जायरा वसीम पर अनुरंजन झा की खरी-खरी, बॉलिवुड से की ये अपील

अभिनेत्री के हिसाब से उनका अभिनय करना इस्लाम और अल्लाह को मंजूर नहीं

Last Modified:
Monday, 01 July, 2019
Anuranjan Jha

अनुरंजन झा, वरिष्ठ पत्रकार।।

2006-7 की बात है। इंवेस्टिगेटिव टीम कोबरा पोस्ट को लीड कर रहा था और फतवों पर स्टोरी की थी। कई अच्छे रिपोर्टरों की टीम इस खबर पर हमारे साथ थी। तकरीबन 2 दर्जन फतवे देश के अलग-अलग मुफ्तियों से खरीदे गए थे। अजीबोगरीब फतवे, दिलचस्प फतवे, उसमें एक मुफ्ती ने इस बाबत भी फतवा दिया था कि टीवी और फिल्मों में मुसलमानों के लिए काम करना हराम है।

इस बात को और ठोस तरीके से प्रमाणित करने के लिए उसने यह भी कहा था कि चूंकि ऐसा करना इस्लाम में हराम है,इसीलिए युसूफ खान ने दिलीप कुमार बनकर काम करना शुरू किया। बड़े गर्व से उस मुफ्ती ने वो फतवा महज 5 हजार में हमारी टीम को बेचा था। उस फतवे के लिहाज से आमिर, शाहरूख समेत सभी मुस्लिम कलाकारों को ऐसा काम नहीं करना चाहिए। अभिनेत्रियों के बारे में उनकी राय जो थी, वो तो माशाअल्लाह...। सबको वो जन्नत की वही हूर समझते थे, जो उनके जिहादियों के काम आती हैँ। ये सब बातें उस मुफ्ती ने कही थीं और उस वक्त करार के मुताबिक ये खबर तब के स्टार न्यूज (अब एबीपी न्यूज) पर चलाई गई थी। जाहिर है, हंगामा हुआ। पूरी टीम को महीनों धमकी वाले संदेश आते रहे। संदेश में यहां तक कहा गया कि तुम्हें दोजख नसीब होगा...इत्यादि-इत्यादि।

यह बातें हम आज इसलिए लिख रहे हैं कि कुछ इसी तरह की हरकत फिर एक बार हुई है और ऐसी ही बातों का हवाला देकर अभिनेत्री जायरा वसीम ने अभिनय छोड़ने की बात कही है। उनके हिसाब से उनका अभिनय करना इस्लाम और अल्लाह को मंजूर नहीं। उनके ईमान में दखल है। तो इसका मतलब हिंदुस्तान के उन सभी मुसलमान कलाकार जिनको हमने अपनी आंखों पर बिठाया है, क्या वो अपने ईमान के साथ धोखा करते हैं, पड़ोसी इस्लामी मुल्कों में जहां हमसे बेहतर नहीं तो कमतर भी नहीं कलाकार मौजूद हैं, क्या वो सब बेईमानी करते हैं। इस देश में आज भी लाखों मुसलमान नौजवान (लड़के-लड़कियां) मुंबई का रुख करते हैं, दिन-रात वहां सितारा बनने के लिए जद्दोजहद करते हैं, क्या उनका अपना कोई ईमान नहीं है।

दरअसल,ऐसा कहना इस्लाम और अल्लाह के साथ बेईमानी है। आपको दंगल गर्ल के तौर पर जायरा वसीम याद तो होंगी ही, साथ ही आपको यह भी याद होगा कि किस तरह जायरा ने हवाई यात्रा में एक सोते हुए व्यक्ति पर छेड़छाड़ का आरोप मढ़ दिया था। अभिनेत्री होने का फायदा उठाने के लिए खुद को एक बेसहारा लड़की के तौर पर पेश किया था और मीडिया की सुर्खियां बटोरी थीं। जायरा के ही साथ सफर करने वाले पैसेंजर ने सारी कहानी पुलिस के सामने बयान की और फिर उस शख्स को जमानत मिली। इतना ही नहीं, महबूबा से मुलाकात के बाद पाकिस्तान के पक्ष में अपने बयान को लेकर भी वो सुर्खियों में आ चुकी हैं।

जायरा को ईमान का यह पाठ पढ़ाते हुए अभिनय को कटघरे में खड़ा करने से पहले अपने गॉडफादर आमिर खान से कम से कम पूछना चाहिए था और उनको भी यह सलाह देनी चाहिए थी। अगर आमिर-शाहरूख का ईमान जायरा की तरह जाग जाए तो हम कितनी उम्दा कलाकारी देखने से महरूम रह जाएं, इसकी तो बस कल्पना ही की जा सकती है। यहां बात सिर्फ मुसलमानों के फिल्मी दुनिया पर काम करने नहीं, बल्कि उस दुनिया के तौर तरीकों पर सवाल है, जिसके सहारे लाखों परिवार पलते हैं, करोड़ों लोगों को दो जून की रोटी नसीब होती है। जायरा का यह बयान जितना हास्यापद है, उतना ही आपत्तिजनक है। आपको काम नहीं करना था तो बस नहीं करना था, कोई घर से खींच कर तो आपको काम करने के लिए लाता नहीं। यह ढोल पीटना किसलिए?

दरअसल, पिछले पांच सालों में कुछ खास नहीं कर पाने के कारण शायद जायरा अवसाद में हों। जायरा को यह मालूम होना चाहिए कि ‘दंगल’ फिल्म की सफलता आमिर खान औऱ उऩकी टीम की सफलता है और उसकी सीढ़ी पर चढ़ जो स्वाद इन्होंने चखा, वो इनका अपना नहीं था। अगर अभियन में ताकत होती तो दूसरी फिल्म तमाम कोशिशों के बाद भी लोगों में दिलों में जगह क्यों नहीं बना पाई, जबकि उसमें भी तो आमिर खान थे।

कुल मिलाकर देखें तो साफ लगता है कि दंगल की इस अभिनेत्री का अभिनय में करियर कुछ खास नहीं चल रहा है और उसे हिंदुस्तान ने जो दिया है, उसकी दरअसल वो उतनी हकदार नहीं थी। धर्म और इस्लाम के नाम पर भ्रम में डूबी हुई एक अति सामान्य मुस्लिम लड़की है, जो निहायत ही डरपोक और स्वार्थी है। अपने स्वार्थ से डर भरे बयान में इस लड़की ने धर्म का जो तड़का डाला है, वो निहायत ही घिनौना है। इस बयान के बाद तो हम मुंबई इंडस्ट्री से आग्रह करेंगे कि इसको कभी काम मत देना। इसलिए काम मत देना कि क्योंकि जिसने उसे अभी तक सब कुछ दिया, उसका अहसान जिस तरीके से चुकाया है, वह निहायत ही शर्मिंदा करने वाला है।

(यह लेखक के निजी विचार हैं।)

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मिस्टर मीडिया: यह अपराध अनजाने में हुए, पर दर्शक समझते हैं कि चैनल ने जानबूझकर ऐसा किया

सोशल मीडिया के अनेक अवतारों पर इन दिनों कोरोना से जुड़ी बेहद संवेदनशील खबरों की बाढ़ आई हुई है। पड़ताल करने के बाद इनमें आए कई वीडियो पुराने निकलते हैं।

राजेश बादल by
Published - Tuesday, 19 May, 2020
Last Modified:
Tuesday, 19 May, 2020
Rajesh Badal

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।

सोशल मीडिया के अनेक अवतारों पर इन दिनों कोरोना से जुड़ी बेहद संवेदनशील खबरों की बाढ़ आई हुई है। पड़ताल करने के बाद इनमें आए कई वीडियो पुराने निकलते हैं। यानी वे असली वीडियो हैं, लेकिन कोरोना के संदर्भ में फर्जी हैं। पिछले दिनों घर लौट रहे प्रवासी श्रमिकों के कुछ वीडियो देखकर मेरा भी मन विचलित हो गया। मैंने एक-दो वीडियो अपने फेसबुक मंच पर साझा कर दिए। बाद में कुछ मित्रों ने उन पर संदेह किया। खोज की तो पाया कि वे वीडियो वाकई ताजे नहीं थे। मैंने फेसबुक प्लेटफॉर्म पर इसके लिए माफी भी मांगी।

इसी क्रम में ऐसे ही चंद वीडियो कुछ टेलिविजन चैनलों ने भी दिखा दिए। बाद में उन्हें भी असलियत पता चली और उन्होंने वीडियो गिरा दिए (चैनल की भाषा में हटाने के लिए गिराना ही प्रचलित है) लेकिन तब क्या हो सकता था। तीर कमान से निकल चुका था। यह अपराध अनजाने में हुए, मगर दर्शक समझते हैं कि चैनल ने जानबूझकर ऐसा किया है।

मुश्किल यह है कि जो लोग इस तरह के वीडियो का दुरुपयोग करते हैं, उनमें से अधिकतर पत्रकार नहीं होते। वे बस इरादतन ऐसा करते हैं। उन्हें इस बात से कोई मतलब नहीं होता कि इससे एक समूचे प्रोफेशन की साख पर सवाल खड़ा हो जाता है। हो सकता है कि किसी स्तर पर कोई पत्रकार भी इसमें शामिल हो जाता हो, पर ज्यादातर तो ऐसा करने से बचते हैं। सोशल मीडिया पर इस प्रवृति पर कैसे लगाम लगाईं जा सकती है?

कुछ चैनल वायरल का सच या वायरल वीडियो की पड़ताल करते हैं मगर इससे दर्शक के मन में पत्रकारिता के बारे में जो छवि बनती है, वह नहीं बदलती। क्योंकि यह जरूरी नहीं कि जब वायरल का सच दिखाया जा रहा हो तो वास्तव में वही दर्शक बैठा हो। जब इस गंभीर अनैतिक कृत्य को आप आधा घंटे के कार्यक्रम की शक्ल देते हैं, तो फिर वह भी एक शो हो जाता है। हमें इससे आगे कुछ सोचना होगा। इसके विरोध में कानूनी तौर पर तब तक कोई कार्रवाई नहीं हो सकती, जब तक कि उससे समाज या देश को कोई बहुत बड़ी हानि नहीं हो। हालिया वर्षों में ऐसे भी मामले आए हैं, जब सांप्रदायिक सद्भाव को बिगाड़ने के लिए अथवा दंगे भड़काने के लिए उनका दुरुपयोग किया गया, किन्तु उससे इस सिलसिले पर पूरी तरह पाबंदी नहीं लगी। पाया गया कि इनमें भी पत्रकारों का हाथ नहीं था।

इसका अर्थ यह है कि कुछ ऐसे असामाजिक तत्व भारतीय मीडिया के कंधे का सहारा लेकर अपनी मंशा पूरी करना चाहते हैं। इन्हें रोकना ही होगा। चैनलों की एसोसिएशन इस बात पर तय कर सकती है कि इस बारे में लगातार स्क्रॉल (पट्टी) चलाई जाती रहे,  ब्रेक के दौरान बीस-तीस सेकंड के संदेश प्रसारित किए जाएं और न्यूज एंकर हर दो तीन घंटे बाद इन नक़ली आपराधिक खबरों से दर्शकों को आग़ाह करें। यदि प्रतिदिन कुल आधा घंटे का ऐसा प्रसारण हो और यह सिलसिला कम से कम साल भर तक चले तो ऐसे कुटेवों पर काबू पाया जा सकता है।

इस मामले में समाचार पत्रों और रेडियो से भी सहयोग लिया जा सकता है। इन प्रसारण संदेशों में कहा जाए कि एक व्यक्ति की इस हरकत से समूचा ताना बाना चरमरा सकता है तो शायद कुछ रोक लगे। कुछ तो जागरूक होंगे ही। ये तो महज कुछ सुझाव हैं। इनसे भी अलग कदम उठाए जा सकते हैं। प्रेस काउंसिल, एडिटर्स गिल्ड, प्रेस क्लब, प्रेस एसोसिएशन, श्रमजीवी पत्रकार संघ, नेशनल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट, भारतीय पत्रकार संघ, आंचलिक पत्रकार संघ और अन्य जितने भी संगठन हैं, उन्हें आगे आना होगा। यदि आज इस पर ध्यान नहीं दिया तो आने वाले कल में यह चुनौती विकराल रूप ले लेगी मिस्टर मीडिया!

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल की 'मिस्टर मीडिया' सीरीज के अन्य कॉलम्स आप नीचे दी गई हेडलाइन्स पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं-

क्या सरकारी प्रसारणों में इन सभी बातों का ध्यान रखा जा रहा है मिस्टर मीडिया!

यह अपने अंदर झांकने का भी दौर है मिस्टर मीडिया!

हालात तो खतरे की घंटी बजा ही रहे हैं मिस्टर मीडिया!   

मिस्टर मीडिया: पत्रकारिता के लिए ये वाकई मुश्किल दौर है

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'इस प्रश्न पर संवाद का साहस न राजनीति में है, न विचारकों में'

कोरोना संकट के बहाने भारत के दुख-दर्द, उसकी जिजीविषा, उसकी शक्ति, संबल, लाचारी, बेबसी, आर्तनाद और संकट सब कुछ खुलकर सामने आ गए हैं। इन सात दशकों में जैसा देश बना या बनाया गया है

Last Modified:
Monday, 18 May, 2020
corona

-प्रो. संजय द्विवेदी

कोरोना संकट के बहाने भारत के दुख-दर्द, उसकी जिजीविषा, उसकी शक्ति, संबल, लाचारी, बेबसी, आर्तनाद और संकट सब कुछ खुलकर सामने आ गए हैं। इन सात दशकों में जैसा देश बना या बनाया गया है, उसके कारण उपजे संकट भी सामने हैं। दिनों दिन बढ़ती आबादी हमारे देश का कितना बड़ा संकट है यह भी खुलकर सामने है, किंतु इस प्रश्न पर संवाद का साहस न राजनीति में है, न विचारकों में। संकटों में भी राजनीति तलाशने का अभ्यास भी सामने आ रहा है। मीडिया से लेकर विचारकों के समूह कैसे विचारधारा या दलीय आस्था के आधार पर चीजों को विश्लेषित और व्याख्यायित कर रहे हैं कि सच कहीं सहम कर छिप गया है। देश के दुख, देश के लोगों के दुख और संघर्ष भी राजनीतिक चश्मों से देखे और समझाए जा रहे हैं।

ऐसे कठिन समय में सच को व्यक्त करना कठिन है, बहुत कठिन। क्योंकि सभी विचारवंतों के ‘अपने अपने सच’ हैं। जो राजनीतिक आस्थाओं के आधार देखे और परखे जा रहे हैं। भारतीय बौद्धिकता और मीडिया के शिखर पुरुषों ने इतना निराश कभी नहीं किया था। साहित्य को राजनीति के आगे चलने वाली मशाल बताने वाले देश ने राजनीतिक आस्थाओं को ही सच का पर्याय मान लिया है। संकटों के समाधान खोजने, उनके हल तलाशने और देश को राहत देने के बजाए जख्म को कुरेद-कुरेद कर हरा करने में मजा आ रहा है। यह सडांध तब और गहरी होती दिखती है, जब कुछ लोग पलायन की पीड़ा भोग रहे हिंदुस्तान के दुख में भी आनंद की अनुभूति सिर्फ इसलिए कर रहे हैं कि देश के नेता के सिर उसका ठीकरा फोड़ा जा सके।

केंद्र की मजबूत सरकार और उसके मजबूत नेता को विफल होते देखने की हसरत इतनी प्रबल है कि वह लोगों की पीड़ा और आर्तनाद में भी आनंद का भाव खोज ले रही है। हमारी केंद्र और राज्य की सरकारों की विफलता दरअसल एक नेता की विफलता नहीं है। यह समूचे लोकतंत्र और इतने सालों में विकसित तंत्र की भी विफलता है। सामान्य संकटों में भी हमारा पूरा तंत्र जिस तरह धराशाही हो जाता है वह अद्भुत है। बाढ़, सूखा, भूकंप और अन्य दैवी आपदाओं के समय हमारे आपदा प्रबंधन के सारे इंतजाम धरे रह जाते हैं। सामान्यजन इसकी पीड़ा भोगता है। यह घुटनाटेक रवैया निरंतर है और इस पर लगाम कब लगेगी कहा नहीं जा सकता। व्यंग्य कवि स्व. प्रदीप चौबे ने लिखा – बाढ़ आए या सूखा मैं खाऊं तू खा। यानि जहां बाढ़ आ रही है, वहां सालों से हर साल आ रही। फिर उसी इलाके में सूखा भी हर साल आ रहा है। यानि इस संकट ने उस इलाके में एक इको सिस्टम बना लिया है और उसके साथ लोग जीना सीख गए हैं। हमारा महान प्रशासनिक तंत्र इन संकटों से निजात पाने के उपाय नहीं खोजता, उसके लिए हर संकट में एक अवसर है।

हम अपने संकटों को चिन्हिंत करें तो वे ज्यादा नहीं हैं, वे आमतौर पर विपुल जनसंख्या और उससे उपजे हुए संकट ही हैं। उत्तर भारत के राज्यों के सामने यह कुछ ज्यादा विकराल हैं क्योंकि यहां की राजनीति ने राजनेता और राजनीतिक योद्धा तो खूब दिए किंतु जमीन पर उतरकर संकटों के समाधान तलाशने की राजनीति यहां आज भी विफल है। ये इलाके आज भी जातीय दंभ, अहंकार, माफियाराज, लूटपाट, गुंडागर्दी के अनेक उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। इसलिए उत्तर भारत के राज्य इस संकट में सबसे ज्यादा परेशानहाल दिखते हैं। उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, बिहार, उत्तराखंड, झारखंड मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, बंगाल जिस तरह पलायन की पीड़ा से बेहाल हैं, उसे देखकर आंखें भर आती हैं। एक बार दक्षिण और पश्चिम के राज्यों महाराष्ट्र,गुजरात, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल की ओर हमें देखना चाहिए। आखिर क्या कारण हैं हमारे हिंदी प्रदेश हर तरह के संकट का कारण बने हुए हैं।पलायन, जातिवाद, सांप्रदायिकता, माफिया,भ्रष्टाचार, ध्वस्त स्वास्थ्य और शिक्षा व्यवस्था सब इनके हिस्से हैं। यह संभव है कि समुद्र के किनारे बसे राज्यों की व्यवस्थाएं, अवसर और संभावनाएं बलवती हैं। किंतु उत्तर भारत के हरियाणा, पंजाब जैसे राज्य भी उदाहरण हैं, जिन्होंने अपनी संभावनाओं को जमीन पर उतारा है। प्रधानमंत्रियों का राज्य रहा उत्तर प्रदेश आज भी देश और दुनिया के सामने सबसे बड़ा सवाल बनकर खड़ा है। अपनी विशाल आबादी और विशाल संकटों के साथ। जमाने से कभी गिरिमिटिया मजदूरों के रूप में विदेशों में ले जाए जाने की पीड़ा तो आजादी के बाद मुंबई, दिल्ली, कोलकाता, रंगून जैसे महानगरों में संघर्ष करते, पसीना बहाते लोग एक सवाल की तरह सामने हैं। यही हाल बिहार का है। एक जमाने में गांवों में गाए जाने वाले लोकगीत भी इसी पलायन के दर्द का बयान करते हैं-

रेलिया बैरन पिया को लिए जाए हो, रेलिया बैरन।

(रेल मेरी दुश्मन है जो मेरे पति को लेकर जा रही है)

मेरे पिया गए रंगून किया है वहां से टेलीफून,

तुम्हारी याद सताती है जिया में आग लगाती है।

आजादी के बाद भी ये दर्द कम कहां हुए हैं? स्वदेशी, स्वावलंबन का ‘गांधी पथ’ छोड़कर सत्ताधीश नए मार्ग पर दौड़ पड़े जो गांवों को खाली करा रहे थे और शहरों को बेरोजगार युवाओं की भीड़ से भर रहे थे। एक समय में आत्मनिर्भर रहे हमारे गांव अचानक ‘मनीऑर्डर एकोनामी’ पर पलने लगे। गांवों में स्वरोजगार के काम ठप पड़ गए। कुटीर उद्योग ध्वस्त हो गए। भारतीय समाज को लांछित करने के लिए उस पर सबसे बड़ा आरोप वर्ण व्यवस्था का है। जबकि वर्ण व्यवस्था एक वृत्ति थी, टेंपरामेंट थी। आपके स्वभाव, मन और इच्छा के अनुसार आप उसमें स्थापित होते थे। व्यावसायिक वृत्ति का व्यक्ति वहां क्षत्रिय बना रहने के मजबूर नहीं था, न ही किसी को अंतिम वर्ण में रहने की मजबूरी थी। अब ये चीजें काल बाह्य हैं। वर्ण व्यवस्था समाप्त है।

जाति भी आज रूढ़ि बन गयी किंतु एक समय तक यह हमारे व्यवसाय से संबंधित थी। हमारे परिवार से हमें जातिगत संस्कार मिलते थे-जिनसे हम विशेषज्ञता प्राप्त कर‘जाब गारंटी’भी पाते थे। इसमें सामाजिक सुरक्षा थी और इसका सपोर्ट सिस्टम भी था। बढ़ई, लुहार, सोनार, निषाद, माली, धोबी, कहार ये जातियां भर नहीं है। इनमें एक व्यावसायिक हुनर और दक्षता जुड़ी थी। गांवों की अर्थव्यवस्था इनके आधार पर चली और मजबूत रही। आज यह सारा कुछ उजड़ चुका है। हुनरमंद जातियां आज रोजगार कार्यालय में रोजगार के लिए पंजीयन करा रही हैं या महानगरों में नौकरी के लिए धक्के खा रही हैं। जाति व्यवस्था और वर्ण व्यवस्था दोनों ही अब अपने मूल स्वरूप में काल बाह्य हो चुके हैं। अप्रासंगिक हो चुके हैं। ऐसे में जाति के गुण के बजाए, जाति की पहचान खास हो गयी है। इसमें भी कुछ गलत नहीं है। हर जाति का अपना इतिहास है, गौरव है और महापुरुष हैं। ऐसे में जाति भी ठीक है, जाति की पहचान भी ठीक है, पर जातिभेद ठीक नहीं है। जाति के आधार भेदभाव यह हमारी संस्कृति नहीं। यह मानवीय भी नहीं और सभ्य समाज के लिए जातिभेद कलंक ही है।

हमें हमारे गांवों की ओर देखना होगा। मनीषी धर्मपाल की ओर देखना होगा, उन्हें पढ़ना होगा, जो बताते हैं कि किस तरह हमारे गांव स्वावलंबी थे। जबकि आज नई अर्थव्यवस्था में किसान आत्महत्या करने लगे और कर्ज को बोझ से दबते चले गए। 1991 के लागू हुयी नई आर्थिक व्यवस्था ने पूरी तरह से हमारे चिंतन को बदलकर रख दिया। संयम के साथ जीने वाले समाज को उपभोक्ता समाज में बदलने की सचेतन कोशिशें प्रारंभ हुयीं। 1991 के खड़ा हुआ यह अर्थतंत्र इतना निर्मम है कि वह दो महीने भी आपको संकटों में संभाल नहीं सकता। आप देखें तो छोटे उद्यमियों की छोड़ें,बड़ी कंपनियों ने भी अपने कर्मियों के वेतन में तत्काल कटौती करने में कोई कमी नहीं की। यहां से जो गाड़ी पटरी से उतरी है,संभलने को नहीं है। ईएमआई के चक्र ने जो जाल बुना है, समूचा मध्यवर्ग उससे जूझ रहा है। निम्न वर्ग उससे स्पर्धा कर रहा है। इससे समाज में बढ़ती गैरबराबरी और स्पर्धा की भावना एक बड़े समाज को निराशा और अवसाद से भर रही है। जाहिर है संकट हमारे हैं, इसके हल हम ही निकालेगें। शिक्षा, स्वास्थ्य, बेरोजगारी, कृषकों के संकट, बढ़ती जनसंख्या के सवाल हमारे सामने हैं। इनके ठोस और वाजिब हल निकालना हमारी जिम्मेदारी है। कोरोना संकट ने हमें साफ बताया है कि हम आज भी नहीं संभले तो कल बहुत देर हो जाएगी। अंधे पूंजीवाद और निर्मम कॉरपोरेट की नीतियों से अलग एक मानवीय,संवेदनशील समाज बनाने की जरूरत है जो भले महानगरों में बसता हो उसकी जड़ों में संवेदना और आत्मीयता हो। सिर्फ हासिल करने और हड़पने की चालाकी न हो। देने का भाव भी हो। भरोसा कीजिए हम इस दुखों की नदी को पार कर जाएंगें।

 (लेखक मीडिया विमर्श पत्रिका के कार्यकारी संपादक व माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में प्रोफेसर व कुलसचिव हैं) 

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‘सुधीर सर, दुनियाभर के पत्रकारों के लिए आपका ये साहस नए जज्बे का प्रतीक है’

कर्तव्य के साथ चुनौतियों को स्वीकारना होता ही है। प्रभु आपके और हमारे सभी साथियों के साथ है। सब जल्द ही सामान्य होगा।

Last Modified:
Saturday, 16 May, 2020
Sudhir Chaudhary

सुधीर चौधरी सर, आपके साथ काम करते हुए सिर्फ चार महीने ही हुए हैं, पर जिस तरह का साहस आपने कल दिखाया, उसने ये अहसास दिलाया कि एक संपादक का साहस क्या होता है। रीढ़विहीन पत्रकारिका का आरोप झेल रहे दुनियाभर के पत्रकारों के लिए आपका ये साहस नए जज्बे का प्रतीक है। जिस तरह आपने कोरोना वायरस की न्यूजरूम एंट्री से डटकर मुकाबला करने की ठानी, वो बहुत DARING है।

चूंकि आप ‘जी न्यूज’ का नेतृत्व कर रहे हैं, ऐसे में हम सबका मानना था कि आपको ऑफिस आकर अपना लोकप्रिय शो ‘डीएनए’ (DNA) नहीं करना चाहिए, आप चाहते तो इस सर्वमान्य निवेदन को स्वीकार कर सकते थे, पर आपने अपने परिवार और हितैषियों की इच्छा के विरुद्ध जाकर लगातार न्यूजरूम में साथियों के साथ कंधा मिलाकर खड़े होने को चुना। वाकई ये हमारे लिए किसी पुलित्जर अवॉर्ड से कहीं ज्यादा है, कि कठिन समय में हमारे नेतृत्वकर्ता ने हमें मझधार में नहीं छोड़ा।

मुझे याद है होली के बाद की वो पहली मीटिंग जिसमें आपने ये कहा था कि हमें न्यूजरूम व मीटिंग में गैदरिंग नहीं करनी है। उसी दिन से सिर्फ अतिआवश्यक टीम ही ऑफिस आ रही थी, डिजिटल की पूरी टीम 40 दिन से ज्यादा समय से वर्क फ्रॉम होम कर रही है। आपने कोरोना की गंभीरता को समय से पहले भांपा था और लगातार इससे बचने के हरसंभव उपाय पर बात की, पर होनी को कौन टाल सकता है।

कर्तव्य के साथ चुनौतियों को स्वीकारना होता ही है। प्रभु आपके और हमारे सभी साथियों के साथ है। सब जल्द ही सामान्य होगा। आप और न्यूजरूम के साथी अपना पूरा ध्यान रखिएगा, वर्क फ्रॉम होम की टीम भी अपने न्यूजरूम के हर साथी के प्रति चिंतित है। कोरोना के साथ हम ये लड़ाई जल्दी ही जीतेंगे, ये मन में विश्वास है।

(वरिष्ठ पत्रकार अभिषेक मेहरोत्रा की फेसबुक वॉल से साभार)

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ऐसे कठिन समय में PM मोदी के राष्ट्र के नाम संदेश की भावनाओं को समझा जाना चाहिए

संकट कितने भी बड़े, गहरे और लाइलाज हों। एक नायक को उम्मीदों और सपनों के साथ ही होना होता है। वह चाहकर भी निराशा नहीं बांट सकता। अवसाद नहीं फैला सकता।

Last Modified:
Thursday, 14 May, 2020
Pro. Sanjay Dwivedi

प्रो.संजय द्विवेदी।।

संकट कितने भी बड़े, गहरे और लाइलाज हों। एक नायक को उम्मीदों और सपनों के साथ ही होना होता है। वह चाहकर भी निराशा नहीं बांट सकता। अवसाद नहीं फैला सकता। उसकी जिम्मेदारी है कि टूटे हुए मनों, दिलों और आत्मा पर लग रही खरोंचों पर मरहम ही रखे। ऐसे कठिन समय में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 12 मई,2020 के राष्ट्र के नाम संदेश की भावनाओं को समझा जाना चाहिए। कोरोना के अंधेरे समय में जब दुनिया की तमाम प्रगतिशील अर्थव्यवस्थाएं संकटों से घिरी हैं और घबराई हुई हैं, तब भी वे उम्मीदों और सपनों का साथ नहीं छोड़ते। एक समर्थ नेता की तरह वे लोगों में निराशा नहीं भरते, बल्कि भरोसा जगाते हैं। वे निराश और हताश नहीं हैं, बल्कि संकटों में अवसर की तलाश कर रहे हैं। वे कोरोना महामारी के व्यापक प्रसार के क्षणों में भी कहते हैं कि ‘हम कोरोना से लड़ेंगें और आगे बढेंगे।’

कोरोना संकट के बाद अखबार बुरी खबरों से भरे पड़े हैं। गांव जाते हुए ट्रेन से कटते श्रमिक, भूख से बिलखते हुए बच्चे, गहरी असुरक्षा से घिरे छोटी गाड़ियों,साइकिलों, मोटरसाइकिलों और पैदल ही गांव को जाते लोग जैसी तमाम छवियां मन को दुखी कर जाती हैं। इस नकारात्मकता के संसार में सोशल मीडिया पर अखंड विलाप करते लोग भी हैं, जो लोकतंत्र की बेबसी और हमारे सरकारी तंत्र की विफलताओं की रूदाली कर रहे हैं। इस गहरे अंधकार, नकारात्मक सूचनाओं के संसार में एक राष्ट्रनायक का काम क्या है? सही मायने में एक राष्ट्र के नायक का यही कर्तव्य है कि वह राष्ट्रजीवन में निराशा और अवसाद के बादल न चढ़ने दे। वह दुखी जनों को और संतप्त न करे। कठिनतम जीवन संघर्ष में लगी जनता को प्रेरित कर उन्हें रास्ता दिखाए।

देश की विशाल आबादी हमारा संकट है। बावजूद इसके इस प्रश्न पर बोलना खतरे से खाली भी नहीं है। सारे संसाधन पैदा होते ही अगर कम हो जाते हैं तो इसका कारण हमारी विशाल जनसंख्या ही है। शायद इसलिए मोदी यह कहते नजर आ रहे हैं कि ‘अर्थ केंद्रित वैश्वीकरण या मनुष्य केंद्रित वैश्वीकरण?’ उनका यह प्रश्न खुद से भी है, देश से भी और नीति-निर्माताओं से भी है। उन देशों से भी है जो तमाम चमकीली प्रगति के बाद भी गहरी निराशा में हैं। मोदी मानते हैं कि आपदा को अवसर में बदला जा सकता है। लोगों के दुख कम किए जा सकते हैं। उन्होंने भुज के उदाहरण से समझाने की कोशिश भी की है कि कैसे खत्म हुए इलाके फिर सांस लेने लगते हैं, धड़कने लगते हैं।

प्रधानमंत्री के इस भाषण की सबसे बड़ी बात है कि उन्होंने ‘आत्मनिर्भर भारत’ शब्द का कई बार इस्तेमाल किया। यह आत्मनिर्भर भारत ही दरअसल अपने पैरों पर खड़ा भारत, स्वावलंबी भारत है। जहां अपने जरूरत की चीजें और उनका निर्माण हम कर पाते हैं। उत्तर प्रदेश जैसे राज्य ‘वन डिस्ट्रिक वन प्रोडक्ट’ जैसे अभियान के माध्यम से इसे संभव भी कर रहे हैं। नरेंद्र मोदी जैसे प्रधानमंत्री जो उदार आर्थिक नीतियों के पक्ष में रहे हैं, अगर आज आत्मनिर्भर भारत को एकमात्र मार्ग बता रहे हैं, तो इसके विशिष्ट अर्थ हैं। यानी अब वह स्थिति है जिसमें भारत एक ग्लोबल लीडर बनने की आतुरता दिखा रहा है। वे यहीं नहीं रुके, उन्होंने यह भी कहा कि ‘लोकल ने हमें बचाया है, लोकल के लिए वोकल बनिए और यही हमारा जीवन मंत्र होना चाहिए।’ 

कोरोना के वैश्विक संकट ने भारत जैसे विशाल आबादी वाले देश के सामने जैसे प्रश्न खड़े किए हैं, उनके उत्तर हमेशा सकारात्मक नहीं हो सकते। सरकारों और उसके तंत्र को कोसते आए हम लोग अचानक उसकी श्रेष्ठता और जनपक्षधरता का बखान नहीं कर सकते। यह तंत्र जैसा भी है, बना और बनाया गया है। यह जितना भी उपयोगी या अनुपयोगी है, सच यह है कि वही हमारे काम आ रहा है। बहुनिंदित पुलिस, सरकारी डॉक्टर, नर्स, सफाई और स्वच्छता से जुड़ा सरकारी तंत्र ही इस महान संकट में अपनी जान जोखिम में डालकर आपके पास पहुंच रहा है। बावजूद इसके कि हर जगह उनके लिए फूल नहीं बरस रहे। कहीं पत्थर हैं तो कहीं व्यापक असहयोग। आप सोचें कि जिस तरह निजीकरण की अंधी आंधी 1991 से चली और यह लगा कि सरकार का काम स्कूल, अस्पताल और सेवा के तमाम काम करना नहीं है, ये सारे काम तो निजी क्षेत्र में ही गुणवत्ता से संभव हैं। आप कल्पना करें कि अगर यह बुरे और खराब सेवाएं देने वाले सरकारी अस्पताल भी हमारे पास न होते क्या होता?     

हम जानते हैं कि कभी भी नायक उम्मीदों का दामन नहीं छोड़ते। देश की विशाल आबादी जो अपने संकटों के कारण अब महानगरों से पलायन कर रही है। उसकी उम्मीदें टूट रही हैं और वह किसी भी हाल में अपने गांव या घर पहुंचना चाहती है। ऐसे में सरकारों का दायित्व क्या है? राष्ट्रनायकों का दायित्व क्या है? यही कि वे भरोसे को दरकने न दें। उम्मीदों को टूटने न दें। सपनों को मरने न दें। हमें यह मान लेना चाहिए कि देश की इतनी विशाल आबादी के लिए कोई भी तंत्र या व्यवस्था द्वारा बनाए गए इंतजाम नाकाफी ही साबित होंगे। किंतु जहां जैसे संकट खड़े हो रहे हैं, सरकारें और समाज पीड़ित जनों के साथ खड़े होते ही हैं। सरकारी तंत्र की सबसे बड़ी विफलता है कि उसके प्रति विश्वास खत्म हो चुका है। वे कुछ भी करें, अब वह भरोसा हासिल नहीं कर सकते। यह भरोसा धीरे-धीरे तोड़ा गया है। सरकार, मीडिया, समाज आदि सबने मिलकर सरकारी संस्थाओं, सरकारी अस्पतालों, स्कूलों, सरकारी सेवाओं से लोगों का भरोसा डिगाया है। सरकारी फोन से लेकर सरकारी पीडीएस की दुकानों की तरफ देखने की हमारी खास दृष्टि है।

आप यह भी देखें कि प्राइवेट विश्वविद्यालय, प्राइवेट फोन कंपनियां, प्राइवेट अस्पताल भी तमाम गलतियां करते हैं पर निशाने पर सरकारी संस्थाएं ही होती हैं। मीडिया के निशाने पर भी सरकारी संस्थाएं ही होती हैं, जैसे निजी क्षेत्र में रामराज्य कायम हो। सरकारों की जड़ता, नीति-नियंताओं की स्वार्थपरता ने हालात और बिगाड़ दिए हैं। अपनी ही संस्थाओं के प्रति सरकारें अनुदार होती गयीं और निजी क्षेत्र पर उनकी कृपा और संवेदना बरसने लगी। किंतु जब संकट आन पड़ा तो वही बहुनिंदित, लापरवाह और कथित तौर पर भ्रष्ट तंत्र ही हमारे काम आया। आज भी नीचे के स्तर पर हमारे सफाई कामगारों, नर्स बहनों से लेकर, सेनिटाइजेशन के काम से जुड़े लोग, पुलिसकर्मियों से लेकर आंगनबाड़ी की बहनों की सेवाओं की ओर देखना चाहिए।

सही मायनों में मोदी सपनों के सौदागर हैं। वे निराश नहीं होते, निराशा नहीं बांटते। अवसाद की परतें तोड़ते हैं और उजास जगाते हैं। वे इसीलिए अपने इस भाषण में एक नायक की तरह बात करते हैं। वे कहते हैं ‘कर्मठता की पराकाष्ठा और कौशल(क्राफ्ट) की पूंजी से ही भारत आत्मनिर्भर बनेगा।’ वे जोड़ते हैं कि मिट्टी की महक से बनेगा नया भारत। हम देखें तो एक नायक तौर पर मोदी संभावनाओं में ही निवेश कर रहे हैं। वे मुख्यमंत्रियों के साथ सतत संवाद कर रहे हैं। उन्हें नेतृत्व दे रहे हैं। अपनी ओर से विविध वर्गों से संवाद कर रहे हैं।

एक लोकतंत्र में संवाद से ही दुनिया बनती और अवसर सृजित होते हैं। इसमें कोई दो राय नहीं कि संकट गहरा है, इंतजाम नाकाफी हैं, सेवाएं गुणवत्तापूर्ण नहीं है, रामराज्य अभी भी प्रतीक्षित ही है, ईमानदारी से कर्तव्य निर्वहन करने वालों की संख्या सीमित है। फिर भी हिंदुस्तान का मन मरा नहीं है। अपनी विशाल आबादी, विशाल संकटों के बाद उसका हौसला टूटा नहीं है। उसकी संवेदनाएं मरी नहीं है। हमारे श्रमदेव और श्रमदेवियों की अपार उपेक्षा के बाद भी, हमारे किसानों के लाख संकटों के बाद भी भारत फिर उठ खड़ा होगा और सपनों की ओर दौड़ लगाएगा, भरोसा कीजिए। कोरोना संकट के बाद का भारत एक नई तरह से सोचेगा, व्यवहार करेगा। साथ ही ज्यादा आत्मनिर्भर और ज्यादा समर्थ होगा।

(लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में प्रोफेसर और कुलसचिव हैं)

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'हैप्पी बर्थडे चित्रा त्रिपाठी, यही खूबियां बनाती हैं आपको दूसरों से खास'

चित्रा सिर्फ रिपोर्टिंग ही नहीं करतीं, बल्कि उसके माध्यम से आम जनता के बीच जाकर उनके दुख-दर्द को टटोलती हैं और उन्हें दूर करने का प्रयास करती हैं।

Last Modified:
Monday, 11 May, 2020
MALVIKA HARIOM

मालविका हरिओम, कवयित्री व सामाजिक कार्यकर्ता।।

उत्तर प्रदेश के छोटे से शहर गोरखपुर से निकलने वाली एक बड़ी शख्सियत के रूप में चित्रा त्रिपाठी ने न सिर्फ अपने शहर और अपने प्रदेश का ही नाम रोशन किया, बल्कि उन सभी लोगों को गर्व की अनुभूति भी करवाई, जो कभी न कभी, किसी न किसी रूप में उनसे जुड़े रहे। उनकी मम्मी पढ़ी-लिखी होने के बावजूद तमाम दूसरी भारतीय महिलाओं की तरह घर पर ही रहीं। सिर्फ परिवार को देखा और अपने सपनों को तिलांजलि दे दी, लेकिन वे अपनी बेटी चित्रा में लगातार कुछ अच्छा करने और आगे बढ़ने की ललक को भरती रहीं। यही कारण है कि कुछ अच्छा करने का जज्बा जन्म के साथ ही मां के आशीर्वाद के रूप में चित्रा को मिल गया और फिर उस सफर को देखें तो जिन छोटी जगहों के बच्चे ठीक से शिक्षा भी प्राप्त नहीं कर पाते, वहां से एक लड़की अपने दम पर धीरे-धीरे आगे बढ़ती है और एक दिन उस ऊंचाई पर पहुंच जाती है, जहां से दुनिया उसे आसानी से देख सके।

सुंदर चेहरा, विनम्र स्वभाव, संवेदनशील हृदय और कुछ कर गुजरने का जज्बा, इन सबको मिलाकर चित्रा की एक ऐसी तस्वीर तैयार होती है जो श्रोताओं और दर्शकों को एक अपनत्व और जुड़ाव का अहसास कराती है। चित्रा सिर्फ रिपोर्टिंग ही नहीं करतीं, बल्कि उसके माध्यम से आम जनता के बीच जाकर उनके दुख-दर्द को टटोलती हैं और उन्हें दूर करने का प्रयास करती हैं। सोशल मीडिया पर उनके भावनात्मक लाइव प्रसारण उनकी सकारात्मक छवि को स्थापित और पुख्ता करते हैं।

आज चित्रा एक सेलिब्रिटी हैं। लेकिन मुझे याद आती है वो प्यारी चित्रा, जिसे मैंने गोरखपुर में उसके संघर्ष के दिनों में देखा था। वहां कई नए लड़के-लड़कियां जो बतौर रिपोर्टर अखबारों में काम करते थे, घर आया करते थे। पतिदेव डॉ. हरिओम उन दिनों जिलाधिकारी गोरखपुर के पद पर तैनात थे और हम दोनों ही चूंकि सांस्कृतिक गतिविधियों में रुचि लेते थे, इसलिए कोई न कोई घर पर इंटरव्यू लेने या बातचीत करने जरूर आ जाता था। इसी सिलसिले में एक दिन चित्रा का भी आना हुआ। लॉन में दो कुर्सियाँ लगाई गईं। उन दिनों वहां एक लोकल चैनल 'सत्या' हुआ करता था। चित्रा उसी में खबरें पढ़ती थीं। सुंदर चेहरा, चमकती आंखें, गर्दन तक कटे हुए छोटे-छोटे बाल, नई उम्र का उत्साह, गज़ब का आत्मविश्वास और कुछ कर गुजरने का जज्बा, ये सबकुछ एकसाथ मुझे उस लड़की में नज़र आया। ज़िलाधिकारी का इंटरव्यू लेने के नाते चित्रा पूरी तैयारी के साथ आई थी। हाथ में ढेर सारे पन्ने, उन पर लिखे हुए सवाल और चेहरे पर हमेशा की तरह एक प्यारी-सी मुस्कुराहट। इंटरव्यू बहुत अच्छा हुआ। चित्रा ने साबित कर दिया कि ख़ूबसूरत चेहरे के साथ-साथ उसमें क़ाबिलियत भी भरपूर है।

फिर एक दिन किसी काम से जब ‘सत्या’ चैनल पर जाना हुआ तो गर्मी के दिनों में दूसरे फ्लोर पर, एक कमरे के छोटे-से स्टूडियो में चित्रा खबरें पढ़ने के लिए तैयार खड़ी थी। गर्मी की वजह से चेहरे पर काफ़ी पसीना आ रहा था। मैंने देखा कि वो खबरों की तैयारी के साथ-साथ, अपने मेकअप का काम भी ख़ुद ही देख रही थी। हम दोनों मिले, थोड़ी-सी बात हुई और उसके बाद वो अपने समाचार प्रसारण की तैयारी में लग गई। मैं देखती ही रह गई कि इतनी छोटी-सी लड़की में कितना आत्मविश्वास है और काम के प्रति कितनी लगन और ईमानदारी है। समाचार पढ़ने में अभी वक़्त था लेकिन चित्रा को खाली बैठना गंवारा नहीं था। वह कुर्सी पर बैठ गयी और समाचार पढ़ने की रिहर्सल करने लगी। जब मैंने उसकी ओर देखा तो वो मुस्कुराई। वो मुस्कुराहट मुझे आज तक याद है।

आज चित्रा मेरी छोटी बहन की तरह है। हम लोग फोन पर बात करते हैं, मिल भी लेते हैं। जब भी उसको देखती हूं तो यही लगता है कि लड़कियां अब किसी भी क्षेत्र में पीछे नहीं हैं। अच्छी सोच हो, काम के प्रति निष्ठा हो और कुछ कर गुजरने का जुनून हो तो छोटे शहरों से आई लड़कियां भी देश-दुनिया की तमाम लड़कियों के लिए प्रेरणा बन सकती हैं। चित्रा ने यह कर दिखाया। आज 'चित्रा त्रिपाठी' सिर्फ़ एक नाम नहीं बल्कि एक 'प्रेरणा' है, उन तमाम लड़कियों के लिए जो न सिर्फ अपने पैरों पर खड़ा होना चाहती हैं बल्कि समाज-दुनिया की बेहतरी के लिए कुछ अच्छा और सकारात्मक भी करना चाहती हैं।

जन्मदिन की अनंत शुभकामनाओं के साथ प्रिय चित्रा के लिए मेरी ये पंक्तियां-

ऊंची लहरों पे चढ़ के आई हूं
मैं जमाने से लड़ के आई हूं
मुफ्त का ज्ञान ना थोपो मुझपर
अपने हिस्से का पढ़ के आई हूं

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'पत्रकार संगठन कब तक इस खुशफहमी में जीते रहेंगे कि वे लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ है!'

मैं राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री से सीधे सवाल करना चाहता हूं कि लोकतंत्र के तथाकथित चौथे स्तम्भ को स्वतंत्र भारत की सरकारों ने अब तक लंगड़ा/अपाहिज क्यों बनाए रखा है?

Last Modified:
Monday, 11 May, 2020
Vinod Bhardwaj

विनोद भारद्वाज, वरिष्ठ पत्रकार।।

कोरोना से संक्रमित पत्रकार साथी ‘दैनिक जागरण’ के उप समाचार संपादक पंकज कुलश्रेष्ठ की कुर्बानी के बाद आज मैं भारत के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री से ये सीधे सवाल करना चाहता हूं कि लोकतंत्र के तथाकथित चौथे स्तम्भ को स्वतंत्र भारत की सरकारों ने अब तक लंगड़ा/अपाहिज क्यों बनाए रखा है?

अन्य तीनों स्तम्भों की तरह इस चौथे स्तम्भ को सरकार ने सुरक्षित और संरक्षित क्यों नहीं किया? इस चौथे स्तम्भ को अन्य तीनों स्तम्भों की भांति आर्थिक और कानूनी अधिकारों से वंचित रखने की साजिश क्यों होती रही है? यही प्रश्न मेरा मीडिया घरानों से भी है कि अब तक सरकार को अन्य तीनों स्तम्भों की भांति अधिकार और सुविधा सम्पन्न करने के लिए मजबूर क्यों नहीं किया गया?

स्वतन्त्र भारत की अब तक की सरकारों ने मीडिया/पत्रकारों का सिर्फ निज स्वार्थ सिद्धि के लिए इस्तेमाल किया है। केवल सरकारें (विधायिका)ही नहीं, कार्यपालिका और न्यायपालिका भी इस चौथे स्तम्भ का अपने हितों के लिए दुरुपयोग की हद तक इस्तेमाल करने में पीछे नहीं दिखी हैं। लोकतंत्र के तीनों स्तम्भों का भरसक प्रयास यही रहता है कि मीडिया/पत्रकार नाम का ये चौथा स्तम्भ उनकी तरह मजबूत/सुरक्षित न होने पाए!

हम पत्रकारों ने भी इसी अधोगति को अपनी नियति मान लिया है। हम सिर्फ इसी खुशफहमी में जिंदा रहकर गर्व महसूस करते हैं कि सब हमको लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कहते हैं, नेताओं-अधिकारियों से दुआ सलाम है हमारी..बहुत पूछ है हमारी..जबकि हाल बिल्कुल उलट है! अपने हालातों/दुर्गति पर ईमानदारी से गौर करके अपनी अंतरात्मा से तो पूछिए कि क्या हम यथार्थ में अन्य तीनों स्तम्भों के पासंग में भी टिकते हैं?

आखिर इन चौतरफा दुर्गतियों के बीच हमारे पत्रकार भाई/पत्रकार संगठन कब तक इस खुशफहमी में जीते रहेंगे कि वे लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ है! मौजूदा सरकार को इस तथाकथित चौथे स्तम्भ के बारे में अब अपना नजरिया साफ तौर पर स्पष्ट करना ही चाहिए।

सरकार से जवाब मांगिये साथियों कि लोकतंत्र के इस चौथे स्तम्भ को अब तक लंगड़ा, मजबूर और दया का पात्र बनाकर क्यों रखा गया है? इस चौथे स्तम्भ को लंगड़ा बनाए रखने के पीछे अन्य तीनों स्तम्भों के बीच आखिर कौन सी दुरभिसन्धि है और क्यों?

सरकार यह भी खुले मंच से स्पष्ट करे कि वह इस चौथे स्तम्भ को अन्य तीनों स्तम्भों की भांति सुरक्षित, समृद्ध और मजबूत करना चाहती है या नहीं! ...और यदि वह ऐसा नहीं करना चाहती तो क्यों? इस देश की जनता को भी ये जानने का पूरा हक है कि लोकतंत्र के इस चौथे स्तम्भ को नजरंदाज और बर्बाद करके वह तीन स्तम्भों के बूते तिपाया बनकर तृप्त/खुश क्यों है?

अब हम पत्रकारों को अपनी ये दुर्गति किसी भी हाल में स्वीकार्य नहीं होनी चाहिए। हमको सरकार से ये सारे सवाल करने और उन्हें जवाब देने के लिए मजबूर करने का पूरा हक है। अपने साथी पंकज कुलश्रेष्ठ के परिवार के लिए आर्थिक और सरकारी संरक्षण की माग और उसकी पूर्ति कराना हमारा हक है, कोई भीख नहीं!

(लेखक ‘ताज प्रेस क्लब’, आगरा के पूर्व अध्यक्ष हैं)

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क्या सरकारी प्रसारणों में इन सभी बातों का ध्यान रखा जा रहा है मिस्टर मीडिया!

डेढ़ महीने से ज़्यादा हो गया। अभी दो-तीन महीने और चलेगा, ऐसी आशंका है। उसके बाद साल भर तक इसके आफ्टर इफेक्ट्स होंगे।

राजेश बादल by
Published - Sunday, 10 May, 2020
Last Modified:
Sunday, 10 May, 2020
Rajesh Badal

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।। 

डेढ़ महीने से ज़्यादा हो गया। अभी दो-तीन महीने और चलेगा, ऐसी आशंका है। उसके बाद साल भर तक इसके आफ्टर इफेक्ट्स होंगे। यानी जिंदगी की गाड़ी पटरी पर लौटने में दो साल तो लग जाएंगे। तब तक मीडिया के तमाम अवतार क्या इसी तरह दिखाते,सुनाते और पढ़ाते रहेंगे, जैसे आज कर रहे हैं। क्या पत्रकारिता के किसी केंद्र में इस बात पर बहस हो रही है कि एक हजार घंटे से भी अधिक समय से मीडिया की चिमनी से कोरोना का ज़हरीला धुआं निकल रहा है। इस मानसिक प्रदूषण का दर्शकों,श्रोताओं और पाठकों पर कितना असर पड़ रहा है, किसी ने सोचा है।

आज सिर्फ सरकारी माध्यमों की बात। इनको देखें तो लगता है कि आकाशवाणी के तमाम केंद्रों को इनदिनों जैसे लकवा मार गया है। अधिकतर केंद्र एक ही प्रसारण दोहराते हैं। उनकी अपनी क्षेत्रीय भाषाओं-बोलियों की खुशबू कपूर की तरह उड़ गई है। विविध संस्कृति की झलक नहीं सुनाई देती। सुबह से लेकर रात तक सारे प्रसारण सिर्फ कोरोना के इर्द-गिर्द सिमटकर रह गए हैं। कोरोना पर भी श्रोता सुनने के लिए तैयार हैं, बशर्ते कुछ नया तो हो। रोज-रोज वही घिसी-पिटी सूचनाएं और उन्हीं को ड्यूटी की तरह दोहराते रेडियो जॉकी और जानकार। कहां गई हमारी पेशेवर हुनरमंदी? बोझिल और अवसादग्रस्त दिमागों को राहत भी चाहिए। सुगम संगीत, फिल्म संगीत, लोकगीत और रेडियो-साहित्य का अनमोल ख़जाना जैसे किसी ने लूट लिया है। एफएम गोल्ड का तो सत्यानाश ही कर दिया गया। इसी तरह अन्य चैनलों की दुर्दशा है। मत भूलिए कि लॉकडाउन के दरम्यान एक ही घर में बच्चे,बूढ़े,महिलाएं और पुरुष बंद हैं। क्या सरकारी प्रसारणों में इन सभी वर्गों का ध्यान रखा जा रहा है? कतई नहीं।

इसी तरह दूरदर्शन और उनके तमाम केंद्रों में इन दिनों अधिक से अधिक बोर करने वाले कार्यक्रमों की होड़ लगी है। ‘रामायण’ और ‘महाभारत’ को छोड़ दें तो कुछ भी नया और ताजगी भरा नहीं है। वैसे तो ये दोनों धारावाहिक भी दूरदर्शन ने तीस-पैंतीस साल पहले बनाए थे। कथावस्तु को छोड़ दें तो इन धारावाहिकों की तकनीक, प्रस्तुति और पटकथा एकदम बासी और आउट ऑफ डेट हो चुकी है। अगर इतने पुराने धारावाहिक ही दिखाने थे तो भारत का पहला धारावाहिक ‘बीवी नातियों वाली’ क्यों नहीं दिखाया गया? उसके बाद सुपरहिट ‘हम लोग’, ‘तमस’, ‘बूंद बूंद’, ‘मालगुडी डेज’ और कालजयी ‘मिर्जा गालिब’ के प्रदर्शन पर विचार नहीं किया गया। मत भूलिए कि इस दौरान दो तीन नई पीढियां आ चुकी हैं और हमें उनके लिए कंटेंट उन्हीं के हिसाब से तैयार करना पड़ेगा। तभी वे दूरदर्शन और सरकारी रेडियो पर ठहरेंगे।

सरकारी प्रचार माध्यम लोगों के दिलों में जगह क्यों नहीं बनाते? उन्हें देखते ही उबकाई सी क्यों आती है-किसी ने सोचा है? अपवाद के तौर पर रेडियो-टीवी के कुछ प्रस्तोता हो सकते हैं, जो हर तरह के कार्यक्रम पेश करने में माहिर हैं, मगर पुराने फिल्म संगीत की जानकार कोई प्रस्तोता कम्पोस्ट खाद बनाने की विधि समझाएगी तो अटपटा लगता ही है। या दूरदर्शन पर समाचार विश्लेषण में कोई ऐसा एंकर स्क्रीन पर हो, जिसने पढ़ना-लिखना ही छोड़ दिया हो अथवा विषय की गहराई तक समझ न हो तो वह केवल नौकरी करता ही नज़र आता है। हर एंकर अशोक श्रीवास्तव नहीं हो सकता। यह बात तो समझनी होगी मिस्टर सरकारी मीडिया!

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल की 'मिस्टर मीडिया' सीरीज के अन्य कॉलम्स आप नीचे दी गई हेडलाइन्स पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं-

यह अपने अंदर झांकने का भी दौर है मिस्टर मीडिया!

हालात तो खतरे की घंटी बजा ही रहे हैं मिस्टर मीडिया!   

मिस्टर मीडिया: पत्रकारिता के लिए ये वाकई मुश्किल दौर है

उस सूरत में अपने आपको भी जवाब देना होगा मिस्टर मीडिया!

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‘भाई पंकज कुलश्रेष्ठ को यही होगी सच्ची श्रद्धांजलि’

कल रात 10.30 बजे सोशल मीडिया पर एक बड़े मीडिया ग्रुप के वरिष्ठ पत्रकार की कोरोना से इंतकाल की खबर आयी।

Last Modified:
Friday, 08 May, 2020
Rajeev Gupta

राजीव गुप्ता।।

कल रात 10.30 बजे सोशल मीडिया पर एक बड़े मीडिया ग्रुप के वरिष्ठ पत्रकार की कोरोना से इंतकाल की खबर आयी। सब को जिज्ञासा हुई कि कौन सा पत्रकार और कौन सा मीडिया संस्थान, लेकिन कुछ ही समय में मीडिया ग्रुप का व पत्रकार भाई पंकज ‪कुलश्रेष्ठ का नाम सामने आते ही लोग सोचने पर मजबूर हो गए कि भगवान न करे अगर कुछ हो गया तो क्या आगरा की व्यवस्था में यहां के निवासियों को धरती पर नरक भोगना पड़ेगा। आज भाई पंकज कुलश्रेष्ठ के असमय ‪निधन ने सोचने पर मजबूर कर दिया कि क्या भारतीय शासन व प्रशासन की व्यवस्था में हम पंगु हैं, असहाय हैं, क्या कलम की ताकत कम हो गयी है, क्या मानव अधिकार कुछ नहीं हैं।

मीडिया जो शहर के उच्च पद तक पहुंच रखता है। संस्थान पीएमओ तक पहुंच सकता है, फिर भी वरिष्ठ पत्रकार भाई पंकज जी को हम आगरा प्रशासन व व्यवस्था से इलाज न दिला सके। यहीं पर सवाल उठता है कि अगर सुरक्षाकर्मी की ही सुरक्षा को आंच आ जाए तो बाक़ी लोगों का क्या होगा। अखबार किसी भी व्यवस्था की आंख होते हैं और क्या हमारी आंख देखकर भी अनदेखा कर गई या कलम बेबस थी। आज सभी मीडिया को एकजुट होकर शहर को बचाना चाहिए, नहीं तो देखते देखते रोम जल जाएगा और नीरो बंसी बजाता रहेगा, वाली कहावत हो जाएगी।

कहीं हम दबाव में तो नहीं। कल रात की घटना के बाद आज चिंता का दिन है। आम मरीज़ को इलाज नहीं है। कोरोना के मरीज के इलाज या क्वारंटाइन सेंटर पर अव्यवस्था की विडियो सोशल मीडिया पर दिल दहला देती हैं। प्रश्न उठता है कि ऐसा क्या हो गया कि आगरा मॉडल की जो तारीफ़ हो रही थी, उसका गणित कब, कहां और केसे बदल गया? शहर तो छोड़िए, बाहर के लोगों को आगरा की चिंता सता रही है। उनके अनेक सवाल होते हैं, पूछते हैं कि सरकार व प्रशासन क्या कर रहा है? क्या लोग डर के मारे अपनी बीमारी छिपा रहे हैं? इतने पॉजिटिव मरीज हैं तो क्या व्यवस्था है। क्या क्वारंटाइन सेंटर, अस्पताल, दवाई खाना, किट, डॉक्टर ऑर पैरा मेडिकल स्टाफ में दिल्ली जैसे महानगर की जनसंख्या के अनुसार आगरा आगे है। कहां और क्या कमी है? क्या आगरा की इस स्थिति को अनदेखी से चाइना का बुहान शहर तो नहीं बना रहे?

आज रेड क्रॉस डे की स्वर्ण जयंती है और भाई पंकज कुलश्रेष्ठ को सच्ची श्रद्धांजलि तभी होगी, जब मीडिया व शहर एकजुट होकर कमियों को दूर कराए, न कि आलोचना में समय लगाए। तभी आगरा कोरोना से जीत पाएगा उसे हराया व भगाया जा सकेगा। भावभीनी श्रद्धांजलि शत-शत नमन्

(लेखक नेशनल चैम्बर के पूर्व अध्यक्ष और सामाजिक संस्था लोक स्वर के अध्यक्ष हैं)

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‘किसी की FB वॉल उसके ही मृत्यु संदेशों से पट जाए, यह तो तुम्हारी कहानियों में संभव था शशि’

अमर उजाला बरेली के सिटी संस्करण में उन दिनों लगातार नए चेहरे आते रहते थे। बहुत से लोग ट्रेनिंग के लिए कुमाऊं ब्यूरो से बुलाए जाते थे। उनकी अच्छी तरह से घिसाई हो, इसके लिए

Last Modified:
Friday, 08 May, 2020
srinet

दिनेश श्रीनेत, वरिष्ठ पत्रकार

अमर उजाला बरेली के सिटी संस्करण में उन दिनों लगातार नए चेहरे आते रहते थे। बहुत से लोग ट्रेनिंग के लिए कुमाऊं ब्यूरो से बुलाए जाते थे। उनकी अच्छी तरह से घिसाई हो, इसके लिए सिटी संस्करण में भेज दिया जाता था। सिटी में काम करना सबसे कठिन और चुनौतीपूर्ण था। करीब 12 से 14 घंटों की ड्यूटी, एक-एक मिनट की डेडलाइन को फॉलो करना, हमेशा सांस अटकी रहना कि कौन सी खबर छूट जाए या फोटो कैप्शन में कोई चूक हो जाए। हर रोज के अखबार और छूटी खबरों पर अगले दिन गहन समीक्षा होती थी।

वीरेन डंगवाल उन दिनों अखबार के सलाहकार संपादक थे और इस तानाशाही भरे माहौल में एक उदारवादी चेहरा भी। साहित्य में दिलचस्पी रखने वालों के प्रति उनके मन में खास अनुराग रहता था। वे चापलूसी और दिखावा करने वालों को ताड़ लेते थे और उनका सार्वजनिक रूप से मजाक भी बना देते थे। वे किसे पसंद करते हैं और किसे नहीं यह हमें बहुत बाद में पता लगता था। तो पहाड़ी ब्यूरो से आने वाले नवोदितों के बीच कुछ कवि ह्रदय और वाम आंदोलन से जुड़े युवा भी हमारी टीम का हिस्सा बन जाते थे। एक दिन छोटे कद का बेहद दुबला-पतला शख्स न्यूजरूम में दिखा। पता चला कि उनका नाम शशिभूषण द्विवेदी है और वे यहां डेस्क पर सहयोग करेंगे।

धीरे-धीरे हमें रोजमर्रा के कामकाज के अलावा शशि की साहित्यिक दिलचस्पियां भी पता चलने लगीं। उन्हीं दिनों डंगवाल जी की पहल से एक साहित्यिक सप्लीमेंट शुरू हुआ था। उसका नाम 'आखर' था। मैं उस सप्लीमेंट का प्रभारी था और शशि को मेरा सहयोगी बनाया गया था। नया-नया इंटरनेट आया था। शशीभूषण ने इंटरनेट से कई दिलचस्प साहित्यिक जानकारियां जुटानी शुरू कीं जिसका इस्तेमाल हम 'आखर' में किया करते थे। उन्हीं दिनों इंटरनेट पर एक साहित्यिक पत्रिका निकली थी जिसके संपादक राजेश रंजन थे। जो इन दिनों ऐपल कंपनी में भारतीय भाषाओं के प्रभारी हैं। वहां से हमने राजेंद्र यादव की बेटी के संस्मरण साभार लिए थे। शशि ने मेरे लिए इंटरनेट में एक छोटी सी खिड़की हिंदी साहित्य के लिए भी खोल दी, जो बाद में मेरे बहुत काम आई।

मैंने उन्हीं दिनों शशिभूषण की कहानियां भी पढ़ीं जो मुझे पसंद भी आईं। शशि डेस्क पर थे इसलिए दोपहर में वे घर पर ही रहते थे। बरेली का एक इलाका था, सुभाष नगर जो शहर के दूसरे इलाकों के मुकाबले कुख्यात और सस्ता था। ज्यादातर नए पत्रकार उसी इलाके में रहा करते थे। शशि ने भी वहीं पर एक कमरा ले रखा था। मैं रिपोर्टिंग में था तो अक्सर दोपहर में जब कभी पास में बेसिक शिक्षा विभाग के दफ्तर रिपोर्टिंग करने निकलता तो फुरसत मिलने पर शशि से मिलने चला जाता था। शशिभूषण तब बैचलर थे और उन्होंने बहुत छोटी सी गृहस्थी बसा रखी थी।

एक अंधेरे से आंगन से ऊपर को सीढ़ियां जाती थीं। आंगन के ऊपर लगी लोहे की ग्रिल को पार करके मैं उनके कमरे में पहुंचता था। हमारी बातचीत का विषय पहले पढ़ी गई किताबें, नई साहित्यिक पत्रिकाएं और साहित्यकारों से जुड़े किस्से होते थे। शशि के पास साहित्यिक बिरादरी से जुड़ी ढेरों सूचनाएं होती थीं। बाद में कभी-कभी मैं और राजेश शर्मा मजाक में कहते थे कि अगर साहित्य के पाठकों के लिए कोई स्टारडस्ट जैसी पत्रिका निकले तो शशिभूषण से बेहतर संपादक कोई नहीं हो सकता। शशि मेरे लिए चाय बनाते थे और हम तीन-चार घंटों तक गपशप करते रहते थे। उनके कमरे की एक खिड़की सुभाष नगर के नाले से लगे विशाल मैदान की तरफ खुलती थी। जब सूरज ढलने लगता तब मैं दफ्तर के लिए रवाना हो जाता। कभी अकेले कभी उनको भी साथ ले लेता था।

शशि अपनी कहानियों पर बहुत मेहनत करते थे। उस समय तक उनका एक संग्रह आ चुका था। यह ज्ञानपीठ से आया था, 'ब्रह्महत्या और अन्य कहानियां'। शशि को अपनी कहानियों मे ऐतिहासिक प्रतीकों के इस्तेमाल का शगल था। वे अक्सर इस बारे में बात भी करते थे। इतिहास से संबंधित अपनी जानकारियों और अध्ययन का इस्तेमाल वे अपने कथानक में करते थे। मुझे उनकी एक कहानी बहुत पसंद थी, जो एक मुसलिम अविवाहित महिला शिक्षिका के बारे में थी। इस कहानी के अलावा उस समय तक प्रकाशित ज्यादातर कहानियों में वे जटिल संरचना वाली कहानियां बुनना पसंद करते थे। मेरी उनसे इस पर बहस होती थी।

मैं कहता था कि उनकी कहानियों का कथ्य अत्यधिक प्रयोगधर्मिता के बोझ से दब जाता है। इसके बावजूद उनकी कहानियां किसी चमत्कार के मानिंद हैं। पात्रों और स्थितियों के प्रति विडंबनात्मक उपहास के भाव में उनकी लेखनी का कौशल झलकता था। उनकी कहानियों मे ऐतिहासिक गाथा या मिथ वर्तमान के नैतिक प्रश्नों के साथ गुत्थमगुत्था हो जाती थी। इसे वे किस्सागोई की शैली में पिरोते थे और बीच-बीच में अपने पाठक से संवाद करते हुए ब्रेख्त की शैली में उसे 'एलिनिएट' भी करते चलते थे। कहानी किसी रोलर-कोस्टर की तरह अतीत से वर्तमान, किस्से से यथार्थ, करुणा से परिहास और हकीकत से फैंटेसी के बीच पाठकों को झुलाती रहती थी।

जब आप उनकी कहानियों को पढ़ते हैं तो वह छोटे कद का चमकती आंखों वाला दुबला-पतला सा शख्स कुछ और ही लगने लगता था। शशिभूषण का ईमानदार मूल्यांकन नहीं हुआ है। शायद इसकी एक वजह यह भी है कि वे बहुतों को नाराज कर देते थे। शराब पीने और बहक जाने के बहुत से किस्से मैंने दूसरों से सुने हैं मगर मैं किसी ऐसी घटना का गवाह नहीं रहा हूं। शशि का तबादला अमर उजाला के नोएडा ऑफिस हो गया। वे वहां गहरे तनाव और फ्रस्ट्रेशन से गुजरे। बाद में वहां के माहौल पर एक अद्भुत कहानी लिखी थी जो अखबारवालों के बीच खूब सर्कुलेट हुई। कादंबिनी पत्रिका जॉइन करने के बाद मैं उनसे दो-तीन बार मिला हूं। मगर उन मुलाकातों में वो शशिभूषण नहीं मिला जिससे मैं अपने न्यूजरूम या सुभाषनगर की गलियों में मिला था।

अभी पिछले बुकफेयर में वे बहुत धज के साथ किसी प्रकाशक के स्टॉल पर आयोजित परिचर्चा में मिले थे। जाने क्यों मुझे हमेशा लगता था कि वो शशि कभी न कभी जरूर मिलेगा और खुलेगा। वह संकोच भरी मुस्कान और परिहास उड़ाती सिकुड़ी आंखों वाला शशि कभी दिल्ली में ओढ़े गए आवरण से निकलकर बाहर आ ही जाएगा। मगर आज जो हुआ वह किस कदर अप्रत्याशित और एबरप्ट था। ठीक उनकी कहानियों की तरह। किसी ने उन्हें टैग कर रखा था, सिर्फ यह लिखकर कि "कह दो कि यह झूठ है!" मैंने क्लिक किया और उनकी वॉल पर चला गया जो श्रद्धांजलि संदेशो से भरी थी।

"किसी की खुद की वॉल उसके ही मृत्यु संदेशों से पट जाए। शशि यह तो तुम्हारी कहानियों में संभव हो सकता था... मैं स्तब्ध हूं और मन बोझिल है। कुछ अधूरा छूट गया था तुम्हारे साथ जिसकी टीस हमेशा रहेगी।"

(साभार: फेसबुक वाल से)

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प्रो. संजय द्विवेदी ने बताया, हिंदी पत्रकारिता पर लग रहे हैं किस तरह के आरोप

भारतीय मीडिया का यह सबसे त्रासद समय है। छीजते भरोसे के बीच उम्मीद की लौ फिर भी टिमटिमा रही है। उम्मीद है कि भारतीय मीडिया आजादी के आंदोलन में छिपी अपनी गर्भनाल से एक बार फिर वह रिश्ता जोड़ेगा

Last Modified:
Friday, 01 May, 2020
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प्रो. संजय द्विवेदी,

कुलसचिव, माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय ।।

भारतीय मीडिया का यह सबसे त्रासद समय है। छीजते भरोसे के बीच उम्मीद की लौ फिर भी टिमटिमा रही है। उम्मीद है कि भारतीय मीडिया आजादी के आंदोलन में छिपी अपनी गर्भनाल से एक बार फिर वह रिश्ता जोड़ेगा और उन आवाजों का उत्तर बनेगा जो उसे कभी पेस्टीट्यूट, कभी पेड न्यूज तो कभी गोदी मीडिया के नाम पर लांछित करती हैं। जिनकी समाज में कोई क्रेडिट नहीं वह आज मीडिया का हिसाब मांग रहे हैं। आकंठ भ्रष्टाचार में डूबे लोग, वाणी और कृति से अविश्वास के प्रतीक भी मीडिया से शुचिता की मांग कर रहे हैं।

देखा जाए तो यह गलत भी नहीं है। मेरे गलत होने से आपको गलत होने की आजादी नहीं मिल जाती। एक पाठक और एक दर्शक के नाते हमें तो श्रेष्ठ ही चाहिए, मिलावट नहीं। वह मिलावट खबरों की हो या विचारों की। लेकिन आज के दौर में ऐसी परिशुद्धता की अपेक्षा क्या उचित है? क्या बदले हुए समय में मिलावट को युगधर्म नहीं मान लेना चाहिए? आखिर मीडिया के सामने रास्ता क्या है? किन उपायों और रास्तों से वह अपनी शुचिता, पवित्रता, विश्वसनीयता और प्रामणिकता को कायम रख सकता है, यह सवाल आज सबको मथ रहा है। जो मीडिया के भीतर हैं उन्हें भी, जो बाहर हैं उन्हें भी।

खबरों में मिलावट का समयः

सबसे बड़ी चुनौती खबरों में मिलावट की है। खबरें परिशुद्धता के साथ कैसे प्रस्तुत हों, कैसे लिखी जाएं, बिना झुकाव, बिना आग्रह कैसे वे सत्य को अपने पाठकों तक संप्रेषित करें। क्या विचारधारा रखते हुए एक पत्रकार इस तरह की साफ-सुथरी खबरें लिख सकता है? ऐसे सवाल हमारे सामने हैं। इसके उत्तर भी साफ हैं, जी हां हो सकता है। हमारे समय के महत्त्वपूर्ण पत्रकार और संपादक श्री प्रभाष जोशी हमें बताकर गए हैं। वे कहते थे “पत्रकार की पॉलिटकल लाइन तो हो किंतु उसकी पार्टी लाइन नहीं होनी चाहिए।”

प्रभाष जी का मंत्र सबसे प्रभावकारी है, अचूक है। सवाल यह भी है कि एक विचारवान पत्रकार और संपादक विचार निरपेक्ष कैसे हो सकता है? संभव हो उसके पास विचारधारा हो, मूल्य हों और गहरी सैंद्धांतिकता का उसके जीवन और मन पर असर हो। ऐसे में खबरें लिखता हुआ वह अपने वैचारिक आग्रहों से कैसे बचेगा? अगर नहीं बचेगा तो मीडिया की विश्वसनीयता और प्रामाणिकता का क्या होगा? उत्पादन के कारखानों में ‘क्वॉलिटी कंट्रोल’ के विभाग होते हैं। मीडिया में यह काम संपादक और रिर्पोटर के अलावा कौन करेगा? तथ्य और सत्य का संघर्ष भी यहां सामने आता है। कई बार तथ्य गढ़ने की सुविधा होती है और सत्य किनारे पड़ा रह जाता है।

पत्रकार ऐसा करते हुए खबरों में मिलावट कर सकता है। वह सुविधा से तथ्यों को चुन सकता है, सुविधा से परोस सकता है। इन सबके बीच भी खबरों को प्रस्तुत करने के आधार बताए गए हैं, वे अकादमिक भी हैं और सैद्धांतिक भी। हम खबर देते हुए न्यायपूर्ण हो सकते हैं। ईमान की बात कर सकते हैं। परीक्षण की अनेक कसौटियां हैं। उस पर कसकर खबरें की जाती रही हैं और की जाती रहेंगी। विचारधारा के साथ गहरी लोकतांत्रिकता भी जरुरी है जिसमें आप असहमति और अकेली आवाजों को भी जगह देते हैं, उनका स्वागत करते हैं। एजेंडा पत्रकारिता के समय में यह कठिन जरूर लगता है पर मुश्किल नहीं।

बौद्धिक विमर्शों से टूटता रिश्ताः

हिंदी पत्रकारिता पर आरोप लग रहे हैं कि वह अपने समय के सवालों से कट रही है। उन पर बौद्धिक विमर्श छेड़ना तो दूर, वह उन मुद्दों की वास्तविक तस्वीर सूचनात्मक ढंग से भी रखने में विफल पा रही है तो यह सवाल भी उठने लगा है कि आखिर ऐसा क्यों है। 1990 के बाद के उदारीकरण के सालों में अखबारों का सुदर्शन कलेवर, उनकी शानदार प्रिटिंग और प्रस्तुति सारा कुछ बदला है। वे अब पढ़े जाने के साथ-साथ देखे जाने लायक भी बने हैं। किंतु क्या कारण है उनकी पठनीयता बहुत प्रभावित हो रही है। वे अब पढ़े जाने के बजाए पलटे ज्यादा जा रहे हैं। पाठक एक स्टेट्स सिंबल के चलते घरों में अखबार तो बुलाने लगा है, किंतु वह इन अखबारों पर वक्त नहीं दे रहा है। क्या कारण है कि ज्वलंत सवालों पर बौद्धिकता और विमर्शों का सारा काम अब अंग्रेजी अखबारों के भरोसे छोड़ दिया गया है? हिंदी अखबारों में अंग्रेजी के जो लेखक अनूदित होकर छप रहे हैं वह भी सेलिब्रेटीज ज्यादा हैं, बौद्धिक दुनिया के लोग कम। हिंदी की इतनी बड़ी दुनिया के पास आज भी ‘द हिन्दू’ या ‘इंडियन एक्सप्रेस’ जैसा एक भी अखबार क्यों नहीं है, यह बात चिंता में डालने वाली है। कम पाठक, सीमित स्वीकार्यता के बजाए अंग्रेजी के अखबारों में हमारी कलाओं, किताबों, फिल्मों और शेष दुनिया की हलचलों पर बात करने का वक्त है तो हिंदी के अखबार इनसे मुंह क्यों चुरा रहे हैं।

हिंदी के एक बड़े लेखक अशोक वाजपेयी कह रहे हैं कि, “पत्रकारिता में विचार अक्षमता बढ़ती जा रही है, जबकि उसमें यह स्वाभाविक रूप से होना चाहिए। हिंदी में यह क्षरण हर स्तर पर देखा जा सकता है। हिंदी के अधिकांश अखबार और समाचार-पत्रिकाओं का भाषा बोध बहुत शिथिल और गैरजिम्मेदार हो चुका है। जो माध्यम अपनी भाषा की प्रामणिकता आदि के प्रति सजग नहीं हैं, उनमें गहरा विचार भी संभव नहीं है। हमारी अधिकांश पत्रकारिता, जिसकी व्याप्ति अभूतपूर्व हो चली है, यह बात भूल ही गयी है कि बिना साफ-सुथरी भाषा के साफ-सुथरा चिंतन भी संभव नहीं है।” (जनसत्ता,26 अप्रैल,2015)

श्री वाजपेयी का चिंताएं हिंदी समाज की साझा चिंताएं हैं। हिंदी के पाठकों, लेखकों, संपादकों और समाचारपत्र संचालकों को मिलकर अपनी भाषा और उसकी पत्रकारिता के सामने आ रहे संकटों पर बात करनी ही चाहिए। यह देखना रोचक है कि हिंदी की पत्रकारिता के सामने आर्थिक संकट उस तरह से नहीं हैं जैसा कि भाषायी या बौद्धिक संकट। हमारे समाचारपत्र अगर समाज में चल रही हलचलों, आंदोलनों और झंझावातों की अभिव्यक्ति करने में विफल हैं और वे बौद्धिक दुनिया में चल रहे विमर्शों का छींटा भी अपने पाठकों पर नहीं पड़ने दे रहे हैं तो हमें सोचना होगा कि आखिर हमारी एक बड़ी जिम्मेदारी अपने पाठकों का रूचि परिष्कार भी रही है। साथ ही हमारा काम अपने पाठक का उसकी भाषा और समाज के साथ एक रिश्ता बनाना भी है।

सूचना और मनोरंजन से आगे बढ़ना होगाः

आखिर हमारे हिंदी अखबारों के पाठक को क्यों नहीं पता होना चाहिए कि उसके आसपास के परिवेश में क्या घट रहा है। हमारे पाठक के पास चीजों के होने और घटने की प्रक्रिया के सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक पहलुओं पर विश्लेषण क्यों नहीं होने चाहिए? क्यों वह गंभीर विमर्शों के लिए अंग्रेजी या अन्य भाषाओं पर निर्भर हो? हिंदी क्या सिर्फ सूचना और मनोरंजन की भाषा बनकर रह जाएगी?  अपने बौद्धिक विश्लेषणों, सार्थक विमर्शों के आधार पर नहीं, सिर्फ चमकदार कागज पर शानदार प्रस्तुति के कारण ही कोई पत्रकारिता लोकस्वीकृति पा सकती है? आज का पाठक समझदार, जागरूक और विविध दूसरे माध्यमों से सूचना और विश्वेषण पाने की क्षमता से लैस है। ऐसे में हिंदी के अखबारों को यह सोचना होगा कि वे कब तक अपनी छाप-छपाई और प्रस्तुति के आधार पर लोगों की जरूरत बने रहेंगें।

गहरी सांस्कृतिक निरक्षरता से मुक्ति जरूरीः

पठनीयता का संकट, सोशल मीडिया का बढ़ता असर, मीडिया के कंटेट में तेजी से आ रहे बदलाव, निजी नैतिकता और व्यावसायिक नैतिकता के सवाल, मोबाइल संस्कृति से उपजी चुनौतियों के बीच मूल्यों की बहस को देखा जाना चाहिए। इस समूचे परिवेश में आदर्श, मूल्य और सिद्धांतों की बातचीत भी बेमानी लगने लगी है।  बावजूद इसके एक सुंदर दुनिया का सपना, एक बेहतर दुनिया का सपना देखने वाले लोग हमेशा एक स्वस्थ और सरोकारी मीडिया की बहस के साथ खड़े रहेंगे। संवेदना, मानवीयता और प्रकृति का साथ ही किसी भी संवाद माध्यम को सार्थक बनाता है। संवेदना और सरोकार समाज जीवन के हर क्षेत्र में आवश्यक है, तो मीडिया उससे अछूता कैसे रह सकता है। सही मायने में यह समय गहरी सांस्कृतिक निरक्षता और संवेदनहीनता का समय है। इसमें सबके बीच मीडिया भी गहरे असमंजस में है। लोक के साथ साहचर्य और समाज में कम होते संवाद ने उसे भ्रमित किया है। चमकती स्क्रीनों, रंगीन अखबारों और स्मार्ट हो चुके मोबाइल उसके मानस और कृतित्व को बदलने में अहम भूमिका निभा रहे हैं। ऐसे में मूल्यों की बात कई बार नक्कारखाने में तूती की तरह लगती है। किंतु जब मीडिया के विमर्शकार, संचालक यह सोचने बैठेंगे कि मीडिया किसके लिए और क्यों- तब उन्हें इसी समाज के पास आना होगा। रूचि परिष्कार, मत निर्माण की अपनी भूमिका को पुनर्परिभाषित करना होगा। तभी मीडिया की सार्थकता है और तभी उसका मूल्य है । लाख मीडिया क्रांति के बाद भी ‘भरोसा’ वह शब्द है जो आसानी से अर्जित नहीं होता। लाखों का प्रसार आपके प्राणवान और सच के साथ होने की गारंटी नहीं है। ‘विचारों के अनुकूलन’ के समय में भी लोग सच को पकड़ लेते हैं। मीडिया का काम सूचनाओं का सत्यान्वेषण ही है, वरना वे सिर्फ सूचनाएं होंगी- खबर या समाचार नहीं बन पाएंगी।

इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के नाते बढ़ा संकटः

एक समय में प्रिंट मीडिया ही सूचनाओं का वाहक था, वही विचारों की जगह भी था। 1990 के बाद टीवी घर-घर पहुंचा और उदारीकरण के बाद निजी चैनलों की बाढ़ आ गयी। इसमें तमाम न्यूज चैनल भी आए। जल्दी सूचना देने की होड़ और टीआरपी की जंग ने माहौल को गंदला दिया। इसके बाद शुरू हुई टीवी बहसों ने तो हद ही कर दी। टीवी पर भाषा की भ्रष्टता, विवादों को बढ़ाने और अंतहीन बहसों की एक ऐसी दुनिया बनी जिसने टीवी स्क्रीन को चीख-चिल्लाहटों और शोरगुल से भर दिया। इसने हमारे एंकर्स, पत्रकारों और विशेषज्ञों को भी जगहंसाई का पात्र बना दिया। उनकी अनावश्यक पक्षधरता भी लोगों से सामने उजागर हुयी। ऐसे में भरोसा टूटना ही था। इसमें पाठक और दर्शक भी बंट गए। हालात यह हैं कि दलों के हिसाब से विशेषज्ञ हैं जो दलों के चैनल भी हैं। पक्षधरता का ऐसा नग्न तांडव कभी देखा नहीं गया। आज हालात यह हैं कि टीवी म्यूट (शांत) रखकर भी अनेक विशेषज्ञों के बारे में यह बताया जा सकता है कि वे क्या बोल रहे होंगे।

इस समय का संकट यह है कि पत्रकार या विशेषज्ञ तथ्यपरक विश्लेषण नहीं कर रहे हैं, बल्कि वे अपनी पक्षधरता को पूरी नग्नता के साथ व्यक्त करने में लगे हैं। ऐसे में सत्य और तथ्य सहमे खड़े रह जाते हैं। दर्शक अवाक रह जाता है कि आखिर क्या हो रहा है। कहने में संकोच नहीं है कि अनेक पत्रकार, संपादक और विषय विशेषज्ञ दल विशेष के प्रवक्ताओं को मात देते हुए दिखते हैं। ऐसे में इस पूरी बौद्धिक जमात को वही आदर मिलेगा जो आप किसी दल के प्रवक्ता को देते हैं। मीडिया की विश्वसनीयता को नष्ट करने में टीवी मीडिया के इस ऐतिहासिक योगदान को रेखांकित जरूर किया जाएगा। यह साधारण नहीं है कि टीवी के नामी एंकर भी अब टीवी न देखने की सलाहें दे  रहे हैं। ऐसे में यह टीवी मीडिया कहां ले जाएगा कहना कठिन है।

सत्यान्वेषण से ही सार्थकताः

कोई भी मीडिया सत्यान्वेषण की अपनी भूख से ही सार्थक बनता है, लोक में आदर का पात्र बनता है। हमें अपने मीडिया को मूल्यों, सिद्धांतों और आदर्शों के साथ खड़ा करना होगा। यह शब्द आज की दुनिया में बोझ भले लगते हों पर किसी भी संवाद माध्यम को सार्थकता देने वाले शब्द यही हैं। सच की खोज कठिन है पर रुकी नहीं है। सच से साथ खड़े रहना कभी आसान नहीं था। हर समय अपने नायक खोज ही लेता है। इस कठिन समय में भी कुछ चमकते चेहरे हमें इसलिए दिखते हैं क्योंकि वे मूल्यों के साथ, आदर्शों की दिखाई राह पर अपने सिद्धांतों के साथ डटे हैं। समय ऐसे ही नायकों को इतिहास में दर्ज करता है और उन्हें ही मान देता है। हर समय अपने साथ कुछ चुनौतियां लेकर सामने आता है, उन सवालों से जूझकर ही नायक अपनी मौजूदगी दर्ज कराते हैं।

नए समय ने अनेक संकट खड़े किए हैं तो अपार अवसर भी दिए भी हैं। भरोसे का बचाना जरुरी है, क्योंकि यही हमारी ताकत है। भरोसे का नाम ही पत्रकारिता है, सभी तंत्रों से निराश लोग अगर आज भी मीडिया की तरफ आस से देख रहे हैं तो तय मानिए मीडिया और लोकतंत्र एक दूसरे के पूरक ही हैं। गहरी लोकतांत्रिकता में रचा-बसा समाज ही एक अच्छे मीडिया का भी पात्र होता है। हमें अपने मनों में झांकना होगा कि क्या हमारी सामाजिक, राजनीतिक परिस्थितियां एक बेहतर मीडिया के लिए, एक अच्छे मनुष्य के लिए उपयुक्त हैं? अगर नहीं तो मनुष्य की मुक्ति के अभी कुछ और जतन करने होंगे। लोकतंत्र को वास्तविक लोकतंत्र में बदलने के लिए और काम करना होगा। ऐसी सारी यात्राएं पत्रकारिता, कलाओं, साहित्य और सृजन की दुनिया को ज्यादा लोकतांत्रिक, ज्यादा विचारवान, ज्यादा संवेदनशील और ज्यादा मानवीय बनाएंगी। यह सृजनात्मक दुनिया एक बेहतर दुनिया को जल्दी संभव करेगी।

  

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