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यह यक्ष प्रश्र 2023 का मेरे लिए नहीं, समूची मीडिया व पत्रकारिता के लिए है: मनोज कुमार
पत्रकारिता और मीडिया के मध्य की लक्ष्मण रेखा सिमट गई। पत्रकारिता समाज का आईना था, तो मीडिया समाज का न्यायाधीश बना हुआ है।
समाचार4मीडिया ब्यूरो 2 years ago
मनोज कुमार, वरिष्ठ पत्रकार ।।
बाबूराव विष्णु पराडकर जी का पत्रकारिता के वर्तमान संदर्भ में सहज ही स्मरण हो आता है। वे भविष्यदृष्टा थे और उन्होंने कहा था कि ‘पत्र सर्वांग सुन्दर होंगे, आकार बड़े होंगे, छपाई अच्छी होगी, मनोहर, मनोरंजक और ज्ञानवर्धक चित्रों से सुसज्जित होंगे, लेखों में विविधता और कल्पनाशीलता होगी। गम्भीर गद्यांश की झलक और मनोहारिणी शक्ति भी होगी। ग्राहकों की संख्या लाखों में गिनी जाएगी। यह सब होगा, पर समाचार पत्र प्राणहीन होंगे। समाचार पत्रों की नीति देशभक्त, धर्मभक्त या मानवता के उपासक महाप्राण संपादकों की नीति न होगी। इन गुणों से सम्पन्न लेखक विकृत मस्तिष्क के समझे जाएंगे। संपादक की कुर्सी तक उनकी पहुंच भी न होगी।
आज उनकी बात सौ फीसद खरी उतर रही है। हालांकि पराडकर जी पत्रकारिता करते थे और हम मीडिया के दौर में हैं। उन्होंने टेलीविजन की कल्पना भी नहीं की थी और आज हम सौ-दो सौ टेलीविजन चैनलों से घिरे हैं। पत्रकारिता कब मीडिया में परिवर्तित हो गई, समाज भी इससे बेखबर रहा। पत्रकारिता और मीडिया के मध्य की लक्ष्मण रेखा सिमट गई। पत्रकारिता समाज का आईना था, तो मीडिया समाज का न्यायाधीश बना हुआ है। इन्हीं हालात में मीडिया की विश्वसनीयता पर पहले विमर्श हुआ करता था, अब यह विमर्श भी नेपथ्य में चला गया है। आम धारणा बन गई है कि जो दिखाया और सुनाया जा रहा है, उसकी स्क्रिप्ट पहले से लिखी जा चुकी है। इधर या उधर के पक्ष या विपक्ष में चर्चा चल रही है। सच क्या है, इससे ना मीडिया को लेना-देना है और ना समाज का ताल्लुक रह गया है। आहिस्ता-आहिस्ता लोग टेलीविजन से दूरी बनाने लगे हैं। आम आदमी को लगने लगा है कि वे ऐसे ही प्रोग्राम देखते रहे तो उनका मानसिक स्वास्थ्य खराब हो जाएगा, जिस तरह से टेलीविजन के पर्दे पर चीख-चीख कर अपनी बात रखी जाती है, जिस तरह से एंकर मेहमानों को डांटते हैं और लगभग अपने पक्ष में बात करने के लिए मजबूर करते हैं, वह सभी अवधारणा को ध्वस्त करते दिखता है।
इस समय मीडिया में दो ग्रुप बंट गए हैं। एक जो पर्दे पर काबिज है और दूसरा जो पर्दे से बाहर है। पर्दे पर काबिज मीडिया साथी लगभग नौकरी कर रहे हैं। उन्हें संकेत दिया जाता है कि क्या बोलना और कितना बोलना है। और वे उतना ही बोलते हैं। एक दूसरा ग्रुप है, जो पर्दे के बाहर है और अपना-अपना यूट्यूब चैनल लिए गरियाने की मुद्रा में रहता है। उसे लगता है कि सबकुछ गलत हो रहा है। उसे भ्रम होता जा रहा है कि घने काले बादलों के बीच वे टार्च की रोशनी से पूरी दुनिया बदल देंगे। इस बात से भले ही आप कितना भी किनारा करें लेकिन सच यह है कि पत्रकारिता या मीडिया रसातल में है और इसके कर्णधार ‘ना बाप बड़ा ना भैया, सबसे बड़ा रुपय्या’ गुनगुना रहे हैं। मुझे नहीं मालूम कि इन चीखने वाले एंकर साथियों का पैकेज सही में क्या है, लेकिन जो सूचना है वह दो-तीन करोड़ सालाना पैकेज तक पहुंच जाता है तो गरिया कर अपनी-अपनी दुकान में ग्राहक (यहां व्यूवर्स को ग्राहक संबोधित किया जा रहा है) को आकर्षित कर रहे हैं। ये ग्राहक बार-बार आएंगे और जितनी दफा सर्च करेंगे, उनका टर्नओवर बढ़ेगा।
2023 के विधानसभा चुनाव ने सब सच सामने ला दिया है। तमाम किस्म के एग्जिट और ओपिनियन पोल औंधे मुंह जमीन पर गिरे पड़े हैं। ऐसा क्यों हुआ, इसके लिए बहुत ज्यादा जोर दिमाग पर डालने की जरूरत नहीं है। सबकुछ एक तयशुदा एजेंडे के तहत होता है। यदि ऐसा नहीं था तो मध्य प्रदेश-छत्तीसगढ़ में कांग्रेस का सूपड़ा क्यों साफ हो गया? एक बार माना जा सकता है कि राजस्थान में परम्परा का पालन हुआ और सरकार पांच साल में बदल गई, लेकिन मध्य प्रदेश में पांचवीं बार बम्पर जीत का कौन सा कारण था? माना गया कि मोदी-शाह की रणनीति के आगे सब फेल हो गया। यह सच हो सकता है तो फिर किस आधार पर चुनाव परिणामों की भविष्यवाणी की गई? क्या मीडिया नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए एग्जिट और ओपिनियन पोल को बंद कर देगा? यह संभव नहीं है क्योंकि इसका भी एक बड़ा बाजार है और बाजार की अपनी शर्तें होती हैं। मीडिया के बारे में कहा जाता है कि ‘जहां ना पहुंचे रवि, वहां पहुंचे कवि’ और जहां लोग नहीं पहुंच पाते हैं, वहां मीडिया पहुंच जाता है लेकिन अब यह धारणा भी धरी रह गई है। मीडिया के साथियों का राजनेताओं से वह सम्पर्क ही नहीं रहा जो कभी विश्वास का हुआ करता था। मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में मुख्यमंत्रियों के नाम को लेकर भी मीडिया गफलत में रहा और बचाव में कहा गया कि मोदी-शाह की रणनीति को समझना मुश्किल है। निश्चित रूप से उन्हें राजनीति करना है तो वे अपने स्तर पर रणनीति बनाएंगे लेकिन उनकी रणनीति को भेदने की ताकत मीडिया में समाप्त हो चुकी है, यह मान लेने में कोई गुरेज नहीं होना चाहिए।
मीडिया का संसार अब मंच पर सिमट गया है। टेक्रालॉजी की दुनिया में वह यंत्रवत काम कर रहा है। विश्वास और अविश्वास की सारी रेखाएं धूमिल पड़ गई हैं। मीडिया के साथ-साथ पत्रकारिता का हाल भी कोई ठीक नहीं है। पत्रकारिता के धुरंधर कहे जाने वाले लोग नेपथ्य में चले गए हैं या सतही विरोध में खड़े हैं। अखबार और टेलीविजन में दो बातों का फर्क रह गया है। पहला टेक्रालॉजी का और दूसरा समय का। अखबार 24 घंटे में एक बार छपकर आता है, तो टेलीविजन को 24 घंटे अपडेट रहना होता है। इस फर्क के चलते पत्रकारिता की साख कुछ बची हुई है लेकिन मीडिया साखविहीन हो गया है। ऐसे में मुझे अपने एक स्टूडेंट का सवाल भीतर तक हिला देता है, जब वे पूछते हैं कि सर, हम ऐसे में कैसे रास्ता तलाश करें? यह यक्ष प्रश्र 2023 के लिए मेरे लिए नहीं, समूची मीडिया और पत्रकारिता के लिए है। कुछ भी स्थायी नहीं और इस सूरत को बदलने के लिए हमें आगे बढऩा नहीं, पीछे लौटना पड़ेगा।
(वरिष्ठ पत्रकार और मीडिया शिक्षक, भोपाल)
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