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'लगता है कि मोदीजी सरकारी कागजी आंकड़ों पर भरोसा कर रहे हैं’
समय रहते ध्यान न दिया गया तो अगली बारी उत्तर प्रदेश की है। आज की स्थिति को बचाया नहीं जा सकता।
पूरन डावर 6 years ago
पूरन डावर, चिंतक एवं विश्लेषक।।
भाजपा ने केजरीवाल (आप) को वाकओवर दिया है। सात-सात सांसद होते हुए भी दिल्ली, दिल्ली नेतृत्वविहीन है। एक समय होता था, जब देश के चुनिंदा सांसद दिल्ली से होते थे। बलराज मधोक, मनोहर लाल सोंधी, विजय कुमार मल्होत्रा, डॉ.भाई महावीर जैसे कद्दावर सांसद होते थे। अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी भी दिल्ली से सांसद रहे। मदन लाल खुराना जैसे जुझारू नेता मुख्यमंत्री रहे।
आखिर क्या कारण है कि आज दिल्ली जैसे प्रदेश या कहें कि देश की राजधानी में किराये के या गायकों/अभिनेताओं को ढूंढा जाता है। दिल्ली के कोर वोट जो पक्के भाजपाई हैं, को छोड़कर भोजपुरी,पूर्वांचल की गायकी से राजनीति हो रही है। अभिनेताओं और दलबदलुओं पर भरोसा किया जाता है। हद तो तब हो जाती है जब देश के कद्दावर नेता, दिल्ली के मूल निवासी, दिल्ली विश्वविद्यालय के अध्यक्ष रहे अरुण जेटली (अब दिवंगत) को दिल्ली छोड़कर अमृतसर से लड़ाया जाता है। क्या अच्छा होता कि परिचित कद्दावर चेहरों को दिल्ली से लड़ाया जाता।
दिल्ली की रही सही छवि दिल्ली नगर निगम ने समाप्त कर रखी है, जो देश के सर्वाधिक भ्रष्ट निगमों में से एक है। मोदीजी के नाम पर सांसद तो चुने जा सकते हैं। राज्य एक बार चुने जा सकते हैं, लेकिन दोबारा नहीं। राज्यों को कार्य करना ही होगा। समय रहते ध्यान न दिया गया तो अगली बारी उत्तर प्रदेश की है। आज की स्थिति को बचाया नहीं जा सकता। लगता है कि मोदीजी सरकारी कागजी आंकड़ों पर भरोसा कर रहे हैं। शौचालयों से लेकर, PMY आवास, मुद्रा ऋण, बिजली कनेक्शन सभी फ़र्जी आंकड़े हैं। ऐसे ही नसबंदी के आंकड़े अधिकारी संजय गांधी को दिया करते थे।
केंद्रीय मंत्रालयों को छोड़कर बाकी सभी भाजपा राज्यों में भ्रष्टाचार चरम पर है। आम जनता को घोटालों से सीधे अंतर नहीं पड़ता, लेकिन रोजमर्रा में राहत कतई नहीं है। कर विभाग फेसलेस में जाने के कारण आखिरी दिनो में खुलेहाथों से लूट रहे हैं। पर्यावरण लागू करने की प्रभावी नीति न बनाकर दोहन और उद्योगों को बंद किया जा रहा है और बेरोजगारी की समस्या बढ़ रही है।
जो दिखता है, वो बिकता है। उत्तराखंड को स्विट्जरलैंड बनाने की बात हो। जैसे- वॉटरफ़्रंट, गंगा की सफाई हो, अभी कोई दिशा या मॉड्यूल ही नहीं है। स्मार्ट सिटी का जो हश्र है, समय रहते वास्तविक जामा न पहनाया गया तो केजरीवाल जैसा व्यक्ति आसानी से पछाड़ सकता है दिल्ली के चुनाव परिणाम सबक हैं। वैसे भी भारत की राजनीति संगठन आधारित कम नेतृत्व आधारित है। यहां चुनाव नेहरू जीतते थे, इंदिरा जीतती थीं, मायावती जीतती हैं, मुलायम जीतते हैं और आज मोदीजी जीत रहे हैं।
मोदीजी का नेतृत्व अदित्वीय है, निर्णय अभूतपूर्व है, लेकिन ये संवेदनशील मुद्दे लंबे समय तक तभी कारगर हो सकते हैं कि विकास सड़क पर दिखे। जो दिखता है वो बिकता है। उत्तर प्रदेश 30 जून तक गड्ढा मुक्त...से अधिक वीभत्स उदाहरण हो नहीं सकता। घोषणाएं और दावे नहीं, कार्य होने चाहिए। जब सड़कें गड्ढामुक्त होंगी तो दिव्यांग को भी दिखायी देंगी। उसकी लाठी भी गड्ढे में नहीं जाएगी।
(यह लेखक के निजी विचार हैं)
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