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‘जब डॉ. वेद प्रताप वैदिक के उस फोन के मायने नहीं समझा और स्टोरी से चूक गया...’

संबंधों को कितनी तरजीह देते थे, इसका उदाहरण ‘नया इंडिया’ अखबार है। हरिशंकर व्यास के साथ अपने संबंधों के चलते ही वह उनके लिए नियमित तौर पर कॉलम लिखते रहे।

समाचार4मीडिया ब्यूरो 2 years ago

अभिषेक मेहरोत्रा, संपादक, बिजनेस वर्ल्ड हिंदी ।।

वैदिक जी नहीं रहे, उनको मैं ‘वैदिक जी’ से ही संबोधित करता था। उनसे संबंध करीब डेढ़ दशक से ही ज्यादा समय से थे, वैदिक जी का अपार स्नेह सदैव मिला। मुझे याद है कि वो दौर, जब मैं `समाचार4मीडिया’ का प्रभारी बना, तो वैदिक जी से कॉलम लिखने का आग्रह किया, उस समय उनको देश का प्रतिष्ठित समाचार पत्र ‘दैनिक भास्कर’ साप्ताहिक कॉलम के 5000 रुपए बतौर पारिश्रामिक दिया करता था। दशक भर पहले ये हिंदी मीडिया संस्थान के लिए बड़ा अमाउंट होता था, जैसे ही मुझे इस बात की जानकारी हुई, मैंने उनको सकुचाते हुए कहा कि सर, मेरा संस्थान आपको इतना बड़ा पारिश्रमिक नहीं दे पाएगा, आपसे हम बाद में कॉलम लिखवाएंगे।

बस इतना सुनना था कि तुरंत बोले, मीडिया मेरा परिवार है, तुम मीडिया पर साइट चला रहे हो, तुमसे 11 रुपए ही लूंगा। आज इस बात का जिक्र इसलिए कर रहा हूं कि वैदिक जी किस तरह निजी संबंधों को महत्व देते थे, ये उसकी बानगी है। समाचार4मीडिया के फाउंडर और एडिटर-इन-चीफ अनुराग बत्रा जी के साथ भी वैदिक जी के बड़े अच्छे संबंध थे। अनुराग जी हिंदी प्रेम के चलते वैदिक जी को अपना गुरु भी मानते हैं, पर वैदिक जी ने कॉलम के पारिश्रमिक के लिए कभी भी अनुराग जी को नहीं बोला, एक बार मैंने कहा भी कि आप बॉस को कह दीजिए, तो उनका जवाब था कि संबंध नैसर्गिक होते हैं, जब तुम्हारे लिए लिख रहा हूं तो पारिश्रमिक के लिए किसी को क्यों बोलूं।

मुझे आज भी याद है वो 13 जुलाई की शाम 8 बजे जब मैं आगरा के आहार रेस्टोरेंट में परिवार संग अपनी बर्थडे पार्टी मना रहा था कि अचानक वैदिक जी का फोन बजा। मैंने मोबाइल उठाया तो उन्होंने कहा कि पाकिस्तान में हाफिज सईद से मुलाकात की है। इतना सुनना था कि मुझे लगा कि अरे, ये क्या हुआ। उस वक्त मेरा पत्रकारिता का शैशवाकाल था, समझ नहीं आया कि उस वक्त के सबसे खतरनाक आतंकी के साथ वैदिक जी की मुलाकात जैसी अतिसंवेदनशील जानकारी को कैसे प्रयोग किया जाए और इसी सोच-विचार और बर्थडे पार्टी के जश्न में ये खबर ब्रेक करने से चूक गया।

चूंकि मैं तड़के जल्दी उठ जाता हूं, तो सबसे पहले रूटीन तौर पर मेल चेक की, तो वैदिक जी ने हाफिज सईद के साथ अपनी मुलाकात की दो फोटो मेल की हुई थीं, पर उसके बाद किस तरह वह खबर पूरी मीडिया में चली, ये सबको पता ही है।

वैदिक जी के साथ निरंतर संवाद होता था। आज भी याद है कि करीब 8 साल पहले गुरुग्राम वाले घर पर जब मैं उनसे मिलने पहुंचा तो तीन बजे थे। वह सबसे पहले बोले कि डाइनिंग टेबल पर बैठो और भोजन करो। मैंने कहा कि सर अब तो 3 बज गए हैं, तो बोले मुझे पता है नोएडा से आए हो, दो घंटे लग गए होंगे तुम्हें। ये कहते हुए तुरंत घर की सहायिका से कहा कि बालक को भोजन कराओ। वाकई उस दोपहर पत्तागोभी और फुलका का जो भोजन वैदिक जी ने कराया, उसकी आत्मीयता आज भी दिल में जिंदा है।

संबंधों को कितनी तरजीह देते थे, इसका उदाहरण ‘नया इंडिया’ अखबार है। हरिशंकर व्यास के साथ अपने संबंधों के चलते ही वह उनके लिए नियमित तौर पर कॉलम लिखते रहे। मैं उनको कभी कभी मजाक में कहता भी था कि सर, आप असल में आज के दौर में कलम के धनी हैं, क्योंकि वैदिक जी अपने लेख पेन से ही लिखते थे। बाद में उनके सहायक मोहन जी उसको टाइप कराते थे।

International Relations पर उनकी जैसी जानकारी और समझ मैंने अपने जीवन पर्यन्त किसी पत्रकार या संपादक में नहीं देखी है। कई देशों के प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति और राजनयिक उनके साथ हॉटलाइन पर रहते थे। रोज सुबह उनके लेख को पढ़कर हम जैसे पत्रकारों की पीढ़ी बहुत कुछ जानती और सीखती थी, पर अब ये सिलसिला टूट गया है।

आज भी उनका लेख लोकमत में प्रकाशित हुआ है, जिसमें उन्होंने ईरान और सऊदी अरब के बीच के समझौते में जिस तरह चीन की चाल को परिभाषित किया है, वह इस विषय को समझने में बहुत सहायक है। आप उनका ये अंतिम लेख नीचे पढ़ सकते हैं-

एक बात जो मुझे उन्हें लेकर सालती रही, वो ये कि मोदी सरकार ने उनकी उपयोगिता नहीं की। जिस तरह मोदी सरकार ने अपने पहले शपथ ग्रहण में अंतरराष्ट्रीय संबंधों को नए परिभाषा देते हुए पड़ोसी मुल्क के शीर्षस्थ को निमंत्रित किया था, उससे उम्मीद थी कि वैदिक जी के अनुभव का फायदा सरकार लेगी, पर....

वैसे 14 मार्च को इस दुनिया के तीन गजब के लोगों की डेथ एनिवर्सरी है- कार्ल मार्क्स, अल्बर्ट आइंस्टाइन और स्टीफन हॉकिंग। तीनों अपने अपने फील्ड में शीर्ष व्यक्तित्व। तीनों ने दुनिया को सबसे ज्यादा प्रभावित किया। अब वैदिक जी भी इसी तारीख को दुनिया को अलविदा कह गए हैं।


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