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राष्ट्रीय प्रेस दिवस पर विशेष: भारतीय पत्रकारिता की चुनौतियां और संभावनाएं

राष्ट्रीय प्रेस दिवस (16 नवंबर) के उपलक्ष्य में लिखे अपने लेख में आलोक मेहता का कहना है कि समय के साथ हिंदी पत्रकारिता में भी कई तरह के बदलाव आए हैं।

Alok Mehta 3 months ago

आलोक मेहता, पद्मश्री, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक।

राष्ट्रीय प्रेस दिवस पर पत्रकारिता की चुनौतियां और उपलब्धियां चर्चा में रही हैं। यह धारणा गलत है कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया आने से हिंदी की पत्रकारिता के लिए गंभीर चुनौतियां और समस्याएं आई हैं। सच तो यह है कि मीडिया के विभिन्न माध्यम एक-दूसरे के पूरक भी हैं। हिंदी और भारतीय भाषाओं के बाहुल्य वाले भारतीय शहरों से लेकर गांव तक सूचना, समाचार, विचार पढ़ने, सुनने और देखने की भूख कम होने के बजाय बढ़ती गई है।

इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ही क्यों, अब तो सोशल मीडिया भी बड़े पैमाने पर लोगों के बीच लोकप्रिय हुआ है। यह अवश्य कहा जा सकता है कि समय के साथ हिंदी पत्रकारिता में भी कई तरह के बदलाव आए हैं। तिलक और गणेश शंकर विद्यार्थी युग वाली पत्रकारिता की अपेक्षा वर्तमान परिपे्रक्ष्य में नहीं की जा सकती। लेकिन आधुनिक हिंदी पत्रकारिता की दृष्टि से 70 के दशक से संपादकों और पत्रकारों ने सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक जागरुकता लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय, मनोहर श्याम जोशी, राजेन्द्र माथुर, जैसे संपादकों ने हिंदी के अखबारों के पाठकों के साथ संपूर्ण सामाजिक, राजनीतिक व्यवस्था को प्रभावित किया। नवभारत टाइम्स, हिंदुस्तान,  नई दुनिया, दैनिक भास्कर, राजस्थान पत्रिका और प्रभात खबर जैसे दैनिक अखबार राजधानी दिल्ली से आगे बढ़कर विभिन्न हिंदीभाषी प्रदेशों में भी निरंतर अपनी छाप छोड़ते रहे।

राजेन्द्र माथुर जब 1982 में नवभारत टाइम्स के संपादक बनकर दिल्ली आए तो उन्होंने कुछ ही सप्ताह बाद एक समारोह में कहा था कि हिंदी का कोई अखबार केवल दिल्ली या मुंबई से प्रकाशित होने से राष्ट्रीय नहीं कहा जा सकता। वह तभी राष्ट्रीय कहला सकता है जब देश के विभिन्न राज्यों में उसके संस्करण हों।

यों अज्ञेय ने भी 1977 में नवभारत टाइम्स के संपादक बनने पर दिल्ली, मुंबई के अलावा बिहार की राजधानी पटना से अखबार का संस्करण निकालने की इच्छा व्यक्त की थी। लेकिन दो वर्ष के संक्षिप्त कार्यकाल के कारण वह सपना पूरा नहीं हुआ। माथुर साहब के आने के बाद लखनऊ, जयपुर, पटना के संस्करण निकले।

इसी तरह जब मुझे दैनिक हिंदुस्तान का संपादक बनने का अवसर मिला, पटना के अलावा लखनऊ यानी उत्तर प्रदेश के संस्करण निकालने के लिए प्रबंधन तैयार हुआ। इसी तरह हरिवंशजी ने प्रभात खबर संभालने के बाद इसे झारखंड और बिहार में प्रतिष्ठित अखबार बना दिया।

जनसत्ता दिल्ली के अलावा मुंबई और कोलकाता से प्रकाशित हुआ। दिलचस्प बात यह भी रही कि राजस्थान पत्रिका जैसे जयपुर के अखबार ने कोलकाता के अलावा दक्षिण भारत में हैदराबाद और बंगलौर जैसे शहरों में हिंदी पाठकों के लिए संस्कारण निकाले। इस दृष्टि से हिंदी पत्रकारिता ने अपनी गुणवत्ता से व्यापक स्तर पर पाठकों में अपनी पहचान बनाई। इसलिए इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से पहले हिंदी अखबारों की प्रगति को उपलब्धि की श्रेणी में रखा जा सकता है।

इलेक्ट्रॉनिक मीडिया यानी टेलीविजन के समाचार चैनल आने से हिंदी अखबारों की प्रसार संख्या कम नहीं हुई बल्कि अधिकृत आंकड़ों के अनुसार भी इनके पाठक बढ़ते गए। मेरा यह मानना है कि रेडियो या टेलीविजन पर कोई खबर देखने के बाद सामान्य जनता इन्हें विस्तार से देखने, पढ़ने और उस पर होने वाली टिप्पणियों के लिए अखबार या पत्रिका पढ़ती है।

इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के आने से पहले भी दैनिक अखबारों में रंगीन फोटो तथा आधुनिक डिजाइन के आकर्षक प्रस्तुतीकरण के प्रयास होने लगे थे। अन्यथा 70 के दशक के पहले भारत ही नहीं, ब्रिटेन जैसे पश्चिमी देश में भी अखबारों में रंगीन फोटो नहीं छपते थे। इसलिए यह कहा जा सकता है कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया आने पर हिंदी अखबारों की डिजाइन और परिशिष्ट में रंगीन फोटो छपने लगे। ररिवारीय संस्करण कुछ हद तक पत्रिका की कमी भी पूरी करने लगे।

असली समस्या यह है कि आधुनिक तकनीक, प्रिंटिंग का खर्च और न्यूजप्रिंट के मूल्य लगातार बढ़ने से बड़े प्रभावशाली कहे जाने वाले अखबार के प्रबंधन घाटे और मुनाफे पर अधिक ध्यान देने लगे। कुछ हद तक राजनीतिक सत्ता का प्रभाव भी इन अखबारों पर पड़ा।

इस संदर्भ में देश के सबसे बड़े प्रकाशन समूह टाइम्स ग्रुप द्वारा मुनाफे को ही सर्वाधिक महत्व देने और अखबार को चटपटा, मसालेदार तथा अंग्रेजी में उपलब्ध सामग्री के अनुवाद को प्रोत्साहित करने की नीति अपनाई जिसका असर अन्य हिंदी अखबारों पर भी पड़ा। लेकिन प्रादेशिक और स्थानीय कम प्रसार संख्या वाले अखबार बहुत हद तक व्यावसायिक नहीं हुए और पाठकों के बीच स्थानीय समाचारों और उपयोगी सामग्री के जरिए अपना स्थान बनाए हुए हैं।

यह कहा जा सकता है कि महानगरों का एक बड़ा वर्ग और युवा पीढ़ी इलेक्ट्रॉनिक और सोशल मीडिया के आने के बाद अखबारों में कम दिलचस्पी ले रही है। लेकिन छोटे कस्बों और गांवों में आज भी अखबार पढ़ने की रुचि बनी हुई है। ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में साक्षरता बढ़ने से अखबारों के लिए अब भी संभावनाएं दिखाई देती हैं। सरकारों खासकर नौकरशाहों ने यह गलत धारणा बना रखी है कि अब लोग अखबार, पत्रिका या पुस्तकें नहीं पढ़ना चाहते हैं। वह भूल जाते हैं कि अमेरिका या जापान जैसे आधुनिक संपन्न देशों में भी अखबारों की प्रसार संख्या अच्छी-खासी है।

वास्तव में प्रकाशकों और संपादकों पर यह निर्भर है कि वह बाजार से प्रभावित न होकर ऐसी सामग्री पाठकों को उपलब्ध कराएं जो सामान्यतः टेलीविजन पर भी नहीं मिल सकती। पश्चिमी देशों की तरह भारत में अलग से टैबलाइट अखबार भी निकले लेकिन दुर्भाग्य से कई अखबार सनसनीखेज सामग्री और फोटो आदि से टैबलाइट की तरह अखबार का स्तर गिराने लगे, वहीं मशीन, प्रिंटिंग और प्रसार व्यवस्था पर अधिकाधिक धन खर्च किया जा रहा है लेकिन समाचारों के संकलन और समर्पित पत्रकारों पर खर्च कम से कम करने की प्रवृत्ति बढ़ती गई है। इसका असर गुणवत्ता पर पड़ रहा है।

इन दिनों मीडिया की शक्ति और स्वायत्तता को लेकर भी निरंतर सवाल उठ रहे हैं। जहां तक शक्ति का सवाल है, प्रिंट या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया अथवा सोशल मीडिया की बात है, उसके व्यापक असर के कारण ही हजारों करोड़ की पूंजी लग रही है और कोई भी सरकार हो उसका यथासंभव उपयोग करने का प्रयास भी करती है। यही नहीं, विदेशी शक्तियां भी भारतीय मीडिया को प्रभावित करने के लिए प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से पूंजी लगा रही हैं।

बड़े कार्पोरेट घरानों के प्रभाव को लेकर बहुत शोर मचता है लेकिन हम भूल जाते हैं कि 80 के दशक तक दिल्ली, मुंबई, कोलकाता तक मीडिया संस्थानों पर बिड़ला, डालमिया, टाटा के प्रभाव की चर्चा शक्तिशाली प्रधानमंत्री करते थे। इसे जूट प्रेस कहा जाता था। सत्ता के दबाव तब भी थे। मैंने पत्रकारिता पर अपनी पुस्तकों पावर, प्रेस एंड पॉलिटिक्स, कलम के सेनापति, भारत में पत्रकारिता, इंडियन जर्नलिज्मः कीपिंग इट्स क्लीन में इस मुद्दे पर प्रामाणिक तथ्यों के साथ विवरण दिया है।

सत्ता की राजनीति ने पत्रकारिता को पहले भी प्रभावित किया था और आज भी कर रही है। इसलिए मुद्दा यह भी है कि सरकारों को बनाने या हटाने की भूमिका जो अखबार या मीडिया निभाता है उसका असर विश्वसनीयता पर पड़ता है। यदि लक्ष्य केवल प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या दल विशेष रहेगा तो स्वायत्तता कहां होगी अन्यथा प्रामाणिक तथ्यों के साथ सरकार की गड़बड़ियों या जनता की समस्याओं को प्रकाशित या प्रसारित करने पर दबाव नहीं पड़ सकता है।

खोजी रिपोर्ट के लिए संस्थानों को अधिक खर्च भी करना पड़ेगा। नई पीढ़ी को जोड़ने के लिए मीडिया संस्थानों की वेबसाइट और प्रकाशित सामग्री के सोशल मीडिया पर उपलब्ध किए जाने के प्रयास किए जा सकते हैं और कुछ हद तक हो भी रहे हैं। इस दृष्टि से ग्रामीण क्षेत्रों में हिंदी और भारतीय भाषाओं के अखबारों की संभावना बनी रहेगी। यही बात वैकल्पिक मीडिया यानी सोशल मीडिया पर लागू होती है। जो अच्छी सामग्री उपलब्ध कराएगा उसका भविष्य भी सुरक्षित रहेगा।

(यह लेखक के निजी विचार हैं। लेखक पद्मश्री से सम्मानित और एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के पूर्व अध्यक्ष हैं)


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