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बुक रिव्यू: यथार्थ की जमीन पर अनुभव का ताना-बाना है 'मैं गली हूं' काव्य संग्रह
वरिष्ठ पत्रकार विवेक पांडेय का काव्य संग्रह 'मैं गली हूं' पूरी तरह अनुभवजन्य यथार्थ पर आधारित लगता है।
समाचार4मीडिया ब्यूरो 3 years ago
- देवेन्द्र प्रसाद सिंह, वरिष्ठ पत्रकार-साहित्यकार
वरिष्ठ पत्रकार विवेक पांडेय का काव्य संग्रह 'मैं गली हूं' पूरी तरह अनुभवजन्य यथार्थ पर आधारित लगता है। अखबारों में काम करते हुए, इनसे-उनसे मिलते हुए, सिली जुबानों को शब्द देते हुए, कुछ लिखते हुए बिखरी संवेदनाओं के तारों से उन्होंने जो स्वर लहरी निकाली है, वह है 'मैं गली हूं'। पुस्तक के आवरण पृष्ठ पर गली का जो चित्र छपा है, उसमें गली अंधेरी जरूर लगती है मगर उसके आखिरी सिरे पर प्रकाश नजर आ रहा है। दिख रहा है एक बालक जो कुछ निहार रहा है/कुछ सोच रहा है. शायद सुनहरे भारत का ताना-बाना बुनना चाह रहा है।
'रिश्तों का मानचित्र' कविता के जरिये कवि ने जो शब्दचित्र उकेरा है, वह आज के दौर के रिश्तों की परिभाषा गढ़ रहा है। रिश्ते कैसे-कैसे होते हैं, कैसे उन्हें निभाने पड़ते हैं, कितने मतलब और बेमतलब के होते हैं... का ताना-बाना है। और अंत में सलीका बताया गया है- एक समंदर तब जीते हैं जब प्रेम से रिश्तों को सीते हैं... अहंकार की लकीर मिटने लगती है, अब मानचित्र नहीं सिर्फ आसमान होता है।
इनकी कविताओं में व्यवस्था की बेईमानी भी है, बदगुमानी भी है, उसका दोगलापन भी है, पंक्तियां देखिए- जिंदगी में भूख का दर्द जितना सचित्र होता है, यकीनन उससे भी खतरनाक दोहरा चरित्र होता है... तभी तो कवि पूछता है- कुआं दे दिया पानी ही नहीं, ये हाल क्यूं है? बेहयाई देखिए, पूछते हैं- परचम लाल क्यूं है? जीने की जुगत में उसने सुबह से शाम कर डाला, अफसोस, रोटी अब भी उसका सवाल क्यूं है?... इन पंक्तियों में व्यवस्था की जड़ पर गहरी चोट है और गरीबी-गुरबत वाले इलाकों में बढ़ते नक्सलवाद की छाया है।
जैसा कि कवि ने खुद लिखा है कि किन-किन राज्यों में उन्होंने पत्रकारिता की है, उनमें झारखंड और पश्चिम बंगाल भी हैं। इसलिए इनकी पंक्तियों में गांवों का दर्द ज्यादा उफान मार रहा है और व्यवस्था से सवाल कर रहा है। सच भी है कि फणीश्वरनाथ रेणु के 'मैला आंचल' से लेकर श्रीलाल शुक्ल की 'राग दरबारी' में गांवों की जो तस्वीर उभरी थी, उसमें आज भी बहुत कुछ बदलाव नहीं आया है। इसलिए आज का लेखक या कवि जब हाईवे से पांच किमी भीतर गांवों में धंसता है तो उसकी नजरों के सामने 'मैला आंचल' और 'राग दरबारी' के गांव उठ खड़े होते हैं।
दूसरी बात, खबरनवीस जब किसी समाचार पत्र के लिए स्टोरी करने निकलता है, तो वहां का पूरा दर्द जब अपनी स्टोरी में नहीं समेट पाता है तो एक गुव्वार सा उसके सीने में उमड़ता-घुमड़ता रहता है और जब भी उसे कोई मुनासिब मंच या माध्यम मिलता है, वह उसे उड़ेल देता है। 'मैं गली हूं...' में भी कई जगह ऐसे दर्दों का एहसास होता है। स्वाभाविक भी है कि देश की आजादी का अमृत महोत्सव मना रहे हैं, मनना भी चाहिए, लेकिन पता नहीं कि किसके लिए मना रहे हैं, क्योंकि हाशिए पर डाल दिए गए लोग अब भी तो वहीं हैं। उनके पेट के भूगोल का सवाल अगर हल हो गया रहता, तो उनके हाथों में भी लाल परचम नहीं तिरंगा ही होता। इसीलिए कवि कहता है- भूख से कल रात ही टूटा था एक रिश्ता, फिर कब्र में मछली और ऊपर ये जाल क्यूं है..?
इस 70 पन्नों के काव्य संग्रह में शब्द भले कम हैं, लेकिन पैने हैं। घाव गहरे छोड़ते हैं क्योंकि कविता में कोरी कल्पना नहीं है, बिल्कुल यथार्थ है जिसका गवाह कवि खुद है। खूब मालूम है कि फैसला क्या आएगा, इसलिए सवाल जहां का तहां जमा है। किस्मत कैसे बदलेगी, सूरत कैसे बदलेगी (मालूम नहीं)। क्योंकि जब लिखने बैठा था तो किस्मत खुद ही खुदा बनकर, रोसनाई और कलम दे गई दगा राजदां बनकर...
'मै गली हूं' काव्य की कसौटी पर कम लेकिन वक्त की कसौटी पर ज्यादा समीचीन है। कहीं-कहीं प्रूफ की गलतियां रह गई हैं लेकिन कवि ने भाव संप्रेषण में कोई कसर नहीं छोड़ी है। काव्यधारा उत्तरोत्तर पैनी होती गई है। बिम्ब के चयन में भले कुछ कमियां हैं लेकिन सवाल तीखे हैं। 65वें पन्ने पर उम्मीद भी है... कहते रहो सितम बहुत झेले हैं तुमने, हमने सितमगर को प्यार करते देखा है।
कवि और पत्रकार विवेक पांडेय करीब 20 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। बागी बलिया से बीजिंग तक प्रिंट, टीवी और डिजिटल माध्यमों में काम करने का तजुर्बा रखते हैं। वर्तमान में ओटीटी प्लेटफार्म जी5 के वरिष्ठ संपादक हैं। हाल ही में इन्हें देश के 40 चुनिंदा पत्रकारों की सूची में स्थान मिला है। समाचार4मीडिया की ‘40अंडर40’ का खिताब इनके नाम है। इनकी रचना नई और पुरानी दोनों पीढ़ियों के पत्रकारों के लिए सीख भी है कि व्यस्त कार्य योजनाओं से वक्त चुराइए और 'अक्षर यज्ञ' का यजमान बनिए। सृजन को अपने जीवन की आधारभूमि बनाइए। यही आपको जिंदा रखेगी...
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