'उदयन शर्मा ने कुछ यूं बदल दिया था फील्ड रिपोर्टिंग का चेहरा और अंदाज'

उदयन शर्मा का मानना था कि एक पत्रकार के काम करने का समय शाम छह बजे से रात 12 बजे तक का होता है

संतोष भारतीय by संतोष भारतीय
Published - Wednesday, 17 July, 2019
Last Modified:
Wednesday, 17 July, 2019
Santosh Bhartiya

उदयन शर्मा को इस संसार को छोड़े हुए 18 वर्ष बीत गए। इस महीने की 11 तारीख को उनकी पुण्यतिथि थी। उदयन शर्मा का नाम पत्रकारिता के विद्यार्थी जानते हैं या नहीं, मैं नहीं जानता, लेकिन उन्हें जानना चाहिए, ऐसा मैं मानता हूं। उदयन शर्मा हिंदी पत्रकारिता का बहुत बड़ा नाम हैं, जिनकी रिपोर्ट आज भी पढ़ने पर लगता है कि वे कितनी सारगर्भित और परिपूर्ण हैं।

शुरू से बात करते हैं। उदयन शर्मा के पिता श्रीराम शर्मा हिंदी के चुनिंदा कथा लेखक थे। बचपन से ही उदयन शर्मा को लिखने का शौक जागा, जो उन्हें धर्मयुग में ले गया। प्रसिद्ध साहित्यकार और धर्मयुग के संपादक धर्मवीर भारती को उदयन शर्मा में बहुत संभावनाएं नजर आईं और उन्हें धर्मयुग में उप संपादक की जिम्मेदारी मिल गई। उन दिनों धर्मयुग में गणेश मंत्री, योगेंद्र कुमार लल्ला और सुरेंद्र प्रताप सिंह सहित कई वरिष्ठ पत्रकार काम करते थे। उदयन शर्मा ने अपनी प्रतिभा से धर्मवीर भारती को इतना प्रभावित किया कि उन्होंने उदयन शर्मा को राजनीति के साथ-साथ खेल और सिनेमा पर भी लिखने की आजादी दे दी।

धर्मवीर भारती का व्यक्तित्व इतना विराट था कि वे जब अपने केबिन से बाहर निकलते थे तो न केवल हिंदी में, बल्कि अंग्रेजी के सेक्शन में भी एक खामोशी फैल जाती थी। यह उनके डर से नहीं, बल्कि उनके सम्मान में होता था। उनके मुंह में सिगार होता था और बुद्धिजीवी की चाल होती थी, लेकिन उदयन शर्मा कुछ ऐसा करते थे कि धर्मवीर भारती मुस्कुरा देते थे। उदयन शर्मा गंभीरता से लिखते हुए भी धर्मयुग के माहौल को हमेशा हल्का और जीवंत रखते थे। आपातकाल में उदयन शर्मा दिल्ली आए और यहां उन्होंने उन सभी से संपर्क किया, जो जेल जाने से बच गए थे। वह अपने उन साथियों के यहां भी जाते थे, जो जेल चले गए थे तथा जिनके परिवार परेशानी मैं थे। उदयन शर्मा छात्र जीवन से ही समाजवादी विचारधारा के थे और डॉक्टर लोहिया का उनके ऊपर प्रभाव था।

उदयन शर्मा की शादी उत्तर प्रदेश में मंत्री रहे कांग्रेसी नेता जगन प्रसाद रावत की नातिन नीलम से हुई। मुंबई में उदयन शर्मा, एसपी सिंह और एमजे अकबर की तिकड़ी बन गई। इनकी दोस्ती इतनी गहरी थी कि तीनों एक साथ रहते थे। उदयन शर्मा मुंबई में थे और नीलम शर्मा आगरा में थीं। एसपी सिंह नीलम शर्मा के ऊपर एक प्रयोग कर रहे थे, जिससे नीलम शर्मा, उदयन शर्मा के साथ शादी करने के लिए हां कह दें। उदयन शर्मा धर्मयुग में भविष्यफल वाला कॉलम भी देखते थे। एसपी सिंह वहां उदयन शर्मा से कहते थे कि नीलम शर्मा के ग्रह या जन्म तारीख वाले भविष्यफल में लिखो कि किसी अति प्रिय का खत आएगा या इस हफ्ते किसी अपने का शुभ समाचार मिलेगा। मुझे एसपी सिंह ने बताया था कि हमने भविष्यफल का इस्तेमाल कर उदयन की और नीलम की शादी करा दी।

आपातकाल के बाद कोलकाता से आनंद बाजार पत्रिका ने संडे अंग्रेजी में और रविवार हिंदी में दो पत्रिकाएं निकालीं। एमजे अकबर दोनों पत्रिकाओं के पहले संपादक बने, लेकिन वे रविवार के लिए हिंदी का व्यक्ति चाहते थे। उनके कहने से एसपी सिंह और उदयन शर्मा भी मुंबई छोड़कर रविवार से जुड़ गए। उदयन शर्मा ने दिल्ली में रहकर रविवार के लिए रिपोर्ट करना चुना और वे रविवार के पहले विशेष संवाददाता बने तथा सुरेंद्र प्रताप सिंह कोलकाता में रहकर रविवार के संपादक बने।

यहीं से रविवार की अनूठी यात्रा शुरू हुई, जिसने हिंदी पत्रकारिता के इतिहास में अपना न मिटने वाला स्थान बना लिया। उदयन शर्मा ने फील्ड रिपोर्टिंग की शुरुआत की और वे सबसे पहले उस जगह पहुंचते थे, जहां घटना घटी थी। अब तक फील्ड रिपोर्टिंग घटना के विवरण तक सीमित रहती थी, लेकिन उदयन शर्मा ने इसका चेहरा और अंदाज बदल दिया। घटना क्या हुई के साथ घटना क्यों हुई, उसके पीछे के क्या कारण थे और कौन-कौन ताकतें इन घटनाओं को करा रही थीं तथा घटना घटने के क्या-क्या परिणाम होंगे, इन सबको मिलाकर एक संपूर्ण रिपोर्ट की परिपाटी शुरू की। वे कभी इस बात को नहीं छुपाते थे कि घटना कराने वाले सरकार के हिस्से हैं या कोई संगठन हैं या स्थानीय अधिकारी और ठेकेदार हैं, इसलिए उनका डर सत्ता प्रतिष्ठान को प्रभावित करने लगा।

उदयन शर्मा ने दंगों की रिपोर्टिंग की और दंगों को किन सांप्रदायिक ताकतों ने हवा दी, इस बारे में लिखने में कभी संकोच नहीं किया। सांप्रदायिक दंगों को रिपोर्ट करने में उदय शर्मा सीमा पार करने में भी संकोच नहीं करते थे। उन्हें विशुद्ध धर्मनिरपेक्ष पत्रकार कह सकते हैं। रिपोर्ट करने में न वे किसी जाति का पक्ष लेते थे और न किसी धर्म का, सिर्फ और सिर्फ सच्चाई बयान करते थे, लेकिन वह सच्चाई जिसके भी खिलाफ जाती थी, वह उन पर लांछन लगाने की भरपूर कोशिश करता था।

उन दिनों जनसत्ता के संपादक प्रभाष जोशी थे। प्रभाष जोशी की टीम में हर तरह की विचारधारा वाले लोग थे। वहां राम बहादुर राय और हरिशंकर व्यास भी थे और बनवारी तथा आलोक तोमर भी थे। एक बार हरिशंकर व्यास और उदयन शर्मा में अंताक्षरी हो गई। विषय बताना महत्वपूर्ण नहीं है। दोनों अपने-अपने विचारों के ध्वजवाहक थे। जनसत्ता के गपशप कॉलम को हरिशंकर व्यास मुख्य रूप से देखते थे तथा उदयन शर्मा रविवार के कुतुबनुमा में लिखते थे। हरिशंकर व्यास के गपशप कॉलम के एक हिस्से को पढ़कर उदयन शर्मा को लगा कि यह उनके ऊपर प्रहार है। उन्होंने कुतुबनुमा में बिना नाम लिए कुछ लिखा, जिसे हरिशंकर व्यास ने अपने ऊपर प्रहार समझ लिया। जब दो महीने बीत गए, तब एक दिन प्रभाष जी का मेरे पास फोन आया और उन्होंने मुझे कहा कि इसे बंद कराओ। दरअसल, यह अंताक्षरी ऐसे मुकाम पर पहुंच गई थी, जहां उदयन शर्मा ने सीधे प्रभाष जी को अपना विषय बना लिया था। उन्होंने संभवत हरिशंकर व्यास को रोका होगा। मैंने उदयन जी से कहा कि प्रभाष जी का कहना है उदयन इसे बंद करें। उदयन जी ने मुझे कहा कि मैं इस हफ्ते नहीं लिखूंगा, लेकिन अगर जनसत्ता में कुछ छपा तो फिर मैं आजाद हूं। उदयन जी की रिपोर्टिंग को लेकर अक्सर पाञ्चजन्य में उनका नाम लेकर टिप्पणी होती रहती थी। वे इन टिप्पणियों का आनंद लेते थे और कहते थे कि जब तक मेरे ऊपर यह टिप्पणियां होती रहेंगी, तब तक मैं मानूंगा कि मैं सही लाइन पर रिपोर्टिंग कर रहा हूं।

उदयन शर्मा में खबर पहचानने की अद्भुत क्षमता थी। उनका संपर्क चौधरी चरण सिंह और  राज नारायण से बहुत अंतरंग था। जॉर्ज फर्नांडिस और मधु लिमए उनके लिखे हुए को पसंद करते थे और खुद उदयन शर्मा जॉर्ज फर्नांडिस और मधु लिमए के यहां अक्सर बैठते थे। कांग्रेस के सीताराम केसरी, तारिक अनवर, गुलाम नबी आजाद उनके मुख्य सूचना स्रोत थे। अकबर अहमद डंपी और मेनका गांधी उन्हें अपना नजदीकी मित्र मानते थे। शरद यादव और केसी त्यागी उनके रोजाना मिलने वालों में थे। मुलायम सिंह यादव और अमर सिंह से उनका अंतरंग रिश्ता था। उदयन शर्मा ने अपने इन संपर्कों से बातचीत दौरान खबरों के ऐसे-ऐसे विषय निकाले, जिनकी रिपोर्टिंग ने उन्हें काफी मशहूर कर दिया।

उदयन शर्मा का मानना था कि एक पत्रकार के काम करने का समय शाम 6:00 बजे से रात 12:00 बजे तक का होता है, इसलिए जो इस समय को बेकार करता है, वह अच्छा पत्रकार हो ही नहीं सकता। वे प्रेस क्लब जाना बहुत पसंद नहीं करते थे। उनका समय खबरों की तलाश में ज्यादा बीतता था। फारुख अब्दुल्ला उनके मित्र थे और उन्होंने कश्मीर को लेकर बहुत रिपोर्ट लिखी थीं। उन्होंने उस समय डिफेंस घोटाले पर भी लिखा था। उदयन शर्मा का दायरा जितना लेखन में विशाल था, उतना ही उनकी व्यक्तिगत मित्रता का भी दायरा बहुत विशाल था। उनके जितने भी मित्र थे, सब निस्वार्थ और हिम्मती थे। आगरा के विजय बाबू लखनऊ के रमेश दीक्षित और पटना के सुधीर मिश्र जैसे कुछ उदाहरण मुझे याद आ रहे हैं।

उन्होंने नए लोगों को पत्रकारिता में महत्वपूर्ण अवसर दिए। कुर्बान अली, राजेश रपरिया और अलका सक्सेना इसके कुछ उदाहरण हैं। जब सुरेंद्र प्रताप सिंह मुंबई नवभारत टाइम्स के संपादक बनकर चले गए, तब उदयन शर्मा रविवार के संपादक बने। रविवार का संपादक बनने के बाद उनकी दोस्ती तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी से हुई। उन्होंने राजीव गांधी को यथासंभव व्यक्तिगत सलाह भी दी थी तथा लेखन के द्वारा भी उनका समर्थन किया था। राजीव शुक्ला की जिंदगी में उदयन शर्मा का बहुत बड़ा रोल रहा। उन्होंने राजीव शुक्ला को दिल्ली में विशेष संवाददाता बनाया तथा उनकी राजीव गांधी से दोस्ती भी कराई। राजीव शुक्ला की शादी अनुराधा प्रसाद से हो, इसके वह समर्थक भी थे और सहायक भी थे।

उदयन शर्मा बाद में धीरूभाई अंबानी के अखबार संडे ऑब्जर्वर के संपादक बने और आखिरी दिनों में वे सुब्रत राय के अखबार राष्ट्रीय सहारा से जुड़े। उदयन शर्मा और एसपी सिंह की दोस्ती में कुछ बातें बहुत कमाल की थीं। उदयन शर्मा के मन में क्या है, यह सुरेंद्र प्रताप सिंह समझ जाते थे और सुरेंद्र प्रताप सिंह क्या चाहते हैं, इसे उदयन शर्मा उनके बिना कहे ही अमल में ले आते थे। सुरेंद्र प्रताप सिंह ब्रेन स्ट्रोक के शिकार हुए और लगभग 15 दिन अपोलो अस्पताल में भर्ती रहे, दूसरी ओर उदयन शर्मा भी ब्रेन स्ट्रोक के एक अजीब तरह के प्रकार का शिकार हुए और वे पंडित पंत अस्पताल में भर्ती रहे। इसे सिर्फ संयोग कह सकते हैं.

जिस तरह प्रसिद्ध कथा लेखक श्रीराम शर्मा के पुत्र उदयन शर्मा बड़े पत्रकार बने उसी तरह उनके बड़े बेटे कार्तिकेय शर्मा आज हिंदी और अंग्रेजी के बड़े पत्रकार हैं तथा उन्होंने प्रमुख रूप से अंग्रेजी पत्रकारिता को अपनाया और टेलिविजन के जाने-माने चेहरे बने। उनके छोटे बेटे कनिष्क शर्मा आधुनिक युद्ध कला के उद्गम स्थल के रूप में प्रसिद्ध चीनी बौद्ध मठ शाओलिन टेंपल से निकलने वाले पहले भारतीय बने। वे इन दिनों सामान्य छात्रों, सिनेमा में काम करने वाले बड़े कलाकारों, जिनमें जॉन अब्राहम, शाहरुख खान और प्रियंका चोपड़ा शामिल हैं, उन्हें एक्शन सिखाने के साथ भारतीय सुरक्षा सेनाओं को बिना हथियार दुश्मन को कैसे परास्त किया जा सकता है, इसकी ट्रेनिंग दे रहे हैं।

आज की पत्रकारिता के बहुत से बड़े नाम, जिनमें विनोद अग्निहोत्री, राम कृपालु सिंह, कमर वहीद नकवी, राजेश बादल तथा स्वर्गीय आलोक तोमर आदि के विकास में उदयन शर्मा का उल्लेखनीय योगदान रहा। जब मुझे लोकनायक जयप्रकाश ने कहां कि तुम पत्रकारिता करो तो मैंने सुरेंद्र प्रताप सिंह को फोन किया। उन्होंने मुझे कहा कि मैं दिल्ली जाकर उदयन शर्मा से अवश्य मिल लूं। मैं उदयन जी से गांधी पीस फाउंडेशन के लॉन मैं मिला। वह एक घंटे की मुलाकात उनकी आखिरी सांस तक जिंदा रही और आज भी जिंदा है। मेरी और उनकी रिपोर्ट को लेकर हमेशा प्रतियोगिता और छीनाझपटी चलती रही, जिसमें हमेशा उनकी जीत हुई।

वे बड़े पत्रकार थे और हमेशा बड़े पत्रकार बने रहेंगे। रिपोर्ट पर झपट पड़ने और उसकी सच्चाई किसी भी तरह सामने लाने का उनका पागलपन हिंदी के पत्रकारों के लिए हमेशा उदाहरण बना रहेगा। शुभ व्रत भट्टाचार्य जो बाद में संडे के संपादक बने और उसके बाद हिन्दुस्तान टाइम्स के संपादक बने, उनके सबसे गहरे मित्रों में रहे। वह हमारे बीच में हैं, उदय शर्मा को जानना हो तो शुभ व्रत भट्टाचार्य से बात करनी चाहिए। राज बब्बर जब मुंबई में संघर्ष कर रहे थे, तब उदयन शर्मा ने उनके ऊपर बड़ी कवरस्टोरी लिखी, जिसने राज बब्बर को हिंदी के क्षेत्र में बहुत सलीके से परिचित कराया। राज बब्बर आगरा के थे और समाजवादी विचारधारा के थे। उदय शर्मा चाहते थे कि राज बब्बर राजनीति में आगे आएं, इसलिए उन्होंने अपनी तरफ से राज बब्बर की भरपूर मदद की।

उनके मन में भारतीय राजनीति में सार्थक हस्तक्षेप करने का विचार हमेशा घूमता था, वे आगरा से लोकसभा का चुनाव भी लड़े। एक बार वह भिंड से भी चुनाव लड़े। भले ही वे जीत नहीं पाए, लेकिन आगरा और भिंड के लोगों ने उन्हें उतना ही सम्मान दिया जो सम्मान एक सांसद को मिलना चाहिए। उदयन शर्मा हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन जब कभी हिंदी पत्रकारिता का इतिहास लिखा जाएगा, तो उनका नाम पत्रकारिता के शिखर पुरुष के रूप में अवश्य शामिल होगा।

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मिस्टर मीडिया: दंड तो यही बनता था, लेकिन क्या ये 'एनकाउंटर' है?

जब न्याय विलंब से मिलता है या चांदी के सिक्कों में खरीदा-बेचा जाता है तो समाज सड़कों पर अपने तरीके से मुजरिम को सजा देता है

राजेश बादल by राजेश बादल
Published - Friday, 06 December, 2019
Last Modified:
Friday, 06 December, 2019
Rajesh Badal

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।

हैदराबाद की डॉक्टर बेटी के साथ जो कुछ हुआ, वह हमें शर्मसार करता है। हमारे अनपढ़ पूर्वजों के भी अपने कुछ संस्कार थे, मगर जैसे-जैसे हम सभ्य होते जा रहे हैं, वैसे-वैसे कुछ अधिक क्रूर,जंगली,वहशी और उन्मादी नहीं हो रहे हैं? संयुक्त परिवार के बिखराव का दर्द लिए हम रेडियो और टीवी पर विज्ञापनों में अपनी बेटियों को समझाइश देते हैं  कि घर में करीबी पुरुष संबंधियों से बचो। उनके गुड टच और बैड टच में फर्क करना सीखो। यह कैसा समाज हम बना रहे हैं। हैदराबाद की नृशंस घटना इसका उदाहरण है।

अव्वल तो यह घटना ही हमारे माथे पर कलंक है। पुलिस ने अपराधियों को टपका दिया। पीड़ित परिवार और हम सबने कलेजे में ठंडक महसूस की। काश! हमारी अदालतें इतनी जल्दी न्याय करने लग जाएं। जब न्याय विलंब से मिलता है या चांदी के सिक्कों में खरीदा या बेचा जाता है तो समाज सड़कों पर अपने तरीके से मुजरिम को सजा देता है ।

एक मीडियाकर्मी होने के नाते जहां अपराधियों के साथ इस सुलूक पर संतोष हो रहा है तो दूसरी तरफ कुछ गंभीर सवाल भी खड़े होते हैं। मीडिया में हम इसे मुठभेड़ कह रहे हैं। तकनीकी तौर पर यह मुठभेड़ कैसे है? भले ही वे मुजरिम थे, लेकिन दोष सिद्ध होने तक वे आरोपित थे। तो आरोपितों को रात तीन बजे चोरों की तरह पुलिस वारदात स्थल पर क्यों ले गई?

जाहिर है कि वे पुलिस हिरासत में थे तो हथकड़ी लगी थी। नाट्य रूपांतरण के लिए हथकड़ी खोली गई होंगी। यानी वे निहत्थे थे। मुठभेड़ तो तब होती है, जब दोनों ओर से गोलीबारी हो। अपराधी भी पुलिस पर फायरिंग कर रहे हों। निहत्थे आरोपित भाग भी रहे थे तो उन पर गोलीचालन मुठभेड़ नहीं कहा जाता। दूसरी बात, कानूनन भागते मुजरिमों पर सबसे पहले गोली पैरों पर मारी जाती है, ताकि वे भाग न सकें और पकड़ लिए जाएं। उनकी जान लेने का इरादा या अधिकार पुलिस को नहीं होता। यह कैसा अचूक निशाना था कि चारों मारे गए। कोई गंभीर रूप से घायल भी नहीं हुआ।

स्पष्ट है कि पुलिस, प्रशासन और सरकार पर इस शर्मनाक घटना का इतना सामाजिक दबाव था कि इस मामले में समूची पटकथा कानून के नजरिये से लचर ढंग से लिखी गई। जनभावना के मुताबिक काम करना एक बात है और कानून हाथ में लेना दूसरी बात। क्या अदालतों और भारतीय दण्ड संहिता का इस मामले में मखौल नहीं उड़ाया गया? अपनी भावनाएं परदे पर या अखबार के पन्नों पर प्रकट करने से पहले हमें वैधानिक स्वरूप का भी अध्ययन करना चाहिए मिस्टर मीडिया!

(यह लेखक के निजी विचार हैं।)

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वरिष्ठ पत्रकार वेद प्रताप वैदिक की नजर से: चीनी मुसलमानों का बुरा हाल

यहां के मुसलमानों पर हो रहे अत्याचारों पर भारत, पाकिस्तान और रूस की भी बोलती बंद है, सिर्फ अमेरिका बोलता रहता है

डॉ. वेद प्रताप वैदिक by डॉ. वेद प्रताप वैदिक
Published - Friday, 29 November, 2019
Last Modified:
Friday, 29 November, 2019
DR Ved Pratap

डॉ. वेदप्रताप वैदिक, वरिष्ठ पत्रकार।।

चीन के सिंक्यांग (शिन्च्यांग) नामक प्रांत में जो लोग रहते हैं, उनका नाम उइगर है। ये लोग मुसलमान हैं। वहां चीन की हान जाति के लोग पहले बहुत कम थे, लेकिन अब लगभग ढाई करोड़ की आबादी में वे डेढ़ करोड़ हैं। अपने ही प्रांत में उइगर मुसलमान लगभग एक करोड़ ही रह गए हैं। ये मुसलमान न तो वहां खुलेआम नमाज पढ़ सकते हैं, न मस्जिद में भीड़ लगा सकते हैं, न रमजान में रोजा रख सकते हैं, न सलवार-कमीज और तुर्की टोपी पहन सकते हैं और न ही दाढ़ी रख सकते हैं। बुर्के पर रोक है। देखने में ये चीनियों जैसे भी नहीं लगते हैं। ये लोग तुर्की और मध्य एशिया के मुसलमानों की तरह दिखते हैं। इनकी भाषा भी चीनी नहीं है। वह तुर्की और फारसी जैसी है। सिंक्यांग में कई लोग मुझसे फारसी में बात किया करते थे। मेरी चीनी अनुवादिका भौचक रह जाती थी।

मैं जब करीब 25 साल पहले सिंक्यांग के कुछ शहरों और गांवों में गया तो मुझे देखने और मिलने के लिए उइगरों की भीड़ लग जाती थी, क्योंकि चीनी सरकार विदेशियों को सिंक्यांग नहीं जाने देती थी। आजकल तो विदेशियों के लिए सख्त प्रतिबंध लगा हुआ है। यों भी सौ-सवा सौ साल पहले तक सिंक्यांग चीन का हिस्सा नहीं था। अब भी चीन अपने इस सबसे बड़े प्रांत को स्वायत्त-क्षेत्र कहता है। इस स्वायत्त-क्षेत्र की हालत किसी गुलाम देश भी बदतर है। यह इलाका चीन के एकदम पश्चिम में है। इसकी सीमाएं आठ देशों को छूती हैं, जिनमें भारत, पाकिस्तान और रूस भी हैं। लेकिन इन तीनों देशों की भी बोलती बंद है। ये उइगरों पर हो रहे अत्याचारों पर आंख मींचे रहते हैं। सिर्फ अमेरिका बोलता रहता है।

इस समय लगभग दस लाख उइगर ‘शिक्षा-शिविरों’ में बंद हैं। उन्हें सभ्य बनाया जा रहा है। उन्हें मंडारिन भाषा सिखाई जा रही है। उन्हें मार-मारकर अपने रीति-रिवाजों से छुटकारा पाना सिखाया जा रहा है। उन्हें शारीरिक काम-धंधों का प्रशिक्षण दिया जा रहा है, चाहे वे डॉक्टर, इंजीनियर या प्रोफेसर ही क्यों न हों? चीनी सरकार का कहना है कि वे अपनी उइगर जनता को देशभक्ति का पाठ पढ़ा रहे हैं। उन्हें सभ्य और उन्नत नागरिक बना रहे हैं। उन्हें आतंकवाद से दूर रहना सिखा रहे हैं। चीनी सरकार ऐसा सब कुछ पांच-दस साल में इसलिए करने लगी है कि 2009 में एक दंगे के दौरान उइगरों ने 200 चीनियों की हत्या कर दी थी। 2014 में जब राष्ट्रपति शी चिन फिंग उरुमची गए थे, उइगरों ने एक रेलवे स्टेशन पर बम लगा दिया था।

इस तरह की दर्जनों छोटी-मोटी घटनाएं अक्सर होती रहती हैं। मुझे 15-20 साल पहले एक बौद्धिक संवाद के दौरान पेइचिंग और शंघाई के कई चीनी नेताओं ने उइगर उग्रवादियों के बारे में काफी विस्तार से सावधान किया था। उन्हें शंका थी कि उनके चीनी उइगर मुसलमान, अफगान, तालिबान और पाकिस्तान के मुजाहिद्दीन से भी जुड़े हुए हैं। जहां तक भारत, पाक और अफगानिस्तान का सवाल है, इन देशों के अल्पसंख्यकों का हाल चीनी अल्पसंख्यकों के मुकाबले बहुत ज्यादा अच्छा है।

(यह लेखक के निजी विचार हैं।)

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‘विश्वविद्यालयों में एक्टिविज्म को लेकर हमें समझनी होगी ये अहम बात’

प्रधानमंत्री नरेंद्र भाई मोदी का यह मंत्र देश के राजनेताओं के साथ-साथ हर सियासतदान को ध्यान में रखना होगा। यही मंत्र देश की उन्नति का पहिया होगा

डॉ. सिराज कुरैशी by डॉ. सिराज कुरैशी
Published - Wednesday, 27 November, 2019
Last Modified:
Wednesday, 27 November, 2019
Dr. Siraj Qureshi

डॉ. सिराज कुरैशी, वरिष्ठ पत्रकार।।

आगरा के अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के राष्ट्रीय अधिवेशन में आए उत्तर प्रदेश के उप मुख्यमंत्री डॉ. दिनेश शर्मा ने बीएचयू में होने वाले आंदोलन पर कटाक्ष करते हुए स्पष्ट शब्दों में कहा कि भाषा को जाति-वर्ग से दूर रखते हुये समझा जाये कि विश्वविद्यालय-कॉलेज और स्कूल ही राष्ट्रीय निर्माण की प्रयोगशाला होते हैं। इन संस्थानों में भाषा और जाति-वर्ग को लेकर जो विद्यार्थी आंदोलन करते हैं, उन्हें यह समझना चाहिये।

इसी तरह की बात एक सीनियर सिटीजन ने छात्रों से कही। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय का तात्पर्य केवल एक निश्चित भूभाग में स्थित किसी भौतिक अवसंरचना से नहीं होता और न ही हम इसका मूल्यांकन वहां मिलने वाली आर्थिक सुविधाओं से कर सकते हैं, जैसा कि वर्तमान में दिखाई देता है। यह सौ प्रतिशत सच है कि जब किसी विश्वविद्यालय में सस्ती शिक्षा की वकालत की जाती है तो उसका अर्थ किसी चैरिटी को संचालित करना नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण की परियोजना के सबसे महत्वपूर्ण उपकरण को धार देने के समान कहा जा सकता है। अगर बीएचयू या एएमयू की गतिविधियों पर विशेष गौर किया जाये तो यह इस तरह के शिक्षा संस्थान कहे जा सकते हैं, जहां पढ़ाई कम तथा ‘एक्टिविज्म’ पर अधिक ध्यान देते हैं। हमें ऐसे विश्वविद्यालयों की गतिविधियों को देखने के बाद समझना होगा कि जिसको हम ‘एक्टिविज्म’ कहकर उपहास उड़ाते हैं, वह दरअसल शिक्षा का ही रूप होता है, जो अपनी परिस्थितियों के विरुद्ध संघर्ष के रूप में व्यक्त होता है।

ऐसी परिस्थिति से अनुमान लगाया जाता है कि इस तरह की ‘एक्टिविज्म’ परिस्थितियां सुधार की वाहक न होकर कहीं पूर्व निर्धारित राजनीतिक विचारों की पुनरावृत्ति बनकर न रह जाएं। दिल्ली स्थित जेएनयू की गतिविधियों को उदाहरण के रूप में कहा जा सकता है। यह कहने में कतई संकोच नहीं है कि बीएचयू, एएमयू, जेएनयू आदि विश्वविद्यालयों को जो सुविधायें मिल रही हैं और उनके बदले मिलने वाले अनुदान का संतुलन बिगड़ा हुआ है। ऐसे विश्वविद्यालयों के उद्देश्यों का एक बार अवश्य स्मरण करना चाहिये।

एक समाजशास्त्री ने जब मुझसे कहा कि एक विश्वविद्यालय, चाहे वह कितना भी उपयोगितावादी क्यों न हो, यदि वह अपने आदर्श, मौलिक सच, सौंदर्य और मानव मस्तिष्क को सुसंस्कृत करने के लिये अपनी खोज को छोड़ देता है, तो उसे विश्वविद्यालय ही नहीं कहा जा सकता। अगर इसी को सरल रूप में कहें तो रोजगार उत्पन्न करना, विश्वविद्यालय नहीं रह जाता, जबकि व्यावहारिकता का निषेध नहीं बल्कि इसे परिष्कार के उदात्त स्तर पर ले जाना ही एक विश्वविद्यालय की विशेषता होनी चाहिये। इसी को कह सकते हैं कि हम विश्वविद्यालय कैम्पस को सिर्फ रोजगार की आस से ही नहीं देखें, बल्कि उसके सभ्यतागत विकास की शक्ति को भी चिन्हित करें।

यह भी पूरी तरह सच है कि हम किसी भी तर्क से एक गरीब देश में महंगी उच्च शिक्षा का पक्ष-पोषण नहीं कर सकते, वर्तमान शिक्षा ही वह सीढ़ी है, जिसके सहारे आसानी से ऊपर चढ़ा जा सकता है, इसलिये राज्यों की भी जिम्मेदारी है कि देश के गरीब एवं वंचित नागरिकों की पहुंच इस पीढ़ी तक सुनिश्चित कराएं। उच्च शिक्षा केवल मुट्ठी भर लोगों की जागीर नहीं है, बल्कि समावेशी विकास का एक टूल है, इसका स्वरूप बने रहना ही बेहतर होगा।

प्रधानमंत्री नरेंद्र भाई मोदी का यह मंत्र देश के राजनेताओं के साथ-साथ हर सियासतदान को ध्यान में रखना होगा कि ‘सबका साथ, सबका विश्वास और सबका विकास।‘  यही मंत्र देश की उन्नति का पहिया होगा। अगर व्यक्ति ने उच्च शिक्षा ग्रहण कर ली और अच्छी नौकरी भी पा ली, परन्तु मोदीजी का मंत्र दिमाग में नहीं रखा तो मेरा विश्वास है कि न ही वह व्यक्ति उन्नति नहीं कर सकता और न ही देश-प्रदेश एवं अपने जिले को आगे बढ़ा सकता है। यही वजह है कि स्वयं मेादीजी इस मंत्र को ही लेकर देश को विश्व पटल की प्रथम पंक्ति में ला रहे हैं।

(यह लेखक के निजी विचार हैं।)

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कार्टूनिस्ट सुधीर धर: दुनिया को ‘बदसूरत’ बनाने वाला इंसान

उनके निधन की इतनी बड़ी खबर को शायद हमारे इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने टीआरपी लायक नहीं समझा

समाचार4मीडिया ब्यूरो by समाचार4मीडिया ब्यूरो
Published - Wednesday, 27 November, 2019
Last Modified:
Wednesday, 27 November, 2019
Sudhir Dhar Irfan Khan

इरफान खान, मशहूर कार्टूनिस्ट।।

कार्टून जगत के सुपरस्टार सुधीर धर का दुनिया से विदा होना ऐसे समय हुआ, जब कार्टून जगत को मजबूती और संबल की सख्त जरूरत है। उनके निधन की इतनी बड़ी खबर को शायद हमारे इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने टीआरपी लायक नहीं समझा। सुधीर धर साहब से मेरी पहली मुलाकात 1989 में हुई थी। उन दिनों मेरी कार्टून प्रदर्शनी श्रीधरणी गैलरी में लगी थी, मुझे पता चला कि ‘हिन्दुस्तान टाइम्स’ के प्रख्यात कार्टूनिस्ट सुधीर धर रोजाना लंच करने त्रिवेणी में आते हैं। यह सुनकर मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। अगले ही दिन मैंने उन्हें त्रिवेणी के गेट पर रोका। अपना परिचय दिया।

मैंने उनसे अपनी कार्टून प्रदर्शनी देखने का आग्रह किया, वह फौरन तैयार हो गए। सभी कार्टून देखकर मुझ कस्बाई कार्टूनिस्ट को प्रोत्साहन दिया। यह मेरे लिए तब बहुत बड़ी बात थी। बड़े-बड़ो का 'कार्टून' बनाने वाले वह देखने में बेहद खूबसूरत, ऊंची कद-काठी के कश्मीरी ब्राह्मण थे। मजाक-मजाक में कई बार हम दोस्त कह ही देते हैं कि खूबसूरत चेहरों को 'बदसूरत' बना देते हैं कार्टूनिस्ट। वे अंग्रेजी फर्राटे से बोलते थे। शायद अपने स्टारडम की वजह से ही उन्हें एक बार फेमिना मिस इंडिया की जूरी का मेंबर बनाया गया था, ऐसा सुना है। 

अपने साफ-सुथरे और फनी सोशल कार्टूनों से उन्होंने घर-घर में अपनी जगह बना ली थी। ‘हिन्दुस्तान टाइम्स’ उस समय दिल्ली का सबसे ज्यादा बिकने वाला अंग्रेजी अखबार था, वहां 20 साल उनका एकछत्र राज कायम रहा। उनकी कलम कई बार कार्टून के जरिए ऐसा तीखा प्रहार करती थी कि बड़े बड़े खूबसूरत चेहरे 'बदसूरत' नजर आने लगते थे भारत में जब भी कभी कार्टूनिस्टों का जिक्र होता था, तो लोग छूटते ही कहते थे कि ‘एक तो लक्ष्मण हैं और एक सुधीर धर  कार्टूनिस्ट हैं।’

सुधीर धर और लक्ष्मण में वही फर्क है, जो लता मंगेशकर और आशा भोसले में है। अगर आशा भी लता की तरह गाना गातीं तो शायद उन्हें वो मुकाम नहीं मिलता, जिसकी वो हकदार थीं। इसलिए उन्होंने गाने की अपनी एक अलग शैली ईजाद की। उसी तरह चूंकि राजनीतिक कार्टूनों में उस वक्त लक्ष्मण का बोलबाला था, उन्होंने अपने कार्टूनों का माध्यम सोशल खबरें चुना। यकीनन इसमें उनकी महारत थी। चाहे वह दिल्ली की बसों में अव्यवस्था हो, सड़कों के गड्ढे, बिजली-पानी की किल्लत हो अथवा अन्य समस्याएं।

ऐसे तमाम मुद्दे थे, जिनसे लोग आज भी रोजमर्रा तौर पर दो-चार होते हैं। वह रोजाना इन मुद्दों पर कार्टून बनाते थे। एक कार्टून जो मुझे हमेशा याद रहता है, एक ऑफिस में नेताजी के सामने कई अफसर खड़े हैं। नेताजी अपने सहायक से पूछते हैं, ‘क्या तुम्हें लगता है कि यह सब ‘फ्री एंड फेयर इलेक्शन’ करवा पाएंगे?’ सहायक बोला-जी, बिलकुल। नेताजी बोले, तो इन सबका तबादला कर दो।

मुझे एक बार उनका साक्षात्कार करने का मौका मिला, जिसमें उन्होंने बताया, ‘मैं मर्लिन मुनरो का बहुत बड़ा फैन हूं और शुरुआत में रेडियो में था। मैं अपनी आवाज के जरिये उन्हीं की तरह मशहूर होना चाहता था।‘

वह राजनैतिक डिस्प्ले (बड़े बॉक्स नुमा) कार्टून कम ही बनाते थे। उनके कार्टून के ऊपर कोने में खबर लिखना पाठक को कार्टून से जुड़ने में आसानी देता था। बाद में बहुत से कार्टूनिस्टों ने इस शैली को अपनाया।  उनकी स्केचिंग ऐसी थी कि कोई भी नया कार्टूनिस्ट उसे देखकर आसानी से कार्टून बनाना सीख सकता है। हाल ही में कई नामी कार्टूनिस्टों अबू, रंगा, लक्ष्मण, राजिंधरपुरी, सुधीर तैलंग के बाद अब सुधीर धर के भी जाने से कार्टून जगत में कार्टूनिस्टों की कमी का अहसास और गहरा हो गया है, जो कभी नहीं भर सकता।

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मिस्टर मीडिया: इसलिए उचित और जायज है मीडिया ट्रायल

सिर्फ अपने गाल बजाने के लिए अपने आप को हम चौथा स्तंभ कहते हैं, अन्यथा कोई भी संवैधानिक प्रावधान हमें चौथे खंभे के रूप में संरक्षण नहीं देता

राजेश बादल by राजेश बादल
Published - Wednesday, 27 November, 2019
Last Modified:
Wednesday, 27 November, 2019
Mister Media

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।

महाराष्ट्र का सियासी प्रहसन अभी जारी है। जितनी होड़ पक्ष और प्रतिपक्षी गठबंधनों में है, उससे अधिक टेलिविजन चैनलों में इस सप्ताह दिखाई दी। कुर्सी के लिए घमासान का एक केंद्र प्रदेश की राजधानी मुंबई, दूसरा देश की राजधानी दिल्ली, तीसरा भारत का सर्वोच्च न्याय मंदिर सुप्रीम कोर्ट और चौथा टीवी का परदा रहा। जितने तर्क, कुतर्क, वितर्क, नियम,कायदे,कानून सुप्रीम कोर्ट में पेश किए जा रहे थे, चैनलों में उससे ज्यादा ही परोसे जा रहे थे। यहां तक कि अनेक हलकों में कहा गया कि इतना मीडिया ट्रायल भी ठीक नहीं है। मीडिया अदालत नहीं है। इसलिए छोटे परदे पर हो रहे शास्त्रार्थ सर्वोच्च अदालत का ध्यान भटका सकते हैं।

देखा जाए तो एक नजरिये से बात ठीक लगती है। सिर्फ अपने गाल बजाने के लिए अपने आप को हम चौथा स्तंभ कहते हैं, अन्यथा कोई भी संवैधानिक प्रावधान हमें चौथे खंभे के रूप में संरक्षण नहीं देता। दूसरी ओर अगर कार्यपालिका और विधायिका की गाड़ी पटरी से उतर गई हो तो क्या मीडिया को हाथ पर हाथ धरे बैठे रहना चाहिए? हमारे राजनेता संवैधानिक और लोकतांत्रिक मर्यादाएं भूलकर सड़कों पर गैरजिम्मेदारी का प्रदर्शन करें तो माफ कीजिए, मीडिया को एक बार नहीं, सौ बार मीडिया ट्रायल का अधिकार है। आज की पत्रकारिता के विकृत चेहरे के बावजूद समाज का बड़ा वर्ग इस पेशे के प्रति अच्छी धारणा रखता है। इसलिए कम से कम मैं तो मीडिया ट्रायल को उचित और जायज मानता हूं। इससे सत्ता प्रतिष्ठान अथवा प्रतिपक्ष खफा हो तो सौ बार हो जाए। अपनी बला से। हम तो मीडिया ट्रायल करते रहेंगे। राजनेताओं को ध्यान रखना चाहिए कि वर्तमान में वे नायक नहीं खलनायक के तौर पर देखे जाने लगे हैं।

 लेकिन, मैं हमारे उन साथियों, पत्रकारों और एंकरों का कतई समर्थन नहीं करूंगा, जो बीते दिनों महाराष्ट्र के घटनाक्रम को लेकर अपने-अपने दिल की जबान से बोल रहे थे। वे एंकर कम पार्टी प्रवक्ता अधिक लग रहे थे। उनके इस विधवा विलाप का क्या अर्थ निकला? उनके कुतर्क से न किसी को बहुमत मिला और न किसी का छीना गया। फिर हमारे पत्रकार साथी अपनी दुर्गति अपने ही हाथों क्यों कर बैठते हैं। उन्हें समझना होगा कि जब वे अपने गढ़े गए तर्कों के साथ परदे पर बहस करते हैं तो माफ़ कीजिए,पत्रकार या एंकर कम, पार्टी के अभिभाषक अधिक लगते हैं। उन्हें यह भ्रम कतई नहीं होना चाहिए कि वे बैलगाड़ी के नीचे चल रहे हैं, इसलिए गाड़ी भी वही खींच रहे हैं। पत्रकारों के किसी दल के पक्ष या विपक्ष में बोलने से राजनीति की नाव उस दिशा में नहीं मुड़ जाती। यह भी सच है कि बहस का चरित्र निरपेक्ष और तटस्थ रखने के लिए उन्हें किसी डॉक्टर की पर्ची नहीं चाहिए। समझदार को इतना इशारा ही काफी है।

एक और अजीब-बेतुकी पत्रकारिता दो-चार दिनों में दिखी। दो-तीन समाचार चैनल ऐसे भी थे, जो महाराष्ट्र के इस शिखर घटनाक्रम के दिनों में भी उसके कवरेज से दर्शक को वंचित कर रहे थे। जब एक-एक मिनट दर्शक सांस साधे महाराष्ट्र के सियासी ड्रामे को देख रहा था, तो ये चैनल चीन की चाल, पाक की मिसाइल या ऐसा ही कोई रिकॉर्ड किया हुआ मनोरंजन का कार्यक्रम दिखा रहे थे। ऐसा एकाध घंटे नहीं, पूरे तीन-चार दिन करते रहे। मैं आगाह करना चाहता हूं कि प्रतिष्ठा कमाने में बरसों लग जाते हैं और एक भी गलत फैसला धड़ाम से नीचे पटक देता है। दूसरी बात यह कि न्यूज चैनल ऑन एयर होने के बाद किसी की निजी संपत्ति नहीं रह जाता। वह दर्शक का हो जाता है। ठीक वैसे ही, जैसे कोई अखबार छपने के बाद पाठकों का हो जाता है।

गनीमत है कि अच्छी सड़क, बिजली या पानी मांगने के लिए जिस तरह लोग सड़कों पर आ जाते हैं, उस तरह अखबारों और चैनलों से अच्छी खबरें मांगने के लिए सड़कों पर नहीं आते। जिस दिन उन्हें लगा कि पत्रकारिता के जरिये परोसी जा रही खबरें किसी सड़ी ब्रेड की तरह बदबूदार और पक्षपाती हैं, तो वे भी आपके खिलाफ आंदोलन पर उतर आएंगे। अपने उपभोक्ता अधिकार के लिए भी सड़कों पर लड़ने का उनका हक अभी जिंदा है मिस्टर मीडिया।

(यह लेखक के निजी विचार हैं।)

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मिस्टर मीडिया: महाराष्ट्र में क्यों चूके मीडिया के महारथी?

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‘राष्ट्रीय सहारा' की परीक्षा में सुप्रिय का असफल होना, उस युग की एक दस्तक थी’

सुप्रिय की उपलब्धियां जानने के लिए कोई सर्च इंजन तलाशने की जरूरत नहीं, बल्कि फिलवक्त ‘आजतक’ जो भी है, उसमें सुप्रिय की निष्ठा, ईमानदारी और कर्मठता है

समाचार4मीडिया ब्यूरो by समाचार4मीडिया ब्यूरो
Published - Monday, 25 November, 2019
Last Modified:
Monday, 25 November, 2019
Supriya-Prasad-Aajtak

संस्थान के संगियों में एक और नाम है सुप्रिय प्रसाद। जिंदगी में ऐसे बहुत कम मौके आते हैं, जब मेरी भाषा और शैली, मेरी सोच, संवेदना और सृजनशीलता के सामने जवाब देने लगती है। आज अपने संस्थान के इस संगी सुप्रिय प्रसाद के बारे में लिखते हुए सालों बाद मेरी शब्द सम्पदा और शैली खुद को कमजोर महसूस कर रही है। मतलब सुप्रिय की उपलब्धि मेरी सोच, शैली और शब्द से बहुत आगे है।

आज हम सोचने को जरूर मजबूर हैं कि कार्यशैली के किस गुर ने सुप्रिय को इतना सफल और नामवर बनाया। एक प्रसंग याद करता हूं कि 1995 में दैनिक 'राष्ट्रीय सहारा' के उप संपादक (प्रशिक्षु) पद की जांच परीक्षा में सुप्रिय का असफल होना हम सहपाठियों के लिए खबर थी। मगर वह उसकी असफलता नहीं थी और न ही योग्यता, बल्कि जो भी हुआ, वह उस युग की एक दस्तक थी, जो युग सुप्रिय के नाम लिखा जाना था।

यह विचित्र संयोग है कि झारखण्ड से आईं दो हस्तियां लोकमानस में अपना विशिष्ट स्थान बनाकर देश-दुनिया और समाज को अपनी सेवाएं दे रहे हैं। पहला-रांची के महेंद्र सिंह धोनी और दूसरा-दुमका शहर के सुप्रिय प्रसाद। आईआईएमसी से पत्रकारिता करने के बाद सुप्रिय प्रसाद ने कमर वहीद नकवी के अधीन एक ट्रेनी के तौर पर ‘आजतक’ जॉइन किया था। तब ‘आजतक’ एसपी सिंह के निर्देशन में ‘दूरदर्शन’ पर प्रसारित होने वाला एक बुलेटिन भर था। आज की तारीख में ‘टीवी टुडे’ ग्रुप के चारों चैनलों-‘आजतक’, ‘तेज’, ‘हेडलाइंस टुडे’ और ‘दिल्ली आजतक’ की जिम्‍मेदारी सुप्रिय के कंधों पर है। इसे कहते हैं सफलता।

करीब 25 साल पहले झारखंड के एक कस्बानुमा शहर दुमका के टीन बाजार से बतौर स्ट्रिंगर पत्रकारिता का अपना सफर शुरू करने वाले सुप्रिय आज हिंदी टीवी पत्रकारिता के उन चार संपादकों (आशुतोष, दीपक चौरसिया और अजीत अंजुम) में शुमार हैं, जिनके नाम से चैनल का रुतबा है। तभी तो टीवी की दुनिया में कहा जाता है कि सुपिय्र केवल टीआरपी मास्‍टर ही नहीं, बल्कि तकनीक के भी जानकार हैं। अपनी टीम से कैसे काम लिया जाता है, इसको भी वे भली-भांति जानते हैं। इससे आगे यह भी कहना ज्यादा मुनासिब होगा कि सुप्रिय की उपलब्धियां जानने के लिए कोई सर्च इंजन तलाशने की जरूरत नहीं, बल्कि फिलवक्त ‘आजतक’ जो भी है, उसमें सुप्रिय की निष्ठा, ईमानदारी और कर्मठता है। ‘आजतक’ का इतिहास सुप्रिय का इतिहास है।

जनसंचार संस्थान की एक घटना याद आती है। ‘दूरदर्शन’ के वरिष्ठ अधिकारी मयंक अग्रवाल आये थे-खोजी पत्रकारिता पढ़ाने और अभ्यास करवाने। विषय था ‘विमान खरीद सौदे में दलाली’। हमें उस दलाली का पर्दाफाश करना था। उस अभ्यास में जो टीम अव्वल रही, उसकी अगुआई सुप्रिय कर रहे थे।

सुप्रिय खबरों को जानने वाला और उनकी अहमियत समझने वाला इंसान है। इसी वजह से वह हिंदी टीवी पत्रकारिता का सबसे सफल और सिद्ध संपादक है। वह खबरों को जीवन मानता है, उनके लिए शिल्प सजाता है, जो शिल्प आपके जीवन का कोई हिस्सा है, अनदेखा हिस्सा। समय के साथ खबरें कैसे अपना रंग बदलती हैं, ढंग बदलती हैं और अपना तर्ज बदलती हैं, कोई सुप्रिय से पूछे। उसके लिए खबरों का ट्रीटमेंट पूजा है, इबादत है।

इसके बावजूद सुप्रिय की पत्रकारिता से जुडी कई ख्वाहिशें हैं, ढेरों मन्नतें हैं, जिन्हें वह पूरा करना चाहते हैं। हम मित्रों की दुआ है कि वे तमाम ख्वाहिशें सुप्रिय के कदम चूमें और मन्नतें उसका सिर चूमें।

(वरिष्ठ पत्रकार अमरेंद्र किशोर की फेसबुक वॉल से साभार)

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मिस्टर मीडिया: महाराष्ट्र में क्यों चूके मीडिया के महारथी?

राजनीति में किसी भी घटना के अनेक पहलू होते हैं। पत्रकार के रूप में काम करते हुए हर कदम पर इन पहलुओं का ध्यान रखना पड़ता है

राजेश बादल by राजेश बादल
Published - Saturday, 23 November, 2019
Last Modified:
Saturday, 23 November, 2019
Rajesh Badal

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।

महाराष्ट्र की राजनीति बारह घंटे में उलट गई। त्रिकोणीय गठबंधन को शरद पवार के भतीजे ने पटखनी दे दी। बीते एक सप्ताह से अजित पवार अपनी खिचड़ी पका रहे थे। उनके वाद्य यंत्रों से अलग सुर निकल रहे थे। लेकिन मीडिया के तमाम अवतार मंच पर होने वाले नाटक और उसके अभिनेताओं की भूमिका पर ही नज़र बनाए हुए थे। परदे के पीछे चल रहे घटनाक्रम की वे उपेक्षा करते रहे। आमतौर पर हर छोटी-बड़ी कवरेज में ड्रेस से लेकर बॉडी लैंग्वेज तक के बारीक तार निकालने वाले मीडिया महारथी इस बार कुछ भी नहीं भांप सके।

राजनीति में किसी भी घटना के अनेक पहलू होते हैं। पत्रकार के रूप में काम करते हुए हर कदम पर इन पहलुओं का ध्यान रखना पड़ता है। महाराष्ट्र के मामले में साफ कहा जा सकता है कि अखबार और टेलिविजन के संवाददाता चूक गए। सवाल यह खड़ा होता है कि पत्रकारिता में यह लड़खड़ाहट क्या एक दिन में आई है अथवा विश्लेषण या आकलन का अभ्यास धीरे-धीरे चटकता जा रहा है। यदि हां, तो इस चटकन का कारण क्या है?

इतने घंटे बीत जाने के बाद भी महाराष्ट्र के राजनीतिक ड्रामे की पटकथा के अनेक पन्ने मीडिया के मंचों पर फड़फड़ा रहे हैं, लेकिन उसमें लिखे संवाद किसी भी चैनल में अब तक नहीं आए हैं। रातों रात इस नाटकीय परिवर्तन के पीछे कुछ सवाल भी उभरते हैं। इन सारे प्रश्नों को अभी तक छोटे परदे पर स्थान नहीं मिला है। अजित पवार कुछ समय से अपने अलग रंग में थे। खोजी राजनीतिक पत्रकार इन रंगों को नहीं देख सके।

जब सरकार ही अस्तित्व में नहीं है  तो किसानों के नाम पर शरद पवार की करीब घंटे भर प्रधानमंत्री से गोपनीय बैठक का कोई और कारण क्यों नहीं हो सकता? इसे किसी ने नहीं पढ़ा। आमतौर पर बेहद आक्रामक और बयान युद्ध में बाजी मारने वाली भारतीय जनता पार्टी  ने चंद रोज से अप्रत्याशित खामोशी क्यों ओढ़ ली थी? क्या किसी ने इसकी पड़ताल करने की कोशिश की? यह भी कि शांति से चल रहे राष्ट्रपति शासन पर ऐसा क्या आपातकाल आ पड़ा कि राजभवन और राष्ट्रपति भवन को अपने प्रोटोकॉल व परंपरा से हटना पड़ा।

अंधेरी काली रात में किसी ने बहुमत का दावा किया। आधी रात को राज्यपाल को जगाकर उन्हें समर्थन देने वाले राजनेता मिलते हैं। राज्यपाल रात में ही राष्ट्रपति भवन को खबर देते हैं। तड़के ही राष्ट्रपति भवन का सचिवालय हरकत में आता है। राष्ट्रपति शासन हटा लिया जाता है। नोटिफिकेशन हो जाता है। नए मुख्यमंत्री की शपथ भी हो जाती है।

राजनीतिक शिष्टाचार का पालन नहीं करते हुए सन्नाटे में शपथ का यह अनूठा नमूना है। राजभवन इससे अपने आपको सवालों के घेरे में लाया है। मीडिया के कितने मंचों पर इस बारे में खुलकर चर्चा हुई? अजित पवार को तो त्रिकोणीय गठबंधन में भी उप मुख्यमंत्री पद मिलना था। उसके पीछे की कहानी क्या है? अभी भी एनसीपी के 54 विधायकों के हस्ताक्षर, देवेंद्र फडणवीस को बहुमत, उनकी संवैधानिक स्थिति और दलबदल कानून के अनेक पृष्ठों को पलटने की आवश्यकता है।   

दरअसल बीते एक दशक में पत्रकारिता धर्म निभाने में वैचारिक और संपादकीय पक्ष कमजोर पड़ता दिखाई दिया है। सिर्फ सूचना प्रधान पत्रकारिता ही अस्तित्व में रही है। मैनेजमेंट भी अपने रोल पर काम कर रहे पत्रकारों से यही चाहता रहा है कि वह जिस राजनीतिक दिशा में जा रहा है, वे सब उसका पालन करें। पत्रकारों और संपादकों की अपनी योग्यता तथा सियासी समीक्षा इससे अत्यंत दुर्बल होती गई। बीट पर काम कर रहे संवाददाता भी यह सोचकर खबर छोड़ देते हैं कि उनकी जानकारी को समाचारपत्र या समाचार चैनल में जगह नहीं मिलेगी।

इसका नुकसान यह हुआ कि जमीनी सूचनाओं, विश्लेषणों व निष्कर्षों के लिए दरवाज़ा बंद हो गया। दोनों ही स्थितियों में क्षति पत्रकारिता को हुई और राजनीति ने इसका फायदा उठाया। एक तरह से किसी राजनीतिक दल को कवर करने वाले पत्रकार के लिए उस पार्टी को पसंद आने वाली खबरों को परोसना ही कर्तव्य हो गया। उसे अपनी बीट वाले दल के भीतर चल रही उठापटक और खींचतान से आंखें मूंदना पड़ा। अपने इस गंभीर आंतरिक संकट को समझने का प्रयास कीजिए मिस्टर मीडिया!

(यह लेखक के निजी विचार हैं।)

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मिस्टर मीडिया: आर्थिक मंदी के दौर में मीडिया कवरेज के लिए निकला है यह अनोखा ‘फॉर्मूला’

मिस्टर मीडिया: अगर इस तरह की खबरें सच हैं तो यह शुभ संकेत नहीं है

मिस्टर मीडिया: किसी पत्रकार को कवरेज का ऐसा दिन देखने का मौका न मिले तो अच्छा

मिस्टर मीडिया: यह विचार की जालसाजी अथवा धोखाधड़ी नहीं तो और क्या है?

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'यह संपादक छपने से पहले अपने चपरासी को संपादकीय पढ़ाते थे'

पिछले 27 साल से मराठी दैनिक अखबार 'नवाकाल' के संपादक की जिम्मेदारी निभा रहे थे

समाचार4मीडिया ब्यूरो by समाचार4मीडिया ब्यूरो
Published - Friday, 22 November, 2019
Last Modified:
Friday, 22 November, 2019
Nilkanth Khadilkar

वरिष्ठ मराठी पत्रकार नीलकंठ खाडिलकर का शुक्रवार तड़के निधन हो गया। 85 वर्षीय खाडिलकर कुछ समय से बीमार थे। उन्होंने मुंबई के उपनगर बांद्रा स्थित एक निजी अस्पताल में आखिरी सांस ली। खाडिलकर पिछले 27 साल से मराठी दैनिक अखबार 'नवाकाल' के संपादक की जिम्मेदारी निभा रहे थे।   

खाडिलकर के निधन पर 'एनडीटीवी इंडिया' में कार्यरत पत्रकार सुनील सिंह ने उन्हें अपनी श्रध्दांजलि देते हुए लिखा है, 'नीलकंठ खाडिलकरजी से (जिनका आज देहांत हो गया) ‘नवाकाल’ के दफ्तर में एक-दो बार मिलने का मौका मिला था। अक्सर वह अपना संपादकीय लिखकर छपने से पहले अपने चपरासी मधु (मुझे यही नाम याद है) और आर्टिस्ट को पढ़ने के लिए देते थे, उनकी राय लेते थे। फिर छापते थे। ऐसा वह आम आदमी की रुचि जानने के लिए करते थे।'

सुनील सिंह के अनुसार, 'शायद यही वजह थी कि उन दिनों उनका संपादकीय आम जनमानस में बेहद लोकप्रिय था। सिर्फ संपादकीय के बल पर अखबार सर्कुलेशन में नंबर 1 पर था। इसलिए उन्हें अग्रलेख का बादशाह कहा जाता था। ऐसे अनोखे संपादक को शत-शत नमन। ईश्वर उनकी आत्मा को शांति दे।'

बता दें कि नीलकंठ खाडिलकर ने ‘प्रैक्टिकल सोशलिज्म: म्यूजिंग्स फ्रॉम ए टूर ऑफ रशिया’ समेत कुछ किताबें भी लिखीं हैं।

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मिस्टर मीडिया: आर्थिक मंदी के दौर में मीडिया कवरेज के लिए निकला है यह अनोखा ‘फॉर्मूला’

इसमें न किसी बदनामी का खतरा है और न इसे आप पीत पत्रकारिता कह सकते हैं। ऐसी स्थिति में पुरानी पीढ़ी के अनेक पत्रकारों में नई चिंता देखी गई है

राजेश बादल by राजेश बादल
Published - Friday, 15 November, 2019
Last Modified:
Friday, 15 November, 2019
Rajesh Badal

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।

इन दिनों मीडिया संस्थानों और मीडिया घरानों की ओर से इवेंट्स कराना आम होता जा रहा है। इसके संस्थान को दो लाभ हैं। वह खबर का उत्पादन करता है और धन भी कमाता है। आर्थिक मंदी के इस दौर में यह एक अनोखा फॉर्मूला निकला है। खबर की फसल पैदा करने का फायदा यह है कि वह उस संस्थान की अपनी संपत्ति होती है इसलिए एक्सक्लूसिव की मोहर लग जाती है। मीडिया समूह इवेंट के कंटेंट को कई दिन तक थोड़ा-बहुत फेरबदल करके पाठकों और दर्शकों तक पहुंचाता रहता है। नए-नए मुद्दे पक्ष और प्रतिपक्ष के राजनेताओं से सवालों के आधार पर उगते रहते हैं। चैनल समझते हैं कि इससे टीआरपी बढ़ती है।

इसके अलावा इवेंट को प्रायोजित करने वाले घरानों को धन देने के बदले में सामाजिक और राजनीतिक पहचान भी मिलती है। इसमें न किसी बदनामी का खतरा है और न इसे आप पीत पत्रकारिता कह सकते हैं। ऐसी स्थिति में पुरानी पीढ़ी के अनेक पत्रकारों में नई चिंता देखी गई है। बीते दिनों लगातार हो रहे मीडिया सेमिनारों में यह बात गंभीरता से उभरकर आई कि विज्ञापन के आवरण में समाचार का उत्पादन कितना जायज है?

मीडिया संस्थान जब ऐसा करते हैं तो वह एक तरह से विज्ञापन जैसी ही कोई श्रेणी होती है। विज्ञापन में अखबार/टेलिविजन चैनल/डिजिटल मीडिया संस्थानों का विज्ञापन के कंटेंट पर सीधा नियंत्रण नहीं होता, लेकिन उसका अपने इवेंट के कंटेंट पर पूरा नियंत्रण होता है। यानी इवेंट भी, विज्ञापन भी, विज्ञापन का कंटेंट भी और उसके बाद उससे निकली खबर पर भी सौ फीसदी एक्सक्लूसिव कंट्रोल। मीडिया संस्थान हेडलाइन भी बनाते हैं और राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय खबरों के समकक्ष अपने विज्ञापननुमा इवेंट से उपजी खबरें बिठाते हैं। सवाल यह है क्या यह अपने बैनर या ब्रैंड का अनुचित इस्तेमाल है?

यह भी एक पहलू है कि अगर यह सिलसिला जिला और तहसील स्तर तक फैल गया तो हर छोटा और मंझोला मीडिया संस्थान धन कमाने के लिए अपने-अपने आयोजन करेगा और अपनी अपनी सुर्खियां रचेगा तो देश की मिट्टी से निकलने वाली वास्तविक खबरें कहां जाएंगी और गढ़ी तथा पकाई गई खबरें क्या पाठकों तथा दर्शकों के साथ अन्याय नहीं होंगी? मेरे जेहन में यह प्रश्न भी है।

एक सेमिनार में सुझाव आया कि मीडिया संस्थान को अपने इवेंट या कॉन्क्लेव दिखाते समय या अखबार के पन्नों पर परोसते समय उसे एडवर्टोरियल या इंपेक्ट फीचर लिखना चाहिए। इससे कोई नैतिक सवाल नहीं पनपेगा और अपने-अपने खबर लोक रचने का अवसर भी नहीं मिलेगा।

मैं स्वीकार करता हूं कि आजकल मीडिया संस्थान अत्यंत आर्थिक दबाव में हैं। अब उनके लिए विज्ञापन का बाजार पहले की तरह नहीं खुला है, लेकिन एक इवेंट से चार महीने चैनल या अखबार का खर्च निकालना और उसकी खबर खपाना कितना ठीक है। इवेंट के सह आयोजक ढूंढ़ना, उनसे धन लेना फिर उन्हीं के आला अफसरों या मैनेजमेंट से जुड़े व्यक्तियों को सम्मान या अवार्ड देना और उनके समाचार दिखाना या प्रकाशित करना क्या दूध में पानी मिला देने की तरह नहीं  है।

प्रादेशिक अखबारों में भी इस तरह की प्रवृति शुरू हो गई है। बीते दिनों  ग्वालियर में विकास संवाद और आईटीएम विश्वविद्यालय में एक विशेषज्ञ ने इंदौर का उदाहरण दिया कि किसी कार्यक्रम के लिए यदि आयोजक एक ही अखबार में विज्ञापन देता है तो अन्य सारे समाचारपत्र उस कार्यक्रम की खबर का बहिष्कार कर देते हैं। शहर को पता ही नहीं चलता कि ऐसा कोई आयोजन भी शहर में हुआ है। यह कौन सी पत्रकारिता है मिस्टर मीडिया?

(यह लेखक के निजी विचार हैं।)

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मिस्टर मीडिया: अगर इस तरह की खबरें सच हैं तो यह शुभ संकेत नहीं है

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‘बाहर पड़ी यह लाश वशिष्ठ बाबू की नहीं, सिस्टम की लाश है’

यकीन मानिए कि समाज में बहुत सारे आदर्श दोबारा जन्म लेंगे, लेकिन वशिष्ठ बाबू जैसा शख्स सदियों में कभी कभार ही धरती पर आता है

समाचार4मीडिया ब्यूरो by समाचार4मीडिया ब्यूरो
Published - Thursday, 14 November, 2019
Last Modified:
Thursday, 14 November, 2019
Anuranjan Jha

अनुरंजन झा, वरिष्ठ पत्रकार।।

सुबह-सुबह सूचना मिली कि वशिष्ठ बाबू नहीं रहे। जो नहीं जानते, उनके लिए एक गणितज्ञ। जो जानते हैं, उनके लिए दूसरे रामानुजन और हमारे लिए ‘बिहार विभूति’ सर। यह भी गजब इत्तेफाक है कि कल ही यह सूचना आई कि उनके जीवन पर फिल्म बनाने के लिए जिन दो निर्माताओं के बीच कॉपीराइट को लेकर कानूनी विवाद फंसा हुआ था, उसे एक्सेल इंटरटेनमेंट ने जीत लिया है। रात ही हमने इनके मुद्दे पर कई लोगों से काफी बात की और थोड़ा सुकून था कि चलो इस विवाद के बाद अब सिनेमा पर काम शुरू होगा तो वशिष्ठ बाबू को दुनिया और ठीक से जान पाएगी।

दुनिया जान पाएगी कि चाणक्य की धरती बिहार में हाल के दिनों तक विश्व को गुरुमंत्र देने वाले लोग पैदा होते रहे हैँ। सोशल मीडिया का सूचना के मामले में जबरदस्त लाभ हुआ है। खबर सोशल मीडिया पर अगले एक घंटे में तैरने लगी। अपनी-अपनी सूचना और जानकारी के हिसाब से लोग उनको श्रद्धांजलि भी देने लगे। हम जितनी बार वशिष्ठ बाबू से मिले,  निश्चित तौर पर उनको कुछ भी याद नहीं रहा होगा, क्योंकि जबसे हमने होश संभाला है, तब से वो सिजोफ्रेनिया के शिकार हैँ, लेकिन हर मुलाकात हमें उत्साह और उर्जा से भर देती थी। निश्चित तौर पर हमारे लिए उनका जाना एक व्यक्तिगत क्षति है।

डिजिटल माध्यम पर उनके निधन की तैरती खबरों के बीच एक ऐसी खबर पर हमारी नजर पड़ी, जिसने हमें कुछ देर के लिए सुन्न कर दिया। उतने मर्माहत तो हम यह खबर सुनकर भी नहीं हुए कि वो नहीं रहे। एक रिपोर्ट देखी, जिसमें साफ-साफ दिखा कि पटना में निधन के बाद उनकी लाश अस्पताल से बाहर तकरीबन फेंक दी गई। उसे घर ले जाने के लिए एक अदद एंबुलेंस की व्यवस्था भी प्रशासन नहीं कर पाया।

आनन-फानन में सरकार ने सरकारी सम्मान से अंतिम संस्कार की घोषणा तो कर दी, लेकिन जिस तरीके का व्यवहार अस्पताल प्रशासन ने किया, वो वाकई शर्मसार करने वाला है। अस्पताल में अंतिम दिनों में कुछ राजनेता मिलने भी गए, क्योंकि उनको अपना फोटो कराना था। नहीं तो उनके जीवन से इन राजनेताओं का कोई लेना-देना नहीं रहा। क्यूंकि अगर रहा होता तो न तो वशिष्ठ बाबू की यह हालत होती और न ही वो गुमनामी की जिंदगी जीते हुए मरते।

जिस तरीके से वशिष्ठ बाबू की लाश बाहर रखी थी और समाज और राजनीति का कोई व्यक्ति नहीं पहुंचा था, उसे देखकर यही लगा कि यह लाश वशिष्ठ बाबू की नहीं, हमारे गौरव की लाश है। जिस शख्स ने 19 साल की उम्र में कैलिफोर्निया से पीएचडी करके एक वक्त में सबसे कम उम्र में यह डिग्री पाने का गौरव हासिल किया हो, यह उस गौरव की लाश है। जिस शख्स ने आइंस्टाइन जैसे वैज्ञानिक के सिद्धांतों तो चुनौती दी हो, यह उस चुनौती की लाश है। जो बीमार होने के बाद भी 40 से ज्यादा सालों तक हर दीवार पर गणित के फार्मूले लिखता रहा हो, यह उस फार्मूले की लाश है। जिसने आत्मसम्मान से समझौता नहीं करने की शर्त पर नासा को ठुकरा कर देश के IIT में पढ़ाना पसंद किया हो, यह उस आत्मसम्मान की लाश है।

फिल्मकार नितिन चंद्रा ने ठीक ही तो कहा कि यह ये वशिष्ठ नारायण की लाश नहीं है, ये बिहारियों की बिहार के प्रति संवेदनशीलता की लाश है। यकीन मानिए समाज में बहुत सारे आदर्श दोबारा जन्म लेंगे, लेकिन वशिष्ठ बाबू जैसा शख्स सदियों में कभी कभार ही धरती पर आता है।

चूंकि मैं आशावादी हूं, इसलिए फिर कहता हूं कि अब भी समय है, चेत जाइए, सिस्टम बदलने का प्रयास कीजिए। अब भी अपने को बचाने की कोशिश कीजिए, धरोहरों का सम्मान कीजिए। भविष्य तभी ठीक होगा,  नहीं तो कभी दाना मांझी अपनों की लाश कंधों पर ढोकर घर ले जाएगा और कभी ये सिस्टम वशिष्ठ बाबू की लाश को झटके में सड़क पर पटक देगा।  वशिष्ठ बाबू को भावभीनी श्रद्धांजलि।

(यह लेखक के निजी विचार हैं।)

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