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‘पत्रकारिता में गुरु बनाने से पहले इस बात का रखें खास ध्यान’
कुछ पेशे तो ऐसे हैं, जो गुरुओं के आशीर्वाद से ही चलते हैं। मसलन, राजनीति और पत्रकारिता
समाचार4मीडिया ब्यूरो 6 years ago
कृष्ण मोहन शर्मा, वरिष्ठ पत्रकार।।
‘सफलता’ से ज्यादा ‘गरिमा’ को महत्व देने की जो बात कहे, वही आपका गुरु है। वो व्यक्ति कोई भी हो सकता है। आपकी मां हो सकती है, आपके पिता हो सकते हैं। हो सकता है कि आपकी पत्नी हो, आपके दोस्त हों, आपके शुभचिंतक हों या फिर वास्तव में आपके शैक्षणिक गुरु। रिश्तों का गुरु के अस्तित्व में होने या नहीं होने से कोई मतलब नहीं होता, कोई भी व्यक्ति आपका गुरु हो सकता है।
कुछ पेशे तो ऐसे हैं, जो गुरुओं के आशीर्वाद से ही चलते हैं। मसलन, राजनीति और पत्रकारिता। दोनों में फर्क सिर्फ इतना है कि राजनेता अपने शिष्य की मदद दलगत राजनीति से ऊपर उठकर भी करते हैं, लेकिन पत्रकारिता में अक्सर यह देखा गया है कि आप अगर किसी वजह से फिसल गए तो आपका गुरु सबसे पहले आपको त्याग देगा।
लेकिन गुरु तो गुरु होता है। ये बात अलग है कि कोई सिर्फ अपनी जाति के लोगों को अपना शिष्य बनाता है, कोई किसी खास धर्म के लोगों को शिष्य बनाता है, कोई किसी राज्य विशेष के लोगों को शिष्य बनाता है। कई की पसंद लैंगिक भी होती है, लेकिन फिर भी कहूंगा कि गुरु तो गुरु होता है, चाहे वो बौद्धिक गुरु हो या फिर शैक्षणिक गुरु। सही मायने में जो ‘सफलता’ से ज्यादा ‘गरिमा’ को महत्व देने की बात कहे, वही आपका असली गुरु है ।
गुरु की बात को जेहन में रखकर सदैव काम करना यूं तो कहने में बहुत अच्छा लगता है, लेकिन इसे अमल में लाकर काम करना बहुत मुश्किल है। खासकर तब, जब इंडस्ट्री के तथाकथित गुरु खुद को बचाने के लिए शिष्यों की बलि ले रहे हों। बात ‘मैनेजेरियल इथिक्स’ की कर रहें हो और एचआर (HR) मैनेजर को अपना दोस्त बना लिया हो।
मुझे श्री कन्हैया लाल नंदन, त्रिनेत्र जोशी, वीरेन्द्र सेंगर, शेष नारायण सिंह, विनोद अग्निहोत्री, अमिताभ, सुप्रिय प्रसाद, संतोष भारतीय, शैलेष कुमार, राम कृपाल सिंह और कमर वाहिद नकवी, जी कृष्णन जैसे लोगों के मार्गदर्शन में काम करने का मौका मिला। इनमे से कई को मुझमें ‘शिष्य’ नहीं मिला तो मुझे भी इनमें से कई लोगों में अपना ‘गुरु’ नहीं मिला। इसे मैं अपना दुर्भाग्य ही मानूंगा कि कई ने मुझे अपना शिष्य नहीं बनाया और कई को मैं अपना गुरु नहीं बना पाया।
ईमानदारी और उसूलों के साथ नौकरी करना आज के दौर में बहुत कठिन काम है। खासकर तब, जब इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में ‘म्यूजिकल चेयर’ का खेल चल रहा हो। जब टीवी में नौकरी करने वाले 20 प्रतिशत पत्रकारों की योग्यता साल के अंत में संस्थान के लिए अप्रासंगिक हो जा रही हो। ऐसे में गुरु की तलाश निश्चित ही एक मुश्किल काम है। लेकिन, इन तमाम सारी थ्योरी और खामियों के बावजूद आज भी पत्रकारिता के पेशे में ‘गुरु-शिष्य’ परंपरा कायम है। रजत शर्मा, प्रणॉय रॉय राय, कमर वाहिद नकवी, हेमंत शर्मा, सुप्रिय प्रसाद जैसे लोग आज भी अपने शिष्यों का ख्याल रखते हैं। यह बात अलग है कि इनमें से कोई आपको अपना शिष्य बनाएगा या नहीं, लेकिन परंपरा अब भी जिंदा है।
बात 2006 की है जब ‘आजतक’ में नौकरी के लिए शैलेष, राम कृपाल सिंह और कमर वाहिद नकवीजी के पैनल में मेरा साक्षात्कार हो रहा था। काफी देर तक सवाल-जवाब के बाद कमर वाहिद नकवीजी ने एक सवाल पूछा कि आखिर आपने नौकरी क्यों छोड़ी? मेरा जवाब था, ‘सर, स्वाभिमान बेचकर नौकरी नहीं हो सकती।’ इस जवाब के बाद नकवीजी ने कहा कि ठीक है जाइए, देखता हूं। चार दिनों के बाद मुझे जानकारी मिली कि मुझे ‘आजतक’ में नौकरी मिल गई है। जॉइन करने के करीब तीन साल बाद नकवीजी ने एक दिन कहा कि जो व्यक्ति सफलता से ज्यादा गरिमा को तव्वजो देता है,वही एक दिन बड़ा आदमी बनता है।
नकवीजी मुझे अपना शिष्य मानते हैं या नहीं, मैं नहीं जानता, लेकिन मैं उन्हें अपना गुरु मानता हूं। इसलिए शिक्षक दिवस के अवसर पर पत्रकारिता के छात्रों को यह मान लेना चाहिए कि ‘सफलता’ से ज्यादा ‘गरिमा’ को महत्व देने की जो बात कहे, वही आपका गुरु है।
(यह लेखक के निजी विचार हैं)
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