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पत्रकार हैं तो बस ख़बरों के लिए समय निकालिए या फ्रांस चलने के बारे में सोचिये

पत्रकारों को दिन में भी उतना ही मुस्तैद रहना पड़ता है, जितना रात में

समाचार4मीडिया ब्यूरो 6 years ago

नीरज नैयर, वरिष्ठ पत्रकार।।

अगर आप पत्रकार हैं तो आपकी सोशल और फैमिली लाइफ कैसी चल रही है, यह पूछने का कोई मतलब ही नहीं बनता। क्यों? क्योंकि पत्रकारिता न तो नौ से पांच बजे वाली नौकरी है और न ही इसमें वीक ऑफ की कोई गारंटी होती है। इतना ही नहीं, आप ऑफिस कब आएंगे, ये तय होता है, लेकिन जाने का कोई ठिकाना नहीं।

लिहाजा ऐसे में यदि कुछ बचता है, तो वो है बस प्रोफेशनल लाइफ। शायद यही वजह है कि पत्रकारों को उनके परिजन ‘उल्लू’ कहते हैं, वो इसलिए कि जब दुनिया चादर तानकर सोती है, हम ख़बरों में सिर खपा रहे होते हैं। फिर भी मुझे लगता है कि हमारी बिरादरी के लिए ‘उल्लू’ नहीं, कोई नया शब्द ईजाद होना चाहिए। क्योंकि हमें दिन में भी उतना ही मुस्तैद रहना पड़ता है, जितना रात में। शुरुआत में सबकुछ बहुत सुहाना लगता है, फिर बीच में एक वक़्त आता है, जब इस ‘रतजगे’ और ‘कटाव’ से झुंझलाहट होने लगती है, लेकिन फिर इसकी आदत पड़ जाती है। यकीन न हो तो पत्रकारिता त्यागकर कहीं और धूनी ज़माने वालों से पूछ लीजिये, आज भी उनकी आँखों में आम आदमी वाली नींद नहीं आती होगी।

दुनिया कहती है ‘शराब में नशा है’, वो बिल्कुल सही कहती है, लेकिन पत्रकारिता भी उससे कम नहीं है। एक बार जिसने इसका रसपान कर लिया या कहें कि अपना सबकुछ इसके नाम कर दिया, वो लाख पीछा छुड़ाना चाहे, सफल नहीं हो पता। संभव है कि वो अपना प्रोफेशन बदल ले, आजकल बड़ी संख्या में पत्रकार ऐसा कर भी रहे हैं, मगर ‘ख़बरों का ये नशा’ उनके अंदर के पत्रकार को मरने नहीं देता। मैं ऐसे कई लोगों को जानता हूं, जो अब पेशे से पत्रकार नहीं हैं, पर समय-समय पर पत्रकारिता के नमूने पेश करते रहते हैं।

एक पत्रकार के लिए समय सबसे कीमती है, क्योंकि सबकुछ समय के हिसाब से होता है, सिवाय परिवार के साथ समय बिताने को छोड़कर। यानी ताउम्र समय का पाबंद रहने वाला पत्रकार अपनों के लिए ही वक़्त नहीं निकाल पाता। उसे यह पता ही नहीं होता कि सूरज ढलने और रात के परवान चढ़ने के बीच कितना कुछ हो जाता है। सच कहूँ तो मुझे भी नहीं पता था। पुणे में जब मैं लोकमत के साथ था, तो सुबह 12 बजे घर से निकलना और रात दो-ढाई बजे वापस पहुंचना, यही रूटीन था। यानी शाम की खुमारी क्या होती है, इसका अहसास ही नहीं था। इस खुमारी के अलावा और भी बहुत कुछ था, जो अपनी आँखों से छिपा हुआ था।

एक दिन शाम 6 बजे छुट्टी मिलने का सौभाग्य मिला, सौभाग्य इसलिए कि वह ‘ऑफ’ के लिए संकट काल था। अधिकांश संस्थानों में पत्रकारों पर इस संकट का साया रहता है। बाइक लेकर जब सड़क पर निकला तो पता चला कि शाम वास्तव में सुहानी होती है। कुछ आगे बढ़ने पर देखा कि सभी वाहन रुके हुए हैं, समझ नहीं आया कि यहाँ क्या हुआ है। मैं तो हमेशा फर्राटा भरता हुआ जाता हूं, कभी ऐसा नहीं हुआ। अब देखिये, दिमाग को भी अँधेरे की इतनी आदत हो जाती है कि उसे दिन-रात के ट्रैफिक का अंतर भी समझ नहीं आता। ख़ैर, कुछ देर बाद सब आगे बढ़े तो पूरा माजरा समझ आया और अपने आप ही चेहरे पर मुस्कान आ गई, ये खुश होने वाली मुस्कान नहीं, बल्कि अपनी बेवकूफी...नहीं-नहीं..बेचारगी कहना ज्यादा बेहतर होगा...पर हंसने वाली मुस्कान थी। दरअसल, वहां ट्रैफिक लाइट थी और सभी उसके ग्रीन होने के इंतजार में रुके थे। पुणे में ट्रैफिक इस कदर होता है कि एक बार में आप तभी निकल सकते हैं, जब आप सबसे आगे हों। रात के दो बजे कहाँ कोई ट्रैफिक लाइट जलती है, इसलिए कभी पता ही नहीं चला, जब चला तो मुस्कुराना तो बनता था।

कभी-कभी लगता है कि फ्रांस चला जाऊं, वहां कर्मचारियों को भी इंसान की श्रेणी में रखा जाता है, फिर यह सोचकर रुक जाता हूं कि पासपोर्ट एक्सपायर हो गया है (बिना किसी ठप्पे के), उसे रिन्यू तो करवा लूँ। ख़ैर, ये तो खालिस मजाक है। अपना देश ही सबसे बेहतर है, लेकिन कर्मचारियों खासकर पत्रकारों के दोहन...(शोषण कहना भी ज्यादा बुरा नहीं होगा) को रोकने के लिए अभी काफी कुछ किये जाने की ज़रूरत है। फ्रांस में कुछ वक़्त पहले ‘राइट टू डिस्कनेक्ट’ कानून अस्तित्व में आया था। इसके तहत कामकाजी घंटों के बाद कंपनियां अपने कर्मचारियों को काम के नाम पर परेशान नहीं कर सकतीं, इसमें फ़ोन कॉल या ईमेल भी शामिल हैं। यानी छुट्टी मतलब छुट्टी। वैसे, अपने देश में भी सांसद सुप्रिया सुले ने ऐसा बिल संसद में रखा है, लेकिन उसके भविष्य पर वैसा ही संकट मंडरा रहा है जैसा पत्रकारों के ‘ऑफ’ पर मंडराता है। क्यों? क्योंकि अपने देश में इस तरह की पहल पर समर्थन आसान कहाँ है?

मान भी लीजिये कि यदि ऐसा कुछ हो गया तो क्या पत्रकारों को उस श्रेणी में रखा जायेगा? जनाब, जो मीडिया संस्थान ‘मजीठिया’ को पत्रकारों के खिलाफ इस्तेमाल कर सकते हैं, वो क्या नहीं कर सकते ज़रा सोचिये? मुझे याद है कि पहले मजीठिया के नाम से हम लोगों के चेहरे खिल जाया करते थे। लगता था कि चलो ‘कम दाम, ज्यादा काम’ से मुक्ति मिलेगी, लेकिन हुआ क्या? मजीठिया से हमारा भला तो नहीं हुआ, बुरा ज़रूर हो गया। लिहाजा, पत्रकार बने हैं तो सोशल और फैमिली लाइफ के लिए नहीं, ख़बरों के लिए समय निकालिए। ’उल्लू’ कहलाइए या प्रोफेशन छोड़ दीजिये (लेकिन पत्रकारिता का नशा नहीं छूटेगा) या फिर मेरी तरह फ्रांस चलने के बारे में सोचिये...सोचने में क्या जाता है।

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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