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मोदी के जेंडर जस्टिस बनाम राहुल के सोशल जस्टिस के बीच होगी चुनावी लड़ाई: विनोद अग्निहोत्री

सरकार द्वारा संसद का विशेष सत्र बुलाने की खबर ने देश में हलचल मचा दी और विपक्षी इंडिया गठबंधन चौकन्ना हो गया।

समाचार4मीडिया ब्यूरो 2 years ago

विनोद अग्निहोत्री, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक, वरिष्ठ सलाहकार सम्पादक, अमर उजाला।

संसद का विशेष सत्र, नया भवन और महिलाओं को लोकसभा व विधानसभाओं में 33 फीसदी आरक्षण देने वाला नारी शक्ति वंदन विधेयक क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का वो तारणहार अस्त्र है जो अगले लोकसभा चुनावों में विपक्षी इंडिया गठबंधन की सारी किलेबंदी को ध्वस्त करके भारतीय जनता पार्टी और उसके सहयोगी दलों के गठबंधन एनडीए की नैया को चुनावी वैतरणी के पार लगा देगा या फिर इंडिया गठबंधन महिला आरक्षण विधेयक का समर्थन करते हुए इसमें पिछड़े और अति पिछड़े वर्गों की महिलाओं की हिस्सेदारी का सवाल जोड़ कर मोदी सरकार के इस हथियार को जाति जनगणना के सामाजिक न्याय के अपने अस्त्र से कुंद करके हवा का रुख अपने पक्ष में मोड़ देगा। जिस तरह से सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों अपने-अपने एजेंडे पर आगे बढ़ रहे हैं उससे तय है कि अगले लोकसभा चुनावों में लड़ाई महिला आरक्षण बनाम पिछड़े वर्गों को आरक्षण और जातीय जनगणना के मुख्य मुद्दे के बीच होगी। या यूं कहें कि अगले लोकसभा चुनाव में मुकाबला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जेंडर जस्टिस और राहुल गांधी व इंडिया गठबंधन के सोशल जस्टिस के मुद्दे के बीच होगा।

सरकार द्वारा संसद का विशेष सत्र बुलाने की खबर ने देश में हलचल मचा दी और विपक्षी इंडिया गठबंधन चौकन्ना हो गया कि हमेशा अपने औचक फैसलों से देश को चौंकाने और विपक्ष को बचाव की मुद्रा में लाने वाली मोदी सरकार इस बार क्या करेगी। एक देश एक चुनाव, इंडिया बनाम भारत, रोहिणी आयोग की रिपोर्ट और महिला आरक्षण विधेयक जैसे तमाम मुद्दे हवा में उछले कि सरकार इस विशेष सत्र में कुछ ऐसा करेगी जिससे विपक्षी इंडिया गठबंधन के मुद्दों महंगाई, बेरोजगारी, जातीय जनगणना आदि की हवा निकल जाएगी। सरकार ने पहले जानकारी दी कि विशेष सत्र में चार विधेयकों को पारित कराया जाएगा, फिर उनकी संख्या आठ बताई जाने लगी और आखिरकार सत्र जब शुरू हुआ तो केंद्रीय मंत्रिमंडल ने अपनी बैठक में नारी शक्ति वंदन विधेयक-2023 को मंजूरी दी। यह कुछ और नहीं बल्के बदले हुए नाम के साथ लगभग वही महिला आरक्षण विधेयक था जैसा 2010 में तत्कालीन यूपीए सरकार ने राज्यसभा में भारी संघर्ष के बाद पारित करवाया था और गठबंधन की मजबूरी की वजह से लोकसभा में ला ही नहीं पाई थी।

सरकार के रणनीतिकारों को पूरी उम्मीद थी कि एक तरफ यह विधेयक इंडिया गठबंधन में कांग्रेस और अन्य सहयोगी दलों विशेषकर राजद और समाजवादी पार्टी के बीच पिछड़े वर्ग की महिलाओं के लिए अलग से कोटा देने के मुददे पर ऐसी दरार डाल देगा कि विपक्षी एकता बिखर जाएगी। वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस विधेयक के समर्थन को विवश होगी और सरकार इसे पारित करवा कर पूरा श्रेय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को देकर भाजपा अगले चुनाव में आधी आबादी के बीच जाएगी। लेकिन आश्चर्यजनक रूप से कांग्रेस ने न सिर्फ विधेयक पेश होने से पहले ही सोशल मीडिया और अन्य समाचार माध्यमों के जरिए लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं के एक तिहाई आरक्षण के लिए पिछले 27 सालों में किए गए अपने प्रयासों और राजीव गांधी द्वारा पंचायतों में महिलाओं को दस फीसदी आरक्षण देने की घोषणा की याद दिलाते हुए महिला आरक्षण के मुद्दे पर खुद को भाजपा के समानांतर खड़ा करने की पुरजोर कोशिश की।

बल्कि साथ ही अपने पुराने रुख से एकदम उलट उसने नए विधेयक में महिलाओं के लिए आरक्षित सीटों के भीतर अलग से पिछड़ी जाति की महिलाओं के लिए कोटा निर्धारित करने की मांग भी जोड़ दी। इस तरह कांग्रेस ने संकेत दे दिए कि वह इस मामले में इंडिया गठबंधन के अपने सहयोगियों के साथ है।  संसद में विधेयक पर बहस के दौरान सोनिया गांधी, मल्लिकार्जुन खरगे, राहुल गांधी, अधीर रंजन चौधरी समेत सभी कांग्रेस नेताओं ने विधेयक में पिछड़ी जाति की महिलाओं के लिए कोटा तय करने और महिला आरक्षण को फौरन 2024 के लोकसभा चुनावों से ही लागू करने की मांग करते हुए सरकार को बचाव की मुद्रा में ला दिया। विधेयक का समर्थन करते हुए भी कांग्रेस समेत इंडिया गठबंधन के सभी घटक दलों के सांसदों ने जिस आक्रामकता के साथ पिछड़े वर्गों का कोटा तय करने, जातीय जनगणना कराने और विधेयक को फौरन लागू करने की मांग की उससे सत्ता पक्ष के भी कई नेता भी दबे स्वर में सहमत दिखाई दिए। भाजपा नेता और मध्य प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती ने खुलकर विधेयक में पिछड़े वर्गों के लिए अलग से आरक्षित सीटों का पचास फीसदी कोटा तय करने की मांग कर डाली।

एनडीए के घटक दलों के नेता चिराग पासवान, अनुप्रिया पटेल आदि ने भी पिछड़े वर्गों के आरक्षण की बात कही। राहुल गांधी ने तो अपने संक्षिप्त भाषण में सिर्फ तीन ही बातें कहीं। पहली पिछड़े वर्ग अनुसूचित जाति जनजाति की महिलाओं को आरक्षण, दूसरा जातीय जनगणना और तीसरा विधेयक को कानून बनते ही इसी समय लागू करना। राहुल ने सदन के बाहर संवाददाता सम्मेलन में भी यही बात दोहराई।उधर, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस मौके को एक ऐतिहासिक मौका बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। विधेयक को संसद भवन के नए परिसर में पहले सत्र की सबसे बड़ी और ऐतिहासिक उपलब्धि के रूप में प्रदर्शित करते हुए न सिर्फ सभी महिला सांसदों से मिलकर प्रधानमंत्री ने उन्हें बधाई दी बल्कि संसद के दोनों सदनों की दर्शक दीर्घा में भी देश के हर क्षेत्र से बड़ी संख्या में महिलाओं को आमंत्रित करके इस ऐतिहासिक अवसर का साक्षी बनाया गया। संसद के बाहर भी महिलाओं के जत्थे आए और इस ऐतिहासिक उपलब्धि के लिए देश की महिलाओं की तरफ से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बधाई और धन्यवाद दिया गया।

लोकसभा में 454 बनाम दो और राज्यसभा में 215 बनाम शून्य के भारी बहुमत से पारित लोकसभा विधानसभा में महिलाओं को एक तिहाई आरक्षण देने वाला नारी शक्ति वंदन विधेयक यानी 128वां संविधान संशोधन को भाजपा आने वाले पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों और उसके बाद होने वाले लोकसभा चुनावों में अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि के रूप पेश करेगी और उसकी कोशिश होगी कि देश की आधी आबादी का एकमुश्त वोट उसे मिले।पार्टी को उम्मीद है कि जिस तरह पिछले एक साल में महिला पहलवानों के धरने से लेकर मणिपुर तक की घटनाओं से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के रुख को लेकर विपक्ष ने सवाल उठाकर महिलाओं के बीच भाजपा को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश की,नारी शक्ति वंदन विधेयक उसका सबसे कारगर जवाब है और इससे देश की महिलाओं के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता न सिर्फ कायम रहेगी बल्कि उसमें इजाफा भी होगा और भाजपा एनडीए और उसके समर्थक इसे मोदी सरकार का मास्टर स्ट्रोक मानते हैं।

लेकिन विपक्ष भी इस मुद्दे पर अपना मुद्दा हावी करने की कोशिश में जुट गया है।  एक स्वर से इंडिया गठबंधन ने पिछड़े वर्गों की महिलाओं के आरक्षण और जातीय जनगणना के मुद्दे पर जोर देना शुरू कर दिया है। साथ ही इस कानून के लागू होने के समय को लेकर भी सरकार पर निशाना साधा जा रहा है। कांग्रेस ने 25 सितंबर को देश के इक्सीस राज्यों की राजधानियों में अपनी महिला नेताओं से महिला आरक्षण के मुद्दे पर संवाददाता सम्मेलन के जरिए भाजपा के मुद्दे की धार कमजोर करने में जुट गई। पिछड़ों के आरक्षण और जातीय जनगणना के मुद्दे पर राहुल गांधी अखिलेश यादव, नीतीश कुमार, लालू प्रसाद यादव, तेजस्वी यादव जैसे मंडलवादी नेताओं से भी आगे और आक्रामक होते दिख रहे हैं। कांग्रेस इस मुद्दे पर पिछड़े वर्गों को अपने साथ जोड़ कर पहले पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों और फिर लोकसभा चुनावों में इसका सियासी लाभ लेने की पूरी कोशिश कर रही है।

इंडिया गठबंधन के अन्य घटक दल भी इस लड़ाई में कूद पड़े हैं और महिला आरक्षण में पिछड़ वर्गों की महिलाओं के कोटे और जातीय जनगणना को को आगामी राजनीति का केंद्रीय मुद्दा बनाने में जुट गए हैं।  मोदी के लैंगिक न्याय (जेंडर जस्टिस) और राहुल के सामाजिक न्याय (सोशल जस्टिस) की इस चुनावी लड़ाई में भाजपा सरकार की चंद्रयान, जी-20, पांचवी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था और 2047 तक भारत को विश्व की महाशक्ति बनाने के सपने, राम मंदिर निर्माण, धारा 370 की समाप्ति आदि जैसी उपलब्धियां और विपक्ष के बेरोजगारी महंगाई पुरानी पेंशन स्कीम सीमाओं पर चीनी अतिक्रमण, मणिपुर की अशांति आदि जैसे मुद्दे दोनों खेमों के प्रचार में तो होंगे लेकिन चुनावी नतीजों को मुख्य रूप से सामाजिक ध्रुवीकरण (महिला आरक्षण बनाम पिछड़े वर्गों की जातीय जनगणना) ही प्रभावित करेगा।

साभार - अमर उजाला।


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