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भोपाल में बंसी कौल के ‘तुक्कू’ ने फिर मचाया धमाल: पशुपति शर्मा
23 अगस्त को भोपाल के एलबीटी सभागार में बंसी कौल और फरीद बज्मी को याद किया गया। उन्हें नमन किया गया।
समाचार4मीडिया ब्यूरो 2 years ago
पशुपति शर्मा, कार्यकारी संपादक, इंडिया न्यूज ।।
शायरों के लिए मोहब्बत का प्रतीक रहा है चांद। ये एक अजीब संयोग ही रहा कि जिस वक्त हिन्दुस्तान का हर शख़्स चांद पर फ़तह की खुशियां मना रहा था, भोपाल के एक छोटे से सभागार में मोहब्बत की चांदनी स्मृतियां दिल-ओ-दिमाग को शीतलता से सराबोर कर रही थीं। मोहब्बत का ये छोटा सा चांद बंसी कौल ने बसाया, सजाया और संवारा, जिसकी शीतलता रंगमंच की दुनिया सदियों तक महसूस करती रहेगी।
23 अगस्त को भोपाल के एलबीटी सभागार में बंसी कौल और फ़रीद बज़्मी को याद किया गया। उन्हें नमन किया गया। रंग-विदूषक संस्था को चांद सी बुलंदी पर ले जाने वाली इन दोनों शख़्सियतों की प्रतिमा के सामने दीप प्रज्ज्वलन की रस्म भी निभाई गई। ‘रंग विदूषक -ए मास्क विदआउट मास्क’ पुस्तक का विमोचन हुआ। रंग विदूषक की सफलतम प्रस्तुतियों में शुमार ‘सीढ़ी दर सीढ़ी उर्फ़ तुक्के पर तुक्का’ का मंचन किया गया। ये सब कुछ सभागार में मौजूद रंग-प्रेमियों ने देखा, लेकिन इसी सभागार में मौजूद था वो ‘आखिरी परिवार’ जिस पर बंसी कौल को पक्का यक़ीन था। बंसी कौल हमेशा कहा करते थे- जब सारे परिवार हाशिए पर चले जाएंगे, जब तमाम अस्मिताएं नफरत की भेंट चढ़ जाएंगी तब भी बचा रहेगा एक परिवार और वो परिवार-रंगमंच का परिवार होगा।
भोपाल में कई शहरों से जुटे रंगकर्मियों ने बंसी कौल के कहे को सच कर दिखाया। बंसी कौल यानी एक घुमक्कड़ रंगकर्मी जिसने एक साथ कई-कई शहरों से रिश्ता बनाया, जिसने एक साथ कई-कई कला बिरादरियों से रिश्ता निभाया। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय का तमगा लेकर बंसी कौल ने कभी ख़ुद को श्रेष्ठतम की क़तार में खड़ा करने की कोशिश नहीं की, बल्कि वो तो आजीवन कुछ सीखने की लालसा से सराबोर रहे। लोक कलाकारों की दुनिया में विचरते रहे नटों -अखाड़ेबाजों की दुनिया में घूमते रहे। ठहराव उन्हें कभी पसंद नहीं आया। कलाकार, चित्रकार, कवि, स्वप्नद्रष्टा, विचारक, चिंतक, समाज विज्ञानी- बंसी कौल की शख्सियत में कई-कई किरदार समाए रहे।
कश्मीर के बाद दिल्ली, फिर कानपुर और लखनऊ जैसे शहरों में शुरुआती रंगकर्म के बाद बंसी कौल ने भोपाल को अपना ठिया बना लिया। यहां 80 के दशक में रंग-विदूषक नाम की संस्था बनाई। कई-कई शहरों के कलाकारों को जोड़ा और अपनी ही शैली बनाई- विदूषकीय शैली। रंग-विदूषक की मूल चेतना में ‘हास्य’ शामिल रहा, लेकिन ये हास्य फूहड़ता का प्रतीक नहीं बना। इस हास्य ने अपनी गरिमा स्थापित की। रंग-विदूषक का विदूषक शरीर की आड़ी तिरछी अदाओं से दर्शकों के ठहाकों तक महदूद नहीं रहा, बल्कि इसने अपने तंज से दर्शकों को दुनियावी हकीकत को सोचने-समझने पर मजबूर किया।
एलबीटी सभागार में प्रस्तुत नाटक ‘तुक्के पर तुक्का’ के ‘तुक्कू मियां’ हुक्मरानों की असलियत बयां करते हैं। नवाब के दरबार में किस कदर मूर्खतापूर्ण फैसले होते हैं और कैसे आम रियाया पिसती चली जाती है, नाटक इन सब की परतें उधेड़ता चला जाता है। सरकार की ठसक, अफसरों की चाटुकारिता, बौद्धिक दिवालियापन और इन सबके बीच एक मसखरे की ‘फिक्र’ सब कुछ मंच पर साकार होता चला जाता है। बंसी कौल के कलाकार एक चलायमान चित्र की तरह मंच पर आते-जाते हैं और सभागार में मौजूद हर दर्शक मंत्र-मुग्ध सा उन्हें निहारता रहता है।
ठहाके भी लगते हैं और बुदबुदाहट भी सुनाई देती है। तुक्कू मियां की भूमिका उदय शहाणे ने निभाई, जो सालों से इस किरदार में रच-बस गए हैं। सत्तर पार का कलाकार यूं लगता है मानो गली-मोहल्ले का सबसे शैतान बालक बन गया हो। नवाब की भूमिका में हर्ष दौंड अपनी अदाओं से दर्शकों का ध्यान खींचते है। माशूका नीति श्रीवास्तव, आखिरी नवाब - संजय श्रीवास्तव और क्राउड में मौजूद हर कलाकार अपनी भूमिका का निर्वहन बड़ी शिद्दत से करता है। बंसी कौल के नाटकों के सबसे अहम किरदार रहे हैं ‘क्राउड’, क्योंकि वो सामूहिकता का उत्सव मनाने की परंपरा में यकीन करते हैं।
तुक्के पे तुक्का नाटक चीनी कहानियों पर आधारित है लेकिन भोपाली चासनी में इस कदर पिरोया गया है कि पूरा नाटक भोपाली सूरमाओं का होकर रह गया है। आलेख राजेश जोशी का है लेकिन इसका पहला ड्राफ्ट तैयार करने वाले फरीद बज्मी को उनके हिस्से का क्रेडिट देना राजेश जोशी कभी नहीं भूलते। संगीत अंजना पुरी ने तैयार किया है, जो नाटक की जान है। चाहे अनचाहे अंजना पुरी इन दिनों रंग-विदूषक संस्था की धुरी बन गई हैं, जिनके एक बुलावे पर बंसी कौल का पूरा ‘रंग-परिवार’ भोपाल में उमड़ पड़ा। भोपाल में उमड़ते घुमड़ते बादलों के बीच विदूषक परिवार की मीठी बूदें जमीन पर पड़ीं और चांद तक ‘बंसी’ की मोहब्बत भरी बांसुरी की मिठास पसरती चली गई।
(साभार- इंडिया न्यूज)
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