क्यों इन मुद्दों को अपने डिबेट शो का हिस्सा नहीं बनाते हैं न्यूज चैनल्स?

दिग्गजों की सलाह को अनदेखा करना अज्ञान या गफलत की वजह से नहीं हो रहा है, इन्हें जानबूझ कर इसलिए इग्नोर किया जा रहा है ताकि सही स्थिति देश के लोगों के सामने न जा पाए

संतोष भारतीय by
Published - Friday, 30 August, 2019
Last Modified:
Friday, 30 August, 2019
Santosh Bhartiya

संतोष भारतीय, वरिष्ठ पत्रकार।।

मैं इस आशा से यह लिख रहा हूं, ताकि इन विषयों की सत्यता मेरे साथी खासकर पत्रकार साथी बता सकें कि मैं कितना सही लिख रहा हूं और कितना गलत लिख रहा हूं। हालांकि मैं जानता हूं कि मैं खुद को उस वर्ग के निशाने पर ला रहा हूं, जिसने इस कहावत को सत्य साबित किया है कि सावन के अंधे को हमेशा हरा ही हरा सूझता है। जिस-जिसकी आंखें अच्छे भविष्य का सपना देखते हुए या उसे सही मानते हुए बंद हुई हैं, वह मेरे आज के विषय को अच्छे भविष्य की आलोचना के रूप में देखेगा, लेकिन इस खतरे को उठाकर भी मैं कहना चाहता हूं कि अगर मुझे मेरे पत्रकार मित्र बता सकें कि मैं गलत विषय उठा रहा हूं तो मैं उनका आभारी रहूंगा।

आज जब भी हम न्यूज चैनल के प्रोग्राम देखते हैं, खासकर शाम 4:00 बजे से रात के 10:00 बजे तक के प्रोग्राम, तब लगता है कि हमारे न्यूज चैनल के विषयों का चयन करने वाले भारत में नहीं, बल्कि कहीं बाहर रहते हैं। अब विज्ञापन के द्वारा कपड़ा, धागा, चाय ऑटो कंपनियों को देश के लोगों को यह बताना पड़ेगा कि उनका उद्योग इतनी खस्ता हालत में पहुंच गया है कि जिसे बर्बाद कहना भी स्थिति की भयावहता को पूरा नहीं दर्शाता।

ऑर्डिनेंस फैक्ट्रियों के 85 हजार से ज्यादा कर्मचारी अभी हड़ताल पर चले गए थे, लेकिन हमारे पत्रकार साथियों ने देश को यह नहीं बताया यह मजदूर वेतन-भत्ते या सुविधाओं के लिए हड़ताल पर नहीं गए थे, ये तो सरकार से यह कह रहे थे कि ऑर्डिनेंस सेक्टर को प्राइवेट या कारपोरेट क्षेत्र में नहीं दिया जाए, जिसकी कि सरकार योजना बना रही है। रेलवे के मजदूर हड़ताल पर जाने वाले हैं, क्योंकि उनकी मांग है कि रेलवे को निजी क्षेत्र में न दिया जाए, क्योंकि इससे करोड़ों लोगों की नौकरियां चली जाएंगी।

बीएसएनल, जेट एयरवेज के बहुत से कर्मचारियों की नौकरियां जा चुकी हैं। डॉलर की तुलना में रुपया 73 क्रॉस कर गया है, सोना 40000 छू रहा है। इतना ही नहीं, बैंकिंग सेक्टर बुरी तरह लड़खड़ा रहा है। न जाने कब बैंक देश के लोगों को धोखा देकर उनकी बचत का पैसा वापस करने से साफ मना कर दें। सेना में पोस्ट कम कर दी गई हैं।

क्या इनके ऊपर न्यूज चैनल्स पर चर्चा नहीं होनी चाहिए? जैसे जेट एयरवेज बंद हो गई, एयर इंडिया 7600 करोड़ के घाटे में है, इसे बेचने की एक बार कोशिश हो चुकी है, लेकिन कोई खरीददार नहीं मिला। दोबारा इसकी कोशिश में भारत सरकार की टीम दुनियाभर में घूम रही है।  बीएसएनल में 54000 नौकरियां खतरे में हैं, भारत की शान रहे हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड जिसे एचएएल के रूप में जानते हैं, उसके पास अब कर्मचारियों को वेतन देने के लिए भी पैसा ही नहीं है, ऑटो इंडस्ट्री संकट में है। 12.76 लाख घर देश के 30 बड़े शहरों में खड़े हैं, लेकिन उनका कोई खरीदार नहीं है। एयरसेल कंपनी खत्म हो चुकी है, जेपी ग्रुप डूबने के कगार पर है।

भारत सरकार को सबसे ज्यादा मुनाफा देने वाली ओएनजीसी और पंजाब नेशनल बैंक लगातार घाटे में जा रहा है। बैंकों ने 2.4 लाख करोड़ माफ कर दिया है, वह भी सिर्फ कुछ औद्योगिक घरानों का, सारे बैंक लगातार घाटा दे रहे हैं। देश के ऊपर 500 बिलियन से ज्यादा उधार है, रेलवे बेचने की पूरी तैयारी सरकार कर चुकी हैं और मौजूदा रेल मंत्री इसकी भिन्न-भिन्न योजनाएं बना रहे हैं। लाल किले की तरह पुरातत्व की नजर से सभी ऐतिहासिक इमारतों को किराए पर देने की पूरी योजना सरकार के पास तैयार हैं, देश की सबसे बड़ी कार बनाने वाली कंपनी मारुति ने अपना उत्पादन घटा दिया है, देश की कारों में लगने वाले सामान फैक्ट्रियों में पड़ा हुआ है जिसकी कीमत लगभग 55000 करोड रुपए है, इनका कोई खरीददार नहीं है,

सारे देश के बिल्डर तनाव के शिखर पर हैं और उनमें से कई ने आत्महत्या भी कर ली है। इसका कारण है कि इनके पास कोई खरीदार नहीं है, इसलिए कंस्ट्रक्शन ठप पड़ा है और जीएसटी की वजह से कीमतें 18 से 28 परसेंट बढ़ गई हैं। ऑर्डिनेंस फैक्ट्री बोर्ड के तहत आने वाली कंपनियों के डेढ़ लाख से ज्यादा कर्मचारियों के परिवार पर मानसिक दबाव और आर्थिक दबाव बढ़ गया है, क्योंकि ऑर्डिनेंस फैक्ट्री बोर्ड यानी ओएफबी रक्षा मंत्रालय की प्रोडक्शन कंपनी है, जो रक्षा सामान बनाती है।

देश मैं बेरोजगारी 45 साल में आज सबसे ज्यादा है। पांच हवाई अड्डे अदानी साहब को बेच दिए गए हैं। विडियोकॉन बैंक करप्ट हो गया है, टाटा डोकोमो बर्बाद हो गया है, कैफे कॉफी डे के मालिक वीजी सिद्धार्थ ने आत्महत्या कर ली है। लोग कह रहे हैं कि हजारों फैक्ट्रियां बंद हो गई हैं और सरकार की नीतियों ने सरकारी नौकरियों के दरवाजे बंद कर रखे हैं। प्राइवेट नौकरियों के रास्ते पर सरकार ने कांटे बिछा दिए हैं और खामियां खड़ी कर दी हैं।

ऊपर से एसबीआई के चेयरमैन रजनीश कुमार का कहना है कि रेट कट की वजह से बैंकों के पास नकदी की कमी नहीं है, लेकिन लोन लेने वालों की संख्या में कमी आ गई है हर कोई लोन लेने से डर रहा है और कर्ज की मांग कमजोर पड़ गई है। मांग कमजोर पड़ने की वजह से उन्होंने जोर दिया है कि अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहन की जरूरत है। परसों रिजर्व बैंक ने भारत सरकार को 1.76 लाख करोड़ रुपए की सहायता दी है। अब इस पैसे को भारत सरकार कहां खर्च करेगी, यह साफ नहीं है। खतरा इस बात का है कि इस पैसे से सरकार के मित्र अदानी और अंबानी के पास यह रकम कहीं ना चली जाए।

रिजर्व बैंक के पुराने गवर्नर रघुराम राजन का कहना है कि अर्थव्यवस्था में लगातार जारी मंदी बहुत चिंताजनक है तथा सरकार को बैंकिंग वित्तीय, ऊर्जा क्षेत्र और गैर बैंकिंग वित्तीय क्षेत्र की समस्याओं को तुरंत हल करना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि निजी क्षेत्र में निवेश को बढ़ाने के लिए नए सुधारों की शुरुआत करनी होगी। एक बात और कही कि जिस तरह जीपीडीपी की गणना की गई है उस पर फिर विचार करना जरूरी है। ऊपर से भाजपा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी का कहना है कि इस हालत के जिम्मेदार पूर्व वित्तमंत्री अरुण जेटली की गलत नीतियां हैं और भारतीय रिजर्व बैंक के चेयरमैन भी इस स्थिति को स्वीकार कर रहे हैं।

उधर इंफोसिस के पूर्व सीईओ मोहनदास पाई कह रहे हैं कि इंडस्ट्री अब और झटके बर्दाश्त नहीं कर सकती। इंडस्ट्री को एक से बढ़कर एक झटके दिए जा रहे हैं। उदाहरण के रूप में वह कहते हैं कि पहले नोटबंदी फिर जीएसटी, आईबीसी, फिर  रेरा की वजह से इंडस्ट्री के सामने मुसीबतें खड़ी हो गई है। एनबीएफसी कंपनियां भी मुसीबत में पड़ गई हैं, बाजार में लिक्विडिटी नहीं है। धंधा करने के लिए पैसा नहीं है, इसलिए अर्थव्यवस्था व उद्योगों को और झटके की जरूरत नहीं है। सरकार को यह समझना चाहिए कि लोगों की क्रय शक्ति समाप्त हो गई है। गांव की इकोनॉमी ध्वस्त हो गई है। शहर भी बर्बादी की राह पर हैं। दूसरी ओर सरकार पर्दा डालने में व्यस्त है, क्योंकि उनकी सोच में एक ही लक्ष्य है हिंदू राष्ट्र बनाना, भले उसके लिए सब कुछ बर्बाद करना पड़े।  यह राम की नहीं रावण की सेना है, जो भेष बदलकर सीता हरण कर ले गई।

इसका उदाहरण पारले जी कंपनी है, जिसने घाटे की वजह से कर्मचारियों को नौकरी से निकाल दिया है। क्योंकि ग्रामीण भारत में 5 और 10 रुपए के बिस्कुट भी नहीं बिक रहे। अब मैं कुछ और ऐसे लोगों की सलाह सामने रखना चाहता हूं, जिन्हें न्यूज चैनल अनदेखा कर रहे हैं। अनदेखा करना अज्ञान या गफलत की वजह से नहीं हो रहा है,  इन्हें जानबूझ कर इसलिए इग्नोर किया जा रहा है, ताकि यह स्थिति देश के लोगों के सामने न जा पाए। दुनिया के सामने सब साफ है, बस देश के लोगों को जानकारी न पहुंच पाए, इसके लिए ये न्यूज चैनल अपनी पूरी ताकत लगा रहे हैं।

दीपक पारेख ऐसे व्यक्ति नहीं हैं, जिनकी चेतावनी को अनसुना या अनदेखा कर दिया जाए, वे एचडीएफसी बैंक के चेयरमैन हैं। उन्होंने कहा है कि मंद पड़ रही अर्थव्यवस्था की रफ्तार  और इकोनामी संकट के दौर से गुजर रही है। इस वक्त की सबसे बड़ी आवश्यकता है कि देनदार के विश्वास को बहाल किया जाए।  इसी से हालात सुधरेंगे। अभी बैंक कर्ज देने में हिचक रहे हैं, कुछ ही चुनिंदा लोगों को फंडिंग मिल पा रही है।

बजाज, l&t, महिंद्रा, मारुति सुजुकी, यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस, टाटा स्टील, टाटा मोटर्स, एयरटेल, वोडाफोन, आइडिया, निशान, ऑडी, नेशनल इंश्योरेंस, ओरिएंटल इंश्योरेंस जैसी कई बड़ी कंपनियां इस समय भारी आर्थिक मंदी का सामना कर रही हैं। अकेले ऑटोमोबाइल सेक्टर में पिछले 4 महीनों में 3:30 लाख से ज्यादा लोग नौकरी से हाथ धो बैठे हैं।

कुछ अनुमान भी देखिए, जिनसे भविष्य का अंदाजा बनता है, जिन्हें न्यूज चैनल्स पूरी तरह से नजरअंदाज किए हुए हैं। इंफॉर्मेशन और आईटी सेक्टर ने इस साल अंदाजा लगाया है कि 37% नौकरियों में कमी आ सकती है। एफआईडीए ने बताया है ऑटो सेक्टर में आने वाले कुछ महीनों में 1000000 लोगों की नौकरियां संकट में हैं।

एसबीआई के चेयरमैन का कहना है, ‘मंदी से निकलने में सिर्फ और सिर्फ भगवान का ही सहारा है। मैं रोज सुबह जाता हूं, आसमान की तरफ देखता हूं कि हे परमेश्वर, हमें इस संकट से मुक्ति दिला दे।’ बजाज के एमडी राजीव बजाज ने कहा है कि ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री कोई चाय की दुकान नहीं है, जिसे रातोंरात बंद करके फिर चालू किया जा सके।  देश में 200 से ज्यादा कार शोरूम बंद कर दिए गए हैं, जिससे लगभग 25000 लोगों की नौकरी चली गई है। इसमें वह संख्या शामिल नहीं है, जो कार बनाने का या पूरे ऑटोमोबाइल सेक्टर का सहयोगी सामान बनाने का सेक्टर है, जिससे लाखों लोग एक झटके में सड़क पर आ गए हैं।

बजाज ग्रुप के चेयरमैन राहुल बजाज का कहना है कि ना मांग है और ना निवेश है, तो क्या आसमान से उतरकर विकास आएगा? आरबीआई के गवर्नर ने एक कार्यक्रम में कहा कि अर्थव्यवस्था अनिश्चितता के दौर से गुजर रही है। देश मैं सबसे ज्यादा रोजगार उपलब्ध कराने वाला टेक्सटाइल सेक्टर मंदी की मार झेल रहा है और लाखों लोगों के हाथ से रोजगार चला गया है। गुजरात का हीरा उद्योग विदेशी बाजारों में चमक खो बैठा है।

न्यूज चैनल इस चेतावनी का भी परीक्षण नहीं कर रहे हैं कि जहां 2013-14 में भारतीय अर्थव्यवस्था विश्व की तीन नंबर की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था थी और आज अट्ठारह-उन्नीस में हम विश्व की सातवें नंबर की अर्थव्यवस्था बन गए हैं। क्या न्यूज़ चैनल यह अंदाजा नहीं लगा पा रहे हैं कि भारत आर्थिक तौर पर बहुत ज्यादा कमजोर होता जा रहा है, कहीं मंदी बड़े स्तर पर हमें चपेट में तो नहीं लेती जा रही है।

दूसरी ओर न्यूज चैनल्स देश के सामने अनुच्छेद 370 हटाने के फैसले के पक्ष में जय जयकार कर रहे हैं। हिंदू मुसलमान का सवाल और राम मंदिर का सवाल बहस में बनाए हुए हैं  तथा पाकिस्तान के खिलाफ तत्काल कदम उठाए जाएं और संभव हो तो एंकर्स को जनरल बनाकर और जनता को सीमा पर भेजकर युद्ध कर लिया जाए, जैसा माहौल योजना पूर्वक बना रहे हैं। विकास की और अर्थव्यवस्था की बात करना देश के हित के खिलाफ है, यह महान ज्ञानी और इतिहास को बदलने की ताकत रखने वाले महान शक्तिशाली चैनल इसलिए कहते हैं, क्योंकि वह सबसे बड़ा देशद्रोही काम कर रहे हैं।

दरअसल वे मंदी दिलाने वाले तत्वों के भारत में एजेंट बन गए हैं, यह बेरोजगारों के दुश्मन हैं, जनता के जानकारी पाने के अधिकार को तबाह करने के सबसे बड़े षड्यंत्रकारी हैं  या फिर यह इतने बड़े अज्ञानी हैं कि इन्हें क्या विषय लेना चाहिए, यह पता ही नहीं है  या देश किस स्थिति से गुजर रहा है, इसकी समझ ही नहीं है। शेर याद कीजिए...हर शाख पे उल्लू बैठा है अंजामे गुलिस्तां क्या होगा?

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

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'13 फरवरी को विश्व रेडियो दिवस मनाने के पीछे ये है वजह'

महान भारतीय वैज्ञानिक सर जगदीश चंद्र बोस ने सबसे पहले रेडियो की खोज की, परन्तु आर्थिक कठिनाइयों के कारण वह इसे व्यावहारिक रूप नहीं दे सके।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Thursday, 13 February, 2020
Last Modified:
Thursday, 13 February, 2020
amita kamal

अमिता कमल, आरजे, आकाशवाणी, ज्ञान वाणी एफएम।।

हर दिन कोई न कोई दिवस होता ही है। वर्ष 2012 से पहले रेडियो का कोई दिवस नहीं था, तो इस कमी को पूरा करने की दृष्टि से 20 अक्टूबर 2010 में स्पेनिश रेडियो अकादमी के अनुरोध पर स्पेन ने संयुक्त राष्ट्र में रेडियो को समर्पित विश्व दिवस मनाने के लिए सदस्य देशों का ध्यान आकर्षित किया। जिसे स्वीकार कर लिया गया और संयुक्त राष्ट के शैक्षणिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन यूनेस्को ने पेरिस में आयोजित 36वीं आमसभा में 3 नवंबर 2011 को घोषित किया कि प्रत्येक वर्ष 13 फरवरी का दिन 'विश्व रेडियो दिवस' के तौर पर मनाया जायेगा।

यह दिन इसलिए चुना गया, क्योंकि इसी दिन संयुक्त राष्ट्र संघ के 'रेडियो यूएनओ' की वर्षगांठ भी होती है। इसी दिन 13 फरवरी 1946 को यह रेडियो स्टेशन स्थापित हुआ था, उसी की याद में इस दिवस के तौर पर मनाया जाता है। विश्व के सभी देशों के रेडियो प्रसारकों और श्रोताओं को एक मंच पर लाने के उद्देश्य से शुरू की गई यह पहल अपने उद्देश्यों में सफल रही है।

महान भारतीय वैज्ञानिक सर जगदीश चंद्र बोस ने सबसे पहले रेडियो की खोज की, परन्तु आर्थिक कठिनाइयों के कारण वह इसे व्यावहारिक रूप नहीं दे सके। आधुनिक रेडियो की खोज इटली के महान वैज्ञानिक मार्कोनी ने की। उन्होंने रेडियो का अविष्कार किया। मार्कोनी को उनके अविष्कार के लिए वर्ष 1909 में भौतिकी का नोबेल पुरस्कार दिया गया था।

परन्तु टीवी के आविष्कार के बाद से रेडियो सुनने वाले श्रोताओं में कमी आई है। गांव में इसकी लोकप्रियता वैसी ही है। शायद यही कारण रहा कि माननीय प्रधानमंत्रीजी ने अपने मन की बात पहुंचाने का जरिया रेडियो को ही चुना।

कुछ देशों में रेडियो शिक्षा पहुंचाने का काम करता है। भारत में इसी बात को ध्यान में रखकर वर्ष 2000 में भारत का पहला शैक्षणिक रेडियो स्थापित किया गया। इसका उद्देश्य देश के जन-जन तक शिक्षा का प्रचार प्रसार करना है। इस रेडियो का नाम दिया गया 'ज्ञान वाणी।' ज्ञान वाणी अपने कई कार्यक्रमों के साथ लोगों का मनोरंजन तो कराता ही है, साथ ही शैक्षणिक जानकारी भी अपने श्रोताओं तक पहुंचाता है।

एक सर्वे के अनुसार सबसे ज्यादा रेडियो भारत के किसान और फौजी वर्ग के लोग सुनते हैं। इस बात की प्रमाणिकता उनके द्वारा आये फोन कॉल्स और संदेशों से होती है। यह एक मात्र ऐसा माध्यम है, जिसकी पहुंच अन्य माध्यमों के मुकाबले काफी अधिक है। सरकार को इस सुन्दर माध्यम की ओर ध्यान देना चाहिए।

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'लगता है कि मोदीजी सरकारी कागजी आंकड़ों पर भरोसा कर रहे हैं’

समय रहते ध्यान न दिया गया तो अगली बारी उत्तर प्रदेश की है। आज की स्थिति को बचाया नहीं जा सकता।

पूरन डावर by
Published - Monday, 10 February, 2020
Last Modified:
Monday, 10 February, 2020
Narendra Modi

पूरन डावर, चिंतक एवं विश्लेषक।।

भाजपा ने केजरीवाल (आप) को वाकओवर दिया है। सात-सात सांसद होते हुए भी दिल्ली, दिल्ली नेतृत्वविहीन है। एक समय होता था, जब देश के चुनिंदा सांसद दिल्ली से होते थे। बलराज मधोक, मनोहर लाल सोंधी, विजय कुमार मल्होत्रा, डॉ.भाई महावीर जैसे कद्दावर सांसद होते थे। अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी भी दिल्ली से सांसद रहे। मदन लाल खुराना जैसे जुझारू नेता  मुख्यमंत्री रहे।

आखिर क्या कारण है कि आज दिल्ली जैसे प्रदेश या कहें कि देश की राजधानी में किराये के या गायकों/अभिनेताओं को ढूंढा जाता है। दिल्ली के कोर वोट जो पक्के भाजपाई हैं, को छोड़कर भोजपुरी,पूर्वांचल की गायकी से राजनीति हो रही है। अभिनेताओं और दलबदलुओं पर भरोसा किया जाता है। हद तो तब हो जाती है जब देश के कद्दावर नेता, दिल्ली के मूल निवासी, दिल्ली विश्वविद्यालय के अध्यक्ष रहे अरुण जेटली (अब दिवंगत) को दिल्ली छोड़कर अमृतसर से लड़ाया जाता है। क्या अच्छा होता कि परिचित कद्दावर चेहरों को दिल्ली से लड़ाया जाता।

दिल्ली की रही सही छवि दिल्ली नगर निगम ने समाप्त कर रखी है, जो देश के सर्वाधिक भ्रष्ट निगमों में से एक है। मोदीजी के नाम पर सांसद तो चुने जा सकते हैं। राज्य एक बार चुने जा सकते हैं, लेकिन दोबारा नहीं। राज्यों को कार्य करना ही होगा। समय रहते ध्यान न दिया गया तो अगली बारी उत्तर प्रदेश की है। आज की स्थिति को बचाया नहीं जा सकता। लगता है कि मोदीजी सरकारी कागजी आंकड़ों पर भरोसा कर रहे हैं। शौचालयों से लेकर, PMY आवास, मुद्रा ऋण, बिजली कनेक्शन सभी फ़र्जी आंकड़े हैं। ऐसे ही नसबंदी के आंकड़े अधिकारी संजय गांधी को दिया करते थे।

केंद्रीय मंत्रालयों को छोड़कर बाकी सभी भाजपा राज्यों में भ्रष्टाचार चरम पर है। आम जनता को घोटालों से सीधे अंतर नहीं पड़ता, लेकिन रोजमर्रा में राहत कतई नहीं है। कर विभाग फेसलेस में जाने के कारण आखिरी दिनो में खुलेहाथों से लूट रहे हैं। पर्यावरण लागू करने की प्रभावी नीति न बनाकर दोहन और उद्योगों को बंद किया जा रहा है और बेरोजगारी की समस्या बढ़ रही है।

जो दिखता है, वो बिकता है। उत्तराखंड को स्विट्जरलैंड बनाने की बात हो। जैसे- वॉटरफ़्रंट, गंगा की सफाई हो, अभी कोई दिशा या मॉड्यूल  ही नहीं है। स्मार्ट सिटी का जो हश्र है, समय रहते वास्तविक जामा न पहनाया गया तो केजरीवाल जैसा व्यक्ति आसानी से पछाड़ सकता है दिल्ली के चुनाव परिणाम सबक हैं। वैसे भी भारत की राजनीति संगठन आधारित कम नेतृत्व आधारित है। यहां चुनाव नेहरू जीतते थे, इंदिरा जीतती थीं, मायावती जीतती हैं, मुलायम जीतते हैं और आज मोदीजी जीत रहे हैं।

मोदीजी का नेतृत्व अदित्वीय है, निर्णय अभूतपूर्व है, लेकिन ये संवेदनशील मुद्दे लंबे समय तक तभी कारगर हो सकते हैं कि विकास सड़क पर दिखे। जो दिखता है वो बिकता है। उत्तर प्रदेश 30 जून तक गड्ढा मुक्त...से अधिक वीभत्स उदाहरण हो नहीं सकता। घोषणाएं और दावे नहीं, कार्य होने चाहिए। जब सड़कें गड्ढामुक्त होंगी तो दिव्यांग को भी दिखायी देंगी। उसकी लाठी भी गड्ढे में नहीं जाएगी।

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

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इस मानसिक दिवालिएपन पर क्या कहा जाए, मिस्टर मीडिया!

समाज में हर क्षेत्र के पूर्वजों के प्रति इतनी उदासीनता शायद ही किसी अन्य देश में होगी

राजेश बादल by
Published - Monday, 10 February, 2020
Last Modified:
Monday, 10 February, 2020
Mister Media

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।

भारत के एक प्रमुख अंग्रेजी समाचार पत्र ने जाने-माने साहित्यकार और चर्चित उपन्यास ‘पहला गिरमिटिया’ के लेखक पद्मश्री गिरिराज किशोर के निधन की खबर प्रकाशित की तो उसमें विश्व हिंदू परिषद के गिरिराज किशोर की तस्वीर चस्पा थी। लाखों पाठकों के लिए यह झटका था। क्या इसके पीछे हिंदी के लेखकों को नहीं जानने की कमजोरी है अथवा अखबार के प्रकाशन में देरी न हो, इसलिए जल्दी-जल्दी में क्रॉस चेक करने की अनिवार्यता का नियम टूट गया।

दूसरी बात पर यकीन नहीं किया जा सकता, क्योंकि गिरिराज किशोर का देहांत सुबह साढ़े नौ बजे ही हो गया था और अखबार अगले दिन सुबह ही प्रकाशित होना था। इसलिए, यह नहीं कहा जा सकता कि छपते-छपते सूचना मिली थी। पहली बात ही सच है कि अखबार के पत्रकार ने लापरवाही की। विडंबना है कि इस तीन कॉलम की खबर में शीर्षक में लिटरेचर की स्पेलिंग भी गलत है। तुर्रा यह है कि अंग्रेजी समाचारपत्रों के पत्रकारों का वेतन हिंदी की तुलना में अधिक होता है।

लेकिन मैं इस आधार पर हिंदी के समाचारपत्रों को भी बरी नहीं कर सकता। हिंदी के अनेक रिसालों ने इसी समाचार के साथ न्याय नहीं किया है। महात्मा गांधी के डेढ़ सौवें साल पूरे होने पर भी इस खबर के साथ अन्याय अफसोसजनक है। महात्मा गांधी पर केंद्रित ‘पहला गिरमिटिया’ उनकी कलम से तीन दशक पहले निकला। उसे साहित्य अकादमी का सम्मान मिला। भारतीय साहित्य और इतिहास में इसे बेजोड़ रचना माना गया। इसके बाद भी हिंदी के पत्रकारों ने गिरिराज जी को यथोचित नहीं दिया। बहुत से लोग तो ऐसे भी होंगे, जिन्हें गिरमिटिया का मतलब ही पता न हो। इस मानसिक दिवालिएपन पर क्या कहा जाए? समाज में हर क्षेत्र के पूर्वजों के प्रति इतनी उदासीनता शायद ही किसी अन्य देश में होगी।

इसी तरह बरसों पहले बिहार के एक केंद्रीय मंत्री का निधन हुआ तो उनके स्थान पर उसी नाम के अन्य राजनेता की फोटो प्रकाशित हो गई थी। यह परंपरा केवल मुद्रित माध्यम में ही नहीं है। टेलिविजन और डिजिटल माध्यमों में भी इस तरह के कई उदाहरण हैं। टेलिविजन चैनलों में आपसी होड़ के चलते हड़बड़ी स्थाई भाव बन गया है। ऐसा अपराध होता है तो उसे भूल का प्रमाणपत्र दे दिया जाता है। पढ़ने-लिखने की छूटती जा रही आदत भी दूसरा बड़ा कारण है। चैनल संपादक अथवा अखबार संपादक भी अपने सहयोगियों के अल्पज्ञान के लिए जिम्मेदार हैं।  

नहीं भूलना चाहिए कि प्रकाशन के बाद कोई भी रिसाला एक दस्तावेज हो जाता है। अगले दिन के अंक में भूल सुधार या खंडन कितने लोग पढ़ते हैं। आज मेरे पुस्तकालय में आजादी से पहले की अनेक पत्र पत्रिकाएं हैं। इनमें कितनी सूचनाओं में तथ्यात्मक त्रुटियां हैं-कौन जानता है। मगर आने वाली पीढ़ियों के लिए यह प्रामाणिक संदर्भ सामग्री है। इसे ध्यान में रखिए मिस्टर मीडिया!

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल की 'मिस्टर मीडिया' सीरीज के अन्य कॉलम्स आप नीचे दी गई हेडलाइन्स पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं-

चुनाव कवरेज के सारे नियम-संतुलन टूट रहे हैं, मिस्टर मीडिया!

पत्रकार पर हमला स्वीकार्य नहीं, लेकिन छिपी चेतावनी भी समझनी होगी मिस्टर मीडिया!

अब तो यह भी कहने का समय हाथ से फिसल सा गया है कि संभल जाइए मिस्टर मीडिया!

विस्तार के साथ ही कवरेज का दायरा सिकुड़ रहा है, परिणाम सोच लीजिए मिस्टर मीडिया!

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चुनाव कवरेज के सारे नियम-संतुलन टूट रहे हैं, मिस्टर मीडिया!

दिल्ली चुनाव में अब लगभग सौ घंटे बचे हैं। डेढ़-दो महीने तक प्रचार की हड़बोंग में इस बार पत्रकारिता की अनेक परंपराएं और नियम टूट गए और आत्म अनुशासन के किले ढह गए

राजेश बादल by
Published - Tuesday, 04 February, 2020
Last Modified:
Tuesday, 04 February, 2020
Rajesh Badal

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।

दिल्ली चुनाव में अब लगभग सौ घंटे बचे हैं। डेढ़-दो महीने तक प्रचार की हड़बोंग में इस बार पत्रकारिता की अनेक परंपराएं और नियम टूट गए और आत्म अनुशासन के किले ढह गए। मौजूदा तौर तरीकों को देखकर नहीं लगता कि कभी अखबारों के पन्नों और टेलिविजन के परदे पर समय का मीटर लगाकर कवरेज किया गया होगा।

याद आता है कि समाचार पत्रों में निर्देश जारी होते थे कि किसी विधानसभा क्षेत्र अथवा लोकसभा क्षेत्र का विश्लेषण एक ही उम्मीदवार या पार्टी के ब्यौरे से पूरा नहीं होगा। कम से कम तीन प्रत्याशियों की स्थिति किसी भी संवाददाता की कॉपी में शामिल होगी, तभी उसे जगह मिलेगी। इसी तरह ऐसा कोई संकेत नहीं दिया जाएगा, जिससे किसी भी उम्मीदवार के हारने या जीतने का संकेत मिले। राजनीतिक दल को दी जाने वाली लाइनें गिन-गिनकर प्रकाशित की जाती थीं।

कमोबेश यही हाल आकाशवाणी का था। पार्टियों के सेकंड गिने जाते थे। बुलेटिन की लाइनें और कॉपी दो-तीन बार चेक होती थी। उसके बाद ही ऑन एयर होती थी। संतुलन का अतिरेक यहां तक होता था कि कई बार मूल खबर का रूप रंग ही बदल जाता। आकाशवाणी के संवाददाता कवरेज के लिए निर्वाचन क्षेत्रों में जाते तो राजनीतिक दल उन्हें उपकृत करने के लिए खोजते फिरते और संवाददाता बचते फिरते।

उन दिनों चैनल उद्योग स्थापित नहीं हुआ था। केवल दूरदर्शन हुआ करता था। उस दौर में दूरदर्शन की आचार संहिता बड़ी सख्त होती थी। सरकार भी एक तरह से असहाय नजर आती थी। चुनाव आयोग की आचार संहिता लागू होते ही उसे तोड़ने का दुस्साहस तो दूर, पत्रकार और संपादक उससे थर थर कांपते थे। निजी चैनल आए तो उसके बाद भी कई साल तक चुनाव के दिनों में कवरेज शांत, संयत, शालीन और मर्यादित रहता था। मगर आज एक भी दिन ऐसा नहीं जाता, जब आचार संहिता की धज्जियां न उड़ाई जाती हों। आयोग बेबस सा दिखाई देता है ।

विडंबना यह है कि पत्रकारिता में अपने विवेक का इस्तेमाल भी जैसे सिकुड़ता जा रहा है। यदि प्रचार अभियान में भाषा का संयम टूटा है और नेता गाली गलौज पर उतर आए हैं तो हम भी उसे दोगुने आवेग के साथ प्रकाशित या प्रसारित करते हैं। यदि कोई आपत्तिजनक दृश्य होता है तो उसे भी परदे पर पेश करने में परहेज नहीं करते।

अक्सर इस तरह के दृश्य सिर्फ पब्लिसिटी का हिस्सा होते हैं और हम उसका शिकार बन जाते हैं। कभी-कभी तो ऐसा भी होता है कि देशद्रोही नारे पहचान छिपाए लोग लगाते हैं और टीवी पर वे उस समूह के हिस्से में चले जाते हैं, जिसे उनका विरोधी बदनाम करना चाहता है। असलियत तो यह है कि विरोधी ही ऐसे नारों को प्रायोजित करता है। हम उसकी चाल में आ जाते हैं। उसका षड्यंत्र कामयाब हो जाता है। हम उसके पीछे की मंशा भी नहीं समझ पाते। हमें संयम, विवेक और अक्ल से काम लेना होगा मिस्टर मीडिया!

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‘पार्किंग ओनर के रिस्क पर और रिपोर्टिंग रिपोर्टर के रिस्क पर’

देश के सबसे तेज चैनल की एंकर अंजना ओम कश्यप जब शाहीन बाग पहुंचीं तो शाहीन बाग ने आंचल खोलकर उनका स्वागत किया।

प्रमिला दीक्षित by
Published - Friday, 31 January, 2020
Last Modified:
Friday, 31 January, 2020
Pramila Dixit

प्रमिला दीक्षित, वरिष्ठ पत्रकार।।

तालों में नैनीताल बाकी सब तलैया...

बागों में शाहीन बाग बाकी सब हैं बगिया!

प्रश्न-जब एनआरसी है ही नहीं तो आप विरोध क्यूं कर रहे हैं?

उत्तर-ये भगत सिंह का देश है।

देश के सबसे तेज चैनल की एंकर अंजना ओम कश्यप जब शाहीन बाग पहुंचीं तो शाहीन बाग ने आंचल खोलकर उनका स्वागत किया। दस लोग जवाब देने के लिए नियुक्त कर दिए और पांच-छह लोग उनके बगल में खड़े हो गए, जो हर सवाल के जवाब के लिए इशारा करके निर्धारित करते थे कि जवाब कौन देगा।

मजेदार बात ये कि पगड़ीधारी सिख, सफेद लबादे में ईसाई धर्मप्रचारक और गेरुए वस्त्र में एक संत-इस तरह तैनात थे कि शाहीन बाग की इस धर्मनिरपेक्षता पर किसी का भी दिल बाग बाग हो जाए।

सत्रह साल की एक बच्ची से जब कई दफा तर्कों के साथ एंकर ने पूछा- बेटा जब एनआरसी है ही नहीं और सीएए में किसी की नागरिकता नहीं जा रही तो फिर आप किसकी मुखालिफत कर रहे हो? तो बात ‘वो सभी का खून शामिल है यहां की मिट्टी में’ टाइप तर्क पर आ गई।

इसलिए तो सीएए समर्थक कह रहे हैं कि अगर ऐसी ही बात है तो सभी का टैक्स शामिल है इसमें, जो घेरी है सड़क वो भी तो किसी के बाप की नहीं है!

कमाल करते हो यार!

सत्रह साल की उस बच्ची से लेकर नब्बे साल की दादी तक की बातों से साफ था, कितने गुमराह कितने अंधेरे में हैं वो कानून को लेकर। एक घंटे के टेलिकास्ट ने साफ कर दिया कि ये धरना-प्रदर्शन महज आशंका पर आधारित धरना है।

बहुत शानदार आजतक! ज्यादा तर्क-वितर्क तो वहां मुमकिन थे नहीं, लेकिन आपने कम से कम लोगों को दिखा दिया कि शाहीन बाग का धरना आशंका का धरना ही है। ज्यादा तर्क-वितर्क से माहौल बिगड़ने की आशंका होते ही अंजना नजारे दिखाने लगतीं कि देखिए दूर-दूर तक, सिर्फ मोबाइल फोन की लाइटें बता रही हैं कि कितने लोग यहां जुटे हैं।

खैर ये अंजना के शो तक ही सीमित रहा। आजतक के ही अंग्रेजी चैनल ने जब मेहमानों के साथ वहां अभिव्यक्ति की आजादी को पर लगाने की कोशिश की तो मेहमानों को सिर पर पैर रखकर भाग खड़े होना पड़ा।

इस्लाम खतरे मे दिखा तो शाहीन बाग एकजुट हो गया और हिंदू खतरे में दिखा तो दीपक चौरसिया और सुधीर चौधरी एकसाथ आ गए। टीआरपी के कलयुग में जब एक रिपोर्टर पिटता है तो दूसरा चैनल सुध तक नहीं लेता। ऐसे में दीपक चौरसिया को अकेले टीआरपी लूटते देख, जी न्यूज का न्यूज नेशन के साथ आना नया प्रयोग बन गया।

शाहीन बाग में सबका स्वागत खुले दिल से हो ऐसा नहीं है। अलग-अलग बैरिकेड और दूरी निर्धारित हैं। जी न्यूज का रिपोर्टर 500 मीटर दूर तक, रिपब्लिक का 800 मीटर और न्यूज नेशन वालों की तो अब दूर से ही नमस्ते है।

एबीपी न्यूज के रिपोर्टर्स के कुदरती खाने वाले विडियो वायरल हैं। जब शाहीन बाग में एक शख्स से पूछा गया कि खाना कहां से आ रहा है, उसने कहा रात में कुदरती आ जाता है। बड़ा दिलचस्प विडियो है। इस विडियो को देखकर प्रसंग संदर्भ समेत व्याख्या की जा सकती है कि जहां तर्क दम तोड़ दें, वहां से रिपोर्ट करना कितना आसान या कितना मुश्किल है।

हालांकि दीपक चौरसिया और सुधीर चौधरी के बाद आजतक और आजतक के बाद रवीश कुमार के बाद एबीपी न्यूज के बाद राहुल कंवल के बाद इंडिया टीवी के सौरव शर्मा के बाद और टीवी भारतवर्ष के बाद एकाध रिपब्लिक भारत या सीएनबीसी आवाज को ही मलाल रह गया होगा कि हाय हुसैन, हम क्यों न हुए शाहीन!

जैसे दिल्ली में पार्किंग ओनर के रिस्क पर होती है। शाहीनबाग में रिपोर्टिंग रिपोर्टर के रिस्क पर। संपादक प्राइम टाइम में टीवी पर बैठकर शाहीन बाग, जामिया या नागरिकता कानून विरोधियों की जितनी लानत-मलानत करते हैं, अगले दिन इन इलाकों की सड़कों पर उनके रिपोर्टर उतनी ही तेजी से दौड़ा लिए जाते हैं!

जी न्यूज के कैमरामैन को जामिया में भीड़ ने घेरकर मारा। दाद देनी होगी रिपोर्टर की जो मौके से भागा नहीं, बल्कि पिटते कैमरामैन को बचाने के लिए हिंसा पर उतारू भीड़ के बीच घुस गया। रिपब्लिक भारत की एक महिला रिपोर्टर को भी दल्ले-दल्ले के नारों के बीच किसी तरह अपनी इज्जत बचाने की जद्दोजहद करते देखा।

वैसे जितनी मारपीट, गालीगलौज, छीनाझपटी जी न्यूज और रिपब्लिक भारत के रिपोर्टर्स के साथ हो रही है, उसका एक दो परसेंट भी एनडीटीवी जैसे किसी चैनल के रिपोर्टर के साथ हुआ होता तो टीवी कितने दिन काला रहता?

खैर.....हम सहिष्णु हैं हम देखेंगे। टीवी जो जो दिखाएगा, हम देखेंगे। बस बांचने की आजादी बनी रहे।

(ये लेखिका के निजी विचार हैं।)

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पत्रकार पर हमला स्वीकार्य नहीं, लेकिन छिपी चेतावनी भी समझनी होगी मिस्टर मीडिया!

पत्रकारिता धर्म भी विकट है। अगर किसी जन आंदोलन का कवरेज छोड़ दिया जाए तो आरोप लगने लगते हैं।

राजेश बादल by
Published - Monday, 27 January, 2020
Last Modified:
Monday, 27 January, 2020
mister-media

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार ।।

कमाल का लोकतांत्रिक विरोध है। धरना, अनशन, प्रदर्शन, रैली और सभाएं सरकार या सिस्टम के प्रति विरोध करने के औपचारिक तरीके हो सकते हैं। गांधी युग से लेकर आज तक इन्हें असहमति की सार्थक शैली माना गया है। लेकिन जब इन आंदोलनों की गाड़ी पटरी से उतर जाए और उसमें हिंसा दाखिल हो जाए तो उस असहमति को नैतिक समर्थन कौन देगा? महात्मा गांधी अपने किसी आंदोलन में हिंसा उभरते देखते थे तो या तो उसे समाप्त कर देते अथवा उससे खुद को अलग कर लेते थे। यही उनकी ताकत थी। इस ताकत को नपुंसक स्वरूप क्यों दिया जाना चाहिए?

पत्रकारिता धर्म भी विकट है। अगर किसी जन आंदोलन का कवरेज छोड़ दिया जाए तो आरोप लगने लगते हैं। अगर कोई पत्रकार आंदोलन स्थल पर जाए और वहां उसकी पिटाई हो, कैमरे छीन लिए जाएं और उसे जान बचाकर वापस आना पड़े तो उस विरोध को कोई जायज नहीं कहेगा। दीपक चौरसिया के साथ जो व्यवहार प्रदर्शनकारियों ने किया, वह इस बात का सबूत है कि वे स्वयं तो अपनी असहमति को व्यक्त करने के सारे हथियार चलाना चाहते हैं, लेकिन पत्रकारिता धर्म पर डटे संवाददाताओं से पार्टी बनकर उनके साथ खड़े होने की अपेक्षा करते हैं। आखि़र वे अपने ऑर्केस्ट्रा से वही धुन क्यों निकलते देखना चाहते हैं, जिसका उपयोग वे सरकार के खिलाफ कर रहे हैं। यह कोई फरमाइशी कार्यक्रम नहीं है कि जो गीत आपको पसंद है, वही पत्रकारिता गाती रहे। मत भूलिए कि सरकार के इसी रवैए का तो आप प्रतिरोध कर रहे हैं कि वह भी अपने पसंद की धुन सुनना चाहती है। तरकश के तीर जब आप आंदोलन में निकालते हैं और धनुर्धर अनाड़ी हो तो तीर उलट कर खुद को ही लगने का खतरा रहता है। गांधीजी उलट कर लगने वाले इसी तीर से बचते थे।

लेकिन दीपक चौरसिया पर आक्रमण के पीछे पत्रकारिता करने वालों के लिए भी एक संदेश छिपा है। आज का समाज पचास साल पहले का समाज नहीं है, जब पत्रकारों की भूमिका और उनके लेखन पर जन मानस की अगाध श्रृद्धा थी। पन्ना और परदा अब किसी पत्रकार की नीयत को छिपाता नहीं है। छपा शब्द और स्क्रीन पर बोले गए लफ्जों का पोचापन अब दर्शक और पाठक पकड़ लेते हैं। अगर मीडिया ऐसी पत्रकारिता करेगा, जिसका रिमोट किसी और के हाथ में होगा तो उसे स्वीकार नहीं किया जाएगा। अफसोस यह है कि इन दिनों पत्रकारिता में पक्ष और प्रतिपक्ष के खेमे बन गए हैं। दोनों खेमे जंग के मैदान में अपने अपने औजारों का इस्तेमाल कर रहे हैं। याद रखिए वे औजार आप चलाएं या सामने वाला खेमा- नुकसान तो पत्रकारिता का ही होगा। चाकू तरबूजे पर गिरे या तरबूजा चाकू पर- कटेगा तो तरबूजा ही मिस्टर मीडिया!

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मिस्टर मीडिया: साल भर जहरीली सांसें छोड़ता रहा मीडिया!

मिस्टर मीडिया: समय का संकेत नहीं समझने का है ये नतीजा

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सलिल सरोज का बड़ा सवाल, क्या वीर सपूतों ने इसी आशा में खून बहाया था?

अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन ने गणतंत्र को परिभाषित करते हुए कहा था कि गणतंत्र लोगों का लोगों के लिए लोगों के द्वारा किया जाने वाला शासन है अर्थात अंत:रूप में जनता ही सर्वोपरि होती है

Last Modified:
Monday, 20 January, 2020
Salil Saroj

अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन ने गणतंत्र को परिभाषित करते हुए कहा था कि गणतंत्र लोगों का लोगों के लिए लोगों के द्वारा किया जाने वाला शासन है अर्थात अंत:रूप में जनता ही सर्वोपरि होती है। जिस शासक को शासन करने के लिए चुना जाता है, वह अपनी शक्ति का दुरुपयोग करके तानाशह न बन जाए,इसलिए उसको चुनने और उसको हटाने की सारी संभावनाओं को जनता के हाथ में सौंपा गया है। अब्राहम लिंकन ने यह कथन अमेरिका के सन्दर्भ में जरूर कहा था, लेकिन दुनिया के तमाम देशों ने कतिपय इसी रूप में इसे अपनाया है । भारत और अमेरिका के बीच भाषा,संस्कृति,समाज समेत और भी कई तरह की असमानताएं हैं, लेकिन अमेरिका और भारत दोनों ही गणतंत्र की मजबूत नींव को पकड़कर आगे बढ़ रहे हैं और दूसरे राष्ट्रों को भी गणतंत्र होने के लिए सम्बल प्रदान कर रहे हैं।

भारतीय गणतंत्र को अभी आठ दशक से भी कम समय हुआ है, लेकिन इस समय अवधि में भारत के कई पड़ोसी मुल्क जैसे कि पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका, अफगानिस्तान, म्यांमार धार्मिक हिंसा, तानाशाही, जातीय नरसंहार या वंशवाद से अभिशप्त हो गए, लेकिन भारत एक जिम्मेदार गणतंत्र के रूप में सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ता ही चला गया। आखिर भारत ने भी इंग्लैंड से ही प्रेरित गणतंत्र को अपनाया, लेकिन किस तरह अपनाया कि यह विश्व के सबसे विशाल और सुदृढ़ गणतंत्र के रूप में परिणत हुआ, यह अवश्य जानकारी का विषय है। इसे बनाने में हमारे पूर्वजों और स्वतंत्रता सेनानियों ने किन बातों का ध्यान रखा, इसका अध्ययन परम आवश्यक है।

सन् 1929 के दिसंबर में लाहौर में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अधिवेशन पंडित जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में हुआ, जिसमें प्रस्ताव पारित कर इस बात की घोषणा की गई कि यदि अंग्रेज सरकार 26 जनवरी 1930 तक भारत को स्वायत्तयोपनिवेश (डोमीनियन) का पद नहीं प्रदान करेगी, जिसके तहत भारत ब्रिटिश साम्राज्य में ही स्वशासित इकाई बन जाता, तो भारत अपने को पूर्णतः स्वतंत्र घोषित कर देगा। 26 जनवरी 1930 तक जब अंग्रेज सरकार ने कुछ नहीं किया तब कांग्रेस ने उस दिन भारत की पूर्ण स्वतंत्रता के निश्चय की घोषणा की और अपना सक्रिय आंदोलन आरंभ किया। उस दिन से 1947 में स्वतंत्रता प्राप्त होने तक 26 जनवरी स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाया जाता रहा।

इसके पश्चात स्वतंत्रता प्राप्ति के वास्तविक दिन 15 अगस्त को भारत के स्वतंत्रता दिवस के रूप में स्वीकार किया गया। भारत के आजाद हो जाने के बाद संविधान सभा की घोषणा हुई और इसने अपना कार्य 9 दिसम्बर 1947 से आरम्भ कर दिया। संविधान सभा के सदस्य भारत के राज्यों की सभाओं के निर्वाचित सदस्यों के द्वारा चुने गए थे। डॉ. भीमराव आंबेडकर, जवाहरलाल नेहरू, डॉ राजेन्द्र प्रसाद, सरदार वल्लभ भाई पटेल, मौलाना अबुल कलाम आजाद आदि इस सभा के प्रमुख सदस्य थे। संविधान निर्माण में कुल 22 समितियां थीं, जिनमें प्रारूप समिति (ड्राफ्टिंग कमेटी) सबसे प्रमुख एवं महत्त्वपूर्ण समिति थी और इस समिति का कार्य संपूर्ण ‘संविधान लिखना’ या ‘निर्माण करना’ था। प्रारूप समिति के अध्यक्ष विधिवेत्ता डॉ. भीमराव आंबेडकर थे। प्रारूप समिति ने और उसमें विशेष रूप से डॉ. आंबेडकर ने 2 वर्ष, 11 माह, 18 दिन में भारतीय संविधान का निर्माण किया और संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेन्द्र प्रसाद को 26 नवम्बर 1949 को भारत का संविधान सुपुर्द किया। इसलिए 26 नवम्बर को भारत में संविधान दिवस के रूप में प्रति वर्ष मनाया जाता है।

संविधान सभा ने संविधान निर्माण के समय कुल 114 दिन बैठक की। इसकी बैठकों में प्रेस और जनता को भाग लेने की स्वतन्त्रता थी। अनेक सुधारों और बदलावों के बाद सभा के 308 सदस्यों ने 24 जनवरी 1950 को संविधान की दो हस्तलिखित कॉपियों पर हस्ताक्षर किये। इसके दो दिन बाद संविधान 26 जनवरी को यह देश भर में लागू हो गया। 26 जनवरी का महत्व बनाए रखने के लिए इसी दिन संविधान निर्मात्री सभा (कांस्टीट्यूएंट असेंबली) द्वारा स्वीकृत संविधान में भारत के गणतंत्र स्वरूप को मान्यता प्रदान की गई।

भारत अपार संभावनाओं से परिपूर्ण राष्ट्र है और इसकी सबसे बड़ी शक्ति है इसकी विभिन्नता। यहां हर तरह के लोगों ने इस देश को विश्व में एक मुकम्मल गणतंत्र बनने में मदद की है। यह जमीन गौतम बुद्ध,महावीर,गुरु नानक,भीकाजी कामा,हेनरी लुइस विवियन दरोज़ीयो, महात्मा गांधी, वीर कुंवर सिंह, भगत सिंह, मौलाना अबुल कलाम, खां अब्दुल गफ्फार खां के द्वारा पाली और पोसी गई है। इसकी हवाओं में अनेकता में एकता का राग घुला है और हर विषम परिस्थिति में यह चीज रामबाण की तरह साबित हुई है। चाहे वह 1971 का पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध हो,चाहे भूख से निजात पाने की कोशिश हो,चाहे उत्तर पूर्व में अपनी अस्मिता को बचाने की चाह हो, चाहे बारिश से डूबते हुए चेन्नई और मुंबई की जनता की जान बचाने की गुहार हो या फिर निर्भया को इन्साफ दिलाने की अदम्य इच्छाशक्ति हो,हर बार हर जाति,धर्म,लिंग,प्रान्त,समुदाय के लोगों ने मिलकर यह जिम्मा उठाया है।

‘यूनान,मिश्र,रोमां सब मिट गए जहां से
बाकी मगर है फिर भी नामों-निशां हमारा
कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी
सदियों रहा है दुश्मन दौरे-जहां हमारा।।

आजादी के 73 सालों में हम खाद्य सम्पन्न राष्ट्र बने और दूसरे देशों को आज भुखमरी से निजात दिलाने में मदद कर रहे हैं। आज हम विश्व में इसरो जैसे संस्था के पुरोधा है दूसरे देशों के कृत्रिम उपग्रह छोड़ने में मदद पहुंचा रहे हैं। पूरे विश्व के लिए हम सबसे युवा और सस्ता वर्क फोर्स दे रहे हैं और पूरी दुनिया भारतीय इंजीनियर, डॉक्टर, सॉफ्टवेयर टेक्निशियंस का लोहा मानती है। पूरे विश्व में एम्स, आईआईएम, आईआईटी ने भारत को एक ब्रैंड के रूप में प्रस्तुत किया है, जो अपनी कार्यशैली में बेहतरीन हैं। हमारी साक्षरता दर लगभग आजादी के समय की तिगुनी हो गई है। लोगों के जीवन स्तर में आमूल परिवर्तन हुआ है। हम प्राकृतिक संसाधन से परिपूर्ण राष्ट्र बन कर उभरे है। हम सबसे कम ऊष्मा उत्सर्जन और सबसे अधिक वन संरक्षण करने वालों देशों में शामिल होते हैं। दक्षिण अमेरिका,अफ्रीका,एशिया सहित हम विश्व के तमाम फोरम पर आज अगुवाई कर रहे हैं। जिस राष्ट्र की कल्पना महान देशप्रेमियों ने की थी, उसकी तरफ इंच दर इंच बढ़ते जा रहे हैं। परन्तु क्या यह सब आत्ममुग्धता के सिवाय कुछ भी नहीं है!

‘कहां तो तय था चिरागां हर घर के लिए,
पर आज रोशनी मयस्सर नहीं पूरे शहर के लिए।’

इतनी तरक्कियों के वाबजूद एक बहुत बड़ा भाग हर रात खाली पेट फुटपाथों पर सोने को बाध्य है। जवान पढ़े-लिखे बच्चे अपनी काबिलियत के अनुसार काम पाने को भटक रहे हैं। देश के कुछ समुदाय डर के साये में जीने को विवश हैं। स्वास्थ्य के नाम पर सरकारी अस्पतालों की स्थिति किसी से छुपी हुई नहीं है। सरकारी नियमों के नाम पर जनता खुद को ठगा हुआ महसूस करती है। वोट के नाम पर हर तरह के दुराचार फैलाए जा रहे है। 70 साल बाद भी चुनाव का मुद्दा रोटी,कपड़ा और मकान ही दिखता है। औरतों के प्रति बढ़ती हिंसा के कारण देश की राजधानी दिल्ली को ‘रेप कैपिटल’ की संज्ञा तक दे दी गई है। हमारे जल,जंगल,जमीन,हवा सब प्रदूषित हो चुके हैं। हम आज भी बाह्य आडम्बर से ज्यादा दूर नहीं निकल पाए हैं और रोज किसी ढोंगी साधु के पकड़े जाने की खबर पढ़ते हैं। हमारे बुजुर्ग एकाकी जीवन बिताने को संघर्षरत हैं। बच्चियां आज भी अपने हक के लिए बिलख रही हैं। हमारे अच्छे फल, फूल, सब्जी, कपड़े, पानी, पेट्रोल सब दूसरे राष्ट्र को निर्यात किए जाते हैं और हम अपने देश में ही द्वितीय नागरिक की तरह खराब और बचे-खुचे हुए सामान पाने की कतार में खड़े हैं। तो आखिर हम हैं कहां? क्या इस दिन के सपने देखे गए थे? क्या हमारे वीर सपूतों ने इसी आशा में खून बहाया था?

‘उतरा कहां स्वराज, बोल दिल्ली तू क्या कहती है
तू तो रानी बन गई,वेदना जनता क्यों सह्ती है
किसने किसके भाग्य दबा रखे हैं अपने कर में
उतरी थी जो विभा वन्दिनी,बोल हुई किस घर में’

एक गणतंत्र के रूप में हमने जितना हासिल किया है, अभी उससे ज्यादा हासिल करना बाकी है। राष्ट्र का निर्माण केवल गगनचुंबी मीनारों से नहीं होता, बल्कि देश के हर नागरिक की चाहतों की पूर्ति से होता है। हर एक को खुश रख पाना किसी के लिए सम्भव नहीं, लेकिन गणतंत्र संख्या का खेल है। यदि अधिकतम जनसंख्या की बातों को लेकर एक सहमति बनाई जा सकती है तो वास्तविकता में वही गणतंत्र की जीत है। सरकार हर तौर पर कई फैसले ले रही है, जो जनता की भलाई और इस राष्ट्र के उत्थान के लिए हैं। जनता को अपने अधिकार के साथ अपने कर्तव्यों का भी निर्वहन करना चाहिए।

‘हम ने बहुत सोच-समझ और देख-भाल के रखा है
अपने सीने में हमने गणतंत्र को पाल के रखा है।’

परिस्थितियां कितनी भी कठिन रही हों, भारतीय गणतंत्र ध्रुव तारे की तरह अटल रहा है। इसकी शास्वतता का कारण लोगों के दिलों में इस तंत्र के प्रति अगाध श्रद्धा और विश्वास है। जब तक यह विश्वास बना रह्ता है, इसको कोई भी हिला नहीं सकता। इस विश्वास को बनाए रखने की जिम्मेदारी सरकार और जनता दोनों की है और इसका मूल मंत्र बस एक है-

‘सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा,
हम बुलबुले हैं इसकी, ये गुलिस्तां हमारा।’

(लेखक लोकसभा सचिवालय में कार्यकारी अधिकारी हैं)

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इस कॉलम के जरिये मैंने कई बार इसका इजहार किया कि अब मीडिया को अपनी आचार संहिता तैयार करने का समय आ गया है

राजेश बादल by
Published - Monday, 20 January, 2020
Last Modified:
Monday, 20 January, 2020
Rajesh Badal

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।

तो वही हुआ,जिसका डर था। पत्रकारिता के तमाम रूपों में बढ़ रही गैर जिम्मेदारी चिंता में डालती थी। इस कॉलम के जरिये मैंने कई बार इसका इजहार किया कि अब मीडिया को अपनी आचार संहिता तैयार करने का समय आ गया है। अब भी अगर न चेते तो फिर विस्फोटक स्थिति बन जाएगी। बयालीस साल के पत्रकारिता जीवन में मैंने पाया कि आचार संहिता बनाने पर विचार तो हुआ, लेकिन अमलीजामा नहीं पहनाया जा सका। सब यह भी कहते रहे कि यह काम सरकार की ओर से नहीं होना चाहिए। सरकारी आचार संहिता एक किस्म की सेंसरशिप ही होती है।सरकार को आपकी नब्ज पर हाथ रखने का अवसर मिल जाता है।

अब केंद्र सरकार के चार मंत्रालय-सूचना और प्रसारण, आईटी, क़ानून और गृह मंत्रालय सोशल मीडिया को नियंत्रित करने के लिए दिशा-निर्देश बना रहे हैं। इनके आकार लेने के साथ ही पत्रकारिता के इस ताकतवर प्लेटफॉर्म पर सरकारी निगरानी बढ़ जाएगी। सूचना प्रसारण विभाग  पेशेवर पत्रकारिता के कान पकड़ेगा तो आईटी उसके हाथ-पैर काटने में सक्षम होगा। कानून मंत्रालय इस पत्रकारिता को कोर्ट के चक्कर लगवाएगा और गृह मंत्रालय अंत में आपका खात्मा कर देगा। इस तरह से भारतीय लोकतंत्र के चौथे स्तंभ कहे जाने वाले अंग ने जानबूझकर खुद को सरकारी हिरासत में सौंप दिया है।

वैसे तो मामला 2012 में ही शुरू हो गया था, जब चुनाव आयोग से निर्देश मिलने के बाद केंद्र सरकार ने अपने दिशा निर्देश तैयार कर लिए थे। भारी विरोध के मद्देनजर यह टलता रहा। अब सुप्रीम कोर्ट बीच में आ गया तो 15 जनवरी तक केंद्र सरकार को इन्हें बना लेना था। अब इस महीने के अंतिम सप्ताह में एक तरह से यह आचार संहिता सर्वोच्च अदालत को सौंप दी जाएगी ।

आजादी के बहत्तर साल बाद भी अगर भारतीय पत्रकारिता का यह चेहरा है तो विनम्रता से निवेदन करना चाहता हूं कि हमने अपने घर को ठीक करने पर ध्यान नहीं दिया है। खतरे की घंटियां तो कब से बज रही थीं, हम ही उनकी अनदेखी करते रहे। इस लापरवाही और अक्षम्य कृत्य का फायदा कोई भी सरकार क्यों नहीं उठाना चाहेगी? अब तो यह भी कहने का समय हाथ से फिसल सा गया है कि संभल जाइए। फिर भी कहूंगा कि सोशल मीडिया के अलावा टीवी और प्रिंट पत्रकारिता पर लटकी तलवार की चिंता कर लीजिए मिस्टर मीडिया!

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मिस्टर मीडिया: दंड तो यही बनता था, लेकिन क्या ये 'एनकाउंटर' है?

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हरिवंश नारायण ने पूर्व पीएम चंद्रशेखर की जिंदगी के अनछुए पन्नों से कुछ यूं कराया रूबरू

पत्रकारिता से राजनीति में आए हरिवंश नारायण सिंह इन दिनों राज्यसभा के उप सभापति की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं

Last Modified:
Sunday, 19 January, 2020
Harivansh Narayan

पत्रकारिता से राजनीति में आए हरिवंश नारायण सिंह इन दिनों राज्यसभा के उप सभापति की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। पत्रकारिता में अपना लोहा मनवाने के बाद हरिवंश नारायण सिंह राजनीति में भी सफलता के नए आयाम स्थापित कर चुके हैं। वह जदयू सांसद हैं और अपनी नई भूमिका में अक्सर हो-हंगामे के बीच बेहतरीन तरीके से उच्च सदन को संभालते हुए नजर आते हैं। सभापति की गैरमौजूदगी में जिस तरह वह सदन का कामकाज संभालते हैं, वह काबिले तारीफ है। इंडियन एक्सप्रेस ने भी उनकी इसी काबिलियत को प्रमुख आधार मानते हुए पिछले दिनों उन्हें 100 असरदार भारतीयों की सूची में शामिल किया है।

संसदीय प्रतिनिधिमंडल के हिस्से के रूप में दुनिया भर में यात्रा करते हुए वह भारत विरोधी प्रोपेगैंडा अपनाने के लिए अक्सर पाकिस्तान को निशाने पर लेते रहते हैं। सबसे शक्तिशाली भारतीयों की सूची में भी हरिवंश को शामिल किया जा चुका है। एक पत्रकार और ‘प्रभात खबर’ के संपादक के तौर पर झारखंड में ग्राउंड रिपोर्ट तैयार करने में उन्होंने बहुत काम किया है।  

इन सबके अलावा हरिवंश नारायण के व्यक्तित्व का एक पहलू और है। एक पत्रकार के तौर पर वह पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के काफी करीबी रहे हैं और प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) में उनके साथ काम भी कर चुके हैं। यही नहीं, वह रवि दत्त बाजपेयी के साथ मिलकर चंद्रशेखर पर एक किताब ‘चंद्रशेखर: द लास्ट आइकन ऑफ आइडियोलॉजिकल पॉलिटिक्स’ (CHANDRA SHEKHAR: THE LAST ICON OF IDEOLOGICAL POLITICS) भी लिख चुके हैं। हमारी सहयोगी बिजनेस मैगजीन ‘बिजनेसवर्ल्ड’ (BW Businessworld) के साथ एक बातचीत में हरिवंश नारायण सिंह ने बताया कि आखिर पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर को क्यों वह ‘वैचारिक राजनीति’ (ideological politics) का आखिरी आइकन मानते हैं।

एक घंटे से ज्यादा की इस बातचीत के दौरान हरिवंश नारायण सिंह का कहना था, ‘राजनीति में आने से पहले मैं एक पत्रकार रहा हूं और धर्मयुग, रविवार जैसे पब्लिकेशंस से जुड़ा रहा हूं। मैं उत्तर प्रदेश और बिहार के बॉर्डर पर स्थित बलिया का रहने वाला हूं और संयोग से जेपी (जयप्रकाश नारायण) भी उसी क्षेत्र के थे। ऐसे में मुझे छात्र जीवन और इसके बाद करियर के दौरान जेपी और उनके बाद चंद्रशेखर जी से जुड़े रहने का मौका मिला।’

हरिवंश नारायण के अनुसार, ‘वर्ष 1972 में जब मैं बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी (BHU) में था तो उस दौरान जेपी आमतौर पर वहां सभाओं को संबोधित करने आते थे। शुरू में वहां 100 छात्र भी नहीं आए। कुछ महीनों बाद उन्हें सुनने के लिए 1.5 लाख लोग जुड़े। जो मुद्दा वह उठा रहे थे, उसकी बदौलत यह भीड़ बढ़ती गई। यह मार्च 1977 की बात है, मैं काम की वजह से मुंबई में था और तभी आपातकाल (Emergency) के बाद हुए लोकसभा चुनावों का परिणाम आया था। मुझे याद है कि इन आंकड़ों को मंत्रालय के बाहर बोर्ड पर लिखा गया था। इन परिणामों की झलक पाने के लिए आम आदमी के साथ ही फिल्म स्टार्स और नेताओं की भीड़ जुट गई थी। तब चंद्रशेखर ‘यंग इंडियन’ (Young Indian) नाम से साप्ताहिक पत्रिका मैगजीन निकालते थे। वह जो संपादकीय लिखते थे, वह आए दिन अखबारों की हेडलाइंस बना करती थी। पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से जुड़ा ऐसा ही एक वाक्या मुझे आज भी याद है।’

हरिवंश नारायण ने बताया, ‘जब चंद्रशेखर जी से मेरी मुलाकात हुई, उस दौरान मैं ‘धर्मयुग’ (Dharmayug) में थे। उस दौरान जेपी को मुंबई के जसलोक अस्पताल में भर्ती कराया गया था। चंद्रशेखर ने पास में ही एक गेस्ट हाउस लिया हुआ था और वह अधिकतर समय उनके साथ ही रहते थे। उसी दौरान जेपी के निधन की किसी ने अफवाह उड़ा दी। यहां तक कि संसद ने भी उन्हें श्रद्धांजलि दे दी। जब जसलोक अस्पताल के बाहर बहुत ज्यादा भीड़ एकट्ठी हो गई, तो चंद्रशेखर ने वहां आकर कहा कि यह फर्जी खबर है और जेपी उनके साथ हैं। फिर मैंने उनका इंटरव्यू लिया। उस दौरान भी मैं धर्मयुग में था। इसके बाद मैं उनके संपर्क में बना रहा। जब चंद्रशेखर प्रधानमंत्री बने तो मैं बतौर जॉइंट सेक्रेटरी (अतिरिक्त सूचना सलाहकार) के तौर पर प्रधानमंत्री कार्यालय से जुड़ गया। प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया (PTI) से जुड़े मिस्टर श्रीवास्तव उनके प्रेस एडवाइजर हुआ करते थे। यह भारतीय राजनीति की काफी बड़ी घटना थी, जब कोई बिना मंत्री बने सीधे प्रधानमंत्री बन गया था। वह काफी निर्णायक नेता थे और यदि उन्हें जनादेश मिला होता तो वह सबसे सफल प्रधानमंत्री साबित होते। यह सिर्फ मेरा मानना ही नहीं है, बल्कि आर वेंकटरमण, प्रणब मुखर्जी, मुचकुंद दुबे और एमके नारायणन जैसे तमाम दिग्गजों ने उनके बारे में लिखा है। पूर्व प्रधानमंत्री नरसिंह राव ने लिखा भी था कि यदि चंद्रशेखर प्रधानमंत्री पद पर बने रहते तो अयोध्या विवाद का सौहार्दपूर्ण ढंग से तभी समाधान हो जाता। चंद्रशेखर ने उस दौरान कई चुनौतीपूर्ण मुद्दों का सामना किया। लेकिन उन्हें कभी इसका श्रेय नहीं मिला। इसी वजह से मेरे मन में यह किताब लिखने का ख्याल आया और मैंने इसका नाम ‘चंद्रशेखर: द लास्ट आइकन ऑफ आइडियोलॉजिकल पॉलिटिक्स’ चुना।‘

इस बातचीत के दौरान हरिवंश नारायण सिंह ने यह भी बताया, ‘चंद्रशेखर गरीब परिवार से थे। उनके पास एक विकल्प यह भी था कि वह शिक्षा प्राप्त करने के बाद अपने परिवार की अच्छे से देखभाल करते, लेकिन इसके बजाय उन्होंने एक कठिन रास्ता चुना, यह जानते हुए भी कि यह काफी कठिन, चुनौतीपूर्ण और अनिश्चितताओं भरा होगा। चंद्रशेखर आचार्य नरेंद्र देव के सिद्धांतों से बहुत प्रभावित थे और वह लगातार उसी विचारधारा पर चलते रहे। अगले 15-20 साल काफी कठिन और चुनौतीपूर्ण रहे। पार्टी के काम के दौरान उन्होंने कई बार पार्टी कार्यालय में साफ-सफाई भी की। यह उनकी लीडरशिप का ही कमाल था कि ‘प्रजा सोशलिस्ट पार्टी’ (PSP) कांग्रेस के बाद उत्तर प्रदेश में दूसरी सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी बन गई थी। वर्ष 1962 में उन्होंने संसद में प्रवेश किया।’

हरिवंश नारायण के अनुसार, ‘चंद्रशेखर का मानना था कि मुद्दे हमेशा व्यक्तित्व से बड़े होते हैं और ये मुद्दे ही देश को आगे ले जाने का काम करेंगे। वह हमेशा बैंकों, बीमा और कोयला सेक्टर का राष्ट्रीयकरण चाहते थे। इन मुद्दों के लिए लड़ते हुए वह कांग्रेस में शामिल हो गए। ‘प्रजा सोशलिस्ट पार्टी’ ने उन्हें निष्कासित कर दिया। छह-सात महीने तक वह इससे अलग रहे। कांग्रेस में रहते हुए इंदिरा गांधी के विरोध के बावजूद वह कांग्रेस वर्किंग कमेटी के लिए चुन लिए गए थे। बाद में इंदिरा गांधी ने उन्हें पार्टी से निकाल दिया। इसके बाद उन्होंने जनता पार्टी जॉइन कर ली। इंमरजेंसी के बाद इंदिरा गांधी चाहती थीं कि चंद्रशेखर कांग्रेस में वापस आ जाएं, लेकिन चंद्रशेखर ने इसमें जरा भी दिलचस्पी नहीं दिखाई। इसके बाद समाजवादी जनता पार्टी का उदय हुआ। चंद्रशेखर पर कई बार पार्टी छोड़ने (दल बदलने) के आरोप लगते रहते हैं, लेकिन सच बात तो यह है कि उन्होंने कभी किसी पार्टी को नहीं छोड़ा। उन्हें उस पार्टी से निकाला गया था। चंद्रशेखर का मानना था कि हमारी आर्थिक नीतियों से अमीरों को फायदा हुआ है। सिर्फ अमीरों को ही लाइसेंस क्यों मिलना चाहिए? यही कारण था कि वह संसाधनों के राष्ट्रीयकरण पर जोर देते थे। यहां तक कि जब देश ने उदारीकरण को अपनाया, उदारीकरण-निजीकरण-वैश्वीकरण पर जोर देने के साथ ही चंद्रशेखर ने अकेले इसके खिलाफ आवाज उठाई। उनका मानना था कि इस रास्ते पर चलकर देश कमजोर होगा। उनका मानना था कि लोग रातोंरात अमीर बनना चाहते हैं। उन्होंने अपनी अंतिम पदयात्रा ‘एलपीजी’ (LPG) और ‘गैट’ (GATT) के खिलाफ की थी।’

चंद्रशेखर के बारे में हरिवंश नारायण सिंह ने बताया, ‘वह आरएसएस और उसकी विचारधारा के खिलाफ थे, लेकिन ‘स्वदेशी’ को लेकर उन्होंने उसके साथ मंच शेयर किया था। एक बार किसी ने टिप्पणी कि भारत में ज्यादा नोबेल विजेता पैदा क्यों नहीं होते हैं, उन्होंने कहा था कि यह मत भूलो के यह संत ग्यानेश्वर और तुकाराम जैसे संतों की भूमि भी है। इंदिरा गांधी के साथ बातचीत के दौरान चंद्रशेखर की विचारधारा के बारे में साफ पता चलता है। उस समय इंदिरा गांधी ने चंद्रशेखर से पूछा था कि आपने कांग्रेस को क्यों चुना? तो चंद्रशेखर का कहना था कि मैंने ‘PSP’ के साथ 15 साल तक काम किया, लेकिन मुझे लगा कि यह आगे बढ़ने में विफल रही। इंदिरा गांधी ने उनसे अगला सवाल किया कि वह कांग्रेस के साथ क्या करेंगे? तो चंद्रशेखर का कहना था कि वह इसे समाजवादी पार्टी बनाएंगे। जब इंदिरा गांधी ने यह पूछा कि यदि वह ऐसा करने में विफल रहे तो, इस पर चंद्रशेखऱ ने जो जवाब दिया उससे इंदिरा गांधी सन्न रह गईं। चंद्रशेखर का कहना था कि उस स्थिति में वह पार्टी को तोड़ देंगे यानी छिन्न-भिन्न कर देंगे। कांग्रेस उस समय एक काफी बड़ी पार्टी बन चुकी थी और किसी नई विचारधारा का इसके तहत पनपना मुश्किल था। इसके बाद भी चंद्रशेखर का यह सोचना उनके साहस को दर्शता है। प्रधानमंत्री के रूप में उनका छोटा सा कार्यकाल शायद आजाद भारत में काफी मुश्किलों भरा समय था।’

हरिवंश नारायण सिंह के अनुसार, ‘बेशक, आर्थिक चुनौती बहुत महत्वपूर्ण थी और जब वित्त सचिव ने प्रधानमंत्री को बताया कि विदेशी मुद्रा भंडार खत्म हो रहा है और भारत जल्द ही डिफॉल्टर देश हो सकता है, चंद्रशेखर का कहना था कि क्या यह संकट मेरा ही इंतजार कर रहा था। इससे पता चलता है कि पहले राज करने वालों ने अपनी जिम्मेदारियों को सही से नहीं निभाया था। चंद्रशेखर के अंदर दृढ़ विश्वास और साहस के साथ अकेले चलने की क्षमता थी। एक बार जब उनसे पूछा गया कि वह विश्वनाथ प्रताप सिंह के मंत्रालय में शामिल क्यों हुए, तो उनका कहना था कि वह उन सरकारों में शामिल नहीं हो सकते, जिनसे उनके विचार मेल नहीं खाते हैं, फिर चाहे वो इंदिरा गांधी की सरकार हो या मोरारजी की। प्रधानमंत्री के रूप में उन्होंने टीवी पर देश को संबोधित किया था। उस समय आरक्षण की आग धधक रही थी और अयोध्या विवाद भी गहरा रहा था। लोगों को लग रहा था कि वह इन सबसे पार पा लेंगे। वह अयोध्या विवाद में एक समाधान तक पहुंच भी गए थे। उन्होंने संविधान के दायरे में रहते हुए कश्मीरियों से बातचीत शुरू कर दी थी। उनकी विचारधारा में देश सबसे पहले शामिल रहता था, राजनीतिक पार्टियों को वह इसके बाद रखते थे। उनके पास अकेले आगे बढ़ने की क्षमता थी। उनके पास साहस, दृढ़ विश्वास और दूरदर्शिता थी। सच कहूं तो वह देश की वैचारिक राजनीति के आखिरी मोती (आइकन) थे।’

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दिल्ली चुनाव को लेकर वरिष्ठ पत्रकार अमर आनंद ने यूं भिड़ाया ‘गणित’

यह वाराणसी नहीं है और न ही 2014, लेकिन यह चुनावी रण है और इस चुनावी रण में आमने-सामने दिख रहे वही दो चेहरे हैं, जो वाराणसी के चुनावी रण में 2014 में दिख रहे थे

Last Modified:
Monday, 13 January, 2020
Amar Anand

अमर आनंद, वरिष्ठ पत्रकार।।

यह वाराणसी नहीं है और न ही 2014, लेकिन यह चुनावी रण है और इस चुनावी रण में आमने-सामने दिख रहे वही दो चेहरे हैं, जो वाराणसी के चुनावी रण में 2014 में दिख रहे थे। फर्क इतना है कि यह लोकसभा नहीं, विधान सभा चुनाव है और वाराणसी की जगह दिल्ली है। फर्क यह भी है कि उस वक्त मोदी के चमकते चेहरे के सामने काफी कम चमक के साथ अपनी धमक लिए केजरीवाल मौजूद थे और यहां मुख्यमंत्री केजरीवाल की चमकती छवि के सामने अपनी दूसरी पारी में प्रधानमंत्री के रूप में चमक खोते जा रहे मोदी हैं। वही नरेंद्र मोदी, प्रधानमंत्री के रूप में जिनकी लोकप्रियता देश के किसी भी पीएम और नेता से ज्यादा रही है। वही नरेंद्र मोदी जो अनुच्छेद 370, 35ए और मुस्लिम महिलाओं के लिए बनाए गए तलाक कानून की वजह से देश के हीरो के रूप में माने जाते रहे हैं और वो नरेंद्र मोदी, जिनकी पार्टी को दो बार से दिल्ली की जनता सातों सीटें समर्पित करती रही हैं। यही नहीं जिन मोदी के खिलाफ दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल से एक भी शब्द दिल्ली की जनता सुनना पसंद नहीं करती रही है और जनता का रुख देखकर केजरीवाल को मोदी की सार्जनिक आलोचना से परहेज करना पड़ा, उन्हीं मोदी को चुनावी रण में केजरीवाल के खिलाफ बीजेपी की ओर से ला खड़ा किया गया है।

दिल्ली में काम किया है तो वोट देना कहने वाले सीएम के सामने काम के मामले में सवाल झेलने वाले पीएम की छवि का होना ये सीएम के कद को वजनदार बनाता है और पीएम के कद को कम करता है। जाहिर सी बात, बीजेपी के पास केजरीवाल के सामने मोदी से बढ़िया कोई जवाब नजर नहीं आया और मजबूरी में उन्हें इस नतीजे पर पहुंचना पड़ा। पीएम से नजदीकियों, बिहारी बहुल वोट बैंक की मजबूरी या कुछ भी कहें, कई मौकों और वाकयों के दौरान ऐसा लगा कि दिल्ली के सीएम बनने का सपना पालने वाले रील लाइफ के हीरो और गायक मनोज तिवारी अपने सपनों की रियल लाइफ की तरफ ले जाने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं, लेकिन अब इसकी संभावना दूर-दूर तक नहीं दिखाई पड़ रही है। दरअसल मनोज तिवारी की सपनों की राह में उनके खुद का कलाकार ज्यादा और नेता कम होना तो है ही, पार्टी में हर्षवर्धन, विजय गोयल, प्रवेश वर्मा जैसे नेताओं का उनके नाम पर असहमति-असहयोग भी नजर आता है। यही वजह है कि लोकसभा चुनाव में विपक्ष से मोदी के मुकाबाले पीएम उम्मीदवार का चेहरा पूछने वाली बीजेपी दिल्ली में केजरीवाल के खिलाफ सीएम उम्मीदवार का चेहरा नहीं पेश कर पाई है।

पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने ट्वीट कर कहा है, ‘मुझे पूरा भरोसा है कि लोकतंत्र के इस महापर्व में लोग उसी सरकार को चुनेंगे, जो उनकी आकांक्षाओं को पूरा करता हो। दिल्ली की जनता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में उन लोगों को हराएगी जो पिछले पांच साल से जनता को सिर्फ गुमराह कर रहे हैं।‘ पिछले दिनों अमित शाह ने बूथ कार्यकर्ताओं की मीटिंग में केजरीवाल को निशाने पर तो लिया, लेकिन केजरीवाल के मुताबिक, वह सिर्फ उन्हें गाली देते नजर आए, उनकी कमियां नहीं बता पाए। अमित शाह केजरीवाल को अर्बन नक्सल भी कहते रहे हैं और उन्हें जेएनयू की विचारधारा से जोड़ते रहे हैं। जेएनयू में छात्रों के साथ हुई गुंडागर्दी के ठीक बाद हो रहे चुनाव की तारीख के ऐलान के भले ही कोई तार न जुड़े हों, मगर इस आग की लपटें भी चुनाव में असर डालेंगी।

केजरीवाल को अर्बन नक्सल बताने वाले अमित शाह और उनकी पार्टी जहां जेएनयू की पुरानी घटनाओं और सरकार के खिलाफ हुए प्रदर्शनों से केजरीवाल को जोड़कर देखती रही है, वहीं केजरीवाल के केंद्र विरोध को भी जेएऩयू से ‘खाद-पानी’ मिलता रहा है या फिर वो सरकार के विरोध में अपने लिए समर्थन की तलाश में जेएनयू के साथ खड़े नजर आते रहे हैं। 

मोहल्ला क्लीनिक को और सरकारी स्कूलों की तालीम को लेकर अक्सर विरोधियों के निशाने पर रहने वाले केजरीवाल की सरकार से सेहत, बिजली-पानी और प्राइवेट स्कूलों की ‘दादागीरी’ के मामले में दिल्ली की  अधिकतर जनता तकरीबन संतुष्ट नजर आती है और बीजेपी के पास केजरीवाल की इस कारीगरी का जवाब फिलहाल जनता को तो नहीं दिखेगा। बीजेपी को अभी सोचना पड़ेगा कि वो किस तरीके से केजरीवाल से बेहतर विकल्प के रूप में खुद को साबित करेगी और वह भी पीएम नरेंद्र मोदी के चेहरे को सामने लेकर। रोजी रोटी और आर्थिक मसलों पर परेशान दिल्ली की ज्यादातर जनता को सिर्फ रोजमर्रा के सवालों का जवाब चाहिए और ये बात उनको बीजेपी की कार्यशैली से ज्यादा केजरीवाल की कार्यशैली में नजर आती है। तमाम विरोध, सहमतियों और असहमतियों के बावजूद केजरीवाल में दिल्ली की ज्यादातर जनता को आम आदमी और आम आदमी के लिए काम करने वाला नेता नजर आता है।

आर्थिक मंदी और बेरोजगारी के लिए जिम्मेदार मानी जाने वाली बीजेपी ने जिस तरह से एनआरसी, सीएए, एनपीआर जैसे मुद्दों को आगे करने का काम किया है उससे न तो चुनाव जीतने में उसे सफलता मिलने वाली है और न ही इन मुद्दों पर विरोध में कमी आने वाली है। यही वजह है अनुच्छेद 370. 35A, मुस्लिम महिलाओं के लिए तलाक कानून और आखिरकार राम मंदिर जैसे मामलों में अपने ग्राफ को बढ़ाती हुई नजर आने वाली बीजेपी का असर धीरे-धीरे जनमानस में कम हो रहा है और वह जनाधार खो रही है।

महाराष्ट्र और झारखंड को खो चुकी बीजेपी के हाथ में दिल्ली आएगी, उसकी कोई गारंटी फिलहाल नहीं दिखाई दे रही है और हां अगर पार्टी हारती है तो उसका एक कारण उनके नेताओं का आपसी अंतर्विरोध भी माना जाएगा।

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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