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यह कहना गलत है कि राहुल गांधी पूरी तरह विफल हुए हैं: प्रमोद जोशी

राहुल गांधी कांग्रेस के बदलाव का हिस्सा हैं। उन्हें पूरा नेतृत्व संभाले अभी एक साल से कुछ ज्यादा समय ही बीता है

समाचार4मीडिया ब्यूरो 6 years ago

कांग्रेस पार्टी को अब अपनी राजनीति को उसकी तार्किक परिणति तक पहुँचाना चाहिए। राहुल गांधी चाहते हैं कि पार्टी का नेतृत्व लोकतांत्रिक तरीके से तय हो, तो उन्हें लम्बा समय देकर पार्टी की आंतरिक संरचना को बदलना होगा। उसे वे ही बदल सकते हैं। व्यावहारिक सत्य यह है कि पार्टी की कार्यसमिति भी मनोनीत होती है। वे अच्छी तरह जानते हैं कि लोकतांत्रिक संरचना इतनी आसान नहीं है। पर यदि वे इसे बदलने में सफल हुए तो भारतीय राजनीति में उनका अपूर्व योगदान होगा। सच यह भी है कि उनके अध्यक्ष बनने के बाद पार्टी का आत्मविश्वास बढ़ा है। चुनावी सफलताएं भी मिली हैं। इसलिए यह कहना गलत है कि वे पूरी तरह विफल हुए हैं।

राहुल गांधी की जिम्मेदारी बनती है कि वे लोकसभा की बहसों में शामिल हों और राष्ट्रीय राजनीति में सकारात्मक भूमिका निभाएं। राजनीतिक सफलता केवल चुनावों की हार-जीत से तय नहीं होती। देश को नया विचार देने और रास्ते दिखाना राजनेताओं का काम है। उन्हें एक श्रेष्ठ राजपुरुष (स्टेट्समैन) के रूप में सामने आना चाहिए। देश की राजनीति में प्रधानमंत्री की भूमिका है तो विरोधी नेताओं की भी भूमिका है। इस भूमिका को वे किसी नए रूप में परिभाषित क्य़ों नहीं करते?

सही या गलत नेहरू-गांधी परिवार का नेतृत्व अब पार्टी की विचारधारा का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। राहुल गांधी चुनाव जीतकर नहीं आए थे। उन्हें यह पद एक राजनीतिक विरासत के रूप में मिला है, उन्हें इसका निर्वाह करना चाहिए। उनका इस मौके पर पद छोड़ना मैदान छोड़कर भागना माना जाएगा। पार्टी के पास विकल्प तलाशने की कोई व्यवस्था नहीं है। उसकी परम्परा रही है कि नेतृत्व पर जब भी संकट आता है, सब मिलकर उसके समर्थन में आते हैं। नेता को शक्ति-सम्पन्न बनाते हैं।

राहुल गांधी कांग्रेस के बदलाव का हिस्सा हैं। उन्हें पूरा नेतृत्व संभाले अभी एक साल से कुछ ज्यादा समय ही बीता है। देश की राजनीति को समझने और उसके अनुरूप सही रणनीति को अपनाने के लिए इतने साल पर्याप्त नहीं हैं। दूसरे विजय और पराजय अनुभवों का हिस्सा है। राहुल को पद क्यों छोड़ना चाहिए? क्योंकि वे पार्टी को विजय नहीं दिला पाए। इसे एकाउंटेबिलिटी कहा जाता है। पर हरेक पार्टी की अपनी कार्य-संस्कृति होती है। सन 1977 में हारने के बाद इंदिरा गांधी क्या कांग्रेस की नेता नहीं रहीं थीं?

राहुल ही क्यों ममता बनर्जी, अखिलेश यादव, मायावती, तेजस्वी यादव और चंद्रबाबू नायडू क्या नेतृत्व छोड़ देंगे? हमारे राजनीतिक दलों की संरचना वैसी है ही नहीं, जिसमें नेतृत्व परिवर्तन ऑटोमेटिक हो। हार या जीत राजनीति का हिस्सा है। उन्हें अब बैठकर पहले यह देखना चाहिए कि सफलता क्यों नहीं मिली। पर रास्ता खोजना चाहिए। रणदीप सुरजेवाला ने कहा है कि पार्टी इस हार को बड़े अवसर के रूप में ले रही है। बेशक यह चुनौती है। राहुल को जल्द से जल्द अपने काम पर वापस आना चाहिए और पार्टी को नेतृत्व प्रदान करना चाहिए। ऐसा नहीं करेंगे, तो छोटे शहरों और कस्बों के कार्यकर्ता पर उसका विपरीत प्रभाव पड़ेगा।

(वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद जोशी की फेसबुक वॉल से)

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