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'बिना अखबार वाली सरकार होनी चाहिए या बिना सरकार वाला अखबार'

न्यूजप्रिंट वह कागज होता है, जिसका उपयोग समाचार-पत्रों के प्रकाशन में होता है

समाचार4मीडिया ब्यूरो 6 years ago

आकार पटेल, वरिष्ठ पत्रकार।।

‘यदि मुझ पर यह फैसला छोड़ दिया जाए कि हमारे यहां बिना अखबार वाली सरकार होनी चाहिए या बिना सरकार वाला अखबार, तो मैं बाद वाला विकल्प चुनने में एक पल के लिए भी हिचकिचाहट नहीं दिखाऊंगा’। थॉमस जेफरसन ने यह बात कहकर आगे कहा था, ‘हर आदमी को अखबार मिलने चाहिए और वह उन्हें पढ़ने के काबिल होना चाहिए’। जेफरसन अमेरिका के राष्ट्रपति थे, इसलिए वे सरकार के महत्व के बारे में जरूर जानते होंगे। उसके बाद भी उन्होंने सूचना देने और जवाबदेही ठहराने की अखबार की क्षमता की तुलना में सरकार को दोयम स्थान दिया। क्यों? और हमारे समय में जब हम अखबार की जगह ‘टेलिविजन की खबरों’ या ‘सोशल मीडिया’ तक का विकल्प आजमा सकते हैं तो क्या स्थिति बदली है? नहीं, लेकिन हम इस पर विचार करेंगे कि ऐसा क्यों है।

इस बार के बजट ने खबर दी कि न्यूजप्रिंट यानी अखबार के कागज पर आयात शुल्क 10 फीसदी बढ़ा दिया गया है। इस वृद्धि से सरकार के खजाने में कोई बड़ी राशि नहीं आने वाली। मेरा हिसाब कहता है कि सरकार को इस कस्टम ड्यूटी के जरिये साल में 1000 करोड़ रुपए से भी कम राशि मिलेगी। हमारे बजट का आकार 27.8 लाख करोड़ रुपए का है और यह ड्यूटी उसका 0.03 फीसदी है। फिर इसे एक अत्यंत महत्वपूर्ण सेक्टर पर क्यों लगाया गया है? इस बारे में मेरी अपनी अटकलें हैं और उनका महत्व नहीं है। आइए, इस बात का परीक्षण करें कि इस शुल्क से वास्तव में क्या असर पड़ेगा।

न्यूजप्रिंट वह कागज होता है, जिसका उपयोग समाचार-पत्रों के प्रकाशन में होता है। किसी भी प्रमुख अखबार के लिए यह महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसी आयातित न्यूजप्रिंट में इतनी उच्च गुणवत्ता है कि इसे तेजी से और अच्छी तरह छापा जा सकता है। कागज की कीमत मोटे तौर पर चार शीट के लिए 1 रुपए है। यदि आप जो अखबार पढ़ रहे हैं उसमें 28 पेज हैं तो इसे प्रकाशित करने में 7 रुपए लगेंगे और यहां हम सिर्फ अखबार के कागज की कीमत की बात कर रहे हैं। अखबार के लिए काम करने वाले लोग और अन्य प्रक्रियाएं तो अलग हैं। भारत में दुनिया के सबसे सस्ते अखबार मिलते हैं (जेफरसन होते तो वे भी मानते)।

लंदन के गार्डियन की कीमत 150 रुपए और द न्यूयॉर्क टाइम्स 175 रुपए का है, जबकि ये दोनों अखबार उतना ही कागज इस्तेमाल करते हैं, जितना अन्य भारतीय अखबार। हमारे आसपास निगाह डालें तो श्रीलंका और बांग्लादेश में अखबार के लिए पाठकों से हमारी तुलना में दोगुना शुल्क लिया जाता है, जबकि आमतौर पर वहां के अखबार साइज में इस अखबार के आधे अथवा इससे छोटे साइज के होते हैं। कुछ साल पहले मैं जिस ‘द पाकिस्तान डेली’ के लिए कॉलम लिखता था, वह 40 रुपए प्रतिदिन का है। यह पाकिस्तानी रुपया है, जो आज भारतीय रुपए की तुलना में आधे से भी कम कीमत का है। लेकिन, इसका मतलब है कि लाहौर और कराची में पाठक अखबार के लिए दिल्ली, मुंबई या अन्य भारतीय शहरों की तुलना में चार गुना कीमत चुकाते हैं।

मीडिया में विज्ञापन कई स्रोतों में बंट गया है। यानी खर्च तो वही है पर विज्ञापन के लिए उसे कई अन्य स्रोतों से स्पर्धा करनी पड़ती है। अब इस तरह के कड़ी स्पर्धा के बाजार में कस्टम ड्यूटी में सरकार द्वारा की गई वृद्धि सारे ही अखबारों पर लागत का बोझ बढ़ा देगी। अब इस ड्यूटी का कोई अर्थ नहीं है बशर्ते…मैं कोई अटकलें नहीं लगाने वाला हूं कि ऐसा क्यों किया गया है। यह कॉलम तो किसी दूसरे पहलू के बारे में है। इसलिए आइए, फिर जेफरसन की ओर मुड़ते हैं और देखते हैं कि क्यों समाज के लिए अखबार महत्वपूर्ण हैं। खासतौर पर हमारे दौर में जब मीडिया शब्द का मतलब इतनी सारी चीजों से है।

अखबार के पत्रकारों को दो प्रकार के कार्यों के आधार पर विभाजित किया जा सकता है-संपादक और रिपोर्टर/फोटोग्राफर। बाद वाली श्रेणी को बीट यानी उनके क्षेत्र विशेष में विभाजित किया जा सकता है। मैं आपको एक उदाहरण देता हूं कि बीट रिपोर्टर क्या करता है। मैं आपको चौथाई सदी पीछे ले जाता हूं, जब मैं बीट रिपोर्टर था। मेरी ‘बीट’ थी बॉम्बे सेशन्स कोर्ट। इसमें तब 40 से ज्यादा कोर्ट रूम थे और खबरों के संकलन के लिए मुझे दिन में चार बार हर कोर्ट रूम में जाना पड़ता था। दो बार सुबह और दो बार दोपहर बाद के वक्त में। वकीलों, वादी-प्रतिवादियों, दोषियों, हत्यारों, धोखाधड़ी करने वालों और सेलेब्रिटी लोगों से मिलकर, बात करके मैं देखता था कि मामला किस बारे में है। फिर शाम को दफ्तर लौटता था वे तीन या चार खबरें लिखने के लिए, जो ऊपर बताई सारी कवायद के नतीजे में निकलती थी।

आज देशभर में शायद क्रमश: 5,000 और 7,000 पूर्णकालिक अखबारी रिपोर्टर और फोटोग्राफर काम कर रहे हैं, जो शिक्षा, स्वास्थ्य, अपराध जैसी कई अन्य बीट पर काम करते हैं। उनका काम यह देखना है कि शासन का कामकाज कैसा चल रहा है? टेलीविजन के पत्रकार यह काम नहीं करते, क्योंकि ज्यादातर खबरें वे कवर नहीं कर सकते क्योंकि उनमें विजुअल यानी टीवी पर दिखाने लायक सामग्री नहीं होती। उनकी खबरें प्राय: अखबारों में पहले ही प्रकाशित खबरों का फालोअप यानी बाद में उसमें हुआ घटनाक्रम होती हैं। जब जेफरसन अखबारों का उल्लेख कर रहे थे तो उनका आशय क्या था? मैं आपको यह बता सकता हूं कि उनका आशय क्या नहीं था: उनका आशय इस जैसे कॉलम से नहीं था। हर छटा वाले विचार आसानी से उपलब्ध हैं और वे रहेंगे फिर चाहे 820 शब्दों में हों या 140 कैरेक्टर्स में।

रिपोर्ट ही अखबार को परिभाषित करती है और किसी स्वतंत्र समाज के लिए इनका ही महत्व होता है। आज हमारे लोकतंत्र और अन्य देशों के लोकतंत्रों को यह सेवा केवल अखबार ही देते हैं। किसी बीट पर पूरे समय काम करने वाले रिपोर्टर की रिपोर्ट की जगह सोशल मीडिया नहीं ले सकता। असली पत्रकारिता के लिए अखबारों का होना जरूरी है। और अखबारी कागज पर आयात शुल्क में वृद्धि सीधे शासन की गुणवत्ता को आंकने और अधिकारियों को जवाबदेह ठहराने की हमारे समाज की क्षमता को चोट पहुंचाती है।

(दैनिक भास्कर से साभार)


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