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हैप्पी बर्थडे राजेश बादल: महाभारत के अर्जुन की तरह आपमें है ये बड़ी खूबी
तब राजेश दिल्ली की मेन स्ट्रीम मीडिया से जुड़ते तो राजेश का ही नहीं, देश की टीवी पत्रकारिता का चेहरा आज कुछ अलग होता
समाचार4मीडिया ब्यूरो 6 years ago
डॉ धीमंत पुरोहित, वरिष्ठ पत्रकार।।
यह सिलसिला कब और कैसे शुरू हुआ, हम दोनों में से किसी को भी याद नहीं है। ईमानदारी से कहूं तो मैं राजेश बादल को ‘डाक्साब’ बुलाता हूं और वो मुझे ‘डॉन’। मुझे जानने वाले गीता की सौगंध लेकर कह सकते हैं कि मैं कहीं से भी डॉन नहीं लगता और राजेश बादल बाकायदा पत्रकारों के डॉक्टर लगते हैं और हैं भी। जिन्हें यकीन न हो, वो समाचार4मीडिया में उनका कॉलम ‘मिस्टर मीडिया’ को एक बार यहां क्लिक कर देख लें।
राजेश की पत्रकारिता कई साल पुरानी है। राजेश की प्रिंट पत्रकारिता की शुरुआत इमर्जेंसी के दौरान 1976 में हुई थी। हमारे ‘बादल’ राजेन्द्र माथुर और प्रिंट वाले एसपी के युग से बरसते रहे हैं। प्रिंट के साथ-साथ रेडियो में भी गए। बाद मैं जब टीवी आया तो 1988 में जयपुर दूरदर्शन पर राजेश बादल दिखे। 1992 में बादल भोपाल आ गए और भोपाल दूरदर्शन पर समाचार पढ़ने वाले सबसे पहले एंकर बने। टीवी में खबरों का पहला यादगार निजी कार्यक्रम 1992 में विनोद दुआ का ‘परख’ था, राजेश बादल उसमें भी थे।
एसपी सिंह ने दूरदर्शन के मेट्रो चैनल पर देश का पहला रोजाना हिंदी खबरों का निजी कार्यक्रम ‘आजतक’ शुरू किया तो राजेश बादल का उनकी पहली ड्रीम टीम में भोपाल के प्रतिनिधि के रूप में जुड़ना स्वाभाविक था। एसपी भविष्य देख सकते थे। 1995 में उन्होंने राजेश को एग्जीक्यूटिव प्रड्यूसर(इनपुट) दिल्ली आने का न्योता दिया, पर शायद पारिवारिक जिम्मेदारियों के चलते राजेश तब वो न्योता कबूल न कर सके। अगर तब राजेश दिल्ली के मेन स्ट्रीम मीडिया से जुड़ते तो राजेश का ही नहीं देश की टीवी पत्रकारिता का चेहरा आज कुछ अलग होता।
खैर, दस साल बाद 2005 में राजेश ने ‘आजतक’ छोड़ा और एक–डेढ़ मिनट की न्यूज स्टोरीज़ के दायरे से निकल कर आधे–एक घंटे की बेहतरीन डॉक्यूमेंटरीज बनाना शुरू किया। ‘आजतक’ के बाद राजेश बादल के मीडिया करियर का दूसरा महत्वपूर्ण दौर ‘राज्यसभा टीवी’ के एग्जिक्यूटिव डायरेक्टर के तौर पर है। राजेश बादल ने पत्रकारिता, साहित्य, खेल और फिल्मी हस्तियों पर डॉक्यूमेंटरीज बनाईं। ये न सिर्फ डॉक्यूमेंटरीज हैं बल्कि भारतीय संस्कृति का टाइम कैप्सूल हैं।
हां, बादल अब मुक्त पंछी हैं। रिटायरमेंट के बाद वो देश भर में घूमःघूम कर अपना ज्ञान बांटते रहते हैं। मुमकिन है ऐसे ही किसी कार्यक्रम में वो ज्ञान आप पर भी बरस जाए। महाभारत के अर्जुन के बारे में कहा जाता है कि वो दोनों हाथों से एक समान श्रेष्ठता से तीर चला सकते थे। हमारे राजेश बादल दो नहीं, चार तीर एक साथ चलाते हैं–प्रिंट, रेडियो, टीवी और डिजिटल मिडिया– वो भी एक समान महारत से। इतना लिख लेने के बाद अब मुझे थोड़ा डर भी लगने लगा है। राजेश बादल को ‘डाक्साब’ कहते-कहते आखिर मैं डॉक्टर बन गया। मुझे डॉन कहते-कहते कहीं राजेश बादल डॉन न बन जाएं! हैप्पी बर्थडे डाक्साब!
टैग्स राजेश बादल जन्मदिन मुबारक धीमंत पुरोहित