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संघ शताब्दी के साथ पारदर्शिता, शुद्धिकरण की चुनौतियां: आलोक मेहता

श्री बालेश्वर अग्रवाल संघ के वरिष्ठ प्रचारक होने के बावजूद संपादक के नाते कांग्रेस तथा अन्य पार्टियों में भी सम्मान पाते थे और एजेंसी को कांग्रेस सरकारों से सहयोग मिलता था।

समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। 5 months ago

आलोक मेहता, पद्मश्री, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ शताब्दी वर्ष की पायदान पर अधिक सफल, पारदर्शी और संगठन के साथ राष्ट्र में बदलाव के लिए तत्पर दिख रहा है। सरसंघचालक मोहन भागवत ने दिल्ली में तीन दिनों के संवाद कार्यक्रम में संघ से जुड़े अनेक महत्वपूर्ण मुद्दों को स्पष्ट किया। विशेष रूप से सत्ता, भाजपा और प्रधानमंत्री के साथ संबंधों, उम्र विवाद, हिन्दू राष्ट्र, धार्मिक मान्यता, मुस्लिम–इस्लाम के अस्तित्व, काशी–मथुरा आंदोलन जैसे मुद्दों पर विरोधियों या समर्थकों के बीच रहे भ्रम के जाले साफ़ किए।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने इन सौ वर्षों में बहुत उतार-चढ़ाव देखे और चुनौतियों का सामना किया। लम्बे समय तक सामाजिक–सांस्कृतिक क्षेत्र में काम करना बहुत कठिन होता है। इस दृष्टि से विश्व में इसे एक हद तक अनूठा संगठन कहा जा सकता है। सबसे रोचक बात यह है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अन्यान्य कारणों से वर्षों तक अपनी गतिविधियों को प्रचारित करना तो दूर रहा, उन्हें गोपनीय रखने का प्रयास भी करता रहा।

बचपन से मैंने उज्जैन, शाजापुर और इंदौर जैसे शहरों से लेकर बाद में राजधानी दिल्ली में संघ की शाखा की गतिविधियों को देखा और समझने का प्रयास किया। कम आयु में हिन्दुस्थान समाचार से अंशकालिक संवाददाता के रूप में जुड़ा और फिर 1971 से 1975 तक दिल्ली में पूर्णकालिक पत्रकार के रूप में कार्य किया। हिन्दुस्थान समाचार में भी राजनीतिक गतिविधियों के समाचार संकलन का काम किया। इसलिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, भारतीय जनसंघ, सोशलिस्ट, कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टियों के नेताओं से मिलने के अवसर भी हुए।

1975 में आपातकाल के दौरान मैंने कई महीने हिन्दुस्थान समाचार के अहमदाबाद कार्यालय में कार्य किया। संस्थान के प्रधान संपादक और महाप्रबंधक श्री बालेश्वर अग्रवाल ने मुझे नियुक्त किया था। दिल्ली में समाचार विभाग में श्री एन. बी. लेले और श्री रामशंकर अग्निहोत्री के मार्गदर्शन में काम किया। इसलिए यह कह सकता हूँ कि सरसंघचालक श्री माधव सदाशिवराव गोलवलकर (गुरूजी) के कार्यकाल से लेकर वर्तमान सरसंघचालक श्री मोहन भागवत की कार्यावधि तक संघ की गतिविधियों के प्रचार कार्य में हुए बदलावों को देखने–समझने के अवसर मिले।

श्री बालेश्वर अग्रवाल संघ के वरिष्ठ प्रचारक होने के बावजूद संपादक के नाते कांग्रेस तथा अन्य पार्टियों में भी सम्मान पाते थे और एजेंसी को कांग्रेस सरकारों से सहयोग मिलता था। कांग्रेस के शीर्ष नेताओं से उन्होंने ही मेरा परिचय कराया, जिससे मुझे काम करने में सुविधा हुई।लगभग 55 वर्ष पहले दिल्ली के झंडेवालान स्थित कार्यालय में समर्पित पदाधिकारी और प्रचारक बेहद सादगी से रहते थे। संघ की शाखा या बौद्धिक विचार-विमर्श के कार्यक्रम सामान्यतः प्रचारित नहीं किए जाते थे। सरसंघचालक नागपुर से समय-समय पर दिल्ली आते लेकिन कोई धूमधाम या प्रचार नहीं होता था। संघ का कोई सदस्यता फार्म या औपचारिक रिकॉर्ड पहले कभी नहीं रहा।

पदाधिकारियों और प्रचारकों के पास अधिकाधिक संपर्क के लिए लोगों के फोन या पते किसी रजिस्टर या डायरी में दर्ज रहते थे।संघ की गतिविधियाँ पहले भी औपचारिक रूप से प्रसारित नहीं होती थीं, लेकिन नागपुर, पुणे, इंदौर, ग्वालियर, लखनऊ, अहमदाबाद और दिल्ली में संघ ने अपनी विचारधारा को समाज में पहुँचाने के लिए अपने समाचार पत्र और पत्रिकाएँ प्रकाशित करना प्रारम्भ किया। पंडित दीनदयाल उपाध्याय, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, के. आर. मलकानी, भानु प्रताप शुक्ल, देवेंद्र स्वरुप, रामशंकर अग्निहोत्री, माणक चंद वाजपेयी, यादवराव देशमुख, विष्णु पंड्या, शेषाद्रि चारी और अच्युतानन्द मिश्र जैसे वरिष्ठ प्रचारक इन पत्र–पत्रिकाओं के संपादन और लेखन का काम भी करते थे।

आपातकाल (1975) में संघ पर प्रतिबंध लगा। तब देशभर में संघ के सैकड़ों लोगों की गिरफ्तारियाँ हुईं, लेकिन अनेक समर्पित प्रचारकों और स्वयंसेवकों ने भूमिगत रहकर सूचनाओं और विचारों को विभिन्न क्षेत्रों तक पहुँचाने का कार्य किया। मुझे स्मरण है कि उन दिनों गुजरात में श्री नरेंद्र मोदी भूमिगत रहकर समाचारों और विचारों की सामग्री तैयार कर गुपचुप बाँटते थे। तब वे संघ के किसी पद पर नहीं थे, मात्र स्वयंसेवक के रूप में सक्रिय थे। अपना वेश बदलकर जेलों में बंद संघ, जनसंघ और सोशलिस्ट पार्टियों के नेताओं को सामग्री पहुँचाने का साहसिक कार्य वे करते थे। नागपुर, लखनऊ और दिल्ली में भी संघ पृष्ठभूमि वाले कुछ पत्रकार भूमिगत रहकर इसी तरह का प्रचार कार्य कर रहे थे।

आपातकाल अधिक समय तक नहीं चला और 1977 में जनता पार्टी की सरकार बनने पर लालकृष्ण आडवाणी सूचना–प्रसारण मंत्री बने। यह पहला अवसर था जब संघ–जनसंघ से जुड़े नेता भारतीय सूचना–प्रचार तंत्र के शीर्ष पद पर पहुँचे। फिर भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपना प्रचार तंत्र उस दौर में भी विकसित नहीं किया। उस समय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और जनसंघ के शीर्ष नेता श्री नानाजी देशमुख जनता पार्टी के साथ सहअस्तित्व के लिए महत्वपूर्ण सेतु की भूमिका निभा रहे थे।जनता पार्टी आने के बाद संघ की गतिविधियों पर अख़बारों–पत्रिकाओं में लेख छपने लगे। विजयादशमी के अवसर पर संघ को लेकर प्रमुख लोगों से बातचीत करके रिपोर्ट या लेख लिखने का अवसर मुझे भी मिला।

पहले सरसंघचालक संघ के प्रकाशन संस्थानों के अलावा किसी अन्य प्रकाशन को इंटरव्यू नहीं दिया करते थे। मुझे सबसे पहले सरसंघचालक प्रो. राजेंद्र सिंह (रज्जु भैया) से विस्तारपूर्वक बातचीत कर इंटरव्यू (अक्टूबर 1997) प्रकाशित करने का अवसर मिला। इसके कुछ वर्ष बाद सरसंघचालक श्री के. सी. सुदर्शन से भी मुझे लम्बा इंटरव्यू (जून 2003) मिला। ये दोनों ऐतिहासिक इंटरव्यू मेरी पुस्तक ‘नामी चेहरों से यादगार मुलाकातें’ में प्रकाशित हैं।उस दौर में तरुण भारत के संपादक रहे श्री एम. जी. वैद्य संघ के बौद्धिक प्रमुख होने के साथ पहले प्रचार प्रमुख भी बने।

श्री वैद्य के प्रयासों से संघ की गतिविधियों की जानकारी समय-समय पर समाज तक पहुँचने लगी। संघ को भारतीय जनसंघ और बाद में भारतीय जनता पार्टी की मातृसंस्था के रूप में देखा जाता है।समाज सेवा और शिक्षा के क्षेत्र में सुनियोजित ढंग से संघ से सैकड़ों लोग जुड़ते रहे। इसी तरह धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियों में संघ के प्रचारक और स्वयंसेवक सक्रिय रहे। लेकिन संघ अपने सामाजिक और सांस्कृतिक कार्यों का सार्वजनिक प्रचार क्यों नहीं करता — इस पर जब भी मैंने नेताओं से प्रश्न किया, उनका उत्तर यही रहा कि “हमें राष्ट्र और समाज के लिए समर्पित भाव से कार्य करना है, प्रचार की भूख नहीं है।”90 के दशक के बाद संघ ने अपने प्रचार तंत्र की ओर ध्यान दिया।

श्री एम. जी. वैद्य के बाद राम माधव, मदन मोहन वैद्य और सुनील आंबेकर घोषित रूप से प्रचार प्रमुख बने। धीरे-धीरे संघ के दरवाजे और खिड़कियाँ लक्ष्मण रेखा के साथ खुलने लगीं। भाजपा के सत्ता में आने पर समाचार माध्यमों में संघ की अधिकाधिक चर्चा होने लगी। सूचना और कंप्यूटर क्रांति आने के बाद पत्र–पत्रिकाओं, टेलीविज़न, वेबसाइट, यूट्यूब, फेसबुक और ट्विटर सहित हर प्रचार माध्यम से संघ की गतिविधियों की जानकारी मिलने लगी। यह कहना भी गलत नहीं होगा कि संघ का प्रचार तंत्र भारत ही नहीं, बल्कि विश्व के अनेक देशों तक फैल गया है।

बताते हैं कि आज संघ की शाखाएँ 68,651 तक पहुँच गई हैं। लक्ष्य है इसे 1,00,000 तक ले जाना। भाजपा सरकार होने से उसे सिर्फ़ तार्किक रूप से ही लाभ नहीं मिला, बल्कि समाज में उसकी दृश्यता और स्वीकार्यता भी बढ़ी। अयोध्या में भव्य मंदिर निर्माण, कश्मीर से धारा 370 की समाप्ति, पाकिस्तान–चीन को करारा जवाब देने की क्षमता, आर्थिक आत्मनिर्भरता, हिन्दू धर्म–मंदिरों का वैश्विक प्रचार–प्रसार, समान नागरिक संहिता पर पहल — क्या यह सब संघ के लक्ष्यों की पूर्ति प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार के बिना संभव था?

सितंबर 2018 में सरसंघचालक मोहन भागवत ने स्पष्ट कहा था:“संघ ने अपने जन्म से ही स्वयं तय किया है कि रोज़मर्रा की राजनीति में हम नहीं जाएँगे। राज कौन करे यह चुनाव जनता करती है। हम राष्ट्रहित पर अपने विचार और प्रयास करते हैं। प्रधानमंत्री और अन्य नेता स्वयंसेवक रहे हैं, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि वे नागपुर के निर्देश पर चलते हैं। राजनीति में कार्य करने वाले मुझसे अधिक अनुभवी हैं। उन्हें हमारी सलाह की आवश्यकता हो तो हम राय देते हैं, लेकिन उनकी राजनीति पर हमारा कोई प्रभाव नहीं है।”

भागवत ने अगस्त 2025 में भी इन बातों को एक बार फिर स्पष्ट किया।संघ के शीर्ष नेता हमेशा इस बात पर ज़ोर देते रहे हैं कि भारत में जन्मे लगभग 98% लोग भारतीय हिन्दू हैं — चाहे वे सिख हों, मुस्लिम हों, ईसाई, बौद्ध या अन्य। सरसंघचालक प्रो. राजेंद्र सिंह ने 4 अक्टूबर 1997 को मुझे दिए इंटरव्यू में कहा था:“भारत में मुसलमानों में केवल 2% के पूर्वज बाहर से आए थे, शेष के पूर्वज इसी देश के थे।

हम उन्हें यह अनुभूति कराना चाहते हैं कि तुम मुसलमान हो, पर भारतीय मुसलमान हो। हमारे यहाँ दर्जनों पूजा पद्धतियाँ हैं, तो एक तुम्हारी भी चल सकती है। इसमें हमें क्या आपत्ति होगी? लेकिन पहचान तुम्हारी इस देश के साथ होनी चाहिए।”हाँ, निचले स्तर पर कुछ अतिवादी नेता हाल के वर्षों में कटुता की भाषा इस्तेमाल करने लगे हैं। यह निश्चित रूप से न केवल मोदी सरकार की, बल्कि भारत की छवि भी दुनिया में खराब करते हैं। उन्हें मोदी का असली दुश्मन कहा जा सकता है।

( यह लेखक के निजी विचार हैं )


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