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'कांग्रेस चाहे तो सबक लेकर 52 से 352 तक का सफर तय कर सकती है'

लोकसभा चुनाव 2019 में मोदी के नेतृत्व में बीजेपी को मिली है शानदार जीत

समाचार4मीडिया ब्यूरो 6 years ago

कुरुक्षेत्र : शानदार जीत चुनौती है तो शर्मनाक पराजय अवसर

विनोद अग्निहोत्री, कंसल्टिंग एडिटर, अमर उजाला।।

लोकसभा चुनावों के नतीजों के बाद देश के दो प्रमुख राष्ट्रीय दलों की अलग-अलग तस्वीरें सामने आईं। पहली तस्वीर दीनदयाल उपाध्याय मार्ग स्थित भारतीय जनता पार्टी के मुख्यालय की रौनक, जश्न और दोबारा सरकार बनाने की गहमागहमी। दूसरी तस्वीर 24 अकबर रोड स्थित कांग्रेस मुख्यालय में पसरा सन्नाटा। मौजूद नेताओं और कार्यकर्ताओं में निराशा और हताशा। नतीजों के अगले दिन सुबह कांग्रेस मुख्यालय में कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में अध्यक्ष पद से राहुल गांधी के इस्तीफे की पेशकश और सभी सदस्यों द्वारा एक स्वर से उसे नामंजूर करने की खबरें आईं। वहीं दूसरी तरफ उसी दिन शाम को संसद के केंद्रीय कक्ष में भाजपा और एनडीए के सभी सांसदों की बैठक में नरेंद्र मोदी को पहले भाजपा संसदीय दल और फिर एनडीए संसदीय दल का नेता चुने जाने का सीधा प्रसारण किया।

इस मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का बेहद सहज और जन मन को छू लेने वाला भाषण, जिसमें नव निर्वाचित सांसदों को सत्ता की जगह सेवा भाव रखने और अहंकार से दूर रहकर देशहित के लिए काम करने की नसीहत देते हुए प्रधानमंत्री ने अल्पसंख्यकों में व्याप्त डर को दूर करने और उनका विश्वास जीतने का संकल्प व्यक्त किया। लेकिन प्रधानमंत्री के इस भाषण का उन लोगों पर जो इस देश के सामाजिक तानेबाने को ध्वस्त करने पर उतारू हैं, उन पर कितना असर पड़ा, इसका उदाहरण मध्य प्रदेश के सिवनी में कथित गौरक्षकों द्वारा कुछ लोगो की निर्मम पिटाई का विडियो और गुरुग्राम में नमाजी टोपी पहने एक युवक की पिटाई की घटनाओं से समझा जा सकता है। ऐसे तत्वों पर सख्ती से लगाम लगाए बिना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अल्पसंख्यकों का विश्वास जीतने का अपना संकल्प कैसे पूरा कर पाएंगे।

इसलिए देश में कहीं भी एसी कोई भी घटना होने पर सरकारी तंत्र के तत्काल सक्रिय होने की जरूरत होगी। देश ने 2019 जो का जनादेश दे दिया, उसमें पहले की अपेक्षा ज्यादा बहुमत और ताकत के साथ यह जिम्मेदारी मोदी और उनकी टीम को मिली है कि पिछले कार्यकाल के दौरान उनकी जन कल्याणकारी योजनाओं के लाभ का विस्तार देशव्यापी हो और जो आशा और अपेक्षा देश को उनसे है, उसे पूरा करने में कोई बाधा न हो। जीत के बाद दिल्ली स्थित भारतीय जनता पार्टी मुख्यालय में पार्टी कार्यकर्ताओं और समर्थकों को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि कभी सिर्फ दो सांसदों तक सिमटने वाली भाजपा को दोबारा सरकार बनाने का जनादेश मिला है। उन्होंने कहा कि दो से दोबारा के इस लंबे सफर में पार्टी ने बड़ा संघर्ष किया और कई उतार चढ़ाव देखे।

नरेंद्र मोदी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह के नेतृत्व में भाजपा की दो से दोबारा तक की इस जबर्दस्त उपलब्धि के अनेक विश्लेषण हो रहे हैं और इसे मोदीत्व की सुनामी जैसे विशेषणों से नवाजा जा रहा है। निश्चित रूप से यह लंबे समय बाद किसी बहुमत की सरकार को दोबारा पहले से ज्यादा बहुमत मिलने की यह घटना एतिहासिक भी है और सभी राजनीतिक दलों के लिए एक बड़ा संदेश भी है कि अब भारत की राजनीति बीसवीं सदी के मानदंडो, सियासी फार्मूलों और राजनीतिक व सामाजिक गठजोंडों के जरिए नहीं की जा सकती है। अब राजनीतिक दलों को जनता का विश्वास जीतने के लिए ऐसा लोकलुभावन विमर्श गढ़ना होगा जो सामने वाले पर भारी पड़े।

सूचना तकनीक और प्रचार माध्यमों का चुनावी हथियार की तरह इस्तेमाल, नेता नेतृत्व और नीतियों के प्रति लोगों में उम्मीद पैदा करने की कला, जनता से सीधे संवाद और अंशकालीन शौकिया राजनीति की जगह 24 घंटे की अथक राजनीतिक मेहनत वह कुंजी है जिससे सत्ता और चुनावी जीत के दरवाजे का ताला खोला जा सकता है। अब लौटते हैं कि दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों के सामने अब अगले पांच साल की चुनौतियां क्या हैं। जनता ने जिस विश्वास से नरेंद्र मोदी को दोबारा मौका दिया है, उस पर खुद उन्हें भी विश्वास नहीं हो रहा है, जिन्हें भाजपा और मोदी सरकार की सत्ता वापसी पर कोई शक नहीं था। लेकिन मोदी है तो मुमकिन है कि नारे ने ऐसा असर दिखाया कि जाति संप्रदाय क्षेत्र वर्ग वर्ण की दीवारें ढहाकर नतीजे आए।

सवाल है कि ऐसा क्यों हुआ जबकि विपक्ष ने नोटबंदी,जीएसटी, राफेल, बेरोजगारी, किसानों की आत्महत्याएं, तबाही, अर्थव्यस्था के पटरी पर उतरने, महिला असुरक्षा, सामाजिक तनाव और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण से देश का सामाजिक तानाबाना बिखरने, दलितों, वंचितों और आदिवासियों पर बढ़ते अत्याचारों के मुद्दों पर सरकार को घेरने में कोई कसर नहीं छोड़ी। ऐसा नहीं है कि विपक्ष के इन आरोपों में कोई सत्यता नहीं थी, लेकिन बहुमत मतदाताओं ने इन्हें स्वीकार नहीं किया और एक बार फिर उन नरेंद्र मोदी पर भरोसा किया, जिन्होंने 2014 में काला धन वापस लाकर सबके खातों में 15 लाख रुपये भेजने, हर साल दो करोड़ रोजगार देने, किसानों की आमदनी दुगनी करने और उनकी फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य में 50 फीसदी तक वृद्धि करने, भ्रष्टाचार मुक्त सरकार देने और न्यूनतम सरकार अधिकतम सुशासन जैसे वादे और नारे दिए थे।

इनमें से मोदी और उनकी टीम ने चुनाव प्रचार के दौरान एक भी वादा पूरा होने का दावा या उसका जिक्र तक नहीं किया। बल्कि उसकी जगह नरेंद्र मोदी, अमित शाह की जोड़ी के चुनावी भाषणों में पाकिस्तान में बैठे आतंकवादियों को घर में घुसकर मारने, हिंदुओं को आतंकवादी कहकर बदनाम करने की कांग्रेस की साजिश, राजीव गांधी के भ्रष्टाचार से लेकर आईएनएस विराट का इस्तेमाल पिकनिक मनाने के लिए करने और 1984 की सिख विरोधी हिंसा के लिए कांग्रेस को कठघरे में खड़ा करने जैसे मुद्दे थे। राहुल गांधी के चौकीदार चोर है के नारे का जवाब मैं भी चौकीदार अभियान चला कर दिया गया।

अपनी सरकार की उपलब्धियों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने केंद्र सरकार की उज्जवला योजना, स्वच्छता अभियान के तहत शौचालयों के निर्माण, प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत गरीबों को घर देने, जिन घरों में बिजली नहीं उजाला योजना के तहत उन्हें बिजली कनेक्शन देने, आयुष्मान भारत के तहत दस करोड़ परिवारों को पांच लाख रुपये तक का स्वास्थ्य बीमा, किसानों के खाते में प्रति वर्ष छह हजार रुपये की सम्मान राशि का जिक्र भी अपने चुनावी भाषणों और प्रचार अभियान में किया। जनता ने विपक्ष और उसके नेता राहुल गांधी की बजाय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर भरोसा जताया। लोगों को लगा कि मोदी की नीयत में खोट नहीं है, हो सकता है शुरु में कुछ गल्तियां हुई हों लेकिन इनकी ईमानदारी, मेहनत और देश के प्रति कुछ करने की लगन असंदिग्ध है। इसलिए इस व्यक्ति को एक मौका और देना चाहिए।

कमोबेश स्थिति वैसी ही थी जैसी 2009 में लालकृष्ण आडवाणी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करके भाजपा ने तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के खिलाफ बेहद आक्रामक प्रचार अभियान चलाया था, लेकिन जनता ने आडवाणी जैसे मजबूत नेता की जगह साफ सुथरी और नरम छवि वाले लेकिन देश के लिए कुछ करने की इच्छा रखने वाले मनमोहन सिंह को दूसरा मौका दिया। तब कांग्रेस भी 142 से 206 पर पहुंच गई थी और पहले कार्यकाल में वाम दलों के बाहरी समर्थन पर निर्भर यूपीए को दूसरी बार पूर्ण बहुमत मिल गया था। लोगों ने मनमोहन सिंह को ज्यादा ताकत इसलिए दी थी कि अब वो ज्यादा स्वतंत्रता से अपना काम करते हुए देश को आगे ले जाएंगे लेकिन मनमोहन की सहयोगी दलों पर निर्भरता थी और उसके बाद जो हुआ वो सबके सामने है।

जनता ने नरेंद्र मोदी पर फिर भरोसा किया है। अपने चुनाव प्रचार में मोदी ने कहा भी था कि आपका एक एक वोट मोदी के खाते में जाएगा। इसलिए लोगों ने न पार्टी देखी, न चुनाव चिन्ह न उम्मीदवार अपना वोट मोदी के लिए दिया। इसलिए अब जिम्मेदारी भी सबसे ज्यादा नरेंद्र मोदी की ही है कि वह अपने वादों और इरादों को अमली जामा पहनाएं। पुरानी जन कल्याणकारी योजनाओं का विस्तार करें और नई नीतियां लागू करें। अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाएं। बेरोजगारी से निबटें। विदेशी बैंको से काले धन की वापसी हालाकि इन चुनावों में कोई मुद्दा ही नहीं था, लेकिन अगर वापस ला सकें तो लाएं। आतंकवाद पर सफल नियंत्रण लगाते हुए कश्मीर में अमन चैन बहाल करें। सीमाओं की सुरक्षा चाक चौबंद करते हुए एसा वातावरण तैयार करें कि सुरक्षा बलों और सेना के जवानों की जान भी सलामत रहे।

किसानों की आत्महत्याएं रोकने वाली आर्थिक नीतियां लागू करें। कृषि उपज का लागत के मुताबिक मूल्य मिले। किसानों की आमदनी दुगनी हो और सबका साथ सबका विकास के साथ साथ सबका विश्वास के नारे को अमल में लाते हुए सामाजिक सद्भवा और सौहार्द बहाल हो। गोरक्षा के नाम पर मुसलमानों और दलितों को निशाना बनाने वालों पर लगाम लगे। अंतर्राष्टीय स्तर पर भारत की भूमिका और ज्यादा प्रभावशाली हो। सुरक्षा परिषद में स्थाई सदस्यता की ओर भारत के कदम बढ़ें और परमाणु आपूर्ति संगठन (एनएसजी) में भारत को प्रवेश मिले।

लोगों की इन अपेक्षाओं और उम्मीदों को पूरा करने अगर नरेंद्र मोदी सफल रहते हैं तो 2024 के आम चुनावों में भी जनता का विश्वास उन्हें फिर मिल सकेगा और अगर उनकी सरकार इन तमाम मोर्चों पर नाकाम रहती है तो 2024 में देश में कुछ वैसा ही बदलाव देखने को मिल सकता है जैसा कि 2014 में देश ने देखा। सही है कि विपक्ष लथपथ है। उसके किले ध्वस्त हो चुके हैं। कांग्रेस जो 2014 में 44 सीटों पर सिमट गई थी, तमाम मेहनत और चुनावी अभियान के बावजूद महज 52 सीटों तक ही पहुंच पाई है। 17 राज्यों में उसका खाता भी नहीं खुल सका है जिनमें राजस्थान जैसा राज्य भी शामिल है जहां पिछले साल दिसंबर में ही उसने विधानसभा चुनाव जीतकर सरकार बनाई है। इसी तरह दिसंबर में जीते गए दो और राज्यों मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में भी कांग्रेस महज एक और दो सीटें ही जीत सकी है।

उत्तर प्रदेश में सपा बसपा गठबंधन और बिहार में राजद कांग्रेस उपेंद्र कुशवाहा, जीतनराम मांझी, मुकेस साहनी के जातीय गठबंधनों को लोगों ने नकार दिया। महाराष्ट्र और कर्नाटक में भी कांग्रेस के गठबंधन असफल रहे। ऐसे में अगर विपक्ष की यह दुदर्शा सत्ता पक्ष को निरंकुश और अहंकारी बना देती है तो यह न देश के लिए ठीक होगा न खुद सत्तापक्ष के लिए। शायद इसे ही भांप कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सत्ता पक्ष के सांसदों को सत्ता की जगह सेवा भाव रखने और अहंकार से दूर रहने की नसीहत दी है। लेकिन यह नसीहत सांसदों के साथ साथ सरकार और उसके मंत्रियों पर भी लागू होती है। इसलिए जितनी ज्यादा ताकत जनता ने दी है उतनी ही बड़ी परीक्षा भी जनता लेगी, इसे सत्ता पक्ष को याद रखना होगा।

अब बात विपक्ष की। चुनाव नतीजों से सन्नाटे में आई कांग्रेस में राहुल गांधी की अध्यक्ष पद से इस्तीफे की पेशकश और कांग्रेस कार्यसमिति द्वारा एक स्वर से नामंजूर किए जाने के बावजूद राहुल का उस पर अड़ना बताता है कि राहुल ने यह कदम सिर्फ औपचारिकता वश नहीं उठाया। वह दिल से इस पर फैसला लेना चाहते हैं। लेकिन यक्ष प्रश्न है कि अगर राहुल नहीं तो फिर कौन। नेहरू गांधी परिवार को लेकर कांग्रेस पर वंशवाद के कितने ही आरोप लगें लेकिन यह सच्चाई है कि यह परिवार कांग्रेस की ताकत और कमजोरी दोनों है। ताकत इसलिए कि यह परिवार पार्टी को एकजुट रखने की धुरी है क्योंकि इसकी स्वीकार्यता न सिर्फ पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं में है बल्कि कांग्रेस के समर्थक वर्ग को भी इसी परिवार पर भरोसा है।

कमजोरी इसलिए कि परिवार पर निर्भरता पार्टी को परिवार से बाहर सोचने ही नहीं देती और पार्टी में परिवार से इतर कोई नेतृत्व विकसित ही नहीं हो पाता। वैसे ये भी सच है कि आजादी के बाद कांग्रेस के कुल 18 अध्यक्षों में गांधी परिवार के सिर्फ पांच ही हैं। जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी और सोनिया गांधी के बाद राहुल गांधी, गांधी परिवार के पांचवे व्यक्ति हैं जो अध्यक्ष बने हैं। यह भी सही है कि कांग्रेस को ताकत और स्वीकार्यता भी तभी मिली जब गांधी परिवार के हाथ में पार्टी की कमान रही है। वरना राजीव गांधी के बाद नरसिंह राव और सीताराम केसरी के कार्यकाल में कांग्रेस जहां पहुंच गई थी, वहां से उसे उबारने का काम भी उन सोनिया गांधी ने किया था जो अध्यक्ष बनने से पहले तक राजनीति के क ख ग से अपरिचित थीं।

इसलिए समाधान राहुल के अध्यक्ष पद से इस्तीफे में नहीं बल्कि पार्टी के संगठनतात्मक ढांचे में आमूल चूल बदलाव करके कील कांटे दुरुस्त करने में है। पराजय मनोबल तो तोड़ती है लेकिन बदलने सुधरने और आगे बढ़ने का अवसर भी देती है। राहुल को अपने इस्तीफे पर अड़ने की बजाय अपने फैसलों पर अड़ना होगा। कार्यसमिति की बैठक में अगर उन्होंने अशोक गहलौत, चिदंबरम और कमलनाथ जैसे नेताओं को इसलिए आड़े हाथों लिया कि उनकी पूरी ताकत और मेहनत सिर्फ अपने बेटों को जिताने में लगी रही तो अब राहुल को यह भी समझना होगा कि पार्टी के हर नेता का परिवार नेहरू गांधी परिवार नहीं है। वरिष्ठ नेताओं की अगर अपने क्षेत्रों में स्वीकार्यता है तो उनका विरोध भी है।

समाज और जनता के साथ साथ पार्टी कार्यकर्ताओं में भी तमाम बड़े नेताओं की स्वीकार्यता नहीं है, तो उनके बेटों बेटियों की स्वीकार्यता कैसे होगी। किसी नेता के बेटे को सिर्फ इसलिए अयोग्य नहीं ठहराया जाना चाहिए कि वह किसी बड़े नेता की संतान है साथ ही उसे इसलिए भी तरजीह नहीं मिलनी चाहिए कि वह किसी बड़े नेता की संतान है। कांग्रेस में सबसे बड़ी चुनौती नई और पुरानी पीढ़ी के बीच संतुलन बनाने की है। सही है कि कई पुराने नेता थक चुके हैं लेकिन कई एसे भी हैं जिनके पास अभी भी न सिर्फ अनुभव है बल्कि उनकी सामाजिक स्वीकार्यता भी है। जबकि तमाम युवा पीढ़ी के नेताओं में ज्यादातर बड़े पिताओं की संतान हैं और उन्हें धूल में पार्टी के लिए खटने की न आदत है न प्राथमिकता। जबकि तमाम जमीनी कार्यकर्ता और आंचलिक नेता अपनी उपेक्षा और अनदेखी की वजह से घरों में बैठ गए हैं।

पार्टी के ढांचे में ऊपर से नीचे तक यह सफाई बहुत जरूरी है। प्रदेश इकाइयों से लेकर जिला स्तर तक संगठन के पुनर्गठन के काम को तत्काल शुरु किए जाने की जरूरत है। पार्टी में फैसले न लेने या बहुत देर से लेने की वजह से लगातार संगठन का क्षरण होता गया है जिसके नतीजे इन चुनावों में साफ दिख रहे हैं। एक अच्छा घोषणा पत्र जिसकी सर्वत्र सराहना हुई, न्याय योजना जिसे लोगों ने गेम चेंजर बताया, लेकिन जनता पर असर क्यों नहीं दिखा सका इसकी सबसे बड़ी वजह पार्टी का जर्जर सांगठनिक ढांचा है। राहुल गांधी को पलायन की जगह पार्टी में डटकर खड़े होने, कड़े और त्वरित फैसले लेने होंगे। इस्तीफा देकर दूर हट जाना समाधान नहीं है।

चुनौती को स्वीकार करना और परिस्थितियों से लड़कर खुद को साबित करने का इससे बेहतर मौका उन्हें दूसरा नहीं मिल सकता। एक पंजाब और केरल को छोडकर पार्टी के सारे दिग्गज नेता खुद भी खेत रहे और कोई कमाल भी नहीं कर पाए। अब राहुल तमाम नए पुराने परजीवी नेताओं से पार्टी संगठन को मुक्त करें। विचारधारा और पार्टी के प्रति वफादार नेताओं और कार्यकर्ताओं की पहचान करके उन्हें आगे लाया जाए और अगले दो साल तक सिर्फ संगठन निर्माण और उसके विस्तार पर ध्यान दिया जाना चाहिए। केंद्र की मोदी सरकार को काम करने का पूरा मौका देकर कम से कम दो साल तक सारा ध्यान देश भर में संगठन निर्माण पर ही देना होगा। अभी इसी साल अक्टूबर में हरियाणा, महाराष्ट्र, झारखंड और संभवत जम्मू कश्मीर में विधानसभा चुनाव होने हैं, इन राज्यों में तत्काल आमूल चूल बदलाव करके जमीनी और जनाधार वाले नेताओं को कमान दिए जाने की जरूरत है।

गठबंधन सिर्फ वहीं किया जाए जहां बेहद जरूरी हो। सिर्फ कुछ नेताओं की लोकसभा और राज्यसभा की राह आसान करने के लिए गठबंधन नहीं किया जाना चाहिए। सबसे ज्यादा ध्यान उत्तर प्रदेश और बिहार पर देने की जरूरत है। इन दोनों राज्यों में पार्टी संगठन लुप्त प्राय है। इसे पुनर्जीवित करने के लिए प्रियंका गांधी को खुद सक्रिय होना पडेगा। सिर्फ रोड शो और उत्सव धर्मिता की राजनीति से काम नहीं चलेगा। इन दोनों राज्यों में जिले जिले और गांव गांव घूमने की जरूरत है। लोग अभी भी भाजपा के विकल्प के रूप में कांग्रेस को ही देखते हैं। इसलिए उन तक सीधे पहुंचने की जरूरत है। जिन राज्यों में कांग्रेस सरकारे हैं, वहां भी संगठन बेहद कमजोर है। उन राज्यों में भी नए और जमीनी कार्यकर्ताओं को जिम्मेदारी देनी होगी।

2022 में उत्तर प्रदेश में चुनाव होंगे। सपा बसपा की चमक उतर चुकी है। उनके जातीय गठजोड़ को भी लोगों ने नकार दिया है। ऐसे में कांग्रेस अपनी खोई जमीन वापस पा सकती है, बशर्ते कड़ी और निरंतर मेहनत वाली प्रदेश इकाई बनाई जाए। दिल्ली या मुंबई से लखनऊ आकर अंशकालीन अध्यक्षों से काम नहीं चलेगा। छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल, राजस्थान में सचिन पायलट और कभी आंध्र प्रदेश में वाई.एस.राजशेखर रेड्डी ने जिस तरह मेहनत करके पार्टी को सत्ता तक पहुंचाया, वैसी ही मेहनत और लगन वाले नेता ही पार्टी को उबार सकते हैं। भाजपा, मोदी और सरकार के खिलाफ विरोध की नकारात्मक राजनीति की जगह विरोध की सकारात्मक राजनीति और मुद्दे उठाए जाने चाहिए।

विरोध व्यक्ति का नहीं, व्यवस्था और नीतियों का होना चाहिए। कुल मिलाकर इतिहास ने राहुल गांधी को इस पराजय के जरिए फिर से खड़े होने का वैसा ही मौका दिया है जैसा कभी 1984 में भाजपा को दो लोकसभा सीटों पर समेट कर दिय़ा था और भाजपा ने निरंतर मेहनत करके दो से दोबारा मौका मिलने तक का लंबा सफर तय किया है। कांग्रेस चाहे तो उससे सबक लेकर 52 से 352 तक का सफर तय कर सकती है या फिर पुराने ढर्रे पर ही चलते हुए इससे भी नीचे जा सकती है। तय उसे करना है, नियति तो सिर्फ अवसर देती है।

(साभार: अमर उजाला)

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