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वरिष्ठ पत्रकार आलोक मेहता ने बताया, कैसे संकट की घड़ी में मीडिया की साख पर उठ रहे सवाल

यह बात उन क्रांतिकारी समझने वाले चर्चित टीवी हस्तियों को भी स्वीकारना चाहिए, जो आजकल स्वयं मीडिया पर भरोसा नहीं करने और उन्हें छोड़कर सबको नाकारा साबित करने में लगे हुए हैं।

समाचार4मीडिया ब्यूरो 5 years ago

आलोक मेहता, वरिष्ठ पत्रकार ।।

कोरोना वायरस हो या साम्प्रदायिक उपद्रव, सत्ता की मारामारी हो या अर्थिक घोटाले. मीडिया की साख पर सवाल उठने लगते हैं। कोरोना के विश्व संकट के दौरान भारतीय मीडिया- प्रिंट, टीवी समाचार चैनल, डिजिटल चैनल ने जितनी जिम्मेदारी के साथ जागरूकता लाने तथा महामारी को फैलने से रोकने में क्या महत्वपूर्ण योगदान नहीं दिया है? कुछ अपवाद हो सकते हैं, लेकिन अधिकांश भारतीय मीडिया पश्चिम के मीडिया से अधिक सक्रिय और सहायक रहा है।

यह बात उन क्रांतिकारी समझने वाले चर्चित टीवी हस्तियों को भी स्वीकारना चाहिए, जो आजकल स्वयं मीडिया पर भरोसा नहीं करने और उन्हें छोड़कर सबको नाकारा साबित करने में लगे हुए हैं। सत्ताधारी और प्रतिपक्ष के भी कई नेता प्रवक्ता अपनी कमजोरी-बर्बादी के लिए मीडिया पर ही दोष मढ़ते रहे हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि वायरस संकट के दौर में संपन्न पश्चिमी देशों का मीडिया ही नहीं सरकारें अधिक नाकारा तथा विफल सिद्ध हो रही हैं। ताजा प्रमाण गुरुवार को ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस साहेब का प्रेस वक्तव्य देख सकते हैं, जिसमें 500 से अधिक लोगों के संक्रमित होने के बावजूद वह यह भी सूचित कर गए कि अभी तो शुरुआत है, असली प्रकोप मई महीने तक दिखेगा, तब हम और कदम उठाएंगे। फिलहाल स्कूल भी बंद नहीं करेंगें, क्योंकि बच्चे खेलेंगे या बुजुर्ग दादा दादी नाना नानी के पास रहकर संक्रमित होंगे या उन्हें करेंगे। बस सावधानी के लिए हाथ बार बार धोते रहिये।

आजकल भारत के सन्दर्भ में राजनीतिक या आर्थिक मामलों पर खबरों तथा टिप्पणियों पर बीबीसी, गार्जियन, न्यूयार्क टाइम्स, एसीएनएन, इकोनॉमिस्ट इत्यादि की बड़ी चर्चा हो रही है। निश्चित रूप से वे अपने नजरिये और देश के हितों के लिए काम करते होंगे। फिर भी हमारे महारथियों को यह भी देखना चाहिए कि ब्रिटिश प्रधानमंत्री या अमेरिकी राष्ट्रपति अपने ही मीडिया को अविश्वसनीय बताकर सार्वजानिक रूप से कितना अपमानित करते हैं।

आपातकाल में सेंसर के कारण राजनीतिक खबरों के लिए हमारे लोगों को पश्चिम के मीडिया पर मजबूरी में निर्भर होना स्वाभाविक था, लेकिन आज तो अधिकांश भारतीय मीडिया प्रिंट, टीवी समाचार चैनल  दुनिया के किसी भी देश से अधिक स्वतंत्र, निर्भीक और विशाल है। बाकी कसर कई नामी पत्रकारों, सामाजिक संगठनों के वेब पोर्टल, यू-टूयूब चैनल्स से पूरी हो रही है। प्रदेशों के कई भाषाई अखबार या टीवी पत्रकार समाज, समस्याओं, स्वास्थ्य, आर्थिक विषयों पर श्रेष्ठतम सामग्री दे रहे हैं। फिर पश्चिम के मीडिया के मुहं पर मोहित क्यों हो रहे हैं। संभव है राजनेताओं को विदेश में अपनी छवि बनाने या दूसरे कि बिगाड़ने में रूचि रहती हो, लेकिन समझदार विश्लेषकों को असली तथ्यों की जानकारी रहनी चाहिए। उनका ध्यान हाल के वर्षों में अमेरिका और ब्रिटेन के सरकारी गोपनीय दस्तावेज डि क्लासिफाइड होने से यह तथ्य उजागर हो चुका है कि अमेरिकी गुप्तचर संगठन सीआईए और ब्रिटिश जासूसी संस्था एमआई 6 न्यूयॉर्क टाइम्स, गार्जियन, बीबीसी के पत्रकारों, प्रबंधकों, मालिकों का इस्तेमाल करते रहे हैं।

सबसे अधिक चौकाने वाला तथ्य यह भी सामने आया कि कुछ वर्ष पहले बीबीसी में बड़े पैमाने पर भर्ती की जिम्मेदारी ही जासूसी संगठन एमआई 6 के वरिष्ठ अधिकारियों को दे दी गई थी। अब आप समझ सकते हैं कि क्या उन अधिकारियों ने अपने काम के लिए अनुकूल लोग भी भर्ती नहीं कराए होंगे? इसी तरह जासूसी संगठन से सेवामुक्त होकर पत्रकार बनकर विदेशों में पहुंचने वाले कई जासूसों ने अपने ढंग से रिपोर्टिंग करने के साथ अपनी एजेंसी को भी गोपनीय सूचनाएं भेजने का काम किया है।

सीआईए के ही रिकॉर्ड का दस्तावेज साबित करता है कि संगठन ने 25 वर्षों के दौरान करीब 400 पत्रकारों का उपयोग जासूसी के लिए करवाया। वाटरगेट कांड को उजागर करने वाले एक पत्रकार कार्ल बेरनिस्तन ने स्वयं यह तथ्य लिखा भी था। दूसरी तरफ सीआईए के एक बड़े अधिकारी ने स्वयं वॉशिंगटन पोस्ट के मालिक फिलिप ग्राहम से कहा था कि हमें जासूसी के लिए कॉल गर्ल से कम खर्च पर पत्रकार मिल जाते हैं। सीआईए के दस्तावेज के अनुसार संगठन ने प्रमुख अंतरराष्ट्रीय न्यूज एजेंसियों को नियमित रूप से फंडिंग कर अपने ढंग से पत्रकारों से सूचनाएं लेने, गलत खबरें फैलाकर गड़बड़ियां कराने में कभी संकोच नहीं किया। यहां तक कि मित्र यूरोपीय देशों में भी राजनीतिक उठापटक में पत्रकारों का उपयोग किया गया। वैसे रूस और चीन के जासूसी संगठन भी पत्रकारों के भेस में जासूस भेजते रहे या स्थानीय लोगों को मोहरा बनाकर उपयोग करते रहे। सत्तर के दशक में भारत के दो बड़े संस्थानों के पत्रकारों के सीआईए एजेंट की तरह काम करने की जानकारी भारतीय गुप्तचर संस्था रॉ को मिली, तब उनसे लाल किले के गुप्त तहखाने में लंबी पूछताछ हुई। एक तो कुछ समय बाद अमेरिकी सम्पर्कों के बल पर भारत से निकलकर वहीँ बस गया और एक स्वयं अधिकाधिक जानकारी देकर अपने राजनीतिक-प्रशासनिक संपर्कों से जेल जाने से बच गया।

इस पृष्टभूमि को देखते हुए जम्मू कश्मीर की स्थिति, अनुच्छेद 370 की समाप्ति के कानून एसीएए या भारतीय राजनीति और अर्थव्यवस्था पर पश्चिम के पूर्वाग्रहों वाली सूचनाओं तथा टिप्पणियों को अनावश्यक तरजीह क्यों दी जानी चाहिए?

सवाल यह भी है कि इंदिरा गांधी से लेकर इन्दर गुजराल और मनमोहन सिंह के सत्ता काल में उनके ही दिग्गज नेता विदेशी जासूसी संगठनों के षड्यंत्रों की बात करते थे, लेकिन अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, उनकी सरकार या रक्षा सौदों पर विदेशी दुष्प्रचार को अपना हथियार बनाने में संकोच नहीं करते। कांग्रेस  के ही नेता जयराम रमेश द्वारा कृष्ण मेनन की जीवनी पर आई नई किताब के तथ्यों के साथ सबसे बुजुर्ग राजनियक पूर्व विदेश सचिव महाराज कृष्ण रसगोत्रा ने हाल में एक कार्यक्रम में माना कि साठ के दशक में भी पश्चिम का मीडिया भारत के विरुद्ध झूठा प्रचार करता था। पत्रकार ही नहीं सेनाधिकारियों से लिखवाकर भारत को नुक्सान पहुंचाने की कोशिशें की गई। इसलिए उदार लोकतंत्र में सूचना-समाचार तंत्र के सारे देसी विदेशी दरवाजे खिड़कियां खुली रखते हुए कम से कम स्वदेशी मीडिया पर अधिक भरोसा कर दुष्प्रचार के वायरस से भी लोगों को बचाना चाहिए।


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