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पलायन के मुद्दे को अभिशाप मानें या वरदान: आलोक मेहता
युवाओं को बाहर जाकर काम की तलाश करनी पड़ी है। एक अध्ययन में पाया गया कि प्रवासी परिवारों में लगभग 80% लोग भूमिहीन या 1 एकड़ से कम जमीन वाले थे।
समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। 3 months ago
आलोक मेहता, वरिष्ठ पत्रकार, पद्मश्री, लेखक।
बिहार विधानसभा चुनाव में रोजगार और बिहारियों के पलायन का मुद्दा महत्वपूर्ण बन गया है। निश्चित रूप से यह किसी भी राज्य या देश के लिए जनता और सत्ता से जुड़ा मुद्दा है। अपेक्षा होती है कि सरकारें इस समस्या का समाधान करे। लेकिन क्या पलायन केवल मजबूरी में होता है? घर, गाँव, शहर, प्रदेश, देश से बाहर जाने के लिए हर व्यक्ति और परिवार की आवश्यकता, महत्वाकांक्षा और सपनों पर निर्भर होती है।
फिर यह कैसे भुलाया जा सकता है कि बाहर जाकर नौकरी, मजदूरी, शिक्षा, अपना काम-धंधा, तरक्की, सुख-सुविधा के साथ अपने परिजनों को भेजी जाने वाली धनराशि से न केवल परिवार बल्कि उस क्षेत्र और राज्य के सामाजिक-आर्थिक बदलाव का कितना लाभ मिलता है। यह सवाल केवल राजनीति और चुनाव के लिए नहीं है। बिहार में बंद उद्योग चालू हों, बाहरी निवेश आए, अपराध नियंत्रित हो, भ्रष्टाचार को रोकने के कदम उठाए जाएँ इससे कोई असहमत नहीं हो सकता।
लेकिन जो लोग अपने जीवन में सुधार के लिए बाहर जाते हैं, उन्हें कमजोर और मजबूर कहना कैसा न्याय है? वे नए स्थानों पर विकास में बड़ी भूमिका निभाते हैं, बिहार या जिस क्षेत्र के हों, उनका गौरव बढ़ाते हैं। भारत के डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक ही नहीं, बैंकर्स, प्रबंधक, व्यापारी और औद्योगिक समूह दूरगामी लाभ भारत को देते हैं। बिहार में माइग्रेशन यानी बाहर जाकर काम करने या बसने वालों की एक लंबी परंपरा रही है।
यह प्रवासन सिर्फ देश के अंदर नहीं, बल्कि विदेशों तक फैला है। यदि बाहर से आने वाली कुल धनराशि करीब 9,88,000 करोड़ रुपये है और बिहार का हिस्सा 14.8 हजार करोड़ रुपये बनता है, तो ग्रामीण बिहार में अधिकांश परिवार आज भी कृषि या सीमित स्वरूप की असंगठित मजदूरी पर निर्भर हैं। खेती का आकार बहुत छोटा-मोटा है और औद्योगिक अवसर काफी कम रहे हैं।
इससे युवाओं को बाहर जाकर काम की तलाश करनी पड़ी है। एक अध्ययन में पाया गया कि प्रवासी परिवारों में लगभग 80% लोग भूमिहीन या 1 एकड़ से कम जमीन वाले थे। अध्ययन से यह भी पता चला कि 85% प्रवासी कम-से-कम 10वीं पास थे—यह संकेत है कि युवा-शिक्षित लोगों ने भी बाहर जाकर अस्थायी या स्थायी रोजगार की ओर रुख किया।
काम के लिए वे पंजाब, महाराष्ट्र, दिल्ली, खाड़ी देशों तक जाते हैं, जहाँ निर्माण, सेवा-उद्योग, कारखाने इत्यादि में काम मिलता था। एक अध्ययन के अनुसार लगभग 50% से अधिक बिहार-ग्रामीण परिवारों में कम-से-कम एक सदस्य प्रवासी है। बिहार से बाहर जाकर काम कर रहे प्रवासी-कर्मी/पेशेवरों द्वारा भेजी गई रकम ने राज्य-अर्थव्यवस्था और घरेलू जीवन दोनों पर असर डाला है।
परिवारों ने इन रकमों का उपयोग मुख्यतः दैनिक खर्च (खाना-पीना, बिजली-पानी), शिक्षा-स्वास्थ्य में किया है। अध्ययन में यह भी पाया गया कि रेमिटेंस प्राप्त परिवारों में शिक्षा-उपस्थिति, पोषण-स्थिति और स्वास्थ्य-खर्च में सुधार देखने को मिला है। सर्वे में बताया गया कि प्रवासी के बाद परिवार की आर्थिक स्थिति, बच्चों की शिक्षा तथा सामाजिक स्थिति सुधरी है।
ग्रामीण श्रम-बाज़ार में भी बदलाव आए हैं—प्रवासी मजदूरों के बाहर जाने से स्थानीय मजदूरी थोड़ी-बहुत बढ़ी, काम करने वालों की समस्या-स्थिति बदली। सामाजिक संरचना और जीवनशैली में कई तरह के बदलाव देखने को मिले—जैसे रेमिटेंस आय मिलने से बच्चों की स्कूल शिक्षा का खर्च उठाना आसान हुआ, शिक्षा-उपस्थिति में सुधार हुआ, स्वास्थ्य-सेवाओं तक पहुँच बेहतर हुई, परिवारों ने अस्पताल-दवा के खर्च को वहन करने की क्षमता पाई।
रेमिटेंस की मदद से गाँवों में कच्चे मकानों से पक्का घर बनने लगे—जैसे गोपालगंज और सीवान में यह प्रवृत्ति स्पष्ट है; वहाँ 80% से अधिक स्थानीय अर्थव्यवस्था प्रवासी रेमिटेंस पर आधारित है। परिवारों की सामाजिक स्थिति और आत्मविश्वास बढ़ा, गृहिणियों को नए अवसर मिले। रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि महिलाओं ने महसूस किया कि आर्थिक स्तर, जीवनशैली, बच्चों की शिक्षा और स्वास्थ्य में सुधार हुआ।
उपभोग-शैली में परिवर्तन हुआ—जैसे मोबाइल-फोन, बैंक-खाता, दूर काम कर रहे सदस्यों से मोबाइल संवाद, बैंकिंग का उपयोग बढ़ा; उदाहरण के तौर पर 80% महिलाओं ने बैंक खाता बना लिया था। प्रवासी होने के कारण परिवारों में “न्यूक्लियर” (एकल) परिवार की प्रवृत्ति बढ़ी। महिलाओं की निर्णय-क्षमता बढ़ी। कुछ प्रवासी बाहर से अनुभव लेकर लौटे और अपने गाँवों-शहरों में नए काम पर नियुक्त किए गए। भारत में घरेलू और अंतरराष्ट्रीय दोनों तरह के प्रवासन का आर्थिक और सामाजिक प्रभाव गहरा है।
प्रवासी मजदूर, पेशेवर और व्यापारी न सिर्फ परिवारों का सहारा बनते हैं, बल्कि उनकी भेजी गई धनराशि भी संबंधित राज्यों की अर्थव्यवस्था को प्रभावित करती है। रिज़र्व बैंक की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में 2023–24 में कुल 9,88,000 करोड़ रुपये की धनराशि विदेशों से आई। बिहार सरकार ने कहा है कि लगभग 57 लाख लोग राज्य के बाहर रह रहे/काम कर रहे हैं, जिनमें लगभग 52 लाख रोजगार-वश पलायन वाले बताए गए हैं।
अन्य राज्यों के उदाहरण देखें तो केरल में खाड़ी देशों सहित विदेशों में बसे प्रवासी हर साल लगभग 1.95 लाख करोड़ रुपये भेजते हैं; तमिलनाडु को लगभग 1,02,752 करोड़, महाराष्ट्र को करीब 2,02,540 करोड़ और गुजरात को लगभग 34,580 करोड़ रुपये का रेमिटेंस मिलता है। इस पृष्ठभूमि में पलायन को केवल अभिशाप कहना अनुचित है।
सामान्य रिक्शा वाला या टैक्सी चालक भी अपने घर-परिवार को सहयोग देता है, उन्हें समय आने पर साथ बुलाता है, बच्चों को शिक्षा और सुविधाएँ देता है और फिर कई बार वापस गाँव-शहर लौटकर नई शुरुआत भी करता है। बिहार में अब 22 मेडिकल कॉलेज, आधुनिक अस्पताल, बेहतर सड़कें और सुगम रेल-हवाई यात्रा उपलब्ध है। पटना, मुजफ्फरपुर, भागलपुर, गया में सुंदर बड़े घर, इमारतें और कारें दिखने लगी हैं—यह आर्थिक प्रगति सरकार के साथ-साथ बिहार के लोगों की मेहनत और प्रवासन से आई पूँजी का भी परिणाम है।
( यह लेखक के निजी विचार हैं )
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