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‘आज की पत्रकारिता के लिए तीन बड़ी चुनौतियां हैं- प्रेशर, ट्रोलिंग और फेक न्यूज’

राष्ट्रीय प्रेस दिवस सिर्फ़ उत्सव नहीं, बल्कि पत्रकारिता की चुनौतियों और जिम्मेदारियों पर ध्यान देने का मौका है। तेज़ी, ट्रोलिंग और डिजिटल शोर के बीच सच को उजागर रखना पहले से ज्यादा जरूरी हो गया है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। 3 months ago

शमशेर सिंह, सलाहकार संपादक, नेटवर्क18 समूह।।

राष्ट्रीय प्रेस दिवस (16 नवंबर) सिर्फ़ पेशे का उत्सव नहीं, बल्कि पत्रकारिता की चुनौतियों और जिम्मेदारियों पर ध्यान देने का मौका है। तेज़ी, ट्रोलिंग और डिजिटल शोर के बीच सच को उजागर रखना अब पहले से कहीं ज्यादा जरूरी हो गया है।

प्रेशर, ट्रोलिंग और फेक न्यूज़। ये तीन चुनौतियां हैं आज की पत्रकारिता के लिए। यह दिन हमारे पेशे का उत्सव भर नहीं, एक याद दिलाने वाला मौका भी है कि पत्रकारिता अभी भी लोकतंत्र की रीढ़ है। याद रखिए इन सबके बीच हमे सोशल मीडिया के तूफ़ान से भी बचना है।

न्यूज़ रूम में सबसे पहले, सबसे तेज के साथ अब वायरल करो की भी रेस है। लेकिन असली पत्रकार वही जो इस शोर में भी सच को सामने रखे।

अब हर खबर के पीछे एक डिजिटल भीड़ खड़ी है—गाली, तंज, निजी हमले। ये तोड़ने आते हैं, रोकने आते हैं। पर हमारा जवाब बहस नहीं, तथ्य और सच्चाई होनी चाहिए।

फेक न्यूज़ अब हथियार नहीं, पूरी फैक्टरी है—डीपफेक से लेकर पुराने वीडियो तक। सच को धुंधली करने की ये कोशिशें ही पत्रकार की जिम्मेदारी को और भारी बनाती हैं—तथ्य छांटने, संदर्भ साफ़ करने और झूठ की परतें उघाड़ने की जिम्मेदारी।

लोकतंत्र की रीढ़ पर रोजाना चोट पड़ती है—पर सच की मशाल अभी भी जल रही है। हमारा काम वही है—दबाव में न झुकना, ट्रोलिंग में न टूटना, और झूठ के अंधेरे में रोशनी कम न होने देना।

दबाव, ट्रोलिंग और फेक न्यूज के बीच भी सच की मशाल थामे रहना ही आज की पत्रकारिता की असली पहचान है। यह दिन याद दिलाता है कि लोकतंत्र की रीढ़ तब मजबूत रहती है जब पत्रकार बिना डर और झुकाव के अपने काम पर कायम रहते हैं।

(यह लेखक के निजी विचार हैं।)

 

 


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