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बुक रिव्यू: औरंगजेब के राजपूतों से रिश्तों को लेकर फैले भ्रम को दूर करती ये किताब

'औरंगजेब नायक या खलनायक' सीरीज के तीसरे खंड में उसके राजपूतों के साथ संबंधों का जो विश्लेषण किया गया है उससे पता चलता है कि औरंगजेब का झगड़ा सिर्फ सत्ता का था

समाचार4मीडिया ब्यूरो 3 years ago

अजय कुमार, स्वतंत्र पत्रकार ।।

जब भी औरंगजेब की चर्चा होती है हिंदू और इस्लाम धर्म के हिमायतियों को आमने-सामने खड़ा कर दिया जाता है, लेकिन 'औरंगजेब नायक या खलनायक' सीरीज के तीसरे खंड में उसके राजपूतों के साथ संबंधों का जो विश्लेषण किया गया है उससे पता चलता है कि दरअसल, औरंगजेब का झगड़ा सिर्फ सत्ता का था, ताकत का था, सियासत का था। उसे धर्म फ्लेवर देना ठीक नहीं। सत्ता और ताकत के लिए ही उसका जीवन विवादों से भरा रहा है। धर्म से अधिक वो अपना सत्ता बनाए रखने के लिए लड़ रहा था। इसके लिए उसके राजपूत घरानों से विवाद रहे, लेकिन सियासी लोगों ने इस विवाद को धर्म की चाशनी में डूबो दिया।

इस सीरीज में लेखक अफसर अहमद ने तटस्थ होकर इतिहास के इस किरदार पर रोशनी डाली है, जिसे तारीफ और आलोचना की बजाय एक सत्ता के लिए संघर्ष के एक घटनाक्रम के तौर पर देखा जाना चाहिए।

इस बात को लेखक ने स्पष्ट करते हुए लिखा है कि 'ये सिर्फ ताकत के लिए बनते-बगड़ते रिश्तों की कहानी है। यहां न कोई हिंदू है, न कोई मुसलमान है और न कोई प्रजा या बादशाह। सब सत्ता के शतरंज के मोहरे की तरह हैं, जो सिर्फ अपने फायदे के अंतिम सच, ताकत की चाहत के अधीन थे।' फिर क्या मंदिर-मस्जिद के गिरने से इस जंग को धार्मिक मानना ठीक है?  लेखक के अनुसार, इतिहासकार औरंगजेब और राजपूतों के बीच बनते-बिगड़ते संबंधों को हिंदू-मुस्लिम विवाद के रूप में देखते हैं। उनके मुताबिक, मुगलों के खिलाफ हिंदुओं में जो नाराजगी भरी हुई थी, वो औरंगजेब के जजिया कर लगाने के बाद बाहर आ गई। जो बिल्कुल सही नहीं है। अगर किसी को लगता है कि ये विवाद हिंदू बनाम मुस्लिम था, तो उसे गौर करना चाहिए कि जब औरंगजेब का बेटा अकबर बागी हो गया तो राजपूतों ने उसका साथ दिया। जो यह साबित करने के लिए पार्याप्त है कि इस विवाद को हिंदू-मुस्लिम की नजर से देखना ठीक नहीं।

इसी तरह राणा जय सिंह के भाई भीम सिंह का मुगल मनसब स्वीकारना और मारवाड़ में विद्रोह के खिलाफ अभियान चलाना ये साबित करता है कि विवाद हिंदू-मुस्लिम नहीं था। विवाद सिर्फ और सिर्फ ताकत का, जिस पर कुछ लोग धर्म का रंग देने की कोशिश करते हैं। सत्ता बचाने के लिए राजपूतों ने औरंगजेब से हाथ मिलाया और औरंगजेब ने खुद को मजबूत करने के लिए इस काम में कोई गुरेज नहीं किया।

मुगलों और राजपूतों के सत्ता संघर्ष के दो अहम किरदारों से भी इसे समझते हैं। अजीत सिंह और दुर्गादास ने शाही सेवा में जाना स्वीकार कर लिया। दूसरी ओर हैरान करने वाली बात यह कि जो औरंगजेब मारवाड़ और मेवाड़ का विद्रोह दबाने के लिए निकला, उसने उन दो किरदारों को शाही सेवा में ले लिया जो इस विवाद की जड़ माने जाते थे, यानी अजीत सिंह और दुर्गादास। साफ है कि दोनों पक्षों के बीच विवाद पूरी तरह से रणनीतिक था, पावर का था न कि धार्मिक।

लेखक के अनुसार औरंगजेब ने मंदिर गिराए इसका उल्लेख है, लेकिन साथ ही राणा जय सिंह के छोटे भाई भीम सिंह ने गुजरात में आकर करीब 300 मस्जिदें गिरा दीं। वहीं भीम सिंह महाराणा की बादशाह से सुलह होने के बाद 21 अगस्त 1681 को मुगल सेवा में चला गया। जब भीम सिंह औरंगजेब के पास अजमेर पहुंचा तो बादशाह ने उसे राजा का पद और मनसब दिया। अगर हम तर्क करें औरंगजेब धर्म के मामले में बेहद कट्टर माना जाता था, तो उसने सैकड़ों मस्जिदें गिराने वाले भीम सिंह को सेवा में रखने से पहले इन बातों पर विचार क्यों नहीं किया। जाहिर है कि यह विवाद राजनीतिक था न कि धार्मिक।


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