हिंदी आज भी अंग्रेजी की छाया में जीने को मजबूर है, कभी उसकी अधीन बनकर, तो कभी उसकी सहायिका बनकर।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
आज जब हम हिंदी दिवस मना रहे हैं, यह सवाल बार-बार दिल और दिमाग में गूंजता है कि स्वतंत्रता के इतने दशकों बाद भी हिंदी को उसका वास्तविक स्थान क्यों नहीं मिला। यह वही हिंदी है, जिसने करोड़ों लोगों को जोड़ने का सेतु बनाया, जिसने हमारी मिट्टी की खुशबू और हमारी संस्कृति की आत्मा को दुनिया तक पहुंचाया। लेकिन अफसोस की बात यह है कि वही हिंदी आज भी अंग्रेजी की छाया में जीने को मजबूर है, कभी उसकी अधीन बनकर, तो कभी उसकी सहायिका बनकर।
नीति-नियंताओं ने हमेशा हिंदी को सम्मान देने और उसके प्रचार-प्रसार की बात जरूर की, लेकिन उनके प्रयास अधूरे ही रहे। हकीकत यह है कि हिंदी ने हमारे समाज और अर्थव्यवस्था को सहारा दिया, रोजगार दिया, उद्योगों को खड़ा किया, लेकिन स्वयं अपने हक से वंचित रही। हिंदी फिल्मों से लेकर हिंदी पत्रकारिता और मीडिया उद्योग तक- सबकी नींव हिंदी पर खड़ी है। इनसे करोड़ों लोगों की रोजी-रोटी चल रही है, फिर भी विडंबना यह है कि हिंदी आज तक राष्ट्रभाषा का दर्जा नहीं पा सकी।
प्रिंट, टीवी या डिजिटल- मीडिया का हर माध्यम हिंदी की ताकत से फल-फूल रहा है, लेकिन संवैधानिक रूप से हिंदी आज भी राजभाषा होकर एक “सहायिका” भर है। यह स्थिति हर उस भारतीय को चुभती है, जो अपनी मातृभाषा को सिर्फ संवाद का नहीं, बल्कि आत्मसम्मान का प्रतीक मानता है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हिंदी को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पहचान और सम्मान दिलाने का जो साहसिक कदम उठाया है, वह काबिले-तारीफ है। लेकिन असली सवाल यही है कि क्या यही सरकार आने वाले समय में हिंदी को राष्ट्रभाषा का संवैधानिक दर्जा दिलाने की हिम्मत दिखाएगी? अगर इस हिंदी दिवस पर यह बड़ा फैसला हो जाता है, तो न सिर्फ हिंदी दिवस सफल होगा बल्कि यह देश के हर उस दिल को तसल्ली देगा, जो वर्षों से हिंदी के हक की प्रतीक्षा कर रहा है।
समाचार4मीडिया ने इस अवसर पर मीडिया में हिंदी की बदलती भूमिका पर विशेष आलेखों का संग्रह प्रस्तुत किया है। यह प्रयास केवल लेखों का संग्रह नहीं है, बल्कि हिंदी के उत्थान और उपेक्षा के बीच के संघर्ष का आईना है। उद्देश्य यही है कि पाठकों तक हिंदी की ताकत, उसकी चुनौतियां और उसके भविष्य की दिशा एक ही मंच पर पहुंच सके।
कालजयी कवियों, लेखकों, भक्तों, विद्वानों ने हिंदी भाषा और साहित्य को नई ऊंचाई दी विस्तार दिया और लोकप्रिय बनाया। हिंदी संघर्ष और स्वतंत्रता आंदोलन की भाषा बनी।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
विनोद अग्निहोत्री,
सलाहकार संपादक, अमर उजाला।।
आज हिंदी दिवस है। हर साल की तरह इस बार भी हिंदी के प्रचार प्रसार के दावों और वादों के साथ देश में सरकारी गैर सरकारी कार्यक्रम आयोजित हैं। रविवार की छुट्टी होने के कारण इस बार सरकारी दफ़्तरों में हिंदी में कामकाज का ढोंग नहीं हो पा रहा है वरना एक दिन के लिए ये भी हो जाता और साल भर के लिए हिंदी के प्रयोग को विदा कह दिया जाता।
हिंदी की स्वीकार्यता और प्रसार में दो तीन बड़ी बाधायें हैं। पहली हिंदी को कथित सरकारी सरंक्षण जिसने हिंदी को न सिर्फ़ सरकारों पर आश्रित बना कर उसे वैसा लाड़ला बच्चा बना दिया जिसकी संघर्ष क्षमता कमजोर पड़ती है साथ ही वो दूसरों की ईर्ष्या का पात्र भी बनता है। हिंदी के साथ यही हुआ। कथित सरकारी सरंक्षण ने उसे सरकारी कामकाज और संस्थानों में अनुवाद की भाषा बना कर उसके विकास को पंगु कर दिया और अन्य भारतीय भाषा भाषी उसे अपने ऊपर थोपे जाने के भय से उसके अकारण विरोधी हो गये। सरकारी शब्दकोषीय अनुवाद की भाषा ने हिंदी के प्रयोग को दुरूह और अरुचिकर बना दिया।
इसके साथ ही कथित सरकारी सरंक्षण ने हिंदी के विकास के नाम पर भाषायी ठेकेदारों की ऐसी जमात भी पैदा की जो सरकारी अनुदानों पद और सम्मानों के लिए हिंदी की नहीं अपनी चिंता गुटबाज़ी में उलझे रहे। इसने हिंदी को कई मठों में बदल दिया और हिंदी क्षेत्र की बोलियों और भाषाओं की अस्मिता भी हिंदी से टकराने लगी। उनके समर्थकों का आग्रह हिंदी से ज़्यादा अपनी बोलियों और भाषाओं को मान्यता दिलाने के लिए हो गया। जब देश में मुस्लिम बादशाहों और अंग्रेजों का राज था तब हिंदी स्वाभाविक और सहज ढंग से फूली फली।
कालजयी कवियों, लेखकों, भक्तों, विद्वानों ने हिंदी भाषा और साहित्य को नई ऊंचाई दी विस्तार दिया और लोकप्रिय बनाया। हिंदी संघर्ष और स्वतंत्रता आंदोलन की भाषा बनी। गांधी, पटेल, सुभाष, नेहरू जैसे नेताओं ने हिंदी को संवाद और संप्रेषण की भाषा के रूप में स्वीकार किया। अनेक कालजयी रचनाओं ने हिंदी और हिंदी क्षेत्र की बोलियों और भाषाओं को एक सूत्र में पिरोया।
अन्य भारतीय भाषाओं के साथ हिंदी का स्वाभाविक रिश्ता बना। कोई टकराव नहीं बहनों जैसा प्रेम विकसित होने लगा। ये सिलसिला आज़ादी के कुछ वर्षों तक जारी रहा। लेकिन जैसे-जैसे हिंदी को सरकारी सरकारी सरंक्षण और उसे राष्ट्रभाषा बनाने का आग्रह बढ़ा हिंदी का विरोध और उसकी दुर्दशा का दौर भी शुरू हो गया। भाषाई राजनीति और मठवाद ने हिंदी को सिर्फ़ हिंदी क्षेत्र की भाषा में बदल दिया और रही सही कसर बाज़ार की भाषा के नाम पर शुरू हुए हिंग्लिश के प्रयोग ने हिंदी को बाजारू भाषा में बदलना शुरू कर दिया।
हिंदी के सहज शब्दों की जगह ज़बरन अंग्रेज़ी के शब्दों को ठूँसने से भाषा का वर्ण संकरीकरण होने लगा।बचाव की जगह रेस्क्यू और विस्फोट या धमाके की जगह ब्लास्ट जैसे शब्दों का प्रयोग इसका उदाहरण है। हिंदी की रचनाओं को अंग्रेज़ी रचनाओं की तुलना में कमतर मानना अंग्रेज़ी ज्ञान से ज़्यादा अंग्रेज़ीयत झाड़ना हिंदी भाषी मध्यवर्ग की आम प्रवृत्ति है। जब तक हिंदी क्षेत्र इस हीन भावना से मुक्त होकर बिना सरकारी सरंक्षण के हिंदी के समृद्ध रचना संसार को अपनी पूँजी और थाती नहीं बनाता तब तक कितने भी हिंदी दिवस मना लीजिए हिंदी की दशा नहीं सुधरेगी।
इसकी पहल हिंदी भाषियों को अपने घरों परिवारों से करनी होगी। अपने घरों परिजनों के साथ बोलचाल पठन पाठन में हिंदी का प्रयोग बेहिचक करना होगा। बच्चे अंग्रेज़ी और अन्य भाषायें सीखें पर हिंदी न छोड़ें। हिंदी अख़बार पढ़ें हिंदी साहित्य जानें और हिंदी में कामकाज में हीनता नहीं गौरव का भाव रखें। सिर्फ़ मजबूरी में सब्ज़ी वाले रिक्शे वाले से हिंदी में बात न करें बल्कि जब तक मजबूरी और ज़रूरी न हो अंग्रेज़ी न बोलें। हिंदी भाषियों से हिंदी में ही बात करें। अपने अध्ययन कक्ष में तुलसी कबीर प्रेमचंद प्रसाद दिनकर समेत सभी हिंदी के महान रचनाकारों की रचनाएँ प्रमुखता से रखें।
हिंदी क्षेत्र की बोलियों भाषाओं को हिंदी के मुक़ाबले खड़ा करने की बजाय उन्हें सहोदरी बनायें।जिस दिन से हम हिंदी भाषी ये सब करने लगेंगे तब हिंदी को किसी सरकारी सरंक्षण दिवस मनाने की ज़रूरत नहीं रहेगी। वरना मानते रहिए हिंदी दिवस का कर्मकांड। वैसे भी पितृ पक्ष चल रहा है जो कर्मकांड का ही समय है। आख़िर में हिंदी कर्मकांड दिवस की बधाई।
(यह लेखक के निजी विचार हैं)
14 सितंबर को देश में हर साल हिंदी दिवस मनाया जाता है। 1949 में इसी दिन संविधान सभा ने हिंदी को राजभाषा के रूप में स्वीकार किया था।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
देश में हर साल 14 सितंबर को हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाता है। 1949 में इसी दिन संविधान सभा ने देवनागरी लिपि में लिखी हिंदी को भारतीय गणराज्य की राजभाषा के रूप में स्वीकार किया था और तभी से हर वर्ष यह दिन हिंदी के प्रति सम्मान जताने के लिए मनाया जाता है। लेकिन एक सवाल जो हर साल इस मौके पर उठता है, वह यह है कि क्या हिंदी को वाकई वह स्थान मिला है जिसकी वह हकदार है? इस सवाल का जवाब खोजने के लिए सिर्फ भावनाओं पर नहीं, आंकड़ों पर भी नजर डालनी जरूरी है।
दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी भाषा
भाषा विशेषज्ञों के मुताबिक, हिंदी आज अंग्रेजी और मैंडरिन (चीनी) के बाद दुनिया में तीसरी सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा है। एथ्नोलॉग जैसे वैश्विक भाषा डेटाबेस के अनुसार दुनिया भर में करीब 61.5 करोड़ लोग हिंदी बोलते या समझते हैं। संयुक्त राष्ट्र के मंच पर भी यह बात दोहराई जा चुकी है कि आज दुनिया भर में लगभग 60 करोड़ लोग हिंदी बोलते और समझते हैं, जबकि लगभग 45 करोड़ लोग इसे अपनी मातृभाषा के रूप में इस्तेमाल करते हैं। भारत के अलावा नेपाल, मॉरीशस, फिजी, गुयाना, सूरीनाम, त्रिनिदाद, दक्षिण अफ्रीका, अमेरिका, ब्रिटेन और खाड़ी देशों में भी बड़ी संख्या में हिंदीभाषी समुदाय बसे हैं, जो इसे एक वास्तविक वैश्विक भाषा बनाते हैं।
भारत के भीतर देखें तो 2011 की जनगणना (जो अब तक की आखिरी उपलब्ध पूर्ण जनगणना है) के अनुसार 43.63 प्रतिशत यानी करीब 52.8 करोड़ भारतीयों ने हिंदी को अपनी मातृभाषा बताया था- यह 2001 की जनगणना के 41 प्रतिशत से अधिक था। यानी देश की करीब आधी आबादी के लिए हिंदी पहली भाषा है और इससे कहीं ज्यादा लोग इसे दूसरी या तीसरी भाषा के रूप में समझते और इस्तेमाल करते हैं। भारत की मौजूदा अनुमानित आबादी करीब 145 करोड़ मानी जा रही है; 2011 के बाद देश में जनगणना नहीं हुई है, लेकिन हिंदी भाषी राज्यों में अपेक्षाकृत अधिक जनसंख्या वृद्धि दर को देखते हुए विशेषज्ञ मानते हैं कि हिंदी मातृभाषियों का अनुपात और भी बढ़ा है।
डिजिटल दुनिया में हिंदी की तेज छलांग
यदि हिंदी दिवस को सिर्फ इतिहास और परंपरा तक सीमित रखा जाए तो यह अधूरी तस्वीर होगी। असली बदलाव पिछले एक दशक में डिजिटल क्षेत्र में आया है। इंटरनेट एंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ इंडिया (IAMAI) और कांतार की संयुक्त "इंटरनेट इन इंडिया रिपोर्ट 2025" (फरवरी 2026 में जारी) के अनुसार भारत में सक्रिय इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की संख्या अब 95.8 करोड़ (958 मिलियन) तक पहुंच चुकी है, जो पिछले साल की तुलना में करीब 8 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि दर्शाती है और अब ग्रामीण भारत में शहरी भारत से ज्यादा इंटरनेट उपयोगकर्ता हैं। इससे एक साल पहले की रिपोर्ट (2024) में यह भी सामने आया था कि भारत के करीब 98 प्रतिशत इंटरनेट उपयोगकर्ता किसी न किसी भारतीय भाषा में ही कंटेंट देखना पसंद करते हैं। सरकार ने इंडिया मोबाइल कांग्रेस 2025 में यह अनुमान भी जताया था कि वित्तीय वर्ष 2026 के अंत तक देश का इंटरनेट उपयोगकर्ता आधार 1 अरब यानी 100 करोड़ के आंकड़े को पार कर जाएगा और मौजूदा रुझान इस लक्ष्य के काफी करीब हैं।
इस विस्फोटक इंटरनेट विस्तार में हिंदी की भूमिका बेहद अहम रही है। सस्ते स्मार्टफोन और किफायती डेटा योजनाओं के आने के बाद जो करोड़ों नए लोग पहली बार ऑनलाइन आए, उनमें एक बड़ा हिस्सा हिंदीभाषी क्षेत्रों से रहा है, जिसने हिंदी सामग्री की मांग को कई गुना बढ़ा दिया। हिंदी अब सिर्फ किताबों और अखबारों की भाषा नहीं रही, बल्कि यह सर्च इंजन, सोशल मीडिया, ओटीटी प्लेटफॉर्म और यूट्यूब जैसी जगहों पर भी अंग्रेजी को कड़ी टक्कर देने लगी है और उद्योग विश्लेषकों के मुताबिक वैश्विक स्तर पर आज भी हिंदी को अंग्रेजी के बाद इंटरनेट पर सबसे अधिक इस्तेमाल होने वाली भाषाओं में गिना जाता है।
तकनीक की दुनिया भी अब हिंदी को गंभीरता से ले रही है। गूगल असिस्टेंट, एलेक्सा और सिरी जैसी वॉयस सेवाओं में हिंदी सपोर्ट, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित अनुवाद उपकरण और सरकार का भाषिणी जैसा राष्ट्रीय भाषा मिशन- ये सभी संकेत हैं कि हिंदी और भारतीय भाषाओं को डिजिटल ढांचे का स्थायी हिस्सा बनाने की कोशिशें तेज हुई हैं। स्वायाम (SWAYAM), दीक्षा (DIKSHA) और ई-पाठशाला (ePathshala) जैसे शिक्षा पोर्टल भी अब बड़े पैमाने पर हिंदी में गुणवत्तापूर्ण कंटेंट उपलब्ध करा रहे हैं, जिससे टियर-2 और टियर-3 शहरों तथा ग्रामीण इलाकों के छात्रों को सीधा फायदा मिल रहा है।
मीडिया और मनोरंजन उद्योग की रीढ़
हिंदी की आर्थिक ताकत का सबसे बड़ा प्रमाण मीडिया और मनोरंजन उद्योग है। प्रिंट अखबारों से लेकर टीवी न्यूज चैनलों, हिंदी सिनेमा और अब ओटीटी वेब सीरीज तक- हर माध्यम की रीढ़ हिंदी ही है। हिंदी समाचार पत्र आज भी देश में सबसे ज्यादा प्रसार संख्या रखने वाले अखबारों में शुमार हैं और हिंदी न्यूज चैनल दर्शक संख्या के मामले में लगातार शीर्ष पर बने रहते हैं। हिंदी सिनेमा दशकों से न केवल भारत बल्कि दुनिया भर में करोड़ों दर्शकों तक भारतीय संस्कृति पहुंचाने का माध्यम रहा है और अब ओटीटी प्लेटफॉर्मों पर हिंदी वेब सीरीज और फिल्में दर्शकों की पहली पसंद बनी हुई हैं। इस पूरे इकोसिस्टम से करोड़ों लोगों की आजीविका जुड़ी है- पत्रकार, लेखक, कलाकार, तकनीशियन, विज्ञापन पेशेवर, कंटेंट क्रिएटर- इन सबका रोजगार सीधे तौर पर हिंदी भाषा पर ही टिका है।
संवैधानिक स्थिति: राजभाषा, राष्ट्रभाषा नहीं
आंकड़ों में इतनी मजबूत उपस्थिति के बावजूद विडंबना यह है कि हिंदी को आज तक संविधान में "राष्ट्रभाषा" का दर्जा हासिल नहीं है। संविधान के अनुच्छेद 343 के तहत हिंदी को देवनागरी लिपि में संघ की "राजभाषा" घोषित किया गया था, जबकि अंग्रेजी को भी सहायक राजभाषा के रूप में जारी रखा गया। मुंशी-आयंगर फॉर्मूले के तहत हुए इस ऐतिहासिक समझौते ने हिंदी को केंद्र सरकार के कामकाज की भाषा तो बनाया, लेकिन "राष्ट्रभाषा" जैसा प्रतीकात्मक और संवैधानिक दर्जा आज भी अधूरा है। मुंशी-आयंगर फॉर्मूला 1949 में संविधान सभा द्वारा भारत की राजभाषा के विवाद को सुलझाने के लिए अपनाया गया एक भाषाई समझौता था। इसे कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी (K.M. Munshi) और एन. गोपालस्वामी आयंगर (N. Gopalaswami Ayyangar) ने पेश किया था। यह समझौता उत्तर और दक्षिण भारत के बीच भाषाई विवाद को सुलझाने के लिए हुआ था। यही वजह है कि हर साल हिंदी दिवस पर यह मांग दोहराई जाती है कि जब हिंदी आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक स्तर पर देश को इतना कुछ दे रही है, तो उसे उसका पूरा संवैधानिक सम्मान क्यों नहीं मिलता।
चुनौतियां भी कम नहीं
आंकड़े जितनी उम्मीद जगाते हैं, उतनी ही कुछ चुनौतियां भी सामने खड़ी हैं। भाषा विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल विस्तार के साथ-साथ "हिंग्लिश" (हिंदी-अंग्रेजी मिश्रित भाषा) का प्रचलन तेजी से बढ़ा है, जिससे शुद्ध हिंदी के व्याकरणिक स्वरूप पर असर पड़ रहा है। तकनीकी और वैज्ञानिक शब्दावली के सीमित विकास, की-बोर्ड और फॉन्ट से जुड़ी तकनीकी दिक्कतें और उच्च शिक्षा व शोध में अंग्रेजी के दबदबे जैसी समस्याएं आज भी बनी हुई हैं। इसके अलावा शहरी मध्यम वर्ग में अंग्रेजी माध्यम की शिक्षा को लेकर बढ़ता आकर्षण भी एक ऐसी प्रवृत्ति है, जो हिंदी के दीर्घकालिक भविष्य के लिए चिंता का विषय बनी हुई है।
भारत की भाषाई विविधता में हिंदी की जगह
यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि हिंदी की मजबूती का मतलब बाकी भारतीय भाषाओं की उपेक्षा नहीं होना चाहिए। बांग्ला, मराठी, तेलुगू, तमिल, पंजाबी जैसी भाषाएं भी करोड़ों लोगों की मातृभाषा हैं और भारत की सांस्कृतिक विविधता की जीवंत मिसाल हैं। हिंदी दिवस का असली संदेश यही होना चाहिए कि हिंदी को उसका हक मिले, लेकिन साथ ही देश की सभी भाषाओं का सम्मान और संरक्षण भी उतना ही जरूरी समझा जाए। भारत की असली ताकत उसकी भाषाई विविधता में ही निहित है।
आगे की राह
आंकड़े साफ बताते हैं कि हिंदी न सिर्फ जीवित है, बल्कि डिजिटल युग में नई ऊर्जा के साथ आगे बढ़ रही है- करोड़ों मातृभाषी, दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी भाषा का दर्जा, इंटरनेट पर दूसरी सबसे लोकप्रिय भाषा की हैसियत और मीडिया-मनोरंजन उद्योग की रीढ़ जैसी उपलब्धियां किसी भी भाषा के लिए गर्व की बात हैं। लेकिन असली चुनौती इस उपलब्धि को संस्थागत और संवैधानिक मान्यता में बदलने की है। सरकारी कामकाज, न्यायपालिका, उच्च शिक्षा और तकनीकी क्षेत्रों में हिंदी के प्रयोग को और सरल तथा व्यावहारिक बनाना होगा, ताकि आम आदमी बिना किसी हीन भावना के अपनी भाषा में काम कर सके।
हिंदी दिवस केवल एक प्रतीकात्मक आयोजन बनकर न रह जाए, बल्कि यह हर साल हमें यह याद दिलाए कि आंकड़ों में जो ताकत हिंदी के पास है, वही ताकत उसे नीति, शिक्षा और शासन के हर स्तर पर भी मिलनी चाहिए। तभी यह दिन सही मायनों में सार्थक होगा- जब हिंदी सिर्फ आंकड़ों में नहीं, बल्कि व्यवस्था में भी उतनी ही मजबूत नजर आएगी।
सोशल मीडिया ने समाज में अलग तरह की स्पर्धा की छवियां प्रस्तुत की हैं। अपने सुखद, आनंद के क्षणों को वायरल करने की बीमारी दूसरे की पीड़ा का कारण बन जाती है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
प्रो.संजय द्विवेदी, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष।
भारत युवाओं का देश है। जाहिर है ऐसे देश की चिंताएं बहुत अलग होती हैं। उसकी ज्यादातर आबादी को शिक्षा, रोजगार और सुंदर जीवन की कामना होती है। उनकी महत्वाकांक्षाएं, अवसरों की होड़ और दौड़, पाने की खुशी और न मिलने का आक्रोश सब साझा होते हैं। करियर में सफल होने, जल्दी और ज्यादा पाने की कामनाएं इस दौर का मूल्य हैं। ऐसे में शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य दोनों को गहरी चुनौती है। संकट के बादल गहरे हैं, समाधान के सूत्र न्यूनतम। सरकारों में नौकरियों के दरवाजे सिकुड़ रहे हैं। ज्यादातर नौकरियां निजी क्षेत्रों में ही हैं।
नौ से पांच बजे की पक्की नौकरियां अब स्वप्न ही हैं। उनकी जगह गिग इकोनॉमी (फ्रीलांस, कॉन्ट्रैक्ट वर्क) ने ले ली है। आर्थिक स्वतंत्रता की तो छोड़िए, यह मॉडल भविष्य की अनिश्चितता और वित्तीय अस्थिरता भी ला रहा है, जिसके नाते बढ़ता मानसिक तनाव और अवसाद संकट को गहरा कर रहा है। हिंदुस्तान अलग तरह से चलता रहा है। परिवार इसकी प्राणवायु रहे हैं। परिवार का कोई एक आदमी नौकरी पर रहता था, शेष अपने घर-इलाके-गांव में बैठकर स्थानीय स्तर पर जो कर सकते थे, करते थे। परिवार की छाया में सुरक्षा थी, संरक्षण था, बच्चों को संस्कारित करने के पारिवारिक उपक्रम थे।
नई व्यवस्था ने एक परिवार में कई परिवार खड़े कर दिए हैं। इससे एक की जगह अब चार परिवार, चार चूल्हे और चार व्यवस्थाएं खड़ी करनी पड़ रही हैं। आप कितना भी कमा रहे हैं, वह कम ही है। इसने नई पीढ़ी को ईएमआई के दुष्चक्र में फंसा कर नई व्यवस्थाओं का गुलाम बना दिया है। परिवार व्यवस्था भारत की संस्कृति का आधार रही है। वह संस्कारशाला भी है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने हमारे सामने नई चुनौतियां पेश की हैं। वे बेहतर सहायक से ज्यादा तनाव के वाहक हैं। युवाओं में एआई के कारण नौकरियां जाने और खुद के अप्रासंगिक हो जाने का भय बैठ गया है।
वे इस पूरे दृश्य को बहुत चिंता से देख रहे हैं। री-स्किलिंग का दबाव उन्हें गहरे भय में डाल रहा है। इससे मानसिक थकान होना स्वाभाविक ही है। इस समय सबसे बड़ी चिंता कार्य और जीवन संतुलन की है। वर्क फ्रॉम होम और डिजिटल कनेक्टिविटी ने सारा कुछ बदलकर रख दिया है। काम के घंटे अब प्रायः 24 घंटे ही हैं। देर रात तक ई-मेल, रिपोर्ट्स और मैसेज का जवाब देते हुए युवा ‘ऑलवेज ऑन’ मोड में रहते हैं, जिससे पारिवारिक जीवन, व्यक्तिगत समय और नींद सब प्रभावित हो रही है। बर्नआउट की बढ़ती दर, काम के अनिश्चित घंटे, स्पर्धा का वातावरण और टारगेट पूरे करने का दबाव साथ चलता है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने बर्नआउट को प्रोफेशनल बीमारी मान लिया है। यह अब भारतीय कॉरपोरेट जगत में एक अनिवार्य समस्या बन गई है। सोशल मीडिया ने समाज में अलग तरह की स्पर्धा की छवियां प्रस्तुत की हैं। अपने सुखद, आनंद के क्षणों को वायरल करने की बीमारी दूसरे की पीड़ा का कारण बन जाती है। किसी की बड़ी पदस्थापना, उसकी पार्टियां, रील्स, पर्यटन की तस्वीरें, महंगी जीवनशैली का विज्ञापन करना, सफलताओं के हाइलाइट्स देखकर तुलना और स्पर्धा की बातें तेज होती हैं। इससे हीनभावना और तनाव का जन्म भी होता है।
परिजन और बच्चे भी अपने पालकों से ऐसी ही जीवनशैली की अपेक्षा करते हैं। ऐसे समय में युवाओं के लिए तनाव प्रबंधन की विधियां समझने और उन्हें जीवन की ठोस सच्चाइयों से जोड़ने की जरूरत है। योग, ध्यान के अनेक अभ्यास जीवन में शांति ला सकते हैं। जिंदगी के हमारे दृष्टिकोण में परिवर्तन ला सकते हैं। रील्स की तुरंतवादी जीवनशैली और जीवन के सतत संघर्ष को समझने की जरूरत है। सोशल मीडिया से प्रक्षेपित हो रही छवियों से प्रभावित होने के बजाय, लोगों के संघर्ष और उससे उपजी सफलताओं के पाठ भी पढ़े जाने चाहिए।
नए समय ने युवाओं को उद्यमिता के गुर दिए हैं। यह पीढ़ी जोखिम उठाने और सफलताओं के नए शिखर छूने वाली पीढ़ी है। इसके मंत्र अलग हैं। वे जल्दी से सफलताओं के नए क्षितिज को छूना चाहते हैं। छू भी रहे हैं। कम आयु में उनकी सफलताएं विस्मित करने वाली हैं। उनके स्टार्टअप धूम मचा रहे हैं। सफलता की बड़ी कहानियां लिख रहे हैं। प्रेरित कर रहे हैं। इसके दूसरे पक्ष का विचार भी जरूरी है।
हमें पता है कि 90 प्रतिशत से अधिक स्टार्टअप शुरुआती सालों में ही अन्यान्य कारणों से विफल हो जाते हैं। विफलता का डर, निवेशकों का दबाव, फंडिंग का संकट संस्थापकों और शुरुआती कर्मचारियों में मानसिक तनाव पैदा कर ही देता है। इतने बड़े देश में हर साल लाखों युवा हाथ काम मांगने के लिए खड़े हो जाते हैं। उनके पास डिग्रियां भी होती हैं, किंतु वे कौशलयुक्त नहीं होते। वे डिग्रीधारी हैं, किंतु किसी काम के नहीं हैं। बाजार की जरूरतें अलग हैं, उनके कौशल अलग हैं। ऐसे में बहुत योग्य लोगों को भी अपेक्षित नौकरी नहीं मिल पाती, अच्छे वेतन की तो जाने ही दीजिए।
युवाओं के ज्यादातर संकट वास्तविक हैं। वे जानकारी से भरपूर हैं, उनके पास अवसरों का जनतंत्र है। आकांक्षाओं की बाढ़ है। वे सूचनाओं से लदे-फंदे हैं। यह ज्यादा सूचनाएं भी दुख और भ्रम का कारण बन रही हैं। आकांक्षाओं का बड़ा आकाश उतनी ही गहरी निराशा लेकर लाता है। यह साधारण नहीं है कि आईआईटी के विद्यार्थी आत्महत्या कर रहे हैं। ऐसे प्रतिभाशाली विद्यार्थियों का अवसान उनके परिवार, देश और समाज के लिए भी बड़ी क्षति है। परीक्षाओं में मिलती असफलताएं, लीक होते प्रश्नपत्र, परीक्षाओं की नष्ट होती शुचिता, सरकारी-प्रशासनिक तंत्र की कदाचार रोकने की विफलताओं ने युवाओं को गहरी चिंताएं दी हैं।
शिक्षा के निजीकरण और उससे उपजे बाजारीकरण ने हालात बहुत बदल दिए हैं। महंगी शिक्षा के लिए परिवार कर्ज में डूब रहे हैं। प्रतिभा पलायन का संकट तो है ही। समाज में यह बात बहुत गहरे पैठ रही है कि इस देश में प्रतिभाशाली युवाओं की जगह नहीं बची है। यह तथ्य नहीं, किंतु गहराई से फैलती धारणा है। आप बिना जुगाड़ के इस व्यवस्था में सफल नहीं हो सकते। किसी राष्ट्र जीवन में ऐसी धारणाएं ठीक नहीं हैं।
हमें समझना होगा कि राष्ट्र से हम सबकी सामूहिक आकांक्षाएं, साझा प्रयासों से ही फलीभूत होंगी। भारत की आजादी के आठ दशक अभूतपूर्व प्रगति, एकत्व और जीवंत लोकतंत्र के प्रमाण हैं। हर राष्ट्र जीवन में चुनौतियां होती हैं, उससे जूझकर हम अपने संकटों का हल खोजते हैं। देश की युवा पीढ़ी भी अपने संकटों के बीच इस राष्ट्र जीवन के समक्ष उपस्थित प्रश्नों के ठोस और वाजिब हल जरूर तलाशेगी। युवा शक्ति की तेजस्विता, नवाचारों और आत्मविश्वास को देखकर यह विश्वास सहज ही होता है।
( यह लेखक के निजी विचार हैं )
अब आइए रोज़गार पर। सरकार के आँकड़े कहते हैं कि अगर 100 लोग लेबर फ़ोर्स में हैं तो सिर्फ़ 23 लोगों के पास सैलरी वाली नौकरी है, जबकि 43 लोग अब भी खेतों में काम कर रहे हैं।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
मिलिंद खांडेकर, वरिष्ठ पत्रकार।
जीडीपी के आँकड़े पर बहस छिड़ी हुई है कि 2.6% हुई है या 7.8%? हफ़्ते भर पढ़ने-लिखने के बाद मैं इतना तो कह सकता हूँ कि 2.6% की गिनती ग़लत है। 7.8% के आँकड़े को भी ग़लत मानने का कोई कारण मुझे नहीं मिला। फिर भी सोशल मीडिया पर लोग मान नहीं रहे हैं कि 7.8% ग्रोथ हुई है? हिसाब-किताब में समझेंगे कि लोग विश्वास क्यों नहीं कर रहे हैं?
जीडीपी की बहस को ब्लैक एंड व्हाइट में देखेंगे तो समझ नहीं पाएँगे। सरकार के आँकड़े मोटे तौर पर सही हैं, लेकिन जनता महसूस नहीं कर रही है। इसका कारण यह ग़लतफ़हमी है कि जीडीपी ग्रोथ का मतलब इनकम ग्रोथ है। अच्छी ग्रोथ से इनकम बढ़ना चाहिए, लेकिन यह बढ़ोतरी असमान होती है। किसी को ज़्यादा मिलती है तो किसी को कम। फिर हमारी प्रति व्यक्ति आय भी कम है। हमारी और ब्रिटेन की जीडीपी लगभग बराबर है। जीडीपी अगर 12 इंच का पिज़्ज़ा है तो वो ब्रिटेन में एक आदमी खा रहा है, वहीं भारत में वो 20 लोगों में बंट जाता है। हरेक व्यक्ति के हिस्से में छोटा स्लाइस आ रहा है।
अब आइए रोज़गार पर। सरकार के आँकड़े कहते हैं कि अगर 100 लोग लेबर फ़ोर्स में हैं तो सिर्फ़ 23 लोगों के पास सैलरी वाली नौकरी है, जबकि 43 लोग अब भी खेतों में काम कर रहे हैं। बाकी लोग स्वरोज़गार कर रहे हैं या दिहाड़ी मज़दूरी। विकसित देशों में सैलरी पर काम करने वाले लोगों की संख्या 80-90 होती है। चीन आबादी के लिहाज़ से लगभग हमारे बराबर है, वहाँ खेतों में सिर्फ़ 22 लोग काम कर रहे हैं।
खेतों से लोगों को निकाले बिना समृद्धि नहीं आ सकती है। इसमें दिक़्क़त है कि सर्विस सेक्टर में उतनी ज़्यादा संख्या में नौकरियाँ नहीं हैं, जबकि मैन्युफ़ैक्चरिंग में हम पिछड़ गए हैं। मैन्युफ़ैक्चरिंग का जीडीपी में योगदान 16-17% पर अटका हुआ है, जबकि मेक इन इंडिया जैसी स्कीम लाई गई थी।
बात सिर्फ़ रोज़गार की नहीं है। सरकार के आँकड़े ही कहते हैं कि पिछले पाँच सालों में लोगों की आमदनी तो बढ़ी है, लेकिन बढ़ी हुई आमदनी महंगाई खा जा रही है। इससे लोगों को लगता है कि हम तो जहाँ थे, वहीं पर अटके पड़े हैं। यह भावना कोई नई नहीं है। पूर्व वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा को हजारीबाग में उनके वोटरों ने कहा था कि हम जीडीपी को खाएँगे क्या? यह 2004 चुनाव की बात है। लोगों को आँकड़ों से मतलब नहीं है, उन्हें अपनी ज़िंदगी बेहतर करने से मतलब है।
( यह लेखक के निजी विचार हैं )
खरगे की रैली के बाद कथित मंच शुद्धिकरण के प्रयास का मुद्दा उठाकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से इस अपमान पर पुलिस में प्राथमिकी (एफआईआर) दर्ज किए जाने की मांग की।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
आलोक मेहता, पद्मश्री, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक।
उत्तर प्रदेश-उत्तराखंड चुनाव से पहले राहुल गांधी और कांग्रेस ने दलित राजनीति के दांवपेंच शुरू कर दिए। हल्द्वानी में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की रैली के बाद हुए कथित 'शुद्धिकरण' (हवन) विवाद पर मल्लिकार्जुन खरगे और राहुल गांधी ने दोषियों पर एफआईआर दर्ज करने का अजीबोगरीब अभियान चला दिया। खरगे की रैली में क्या कोई हमला हुआ? अगले दिनों उसी मैदान में कार्यक्रम से पहले हुई सफाई, पूजा इत्यादि में खरगे के विरुद्ध गालियों या तंत्र-मंत्र की कोई रिकॉर्डिंग या अन्य सबूत राहुल के पास हैं?
अब तक तो सामने नहीं आए। फिर भी खरगे और उनके नेता राहुल गांधी लगातार दलित अपमान पर संसद से सड़क तक हाहाकार कर रहे हैं। राहुल ने तो प्रेस कॉन्फ्रेंस और सोशल मीडिया में इस मुद्दे को तूल देते हुए आरोप लगाया कि आज भी हर जगह दलितों का अपमान हो रहा। खरगे की रैली के बाद कथित मंच शुद्धिकरण के प्रयास का मुद्दा उठाकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से इस अपमान पर पुलिस में प्राथमिकी (एफआईआर) दर्ज किए जाने की मांग की।
भारत में यह पहला अवसर है, जब प्रतिपक्ष का शीर्ष नेता एक दिन एफआईआर दर्ज कराने या दूसरे दिन दो सौ एफआईआर रद्द करने के लिए पीएम निवास तक धरना देने लगे, जैसे एफआईआर पीएम मंत्रियों के दफ्तरों में दर्ज होती हो। बाईस वर्षों की सांसदी और अदालतों में हाजिरी लगाने के बावजूद उन्हें नहीं पता कि प्राथमिकी शिकायत मात्र है, न सबूत है और न ही सजा? फैसला वर्षों बाद अदालत में होगा। मतलब जनता में भ्रम से भड़काने की राजनीति के अलावा कुछ नहीं।
दूसरी तरफ भाजपा का कहना है कि इस घटना का किसी जाति से कोई लेना-देना नहीं है। उनका दावा है कि रैली के बाद वहां गंदगी छोड़ी गई थी और कुछ लोगों ने केवल उस जगह की सफाई के उद्देश्य से धार्मिक प्रक्रिया की थी। वह संगठन भी पार्टी का नहीं है। इसके साथ ही, भाजपा ने कांग्रेस पर इस मुद्दे को लेकर विभाजनकारी राजनीति करने और दलित समाज को राजनीतिक टूल की तरह इस्तेमाल करने का आरोप लगाया है।
यह मामला कानूनी रूप ले चुका है। अब तो हवन में शामिल दलित युवक ने ही राहुल गांधी द्वारा नफरत फैलाने के खिलाफ शिकायतें दर्ज करा दी हैं। स्वाभाविक है, इस तरह के मामले कानूनी गलियारों में वर्षों तक घूमते रह सकते हैं। इसीलिए पिछले दिनों वाराणसी से एक वरिष्ठ पत्रकार ने मुझे फोन करके कहा कि 'विपक्ष के लिए चुनाव में सदा गुंजाइश है, लेकिन राहुल और उनके सलाहकार इतना भी नहीं समझते कि दीवारों पर वर्षों पहले लगे दाग आसानी से नहीं हटते। और इस देश के गरीब दलित, पिछड़े, अल्पसंख्यक कम शिक्षित होने पर भी कांग्रेस राज में हुए अत्याचार आसानी से नहीं भूल पाते। दलितों पर हुए अत्याचार के रिकॉर्ड की रिपोर्ट्स और संपादकीय टिप्पणियां उपलब्ध हैं।'
सचमुच इस मुद्दे पर मुझे पिछले दशकों में अपनी रिपोर्ट्स और टिप्पणियों की फाइल का ध्यान आ गया। खरगे इस समय कांग्रेस के अध्यक्ष हैं और दलित नेता के मान-अपमान के मुद्दे पर कांग्रेस के ही शीर्ष दलित नेता माने जाने वाले बाबू जगजीवन राम को याद किया जाना चाहिए। वह भी सत्तर के दशक में पार्टी के अध्यक्ष थे और वरिष्ठ मंत्री रहे।
पत्रकार के नाते 1972 से लगातार उनसे मिलने, बात करने के अवसर मिले। आपातकाल की ज्यादतियों और दलितों की हालत से दुखी रहने के कारण 1977 में चुनाव की घोषणा के साथ उन्होंने विद्रोह कर दूसरे बड़े नेता हेमवतीनंदन बहुगुणा के साथ नई पार्टी बनाई। वहीं जनता पार्टी में भी पुरानी संगठन कांग्रेस के अधिकांश कांग्रेसी नेता थे। लेकिन उन कांग्रेसियों ने भी जगजीवन राम को प्रधानमंत्री नहीं बनने दिया।
उपप्रधानमंत्री पद दिलवाने के लिए कई दिनों तक उनके निवास के बाहर और अन्य ठिकानों पर समर्थकों के प्रदर्शनों की रिपोर्ट मेरी फाइल में आज भी रखी है। तब तो उन्हें इंदिरा कांग्रेस ने विद्रोही करार दिया था। लेकिन 1979 में जनता पार्टी के टूटने पर भी उपप्रधानमंत्री पद पर रहे सबसे अनुभवी नेता जगजीवन राम के बजाय इंदिरा कांग्रेस ने श्रीमती गांधी को जेल भिजवाने वाले चौधरी चरण सिंह को समर्थन देकर प्रधानमंत्री बनवाया।
चरण सिंह पर इंदिरा गांधी और उनके पुत्र संजय गांधी के विरुद्ध चल रहे मामलों को लेकर दबाव था। चरण सिंह ने इन मामलों को वापस लेने से इनकार किया। परिणामतः इंदिरा कांग्रेस ने विश्वासमत से ठीक पहले समर्थन वापस ले लिया और चरण सिंह को इस्तीफा देना पड़ा। जगजीवन राम ने दावा किया कि वे बहुमत जुटा सकते हैं। वे विपक्ष/जनता गठबंधन के नेता थे और उनके पास काफी सांसदों का समर्थन था। तब जगजीवन राम को मौका क्यों नहीं मिला? इसलिए दलित नेताओं का उपयोग और अपमान का रिकॉर्ड क्या भुलाया जा सकता है? आज भी क्या कांग्रेस पार्टी राहुल गांधी के बजाय खरगे को अगले प्रधानमंत्री की तरह पेश कर रही है?
जहाँ तक दलितों पर अत्याचार की बात है, दलितों के सामाजिक और राजनीतिक अधिकारों का प्रश्न केवल संविधान और कानूनों का प्रश्न नहीं रहा है। प्रश्न है—जब इन घटनाओं के समय कांग्रेस की सरकार थी, तब प्रशासन और राजनीतिक नेतृत्व ने क्या किया? कांग्रेस सरकार के अधीन पुलिस प्रशासन ने दलित नागरिकों की रक्षा क्यों नहीं की और दोषियों को दंड दिलाने में कितनी सफलता मिली?
शायद 1978 के बाद बिहार में दलितों पर हुई हिंसा से जुड़े चर्चित बेलछी कांड के समय श्रीमती इंदिरा गांधी द्वारा सहानुभूति जताने और दोषियों को दंडित कराने की मांग से उनकी राजनीतिक वापसी होने की बात राहुल को समझाई गई होगी। लेकिन सत्ता की वापसी केवल एक घटना से नहीं हुई थी। बड़ा कारण जनता पार्टी का बिखरना और एक हद तक कांग्रेस की पुरानी संगठन क्षमता थी।
आज संगठन कहाँ है? अत्याचार में उत्तर प्रदेश और बिहार में कांग्रेस राज में दलितों पर सर्वाधिक हिंसक हमले हुए और अपराधियों को कांग्रेस नेताओं के संरक्षण के आरोप रहे। पराकाष्ठा यहाँ तक रही है कि दलितों के हत्याकांड के पीछे कांग्रेस नेता के हाथ का आरोप रहते उस पूर्व सांसद को पार्टी ने राष्ट्रपति पर दबाव डालकर राज्यसभा में नामजद श्रेणी में फिर से सांसद तक बनवा दिया। राष्ट्रपति ने एक बार प्रस्ताव पर सहमति न देकर फाइल लौटा दी थी। तब दोबारा भेजी गई और उन्हें दस्तखत करना पड़े। तत्कालीन राष्ट्रपति ने स्वयं यह बात दुखी स्वर में बताई थी।
असल में दलितों के सामाजिक और राजनीतिक अधिकारों का प्रश्न केवल संविधान और कानूनों का प्रश्न नहीं रहा है। शायद राहुल गांधी को 1978 में बिहार में दलित हिंसा के बेलछी कांड से इंदिरा गांधी की वापसी के रास्ते की बात समझाई जाती होगी। लेकिन उनकी वापसी एक घटना में सहानुभूति जताने से नहीं, बल्कि जनता पार्टी बिखरने और कांग्रेस की पुरानी संगठन क्षमता से हुई। आज क्या उत्तर प्रदेश, बिहार जैसे राज्यों में कांग्रेस की संगठन क्षमता है? यही नहीं, दलित बस्तियों में आज भी कांग्रेस राज में हुई हिंसा की बातें दुःख से सुनाई-बताई जाती हैं।
1980 में कांग्रेस बिहार में सत्ता में लौटी। मुख्यमंत्री बने जगन्नाथ मिश्र। इसी दौर की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में पिपरा नरसंहार है। 25 फरवरी 1980 को जहानाबाद क्षेत्र के पिपरा गांव में दलित बस्ती पर हमला हुआ। अनेक घर जला दिए गए और महिलाओं तथा बच्चों सहित दलितों की हत्या की गई। रिपोर्ट में पांच महिलाओं, तीन वयस्क पुरुषों और छह बच्चों सहित 14 मृतकों का उल्लेख है। 1985–86 का दौर कांग्रेस शासन में मध्य बिहार के सबसे गंभीर जातीय संघर्षों में से था। 1987 में नोनाही-नगवां में दलितों की हत्या हुई। जून 1987 की घटना में 18 दलितों के मारे जाने का उल्लेख मिलता है।
2004 में केंद्र में यूपीए सरकार बनी। प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह थे और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी। इस दशक में भी कई कांग्रेस-शासित राज्यों में दलित अत्याचार के बड़े मामले सामने आए। 29 सितंबर 2006 को महाराष्ट्र के भंडारा जिले के खैरलांजी गांव में भोतमांगे परिवार के चार सदस्यों की हत्या। सुप्रीम कोर्ट के रिकॉर्ड में परिवार के सदस्यों और उनकी अनुसूचित जाति पहचान का स्पष्ट उल्लेख है।
हरियाणा में कांग्रेस के सत्ता काल में 2005 का गोहाना कांड सामने आया। दलित/वाल्मीकि बस्ती के अनेक घरों को आग लगा दी गई। 21 अप्रैल 2010 को हिसार जिले के मिर्चपुर गांव में हिंसक भीड़ ने वाल्मीकि दलित बस्ती के घरों में आग लगा दी। दिल्ली की अदालत में दर्ज न्यायिक रिकॉर्ड के अनुसार 18 दलित घर जलाए गए और एक 60 वर्षीय व्यक्ति तथा उसकी दिव्यांग बेटी आग में जलकर मारे गए।
प्रश्न यह है कि कांग्रेस सरकार के अधीन पुलिस प्रशासन ने दलित नागरिकों की रक्षा क्यों नहीं की और दोषियों को दंड दिलाने में कितनी सफलता मिली? 2004 से 2014 तक अविभाजित आंध्र प्रदेश में कांग्रेस की सरकार रही। 2004–14 के दौरान दलितों पर अत्याचार के अपराध के 42,060 मामले दर्ज हुए, जिनमें 539 हत्या और 1,084 बलात्कार के अपराध के रिकॉर्ड सरकारी अपराध ब्यूरो में दर्ज हैं। इस हिसाब-किताब को देखते हुए राहुल गांधी की दलित राजनीति से उनकी पार्टी के लिए होने वाले खतरों को देखा जा सकता है।
( यह लेखक के निजी विचार हैं )
वरिष्ठ टीवी पत्रकार और लोकप्रिय न्यूज एंकर नग़मा सहर के एनडीटीवी से विदा लेने के बाद वरिष्ठ पत्रकार संजय किशोर ने उनके साथ करीब 20 साल तक काम करने के अनुभव साझा किए हैं।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
वरिष्ठ टीवी पत्रकार और लोकप्रिय न्यूज एंकर नग़मा सहर के एनडीटीवी से विदा लेने के बाद वरिष्ठ पत्रकार संजय किशोर ने उनके साथ करीब 20 साल तक काम करने के अनुभव साझा किए हैं। संजय किशोर ने सोशल मीडिया पर लिखी अपनी पोस्ट में नग़मा सहर की पत्रकारिता, एंकरिंग के अंदाज़ और उनके शांत एवं गरिमापूर्ण व्यक्तित्व को याद किया है। उन्होंने नग़मा के साथ अपने लंबे जुड़ाव के कई अनुभव साझा करते हुए उनके आगे के सफर के लिए शुभकामनाएं भी दी हैं।
संजय किशोर ने अपनी पोस्ट में लिखा है-
नग़मा ने भी उस ‘सहर’ को छोड़ दिया
नग़मा सहर। तक़रीबन बीस साल साथ काम किया। इतने लंबे साथ में किसी इंसान को सिर्फ़ सहकर्मी की तरह नहीं, उसकी शख़्सियत की कई परतों के साथ जानने का मौक़ा मिलता है। नग़मा को भी कुछ ऐसा ही जाना।
एक ऐसी शख़्सियत, जिसे न कभी आपा खोते देखा, न खुलकर ठहाके लगाते हुए। ग़म में ग़मगीन नहीं और ख़ुशी के मौक़े पर भी जश्न में अपनी गरिमा खोते हुए नहीं। शांत आवाज़, संयमित भाषा, बातों में ठहराव, चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान और वह ट्रेडमार्क डिंपल।
और फिर उनका एंकरिंग का अपना एक अलग अंदाज़ था।
जब भी स्पोर्ट्स की कोई बड़ी ख़बर होती, स्टूडियो जाने के ठीक पहले हमसे ब्रीफ़ लेना वह कभी नहीं भूलती थीं। हम अपनी तरफ़ से उन्हें जितना बताते, उतना ही लगता कि अब शायद उन्हें विषय की पूरी जानकारी हो गई होगी। लेकिन ऑन एयर होते ही जब वह डिबेट शुरू करतीं, तो कई बार मन में यही आता था, “हमने तो इन्हें थोड़ा-सा ही बताया था, इन्हें तो पहले से ही सब पता था!”
असल बात यह थी कि वह सिर्फ़ ब्रीफ़ नहीं लेती थीं, उसे आत्मसात करती थीं। सवाल पूछने से पहले विषय को समझती थीं। और यही एक अच्छे एंकर और सिर्फ़ सवाल पूछने वाले एंकर के बीच का फ़र्क़ था।
उनकी एक और बात मुझे हमेशा याद रहेगी। रिपोर्टर हो या कोई सहकर्मी, वह उसे बोलने का पूरा और पर्याप्त मौक़ा देती थीं। अपनी बात मनवाने या अपनी आवाज़ सुनाने की बेचैनी नहीं होती थी। आज के दौर के कई एंकरों की तरह लंबे-लंबे सवालों में ही आधा जवाब ठूँस देने की आदत नहीं थी। वह सवाल करती थीं, फिर सामने वाले को सुनती थीं। सचमुच सुनती थीं।
शायद इसलिए उनकी डिबेट में शोर कम और संवाद ज़्यादा होता था।
और शायद यही वजह थी कि उनकी आवाज़ सिर्फ़ सुनाई नहीं देती थी, ठहरती थी। न्यूज़रूम के शोर में भी उनकी आवाज़ का अपना एक सुकून था। ऊँची आवाज़ के बिना अपनी बात कह देना और बिना हावी हुए अपनी मौजूदगी दर्ज करा देना, यह हुनर हर किसी के पास नहीं होता।
आपने ऐसे समय में पत्रकारिता की अपनी पहचान बनाई, जब टेलीविज़न न्यूज़ धीरे-धीरे आवाज़ की ऊँचाई को पत्रकारिता की ताक़त समझने लगा था। लेकिन आपकी ताक़त हमेशा आपकी आवाज़ की ऊँचाई नहीं, उसका ठहराव और उसकी विश्वसनीयता रही।
पटना वीमेंस कॉलेज से शुरुआत, दिल्ली विश्वविद्यालय, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय और फिर ‘हम लोग’ तथा ‘इंटरनेशनल एजेंडा’ जैसे यादगार कार्यक्रमों तक का सफ़र अपने आप में प्रेरणादायक है। लेकिन मेरे लिए आपकी सबसे बड़ी पहचान उन उपलब्धियों से कहीं आगे है।
आप उस दौर की याद हैं, जब न्यूज़ एंकर होना सिर्फ़ स्क्रीन पर दिखाई देना नहीं था। उसमें पढ़ना था, समझना था, सुनना था और सबसे बढ़कर, गरिमा के साथ अपनी बात रखना था।
टेलीविज़न न्यूज़ के उस सुनहरे दौर में आपके साथ इतने वर्षों तक काम करना और आपको इतने क़रीब से देखना मेरे लिए हमेशा एक विशेष अनुभव रहेगा।
और एक साथी पटना वाले के तौर पर, आपके सफ़र पर हमेशा एक अलग तरह का गर्व रहेगा।
नग़मा, आप सचमुच उस शांत, संयमित और गरिमापूर्ण आवाज़ की आख़िरी मज़बूत कड़ी थीं, जो आज के शोर में कहीं खोती जा रही है।
बहुत कुछ बदला, बहुत लोग आए और चले गए। लेकिन कुछ आवाज़ें सिर्फ़ याद नहीं रहतीं, एक दौर की पहचान बन जाती हैं।
आप भी ऐसी ही एक आवाज़ हैं।
आगे का सफ़र और भी ख़ूबसूरत हो, नग़मा।
उसी ठहराव, उसी गरिमा और उसी ट्रेडमार्क डिंपल के साथ।
(वरिष्ठ पत्रकार संजय किशोर की फेसबुक वॉल से साभार)
हल्ला मचने के बाद अब बैंक इस फैसले के खिलाफ अपील करने जा रहे हैं। बैंक Essel ग्रुप की कंपनियों से भी अलग से वसूली में लगे हैं, जिनकी गारंटी सुभाष चंद्रा ने ली थी।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
मिलिंद खांडेकर, वरिष्ठ पत्रकार।
अरुण शौरी का करीब दस साल पुराना वीडियो वायरल हो रहा है। वो IBC के बारे में बात कर रहे हैं। तब IBC यानी Insolvency and Bankruptcy Code लागू ही हो रहा था। उन्होंने उदाहरण देकर बताया कि किसी कंपनी ने खुद को दिवालिया घोषित किया और फिर कंपनी के भाई की पत्नी ने आने-पौने दाम पर कंपनी खरीद ली। नए नियमों के तहत भाई की पत्नी को देनदार का रिश्तेदार नहीं माना जाता है। अब आइए Z टीवी के संस्थापक सुभाष चंद्रा के केस पर।
सुभाष चंद्रा पर करीब 22 हजार करोड़ रुपये का दावा NCLT में किया गया था। अगर कोई कंपनी लोन नहीं चुका रही है या गारंटी देने वाले से वसूली करनी है तो IBC के तहत केस NCLT (नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल) में चलता है। सुभाष चंद्रा का केस 6.5 करोड़ रुपये में निपट गया। ₹100 की देनदारी थी तो 3 पैसे देकर वो छूट गए। इसे फाइनेंस की भाषा में हेयर कट कहते हैं। 99.97% हेयर कट हो गया। हिसाब-किताब में समझेंगे कि ये खेल कैसे हुआ?
NCLT के सामने अगर किसी प्रस्ताव पर 75% से ज्यादा लेनदारों के वोट पड़ जाते हैं तो प्रस्ताव पास हो जाता है। सेटलमेंट के पक्ष में 80% वोट पड़े। जिन्होंने पक्ष में वोट दिया, उनमें से 35% सुभाष चंद्रा के भाई जवाहर गोयल की पत्नी की कंपनियों ने दिए, जबकि 27% वोट जिन कंपनियों ने दिया, उनके डायरेक्टर का Essel ग्रुप की कंपनियों से नाता रहा है। 62% वोट घर से ही मिलने का आरोप है, लेकिन NCLT ने यह आपत्ति नहीं मानी कि ये कंपनियां सुभाष चंद्रा की Associate हैं। LIC Housing, HDFC Bank समेत कई बैंकों के करीब 4 हजार करोड़ रुपये बकाया हैं, लेकिन उनके पास सिर्फ 20% ही वोट थे।
एक बात यह जान लीजिए कि सुभाष चंद्रा ने खुद 22 हजार करोड़ रुपये का लोन नहीं लिया था। लोन उनके Essel ग्रुप की कंपनियों ने लिया था। ये कंपनियां मुख्य तौर पर इंफ्रास्ट्रक्चर का काम करती थीं। यह Z टीवी से अलग बिजनेस है। इस लोन की गारंटी सुभाष चंद्रा ने ली थी। कंपनियां लोन नहीं चुका पाईं तो लेनदारों ने NCLT में केस कर दिया।
लेनदारों में LIC Housing, Indiabulls, HDFC Bank, Union Bank, Axis Bank, RBL Bank जैसी बड़ी कंपनियां शामिल थीं। इनका बकाया करीब 4 हजार करोड़ रुपये था। लेनदारों में वीणा इन्वेस्टमेंट ग्रुप कंपनियां (करीब 35%), Lemonade Capital और Corpcall Capital (27%) भी शामिल हो गए। इन कंपनियों का दावा था कि सुभाष चंद्रा ने जो गारंटी दी थी, उसमें उनका भी इस्तेमाल किया गया था।
मोटे तौर पर उनके शेयर गिरवी रखे थे। उन्होंने करीब 14 हजार करोड़ रुपये का दावा किया। बैंक कहते रहे कि ये कंपनियां सुभाष चंद्रा से जुड़ी हुई हैं। इनको लेनदार नहीं मानना चाहिए। वीणा इन्वेस्टमेंट ग्रुप कंपनियों की मालकिन सुशीला गोयल हैं। वो सुभाष के छोटे भाई जवाहर की पत्नी हैं। बाकी दोनों कंपनियों Lemonade Capital और Corpcall Capital के डायरेक्टर पहले Essel ग्रुप की कंपनियों में डायरेक्टर रह चुके हैं। ट्रिब्यूनल ने बैंकों की आपत्ति को खारिज कर दिया। कानूनन सुभाष चंद्रा की जीत हुई।
हल्ला मचने के बाद अब बैंक इस फैसले के खिलाफ अपील करने जा रहे हैं। बैंक Essel ग्रुप की कंपनियों से भी अलग से वसूली में लगे हैं, जिनकी गारंटी सुभाष चंद्रा ने ली थी। सरकारी सूत्रों का दावा है कि उनसे करीब 1400 करोड़ की वसूली हो सकती है, जबकि कुल लोन 4 हजार करोड़ रुपये का है। यह लंबी प्रक्रिया है।
अब अरुण शौरी के बयान पर लौटिए। लोन डूबाने के बाद आपके रिश्तेदार या जान-पहचान के लोग ही आपको सस्ते में छुड़वा सकते हैं, जैसा सुभाष चंद्रा के भाई की पत्नी ने दावा ठोककर किया। सवाल IBC पर भी उठ रहे हैं, जिसे सरकार बड़ा रिफॉर्म बताती रही है।
( यह लेखक के निजी विचार हैं )
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख सरसंघचालक मोहन भागवत ने भी आधुनिक सामाजिक परिस्थितियों के अनुरूप संगठन के डिजिटल विस्तार की जरूरत स्वीकार की है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
आलोक मेहता, पद्मश्री, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक।
असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने नई दिल्ली में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुख्यालय 'केशव कुंज' में एक पुस्तक लोकार्पण कार्यक्रम में जेन जी और जेन अल्फा के हंगामी प्रचार पर बहुत महत्वपूर्ण मुद्दा उठाया। उन्होंने इन दोनों श्रेणियों को पूरी तरह से "पश्चिमी और यूरोपीय अवधारणा" बताते हुए खारिज कर दिया। मुख्यमंत्री ने कहा, "हमारे देश में जेन जी या जेन अल्फा जैसा कोई कॉन्सेप्ट नहीं है। ये शब्द अमेरिका और यूरोप से आते हैं, उस संस्कृति से हमारा कोई लेना-देना नहीं है।" उन्होंने जोर देकर कहा, "मेरे लिए हमारे देश और असम के युवा कोई 'जेन जी' या 'जेन अल्फा' नहीं हैं, बल्कि वे हमारे अपने बेटे और बेटियां हैं। हम अपने बच्चों को किसी भी श्रेणी में नहीं बांटेंगे।"
उन्होंने कहा कि भारतीय समाज पारंपरिक रूप से पीढ़ियों को पारिवारिक रिश्तों (जैसे माता-पिता, दादा-दादी, बेटे-बेटी) के माध्यम से समझता है। इसलिए बच्चों को ऐसे पश्चिमी लेबलों में कैद करने के बजाय, हमें एक परिवार की तरह मिलकर रहना चाहिए और बच्चों के कल्याण व देश को आगे बढ़ाने के लिए काम करना चाहिए। पुस्तक विमोचन के बाद उन्होंने यह टिप्पणी गुजरात (सोमनाथ) और मीडिया के अन्य पत्रकारों के साथ बातचीत के दौरान भी साझा की।
हाल के वर्षों में हिमंत बिस्वा सरमा भारतीय जनता पार्टी के मुख्यमंत्री के रूप में ही नहीं, भारतीय जीवन मूल्यों, संस्कारों, हिंदुत्व की संस्कृति पर प्रभावी ढंग से राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने लगे हैं। वह संभवतः कभी संघ के स्वयंसेवक नहीं रहे होंगे, लेकिन कांग्रेस के सक्रिय कार्यकर्ता से शीर्ष नेता बनते हुए असम और संपूर्ण भारत के लिए विदेशी ताकतों-संगठनों से हुए नुकसान को गहराई से समझे हुए हैं। पुस्तक लोकार्पण कार्यक्रम में भी उन्होंने अन्य लोगों की अपेक्षा अधिक विनम्रता और दृढ़ता से अपनी बातें रखीं। जबकि संघ से जुड़े वक्ता जेन जी, जेन अल्फा का उल्लेख करते हुए औपचारिक भाषण देते रहे।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख सरसंघचालक मोहन भागवत ने भी आधुनिक सामाजिक परिस्थितियों के अनुरूप संगठन के डिजिटल विस्तार की जरूरत स्वीकार की है। एक रिपोर्ट के अनुसार संघ जेन जी और डिजिटल संपर्क तंत्र पर ध्यान दे रहा है तथा स्वयंसेवकों को तकनीक के उपयोग का प्रशिक्षण भी दिया जा रहा है। वहीं श्री भागवत ने चेतावनी दी कि संगठन को केवल प्रचारोन्मुख नहीं बनना चाहिए। यह बहुत दिलचस्प विरोधाभास है।
हाल के वर्षों में संघ-भाजपा में यह अंतर्विरोध चुनौतियों के साथ खतरा भी बन रहा है। इसमें कोई शक नहीं कि संघ प्रमुख और उनके सहयोगी दत्तात्रेय होसबोले के साथ कई प्रचारक मूल संस्कारों और विचारधारा पर जोर दे रहे हैं। दोनों संगठनों में जहां समर्पित लोग हैं, वहीं सत्ता से पद और स्वार्थों की पूर्ति में लगे हैं। इससे छवि पर असर पड़ रहा है। हाल ही में दिल्ली के जंतर-मंतर पर कॉकरोच पार्टी के आंदोलन और उसके पीछे रही बाहरी ताकतों-संगठनों के दबाव से सरकार के कुछ नेताओं को जेन जी का राग गाना पड़ा है।
लेकिन सत्ता से लाभान्वित संघ-भाजपा के युवा संगठनों ने छात्रों की समस्याओं पर संघर्ष और सहयोग के लिए क्या कोई योगदान दिया? सही बात तो यह है कि भाजपा के कई नेताओं की तरह दूसरी-तीसरी पंक्ति के नेता-कार्यकर्ता सोशल मीडिया पर प्रचार तक सीमित रहने लगे। इसीलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अधिकांश बैठकों में सांसदों, विधायकों और अन्य नेताओं को जनता के बीच घर-घर तक जाने की आवश्यकता बता रहे हैं। आखिरकार जनता से जुड़े होने के कारण उत्तर-पश्चिम भारत के साथ पूर्वोत्तर में संघ-भाजपा शक्तिशाली होकर सत्ता में आई।
मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने भी 'ग्रिट एंड ग्लोरी' नामक जिस पुस्तक का लोकार्पण किया, वह असम और पूर्वोत्तर भारत के उन लोगों के योगदान को रेखांकित करती है, जिन्होंने बहुत ही निष्ठा और निस्वार्थ भाव से संघ के साथ मिलकर काम किया और क्षेत्र में सामाजिक परिवर्तन लाने में अपना योगदान दिया। यह पुस्तक पूर्वोत्तर भारत के इतिहास, उसकी चुनौतियों और वहां हुए सामाजिक बदलावों पर केंद्रित है। इसमें विशेष रूप से आरएसएस के प्रचारकों और उससे जुड़े संगठनों के उन कार्यकर्ताओं के अनुभवों को संकलित किया गया है, जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों में काम किया।
वे लोग बिना किसी स्थापित नेटवर्क या संसाधनों के बेहद सुदूर और अपरिचित क्षेत्रों में गए। उन्होंने कठिन जीवन परिस्थितियों, उग्रवादी समूहों की धमकियों, शारीरिक हमलों और अन्य कठिनाइयों का सामना करते हुए भी समाज सेवा और राष्ट्र निर्माण का अपना काम जारी रखा। अक्सर इस क्षेत्र को केवल संघर्ष, अलगाववाद या उग्रवाद के चश्मे से देखा जाता रहा है। लेकिन यह पुस्तक दर्शाती है कि समाज केवल सरकारी नीतियों या संस्थाओं से नहीं बदलता, बल्कि जमीन पर चुपचाप काम करने वाले लोगों के साहस, दृढ़ता और सेवा भाव से बदलता है।
संघ में प्रचारक का अर्थ ही था—व्यक्तिगत सुविधा छोड़कर संगठन को पूरा समय देना। प्रचारक अक्सर साधारण जीवन जीता था, एक जगह से दूसरी जगह जाता था, कार्यकर्ताओं के घर रुकता था, साइकिल/बस/रेल से यात्रा करता था और स्थानीय समाज में लगातार व्यक्तिगत संपर्क बनाता था। उसकी सबसे बड़ी ताकत मोबाइल फोन, सोशल मीडिया या बड़ा कार्यालय नहीं, बल्कि व्यक्ति से व्यक्ति का संपर्क थी। इसीलिए पुराने प्रचारक किसी शहर में पहुंचते थे तो पत्रकार, शिक्षक, व्यापारी, किसान, विद्यार्थी, डॉक्टर, वकील और स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ताओं के घर जाकर घंटों बातचीत करते थे। शाखा और छोटी बैठकों के माध्यम से धीरे-धीरे नेटवर्क बनता था।
दिल्ली के झंडेवाला स्थित पुराने संघ कार्यालय में पदों से प्रचारक अलग नहीं पहचाने जाते थे। एक पत्रकार के नाते 1972 से मुझे कई बार इस कार्यालय में जाने के अवसर मिले। वरिष्ठ प्रचारक चमनलालजी के माध्यम से सरसंघचालक तक से भेंट करना कठिन नहीं था। प्रोफेसर राजेंद्र सिंह (रज्जु भैया) और के.सी. सुदर्शनजी के लंबे इंटरव्यू छोटे से कमरे में सामान्य कुर्सियों पर बैठकर हो जाते थे। नई बिल्डिंग्स के टावर बनने से पहले प्रचारक अपने कमरों या हॉल में सामान्य ढंग से खाट पर सोते और जमीन पर बैठकर भोजन किया करते थे। पिछले सप्ताह पूर्वोत्तर पर पुस्तक लोकार्पण के कार्यक्रम के लिए पहली बार संघ के भव्यतम भवनों वाला कार्यालय देखने का अवसर मिला। बाहर सुरक्षा व्यवस्था किसी सरकारी मंत्रालय और कॉरपोरेट कंपनी से भी अधिक दिखी। पांच सितारा रंग-ढंग देखकर पता चला कि संघ कितना बदल गया है।
अपनी शताब्दी वर्ष की योजना में संघ ने हर गांव और हर घर तक पहुंचने तथा लगभग 58,964 मंडलों और 44,055 बस्तियों में हिंदू सम्मेलन आयोजित करने का लक्ष्य बताया था। लेकिन काम करने का तरीका निश्चित रूप से बदल रहा है। पहले प्रचारक का प्रभाव मुख्यतः स्थानीय संगठन और व्यक्तिगत संबंधों से बनता था। आज एक वरिष्ठ प्रचारक के पास बड़ा संगठनात्मक कार्यालय, यात्रा की बेहतर सुविधा, डिजिटल संचार, व्हाट्सऐप समूह, वीडियो कॉन्फ्रेंस, सोशल मीडिया टीम, मीडिया संपर्क, विभिन्न संगठनों के साथ समन्वय जैसी सुविधाएं उपलब्ध हैं।
आधुनिक भवन भी इसी बदलाव का प्रतीक है। ‘केशव कुंज’ को केवल कार्यालय भवन के रूप में नहीं, बल्कि संगठनात्मक गतिविधियों, प्रशिक्षण, आवास, प्रकाशन, अध्ययन और बड़े कार्यक्रमों के लिए एक बहुउद्देश्यीय परिसर के रूप में विकसित किया गया है। इसका पुनर्निर्माण लगभग 150 करोड़ रुपये की लागत से हुआ बताया जाता है। केशव कुंज परिसर में तीन टावर—‘साधना’, ‘प्रेरणा’ और ‘अर्चना’ हैं।
प्रत्येक टावर ग्राउंड फ्लोर के अलावा 12 मंजिल का है। कुल मिलाकर लगभग 300 कमरे और कार्यालय स्थान हैं। यहां तीन बड़े सभागारों की कुल क्षमता 1,300 से अधिक बताई गई है। इसी तरह हाल ही में नागपुर में भी संघ मुख्यालय के स्मृति मंदिर परिसर के लगभग ₹300 करोड़ के पुनर्विकास की प्रक्रिया शुरू की है। इसका प्रमुख उद्देश्य पुराने ढांचे को आधुनिक बनाना और 2027 में नागपुर में होने वाली अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा के लिए बड़ी एवं आधुनिक सुविधाएं तैयार करना है। इस दृष्टि से नए रूप में संघ-भाजपा को पुराने संस्कारों, आधुनिक विचारों में समन्वय और जनता से जीवंत संपर्क की चुनौती सबसे अधिक रहने वाली है।
( यह लेखक के निजी विचार हैं )
बहुत कुछ तो एआई कर ही रहा है। सीखते हुए बड़ी और समझदार हो रही मशीनें क्या हमें लिखने लायक भी छोंडेंगी? मशीनों पर बढ़ती निर्भरता क्या हमें मौलिक चिंतन के लायक छोड़ेगी?
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
प्रो.संजय द्विवेदी, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष।
अब जब वह जमाना बीत रहा है जिसमें हम अपने पसंदीदा लेखकों को मुग्ध होकर पढ़ते थे, उनकी भाषा, उनकी शैली की दीवानगी हमें उनसे जोड़कर रखती थी। यह ऐसा रिश्ता था जो हमें किसी खास लेखक का पाठक बना देता था। क्या डिजिटल क्रांति के इस दौर में मशीनें जिस तरह लिख-पढ़ रही हैं, लेखकों का वजूद रह जाएगा? जनरेटिव एआई अब केवल तकनीकी टूल न रहकर भाषा, विचार और अभिव्यक्ति का माध्यम बन रही हैं, उससे चिंता की लकीरें गहरी हो गयी हैं। हमें आश्वासन दिए जा रहे हैं कि वे एक मशीनी भाषा लिखेंगीं, पर दिल कहां से लाएंगी? संवेदनाएं कहां से लाएंगीं? लेकिन दिमाग इस तरह से भी सोचता है कि अगर वे दिल और भावनाएं भी ला सकीं, हमारे आपके जैसा ही सोचने और लिखने लगीं तो क्या होगा?
हमारे लिए क्या छोड़ेंगी मशीनें?
बहुत कुछ तो एआई कर ही रहा है। सीखते हुए बड़ी और समझदार हो रही मशीनें क्या हमें लिखने लायक भी छोंडेंगी? मशीनों पर बढ़ती निर्भरता क्या हमें मौलिक चिंतन के लायक छोड़ेगी? ये बड़े सवाल हैं। एआई के अनेक टूल्स हिंदी और भारतीय भाषाओं में धाराप्रवाह लिख रहे हैं, कंटेट क्रिएट कर रहे हैं। यह हमारी भाषाई विविधता के लिए बड़ा अवसर है या भाषाई पहचान और भाषा से जुड़े व्यवसाय के लिए संकट के दिन, कहना कठिन है। माना जा रहा है कि ये प्रयोग डिजिटल खाइयों (डिजिटल डिवाइड) को कम करेंगें। अंग्रेजी न लिखने, बोलने और समझने वाले बड़े समाज के लिए बहुत कुछ पहुंच में आ जाएगा।
वे सरकारी योजनाओं, सेवाओं, सूचनाओं को अपनी भाषा में ग्रहण कर सकेंगें। भारतीय भाषाओं का ‘रीयल टाइम अनुवाद’ हमारी भाषाई सद्भावना को बढ़ाने का काम करेगा। हमारा संपूर्ण भारतीय साहित्य और ज्ञान परंपरा सब भाषा भाषियों तक पहुंच सकेगा। इसी के साथ लुप्त हो रही बोलियां, संवाद और लोक परंपराएं और प्रदर्शन कलाएं संरक्षित किए जाने की पहल भी हो सकती है। डिजिटल आकार्इव हमें यह सुविधा देगा कि हम अपना बहुत कुछ बचा सकें और अपनी-अपनी भाषाओं में उसे सुन सकें, पढ़ सकें।
क्या रूप, रस, गंध खो बैठेंगीं भाषाएं?
सबसे बड़ा संकट है भाषाओं की आत्मा का। उसकी चिति का। उसके मुहावरों- लोकोक्तियों का। उसके नाद का। मशीनी अनुवाद,मशीनी लेखन से भाषाएं क्या अपना मूल रस,स्वाद,गंध और भाव खो बैठेंगी। क्या उन्हें संवेदना के तल पर रिक्त छोड़ दिया जाएगा। क्या भाषाएं अब सूचना की वाहक तो होंगीं किंतु भावों का निर्वहन करने लायक नहीं बचेंगीं? हमारे एआई माडल्स मूलतः पश्चिमी या अंग्रेजी डेटासेट पर प्रशिक्षित हैं। वे भारतीय भाषाओं का सुंदर अनुवाद कर रहे हैं। लेकिन उसमें प्रयुक्त मुहावरों, लोकोक्तियों, मानवीय संस्पर्श की कोमल भावनाओं, व्यंग्य और भावनात्मक गहराई को छू नहीं पा रहे हैं। संभावना है कि वे भविष्य में इन्हें छूने और पकड़ने का प्रयास करें।
भाषाई समरूपता कई बार भाषा प्रवाह में ही बाधा बनती है। मशीनी अनुवाद की सीमाएं भी जाहिर ही हैं। इनके कारण लेखन में मशीनीपन और भाषा में भाव की कमी साफ दिखती है। भारतीय भाषाओं की डेटा आज भी बहुत कम है। वे समाज में गहरी पैठी हुई भाषाएं तो हैं किंतु डिजिटल दुनिया में उनकी उपस्थिति अभी सीमित है। ऐसे में स्थानीय डेटासेट बड़ी संभावनाओं के द्वार खोलता है। भारतीय भाषाओं के लिए स्वदेशी टूल्स (एलएलएम्स) का विकास जरुरी है, जिससे हमारी भाषाएं भी अपने सामर्थ्य का प्रदर्शन यहां कर सकें।
इससे हमारी संस्कृति, हमारी वाक् परंपरा और व्याकरण का संरक्षण भी होगा। सभी कहते हैं कि एआई को सहायक के रुप में देखें न कि लेखक के रूप में। लेकिन एआई पर बढ़ती निर्भरता क्या लेखक के विचारों और उसकी चिंतन प्रक्रिया को अनुकूलित नहीं करेगी? वह उन्हीं विषयों, विचारों और दायरों में कैद होकर रह जाएगा जहां एआई उसे ले जाएगी। स्वतंत्र चिंतन के लिए एआई का प्रयोग कितना उपयोगी है, यह सोचने की जरुरत है। आज हमारे पास कोई नीतिगत ढांचा और नैतिक निर्देश नहीं हैं। ऐसे में हम अपनी हदों और सरहदों को कैसे तय करें?
संस्कृति की वाहक है भाषा-
इसमें दो राय नहीं कि एआई के पास भाषा आ चुकी है। वह उसे लिखना, बोलना और व्यक्त करना जानता है। कई बार उसकी भाषा परिशुद्ध भी होती है, गलतियों के बिना और व्याकरणपरक भी। बावजूद इसके उसके मशीनीकृत रूप के भी कई रूप रचे जा सकते हैं। वह अनेक शैलियों में पारंगत हो रहा है। अनुवाद कुशल तो वह है ही। ऐसे में भाषा की आत्मा का क्या होगा, यह प्रश्न ज्यों का त्यों सामने खड़ा है। भाषा अकेली नहीं आती, वह किसी संस्कृति की वाहक होती है। स्थानीयता की भी वाहक होती है। संवेदना, विचार, संस्कृति और स्थानीय तत्वों से मिलकर भाषा अपने मुहावरे में ही मुक्ति पाती है। इससे उसकी दुनिया बड़ी होती है। उसका पाठक संसार खड़ा होता है। भारतीय भाषाओं के सामने सबसे बड़ा संकट यही है क्या वे अपनी मूल चेतना और रस-गंध को खो बैठेंगीं? वे सूचनाएं देंगी पर पर कुछ कहेंगीं नहीं। बतियाएंगी नहीं। उनमें बातें कहने की क्षमता हो सकती है पर वे संवाद नहीं कर पाएंगी।
सूचना का सुपर हाइवे मौलिकता की बलि न ले-
तकनीक की तेज रफ्तार के बीच में हमें भाषाई मौलिकता,मानवीय संस्पर्श को बचाए और बनाए रखने के सचेतन प्रयास करने होगें। डिजिटल क्रांति से भाषाओं का विस्तार तो हो किंतु उनकी मूल संवेदना, मुहावरे, लोकोक्तियां और संस्कृति न छूटें इसका प्रयास हम भाषाप्रेमियों को ही करना होगा। भाषाई दीवारें गिराने पर आमादा एआई हमारे लिए एक अवसर है, किंतु यह अवसर आत्मसमर्पण का कारण नहीं बने, इसके लिए हमें सोचना होगा। शब्द इंसान के हों किंतु भाषा मशीनी हो ऐसा तो हममें से कोई नहीं चाहेगा। सूचना का यह सुपर हाइवे हमारी मौलिकता की बलि न ले ले, इसकी जिम्मेदारी हर उस व्यक्ति की है जो अपनी भाषा से प्यार करता है।
यह लेखक के निजी विचार हैं।
'एक्सचेंज4मीडिया' के फाउंडर और 'BW बिजनेसवर्ल्ड' के चेयरमैन व एडिटर-इन-चीफ डॉ. अनुराग बत्रा के जन्मदिन पर कम्युनिकेशन कंसल्टेंट और लेखक गणपति विश्वनाथन ने उनके व्यक्तित्व को शब्दों में पिरोया है
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
गणपति विश्वनाथन, कम्युनिकेशन कंसल्टेंट और लेखक।
कुछ लोग बिजनेस खड़ा करते हैं, कुछ ब्रैंड बनाते हैं और कुछ खास लोग ऐसे होते हैं, जो संस्थान तैयार करते हैं। 'एक्सचेंज4मीडिया' (exchange4media) ग्रुप के फाउंडर और 'BW बिजनेसवर्ल्ड' के चेयरमैन एवं एडिटर-इन-चीफ डॉ. अनुराग बत्रा ऐसे ही लोगों में शामिल हैं।
आज, जब डॉ. अनुराग बत्रा 54 साल के हो गए हैं, तो कम्युनिकेशन कंसल्टेंट और लेखक गणपति विश्वनाथन ने उनके अब तक के सफर को शब्दों में पिरोया है। गणपति विश्वनाथन के अनुसार, डॉ. अनुराग बत्रा की कहानी केवल उनकी उपलब्धियों की कहानी नहीं है, बल्कि उस तरीके की भी कहानी है, जिससे उन्होंने यह सब खड़ा किया—आस्था, जुनून, निरंतरता और सबसे बढ़कर भविष्य पर लगातार नजर रखते हुए।
गणपति विश्वनाथन लिखते हैं कि डॉ. अनुराग बत्रा एक बेहद आस्थावान व्यक्ति हैं, जिनके लिए काम ही पूजा है। उनकी आस्था उनके व्यक्तित्व का एक अहम हिस्सा है, लेकिन काम के प्रति उनकी असाधारण ऊर्जा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। वह ऐसे व्यक्ति हैं, जिनके मन में हमेशा कुछ न कुछ चलता रहता है। एक नया विचार, नया अवसर, नई संभावना या किसी चीज को और बेहतर बनाने का नया तरीका।
डॉ. अनुराग बत्रा ने अपने पार्टनर नवल आहूजा के साथ एक-एक ईंट जोड़ते हुए ‘एक्सचेंज4मीडिया’ (exchange4media) को खड़ा किया। एक केंद्रित प्लेटफॉर्म के तौर पर शुरू हुआ यह सफर वर्षों में भारतीय मीडिया, मार्केटिंग और एडवरटाइजिंग इकोसिस्टम में एक महत्वपूर्ण और प्रभावशाली उपस्थिति के रूप में विकसित हुआ।
हालांकि, उनका सफर यहीं नहीं रुका। डॉ. अनुराग बत्रा ने लगातार अपने मीडिया विस्तार को आगे बढ़ाया और ‘बिजनेसवर्ल्ड’ (BusinessWorld) तथा ‘इम्पैक्ट’ (IMPACT) को समूह में शामिल किया। इसके साथ ही पब्लिकेशंस और प्लेटफॉर्म्स का एक बड़ा इकोसिस्टम तैयार हुआ। इस यात्रा की खास बात मीडिया के प्रति उनका 360 डिग्री दृष्टिकोण है। समूह ने बिजनेस, मार्केटिंग, एडवरटाइजिंग, मीडिया और इन इंडस्ट्रीज को आकार देने वाले लोगों, विचारों और चर्चाओं के बीच अपनी उपस्थिति बनाई है।
गणपति विश्वनाथन के अनुसार, डॉ. अनुराग बत्रा की सबसे बड़ी ताकतों में से एक यही है कि वह पब्लिशिंग को केवल कंटेंट तैयार करने का बिजनेस नहीं मानते, बल्कि इसे बातचीत और संवाद तैयार करने का माध्यम समझते हैं। यही बातचीत किसी भी इंडस्ट्री को जीवंत बनाए रखती है।
डॉ. अनुराग बत्रा हमेशा अपनी सोच में साहसी रहे हैं और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उनका दृष्टिकोण हमेशा भविष्य की ओर रहा है। उन्होंने यह समझा कि मीडिया बिजनेस केवल कल क्या हुआ, इसे देखकर नहीं चल सकता। उसे यह भी समझना होगा कि आने वाले समय में दर्शक और पाठक क्या चाहेंगे।
परिवर्तन को पहले से भांपने की इसी क्षमता ने उनके पब्लिकेशंस को समसामयिक, प्रासंगिक और अपने दर्शकों के लिए उपयोगी बनाए रखने में मदद की है। दिल से इनोवेटर डॉ. अनुराग बत्रा लगातार इस बात पर विचार करते रहते हैं कि उनके प्लेटफॉर्म्स को और अधिक जानकारीपूर्ण, समकालीन और दर्शकों के लिए उपयोगी कैसे बनाया जाए। वह केवल वही करते रहने में सहज नहीं हैं, जो हमेशा से होता आया है। उनके मन में हमेशा एक सवाल रहता है—‘अब आगे क्या?’
शायद यही सवाल उनके पूरे सफर की प्रमुख प्रेरक शक्तियों में से एक रहा है। आज भारत के मार्केटिंग और एडवरटाइजिंग इकोसिस्टम में किसी प्रमुख प्लेटफॉर्म का नाम आता है तो ‘एक्सचेंज4मीडिया’ का नाम स्वाभाविक रूप से सामने आता है। इस तरह की ब्रैंड पहचान रातोंरात नहीं बनती। इसके पीछे वर्षों की लगातार मेहनत, इंडस्ट्री से रिश्ते, विश्वसनीयता और यह समझ शामिल होती है कि लोग क्या जानना और किस बारे में बात करना चाहते हैं।
हालांकि, डॉ. अनुराग बत्रा की एक और खासियत है, जो गणपति विश्वनाथन को विशेष रूप से प्रभावित करती है। उन्होंने इतना कुछ बनाया है, लेकिन आज भी वह ऐसे व्यक्ति की तरह काम करते हैं, जैसे अभी भी कुछ बनाने की शुरुआत कर रहे हों।
उनमें मंजिल पर पहुंच जाने का कोई भाव नहीं है। इसके बजाय, आगे क्या है, इसे जानने की एक निरंतर जिज्ञासा है। शायद यही वजह है कि 54 की उम्र उन्हें केवल एक संख्या नहीं, बल्कि एक ऐसे पड़ाव के रूप में दिखाती है, जहां पीछे के अनुभव भी हैं और भविष्य की संभावनियां भी साफ दिखाई देती हैं।
गणपति विश्वनाथन के शब्दों में, यही वह अनुराग हैं, जिन्हें वह जानते हैं एक ऐसा व्यक्ति, जो आस्था से प्रेरित है, काम से ऊर्जा पाता है और जिसकी नजर लगातार आने वाले कल पर रहती है। 54 साल की उम्र में डॉ. अनुराग बत्रा एक महत्वपूर्ण विरासत बना चुके हैं। लेकिन गणपति विश्वनाथन का मानना है कि अनुराग बत्रा शायद पीछे मुड़कर अपनी विरासत को देखने में उतनी रुचि नहीं रखते। वह इससे ज्यादा इस बारे में सोचना पसंद करेंगे कि अगला क्या बनाया जा सकता है।
गणपति विश्वनाथन के अनुसार, डॉ. अनुराग बत्रा शायद अपने सफर को आगे मौजूद संभावनाओं से मापते रहेंगे। डॉ. अनुराग बत्रा के 54वें जन्मदिन पर गणपति विश्वनाथन ने उन्हें निरंतर सफलता, खुशी, अच्छे स्वास्थ्य और सबसे बढ़कर उसी जुनून और बेचैन ऊर्जा के लिए शुभकामनाएं दी हैं, जिसने उनके सफर को परिभाषित किया है। 54 साल की उम्र। पीछे एक लंबा और महत्वपूर्ण सफर। और आगे शायद उससे भी ज्यादा रोमांचक यात्रा इंतजार कर रही है। जन्मदिन की बहुत-बहुत शुभकामनाएं, डॉ. अनुराग बत्रा।