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‘हर हिन्दुस्तानी को बनानी पड़ेगी यह सोच’

किसी ने सोचा नहीं था कि अचानक कोई वायरस आएगा और तेज भागती दुनिया घरों में कैद हो जाएगी।

समाचार4मीडिया ब्यूरो 5 years ago

धर्मेंद्र पैगवार, वरिष्ठ पत्रकार।।

किसी ने सोचा नहीं था कि अचानक कोई वायरस आएगा और तेज भागती दुनिया घरों में कैद हो जाएगी। भारत के लोग लगभग एक महीने से अपने घरों में हैं। स्कूल-कॉलेज से लेकर बाजार-मॉल सब कुछ बंद है। यहां तक कि बस ट्रेन और हवाई जहाज भी। लोग बच्चों समेत अपने घरों में बंद हो गए हैं। एक अदृश्य वायरस ने पूरी मानव जाति को डरा दिया है और उसके अब तक के विकास पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। 

घरों में कैद लोग अधिकांश समय सोशल मीडिया और टीवी पर व्यतीत कर रहे हैं। बड़े शहरों के लोगों ने करीब 28 साल पहले 1992 और उससे पहले 1984 के दंगों में कर्फ्यू के दौरान घरों में अपना वक्त गुजारा था। वह एक अलग दौर था, जब हर घर में टीवी और फोन नहीं होते थे। लेकिन अब अधिकांश घरों में जितने सदस्य हैं, उससे ज्यादा मोबाइल फोन। वायरस कितना खतरनाक है, यह हर पढ़ा-लिखा आदमी जान रहा है।  सरकारी और तमाम संगठन लोगों को समझा रहे हैं। छोटे-छोटे गांव कस्बे का आदमी वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन की गाइडलाइन की बात कर रहा है। इस सबके बावजूद लोगों का सुविधाओं से मोहभंग नहीं हो रहा है। जरा सी ढील मिलते ही आदमी किराने का सामान, दूध और सब्जी के लिए टूट पड़ता है। अपने मतलब का सामान लेने के लिए वह कब सोशल डिस्टेंसिंग भूल जाता है, उसे पता ही नहीं चलता। सब्जी कितने हाथों से होकर गुजरती है और किराने वाले की दुकान पर किस आदमी से वह संपर्क में आ रहा है, वह सब कुछ  अपने मतलब के कारण भूल जाता है। बड़े शहरों में लोग होम डिलीवरी पर पिज्जा बर्गर भी बुला रहे हैं। कई शहरों में रेस्टोरेंट बना हुआ खाना लोगों को उपलब्ध करा रहे हैं।

वक्त के साथ-साथ हमने देखा है कि लोगों की संघर्ष क्षमता कम होती जा रही है। बचत की आदत भी। कभी किसी ने सपने में नहीं सोचा था कि भारत से लेकर अमेरिका जैसे सुपर पावर देश भी थम जाएंगे। कोई ऐसी चीज जो दिखाई भी न दे, वह लोगों की जान की दुश्मन होगी। तेज दौड़ती भागती जिंदगी में लोगों ने लोन लेकर सुविधाएं प्राप्त कर ली हैं। अधिकांश घरों में टीवी, फ्रिज, कूलर, एसी और कम से कम बाइक तो है ही। हमारे बच्चे ब्रेकफास्ट, लंच, डिनर के बाद रात को दूध पीकर सोने के आदी हो गए हैं। ड्राई फ्रूट और फल के अलावा पिज्जा बर्गर भी हमारे बच्चों की जिंदगी का हिस्सा हो गए हैं और होना भी चाहिए। इस प्रगति के बावजूद हमने यदि कुछ खोया है तो वह यह कि बच्चों को संघर्ष के साथ रहना और जीना नहीं सिखाया है जबकि व्यवसायी से लेकर नौकरीपेशा लोगों को भी पिछले 20 सालों में आजीविका के लिए जबरदस्त संघर्ष करना पड रहा है। 

संघर्ष के इस दौर में सुविधाएं पाते हुए हम अपनी पुरानी परंपराएं कब पीछे छोड़ आए, पता ही नहीं चला। घरों में अनाज के भंडार रखे जाते थे। कुछ नहीं तो गेहूं, दाल, चावल तो होते ही थे। साल में एक बार मोहल्लों में घर-घर अचार डालने और पापड़ बड़ी बनाना एक वार्षिक परंपरा थी। होम डिलीवरी, सुपर बाजार और मार्ट के कल्चर ने इन सब परंपराओं को खत्म कर दिया। 

घरों में महिलाएं किटी पार्टी, टीवी सीरियलों और अन्य कामों में बिजी हो गई। बच्चों की जिद पर हर चीज उपलब्ध होने लगी। जब पूरी दुनिया घरों में ‘कैद’ हुई तो भी बच्चे पराठे, पाश्ता, चाऊमीन, नूडल्स, मैगी के साथ पिज्जा बर्गर आइसक्रीम की डिमांड रखने लगे। यह दौर था जब अपने बच्चों को आगे की दुनिया देखते हुए थोड़ा अभाव में रहना और संघर्ष करना सिखा सकते थे या अभी भी उसकी आदत डाल सकते हैं। 

सोशल मीडिया के इस दौर में हमने कई बार सियाचिन में ठंड से जमे हुए अंडे फोड़ते हुए जवानों के विडियो खुद ही वायरल किए हैं। हमने ही राजस्थान के मरुस्थल में 50 डिग्री से ज्यादा तापमान में पहरेदारी कर रहे जवानों की तकलीफ सोशल मीडिया पर न केवल पढ़ी है बल्कि उन जानकारियों को आगे भी बढ़ाया है। बच्चों को अब्राहम लिंकन से लेकर गांधी जी और विनोबा भावे के उदाहरण दिए हैं कि कैसे इन्होंने अभावों में रहकर और खुद की मेहनत पर य स्वाबलंबी बनकर दुनिया में मुकाम पाया है। 

लॉक डाउन के दौरान अधिकांश मध्यमवर्गीय परिवार सुबह से ही दूध और हरी सब्जी के लिए जान हथेली पर रखकर बाहर संघर्ष करते हुए दिखते हैं। जबकि जरूरत है कि इस दौर में बच्चों को बताएं कि काली चाय भी पी जा सकती है य बिना चाय कॉफी के भी रहा जा सकता है। इसी तरह सिर्फ आलू खाकर या अचार से भी रोटी खा कर पेट भरा जा सकता है। यह सब बातें आपका बच्चा सीख कर भविष्य में संघर्ष के लिए तैयार होगा। भविष्य किसी ने नहीं देखा है। कब बच्चों को अभावों में रहना पड़े या संघर्ष के दिन गुजारना पड़े। इसलिए अभी भी वक्त है बच्चों को सुविधा भोगी होने से बचाया जाए और उन्हें मानसिक रूप से तैयार किया जाए कि कैसे कम भोजन खाकर या घर में रखा कुछ भी खाकर समय गुजारा जा सकता है। घरों में सत्तू, राजमा, पोहा, चने, दाल, चावल, मुरमुरे आदि इसलिए रखे भी जाते हैं। हालांकि होम डिलीवरी के इस दौर में कई परिवारों ने इस पुरानी हिन्दुस्तानी परंपरा से नाता तोड़ लिया है। 

इस दौर में एक बात और देखने में आई है कि लोग लॉकडाउन के दौरान घरों में किराने का सामान स्टॉक करने के आदी हो गए हैं। एक दौर था, जब इस देश में संत और नेता लोगों से एक वक्त खाना खाने की अपील करते थे तो लाखों लोग उसका पालन करते थे। अब ऐसा नहीं हो रहा है। मेरे एक मित्र चार्टर्ड अकाउंटेंट अंशुल अग्रवाल भोपाल की कोलार रोड पर d-mart के पास में रहते हैं। मैंने उनसे किराने के सामान पर चर्चा की। उनका तर्क था कि सिर्फ जरूरत का सामान ही वे लाते है। अभी देश के पास सीमित संसाधन हैं, यदि हम लोग ही बहुत अधिक सामान घरों में स्टॉक करके रख लेंगे तो जरूरतमंद को कैसे सामान मिलेगा। यह सोच हर हिन्दुस्तानी को बनानी पड़ेगी। साथ ही बच्चों को बताना पड़ेगा कि कैसे वह भविष्य में आने वाले संघर्ष के दिनों से निपट सकेगा, इसके लिए उसे इस दौर में कुछ अच्छी आदतें सिखाइए। संघर्ष करने की उसकी क्षमता को बढ़ाइए, क्योंकि भगवान न करें कि भविष्य में उन्हें इस तरह के दिन फिर कभी देखने पड़े और यदि ऐसा दौर आए तो वह उसका डटकर मुकाबला कर सकें।

(यह लेखक के निजी विचार हैं)


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