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कुपोषण से निपटने के लिए इस तरह के बड़े फैसलों की जरूरत

देश मे एक तिहाई से ज्यादा बच्चे अभी भी कुपोषण का शिकार हैं। वंचित तबकों में समस्या काफी गंभीर है

समाचार4मीडिया ब्यूरो 6 years ago

अंजना।।

देश मे पोषण माह चल रहा है। सरकार ने पोषण त्यौहार की जगह पोषण व्यवहार की थीम पर काम शुरू किया है। यानी आदतों में बदलाव पर ध्यान केंद्रित किया जा रहा है। हमारा व्यवहार बदले, आदतें बदलें, खानपान को लेकर हम ज्यादा जागरूक हों, ये जरूरी है। लेकिन गंभीर रूप से कुपोषण की समस्या से निपटने के लिए बचाव के ये कदम कारगर नहीं हो सकते।

व्यवहार परिवर्तन या जागरूकता की अन्य कवायद कुपोषण की समस्या को कम करने में मददगार हो सकती है। पहले से रोकथाम के लिए की गई तैयारी महिलाओं व बच्चों को कुपोषण का शिकार होने से बचा सकती है। दीर्घकालिक रणनीति में ये अच्छा कदम है। लेकिन मौजूदा समस्या को कम करने के लिए बहुआयामी विकल्पों पर एक साथ काम करने की जरूरत है।

दुर्भाग्य से कुपोषण से निपटने के लिए बनाई गई वर्तमान रणनीति ऊंट के मुंह मे जीरा साबित होने वाला कदम है। देश मे एक तिहाई से ज्यादा बच्चे अभी भी कुपोषण का शिकार हैं। वंचित तबकों में समस्या काफी गंभीर है। हम खुश हो सकते हैं कि कुपोषण की समस्या में पिछले एक दशक के दौरान कमी आई है, लेकिन हमारी खुशी स्थाई नहीं हो सकती अगर हम समग्र तस्वीर पर नजर डालें।

हमारे यहां सामान्य कुपोषण से अलग गंभीर रूप से कुपोषण एक महामारी की तरह बड़ी संख्या में महिलाओं और बच्चों का जीवन छीन रहा है। गंभीर और तीव्र कुपोषण ज्यादातर मामले में जानलेवा हो सकता है। इस समस्या से निपटने के लिए हमने अभी तक कोई ठोस कदम नही उठाया है। या जिन उपायों को हम ठोस मानकर आगे लेकर आये हैं, वे इससे निपटने में कारगर नहीं हैं।

हम अभी तक नीति आयोग द्वारा गंभीर रूप से कुपोषण पर समुदाय आधारित कुपोषण प्रबंधन की नीति तय नहीं कर पाए हैं। अंदरूनी उलझनों की वजह से रेडी टू यूज थेरेपेटिक फूड (आरयूटीएफ) को लेकर कई राज्यों का सफल मॉडल भी नहीं अपनाया जा सका। इसके विकल्प पर भी कोई ठोस फैसला अभी तक नहीं हुआ।

‘एकीकृत बाल विकास योजना’ (आईसीडीएस) के तहत कई तरह से पूरक पोषाहार उपलब्ध कराने की योजना चल रही है। टेक होम राशन (THR) के तहत बच्चों (6 महीने से 6 साल) और गर्भवती व स्तनपान कराने वाली माताओं को पूरक पोषाहार दिया जाता है। लेकिन टीएचआर का प्रभाव और पूरक पोषाहार का वितरण प्रभावी कदम के रूप में मान्यता हासिल नही कर पाया।

मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में टीएचआर की जगह कैश ट्रांसफर का पायलट प्रोजेक्ट शुरू करने की बात हुई, लेकिन इसकी राह में भी कांटे नजर आए। नीति आयोग की अगुवाई में कुपोषण से निपटने के लिए बनी राष्ट्रीय परिषद की सिफारिशें तत्कालीन महिला व बाल विकास मंत्री मेनका गांधी को रास नहीं आई। उनकी आपत्ति कम राशि को लेकर और अन्य कई वजहों से थी।

अब महिला व बाल विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने पोषण कार्यक्रम को लेकर नए सिरे से अपनी दिलचस्पी दिखाई है। वे पोषण कार्यक्रमों की लगातार मॉनीटरिंग कर रही हैं। ऐसे में गंभीर रूप से कुपोषण का शिकार लोगों के लिए जल्द समग्र नीति की अपेक्षा की जा रही है। समस्या से निपटने के लिए समुदाय आधारित प्रबंधन और औषधीय खानपान की जरूरत पर सरकार को अपना  रुख स्पष्ट करना होगा।

इस मामले में सभी भागीदार पक्षों की बात सुननी होगी। राज्यों के श्रेष्ठ मॉडल अपनाने होंगे। नौकरशाही जटिलताओं से निकलकर निर्णायक फैसला करना होगा। हमें उन रिपोर्ट पर तत्काल गौर करने की जरूरत है, जिनमें कहा गया है कि भारत में हर साल करीब दस लाख बच्चे कुपोषण की वजह से मर जाते हैं।

स्वस्थ मां ही स्वस्थ बच्चे को जन्म दे सकती है, लेकिन गर्भवती महिलाओं में कुपोषण की समस्या आम है। इंडेक्स में हम अफ्रीकी देशों के मुकाबले खड़े नजर आते हैं। दलित, पिछड़ों,आदिवासी समुदाय में ये समस्या और भी गंभीर है। इसलिए हमें ये मानकर नीतिगत फैसलों और उनके अमल में तेजी करनी चाहिए कि हम कुपोषण के लिहाज से आपात स्थिति का सामना कर रहे हैं।


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