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वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल ने बताया, क्या करे अफगानिस्तान को लेकर दुविधा में फंसा भारत

देश इस समय दुविधा में है। अफगानिस्तान के नए नियंताओं से बात की जाए अथवा नहीं। उनसे संपर्क और संबंध रखे जाएं अथवा नहीं।

समाचार4मीडिया ब्यूरो 4 years ago

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार ।।

देश इस समय दुविधा में है। अफगानिस्तान के नए नियंताओं से बात की जाए अथवा नहीं। उनसे संपर्क और संबंध रखे जाएं अथवा नहीं। जो लोग बंदूक के बल पर सत्ता हथियाने में भरोसा रखते हैं, उनसे एक विराट लोकतांत्रिक मुल्क को व्यवहार रखना चाहिए अथवा नहीं, सारा हिंदुस्तान इस पर माथापच्ची कर रहा है।

एक वर्ग तालिबान के सख्त खिलाफ है और उसके साथ किसी भी किस्म के रिश्ते रखने का हामी नहीं है। यह वर्ग तालिबानी बर्बरता, दूसरे धर्मो से उसकी अदावत और लड़कियों तथा महिलाओं के साथ उसके ज़ुल्मों की दुहाई दे रहा है। दूसरा वर्ग यह कहता है कि आज का तालिबान वह नहीं है, जो बीस बरस पहले था। भारत ने वहां बड़ा निवेश किया है और चीन-पाकिस्तान से हमारे कटुतापूर्ण संबंधों को देखते हुए तालिबान को अपने साथ रखना आवश्यक है। 

सतही तौर पर दोनों पक्षों के तर्क जायज लगते हैं और गंभीरता से विचार की मांग करते हैं। भारतीय विदेश नीति ऐसे संवेदनशील मामलों में या तो तटस्थ रहती आई है या फिर उसने जनहित के मद्देनजर निर्णय लिए हैं। यानी उन देशों की जनता के द्वारा निर्वाचित और प्रतिनिधि सरकारों को हिंदुस्तान का साथ मिला है। लेकिन शायद पहली बार एक दुविधा भरी स्थिति आई है।

मानवीय कर्तव्य और देशहित आमने सामने हैं। यदि भारत अफगानिस्तान की अवाम के साथ खड़ा होता है तो चीन और पाकिस्तान जैसे स्थायी शत्रु देश उसका फायदा उठाते हैं और हमारा सिरदर्द बढ़ाते हैं। यदि हम तालिबान के पक्ष में आते हैं या उसकी सरकार को मान्यता देते हैं तो मानवीय मूल्यों की बलि चढ़ती है। इसके बाद भी इस बात की गारंटी नहीं है कि चीन और पाकिस्तान के साथ तालिबान पींगें नहीं बढ़ाएगा।

भारत अब क्या करे?

तो अब भारत क्या करे? हाल ही में प्रेस क्लब ऑफ इंडिया ने भारतीय पत्रकारों के लिए अफगानिस्तान के मसले पर विचारोत्तेजक विशेषज्ञ सत्न आयोजित किया था। इसमें अफगानी मामलों के चुनिंदा जानकार शामिल हुए। यहां वक्ताओं की राय आम हिन्दुस्तानी की सोच से बिलकुल उलट दिखाई दी। जानकारों का कहना था कि भारत को राष्ट्रहित में तालिबानी सरकार से संवाद करना चाहिए। कुछ लोगों का कहना था कि भारत ने पहले ही इस प्रसंग में देर कर दी है और रूस, चीन और पाकिस्तान ने इसका लाभ उठा लिया है।

उनका तर्क था कि आज के तालिबान बीस बरस पहले के बर्बर और जुल्मी तालिबान नहीं हैं और न ही आज के संसार में ऐसी कोई हुकूमत हो सकती है, जो जन भावनाओं को कुचलते हुए उन्हें मध्यकाल के बर्बर युग में ले जाए। खास तौर पर इस पहाड़ी देश में, जहां लोग दो दशक से आजादी के आधुनिक संस्करण का लाभ लेते रहे हैं।

इस हकीकत को तालिबानी भी समझ रहे हैं। एक-दो अवसरों पर वे कुछ-कुछ स्पष्ट भी कर चुके हैं कि वे शांति चाहते हैं, सभी देशों से बेहतर रिश्ते चाहते हैं और महिलाओं को काम की आजादी देने के पक्ष में हैं। पर वे शरिया विधान के पक्षधर भी हैं, जो एक तरह से मुल्क को कबीलाई दौर में ले जाता है। अगर उनके नजरिये से विचार करते हैं तो वे और क्या कह सकते थे?

यदि वे ऐलान करते कि पुरानी सरकार की सारी व्यवस्थाएं जारी रखेंगे और उनके साथ छेड़छाड़ नहीं की जाएगी तो यह धारणा मजबूत होती कि वे सिर्फ गद्दी का सुख लेने की खातिर सरकार को हटा कर आए हैं। इसके अलावा बुद्धिजीवियों के बीच इस बहस को बल मिलता कि ऐसी स्थिति में ताकत के प्रदर्शन की जरूरत क्या थी।

अशरफ गनी सरकार तो पहले ही सरकार में साझीदारी का न्यौता दे चुकी थी। अमेरिकी सेना अपने देश लौट चुकी है तो एक राष्ट्रीय सरकार वहां क्यों काम नहीं कर सकती थी? जाहिर है कि तालिबानी अफगानिस्तान में अनेक देशों में हुए ध्रुवीकरण की तरह वहां की कट्टरपंथी धारा का प्रतिनिधित्व करेंगे।

अगर आइंदा उन्होंने चुनाव जैसी कोई प्रणाली विकसित की तो उनके विरोधी उदारवादी चेहरे के साथ प्रस्तुत होंगे। यद्यपि यह राय बनाना तनिक जल्दबाजी होगी कि दूसरे कार्यकाल में तालिबान परिष्कृत और उदार रूप में जनता के सामने आएगा। ऐसे में उसके साथ संपर्क-संवाद में कोई नुकसान नहीं दिखाई देता।

महात्मा गांधी कहते थे कि पाप से घृणा करो, पापी से नहीं। यदि तालिबान विश्व के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलना चाहता है तो उसे कौन रोक सकता है। दूसरी धारा का विचार तालिबान के साथ रिश्ते रखने के एकदम खिलाफ है। इस मत के लोग मानते हैं कि तालिबान नृशंस है। वह सिर्फ हथियारों की भाषा जानता है।

इसके समर्थकों का कहना है कि तालिबान पाकिस्तान से कटकर नहीं रह सकता। अफगानिस्तानी तालिबान को हमेशा एक ऐसा पड़ोसी चाहिए, जो प्रतिकूल परिस्थितियों में अपनी जमीन पर तालिबान को पालता पोसता रहे।

यह मुल्क पाकिस्तान ही हो सकता है। न तो भारत ऐसा कर सकता है और न चीन या ईरान ऐसा करेंगे। पाकिस्तान ने कई तालिबानी गुट पैदा किए हैं। भले ही अब इन धड़ों में आपस में नहीं बन रही हो मगर देर सबेर वे एक नहीं होंगे - यह कोई नहीं कह सकता। ऐसी सूरत में तालिबान से संपर्क रखना खतरे से खाली नहीं है।

इसके अलावा दुनिया के इस्लामी देशों में बहुमत उनका है, जिन्होंने अभी तक तालिबान को मान्यता नहीं दी है। लब्बोलुआब यह कि सियासत और कूटनीति में कई बार सिद्धांतों की बलि चढ़ानी होती है। घरेलू राजनीति में तो हम यह देख ही चुके हैं। फिर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर हमें भारतीय हितों को ही सर्वोपरि रखना होगा। दुश्मन का दुश्मन दोस्त ही होता है।

अफगानी तालिबान इस आधार पर साथ देने को तैयार हों तो भारत को पीछे नहीं हटना चाहिए। हमारा बहुत कुछ वहां दांव पर लगा है। पर यह सब समझने-करने के लिए भी संवाद तो करना ही होगा। संवाद में समाधान भी छुपा होता है।

(साभार: लोकमत समाचार)


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