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संवेदनशीलता की बात करते संवेदन शून्य पत्रकार

मेरे प्यारे वरिष्ठ पत्रकारों, लाखों की तनख्वाह में से एक हजार के ओआरएस खरीद कर बांट दो

समाचार4मीडिया ब्यूरो 6 years ago

अतुल गुप्ता, पत्रकार।।

यहां सब कुशल मंगल है और मुजफ्फरपुर में सब कुशल मंगल हो जाने की आशा और ईश्वर से प्रार्थना करता हूं। क्योंकि आपसे, आपके चैनल से ऐसी आशा करना तो खैर व्यर्थ है ही। फिर भी एक निवेदन है कि अस्पताल में रिपोर्टिंग और वॉक थ्रू करके आप और दूसरे चैनल के लोग उन डॉक्टरों पर दबाव न बनाएं कि डॉक्टर कम हैं, वो सुनते नहीं, इलाज नहीं कर रहे, लापरवाह हैं आदि इत्यादि। उन्हें अपना काम करने दीजिए, ताकि वो समस्या पर काबू कर पाएं, न कि अपनी नौकरी बचाने में और आपके गैर संवेदनशील सवालों के जवाब देने में अपनी ऊर्जा लगाएं। अपनी टीआरपी बढ़ाने और चैनल को स्टेबल करने की कोशिश में कम से कम डाक्टरों की पेशेगत विवशताओं को समझिए। वो डाक्टर कम से कम पांच घंटे कुछ लाइनें नियमित सुनता है।

डॉ. साब देख लीजिए, सब ठीक तो है, बहुत तेज बुखार है, जल्दी सूई लगाइए। ज्यादा खून बह गया है, जल्दी करिए, हमारे मरीज को पहले देखिए आदि। कई बार लोग मारपीट पर उतर आते हैं। कई बार डॉक्टर नाराज होते हुए भी मन मसोसकर इलाज करता है। उस पर स्थानीय लोगों, नेताओं, पत्रकारों की सिफारिशें भी देखनी होती हैं। जरा सोचिए! एक डॉक्टर के साथ ये समस्याएं सामान्य हैं, लेकिन डॉक्टर दबता या डरता कब है, उखड़ता कब है, नाराज कब होता है? बड़े विचारणीय प्रश्न हैं।

इन प्रश्नों का उत्तर मेरे पास है और इसलिए है कि मुझे सरकारी डॉक्टरों पर प्राइवेट से ज्यादा भरोसा है। जब कोई पत्रकार या रसूखदार कहता है कि मैं तुम्हें देख लूंगा या लगाता हूं तुम्हारी खबर! या व्यावसायिक हितों के चलते अपनी मानवता को बेच देता है। वह भूल जाता है कि सवाल पूछना किससे है! दोषी किसे कहना है! एक डॉक्टर को, व्यवस्था को या फिर लाशों पर फैली टीआरपी बढ़ाने की भूख को! वो कहता है कि देश की संवेदना मर गई है और खुद इतना असंवेदनशील!!

बताते हैं कि एक चील एक बच्चे की मौत का इंतजार कर रही थी, फोटो पत्रकार ने उसकी फोटो क्लिक की और पुलित्जर अवॉर्ड जीत गया, लेकिन उस बच्चे की मौत से वो पत्रकार इतना द्रवित हुआ कि उसने आत्महत्या कर ली! और आप कर रहे हैं संवेदना की बात!! आपकी संवेदना कहां मर गई सरकार? और फिर क्या आपकी हिम्मत हुई कि एक बार भी सरकार से यही सवाल कर सकें? क्यों नहीं कर सके। क्या आपकी रिपोर्टिंग के बाद समस्या खत्म हो गई! या उस राज्य से विज्ञापन बंद होने के डर से आप सवाल नहीं कर सकते हैं?

एक आंकड़ा बाबू बैठकर बता रहे हैं कि 2014 में यही हुआ था। केंद्रीय मंत्री ने छल किया, कुछ नहीं किया। पर बाबू साहेब आप तो बिहार की माटी के हैं! आपने क्या किया? एक पैकेट ओआरएस भिजवा देते। एक साहेब केंद्रीय मंत्री से सवाल करके विडियो शेयर करके दम किए हैं कि उन्होंने सवाल किया और पत्रकारिता बचा ली और पता नहीं क्या-क्या!

मेरे प्यारे वरिष्ठ पत्रकारों, बच्चों की मौत को कम से कम न बेचो? वहां गए हैं आप तो लाख रुपए की तनख्वाह में से एक हजार के ओआरएस खरीद कर बांट दो। किसी मां-बाप को ढांढस बंधा दो। एक सवाल है, हिम्मत हो तो जवाब दीजियेगा। खुदा न खास्ता कि अगर उसी अस्पताल में आप अपने बच्चे को लेकर जाते और उन मृतकों के परिवार का कोई पत्रकार आपसे ऐसे बेहूदे सवाल पूछता और बच्चे के इलाज में मदद के बजाय देरी करवाता तो आप क्या करते? हां! आपसे ये नहीं हो पा रहा तो कृपा करके आप वो न करो, जो आप कर रहे हो।

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

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