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धर्म संबंधी मामलों को लेकर संशय से ग्रस्त नजर आती है कांग्रेस पार्टी: ए. सूर्यप्रकाश

जिन राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं, वे मध्य और उत्तर भारत के ऐसे राज्य हैं, जिनमें हिंदुओं की बड़ी आबादी रहती है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो 2 years ago

ए. सूर्यप्रकाश, लोकतांत्रिक विषयों के विशेषज्ञ एवं वरिष्ठ स्तंभकार ।।

कर्नाटक विधानसभा चुनाव में मिली सफलता से उत्साहित कांग्रेस अपनी इस सफलता को मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में भी दोहराना चाहती है। इसके लिए वह कुछ ‘गारंटी’ देने पर भी विचार कर रही है। इस बीच एक मुद्दे पर पार्टी बड़ी दुविधा से ग्रस्त दिखती है और यह मुद्दा है हिंदुत्व का। चूंकि जिन राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं, वे मध्य और उत्तर भारत के ऐसे राज्य हैं, जिनमें हिंदुओं की बड़ी आबादी रहती है तो इस मुद्दे की गंभीरता को अनदेखा नहीं किया जा सकता।

पूरे देश में हिंदुओं की 110 करोड़ से अधिक संख्या है। हिंदुओं की आबादी का एक बड़ा हिस्सा चुनाव में भाजपा को समर्थन देता है। कांग्रेस जिन राज्यों में प्रभावी रह गई है, उसे भी वहां हिंदू जनसंख्या का अच्छा-खासा समर्थन मिलता है। इसके बावजूद कांग्रेस नेता भाजपा से अपनी नफरत के चलते भाषाई मर्यादा की रेखा लांघते रहते हैं। रणदीप सिंह सुरजेवाला इसके ताजा उदाहरण बने। हरियाणा में एक रैली के दौरान उन्होंने यहां तक कह दिया कि भाजपा को वोट देने एवं समर्थन करने वाले राक्षसी प्रवृत्ति के हैं और मैं उन्हें महाभारत की धरती से श्राप देता हूं।

सुरजेवाला की टिप्पणी राजनीति एवं लोकतंत्र की उस मूल भावना के सर्वथा विपरीत है, जिसमें जनता को जनार्दन यानी भगवान की संज्ञा दी गई है। शायद यह पहली बार है कि किसी बड़े राजनीतिक दल के नेता ने मतदाताओं को श्राप दिया है। आम तौर पर यही माना जाता है कि भाजपा अभी तक धार्मिक अल्पसंख्यक मतदाताओं को अपने पाले में नहीं खींच पाई है। यदि ऐसा है तो फिर सुरजेवाला किसे निशाना बना रहे हैं?

हालांकि सुरजेवाला का रवैया हमेशा ऐसा नहीं रहा है। पिछले साल कर्नाटक में जब कांग्रेस के नेता सतीश जारकीहोली ने कहा कि हिंदू एक भद्दा शब्द है, क्योंकि इसकी जड़ें फारस से जुड़ी हैं तो इस पर तुरंत प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए सुरजेवाला ने जारकीहोली के बयान को उनकी निजी टिप्पणी बताया था। उन्होंने न केवल पार्टी को जारकीहोली के बयान से अलग कर लिया, बल्कि उस टिप्पणी की निंदा भी की थी।

अतीत के उलट सुरजेवाला की ताजा टिप्पणी को राजनीतिक पंडित बिल्कुल मणिशंकर अय्यर वाली शैली का मान रहे हैं। अय्यर गाहे-बगाहे अपने बयानों से कांग्रेस की फजीहत कराते हैं, जिनका पार्टी को समय-समय पर खामियाजा भी भुगतना पड़ा है।

कांग्रेस के तमाम शुभचिंतकों का मानना है कि जनवरी 2014 में नरेन्द्र मोदी पर की गई मणिशंकर अय्यर की अपमानजनक टिप्पणी की पार्टी को लोकसभा चुनावों में भारी कीमत चुकानी पड़ी थी। अय्यर से अमूमन किनारा करने वाले कांग्रेसी सुरजेवाला से सहमति जताते हुए उनका बचाव कर रहे हैं। पार्टी के एक अन्य नेता ने भी सुरजेवाला के सुर से सुर मिलाते हुए कहा कि देश में इस समय मानवों और दानवों के बीच संघर्ष छिड़ा हुआ है। कांग्रेस में सुरजेवाला का तेजी से उभार जारी है। वह कर्नाटक के प्रभारी महासचिव हैं। जल्द ही चुनावों का सामना करने जा रहे मध्य प्रदेश का भी उन्हें अतिरिक्त प्रभार दिया गया है।

हिंदुत्व और कांग्रेस को लेकर जारी मौजूदा बहस के बीच पार्टी के एक नेता आचार्य प्रमोद कृष्णम भी अक्सर चर्चा में रहते हैं। वह सीधे सपाट लहजे में कहते हैं कि कांग्रेस की छवि हिंदू-विरोधी झुकाव वाली बन गई है। उनका कहना है कि पार्टी कुछ चाटुकारों-दरबारियों के बीच फंस गई है और यही मंडली हिंदू-विरोधी बातों को प्रचारित करती है। उन्होंने यहां तक कहा कि चूंकि वह माथे पर तिलक लगाते हैं और संत परंपरा वाले परिधान पहनते हैं, इसलिए उनका यही पहनावा एवं तिलक तमाम कांग्रेस नेताओं की आंखों में चुभता है।

उन्होंने स्पष्ट कहा कि वह किसी भी कीमत पर तिलक लगाना नहीं छोड़ सकते। उनका स्पष्ट मानना है कि यदि कांग्रेस को भाजपा से मुकाबला करना है तो उसे इन मुद्दों पर विचार करना होगा। प्रमोद कृष्णम के अनुसार, ‘उनका (कांग्रेस मंडली) हिंदू धर्म को लेकर दुराग्रह है। हिंदू धर्म को निशाना बनाना सही नहीं। न ही हर वक्त मोदी को कोसते रहने से कोई भला होने वाला है।’ उनका यह भी मानना है कि कांग्रेस महात्मा गांधी की वैचारिकी से विमुख होकर वामपंथ की ओर झुक रही है। गांधीजी अपनी बैठक की शुरुआत ‘रघुपति राघव राजा राम’ के साथ करते थे। वहीं, अब कांग्रेस नेताओं को वंदे मातरम और भारत माता की जय बोलना भी सांप्रदायिक लगता है।

आचार्य प्रमोद कृष्णम ने पार्टी नेतृत्व को ‘चुनावी हिंदू’ का चोला धारण करने पर भी आड़े हाथों लिया। उनके कहने का आशय यह है कि चुनावों के समय कुछ कांग्रेस नेता हिंदुओं से जुड़े प्रतीकों को लेकर एकाएक सक्रियता दिखाने लगते हैं, फिर उनकी अनदेखी करने लगते हैं। उन्होंने नाम तो नहीं लिया, लेकिन उनका इशारा संभवत: राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा की ओर था। दोनों नेता विभिन्न राज्यों के चुनावों के दौरान मंदिरों में देखे गए। गुजरात चुनाव के दौरान राहुल गांधी का सोमनाथ मंदिर जाना तो बहुत चर्चित भी रहा।

बड़ी अजीब बात है कि सितंबर, 2017 में जब राहुल के सोमनाथ मंदिर जाने के मुद्दे ने तूल पकड़ा तो सुरजेवाला ने दावा करते हुए राहुल गांधी को ‘जनेऊधारी हिंदू’ तक बता दिया था। नवंबर, 2018 में जब राहुल गांधी पुष्कर स्थित मंदिर गए तो मंदिर के पुजारी ने मीडिया को बताया कि राहुल गांधी दत्तात्रेय गोत्र के कश्मीरी ब्राह्मण हैं। पुजारी ने यह भी बताया कि मंदिर मोतीलाल नेहरू के जमाने से ही नेहरू परिवार का लेखाजोखा रखे हुए है। चुनाव अभियानों के दौरान प्रियंका गांधी वाड्रा भी मंदिरों में दर्शन करते हुए देखी जाती हैं।

सीधे शब्दों में कहा जाए तो राष्ट्रीय फलक पर भाजपा के इतने व्यापक उभार के बाद नेहरू-गांधी परिवार और कांग्रेस धर्म संबंधी मामलों को लेकर दुविधा के शिकार दिखते हैं, जिससे जुड़े रुख में अक्सर उतार-चढ़ाव नजर आता है। आचार्य कृष्णम जैसे नेता पार्टी को इन्हीं तिकड़मों को लेकर चेता रहे हैं। भारत की सबसे पुरानी पार्टी अगर आगामी आम चुनाव में भाजपा को गंभीर चुनौती पेश करना चाहती है तो इसे इस दुविधा का जल्द से जल्द हल निकालना होगा।

(साभार - दैनिक जागरण)


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