उदयन शर्मा का मानना था कि एक पत्रकार के काम करने का समय शाम छह बजे से रात 12 बजे तक का होता है
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संतोष भारतीय
उदयन शर्मा को इस संसार को छोड़े हुए 18 वर्ष बीत गए। इस महीने की 11 तारीख को उनकी पुण्यतिथि थी। उदयन शर्मा का नाम पत्रकारिता के विद्यार्थी जानते हैं या नहीं, मैं नहीं जानता, लेकिन उन्हें जानना चाहिए, ऐसा मैं मानता हूं। उदयन शर्मा हिंदी पत्रकारिता का बहुत बड़ा नाम हैं, जिनकी रिपोर्ट आज भी पढ़ने पर लगता है कि वे कितनी सारगर्भित और परिपूर्ण हैं।
शुरू से बात करते हैं। उदयन शर्मा के पिता श्रीराम शर्मा हिंदी के चुनिंदा कथा लेखक थे। बचपन से ही उदयन शर्मा को लिखने का शौक जागा, जो उन्हें धर्मयुग में ले गया। प्रसिद्ध साहित्यकार और धर्मयुग के संपादक धर्मवीर भारती को उदयन शर्मा में बहुत संभावनाएं नजर आईं और उन्हें धर्मयुग में उप संपादक की जिम्मेदारी मिल गई। उन दिनों धर्मयुग में गणेश मंत्री, योगेंद्र कुमार लल्ला और सुरेंद्र प्रताप सिंह सहित कई वरिष्ठ पत्रकार काम करते थे। उदयन शर्मा ने अपनी प्रतिभा से धर्मवीर भारती को इतना प्रभावित किया कि उन्होंने उदयन शर्मा को राजनीति के साथ-साथ खेल और सिनेमा पर भी लिखने की आजादी दे दी।
धर्मवीर भारती का व्यक्तित्व इतना विराट था कि वे जब अपने केबिन से बाहर निकलते थे तो न केवल हिंदी में, बल्कि अंग्रेजी के सेक्शन में भी एक खामोशी फैल जाती थी। यह उनके डर से नहीं, बल्कि उनके सम्मान में होता था। उनके मुंह में सिगार होता था और बुद्धिजीवी की चाल होती थी, लेकिन उदयन शर्मा कुछ ऐसा करते थे कि धर्मवीर भारती मुस्कुरा देते थे। उदयन शर्मा गंभीरता से लिखते हुए भी धर्मयुग के माहौल को हमेशा हल्का और जीवंत रखते थे। आपातकाल में उदयन शर्मा दिल्ली आए और यहां उन्होंने उन सभी से संपर्क किया, जो जेल जाने से बच गए थे। वह अपने उन साथियों के यहां भी जाते थे, जो जेल चले गए थे तथा जिनके परिवार परेशानी मैं थे। उदयन शर्मा छात्र जीवन से ही समाजवादी विचारधारा के थे और डॉक्टर लोहिया का उनके ऊपर प्रभाव था।
उदयन शर्मा की शादी उत्तर प्रदेश में मंत्री रहे कांग्रेसी नेता जगन प्रसाद रावत की नातिन नीलम से हुई। मुंबई में उदयन शर्मा, एसपी सिंह और एमजे अकबर की तिकड़ी बन गई। इनकी दोस्ती इतनी गहरी थी कि तीनों एक साथ रहते थे। उदयन शर्मा मुंबई में थे और नीलम शर्मा आगरा में थीं। एसपी सिंह नीलम शर्मा के ऊपर एक प्रयोग कर रहे थे, जिससे नीलम शर्मा, उदयन शर्मा के साथ शादी करने के लिए हां कह दें। उदयन शर्मा धर्मयुग में भविष्यफल वाला कॉलम भी देखते थे। एसपी सिंह वहां उदयन शर्मा से कहते थे कि नीलम शर्मा के ग्रह या जन्म तारीख वाले भविष्यफल में लिखो कि किसी अति प्रिय का खत आएगा या इस हफ्ते किसी अपने का शुभ समाचार मिलेगा। मुझे एसपी सिंह ने बताया था कि हमने भविष्यफल का इस्तेमाल कर उदयन की और नीलम की शादी करा दी।
आपातकाल के बाद कोलकाता से आनंद बाजार पत्रिका ने संडे अंग्रेजी में और रविवार हिंदी में दो पत्रिकाएं निकालीं। एमजे अकबर दोनों पत्रिकाओं के पहले संपादक बने, लेकिन वे रविवार के लिए हिंदी का व्यक्ति चाहते थे। उनके कहने से एसपी सिंह और उदयन शर्मा भी मुंबई छोड़कर रविवार से जुड़ गए। उदयन शर्मा ने दिल्ली में रहकर रविवार के लिए रिपोर्ट करना चुना और वे रविवार के पहले विशेष संवाददाता बने तथा सुरेंद्र प्रताप सिंह कोलकाता में रहकर रविवार के संपादक बने।
यहीं से रविवार की अनूठी यात्रा शुरू हुई, जिसने हिंदी पत्रकारिता के इतिहास में अपना न मिटने वाला स्थान बना लिया। उदयन शर्मा ने फील्ड रिपोर्टिंग की शुरुआत की और वे सबसे पहले उस जगह पहुंचते थे, जहां घटना घटी थी। अब तक फील्ड रिपोर्टिंग घटना के विवरण तक सीमित रहती थी, लेकिन उदयन शर्मा ने इसका चेहरा और अंदाज बदल दिया। घटना क्या हुई के साथ घटना क्यों हुई, उसके पीछे के क्या कारण थे और कौन-कौन ताकतें इन घटनाओं को करा रही थीं तथा घटना घटने के क्या-क्या परिणाम होंगे, इन सबको मिलाकर एक संपूर्ण रिपोर्ट की परिपाटी शुरू की। वे कभी इस बात को नहीं छुपाते थे कि घटना कराने वाले सरकार के हिस्से हैं या कोई संगठन हैं या स्थानीय अधिकारी और ठेकेदार हैं, इसलिए उनका डर सत्ता प्रतिष्ठान को प्रभावित करने लगा।
उदयन शर्मा ने दंगों की रिपोर्टिंग की और दंगों को किन सांप्रदायिक ताकतों ने हवा दी, इस बारे में लिखने में कभी संकोच नहीं किया। सांप्रदायिक दंगों को रिपोर्ट करने में उदय शर्मा सीमा पार करने में भी संकोच नहीं करते थे। उन्हें विशुद्ध धर्मनिरपेक्ष पत्रकार कह सकते हैं। रिपोर्ट करने में न वे किसी जाति का पक्ष लेते थे और न किसी धर्म का, सिर्फ और सिर्फ सच्चाई बयान करते थे, लेकिन वह सच्चाई जिसके भी खिलाफ जाती थी, वह उन पर लांछन लगाने की भरपूर कोशिश करता था।
उन दिनों जनसत्ता के संपादक प्रभाष जोशी थे। प्रभाष जोशी की टीम में हर तरह की विचारधारा वाले लोग थे। वहां राम बहादुर राय और हरिशंकर व्यास भी थे और बनवारी तथा आलोक तोमर भी थे। एक बार हरिशंकर व्यास और उदयन शर्मा में अंताक्षरी हो गई। विषय बताना महत्वपूर्ण नहीं है। दोनों अपने-अपने विचारों के ध्वजवाहक थे। जनसत्ता के गपशप कॉलम को हरिशंकर व्यास मुख्य रूप से देखते थे तथा उदयन शर्मा रविवार के कुतुबनुमा में लिखते थे। हरिशंकर व्यास के गपशप कॉलम के एक हिस्से को पढ़कर उदयन शर्मा को लगा कि यह उनके ऊपर प्रहार है। उन्होंने कुतुबनुमा में बिना नाम लिए कुछ लिखा, जिसे हरिशंकर व्यास ने अपने ऊपर प्रहार समझ लिया। जब दो महीने बीत गए, तब एक दिन प्रभाष जी का मेरे पास फोन आया और उन्होंने मुझे कहा कि इसे बंद कराओ। दरअसल, यह अंताक्षरी ऐसे मुकाम पर पहुंच गई थी, जहां उदयन शर्मा ने सीधे प्रभाष जी को अपना विषय बना लिया था। उन्होंने संभवत हरिशंकर व्यास को रोका होगा। मैंने उदयन जी से कहा कि प्रभाष जी का कहना है उदयन इसे बंद करें। उदयन जी ने मुझे कहा कि मैं इस हफ्ते नहीं लिखूंगा, लेकिन अगर जनसत्ता में कुछ छपा तो फिर मैं आजाद हूं। उदयन जी की रिपोर्टिंग को लेकर अक्सर पाञ्चजन्य में उनका नाम लेकर टिप्पणी होती रहती थी। वे इन टिप्पणियों का आनंद लेते थे और कहते थे कि जब तक मेरे ऊपर यह टिप्पणियां होती रहेंगी, तब तक मैं मानूंगा कि मैं सही लाइन पर रिपोर्टिंग कर रहा हूं।
उदयन शर्मा में खबर पहचानने की अद्भुत क्षमता थी। उनका संपर्क चौधरी चरण सिंह और राज नारायण से बहुत अंतरंग था। जॉर्ज फर्नांडिस और मधु लिमए उनके लिखे हुए को पसंद करते थे और खुद उदयन शर्मा जॉर्ज फर्नांडिस और मधु लिमए के यहां अक्सर बैठते थे। कांग्रेस के सीताराम केसरी, तारिक अनवर, गुलाम नबी आजाद उनके मुख्य सूचना स्रोत थे। अकबर अहमद डंपी और मेनका गांधी उन्हें अपना नजदीकी मित्र मानते थे। शरद यादव और केसी त्यागी उनके रोजाना मिलने वालों में थे। मुलायम सिंह यादव और अमर सिंह से उनका अंतरंग रिश्ता था। उदयन शर्मा ने अपने इन संपर्कों से बातचीत दौरान खबरों के ऐसे-ऐसे विषय निकाले, जिनकी रिपोर्टिंग ने उन्हें काफी मशहूर कर दिया।
उदयन शर्मा का मानना था कि एक पत्रकार के काम करने का समय शाम 6:00 बजे से रात 12:00 बजे तक का होता है, इसलिए जो इस समय को बेकार करता है, वह अच्छा पत्रकार हो ही नहीं सकता। वे प्रेस क्लब जाना बहुत पसंद नहीं करते थे। उनका समय खबरों की तलाश में ज्यादा बीतता था। फारुख अब्दुल्ला उनके मित्र थे और उन्होंने कश्मीर को लेकर बहुत रिपोर्ट लिखी थीं। उन्होंने उस समय डिफेंस घोटाले पर भी लिखा था। उदयन शर्मा का दायरा जितना लेखन में विशाल था, उतना ही उनकी व्यक्तिगत मित्रता का भी दायरा बहुत विशाल था। उनके जितने भी मित्र थे, सब निस्वार्थ और हिम्मती थे। आगरा के विजय बाबू लखनऊ के रमेश दीक्षित और पटना के सुधीर मिश्र जैसे कुछ उदाहरण मुझे याद आ रहे हैं।
उन्होंने नए लोगों को पत्रकारिता में महत्वपूर्ण अवसर दिए। कुर्बान अली, राजेश रपरिया और अलका सक्सेना इसके कुछ उदाहरण हैं। जब सुरेंद्र प्रताप सिंह मुंबई नवभारत टाइम्स के संपादक बनकर चले गए, तब उदयन शर्मा रविवार के संपादक बने। रविवार का संपादक बनने के बाद उनकी दोस्ती तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी से हुई। उन्होंने राजीव गांधी को यथासंभव व्यक्तिगत सलाह भी दी थी तथा लेखन के द्वारा भी उनका समर्थन किया था। राजीव शुक्ला की जिंदगी में उदयन शर्मा का बहुत बड़ा रोल रहा। उन्होंने राजीव शुक्ला को दिल्ली में विशेष संवाददाता बनाया तथा उनकी राजीव गांधी से दोस्ती भी कराई। राजीव शुक्ला की शादी अनुराधा प्रसाद से हो, इसके वह समर्थक भी थे और सहायक भी थे।
उदयन शर्मा बाद में धीरूभाई अंबानी के अखबार संडे ऑब्जर्वर के संपादक बने और आखिरी दिनों में वे सुब्रत राय के अखबार राष्ट्रीय सहारा से जुड़े। उदयन शर्मा और एसपी सिंह की दोस्ती में कुछ बातें बहुत कमाल की थीं। उदयन शर्मा के मन में क्या है, यह सुरेंद्र प्रताप सिंह समझ जाते थे और सुरेंद्र प्रताप सिंह क्या चाहते हैं, इसे उदयन शर्मा उनके बिना कहे ही अमल में ले आते थे। सुरेंद्र प्रताप सिंह ब्रेन स्ट्रोक के शिकार हुए और लगभग 15 दिन अपोलो अस्पताल में भर्ती रहे, दूसरी ओर उदयन शर्मा भी ब्रेन स्ट्रोक के एक अजीब तरह के प्रकार का शिकार हुए और वे पंडित पंत अस्पताल में भर्ती रहे। इसे सिर्फ संयोग कह सकते हैं.
जिस तरह प्रसिद्ध कथा लेखक श्रीराम शर्मा के पुत्र उदयन शर्मा बड़े पत्रकार बने उसी तरह उनके बड़े बेटे कार्तिकेय शर्मा आज हिंदी और अंग्रेजी के बड़े पत्रकार हैं तथा उन्होंने प्रमुख रूप से अंग्रेजी पत्रकारिता को अपनाया और टेलिविजन के जाने-माने चेहरे बने। उनके छोटे बेटे कनिष्क शर्मा आधुनिक युद्ध कला के उद्गम स्थल के रूप में प्रसिद्ध चीनी बौद्ध मठ शाओलिन टेंपल से निकलने वाले पहले भारतीय बने। वे इन दिनों सामान्य छात्रों, सिनेमा में काम करने वाले बड़े कलाकारों, जिनमें जॉन अब्राहम, शाहरुख खान और प्रियंका चोपड़ा शामिल हैं, उन्हें एक्शन सिखाने के साथ भारतीय सुरक्षा सेनाओं को बिना हथियार दुश्मन को कैसे परास्त किया जा सकता है, इसकी ट्रेनिंग दे रहे हैं।
आज की पत्रकारिता के बहुत से बड़े नाम, जिनमें विनोद अग्निहोत्री, राम कृपालु सिंह, कमर वहीद नकवी, राजेश बादल तथा स्वर्गीय आलोक तोमर आदि के विकास में उदयन शर्मा का उल्लेखनीय योगदान रहा। जब मुझे लोकनायक जयप्रकाश ने कहां कि तुम पत्रकारिता करो तो मैंने सुरेंद्र प्रताप सिंह को फोन किया। उन्होंने मुझे कहा कि मैं दिल्ली जाकर उदयन शर्मा से अवश्य मिल लूं। मैं उदयन जी से गांधी पीस फाउंडेशन के लॉन मैं मिला। वह एक घंटे की मुलाकात उनकी आखिरी सांस तक जिंदा रही और आज भी जिंदा है। मेरी और उनकी रिपोर्ट को लेकर हमेशा प्रतियोगिता और छीनाझपटी चलती रही, जिसमें हमेशा उनकी जीत हुई।
वे बड़े पत्रकार थे और हमेशा बड़े पत्रकार बने रहेंगे। रिपोर्ट पर झपट पड़ने और उसकी सच्चाई किसी भी तरह सामने लाने का उनका पागलपन हिंदी के पत्रकारों के लिए हमेशा उदाहरण बना रहेगा। शुभ व्रत भट्टाचार्य जो बाद में संडे के संपादक बने और उसके बाद हिन्दुस्तान टाइम्स के संपादक बने, उनके सबसे गहरे मित्रों में रहे। वह हमारे बीच में हैं, उदय शर्मा को जानना हो तो शुभ व्रत भट्टाचार्य से बात करनी चाहिए। राज बब्बर जब मुंबई में संघर्ष कर रहे थे, तब उदयन शर्मा ने उनके ऊपर बड़ी कवरस्टोरी लिखी, जिसने राज बब्बर को हिंदी के क्षेत्र में बहुत सलीके से परिचित कराया। राज बब्बर आगरा के थे और समाजवादी विचारधारा के थे। उदय शर्मा चाहते थे कि राज बब्बर राजनीति में आगे आएं, इसलिए उन्होंने अपनी तरफ से राज बब्बर की भरपूर मदद की।
उनके मन में भारतीय राजनीति में सार्थक हस्तक्षेप करने का विचार हमेशा घूमता था, वे आगरा से लोकसभा का चुनाव भी लड़े। एक बार वह भिंड से भी चुनाव लड़े। भले ही वे जीत नहीं पाए, लेकिन आगरा और भिंड के लोगों ने उन्हें उतना ही सम्मान दिया जो सम्मान एक सांसद को मिलना चाहिए। उदयन शर्मा हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन जब कभी हिंदी पत्रकारिता का इतिहास लिखा जाएगा, तो उनका नाम पत्रकारिता के शिखर पुरुष के रूप में अवश्य शामिल होगा।
पत्रकारिता के दौरान मैंने नेताओं को बनते, बदलते और वक्त के साथ राजनीतिक पहचान गढ़ते देखा है। मेरे लिए ‘ब्रैंड मोदी’ को छह शब्दों में समझा जा सकता है- व्यक्ति, कहानी, संदेश, संचार, संगठन और डिलीवरी।
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Samachar4media Bureau
शमशेर सिंह, वरिष्ठ पत्रकार।।
पूरा देश प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का 76वां जन्मदिन मना रहा है। इस मौके पर पीछे मुड़कर देखें तो एक सवाल बेहद दिलचस्प है- आखिर कोई राजनेता सिर्फ नेता से एक राजनीतिक ब्रैंड कैसे बनता है?
करीब तीन दशक की अपनी पत्रकारिता के दौरान मैंने नेताओं को बनते, बदलते और वक्त के साथ अपनी राजनीतिक पहचान गढ़ते देखा है। इसी दौरान मुझे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की राजनीतिक यात्रा को भी सीधे तौर पर देखने, कवर करने और करीब से समझने का अवसर मिला है। गुजरात से दिल्ली, फिर दिल्ली से गुजरात और फिर गुजरात से दिल्ली। गुजरात की राजनीति से लेकर राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र तक।
इस दौरान मैंने सिर्फ एक नेता को बदलते नहीं देखा, बल्कि बढ़ते, चमकते, एक राजनीतिक ब्रैंड को बनते और लगातार विकसित होते देखा है। लेकिन मोदी ने सिर्फ राजनीति नहीं की, अपने नाम को एक ब्रैंड में बदला। मेरे लिए ‘ब्रैंड मोदी’ को छह शब्दों में समझा जा सकता है- व्यक्ति, कहानी, संदेश, संचार, संगठन और डिलीवरी।
एक व्यक्ति के तौर पर उनकी एक अलग पहचान है, अपनी अलग शैली है और प्रेजेंटेशन भी बिल्कुल अलग है। उनकी कहानी और भी दिलचस्प और प्रेरणादायक है- वडनगर से दिल्ली तक का सफर, जो लगातार उनकी सार्वजनिक पहचान का हिस्सा बना। संदेश भी साफ है- विकास, राष्ट्र निर्माण, गरीब कल्याण, आत्मनिर्भरता और विकसित भारत जैसे स्पष्ट और दोहराए जाने वाले नैरेटिव। संचार तो जबरदस्त है। भाषण, सभा से सोशल मीडिया तक, टीवी से ‘मन की बात’ तक।
संगठन, व्यक्ति की पहचान को कार्यकर्ता और बूथ स्तर तक पहुंचाने वाला मजबूत राजनीतिक नेटवर्क है। रही बात डिलीवरी की, तो वह दुनिया के सामने है। नीतियां, योजनाएं, फैसले, दुनिया के मंच पर भारत की छवि और बड़े राष्ट्रीय आयोजन। ब्रिक्स इसका ताजा उदाहरण है।
दरअसल, किसी नेता की असली कहानी सिर्फ उसके भाषणों में नहीं होती। लोगों के बीच उनकी मौजूदगी, लोगों से उनका संवाद, मीडिया से उनका रिश्ता और समय के साथ बदलती उनकी कम्युनिकेशन स्ट्रैटेजी- ये सब मिलकर उनकी राजनीतिक पहचान बनाते हैं। और नरेंद्र मोदी के मामले में यह प्रक्रिया लगातार दिखाई देती रही है। तभी तो ‘मोदी’ अब सिर्फ एक नाम नहीं है; यह एक पूरा पॉलिटिकल कम्युनिकेशन आर्किटेक्चर है।
सिर्फ लोकप्रियता से कोई राजनेता ब्रैंड नहीं बन सकता। ब्रैंड बनने के लिए अपनी Identity, Credibility, Consistency, Visibility और Public Connection बेहद जरूरी है। ये Political Brand के Pillars हैं। इनमें एक भी कमजोर हो, तो ब्रैंड का लंबे समय तक टिकना मुश्किल होता है।
मोदी ने राजनीति को सिर्फ नीतियों और भाषणों तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने अपने सार्वजनिक संचार में एक ऐसी भाषा विकसित की, जो राजनीतिक मंच से निकलकर आम बातचीत का हिस्सा बनी। “मन की बात”, सोशल मीडिया, बड़े सार्वजनिक कार्यक्रम, रेडियो, डिजिटल प्लेटफॉर्म और सीधे जनता से संवाद- इन सभी माध्यमों का लगातार इस्तेमाल इस ब्रैंड की पहचान बना।
ब्रैंड भाषणों से बन सकता है, लेकिन लंबे समय तक टिकता है तो उसके पीछे नीतियां, निर्णय, संगठन और जनता का अनुभव भी होना चाहिए। “ब्रैंड मोदी” की कहानी इसलिए दिलचस्प है क्योंकि यह केवल एक नेता की कहानी नहीं है। यह भारतीय राजनीति के बदलते Communication Landscape की भी कहानी है। मजबूत Communication और Governance Experience के बीच लगातार तालमेल की कहानी है।
करीब 25 वर्षों की सार्वजनिक यात्रा को इसलिए केवल सत्ता और चुनावों की कहानी के रूप में देखना अधूरा होगा। यह भारतीय राजनीति में व्यक्तित्व, संचार और राजनीतिक ब्रैंडिंग के बदलते स्वरूप की भी कहानी है। और एक पत्रकार के रूप में मेरे लिए शायद यही ‘ब्रैंड मोदी’ का सबसे दिलचस्प पहलू है।
(यह लेखक के निजी विचार हैं। लेखक 'टाइम्स नेटवर्क' में मैनेजिंग एडिटर-डिजिटल (हिंदी एवं क्षेत्रीय भाषाएं) के पद पर कार्यरत हैं।)
नरेंद्र मोदी के जन्मदिन पर मैं उन्हें शुभकामनाएं देता हूं। मेरी कामना है कि उन्हें भारत ही नहीं, बल्कि विश्व राजनीति में शांति और समाज की प्रगति के लिए भी बड़ी सफलता मिले।
by
Alok Mehta
आलोक मेहता, पद्मश्री, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक।।
राजनीति में 25 साल का समय काफी लंबा होता है। सरकारें बदलती हैं, राजनीतिक नारे गायब हो जाते हैं, मीडिया की तकनीक बदल जाती है और लोगों की धारणाएं लगातार बदलती रहती हैं। इसके बावजूद नरेंद्र मोदी करीब ढाई दशक से भारत की राजनीतिक चर्चा के केंद्र में बने हुए हैं। 2001 में गुजरात के मुख्यमंत्री बनने से लेकर 2026 में प्रधानमंत्री के तौर पर 12 साल पूरे करने तक उनकी राजनीतिक यात्रा लगातार चर्चा में रही है।
‘Brand Modi’ का विकास केवल एक व्यक्ति की राजनीतिक कहानी नहीं है। यह राजनीतिक संचार, लेखन, संगठन, मीडिया संबंधों, तकनीक और एक ऐसी राजनीतिक पहचान को लगातार नए रूप में पेश करने की कहानी भी है, जिसमें मूल पहचान को बरकरार रखा गया।
नरेंद्र मोदी केवल ऐसे राजनीतिक व्यक्तित्व नहीं हैं, जिन्हें एक पत्रकार के तौर पर देखा गया है। उनसे और उनके परिवार के सदस्यों से लंबे समय से जुड़ाव रहा है। इस संबंध का एक साहित्यिक पक्ष भी रहा है। नरेंद्र मोदी ने ‘नमन नर्मदा’ और ‘सोशल रिफॉर्म इन इंडिया’ पुस्तकों की भूमिका लिखी। जनवरी 2026 में ‘रिवोल्यूशनरी राज: नरेंद्र मोदीज 25 इयर्स’ नामक कॉफी-टेबल बुक जारी हुई, जिसमें नरेंद्र मोदी की राजनीतिक यात्रा को तस्वीरों, घटनाओं और पत्रकारिता के अनुभवों के माध्यम से दर्ज किया गया है।
इसकी भूमिका गृहमंत्री अमित शाह ने लिखी है, जो नरेंद्र मोदी के करीबी राजनीतिक सहयोगियों में से एक और भाजपा के संगठनात्मक विस्तार से जुड़े महत्वपूर्ण नेताओं में रहे हैं। यह व्यक्तिगत जुड़ाव ‘Brand Modi’ को केवल चुनावी घटना के तौर पर नहीं, बल्कि एक बदलती संचार शैली के रूप में देखने का एक अलग नजरिया देता है।
लेखन में भी रही नरेंद्र मोदी की रुचि: नरेंद्र मोदी के व्यक्तित्व का एक ऐसा पक्ष है, जो उनकी राजनीतिक यात्रा के सामने अक्सर पीछे छूट जाता है और वह है लेखन में उनकी लंबे समय से रही रुचि। उनका शुरुआती लेखन मुख्य रूप से गुजराती में रहा, जो उनकी मातृभाषा है। उनकी पहली पुस्तक ‘संघर्ष मा गुजरात’ आपातकाल के बाद लिखी गई और 1978 में गुजराती में प्रकाशित हुई। इसमें आपातकाल के दौरान गुजरात में राजनीतिक संघर्ष से जुड़े उनके अनुभवों और टिप्पणियों को दर्ज किया गया था। बाद में इस पुस्तक के कई संस्करण भी आए। यह पहलू नरेंद्र मोदी की बाद की संचार शैली को समझने में महत्वपूर्ण है। राजनीतिक कम्युनिकेटर बनने से पहले ही उनके अनुभव में लेखक की भूमिका जुड़ी हुई थी।
आपातकाल के दौरान नरेंद्र मोदी युवा आरएसएस प्रचारक के तौर पर भूमिगत रहकर काम कर रहे थे। उस समय गुप्त तरीके से संवाद करना, साहित्य का वितरण करना और आंदोलन से जुड़े लोगों के बीच संपर्क बनाए रखना उनके अनुभवों का हिस्सा रहा। बाद में इन अनुभवों ने उनकी नजर से उस दौर का एक राजनीतिक इतिहास भी तैयार किया।
2025 में अमित शाह ने ‘द इमरजेंसी डायरीज: ईयर्स दैट फोर्ज्ड अ लीडर’ पुस्तक का विमोचन किया। इसमें आपातकाल विरोधी आंदोलन के दौरान नरेंद्र मोदी के अनुभवों को शामिल किया गया है। इस पुस्तक में सेंसरशिप, दमन और व्यापक आंदोलन से जुड़े अनुभवों के साथ एक युवा प्रचारक के भूमिगत जीवन का भी उल्लेख है। इस तरह नरेंद्र मोदी के टेलीविजन व्यक्तित्व या डिजिटल कम्युनिकेटर बनने से काफी पहले ही उनके राजनीतिक अनुभव में लेखक, संगठनकर्ता और भूमिगत कम्युनिकेटर की भूमिकाएं मौजूद थीं।
कविता और चिंतन से भी जुड़ा रहा लेखन: नरेंद्र मोदी का लेखन केवल राजनीतिक दस्तावेजों तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने कविताएं, चिंतन और व्यक्तिगत अनुभवों के साथ-साथ समाज और सार्वजनिक जीवन से जुड़े विषयों पर भी लिखा। उनके गुजराती लेखन में प्रकृति, आध्यात्मिकता, अनुशासन, एकांत, सामाजिक सरोकार और व्यक्तिगत अनुभव जैसे विषय बार-बार दिखाई देते हैं। यह उनके व्यक्तित्व के उस चिंतनशील पक्ष को सामने लाता है, जो एक सामान्य राजनीतिक प्रचारक की छवि से अलग है।
नरेंद्र मोदी की ओर से ‘नमन नर्मदा’ और ‘सोशल रिफॉर्म इन इंडिया’ की भूमिकाएं लिखा जाना भी इस साहित्यिक संबंध का हिस्सा है। नर्मदा, सामाजिक सुधार और बदलता भारतीय समाज ऐसे विषय रहे, जिन पर एक राजनीतिक नेता और पत्रकार-लेखक के बीच पुस्तकों के माध्यम से संवाद हुआ।
गुजरात से शुरू हुआ मीडिया संवाद: जब नरेंद्र मोदी 2001 में गुजरात के मुख्यमंत्री बने, तब राजनीतिक संचार का वातावरण आज से काफी अलग था। टेलीविजन न्यूज चैनल और अखबार राजनीतिक संवाद के प्रमुख माध्यम थे। उस दौर में पत्रकारों और संपादकों के साथ सीधे संवाद पर जोर दिया गया। इनमें ऐसे लोग भी शामिल थे, जो भाजपा संगठन का हिस्सा नहीं थे। गुजरात में खासकर वाइब्रेंट गुजरात जैसे आयोजनों के दौरान पत्रकारों और संपादकों को आमंत्रित किया जाता था।
इन आयोजनों के जरिए गुजरात को निवेश और विकास के गंतव्य के रूप में प्रस्तुत किया गया। साथ ही, मीडिया के जरिए गुजरात के विकास की कहानी को राष्ट्रीय दर्शकों तक पहुंचाने और घटनाओं पर सीधे अपनी बात रखने का अवसर भी मिला। मीडिया के साथ यह संवाद कई स्तरों पर काम करता था। पत्रकारों को राजनीतिक नेतृत्व तक पहुंच मिलती थी, गुजरात के विकास का नैरेटिव राष्ट्रीय स्तर पर पहुंचता था और नरेंद्र मोदी को घटनाओं पर अपनी व्याख्या सीधे रखने का अवसर मिलता था। राजनीतिक संचार को उन लोगों के साथ संबंधों से अलग नहीं किया जा सकता, जो राजनीति को जनता तक पहुंचाते हैं।
विकास बना राजनीतिक पहचान का हिस्सा: गुजरात के मुख्यमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी की राजनीतिक पहचान में विकास एक केंद्रीय विषय बन गया। निवेश सम्मेलन, बुनियादी ढांचा, औद्योगीकरण, शासन और प्रशासनिक दक्षता जैसे विषय गुजरात की सार्वजनिक छवि का हिस्सा बनते गए।
वाइब्रेंट गुजरात एक अंतरराष्ट्रीय मंच के रूप में महत्वपूर्ण हुआ, जहां राज्य ने निवेश और अपनी पहचान को सामने रखा। इस संचार रणनीति की खासियत यह थी कि एक ही आयोजन सरकारी कार्यक्रम, आर्थिक बैठक, मीडिया इवेंट और राजनीतिक संदेश का रूप ले सकता था। 2014 के बाद यह तरीका राष्ट्रीय स्तर पर कहीं ज्यादा व्यापक रूप में सामने आया।
संगठन और व्यक्तित्व का मेल: ‘Brand Modi’ को भाजपा के संगठन से अलग करके नहीं समझा जा सकता। आरएसएस कार्यकर्ता और भाजपा संगठनकर्ता के रूप में नरेंद्र मोदी ने नेटवर्क बनाने, कार्यकर्ताओं को जोड़ने और जमीनी स्तर पर राजनीतिक संचार को समझने का अनुभव हासिल किया।
बाद के दौर में अमित शाह के साथ उनकी साझेदारी भी महत्वपूर्ण रही। एक तरफ नरेंद्र मोदी का बेहद पहचान योग्य सार्वजनिक चेहरा था, तो दूसरी तरफ संगठन के पास ऐसा नेटवर्क था जो संदेश को दिल्ली से राज्यों, जिलों, गांवों और डिजिटल समुदायों तक पहुंचा सकता था। संगठन और व्यक्तित्व का यह मेल मोदी दौर की भाजपा राजनीति की महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक रहा।
‘मन की बात’: रेडियो से राष्ट्रीय संवाद तक: नरेंद्र मोदी की संचार रणनीति का सबसे प्रमुख उदाहरण ‘मन की बात’ है। डिजिटल दौर में सोशल मीडिया को राजनीतिक संवाद का प्रमुख माध्यम माना जा रहा था, लेकिन नरेंद्र मोदी ने रेडियो की पहुंच और प्रभाव को भी पहचाना। 2014 में शुरू हुआ ‘मन की बात’ प्रधानमंत्री और नागरिकों के बीच नियमित सीधे संवाद का माध्यम बना। बाद में पत्रों, फोन कॉल, मायगव के सुझावों, ऐप पर आने वाली प्रतिक्रियाओं और सोशल मीडिया प्रतिक्रियाओं को भी इस संवाद का हिस्सा बनाया गया।
2023 में कार्यक्रम के 100वें एपिसोड के समय आईआईएम रोहतक की एक स्टडी में बताया गया कि सर्वे में शामिल 96 प्रतिशत आबादी ‘मन की बात’ से परिचित थी और 100 करोड़ लोगों ने इसे कम से कम एक बार सुना था। इसी अध्ययन में 23 करोड़ नियमित श्रोताओं का अनुमान लगाया गया। ये आंकड़े कार्यक्रम की पहुंच और जागरूकता को मापते हैं, राजनीतिक समर्थन को नहीं। इस तरह पारंपरिक मीडिया को डिजिटल माध्यमों से अलग करने के बजाय उन्हें एक साथ इस्तेमाल किया गया। रेडियो, टेलीविजन, अखबार, वेबसाइट, मोबाइल एप्लिकेशन, सोशल मीडिया और सीधे सार्वजनिक संवाद एक व्यापक संचार व्यवस्था का हिस्सा बने।
बदलती राजनीतिक भाषा, कायम रही पहचान: ‘Brand Modi’ की एक और विशेषता यह रही कि समय के साथ राजनीतिक भाषा और सार्वजनिक छवि बदलती रही, लेकिन मूल पहचान बनी रही। अलग-अलग दौर में नरेंद्र मोदी की पहचान गुजरात के प्रशासक, विकास पर जोर देने वाले मुख्यमंत्री, भाजपा संगठनकर्ता, चुनाव प्रचारक, ‘चायवाला’, प्रधानमंत्री, तकनीक-केंद्रित नेता, राष्ट्रवादी कम्युनिकेटर और वैश्विक नेता के रूप में सामने आई। इन बदलती पहचानों के बीच व्यक्तिगत प्रयास, अनुशासन, राष्ट्रसेवा, सीधे संवाद, आम नागरिकों से जुड़ाव और भारत की सभ्यतागत एवं राष्ट्रीय पहचान पर जोर जैसे तत्व लगातार बने रहे।
एक राजनीतिक नेता जो लिखता है, वह अपनी कहानी को शब्दों में रख सकता है। जो मीडिया को समझता है, वह उस कहानी को लोगों तक पहुंचा सकता है। राजनीतिक संगठन उस संदेश को जमीनी स्तर तक ले जा सकता है और डिजिटल तकनीक उसे बहुत तेजी से बड़े स्तर पर पहुंचा सकती है। नरेंद्र मोदी की राजनीतिक यात्रा में ये चारों स्तर दिखाई देते हैं।
‘Brand Modi’ की जड़ें सोशल मीडिया से पहले की हैं: ‘Brand Modi’ को केवल सोशल मीडिया के दौर की उपज नहीं माना जा सकता। इसकी जड़ें गुजराती लेखन, राजनीतिक संगठन, आपातकाल के अनुभव, पत्रकारों के साथ संबंध, सार्वजनिक सभाओं और इस समझ में देखी जा सकती हैं कि संचार केवल भाषण देने का नाम नहीं है, बल्कि लोगों के साथ लगातार संबंध बनाने की प्रक्रिया है। ‘मन की बात’ इस सोच का एक प्रमुख उदाहरण है। इसमें रेडियो जैसे पुराने माध्यम को आधुनिक राजनीतिक संचार के मंच में बदला गया और टेलीविजन तथा डिजिटल मीडिया के जरिए उसका विस्तार किया गया।
नरेंद्र मोदी के साथ लंबे समय के जुड़ाव उनकी गुजराती और साहित्यिक रुचियों से लेकर उनकी पुस्तकों की भूमिकाओं और फिर ‘रिवोल्यूशनरी राज: नरेंद्र मोदीज 25 इयर्स’ तक—इस व्यापक यात्रा को देखने का एक व्यक्तिगत नजरिया भी देता है। यह कॉफी-टेबल बुक केवल तस्वीरों का संग्रह नहीं है, बल्कि नरेंद्र मोदी की राजनीतिक यात्रा को तस्वीरों, राजनीतिक घटनाओं और पत्रकारिता के अनुभवों के जरिए दर्ज करने का प्रयास है। अमित शाह की भूमिका व्यक्तिगत नेतृत्व और राजनीतिक संगठन के बीच एक कड़ी का काम करती है।
25 साल की इस यात्रा को केवल किसी एक नारे, चुनाव या माध्यम से नहीं समझा जा सकता। इसमें लेखक, आरएसएस संगठनकर्ता, भाजपा रणनीतिकार, गुजरात के मुख्यमंत्री, विकास के कम्युनिकेटर, मीडिया व्यक्तित्व, प्रधानमंत्री, रेडियो ब्रॉडकास्टर और डिजिटल दौर के राजनीतिक कम्युनिकेटर जैसे कई स्तर शामिल हैं।
नरेंद्र मोदी के जन्मदिन के मौके पर यह यात्रा उस बदलाव को भी सामने रखती है, जिसमें भारत में राजनीतिक संचार प्रिंट और व्यक्तिगत मीडिया संबंधों से आगे बढ़कर रेडियो, टेलीविजन, स्मार्टफोन और सीधे डिजिटल संवाद तक पहुंचा है। नरेंद्र मोदी के जन्मदिन पर मैं उन्हें शुभकामनाएं देता हूं। मेरी कामना है कि उन्हें भारत ही नहीं, बल्कि विश्व राजनीति में शांति और समाज की प्रगति के लिए भी बड़ी सफलता मिले।
(यह लेखक के निजी विचार हैं)
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन के मौके पर डॉ. अनुराग बत्रा लिखते हैं कि ‘ब्रैंड मोदी’ की 25 साल की यात्रा बड़े स्तर पर काम करने, निरंतरता और नेतृत्व के बारे में क्या सीख देती है।
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Samachar4media Bureau
डॉ. अनुराग बत्रा, चेयरमैन व एडिटर-इन-चीफ, एक्सचेंज4मीडिया ग्रुप ।।
“जब सपने और संकल्प ऊंचे होते हैं, तो हमारी क्षमता की ऊंचाई भी बढ़ जाती है।” — नरेंद्र मोदी
राजनीति में कुछ करियर होते हैं, कुछ नेतृत्व की विरासत बनते हैं और कुछ ऐसी पहचान बन जाते हैं, जिन्हें उस दौर से अलग करना मुश्किल हो जाता है, जिसमें वे काम कर रहे होते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसी तीसरी श्रेणी में आते हैं।
नरेंद्र मोदी के 76वें जन्मदिन के मौके पर दिलचस्प सवाल सिर्फ यह नहीं है कि वह कितने लंबे समय से भारतीय राजनीति के केंद्र में हैं। बड़ा सवाल यह है कि गुजरात से शुरू हुई एक राजनीतिक पहचान किस तरह राज्य प्रशासन से राष्ट्रीय राजनीति तक पहुंची, चुनावी रैलियों से अंतरराष्ट्रीय मंचों तक गई और शासन की भाषा से निकलकर उस भाषा का हिस्सा बनी, जिसके जरिए भारत खुद को दुनिया के सामने पेश कर रहा है।
7 अक्टूबर 2026 को नरेंद्र मोदी के गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में पहली बार पद संभालने के 25 साल पूरे हो जाएंगे। उन्होंने 7 अक्टूबर 2001 को मुख्यमंत्री पद संभाला था। इसके बाद 2014 में वह दिल्ली पहुंचे और प्रधानमंत्री बने। जून 2024 में उन्होंने लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री पद की जिम्मेदारी संभाली।
आज की सार्वजनिक जिंदगी में 25 साल बहुत लंबा समय होता है। इस दौरान कंपनियां खत्म हो जाती हैं, तकनीक पुरानी पड़ जाती है, लोगों की पसंद बदल जाती है, राजनीतिक मुद्दे बनते और खत्म होते हैं, नेतृत्व बदलता है और पूरे-पूरे उद्योग नई दिशा में चले जाते हैं, लेकिन मोदी की राजनीतिक पहचान ने अपना दायरा लगातार बढ़ाया है, जबकि उसके कुछ मूल तत्व लगातार बने रहे हैं। यही शायद ‘ब्रैंड मोदी’ की सबसे अहम कहानी है।
टिके रहने की ताकत
लंबे समय तक नेतृत्व में बने रहना सिर्फ मौजूद रहने का नाम नहीं है। असली चुनौती यह है कि आपके आसपास की दुनिया बदलती रहे और आप बदलते माहौल में प्रासंगिक बने रहें। 2000 के दशक की शुरुआत वाले गुजरात के मोदी और 2026 में देश का नेतृत्व कर रहे मोदी एक जैसे नहीं हो सकते। जिम्मेदारियां बढ़ी हैं, लोगों का दायरा बदला है और दुनिया की राजनीति भी काफी बदल चुकी है। फिर भी विकास, आकांक्षा, राष्ट्रीय पहचान, प्रशासन का बड़ा स्तर, तकनीक, सांस्कृतिक आत्मविश्वास और बदलाव जैसे कुछ विषय लगातार उनकी राजनीतिक भाषा में दिखाई देते हैं।
कारोबारी दुनिया के लिए भी इसमें एक सीख है। हर लंबे समय तक चलने वाली संस्था के सामने यही चुनौती होती है। बहुत ज्यादा बदलेंगे तो अपनी पहचान खो सकते हैं और बहुत कम बदलेंगे तो दुनिया आगे निकल सकती है। मोदी की राजनीतिक स्थिति ने बार-बार इन दोनों के बीच जगह बनाने की कोशिश की है।
परंपरा के साथ तकनीक, कल्याण योजनाओं के साथ आकांक्षाएं, सांस्कृतिक पहचान के साथ वैश्विक महत्वाकांक्षा और स्थानीय राजनीतिक समझ के साथ अंतरराष्ट्रीय पहचान—इन सभी को एक साथ रखने की कोशिश दिखाई देती है। यही संतुलन उनकी राजनीतिक पहचान को समझने में अहम है।
क्रिएटर, प्रिजर्वर और डिसरप्टर
मोदी के नेतृत्व मॉडल को समझने का एक और तरीका है—उसे तीन भूमिकाओं में देखना। क्रिएटर, प्रिजर्वर और डिसरप्टर। यह किसी धार्मिक तुलना के तौर पर नहीं, बल्कि नेतृत्व को समझने के एक तरीके के तौर पर देखा जा सकता है।
क्रिएटर यानी ऐसी चीज तैयार करना, जो पहले उस रूप में मौजूद नहीं थी। मोदी के मामले में इसका उदाहरण एक ऐसी व्यक्तिगत और बड़े पैमाने वाली राजनीतिक संचार शैली के रूप में देखा जा सकता है, जिसमें सीधे संवाद, तकनीक, बड़े सार्वजनिक मंच और बार-बार दोहराए जाने वाले स्पष्ट संदेशों का इस्तेमाल होता है।
प्रिजर्वर यानी उन चीजों को बनाए रखना, जिन्हें लोग अपनी पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा मानते हैं। मोदी की राजनीतिक भाषा में भारतीय सभ्यता, परंपरा, सांस्कृतिक प्रतीकों और राष्ट्रीय पहचान की बात लगातार दिखाई देती है। इसी के साथ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, सेमीकंडक्टर, डिजिटल भुगतान, बुनियादी ढांचे और विकसित भारत जैसे विषय भी सामने आते हैं।
इसके बाद आता है डिसरप्टर यानी पुरानी धारणाओं को चुनौती देना। मसलन, यह धारणा कि तकनीक मुख्य रूप से शहरों में रहने वाले संपन्न लोगों तक सीमित है। या यह सोच कि बड़े पैमाने पर कल्याण योजनाओं और डिजिटल व्यवस्था को एक साथ नहीं चलाया जा सकता। इसी तरह विदेशों में भारतीय राजनीतिक संवाद के पारंपरिक तरीके से अलग बड़े और व्यापक सार्वजनिक कार्यक्रम भी देखने को मिले।
यह बदलाव की एक अहम सोच को दिखाता है। बदलाव सिर्फ कुछ नया बनाने का नाम नहीं है। कई बार बदलाव की शुरुआत यह तय करने से होती है कि पुरानी सीमा को अब सीमा मानने की जरूरत नहीं है।
‘स्केल’ है ब्रैंड मोदी की बड़ी भाषा
अगर मोदी के दौर से जुड़ा एक शब्द चुना जाए तो वह ‘स्केल’ यानी बड़े स्तर पर काम करना हो सकता है।
वित्तीय समावेशन को ही देखें। अगस्त 2026 तक प्रधानमंत्री जनधन योजना के तहत 59.09 करोड़ खाते खोले जा चुके थे। वित्त मंत्रालय के मुताबिक, इनमें 55.7 फीसदी खाताधारक महिलाएं थीं और 77.8 फीसदी खाते ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों में थे।
डिजिटल भुगतान की बात करें तो अगस्त 2026 में यूपीआई के जरिए 24.51 अरब लेनदेन हुए, जिनकी कुल कीमत करीब 29.82 लाख करोड़ रुपये रही। यह यूपीआई के जरिए एक महीने में हुए लेनदेन का रिकॉर्ड स्तर था। इन योजनाओं को लेकर अलग-अलग राजनीतिक और नीतिगत नजरिए हो सकते हैं, लेकिन प्रबंधन के नजरिए से एक बात साफ दिखाई देती है- भारत में किसी भी विचार को बहुत बड़े स्तर पर काम करने की चुनौती से गुजरना पड़ता है।
10 हजार लोगों के लिए काम करने वाला समाधान एक प्रयोग हो सकता है। 10 लाख लोगों तक पहुंचने वाला समाधान एक बड़ी उपलब्धि बन जाता है। लेकिन जब कोई व्यवस्था करोड़ों लोगों के लिए बनाई जाती है तो मामला सिर्फ योजना का नहीं रहता, बल्कि पूरी व्यवस्था तैयार करने का हो जाता है। मोदी के दौर में इस बड़े पैमाने को भारत की अंतरराष्ट्रीय पहचान से जोड़ने की कोशिश भी हुई है।
2023 के जी20 शिखर सम्मेलन में डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढांचे को नई दिल्ली नेताओं की घोषणा में जगह मिली। इसमें ऐसे डिजिटल सिस्टम की क्षमता को सेवा पहुंचाने और बड़े स्तर पर नवाचार में उपयोगी माना गया। यहीं घरेलू नीतियां वैश्विक पहचान से जुड़ने लगती हैं। बात सिर्फ यह कहने की नहीं रह जाती कि ‘देखिए हमने क्या बनाया।’ बल्कि संदेश यह बनता है कि ‘देखिए, हमारे जैसे बड़े स्तर पर क्या बनाया जा सकता है।’
स्थानीय नेता से वैश्विक मंच तक
मोदी के अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक संवाद ने भी भारतीय प्रधानमंत्रियों की पारंपरिक सार्वजनिक छवि से अलग एक नया तरीका दिखाया। 2014 में न्यूयॉर्क के मैडिसन स्क्वायर गार्डन में उनके भारतीय समुदाय के कार्यक्रम में 18 हजार से ज्यादा लोग शामिल हुए थे। इसके पांच साल बाद ह्यूस्टन में हुए ‘हाउडी मोदी’ कार्यक्रम में 50 हजार से ज्यादा लोगों की मौजूदगी रही। इन कार्यक्रमों की अहमियत सिर्फ भीड़ की संख्या में नहीं थी। इनके जरिए भारतीय प्रवासी समुदाय को भारत की वैश्विक राजनीतिक मौजूदगी के एक बड़े हिस्से के रूप में पेश किया गया।
प्रधानमंत्री अब सिर्फ राजनयिकों से मुलाकात, संसदों में भाषण या अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में हिस्सा लेने तक सीमित नहीं थे। भारतीय राजनीतिक संवाद खुद एक बड़े अंतरराष्ट्रीय मंच का हिस्सा बनता दिखाई दिया। यहीं मोदी की वैश्विक पहचान कुछ अलग नजर आती है।
योग और डिजिटल सार्वजनिक ढांचे की बात, भारतीय सभ्यता और सेमीकंडक्टर की महत्वाकांक्षा, मंदिर और तकनीक, ग्लोबल साउथ और वैश्विक निवेश- इन सभी विषयों को एक ही व्यापक राजनीतिक कहानी में जोड़ा गया। परंपरा और आधुनिकता को एक-दूसरे के विरोध में रखने के बजाय उन्हें एक-दूसरे के साथ जोड़ने की कोशिश की गई। यही ‘ब्रैंड मोदी’ के केंद्र में दिखाई देने वाला संतुलन है।
समावेश को व्यवस्था का हिस्सा बनाना
मोदी की राजनीतिक पहचान को बड़े स्तर पर बनाने में एक और चीज महत्वपूर्ण रही है- समावेशन को सिर्फ कल्याण योजना के रूप में नहीं, बल्कि लोगों को व्यवस्था से जोड़ने के रूप में पेश करना। जैसे- एक बैंक खाता, एक डिजिटल पहचान, एक मोबाइल कनेक्शन, एक भुगतान व्यवस्था और सीधे लाभ पहुंचाने की व्यवस्था।
जी20 की भारत की अध्यक्षता के दौरान भी डिजिटल सार्वजनिक ढांचे को समावेशी विकास के एक माध्यम के तौर पर सामने रखा गया और भारत के अनुभव को दूसरे विकासशील देशों के लिए उपयोगी बताया गया। इससे समावेशन का मतलब भी बदलता है। यह सिर्फ लोगों तक सहायता पहुंचाने की बात नहीं रह जाती, बल्कि उन्हें व्यवस्था में शामिल करने की बात बन जाती है। जितने ज्यादा लोग व्यवस्था से जुड़ते हैं, व्यवस्था का आकार उतना ही बड़ा होता जाता है।
कॉरपोरेट जगत के लिए भी इसमें एक महत्वपूर्ण सीख है। अगले एक अरब उपभोक्ताओं को सिर्फ पहले 10 करोड़ उपभोक्ताओं का छोटा रूप मानकर नहीं देखा जा सकता। उत्पाद, भुगतान व्यवस्था, वितरण, इंटरफेस और कीमतों को बड़े स्तर पर लोगों की भागीदारी को ध्यान में रखकर तैयार करना होगा।
लगातार एक जैसी पहचान की ताकत
राजनीति में ‘बैंकएबिलिटी’ का मतलब कारोबार से अलग है। यह उस भरोसे से जुड़ा है कि किसी खास नाम के सामने आने पर लोगों को मोटे तौर पर पता होता है कि उस नाम से किस तरह की राजनीतिक सोच और संदेश जुड़े हैं।
आज की भारतीय राजनीति में मोदी की पहचान लगातार दोहराए गए संदेशों और एक तय राजनीतिक भाषा के साथ बनी है। समय के साथ शब्द बदले हैं। महत्वाकांक्षाएं बढ़ी हैं। चुनावी अभियान बदले हैं। सरकार की प्राथमिकताएं भी बदली हैं। लेकिन विकास, बदलाव, राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा और बड़े भविष्य की ओर बढ़ने की बात लगातार दिखाई देती रही है। इस निरंतरता का असर चुनावी राजनीति में भी दिखाई दिया। मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने 2014 और 2019 में केंद्र में सरकार बनाई और 2024 में एनडीए गठबंधन के नेतृत्व में उन्होंने तीसरी बार प्रधानमंत्री पद संभाला। लेकिन लंबे समय तक किसी राजनीतिक पहचान को बनाए रखने के लिए सिर्फ चुनावी सफलता काफी नहीं होती। उसके लिए लगातार भविष्य की एक नई तस्वीर भी सामने रखनी पड़ती है।
भविष्य इस कहानी का अहम हिस्सा है
मोदी के संचार की एक खास बात यह रही है कि कहानी अक्सर वर्तमान पर खत्म नहीं होती। आगे का कोई न कोई लक्ष्य हमेशा दिखाई देता है। जैसे- डिजिटल इंडिया, मेक इन इंडिया, स्टार्टअप इंडिया, विकसित भारत, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, मैन्युफैक्चरिंग, बुनियादी ढांचा, ग्लोबल साउथ में भारत की बड़ी भूमिका और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की ज्यादा दिखाई देने वाली मौजूदगी। यानी मंजिल लगातार आगे बढ़ती रहती है।
सीईओ, संस्थापक और संस्थाएं बनाने वाले लोगों के लिए मोदी की यात्रा से एक महत्वपूर्ण बात समझी जा सकती है। नेतृत्व सिर्फ आज की जरूरतें पूरी करने का नाम नहीं है। इसमें निरंतरता बनाए रखना और लोगों को अगले अध्याय के लिए उत्साहित रखना भी शामिल है। यही हमें फिर उन तीन भूमिकाओं पर ले आता है- क्रिएटर, प्रिजर्वर, डिसरप्टर।
नई संभावना तैयार करना, लोग जिस पहचान को जानते हैं, उसे बनाए रखना और यह चुनौती देना कि जो स्तर अभी तक सबसे बड़ा माना जाता था, वही आखिरी सीमा है।
नरेंद्र मोदी के मुख्यमंत्री के रूप में पहली बार पद संभालने के 25 साल पूरे होने के मौके पर उनकी राजनीतिक पहचान को सिर्फ एक चुनाव, एक योजना, एक नारे या एक दौर तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। इसकी कहानी लगातार अपना दायरा बढ़ाने की कोशिश में दिखाई देती है। गुजरात से दिल्ली तक, राष्ट्रीय राजनीति से वैश्विक मंच तक, कल्याण योजनाओं से डिजिटल बुनियादी ढांचे तक, सभ्यता और संस्कृति की भाषा से तकनीकी महत्वाकांक्षा तक।
अगर ‘ब्रैंड मोदी’ को सिर्फ एक नेतृत्व केस स्टडी के तौर पर देखा जाए तो दिलचस्प बात सिर्फ यह नहीं है कि यह पहचान इतने लंबे समय तक बनी रही। दिलचस्प बात यह है कि जैसे-जैसे मंच बड़ा होता गया, यह पहचान भी खुद को उस बड़े मंच के मुताबिक ढालती गई।
“सुधार करके व्यवस्था को आसान बनाओ, काम करके नतीजे दो और बदलाव के जरिए असर पैदा करो।” — नरेंद्र मोदी
संदेश के अंत में सुधीर चौधरी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जन्मदिन की शुभकामनाएं देते हुए उन्हें ‘India’s pride’ बताया।
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वरिष्ठ पत्रकार सुधीर चौधरी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को उनके जन्मदिन पर खास अंदाज में शुभकामनाएं दी हैं। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (X) पर अपने संदेश में नरेंद्र मोदी के वडनगर से वाराणसी तक के सफर का जिक्र किया और चाय की दुकानों से लेकर सेमीकंडक्टर के सपनों तक की यात्रा को याद किया।
सुधीर चौधरी ने अपने संदेश में जनधन, UPI, GST, अनुच्छेद 370, CAA, तीन तलाक, सर्जिकल स्ट्राइक, बालाकोट, राम मंदिर, महिला आरक्षण और नए संसद भवन का जिक्र किया। इसके साथ ही उन्होंने G20, मेक इन इंडिया, स्पेस और सेमीकंडक्टर जैसे विषयों को भी अपने पोस्ट में शामिल किया।
उन्होंने लिखा कि कुछ फैसलों ने इतिहास बनाया, कुछ ने सुर्खियां बटोरीं और कुछ ने विपक्ष को निश्चित तौर पर अतिरिक्त मेहनत करने पर मजबूर किया। संदेश के अंत में सुधीर चौधरी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जन्मदिन की शुभकामनाएं देते हुए उन्हें ‘India’s pride’ बताया।
From Vadnagar to Varanasi, from tea stalls to semiconductor dreams - what a journey!
— Sudhir Chaudhary (@sudhirchaudhary) September 17, 2026
Jan Dhan, UPI, GST,
Article 370, CAA, Triple Talaq,
Surgical strikes, Balakot,
Ram Mandir, Women’s Reservation, New Parliament.
G20, Make in India, Space, Semiconductors…
Some decisions made… pic.twitter.com/CDut7YQPss
कालजयी कवियों, लेखकों, भक्तों, विद्वानों ने हिंदी भाषा और साहित्य को नई ऊंचाई दी विस्तार दिया और लोकप्रिय बनाया। हिंदी संघर्ष और स्वतंत्रता आंदोलन की भाषा बनी।
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विनोद अग्निहोत्री,
सलाहकार संपादक, अमर उजाला।।
आज हिंदी दिवस है। हर साल की तरह इस बार भी हिंदी के प्रचार प्रसार के दावों और वादों के साथ देश में सरकारी गैर सरकारी कार्यक्रम आयोजित हैं। रविवार की छुट्टी होने के कारण इस बार सरकारी दफ़्तरों में हिंदी में कामकाज का ढोंग नहीं हो पा रहा है वरना एक दिन के लिए ये भी हो जाता और साल भर के लिए हिंदी के प्रयोग को विदा कह दिया जाता।
हिंदी की स्वीकार्यता और प्रसार में दो तीन बड़ी बाधायें हैं। पहली हिंदी को कथित सरकारी सरंक्षण जिसने हिंदी को न सिर्फ़ सरकारों पर आश्रित बना कर उसे वैसा लाड़ला बच्चा बना दिया जिसकी संघर्ष क्षमता कमजोर पड़ती है साथ ही वो दूसरों की ईर्ष्या का पात्र भी बनता है। हिंदी के साथ यही हुआ। कथित सरकारी सरंक्षण ने उसे सरकारी कामकाज और संस्थानों में अनुवाद की भाषा बना कर उसके विकास को पंगु कर दिया और अन्य भारतीय भाषा भाषी उसे अपने ऊपर थोपे जाने के भय से उसके अकारण विरोधी हो गये। सरकारी शब्दकोषीय अनुवाद की भाषा ने हिंदी के प्रयोग को दुरूह और अरुचिकर बना दिया।
इसके साथ ही कथित सरकारी सरंक्षण ने हिंदी के विकास के नाम पर भाषायी ठेकेदारों की ऐसी जमात भी पैदा की जो सरकारी अनुदानों पद और सम्मानों के लिए हिंदी की नहीं अपनी चिंता गुटबाज़ी में उलझे रहे। इसने हिंदी को कई मठों में बदल दिया और हिंदी क्षेत्र की बोलियों और भाषाओं की अस्मिता भी हिंदी से टकराने लगी। उनके समर्थकों का आग्रह हिंदी से ज़्यादा अपनी बोलियों और भाषाओं को मान्यता दिलाने के लिए हो गया। जब देश में मुस्लिम बादशाहों और अंग्रेजों का राज था तब हिंदी स्वाभाविक और सहज ढंग से फूली फली।
कालजयी कवियों, लेखकों, भक्तों, विद्वानों ने हिंदी भाषा और साहित्य को नई ऊंचाई दी विस्तार दिया और लोकप्रिय बनाया। हिंदी संघर्ष और स्वतंत्रता आंदोलन की भाषा बनी। गांधी, पटेल, सुभाष, नेहरू जैसे नेताओं ने हिंदी को संवाद और संप्रेषण की भाषा के रूप में स्वीकार किया। अनेक कालजयी रचनाओं ने हिंदी और हिंदी क्षेत्र की बोलियों और भाषाओं को एक सूत्र में पिरोया।
अन्य भारतीय भाषाओं के साथ हिंदी का स्वाभाविक रिश्ता बना। कोई टकराव नहीं बहनों जैसा प्रेम विकसित होने लगा। ये सिलसिला आज़ादी के कुछ वर्षों तक जारी रहा। लेकिन जैसे-जैसे हिंदी को सरकारी सरकारी सरंक्षण और उसे राष्ट्रभाषा बनाने का आग्रह बढ़ा हिंदी का विरोध और उसकी दुर्दशा का दौर भी शुरू हो गया। भाषाई राजनीति और मठवाद ने हिंदी को सिर्फ़ हिंदी क्षेत्र की भाषा में बदल दिया और रही सही कसर बाज़ार की भाषा के नाम पर शुरू हुए हिंग्लिश के प्रयोग ने हिंदी को बाजारू भाषा में बदलना शुरू कर दिया।
हिंदी के सहज शब्दों की जगह ज़बरन अंग्रेज़ी के शब्दों को ठूँसने से भाषा का वर्ण संकरीकरण होने लगा।बचाव की जगह रेस्क्यू और विस्फोट या धमाके की जगह ब्लास्ट जैसे शब्दों का प्रयोग इसका उदाहरण है। हिंदी की रचनाओं को अंग्रेज़ी रचनाओं की तुलना में कमतर मानना अंग्रेज़ी ज्ञान से ज़्यादा अंग्रेज़ीयत झाड़ना हिंदी भाषी मध्यवर्ग की आम प्रवृत्ति है। जब तक हिंदी क्षेत्र इस हीन भावना से मुक्त होकर बिना सरकारी सरंक्षण के हिंदी के समृद्ध रचना संसार को अपनी पूँजी और थाती नहीं बनाता तब तक कितने भी हिंदी दिवस मना लीजिए हिंदी की दशा नहीं सुधरेगी।
इसकी पहल हिंदी भाषियों को अपने घरों परिवारों से करनी होगी। अपने घरों परिजनों के साथ बोलचाल पठन पाठन में हिंदी का प्रयोग बेहिचक करना होगा। बच्चे अंग्रेज़ी और अन्य भाषायें सीखें पर हिंदी न छोड़ें। हिंदी अख़बार पढ़ें हिंदी साहित्य जानें और हिंदी में कामकाज में हीनता नहीं गौरव का भाव रखें। सिर्फ़ मजबूरी में सब्ज़ी वाले रिक्शे वाले से हिंदी में बात न करें बल्कि जब तक मजबूरी और ज़रूरी न हो अंग्रेज़ी न बोलें। हिंदी भाषियों से हिंदी में ही बात करें। अपने अध्ययन कक्ष में तुलसी कबीर प्रेमचंद प्रसाद दिनकर समेत सभी हिंदी के महान रचनाकारों की रचनाएँ प्रमुखता से रखें।
हिंदी क्षेत्र की बोलियों भाषाओं को हिंदी के मुक़ाबले खड़ा करने की बजाय उन्हें सहोदरी बनायें।जिस दिन से हम हिंदी भाषी ये सब करने लगेंगे तब हिंदी को किसी सरकारी सरंक्षण दिवस मनाने की ज़रूरत नहीं रहेगी। वरना मानते रहिए हिंदी दिवस का कर्मकांड। वैसे भी पितृ पक्ष चल रहा है जो कर्मकांड का ही समय है। आख़िर में हिंदी कर्मकांड दिवस की बधाई।
(यह लेखक के निजी विचार हैं)
गणेश जी के बड़े कान इस बात की गवाही हैं कि वे हर बात को ध्यान से सुनते हैं। सुनना एक साधना है। ध्यान से सुनना उससे बड़ी साधना है। उन्होंने श्रवण कौशल को साध लिया है।
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प्रो.संजय द्विवेदी, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल के जनसंचार विभाग के अध्यक्ष।
भारतीय संस्कृति अपने नायकों, प्रतीकों और उनकी कथाओं से जीवन रस लेकर ही आज तक प्राणवान है। जीवंत है। उसके नायक चिरयुवा हैं और संकटों से जूझकर सुंदर दुनिया बनाने की आकांक्षा से भरे-पूरे हैं। राम, कृष्ण, शिव, गणेश और ऐसे न जाने कितने देव हमें प्रेरित करते हैं। सबका जीवन सरल नहीं है। सब जूझते हैं और समाधान पाते हैं। आदर पाते हैं। लोकमंगल ही सबका ध्येय है। इन सबमें श्री गणेश की महिमा सबसे अलग है। गणेश चतुर्थी के प्रसंग पर उनकी पूजा के साथ यह जानना जरूरी है कि आखिर उनमें ऐसा क्या खास है, जो उन्हें सबसे अलग बनाता है।
वे असाधारण संचारकर्ता और कुशल प्रबंधक की तरह हमारे सामने आते हैं। गणेश जी के बड़े कान इस बात की गवाही हैं कि वे हर बात को ध्यान से सुनते हैं। सुनना एक साधना है। ध्यान से सुनना उससे बड़ी साधना है। उन्होंने श्रवण कौशल को साध लिया है। दूसरों को ध्यान से सुने बिना न आप समझ सकते हैं, न ही उचित निदान तक पहुंच सकते हैं। फैसले लेने हों या न लेने हों, सुनना तो पड़ेगा। गणेश जी ने इसे साध लिया है।
इसलिए उन्हें विघ्नहर्ता कहा गया, वे सुनकर हमारी समस्याओं का हल करने की क्षमता से लैस हैं। नजर से ही नजरिया बनता है। आंखें सबके पास होती हैं, किंतु दृष्टि सबके पास नहीं होती। सूक्ष्म विश्लेषण का गुण ऐसे ही अर्जित नहीं होता। संकट या सामान्य दिनों में भी बारीक और पैनी नजर रखना व्यक्ति का विलक्षण गुण है। गणेश जी इसी गुण से समादृत हुए। उनकी छोटी आंखें पैनी नजर और तीक्ष्ण एकाग्रता का प्रतीक हैं। वे किसी भी संकट का सूक्ष्म विश्लेषण करते हैं। श्री गणेश समय के साथ चलते हैं। मौके पर वे अनुकूलन कर लेते हैं और लचीलापन उनका स्वभाव है।
कलाकारों को देखिए, वे उनकी कितनी तरह की प्रतिमाएं बनाते हैं। उनका व्यक्तित्व ऐसा है कि उनमें प्रयोग संभव है। उनकी लचीली सूंड यह बताती है कि एक अच्छा कम्युनिकेटर (संचारक) कभी भी अपने रवैये में कठोर नहीं होता। लचीलापन, स्वीकार्यता और समावेशिता उसका मूल गुण है। समय और वातावरण को पहचान कर आचरण ही एक सफल संचारक की पहचान होती है। लोगों को प्रभावित करने में वे इसीलिए सफल होते हैं। आप देखें तो गणेश जी सकारात्मक संचार करते हैं। उनकी सर्वाधिक प्रतिमाएं इसलिए भेंट की जाती हैं, क्योंकि वे शुभ और सकारात्मकता का संचार करती हैं।
कम से कम संसाधनों के उपयोग से वे बेहतर जिंदगी का पाठ पढ़ाते हैं। उनके माता-पिता पूज्य शिव और मां पार्वती उनके सामने ब्रह्मांड का चक्कर लगाने की शर्त रखते हैं तो कार्तिक अपने तेज वाहन मयूर से तत्काल यात्रा पर निकल जाते हैं। किंतु श्री गणेश अपनी अप्रतिम बुद्धिमत्ता और सीमित संसाधनों के प्रयोग के संकल्प पर कायम रहते हुए अपने वाहन मूषक (चूहा) की सीमाओं को भी समझते हुए 'आउट ऑफ बॉक्स' निर्णय लेते हैं। वे अपने माता-पिता की परिक्रमा करके ही स्मार्ट वर्क और रिसोर्स मैनेजमेंट का उदाहरण देते हैं।
ऐसे कौशल ने उन्हें अप्रतिम बना दिया। वे रुकना नहीं जानते, निरंतर काम पर हैं। बाधाएं आती हैं तो आएं, इससे वे प्रभावित नहीं होते। महाभारत लिखने की कथा को आप याद करें। उस समय महर्षि वेदव्यास तेज गति से बोल रहे थे। गणेश जी उनके सहयोगी लेखक हैं। उनकी लेखनी (कलम) टूट जाती है। वे पल भर का समय नहीं देखते। तत्काल अपना एक दांत तोड़कर लिखना प्रारंभ कर देते हैं। इसलिए उनको 'एकदंत' के रूप में भी पूजा जाता है। अपनी समय सीमा में रहते हुए काम को वक्त पर पूरा करना ऐसी ही प्रतिबद्धता है, जिसके वे उदाहरण बने।
अपने ऐसे प्रबंधकीय और लेखकीय गुणों से उन्होंने मानवता की सेवा की। वे सब करते हैं। सब जानते हैं। संकटों के समाधान का रास्ता बताने वाले हैं, किंतु सबके प्रिय गणेश जी कभी भी अपनी जमीन नहीं छोड़ते। पद और ज्ञान का अहंकार उन्हें छू तक नहीं गया है। वे जो हैं, वह होना कठिन है। उनका विशाल शरीर है, वे असीम बुद्धिमत्ता से भरे हैं। इसके बाद भी वे छोटे से वाहन मूषक पर चल रहे हैं। आज जरा सी पद-प्रतिष्ठा पाते ही लोग बड़े वाहनों पर चलने लगते हैं। हवाई यात्राओं में ही उनका जीवन और समय बीतता है। गणेश जी के पास सब कुछ है।
लक्ष्मी साथ ही विराजमान हैं, किंतु वे अपने पुराने वाहन और पुराने सहयोगियों को नहीं भूलते। अहंकार उनके आसपास भी नहीं है। लोगों का मंगल करते हुए, लोगों के कष्ट दूर करते हुए वे सतत प्रवास करते हैं। संवाद करते हैं। उनका बड़ा उदर (पेट) साधारण नहीं है। वे सब कुछ पचा जाते हैं। समाज और संगठन में हो रही हर अच्छी-बुरी बातों को संभालते हैं। उनका बड़ा पेट इस बात को बताता है कि कैसे लीडर को काम करना चाहिए। किस तरह उसको बिना विचलित हुए बहुत सारी निंदा, आलोचना और सुझावों को आत्मसात करते हुए पचा जाना चाहिए।
वे निरंतर परिशुद्ध होते जाते हैं। समस्याओं का समाधान करते हुए लोकमंगल का व्रत निभाते हुए। वे कड़े भी हैं, सरल भी। उनके हाथ में अंकुश भी है और पाश भी है। वे जानते हैं कि कब उन्हें कठोर होना है और कब सामान्य जनों को अपने प्रेम पाश में बांध कर रखना है। इसलिए देखिए तो गणेश जी बच्चों के सबसे प्रिय देवता हैं, वे अपने से लगते हैं। तो श्रेष्ठ जनों में उनको लेकर अलग पूज्य भाव दिखते हैं। इस तरह गणेश जी का कवरेज एरिया बहुत व्यापक है। गणेश जी संकटों से घबराते नहीं, रास्ता दिखाते हैं। वे ही हैं जिन्हें विघ्नहर्ता कहा गया।
'रिस्क मैनेजमेंट' उनकी विशेषज्ञता का क्षेत्र है। उनको समाधान ही दिखते हैं, संकट नहीं। वे संकट को भांपकर उपयुक्त समाधान देते हैं। विविधता की स्वीकार्यता उनका गुण है। वे अपने पिता शिव के समस्त गणों से भी संवाद रखते हैं, जिनमें भूत, प्रेत, पशु, देवता सभी शामिल हैं। इतने विविध समुदायों से संवाद और उनका साहचर्य प्राप्त करते हुए वे विविधता को साधने वाले देवता बन जाते हैं, जिनके लिए कोई भी अलग नहीं है, पराया नहीं है। सभी उनके हैं।
महान प्रबंधक कैसे विविध लोगों को साधते हैं, गणेश इसके उदाहरण हैं। वे माता-पिता दोनों के प्रिय हैं। दुलारे हैं। वे सभी के लिए गणपति हैं। सभी उन्हें प्रथम पूज्य मानते हैं। अपने जीवन के आरंभ में ही हुई महान दुर्घटना से उन्होंने खुद को उबार लिया। उसका दुख उन्होंने कभी प्रकट नहीं किया। वे बताते हैं, जिंदगी रुकती नहीं, आगे भी चलती है। आइए, हम अपने देवों की सिर्फ प्रतीकात्मक पूजा न करें, बल्कि उनके जीवन से सीखें भी और अनुसरण भी करें।
( यह लेखक के निजी विचार हैं )
हिंदी आज भी अंग्रेजी की छाया में जीने को मजबूर है, कभी उसकी अधीन बनकर, तो कभी उसकी सहायिका बनकर।
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Samachar4media Bureau
आज जब हम हिंदी दिवस मना रहे हैं, यह सवाल बार-बार दिल और दिमाग में गूंजता है कि स्वतंत्रता के इतने दशकों बाद भी हिंदी को उसका वास्तविक स्थान क्यों नहीं मिला। यह वही हिंदी है, जिसने करोड़ों लोगों को जोड़ने का सेतु बनाया, जिसने हमारी मिट्टी की खुशबू और हमारी संस्कृति की आत्मा को दुनिया तक पहुंचाया। लेकिन अफसोस की बात यह है कि वही हिंदी आज भी अंग्रेजी की छाया में जीने को मजबूर है, कभी उसकी अधीन बनकर, तो कभी उसकी सहायिका बनकर।
नीति-नियंताओं ने हमेशा हिंदी को सम्मान देने और उसके प्रचार-प्रसार की बात जरूर की, लेकिन उनके प्रयास अधूरे ही रहे। हकीकत यह है कि हिंदी ने हमारे समाज और अर्थव्यवस्था को सहारा दिया, रोजगार दिया, उद्योगों को खड़ा किया, लेकिन स्वयं अपने हक से वंचित रही। हिंदी फिल्मों से लेकर हिंदी पत्रकारिता और मीडिया उद्योग तक- सबकी नींव हिंदी पर खड़ी है। इनसे करोड़ों लोगों की रोजी-रोटी चल रही है, फिर भी विडंबना यह है कि हिंदी आज तक राष्ट्रभाषा का दर्जा नहीं पा सकी।
प्रिंट, टीवी या डिजिटल- मीडिया का हर माध्यम हिंदी की ताकत से फल-फूल रहा है, लेकिन संवैधानिक रूप से हिंदी आज भी राजभाषा होकर एक “सहायिका” भर है। यह स्थिति हर उस भारतीय को चुभती है, जो अपनी मातृभाषा को सिर्फ संवाद का नहीं, बल्कि आत्मसम्मान का प्रतीक मानता है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हिंदी को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पहचान और सम्मान दिलाने का जो साहसिक कदम उठाया है, वह काबिले-तारीफ है। लेकिन असली सवाल यही है कि क्या यही सरकार आने वाले समय में हिंदी को राष्ट्रभाषा का संवैधानिक दर्जा दिलाने की हिम्मत दिखाएगी? अगर इस हिंदी दिवस पर यह बड़ा फैसला हो जाता है, तो न सिर्फ हिंदी दिवस सफल होगा बल्कि यह देश के हर उस दिल को तसल्ली देगा, जो वर्षों से हिंदी के हक की प्रतीक्षा कर रहा है।
समाचार4मीडिया ने इस अवसर पर मीडिया में हिंदी की बदलती भूमिका पर विशेष आलेखों का संग्रह प्रस्तुत किया है। यह प्रयास केवल लेखों का संग्रह नहीं है, बल्कि हिंदी के उत्थान और उपेक्षा के बीच के संघर्ष का आईना है। उद्देश्य यही है कि पाठकों तक हिंदी की ताकत, उसकी चुनौतियां और उसके भविष्य की दिशा एक ही मंच पर पहुंच सके।
जैकब की आशंका पर Anthropic के CEO और फाउंडर डारियो अमोडेई ने भी एक तरह से मुहर लगा दी है। उन्होंने जैकब के आरोपों पर सीधे जवाब तो नहीं दिया।
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Samachar4media Bureau
मिलिंद खांडेकर, वरिष्ठ पत्रकार।
Artificial Intelligence (AI) ने चार साल में हमारी दुनिया बदल कर रख दी है। कभी वो गणित के अनसुलझे सवालों को सुलझा लेता है तो कभी हमारी नौकरी खाने पर आ जाता है। अब Anthropic AI के रिसर्चर ने यह कहकर इस्तीफा दिया है कि AI दस साल में मानवता को खत्म कर सकता है। इस दावे से सनसनी फैल गई है कि क्या AI की अंधी दौड़ में सावधानी से मुंह मोड़ लिया जा रहा है? हिसाब-किताब AI के खतरे का।
जैकब कॉक्सन Anthropic (Claude) में रिसर्च का काम करते थे। यह कंपनी दावा करती रही है कि OpenAI (ChatGPT) के मुकाबले ज्यादा जिम्मेदार है, बल्कि Claude बनाने वाले डारियो अमोडेई ने OpenAI को यह कहकर छोड़ा था कि वो पैसे बनाने के लिए जल्दबाजी कर रही है। जैकब भी OpenAI में काम कर चुके हैं। उन्होंने Anthropic से पिछले हफ्ते इस्तीफा दे दिया। उनका आरोप है कि मानवता पर खतरे को लेकर AI कंपनियां गंभीर नहीं हैं।
जैकब की आशंका पर Anthropic के CEO और फाउंडर डारियो अमोडेई ने भी एक तरह से मुहर लगा दी है। उन्होंने जैकब के आरोपों पर सीधे जवाब तो नहीं दिया है, लेकिन उन्होंने AI के खतरे पर ब्लॉग लिखा है। उन्होंने AI कंपनियों से अपील की है कि डेवलपमेंट के काम को धीमा करें। AI के खतरे को देखकर सुरक्षा चाक-चौबंद की जानी चाहिए, वरना 6 से 12 महीनों में AI एजेंट का झुंड इंटरनेट को ठप करने की ताकत रखता है। OpenAI के फाउंडर सैम अल्टमन और xAI के फाउंडर एलन मस्क ने डारियो का समर्थन किया है।
डारियो के ब्लॉग से पहले Anthropic की सुरक्षा रिपोर्ट भी आई है। रिपोर्ट में बताया गया है कि Claude AI का दुरुपयोग करने की कोशिश कैसे और कहाँ की गई है। Claude की मदद से Bio Weapon बनाने की कोशिश भी हुई है। चिकनगुनिया और एवियन इन्फ्लूएंजा वायरस के साथ छेड़छाड़ की गई थी। इसका इस्तेमाल बीमारी फैलाने के लिए हो सकता था। मतलब मानवता को नष्ट करने की कोशिश में AI की मदद लेने के सबूत मिले हैं।
जैकब जिस खतरे की बात कर रहे हैं, वो यह नहीं है। अभी तो आदमी ही AI का इस्तेमाल करते हुए खतरे पैदा कर रहा है, लेकिन AI हमसे तेज हो गया तो क्या होगा? अभी तो वो हमारे कहने पर चल रहा है, लेकिन साथ में वो खुद भी सीख रहा है। जब वो हमारे काबू से बाहर निकल जाएगा तो दो तरह के खतरों की बात हो रही है।
AI खुद Bio Weapon बनाकर हमें खत्म कर सकता है, मानो कोई वायरस ही बनाकर छोड़ दे। दूसरा खतरा है कि AI हमारी जिंदगी के हर हिस्से में है। बिजली सप्लाई हो, एयरपोर्ट, रेलवे, सेना। वहाँ से भी AI तबाही मचा सकता है।
सबको इन खतरों के बारे में पता है, लेकिन कोई इस रेस में पीछे नहीं छूटना चाहता है। एक रेस अमेरिका और चीन में चल रही है। दूसरी रेस अमेरिकी कंपनियों जैसे OpenAI और Anthropic में चल रही है। ये कंपनियां IPO लाने की तैयारी कर रही हैं। अमेरिका की सरकार भी कंपनियों को कसने के मूड में नहीं है, क्योंकि चीन के आगे बढ़ने का डर है। एक-दूसरे से आगे निकलने की होड़ दुनिया को खतरे में डाल सकती है और यह बात तो अब डारियो ही कह रहे हैं।
( यह लेखक के निजी विचार हैं )
ताजा प्रमाण ब्रिक्स (पांच देशों का संगठन) शिखर सम्मेलन में 12 देशों की उपस्थिति और भारत की भूमिका की स्वीकार्यता मोदी की वैश्विक रणनीति का महत्वपूर्ण स्तंभ कहा जा सकता है।
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Samachar4media Bureau
आलोक मेहता, पद्मश्री, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक।
इस साल फरवरी में जब मेरी किताब 'रिवालूशनरी राज - नरेंद्र मोदी रूल ऑफ 25 इयर्स' प्रकाशित हुई, तो कुछ कार्यक्रमों में मुझसे इस क्रांतिकारी राज में विश्व राजनीति में भारत को मोदी के कार्यकाल में कोई बड़ी उपलब्धि के सवाल हुए, तो मैंने उन्हें 1971 से अब तक अपनी पत्रकारिता और तथ्यों के आधार पर उत्तर दिए। इसमें सबसे बड़ा तर्क यही है कि इंदिरा गांधी से मनमोहन सिंह के राज तक संयुक्त राष्ट्र या अन्य अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में भारत को 'गुट निरपेक्षता' का ठप्पा लगाकर पेश किया जाता था, लेकिन मुझे 1983 के प्रारम्भ में दिल्ली के विज्ञान भवन में हुए गुट निरपेक्ष देशों के सम्मेलन के कवरेज के समय ही लगा था कि यह ठप्पा केवल अमेरिका और चीन से नाराज या सोवियत रूस समर्थक देशों का समूह है।
इसके विपरीत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2014 में सत्ता संभालने के साथ असली निर्गुट नीति अपनाकर रूस, अमेरिका, चीन, ब्रिटेन, अफ्रीका, मध्य पूर्व, पश्चिम और पूर्वी एशिया और यूरोपीय समुदाय के देशों के शीर्ष नेताओं से सीधे कूटनीतिक और कुछ हद तक अपनत्व के साथ संबंध जोड़ने शुरू कर दिए।
ताजा प्रमाण ब्रिक्स (पांच देशों का संगठन) शिखर सम्मेलन में 12 देशों की उपस्थिति और भारत की भूमिका की स्वीकार्यता मोदी की वैश्विक रणनीति का महत्वपूर्ण स्तंभ कहा जा सकता है। भारत ने 2016 में ब्रिक्स सम्मेलन की मेजबानी की थी और अब 2026 में अध्यक्षता की है। 2026 के सम्मेलन में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन जैसे नेताओं के साथ भारत का संवाद इस रणनीति को और महत्वपूर्ण बनाता है। दुनिया की लगभग आधी आबादी और अर्थव्यवस्था का करीब 40 प्रतिशत इस समूह से जुड़ा है।
अमेरिका या उससे जुड़े देश थोड़े विचलित हो सकते हैं, लेकिन उन्हें भारत के सहारे ही चीन, रूस, ईरान से भी आर्थिक संबंध रखने की तमन्ना है। ब्रिक्स सम्मेलन की सबसे बड़ी सफलता केवल चीन, रूस, ईरान, सऊदी अरब, इंडोनेशिया और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों के राष्ट्र प्रमुखों द्वारा स्वीकार किए गए घोषणा पत्र में पाकिस्तान द्वारा जम्मू-कश्मीर में अप्रैल 2025 में किए गए आतंकी हमले की भर्त्सना किया जाना है।
यही नहीं, किसी भी सत्ता द्वारा आतंकियों की फंडिंग और आतंकवाद के विरुद्ध मिलकर लड़ने का संकल्प लिया गया। यह मोदी की कूटनीतिक सफलता है, क्योंकि चीन, सऊदी अरब तो पाकिस्तान के सबसे प्रमुख समर्थक रहे हैं। टैरिफ की बंदर घुड़की देने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भारत आने और उससे पहले नवंबर में चीन-रूस के राष्ट्रपतियों से मिलने के इंतजार में हैं।
इसलिए यहाँ निराश पिटे हुए चिदंबरम जैसे कुछ कांग्रेसी नेता भले ही ब्रिक्स या किसी से कुछ न मिलने का रुदन करें, संयुक्त राष्ट्र, विश्व बैंक, विश्व मुद्रा कोष भारत के नेतृत्व और आर्थिक विकास में सबसे अग्रणी होने की सराहना सम्मेलन में ही कर रहे हैं। मोदी के लिए ब्रिक्स का महत्व ग्लोबल साउथ की अवधारणा, पश्चिमी देशों के प्रभुत्व वाले संगठनों में सुधार, वैकल्पिक वित्तीय मेकेनिज्म, व्यापार, ऊर्जा, टेक्नोलॉजी, विकास के वित्तीय प्रबंध, बहुध्रुवीय विश्व के लिए है।
इसे संयोग कहा जाए अथवा मोदी के सलाहकारों की रणनीति कि ब्रिक्स में मोदी की जयकार उनके जन्मदिन (17 सितंबर) से तीन दिन पहले से हो रही है। वहीं उनकी भारतीय जनता पार्टी नरेंद्र मोदी के मुख्यमंत्री से प्रधानमंत्री तक के सफल 25 वर्षों के सत्ता काल के उत्सव मनाने जा रही है। मैंने अपनी किताब और लेखों में तो इस तथ्य को रेखांकित किया है कि पुतिन, शी जिनपिंग या ट्रंप सहित दुनिया के किसी देश के नेता के पास एकसाथ 25 वर्ष सत्ता चलाने का अनुभव नहीं है। ध्यान देने की बात यह है कि मोदी की अंतरराष्ट्रीय समझ 2014 के बाद अचानक पैदा नहीं हुई।
वे लंबे समय तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े रहे और बाद में भाजपा संगठन में आए। 1978 में वे संघ के क्षेत्रीय स्तर के प्रचारक बने और 1979 में दिल्ली में संघ के काम से जुड़े। 1980 के दशक के उत्तरार्ध में भाजपा संगठन में उनकी भूमिका बढ़ी। 1990 में लालकृष्ण आडवाणी की राम रथयात्रा और 1991–92 में मुरली मनोहर जोशी की एकता यात्रा के संगठन में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। यही वह दौर था, जिसमें मोदी ने देश के अलग-अलग हिस्सों को संगठन की दृष्टि से समझा और बाद में विदेशों में भारतीय समुदाय से संपर्क का अनुभव भी प्राप्त किया। बहुत कम लोगों को मालूम होगा कि 1993 में नरेंद्र मोदी अमेरिका गए थे, उस समय वे न मुख्यमंत्री थे, न सांसद और न ही केंद्र सरकार में कोई पद था।
वे भाजपा-संघ संगठन से जुड़े नेता थे। उनका पहल प्रशिक्षण दौरा अमेरिकन कौंसिल ऑफ यंग पॉलिटिकल लीडर्स संस्था के निमंत्रण पर हुआ था। यह संगठन अमेरिकी सरकार के सहयोग से दुनिया, खासकर उस समय के विकासशील देशों के चुनिंदा युवा नेताओं को एक महीने के लिए आमंत्रित करता रहा है। इस अवधि में अमेरिका भ्रमण के दौरान विचारों के आदान-प्रदान, नेताओं और प्रशासन के वरिष्ठ नेताओं के साथ संवाद आदि के कार्यक्रम होते हैं। यह वही दौर था, जब राव राज में भारत ने उदार अर्थव्यवस्था के लिए खिड़की-दरवाजे खोलने शुरू हुए थे। इस तरह मोदीजी को अमेरिकी राजनीतिक व्यवस्था, नेतृत्व, चुनावी राजनीति और संस्थागत कामकाज देखने का अवसर मिला।
दिलचस्प बात यह है कि उस समय का यह अनुभव बाद के मोदी में दिखाई देता है—विदेश जाकर केवल सरकारों से बात नहीं करना, बल्कि राजनीतिक व्यवस्था, कारोबारी समुदाय और प्रवासी भारतीयों को भी समझना। गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में विदेश नीति का पहला प्रयोग शुरू किया। 2001 में नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री बने। उनकी सबसे बड़ी विशेषता थी कि उन्होंने मुख्यमंत्री के पद को केवल प्रशासनिक पद नहीं माना।
उन्होंने गुजरात को एक सफल आर्थिक प्रगति वाले मॉडल प्रदेश के रूप में प्रस्तुत करना शुरू किया। उनका लक्ष्य था: विदेशी निवेश, उद्योग, तकनीक, इंफ्रास्ट्रक्चर, बंदरगाह, ऊर्जा, फार्मास्यूटिकल, हीरा उद्योग, ऑटोमोबाइल, प्रवासी भारतीयों को निवेश से जोड़ना रहा। इसी रणनीति के केंद्र में वाइब्रेंट गुजरात के अंतरराष्ट्रीय आयोजन शुरू किए। इन आयोजनों को अहमदाबाद, गांधीनगर में जाकर मैंने स्वयं देखा है। देश-विदेश के उद्यमी और संबंधित नेताओं के आने से मोदी को राजनीतिक-आर्थिक क्षेत्र में पैर मजबूत करने में सुविधा हुई।
भारत में उनके विरोधियों और केंद्र में कांग्रेस की सरकार के कारण 2005 में अमेरिका ने उन्हें वीजा देने से इनकार किया। इसके बावजूद उन्होंने अपनी विदेश नीति को रोकने के बजाय एशिया की ओर ज्यादा केंद्रित किया। वे चीन, जापान, सिंगापुर, दक्षिण कोरिया, ताइवान, मलेशिया, थाईलैंड और अन्य एशियाई केंद्रों से आर्थिक संपर्क बढ़ाते रहे। गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में उनकी यात्राओं में रूस और चीन की तीन-तीन यात्राएँ, इजरायल, स्विट्जरलैंड, युगांडा और केन्या जैसी यात्राएँ भी शामिल थीं। मुख्यमंत्री रहते हुए मोदी ने चीन को केवल राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी की तरह नहीं देखा।
उन्होंने चीन की विशेष इकोनॉमिक जोन, इंफ्रास्ट्रक्चर, पोर्ट्स, लघु-मध्यम श्रेणी के उद्यम, शहरी विकास जैसे कार्यों का अध्ययन किया। उनकी 2006, 2007 और 2011 में चीन की यात्राओं का उल्लेख मिलता है। 2011 की यात्रा में बीजिंग, शंघाई और चेंगडु शामिल थे तथा उनके साथ कारोबारी प्रतिनिधिमंडल भी था। यानी मोदी का संदेश था: “जिस देश से प्रतिस्पर्धा करनी है, उससे भी सीखो।” यही शायद उनकी विदेश नीति की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक है।
जापान से चीन तक—मुख्यमंत्री के रूप में विकास की कूटनीति सार्थक होती गई। 2007 और 2012 में जापानी प्रधानमंत्री शिंजो आबे के साथ उनकी मुलाकातों ने व्यक्तिगत संबंध बनाने में भूमिका निभाई। गुजरात में जापानी निवेश आकर्षित करने की कोशिशें आगे बढ़ीं। बाद में प्रधानमंत्री बनने पर यही सोच मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन परियोजना के रूप में सामने आई। मुख्यमंत्री मोदी विदेश यात्रा को केवल औपचारिक यात्रा नहीं बनाते हैं, वे वहाँ से नए आइडिया लेकर लागू करने की कोशिश करते हैं।
26 मई 2014 को नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने। उनकी पहली विदेश यात्रा जून 2014 में भूटान की थी। इसके बाद ब्राजील में ब्रिक्स सम्मेलन में शामिल हुए। इसके बाद उनकी विदेश यात्राओं की गति असाधारण रही। सितंबर 2026 तक उपलब्ध जानकारी के अनुसार मोदी ने प्रधानमंत्री के रूप में 100 से अधिक अंतरराष्ट्रीय यात्राएँ की हैं और 80 से अधिक देशों तक पहुँचे हैं। मोदी की विदेश नीति का मूल मंत्र: “सबसे संबंध, किसी से गुलामी नहीं।” मोदी की विदेश नीति को केवल “अमेरिकी या रूसी ओरिएंटेड” नहीं कही जा सकती है।
वे एक साथ अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस, जर्मनी, ईरान, इजराइल, संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, आसियान, अफ्रीका के साथ संबंध बनाए रखने की कोशिश करते हैं। यही स्ट्रैटिजिक ऑटोनोमी जैसा मॉडल है। यूक्रेन युद्ध के दौरान भारत ने रूस से संबंध नहीं तोड़े, लेकिन यूक्रेन के साथ भी संवाद रखा। पश्चिम एशिया में इजराइल के साथ रणनीतिक संबंध हैं, लेकिन ईरान और खाड़ी के देशों से भी भारत के संबंध जारी रहे। चीन के साथ सीमा विवाद गंभीर है, लेकिन ब्रिक्स और शंघाई सहयोग संगठन जैसे मंचों पर संवाद जारी है।
अगर मोदी के प्रधानमंत्री काल की एक बड़ी कूटनीतिक सफलता चुननी हो तो 2023 में जी-20 की अध्यक्षता सबसे महत्वपूर्ण कही जा सकती है। नई दिल्ली में जी-20 सम्मेलन के दौरान भारत ने अफ्रीकन देशों के संगठन यानी अफ्रीकी देशों को जी-20 का स्थायी सदस्य बनाने में भूमिका निभाई। दिल्ली घोषणा पत्र पर सहमति बनाने में सफलता पाई। भारत मध्य पूर्व-यूरोप इकोनॉमिक कॉरिडोर की घोषणा में भूमिका निभाई।
यह विशेष रूप से महत्वपूर्ण था, क्योंकि यूक्रेन युद्ध के कारण जी-20 के भीतर मतभेद बहुत गहरे थे। फिर भी भारत ने सर्वानुमति से घोषणा जारी करवाई। सबसे बड़ा काम भारत की पाकिस्तान के आतंकवाद पर हर मंच से न केवल भर्त्सना की, नाम लिए बिना सबको साथ देने का संकल्प करवाया। भारत जी-7 का सदस्य नहीं है। लेकिन मोदी को कई वर्षों में जी-7 के विशेष सत्रों में आमंत्रित किया गया। यानी मोदी ने जी-7 की सदस्यता प्राप्त नहीं की—बल्कि जी-7 के बाहर रहकर भारत को उस बातचीत का आवश्यक पक्ष बना दिया।
क्वाड यानी अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया और भारत के लिए भारत-प्रशांत क्षेत्र की रणनीति कारगर है। प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में भारत की भूमिका को भी अधिक सक्रिय बनाया। उन्होंने सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता की मांग दोहराई। उनकी विदेश नीति का एक बड़ा हिस्सा यह रहा है कि भारत केवल नियमों का पालन करने वाला देश नहीं, बल्कि नियम बनाने में भाग लेने वाली शक्ति बने। इसी सोच के तहत संयुक्त राष्ट्र सुधार, आतंकवाद से संघर्ष, पर्यावरण संरक्षण, सौर ऊर्जा अलायंस, योग से स्वास्थ्य जैसे मुद्दों को विश्वव्यापी बना दिया। इसलिए चाहें उन्हें न कहें, लेकिन मोदी के भारत को विश्व गुरु के रूप में स्वीकारा जाना चाहिए। तभी उनके जन्मदिन और 25 वर्षों के सत्ता काल की बधाई और शुभकामनाएं।
( यह लेखक के निजी विचार हैं )
14 सितंबर को देश में हर साल हिंदी दिवस मनाया जाता है। 1949 में इसी दिन संविधान सभा ने हिंदी को राजभाषा के रूप में स्वीकार किया था।
by
Vikas Saxena
देश में हर साल 14 सितंबर को हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाता है। 1949 में इसी दिन संविधान सभा ने देवनागरी लिपि में लिखी हिंदी को भारतीय गणराज्य की राजभाषा के रूप में स्वीकार किया था और तभी से हर वर्ष यह दिन हिंदी के प्रति सम्मान जताने के लिए मनाया जाता है। लेकिन एक सवाल जो हर साल इस मौके पर उठता है, वह यह है कि क्या हिंदी को वाकई वह स्थान मिला है जिसकी वह हकदार है? इस सवाल का जवाब खोजने के लिए सिर्फ भावनाओं पर नहीं, आंकड़ों पर भी नजर डालनी जरूरी है।
दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी भाषा
भाषा विशेषज्ञों के मुताबिक, हिंदी आज अंग्रेजी और मैंडरिन (चीनी) के बाद दुनिया में तीसरी सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा है। एथ्नोलॉग जैसे वैश्विक भाषा डेटाबेस के अनुसार दुनिया भर में करीब 61.5 करोड़ लोग हिंदी बोलते या समझते हैं। संयुक्त राष्ट्र के मंच पर भी यह बात दोहराई जा चुकी है कि आज दुनिया भर में लगभग 60 करोड़ लोग हिंदी बोलते और समझते हैं, जबकि लगभग 45 करोड़ लोग इसे अपनी मातृभाषा के रूप में इस्तेमाल करते हैं। भारत के अलावा नेपाल, मॉरीशस, फिजी, गुयाना, सूरीनाम, त्रिनिदाद, दक्षिण अफ्रीका, अमेरिका, ब्रिटेन और खाड़ी देशों में भी बड़ी संख्या में हिंदीभाषी समुदाय बसे हैं, जो इसे एक वास्तविक वैश्विक भाषा बनाते हैं।
भारत के भीतर देखें तो 2011 की जनगणना (जो अब तक की आखिरी उपलब्ध पूर्ण जनगणना है) के अनुसार 43.63 प्रतिशत यानी करीब 52.8 करोड़ भारतीयों ने हिंदी को अपनी मातृभाषा बताया था- यह 2001 की जनगणना के 41 प्रतिशत से अधिक था। यानी देश की करीब आधी आबादी के लिए हिंदी पहली भाषा है और इससे कहीं ज्यादा लोग इसे दूसरी या तीसरी भाषा के रूप में समझते और इस्तेमाल करते हैं। भारत की मौजूदा अनुमानित आबादी करीब 145 करोड़ मानी जा रही है; 2011 के बाद देश में जनगणना नहीं हुई है, लेकिन हिंदी भाषी राज्यों में अपेक्षाकृत अधिक जनसंख्या वृद्धि दर को देखते हुए विशेषज्ञ मानते हैं कि हिंदी मातृभाषियों का अनुपात और भी बढ़ा है।
डिजिटल दुनिया में हिंदी की तेज छलांग
यदि हिंदी दिवस को सिर्फ इतिहास और परंपरा तक सीमित रखा जाए तो यह अधूरी तस्वीर होगी। असली बदलाव पिछले एक दशक में डिजिटल क्षेत्र में आया है। इंटरनेट एंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ इंडिया (IAMAI) और कांतार की संयुक्त "इंटरनेट इन इंडिया रिपोर्ट 2025" (फरवरी 2026 में जारी) के अनुसार भारत में सक्रिय इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की संख्या अब 95.8 करोड़ (958 मिलियन) तक पहुंच चुकी है, जो पिछले साल की तुलना में करीब 8 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि दर्शाती है और अब ग्रामीण भारत में शहरी भारत से ज्यादा इंटरनेट उपयोगकर्ता हैं। इससे एक साल पहले की रिपोर्ट (2024) में यह भी सामने आया था कि भारत के करीब 98 प्रतिशत इंटरनेट उपयोगकर्ता किसी न किसी भारतीय भाषा में ही कंटेंट देखना पसंद करते हैं। सरकार ने इंडिया मोबाइल कांग्रेस 2025 में यह अनुमान भी जताया था कि वित्तीय वर्ष 2026 के अंत तक देश का इंटरनेट उपयोगकर्ता आधार 1 अरब यानी 100 करोड़ के आंकड़े को पार कर जाएगा और मौजूदा रुझान इस लक्ष्य के काफी करीब हैं।
इस विस्फोटक इंटरनेट विस्तार में हिंदी की भूमिका बेहद अहम रही है। सस्ते स्मार्टफोन और किफायती डेटा योजनाओं के आने के बाद जो करोड़ों नए लोग पहली बार ऑनलाइन आए, उनमें एक बड़ा हिस्सा हिंदीभाषी क्षेत्रों से रहा है, जिसने हिंदी सामग्री की मांग को कई गुना बढ़ा दिया। हिंदी अब सिर्फ किताबों और अखबारों की भाषा नहीं रही, बल्कि यह सर्च इंजन, सोशल मीडिया, ओटीटी प्लेटफॉर्म और यूट्यूब जैसी जगहों पर भी अंग्रेजी को कड़ी टक्कर देने लगी है और उद्योग विश्लेषकों के मुताबिक वैश्विक स्तर पर आज भी हिंदी को अंग्रेजी के बाद इंटरनेट पर सबसे अधिक इस्तेमाल होने वाली भाषाओं में गिना जाता है।
तकनीक की दुनिया भी अब हिंदी को गंभीरता से ले रही है। गूगल असिस्टेंट, एलेक्सा और सिरी जैसी वॉयस सेवाओं में हिंदी सपोर्ट, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित अनुवाद उपकरण और सरकार का भाषिणी जैसा राष्ट्रीय भाषा मिशन- ये सभी संकेत हैं कि हिंदी और भारतीय भाषाओं को डिजिटल ढांचे का स्थायी हिस्सा बनाने की कोशिशें तेज हुई हैं। स्वायाम (SWAYAM), दीक्षा (DIKSHA) और ई-पाठशाला (ePathshala) जैसे शिक्षा पोर्टल भी अब बड़े पैमाने पर हिंदी में गुणवत्तापूर्ण कंटेंट उपलब्ध करा रहे हैं, जिससे टियर-2 और टियर-3 शहरों तथा ग्रामीण इलाकों के छात्रों को सीधा फायदा मिल रहा है।
मीडिया और मनोरंजन उद्योग की रीढ़
हिंदी की आर्थिक ताकत का सबसे बड़ा प्रमाण मीडिया और मनोरंजन उद्योग है। प्रिंट अखबारों से लेकर टीवी न्यूज चैनलों, हिंदी सिनेमा और अब ओटीटी वेब सीरीज तक- हर माध्यम की रीढ़ हिंदी ही है। हिंदी समाचार पत्र आज भी देश में सबसे ज्यादा प्रसार संख्या रखने वाले अखबारों में शुमार हैं और हिंदी न्यूज चैनल दर्शक संख्या के मामले में लगातार शीर्ष पर बने रहते हैं। हिंदी सिनेमा दशकों से न केवल भारत बल्कि दुनिया भर में करोड़ों दर्शकों तक भारतीय संस्कृति पहुंचाने का माध्यम रहा है और अब ओटीटी प्लेटफॉर्मों पर हिंदी वेब सीरीज और फिल्में दर्शकों की पहली पसंद बनी हुई हैं। इस पूरे इकोसिस्टम से करोड़ों लोगों की आजीविका जुड़ी है- पत्रकार, लेखक, कलाकार, तकनीशियन, विज्ञापन पेशेवर, कंटेंट क्रिएटर- इन सबका रोजगार सीधे तौर पर हिंदी भाषा पर ही टिका है।
संवैधानिक स्थिति: राजभाषा, राष्ट्रभाषा नहीं
आंकड़ों में इतनी मजबूत उपस्थिति के बावजूद विडंबना यह है कि हिंदी को आज तक संविधान में "राष्ट्रभाषा" का दर्जा हासिल नहीं है। संविधान के अनुच्छेद 343 के तहत हिंदी को देवनागरी लिपि में संघ की "राजभाषा" घोषित किया गया था, जबकि अंग्रेजी को भी सहायक राजभाषा के रूप में जारी रखा गया। मुंशी-आयंगर फॉर्मूले के तहत हुए इस ऐतिहासिक समझौते ने हिंदी को केंद्र सरकार के कामकाज की भाषा तो बनाया, लेकिन "राष्ट्रभाषा" जैसा प्रतीकात्मक और संवैधानिक दर्जा आज भी अधूरा है। मुंशी-आयंगर फॉर्मूला 1949 में संविधान सभा द्वारा भारत की राजभाषा के विवाद को सुलझाने के लिए अपनाया गया एक भाषाई समझौता था। इसे कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी (K.M. Munshi) और एन. गोपालस्वामी आयंगर (N. Gopalaswami Ayyangar) ने पेश किया था। यह समझौता उत्तर और दक्षिण भारत के बीच भाषाई विवाद को सुलझाने के लिए हुआ था। यही वजह है कि हर साल हिंदी दिवस पर यह मांग दोहराई जाती है कि जब हिंदी आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक स्तर पर देश को इतना कुछ दे रही है, तो उसे उसका पूरा संवैधानिक सम्मान क्यों नहीं मिलता।
चुनौतियां भी कम नहीं
आंकड़े जितनी उम्मीद जगाते हैं, उतनी ही कुछ चुनौतियां भी सामने खड़ी हैं। भाषा विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल विस्तार के साथ-साथ "हिंग्लिश" (हिंदी-अंग्रेजी मिश्रित भाषा) का प्रचलन तेजी से बढ़ा है, जिससे शुद्ध हिंदी के व्याकरणिक स्वरूप पर असर पड़ रहा है। तकनीकी और वैज्ञानिक शब्दावली के सीमित विकास, की-बोर्ड और फॉन्ट से जुड़ी तकनीकी दिक्कतें और उच्च शिक्षा व शोध में अंग्रेजी के दबदबे जैसी समस्याएं आज भी बनी हुई हैं। इसके अलावा शहरी मध्यम वर्ग में अंग्रेजी माध्यम की शिक्षा को लेकर बढ़ता आकर्षण भी एक ऐसी प्रवृत्ति है, जो हिंदी के दीर्घकालिक भविष्य के लिए चिंता का विषय बनी हुई है।
भारत की भाषाई विविधता में हिंदी की जगह
यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि हिंदी की मजबूती का मतलब बाकी भारतीय भाषाओं की उपेक्षा नहीं होना चाहिए। बांग्ला, मराठी, तेलुगू, तमिल, पंजाबी जैसी भाषाएं भी करोड़ों लोगों की मातृभाषा हैं और भारत की सांस्कृतिक विविधता की जीवंत मिसाल हैं। हिंदी दिवस का असली संदेश यही होना चाहिए कि हिंदी को उसका हक मिले, लेकिन साथ ही देश की सभी भाषाओं का सम्मान और संरक्षण भी उतना ही जरूरी समझा जाए। भारत की असली ताकत उसकी भाषाई विविधता में ही निहित है।
आगे की राह
आंकड़े साफ बताते हैं कि हिंदी न सिर्फ जीवित है, बल्कि डिजिटल युग में नई ऊर्जा के साथ आगे बढ़ रही है- करोड़ों मातृभाषी, दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी भाषा का दर्जा, इंटरनेट पर दूसरी सबसे लोकप्रिय भाषा की हैसियत और मीडिया-मनोरंजन उद्योग की रीढ़ जैसी उपलब्धियां किसी भी भाषा के लिए गर्व की बात हैं। लेकिन असली चुनौती इस उपलब्धि को संस्थागत और संवैधानिक मान्यता में बदलने की है। सरकारी कामकाज, न्यायपालिका, उच्च शिक्षा और तकनीकी क्षेत्रों में हिंदी के प्रयोग को और सरल तथा व्यावहारिक बनाना होगा, ताकि आम आदमी बिना किसी हीन भावना के अपनी भाषा में काम कर सके।
हिंदी दिवस केवल एक प्रतीकात्मक आयोजन बनकर न रह जाए, बल्कि यह हर साल हमें यह याद दिलाए कि आंकड़ों में जो ताकत हिंदी के पास है, वही ताकत उसे नीति, शिक्षा और शासन के हर स्तर पर भी मिलनी चाहिए। तभी यह दिन सही मायनों में सार्थक होगा- जब हिंदी सिर्फ आंकड़ों में नहीं, बल्कि व्यवस्था में भी उतनी ही मजबूत नजर आएगी।