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बिहार के मतदाता के मन को पढ़ना आसान नहीं: समीर चौगांवकर

अगर बीजेपी को लोकसभा मे मिले वोट से कम वोट मिलते है तो एनडीए को कड़ा संघर्ष करना होगा और यदि लोकसभा से ज्यादा वोट मिलते है तो एनडीए प्रचंड बहुमत की सरकार बना लेगा।

समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। 3 months ago

समीर चौगांवकर, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक।

लोकसभा चुनाव के लगभग डेढ़ साल बाद बिहार विधानसभा के चुनाव होते हैं, लेकिन बिहार के लोकसभा और विधानसभा के पिछले चार चुनावों का मतदान पैटर्न यह बताता है कि लोकसभा में मतदाता भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को प्राथमिकता देते हैं, लेकिन विधानसभा चुनाव में भाजपा की तुलना में क्षेत्रीय दलों की ओर झुकाव दिखाते हैं। 2004 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को 5 सीटें और 14.57 प्रतिशत वोट मिले थे, लेकिन 2005 के बिहार विधानसभा चुनाव में भाजपा को 37 सीटें और 10.97 प्रतिशत वोट मिले।

यानी लोकसभा की तुलना में लगभग 4 प्रतिशत कम वोट। 2009 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को 12 सीटें और 13.99 प्रतिशत वोट मिले, वहीं 2010 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को 91 सीटें और 16.49 प्रतिशत वोट मिले। यानी इस बार लोकसभा की तुलना में 2.5 प्रतिशत ज्यादा वोट मिले। यह चुनाव एकमात्र अपवाद था, जिसमें नीतीश कुमार और भाजपा ने मिलकर प्रचंड जीत दर्ज की थी। 2014 के लोकसभा चुनाव में बिहार में भाजपा को 22 सीटें और 29.86 प्रतिशत वोट मिले थे, वहीं डेढ़ साल बाद हुए 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में भाजपा को 53 सीटें और 24.42 प्रतिशत वोट मिले।

2014 का लोकसभा चुनाव और 2015 का विधानसभा चुनाव नीतीश कुमार ने भाजपा से अलग होकर लड़ा था। 2014 में नीतीश के साथ न होने पर भी बिहार के मतदाताओं ने भाजपा के पक्ष में वोट किया था, और उन्हीं मतदाताओं ने 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में नीतीश-लालू के गठबंधन के पक्ष में जमकर मतदान किया। 2015 में बिहार विधानसभा चुनाव में भाजपा 157 सीटों पर लड़ी और केवल 53 सीटें जीत सकी। लोकसभा चुनाव की तुलना में भाजपा के वोटों में 5.44 प्रतिशत की कमी आई थी।

2019 के लोकसभा चुनाव में नीतीश कुमार और भाजपा ने मिलकर चुनाव लड़ा, जिसमें भाजपा ने 24.05 प्रतिशत वोट के साथ 17 सीटें जीतीं। लेकिन 2020 के विधानसभा चुनाव में भाजपा का वोट प्रतिशत घटकर 19.46 प्रतिशत रह गया और सीटें मिलीं 74, 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को बिहार में 12 सीटें और 20.52 प्रतिशत वोट मिले। लोकसभा चुनाव के डेढ़ साल बाद होने जा रहे बिहार विधानसभा चुनाव में यह बड़ा सवाल है कि क्या बिहार का मतदाता लोकसभा की तरह मतदान करेगा या फिर एक बार फिर क्षेत्रीय दलों पर भरोसा जताएगा।

भाजपा की वोट हिस्सेदारी पिछले दो चुनावों के पैटर्न के अनुसार घटेगी या फिर भाजपा और नीतीश कुमार मिलकर 2010 का प्रदर्शन दोहराने जा रहे हैं, जब एन.डी.ए. को प्रचंड जीत मिली थी। 2010 में भाजपा और जेडीयू ने मिलकर 206 सीटें जीती थीं। इस बार ऐसा संभव नहीं है क्योंकि भाजपा और जेडीयू मिलकर केवल 202 सीटों पर चुनाव लड़ रही हैं।

इस बार चुनाव का पूरा दारोमदार एन.डी.ए. की तरफ से भाजपा के कंधों पर है और महागठबंधन की तरफ से यह जिम्मेदारी तेजस्वी यादव के कंधों पर है। यदि भाजपा को 2024 के लोकसभा में मिले वोट से कम वोट मिलते हैं, तो एन.डी.ए. को सत्ता बचाने के लिए कड़ा संघर्ष करना होगा। और यदि लोकसभा से अधिक वोट मिलते हैं, तो एन.डी.ए. प्रचंड बहुमत की सरकार बना लेगा। देखना दिलचस्प होगा कि बिहार की जनता इस बार लोकसभा चुनाव के तर्ज पर मतदान करती है या फिर बिहार में चले आ रहे परंपरागत ट्रेंड के आधार पर।

फिलहाल यह चुनाव दो ध्रुवीय दिखाई दे रहा है। सीधा मुकाबला एन.डी.ए. और महागठबंधन के बीच है, लेकिन तीसरे कोण को भी नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। इस बार बिहार के मतदाताओं के मन को पढ़ना आसान नहीं है। जीत का दावा सब कर रहे हैं, लेकिन यह भी सच है कि सबकी सांसें अटकी हुई हैं। बिहार के मतदाता किसे तर करते हैं और किसे प्यासा छोड़ते हैं। यह देखने के लिए 14 नवंबर का इंतज़ार करना पड़ेगा।

( यह लेखक के निजी विचार हैं )


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