‘अखबारों के बारे में यह फैसला क्या लोकतंत्र का गला घोंटने का संगठित अपराध नहीं है?’

मुझे याद है जब हम लोग पत्रकारिता की शिक्षा ग्रहण कर रहे थे, तब यह पढ़ाया जाता था कि युद्ध और महामारी के दौर में अखबार सरकार और प्रशासन के बड़े सहारे होते हैं

Last Modified:
Friday, 24 April, 2020
Amitabh Shrivastava

अमिताभ श्रीवास्तव, संपादक, लोकमत समाचार, औरंगाबाद।।

मुझे याद है जब हम लोग पत्रकारिता की शिक्षा ग्रहण कर रहे थे, तब यह पढ़ाया जाता था कि युद्ध और महामारी के दौर में अखबार सरकार और प्रशासन के बड़े सहारे होते हैं, जिनके माध्यम से जनता से सतत संवाद बनाए रखा जाता है। लेकिन, कोरोनावायरस के संक्रमण के बाद महाराष्ट्र में यह देखने में आ रहा है कि सरकार महामारी से निपटने में अखबारों की मदद लेना तो दूर, अपने प्रशासनिक तंत्र के माध्यम से उन्हें लोगों से दूर करने की कोशिश में लगी है।

पहले अफवाहों का सहारा लेकर सरकार ने अखबारों को जनता तक पहुंचने से रोकने की कोशिश की, फिर जब जनता की समझदारी से अखबार लोगों तक पहुंचने लगे और उन तक सही जानकारी पहुंचने लगी तो सरकार ने अपने मुख्य सचिव के माध्यम से फरमान निकालकर अखबारों को घरों तक पहुंचने से रोककर अपनी छद्म ताकत का अहसास करा दिया। कुछ हद तक अखबारों ने भी सरकार की ‘जनहित में दादगिरी’ को मान लिया। मगर अखबारों के नाम से लोगों में डर फैला कर आखिर राज्य सरकार क्या हासिल करना चाहती है? एक तरफ जहां सरकार अपनी नीयत की दुहाई में घर-घर पहुंचने वाले अखबारों को स्टॉल, दुकानों से बेचने के लिए कह रही है, वहीं दूसरी ओर लोगों को उनके घरों में रोकने के इरादे से कर्फ्यू की अवधि बढ़ाती चली जा रही है।

यदि सरकार अपनी सोच से एक गरीब हॉकर को कोरोना वायरस का वाहक मान कर चलती है तो पहली बात यह कि वह एक ऐसा व्यक्ति है, जो कभी अपने ग्राहक से मिलता नहीं है। वह ‘सोशल डिस्टेंसिंग’ का बड़ा उदाहरण है। वह माह में केवल एक बार ही अपने ग्राहक से रूबरू होता है। दूसरी ओर यदि सरकार को केवल अखबार के हॉकरों से ही कोरोना वायरस फैलने की चिंता है तो फिर उसे जानकारी होते हुए उनकी जांच कराने में किस बात का संकोच है? क्या जांच से सच सामने आने का डर है? यदि सैकड़ों लोगों से हाथ से गुजर कर दूध का पैकट घर पहुंच जाता है, यदि तमाम लोगों के छूने के बाद सब्जियां भी बिक जाती हैं, यदि किराना दुकान में सैकड़ों लोगों के छूने के बावजूद सामान खरीदा जाता है, यदि दवाई की दुकान में किसी विक्रेता के हाथ या छींक की चिंता नहीं की जाती है, यदि भूख के दौर में दारू की दुकानों को खोलने की जरूरत समझी जाती है। यदि  ‘साहब’ कागजों को देखते वक्त उनके कोरोना परीक्षण की मांग नहीं करते तो अखबारों से इतनी ‘एलर्जी’ क्यों?

क्या यह सरकार का लोकतंत्र का गला घोंटने का संगठित अपराध नहीं है? वर्ना क्या जरूरत थी कि मुख्य सचिव के आदेश के बाद जिलाधिकारी अलग से आदेश निकाल कर खुद के हस्ताक्षर की कीमत बताकर अपना ‘कॉलर टाइट’ करने की कोशिश में लगे रहे। देश में जहां बिजली का संकट आम हो, इंटरनेट हर आदमी के बस की बात न हो, ऐसे में सूचनाओं के सबसे सस्ते-सुलभ और प्रचलित माध्यम के प्रसार की राह में बाधा बनना तानाशाही का दौर नहीं तो क्या है? इसे आपदाकाल में ‘विनाश काले विपरीत बुद्धि’ से अधिक कुछ नहीं माना जा सकता। अन्यथा यदि कहीं कोई संवेदनशीलता और गंभीरता होती तो हंसती-खेलती मुंबई, पारंपरिक सांचे में ढले पुणे और जीरो माइल के शहर नागपुर का बुरा हाल नहीं होता।

सरकार यह समझने में असफल है कि मुंबई में सड़कों पर आते लोग तफरीह करने वाले नहीं हैं, न वे अखबारों के काउंटर ढूंढते सड़कों पर उतर आते हैं, जैसा सरकार का ‘विचित्र’ इरादा है। ये लोग अनाज और सब्जी के लिए भटकते हुए लोग हैं, जिन्हें रोजमर्रा का सामान पहुंचाने में सरकार और प्रशासन विफल है। यदि किसी शहर में लोग घरों में दिखते हैं तो साफ है कि वहां अच्छी व्यवस्था है। देश में भीलवाड़ा ऐसा ही एक सुंदर व्यवस्था का उदाहरण है, जिसने कोरोना के खिलाफ असली युद्ध लड़कर उसे भगाया है। वहीं महाराष्ट्र में गृह मंत्री औरंगाबाद के कोरोना प्रभावित इलाकों में ऐसे निकलते हैं, जैसे कोई फिल्म सितारा चुनाव प्रचार के लिए सड़कों से गुजरता है। उन्हें न तो राहत शिविरों को देखने की फुर्सत मिलती, न राशन की दुकान में खड़े लोगों का हाल जानने की। सच तो यह है कि जब काम से जी चुराना हो, जब दूरदर्शिता का अभाव हो, जब मंत्रिमंडल, विधायक, प्रशासनिक तंत्र वातानुकूलित कमरों में बैठ चंद मेडिकल कर्मचारियों के कंधों पर वैश्विक महामारी का बोझ डाल जिंदगी सुकून से गुजारने में व्यस्त हो तो कमी उनमें ही दिखेगी, जो लोग काम कर रहे हैं। इनमें स्वास्थ्यकर्मी, सुरक्षाकर्मी और मीडिया सभी हैं। तीनों ही परेशान हैं। न सुरक्षा है और न पैसा है। सिर पर धूप और पांवों में छाले हैं।

सरकार निर्माण कार्य में एक ठेकेदार के पास काम करने वाले मजदूर के लिए दो हजार रुपए का इंतजाम कर सकती है, मगर वह सुबह तीन बजे उठकर अखबार बांटने वाले और उसके साथ काम करने वालों के घर परिवार की चिंता नहीं कर सकती है, वह भी ऐसी स्थिति में जब तत्काल अखबार देकर एक महीने के इंतजार के सिवाय उसके हाथ एक पैसा भी नहीं आने वाला है। यदि निर्माण कार्य कर्मचारी को मदद मिल सकती है तो हॉकर को क्यों नहीं। दरअसल हॉकर आम जनता तक सच्चाई पहुंचाने का माध्यम है, जिसे बांधकर सरकार अपनी कमियों पर परदा डाल सकती है।

ऐसा कहा जाता है कि जो लोग अच्छे फोटोग्राफर होते हैं वे उस चीज को भी देख लेते हैं, जो किसी को दिखाई नहीं देती। किंतु दुर्भाग्य के साथ यहां लिखना पड़ रहा है कि राज्य के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे एक उत्कृष्ट फोटोग्राफर हैं, लेकिन उन्हें जमीनी सच्चाई नहीं दिख रही। वह वही देख रहे हैं जो उनके सिपहसालार दिखा रहे हैं। वह वही सुन रहे हैं, जो उन्हें भ्रमित करने के लिए सुनाया जा रहा है। वह उनके ही संपर्क में हैं, जो लोकतंत्र की दुहाई देकर खुद को ‘जाणता राजा’ मान बैठे हैं, लेकिन प्रजा की आवाज दबाने और लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को पीछे ढकलने की कोशिशों में उनका मौन व्रत टूट नहीं रहा है।

यदि मुख्यमंत्री कम से कम अपनी ही पार्टी के जमीनी स्तर पर कार्यरत शिवसैनिकों से सच्चाई जान लें तो भी उनकी आंखों के सामने उजाला आ सकता है। फिलहाल तो देश के एक पुरोगामी राज्य का इन दिनों सूचनाओं के अंधरे में जीना बड़ा ही दुर्भाग्यपूर्ण है और इन परिस्थितियों को पैदा करने वालों को धिक्कार है।

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

 

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हिंदी टीवी पत्रकारिता को सम्मान दिलाने वाले विनोद दुआ को आखिरी सलाम: विजय त्रिवेदी

विनोद दुआ हिंदी टीवी पत्रकारिता का सबसे बड़ा नाम यूं ही नहीं थे। उनसे ज़्यादा कैमरा फ्रेंडली एंकर शायद ही कोई दूसरा रहा हो।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Saturday, 04 December, 2021
Last Modified:
Saturday, 04 December, 2021
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विजय त्रिवेदी, वरिष्ठ पत्रकार ।।

मेरे पत्रकार और फ़िल्मकार मित्र जो एक सीनियर जर्नलिस्ट हैं, ने ट्विटर पर लिखा- ‘विनोद मरा नहीं, विनोद मरते नहीं।’ सच ही लिखा है, भले ही यह खबर सच हो कि वरिष्ठ पत्रकार विनोद दुआ ने शनिवार को साढ़े चार बजे दिल्ली के अपोलो अस्पताल में आखिरी सांस ली, लेकिन विनोद दुआ, उनकी पत्रकारिता, उनकी जांबाज़ी, उनकी हिम्मत मर नहीं सकती। अपने 35 साल के करियर में उनका यह अंदाज़ सैकड़ों पत्रकारों में छूट गया है, जो खत्म नहीं हो सकता। उसे खत्म किया नहीं जा सकता।

विनोद दुआ हिंदी टीवी पत्रकारिता का सबसे बड़ा नाम यूं ही नहीं थे। उनसे ज़्यादा कैमरा फ्रेंडली एंकर शायद ही कोई दूसरा रहा हो। आज के दौर में जब ज़्यादातर एंकर टीवी प्रॉम्पटर के बिना नहीं चल सकते हों, उसमें विनोद दुआ ने कभी प्रॉम्पटर का इस्तेमाल नहीं किया, क्योंकि किसी भी कार्यक्रम या स्टोरी के लिए उनके दिमाग में तस्वीर साफ होती थी और वो वही बोलते थे, चाहे आपको पसंद आए या नहीं।

दुआ साहब यूं तो खुद को पत्रकार नहीं कहते थे, और प्रजेंटर बोलते थे, क्योंकि उस ज़माने में दूरदर्शन पर एंकर प्रजेंटर ही होते थे, लेकिन उनकी राजनीतिक समझ और पत्रकारिता की पैनी धार ऐसी रही, जिसका तोड़ पाना आसान काम नहीं था। कैमरे के सामने उनका दुस्साहस और बेलागमपन उन्हें सबसे अलग करता है, उनका अपना खास अंदाज़ था, बेफिक्री का अंदाज़। दूरदर्शन पर चुनाव विश्लेषणों ने उनको ऐसी पहचान दी कि वो हर हिन्दुस्तानी घर में सेलेब्रिटी हो गए। प्रणव रॉय और उनकी जोड़ी खूब जमती थी। दिल्ली के हंसराज कॉलेज से अंग्रेजी में स्नातक और दिल्ली विश्वविद्यालय से लिट्रेचर में एम ए कर चुके दुआ की अंग्रेजी और हिंदी दोनों पर जबरदस्त पकड़ थी। प्रणव रॉय के अंग्रेजी प्रजेंटेशन को भी वे तुरंत बड़ी खूबसूरती से हिंदी में समझा देते थे। हिंदी टीवी पत्रकारिता को सम्मान दिलाने में उनकी भूमिका को नज़रअंदाज नहीं किया जा सकेगा।

क्या अब विनोद दुआ जैसी हिम्मत कोई एंकर दिखा सकता है

कम लोगो को याद होगा कि जिस जमाने में दूरदर्शन अकेला टीवी चैनल होता था और वो भी सरकार के अधीन, उस दूरदर्शन पर उनका प्रोग्राम जनवाणी खासा लोकप्रिय था। इस कार्यक्रम में वो सरकार के नुमाइंदों और मंत्रियों को बुलाते थे और जनता के सवाल भी शामिल करते थे। कुछ लोग अब भी चाहें तो उस प्रोग्राम से दुस्साहसी होने के लिए हिम्मत जुटा सकते हैं। उस कार्यक्रम में दुआ साहब मंत्रियों से जैसे सवाल पूछते, टिपप्णी करते, जनता को मौका देते, वो तब तो मुश्किल काम था ही, अब असंभव सा लगता है। क्या आज कोई प्राइवेट न्यूज चैनल पर भी किसी मंत्री के कामकाज पर टिप्पणी करते हुए, उसे दस में से तीन अंक देने की हिम्मत दिखा सकता है, वो काम उन्होंने सरकारी चैनल दूरदर्शन पर किया। दुआ साहब ने शायद कभी इस बात की परवाह नहीं की कि सत्ता का व्यवहार उनके साथ कैसा रहेगा। 2008 में जब मनमोहन सिंह सरकार ने उन्हें पद्मश्री से सम्मानित करने का ऐलान किया, उनकी सूची में कुछ और नाम भी थे। उस हिसाब से विनोद दुआ के लिए वो बहुत छोटा सम्मान था।

संवाददाताओं का देश भर में जाल बिछाया

दूरदर्शन पर प्राइवेट प्रॉडक्शन के तौर पर वह पहली साप्ताहिक पत्रकारिता थी– ‘परख’, नवम्बर 1992 में शुरू हुए इस कार्यक्रम के लिए लोग पूरे सप्ताह इंतज़ार करते थे। मेरा सौभाग्य है कि उस प्रोग्राम की शुरुआत से मैं उसमें जुड़ा रहा, पहले दिन से, पहले कार्यक्रम से। उस कार्यक्रम में भी हर सेगमेंट का नाम उन्होंने बेहद खूबसूरत तरीके से चुना था। वो उस कार्यक्रम के ना केवल निर्माता निर्देशक थे, बल्कि इसके माध्यम से उन्होनें देश भर में संवाददाताओं का ऐसा जाल बिछाया, जो बाद में आने वाले न्यूज चैनलों के आधार स्तम्भ बन गए। आज भी यह जानकार अच्छा महसूस होता है कि परख की टीम के उन पत्रकारों ने पत्रकारिता के मानदंडों को नहीं छोड़ा और आगे बढ़ाने की कोशिश ही की। देर रात तक उस कार्यक्रम पर चर्चाओं में उनका सहभागी और प्यार का हकदार बना। उन चर्चाओं के बीच इतिहास, विदेश नीति और संगीत पर उनका ज्ञान अदभुत था।

पढ़ने लिखने और गाने के शौकीन दुआ

पढ़ने लिखने और गाने के शौकीन। गाने के शौक और एक कार्यक्रम से ही उनकी मुलाकात बाद में उनकी जीवनसंगिनी बनी डॉ पद्मावती से हुई। प्यार से उन्हें लोग चिन्ना दुआ के नाम से जानते हैं और वो नेवीगेटर थीं विनोद दुआ की, शायद यही वजह रही कि इस साल कोरोना की वजह से जून में चिन्ना जी के जाने के बाद दुआ साहब ना केवल टूट गए, बल्कि शायद जीने की इच्छा ही छोड़ दी और वो बीमारी की इस लड़ाई से वैसे नहीं लड़ रहे थे, जैसे उन्होंने अपने करियर में बड़े बड़े लोगो से लड़ी थीं। नौकरी करना उन्हें पसंद नहीं था, बल्कि यूं कहना चाहिए कि उनका स्वभाव नही था। कोई ना तो उन्हें बांध सकता था और ना ही उनके विचारों को रोक सकता था, किसी गहरी और बड़ी नदी की तरह उनका विस्तार तो था ही, पत्थर उनका रास्ता नहीं रोक सकते थे, सिर्फ बहते रहे अपने अंदाज़ में।

लोकप्रियता के शिखर पर रहते वक्त भी वो ओढ़ी हुई गंभीरता के साथ नहीं रहते थे, एक जिंदादिल इंसान, जोश खरोश से भरा हुआ, अपने सहयोगियों को दोस्त मानने वाला। सड़क पर भुट्टा खाने, नमक मसाले वाली मूली खरीदने और गोल गप्पे खाने वाला दुआ साहब बनना मुश्किल काम है। लोकप्रियता जब दूसरों से दरवाज़े बंद करती हो, उस वक्त भी वो सबके लिए खुले हुए, हर चर्चा के लिए। हिंदी,उर्दू और अंग्रेजी साहित्य जितना पढ़ते थे, उतना ही ज्ञान उन्हें संगीत और नाटक में था। फ़िल्मों और गीतों के साथ सूफी संगीत उनका शौक था। सुनना भी, गाना भी और उसमें उनकी जबरदस्त जोड़ी सहयोगी चिन्ना दुआ। अक्सर बुल्ले शाह और बाबा फरीद का ज़िक्र और गीत उनकी बातचीत में शामिल होते थे। खाने खिलाने के शौकीन।

‘जायका’ शो आपको खाने का जायका महसूस कराता था

विनोद दुआ का मतलब पार्टियां, हर मौके, बेमौके पार्टियां लेकिन अनौपचारिक बिना दिखावे की। किस्से, लतीफे और चुटकियां, हंसना, हंसाना, और बेलौस जीना। उनकी बेटी स्टैंड-अप मल्लिका में यह गुण शायद उनसे ही आया होगा। पत्रकारिता से दूर जब उन्होंने हिन्दुस्तान की सड़कों और गलियों और ढाबों के लोकल फूड पर एनडीटीवी पर कार्यक्रम किया ज़ायका इंडिया का, तो उसे सिर्फ़ देखना नहीं होता था, आप उसमें उस फूड का ज़ायका महसूस कर सकते थे। उनकी दूसरी बेटी बकुल क्लिनिकल साइकोलोजिस्ट हैं, शायद वो किसी दिन बेहतर तरीके से समझा पाएं। विनोद दुआ का परिवार विभाजन के वक्त पाकिस्तान के डेरा इस्माइल खान से आया था। बचपन मुश्किलों में बीता। उनकी विनम्रता, उनकी हंसी, उनकी पत्रकारिता यदि आपने महसूस नहीं की, तो पक्का मानिए आप बहुत कुछ हासिल करने से रह गए हैं।

(साभार:  tv9hindi.com)

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वरिष्ठ पत्रकार मनोरंजन भारती ने अपने गुरु विनोद दुआ जी को यूं दी भावभीनी श्रद्धांजलि‍

विनोद दुआ जी ने IIMC से पास हुए एक बच्चे को सिखाई थी कि जैसे ही कैमरा और लाइट ऑन हो तो सवाल वही पूछना जो तुम पूछना चाहते हो और सवाल चिल्लाकर नहीं...

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Saturday, 04 December, 2021
Last Modified:
Saturday, 04 December, 2021
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मनोरंजन भारती, मैनेजिंग एडिटर, एनडीटीवी इंडिया

मैं कॉलेज के जमाने से 'परख' और World this week देखा करता था और एक सपना था कभी इनसे (विनोद दुआ जी से) मिलूं। फिर IIMC में चयन हो गया। साल 1994 की बात है IIMC से पास करने के बाद मौका था नौकरी ढूंढने का, पता चला कि विनोद दुआ और ‘टाइम्‍स ऑफ इंडिया’ के दिलीप पडगांवकर ने मिलकर एक कंपनी बनाई है जो दूरदर्शन के लिए प्रोग्राम बनाएंगे।

विनोद दुआ और दिलीप पडगांवकर जैसे लेगों ने एक कंपनी बनाई थी APCA जो किन्‍हीं कारणों से चली नहीं। फिर मुझे मौका मिला दुआ सर के साथ काम करने का, जबकि मेरे कई दोस्त अलग-अलग जगह चले गए। मेरे रूम मेट नीरज भी पडगांवकर की नई कंपनी APCA में चले गए, लेकिन मैंने मन बनाया हुआ था कि हिंदी पत्रकारिता में काम करना है तो विनोद दुआ के साथ ही करूंगा और मैं ‘परख’ में आ गया।

पहले कई महीने रिसर्च करता रहा, फिर पहली स्टेरी मिली वो भी टाडा पर। मैंने पूरी मेहनत करके ऐसी स्टोरी की जो दूरदर्शन को पसंद नहीं आई। चूंकि 'परख' दूरदर्शन पर आता था इसलिए कहा गया कि काट छांट करें। फिर दुआ सर ने स्टोरी दोबारा एडिट की, फिर वो टेलीकास्ट हुई।

हर शुक्रवार को 'परख' का टेप जाने के बाद पार्टी होती थी। खाने के बड़े शौकीन थे। सबसे पहले निहारी खाने का सौभाग्य उनके पास ही मिला। घर भी बुलाते थे, खुद बना के खिलाते थे। संगीत के गुरु थे, खुद गाते थे साथ में चिन्ना मैम भी,  जो तमिलियन थीं। दोनों हिंदी गाने बहुत ख़ूबसूरत अंदाज में गाते थे। मैंने देखा जब नुसरत फतेह अली खान भारत आए थे, तो केवल परख को अनुमति थी, तीन गाने शूट करने की। फिर दुआ सर ने नुसरत फतेह अली खान के साथ एक अलग कॉन्‍सर्ट किया था जिसमें 'परख' के सभी लोगों को बुलाया। दुआ सर की वजह से नुसरत साहब को सामने से सुनने का सुखद अनुभव हुआ। पंजाबी और हिंदी गानों को खूब पसंद करते थे और बड़े सुर में गाते थे।

फिर जब 'परख' बंद हुआ तो मैं उनके साथ NDTV आ गया, Good Morning India में। यादों का सिलसिला खत्म नहीं हो रहा मगर उन्होंने IIMC से पास हुए एक बच्चे को सिखाई थी कि जैसे ही कैमरा और लाइट ऑन हो तो सवाल वही पूछना जो तुम पूछना चाहते हो और सवाल चिल्ला कर नहीं बातचीत के लहजे में मुस्कुराते हुए, जैसे तुम गेस्ट से बातचीत कर रहे हो। उनकी ये बात मैं अभी भी फॉलो कर रहा हूं। यही बात NDTV में भी सिखाई गई। दुआ सर, आज आप नहीं हैं मगर आप का नाम देश के टेलीविजन इतिहास में लिखा जाएगा। जो सफर 'जनवाणी' से शुरू हुआ वो जारी रहेगा। सवाल तो पूछना ही है, आपके शिष्य होने के नाते हम ये करते रहेंगे। आपके जाने के साथ पत्रकारिता के उस युग का अंत हो गया जो कठिन सवाल पूछने से डरता नहीं था, भले ही मुकदमे हो जाएं। गोदी मीडिया के इस युग में जब चाटुकारिता पत्रकारिता हावी है, दुआ सर आप बड़ी शिद्दत से याद किए जाएंगे। एक शिष्य होने के नाते आपको भावभीनी श्रद्धांजलि‍।

(साभार: एनडीटीवी डॉट इन)

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टीवी पत्रकारिता का एक शानदार पन्ना आज अलग हो गया: रवीश कुमार

भारत की टेलीविज़न पत्रकारिता में सवाल पूछने की यात्रा की पहचान विनोद दुआ से बनती है। पूछने की पहचान के साथ उनकी पत्रकारिता जीवन भर जुड़ी रही।

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Published - Saturday, 04 December, 2021
Last Modified:
Saturday, 04 December, 2021
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रवीश कुमार, वरिष्ठ पत्रकार ।।

भारत की टेलीविज़न पत्रकारिता में सवाल पूछने की यात्रा की पहचान विनोद दुआ से बनती है। पूछने की पहचान के साथ उनकी पत्रकारिता जीवन भर जुड़ी रही। आज हमें बताते हुए अच्छा नहीं लग रहा कि हमने भारतीय टेलिविज़न की एक शानदार हस्ती को खो दिया। यह साल उनके लिए बहुत भारी रहा। कोरोना के कारण उन्होंने अपनी जीवनसाथी पदमावती चिन्ना दुआ को खो दिया, उस समय विनोद अस्पताल में ही भर्ती थे। उसके बाद भी उनकी सेहत पटरी पर नहीं लौट सकी और आज दिल्ली में उनका निधन हो गया। विनोद दुआ हमारे चैनल से भी जुड़े रहे हैं और यहां उन्होंने कई शानदार कार्यक्रम किए। 'ख़बरदार' और 'ज़ायका इंडिया' चंद नाम हैं। ‘गुडमार्निंग इंडिया’ की यादें हम सबके मन में आज भी ताज़ा हैं जब उस कार्यक्रम के ज़रिए हम जैसे लोग ‘एनडीटीवी’ में पत्रकारिता के बहुत से अनुशासनों को सीख रहे थे।

क्या बोलना और कैसे बोलना है, इसे लेकर विनोद दुआ के पास जो एकाधिकार था कोई उस स्तर तक नहीं पहुंच सका। भाषा उनके स्वभाव में आसानी से आती थी लेकिन इसके बाद भी वे एक एक शब्द के लिए काफी मेहनत करते थे। अपने शब्दों को काफी सम्मान देते थे और उनके उच्चारण की जगह ख़ास तरीके से तय करते थे। उनकी भाषा माध्यम के हिसाब से सटीक थी, संक्षिप्त थी और शालीन थी। उनकी भाषा में अंग्रेज़ी, पंजाबी, हिन्दी और उर्दू का बेहतरीन समावेश था। उनके पिता विभाजन के बाद पाकिस्तान के डेरा इस्माइल ख़ां से भारत आ गए थे। अपने पुरखों के शहर की पंजाबीयत और उसकी ठाठ तब खूब झलकती थी जब वे पठान सूट पहनते थे। कैमरे के सामने उनकी सहजता लाजवाब थी। टीवी का पत्रकार पत्रकारिता के पैमानों के साथ टीवी के माध्यम के प्रति उसकी समझ और उसके बर्ताव को लेकर भी जाना जाता है। माध्यम के लिहाज़ से विनोद दुआ हमेशा ही श्रेष्ठ प्रस्तोता बने रहे।

विनोद दुआ के काम को समझना है तो कैमरे के सामने उनके हाव-भाव को देखिए। ऐसा लगता था कि दर्शक और उनके बीच कोई कैमरा ही नहीं है। दोनों आमने सामने बैठे हैं। किसी बात को कह कर और वहीं छोड़ कर आगे बढ़ जाने का फ़न उन्हें बहुत आसानी से आता था। ज़ायका इंडिया सफल नहीं होता अगर वे खाना खाने, खाना बनाने और खाना खिलाने में माहिर न होते। इस कार्यक्रम में विनोद को चलते फिरते देख आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि उन्हे अपने माध्यम की कितनी गहरी समझ है। सब कुछ नपा तुला बोलना और सही जगह पर बोलना। राजनीतिक पत्रकारिता में दखल रखने वाले विनोद दुआ।

मसालों और व्यंजनों पर राजनीतिक और सांस्कृति रूप से इस तरह से बात कर जाएंगे किसी को यकीन नहीं था। अपनी पत्नी के निधन के बाद भी लिखते रहे कि वे वापस लौटेंगे। रिपोर्टिंग करेंगे।

दूरदर्शन के लिए उनका कार्यक्रम 'जनवाणी' और 'परख' आज भी यादगार माना जाता है। उस कार्यक्रम ने टीवी पत्रकारिता के लिए कई लोगों को प्रशिक्षित किया जो भविष्य में जाकर इस माध्यम का चेहरा बने। आपके इस ऐंकर को भी विनोद दुआ के साथ काम करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। इस माध्यम के बारे में उनसे काफी कुछ सीखा है और जाना है।

काम के बीच में उनका गुनगुना देना और किसी पुराने गाने को यूं याद कर लेना सबको सहज कर देता था कि सीनियर हैं मगर सहयोगी वाले सीनियर हैं। अपनी पत्नी चिन्ना के साथ उनका गाना और अच्छा गाना उनके दोस्त कभी नहीं भूल सकते हैं। हाल के दिनों तक वे तलत महमूद, बड़े गुलाम अली ख़ां, पंडित जसराज की गायकी पोस्ट करते रहे थे। डॉ. प्रणय रॉय और उनकी जोड़ी चुनावी नतीजों के दिन पूरे देश को जगा देती थी और जगाए रखती थी। दोनों ने लंबे समय तक एक दूसरे के साथ काम भी किया। दोनों ने अलग-अलग भी काम किया और एनडीटीवी में भी एक साथ लंबे अर्से तक काम किया। टीवी पत्रकारिता का एक शानदार पन्ना आज अलग हो गया है। वो अब इस दुनिया में नहीं हैं लेकिन इस माध्यम में इस कदर हैं कि लगता ही नहीं कि आज नहीं हैं। हाल के दिनों में हिमाचल प्रदेश के भाजपा नेता ने उन पर राजद्रोह का मामला दायर कर दिया। उस मुकदमे का सामना भी विनोद ने उसी निर्भिकता से किया। सुप्रीम कोर्ट ने विनोद के पक्ष में फैसला दिया।

विनोद दुआ हों और कुछ बोल न रहे हों, कुछ सख्त न हो बोल रहे हों तो फिर वे विनोद दुआ नहीं हो सकते। उनकी चाल ढाल में निर्भिकता भरी रहती थी। विनोद दुआ नहीं हैं तो आज वो दिल्ली भी नहीं है जो उनके टीवी पर आने पर पूरे देश की हो जाती थी। पत्रकारिता तो अब वैसी रही नहीं लेकिन विनोद दुआ ता उम्र वैसे ही रहे जैसे थे। बहुत सारे किस्से थे और बहुत सारे किस्से उन्हें लेकर थे।

(साभार: एनडीटीवी डॉट इन)

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टीवी प्रजेंटेशन के ‘हेडमास्टर’ थे विनोद दुआ जी: सतीश के.सिंह

विनोद जी का जाना, जीवंत पत्रकारिता के लिए अपूरणीय क्षति है। भाषा, सौम्यता, अध्ययन और प्रस्तुति के लिहाज से उन्हें मैं बहुत बड़ा मानता रहा।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Saturday, 04 December, 2021
Last Modified:
Saturday, 04 December, 2021
satish K Singh

सतीश के सिंह, वरिष्ठ पत्रकार।।

विनोद जी का जाना, जीवंत पत्रकारिता के लिए अपूरणीय क्षति है। भाषा, सौम्यता, अध्ययन और प्रस्तुति के लिहाज से उन्हें मैं बहुत बड़ा मानता रहा। चुटीले अंदाज में, मुहावरों के जरिये और मुस्कुराते हुए गंभीर टिप्पणी कर देना, जैसे उनके डीएनए में था और बहुत ही स्वभाविक लगता था। अगर टीवी पत्रकारों ने या खास तौर से एंकर्स ने उनसे कुछ नहीं सीखा तो कुछ नहीं सीखा। दुआ सर टीवी प्रजेंटेशन के हेडमास्टर थे।

मैंने विनोद दुआ सर को सबसे पहले 1984 में ‘डीडी‘ पर चुनाव प्रसारण में नोटिस किया था। अंग्रेजी का अनुवाद और हिंदी में सूचना कितनी सहजता और सटीक देते थे, क्या कहना। एक शब्द भी फालतू नहीं। ये खूबी और कला किसी में मैंने आज तक नहीं पाई ।

दुआ सर मेरी नजर में इतने बड़े थे कि एक ही संस्थान के लिए काम करते हुए पहली बार तो मैं उन्हें दूर से ही निहारता था, शायद बात 1996 या 1997 की है। लेकिन, दिसंबर 1999 में कुछ ऐसा हुआ कि वह भी मुझे जानने लगे, जब मैं एक रिपोर्टर के रूप में इस इंडियन एयरलाइंस की फ्लाइट IC 814 के हाईजैक पर रिपोर्टिंग कर रहा था और वह मैराथन एंकरिंग।

विनोद सर दूर से ही सही, लेकिन मुझे जानते-पहचानते थे। अक्सर वह खुद ही मुझे बुलाकर बात करते थे। लेकिन, बस IC 814 प्रकरण तक सीमित रहा। दरअसल, मैं उनसे इतना प्रभावित था कि दुआ सर के नजदीक जाने की हिम्मत ही नहीं हुई, जबकि उनका स्वभाव, शिष्टाचार किसी से मिलने, मिलाने का था ।

दुआ सर के साथ दूसरी बार एक दूसरे चैनल में काम करते वक्त वर्ष 2005 में संपर्क हुआ। वह शाम के वक्त आते थे, टोकते जरूर थे और  मजाक, हंसी उनके निरंतर स्वभाव का हिस्सा थी। ये सिलसिला लगभग दो साल चला ।

मैं ऐसा दावा तो नहीं कर सकता कि मैं उनका नजदीकी था, मगर ये कह सकता हूं कि उनके हुनर, ज्ञान, वाकपटुता, प्रजेंटेशन और टिप्पणियों का कायल जरूर था। विनोद जी ने जिंदगी अपनी शर्तो पर जी, नहीं तो वह भी एक मीडिया एम्पायर के महामानव होते, दरअसल, वह एक पत्रकार और प्रजेंटर ही रह गए, न बंधे और न बांधा।

एक मौका ऐसा भी आया जब मैंने उनसे एक चैनल के लिए डेली शो करना चाहा, बात भी हो गई, लेकिन वह चालू नहीं हो पाया। मुझे लगता है कि धर्मपत्नी के निधन के बाद दुआ सर टूट गए थे। इतने जीवंत आदमी ने जीने की तमन्ना ही छोड़ दी थी ।

सच कहूं तो संतोष भारतीय जी के साथ एक इंटरव्यू को देखकर मुझे ऐसा प्रतीत हुआ था। काफी कमजोर लग रहे थे। आवाज भी फंसी और रुंधी हुई, लेकिन वाणी बिल्कुल विनोद दुआ सिग्नेचर। दुआ सर चले गए, लेकिन पत्रकारों, एंकर्स, डिबेट करने और इंटरव्यू देने वालों नेताओं के लिए आईना, पाठ्यक्रम और मिसाल बनकर। दुआ साहब की तैयारी पूरी रहती थी,शायद वह दूसरे से भी यही अपेक्षा रखते थे। दुआ सर, विनम्र श्रद्धांजलि, रेस्ट इन पीस चीफ।

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वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी ने बताया, कुछ ऐसे थे हमारे मित्र विनोद दुआ

विनोद दुआ नहीं रहे। चिन्ना भाभी के पास चले गए। जीवन में साथ रहा। अस्पताल में साथ रहा। तो पीछे अकेले क्यों रहें।  

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Saturday, 04 December, 2021
Last Modified:
Saturday, 04 December, 2021
VinodDua5454

ओम थानवी, वरिष्ठ पत्रकार ।।

विनोद दुआ नहीं रहे। चिन्ना भाभी के पास चले गए। जीवन में साथ रहा। अस्पताल में साथ रहा। तो पीछे अकेले क्यों रहें।  उनका परिवार डेरा इस्माइल ख़ान से आया था। मैं उन्हें पंजाबी कहता तो फ़ौरन बात काट कर कहते थे- हम सरायकी हैं, जनाब। दिल्ली शरणार्थी बस्ती से टीवी पत्रकारिता की बुलंदी छूने का सफ़र अपने आप में एक दास्तान है।

दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाई (जैसी करते थे, करते थे) के साथ रंगमंच का तजुर्बा हासिल करते हुए टीवी की दुनिया में चले आए। कीर्ति जैन ने उनकी प्रतिभा को पहचाना, यह बात उन्हें हमेशा याद रही। दूरदर्शन सरकारी था। काला-सफ़ेद था। उन्होंने उसमें पेशेवराना रंग भर दिया। उनके मुंहफट अंदाज़ ने किसी दिग्गज को नहीं बख़्शा। जनवाणी केंद्रीय मंत्रिमंडल के रिपोर्ट-कार्ड सा बन गया, जिसे प्रधानमंत्री राजीव गांधी तक देखते थे।

कम लोगों को मालूम होगा कि विनोद कभी कार्यक्रम की स्क्रिप्ट नहीं तैयार करते थे। न प्रॉम्प्टर पर पढ़ते थे। बेधड़क, सीधे। दो टूक, बिंदास। कभी-कभी कड़ुए हो जाते। पर अमूमन मस्त अन्दाज़ में रहते। परख के लिए आतंकवाद के दिनों में पंजाब के मुख्यमंत्री बेअंत सिंह से बात की। उन्हें कुछ गाकर सुनाने को कहा। ना-ना-ना करते गवा ही बैठे।

विनोदजी का हिंदी और अंग्रेजी पर लगभग समान अधिकार था। प्रणय रॉय के साथ चुनाव चर्चा की रंगत ही और थी। बाद में विनोदजी ने अपनी कंपनी बनाई। उससे ‘परख’, ‘अख़बारों की राय’ जैसे अनेक कार्यक्रम बनाए। पर रहे उनके गिर्द ही।

फिर वे अपने पुराने मित्र के चैनल 'एनडीटीवी इंडिया' से आ जुड़े। चैनल की वे शान बने। राजनेताओं से उलझना उनकी फ़ितरत में था। चाहे किसी भी पार्टी के हों। चैनल ने बाद में उन्हें ‘ज़ायक़ा इंडिया का’ जैसा कार्यक्रम दे दिया। उन्हें खाने-पीने का शौक़ था। कार्यक्रम के लिए देश में घूमा किए। चाव से। हम देश के लिए खाते हैं, उनका लोकप्रिय जुमला बना।

पर दिल से वे राजनीति के क़रीब थे। उन्होंने ज़ायक़ा बदल लिया। नेटवर्क-18 का एक कार्यक्रम पकड़ा। मुझे मालूम था वहां निभेगी नहीं। सहारा से सुबह के अख़बारों वाले कार्यक्रम प्रतिदिन से काफ़ी पैसा मिलता था। किसी बात पर सहाराश्री से खटपट हुई। मेरे सामने (आईआईसी के बगीचे से) लखनऊ फ़ोन किया और गाली से बात की। क़िस्सा ख़त्म।

मगर सिद्धार्थ वरदराजन के साथ ‘द वायर’ में उनकी ख़ूब निभी। ‘जन की बात’ जबर हिट हुआ। मोदी सरकार पर इतना तीखा नियमित कार्यक्रम दूसरा नहीं था। पर मी-टू में वे एक आरोप मात्र से घिर गए। वायर ने नैतिकता के तक़ाज़े पर उनसे तोड़ ली। जो असरदार सिलसिला चला था, थम गया। बाद में सिद्धार्थ इससे त्रस्त लगे और विनोद भी। इसके बाद भी विनोद सक्रिय रहे। पर पहले अदालती संघर्ष, जिसमें वे जीते और फिर कोरोना से लड़ाई उससे भी वे निकल आए। लेकिन, जैसा कि कहते हैं, होनी को कुछ और मंज़ूर था।

मेरे क़रीबी मित्र थे। कितनी शामें आईआईसी में बिताईं। बेटे मिहिर के विवाह में जयपुर आए। चिन्ना भाभी के साथ गीत भी गाए। कुरजां की खोज में हमारे गांव फलोदी जा पहुंचे।

उनकी याद में आंखें नम हैं। कुछ लिखने का इरादा नहीं था। पर मृत्यु की ख़बर जान जयपुर के कॉफ़ी हाउस में बैठे कुछ इबारत अपने आप उतर आई।

(साभार: फेसबुक वाल से)

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हिंदी को व्यावसायिक बनाती इलेक्ट्रॉनिक मीडिया

एक धारणा के मुताबिक अंग्रेजी को ही व्यवसाय की भाषा कहा जाता है। वैश्वीकरण के दौर में जहां बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने अपने व्यवसाय को विस्तार दिया है

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Friday, 03 December, 2021
Last Modified:
Friday, 03 December, 2021
hindi544

आलोक राजा

एक धारणा के मुताबिक अंग्रेजी को ही व्यवसाय की भाषा कहा जाता है। वैश्वीकरण के दौर में जहां बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने अपने व्यवसाय को विस्तार दिया है, वहीं अंग्रेजी की महत्वता को और अधिक बल मिला है। परन्तु हमारे देश की अर्थव्यवस्था में एंटरटेनमेंट और मीडिया ने हिंदी को नई दिशा देकर व्यापारिक बनाने में खासी भूमिका अदा की है। हिंदी को किताबी साहित्य से बाहर निकालकर उसे बाजार की भाषा बनाने में अगर सबसे बड़ा योगदान किसी का है तो वह इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का है।

यह सवाल हिंदी साहित्यकारों एवं लेखकों के बीच में काफी चर्चित रहता है कि क्यों हिंदी के पाठकों में बढ़ोत्तरी अंग्रेजी के पाठकों की तरह नहीं होती है? लेकिन इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने जहां एक तरफ हिंदी भाषा को सरल, सहज एवं आम-जन की भाषा बनाकर परोसा है, वहीँ दूसरी तरफ लोगों को हिंदी पत्रकारिता की तरफ आकर्षित किया है। ऐसे में हिंदी की दुनिया को दुनिया के सामने बेहतर तरीके से प्रस्तुत करने में भी मदद मिली है। हिंदी धारावाहिक, हिंदी फिल्मों और हिंदी की किताबों को चर्चित करने के लिए भी आज इलेक्ट्रॉनिक मीडिया प्लेटफॉर्म का उपयोग किया जाता है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के मार्केटिंग इफैक्ट को हम इस तरह समझ सकते हैं कि बॉलीवुड की फिल्में भी बड़े पर्दे पर उतरने से पहले इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के माध्यम से प्रमोशन करती हैं।

विदित है कि कोई भाषा केवल उसी स्थिति में विस्तार प्राप्त कर पाती है जब उसे व्यावसायिक बनाया जा सके और जब उस भाषा में रोजगार की संभावनाएं पैदा हो सकें। अगर किसी भाषा में आर्थिक गतिविधि कर पाना संभव न हो तो ऐसी भाषा सिर्फ एक संकुल तक सिमट कर ही रह जाती है और सिर्फ भावनाओं के सम्प्रेषण तक ही उसे सीमित रह जाना पड़ता है। आज जब हम संस्कृत भाषा की बात करते हैं तो भले ही संस्कृत को संस्कृति की भाषा कहा जाता हो लेकिन व्यवसायीकरण के दौर में संस्कृत आमजन की भाषा नहीं बन पायी है जिसका बहुत बड़ा कारण इसका व्यावसायिक न हो पाना है।

वहीँ अंग्रेजी, फ्रेंच और जर्मन जैसी भाषाओँ को विश्व में खासी अहमियत मिली है क्योंकि ये भाषाएं आर्थिक रूप से संपन्न देशों की भाषाएं हैं। लेकिन हिंदी को व्यवसाय की भाषा बना पाना संभव है। जिस तरह आज मीडिया में हिंदी का प्रयोग किया जाता है और उसे चमक दमक वाली भाषा के रूप में प्रस्तुत किया जाता है उससे वह बाजार की भाषा बनने में काफी हद तक सफल हुई है। हिंदी के साहित्यकार ऐसा मानते हों कि आधुनिक हिंदी को बाजार ने तोड़ मरोड़ कर प्रस्तुत किया है। इस तथ्य में भले ही सच्चाई हो, लेकिन हमें यह समझना पड़ेगा कि बहु-भाषीय देश भारत में किसी भी क्लिष्ट भाषा को बाजार की भाषा नहीं बनाया जा सकता है। बाजार की भाषा बनाने के लिए भाषा का सहज, सरल और आम होना बेहद जरूरी होता है और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने हिंदी को आम व सरल रूप में प्रस्तुत किया है।

इसी का ही परिणाम है की आज बड़े अंग्रेजी के चैनल भी अपने दर्शकों की संख्या बढ़ाने के लिए हिंदी में उतर रहे हैं। यहां तक कि हॉलीवुड की फिल्मों को हिंदी में डब किया जाने लगा है। हमारे देश में हिंदी को विस्तार इस कदर मिल चुका है कि राजनीति की भाषा के रूप में हिंदी अब पूरी तरह स्थापित हो चुकी है। अंतराष्ट्रीय स्तर पर भी हिंदी के पत्रकारों को रेमैन मेग्सेसे अवॉर्ड भी मिलने लगे हैं। यानि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के इस योगदान को सराहा जाना चाहिए की इसने हिंदी के व्यावसायिक रूप को गढ़ने में अपनी बड़ी भूमिका निभाई है।

(लेखक, ‘भारत समाचार’ न्यूज चैनल में सीनियर एंकर के तौर पर कार्यरत हैं और यह उनके निजी विचार हैं)

 

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यह स्थिति पत्रकारों के लिए खतरे की घंटी है मिस्टर मीडिया!

संसद में पत्रकारों के एक बड़े वर्ग को अपना कर्तव्य निभाने से रोक दिया गया है। प्रतिपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे और पत्रकारों के संगठन इससे खफा हैं।

राजेश बादल by
Published - Thursday, 02 December, 2021
Last Modified:
Thursday, 02 December, 2021
Mister Media

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।

संसद में पत्रकारों के एक बड़े वर्ग को अपना कर्तव्य निभाने से रोक दिया गया है। प्रतिपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे और पत्रकारों के संगठन इससे खफा हैं। ‘प्रेस क्लब ऑफ इंडिया‘ ने दो दिसंबर को दिन में एक बजे संसद भवन तक जाकर विरोध प्रदर्शन करने का फैसला किया है। इसमें ‘एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया‘,‘प्रेस एसोसिएशन‘,‘दिल्ली पत्रकार संघ‘,‘इंडियन वीमेन प्रेस कोर‘ और ‘वर्किंग न्यूज कैमरामैन एसोसिएशन‘ जैसे अनेक संगठन पहली बार एकजुट होकर संयुक्त विरोध के लिए मजबूर हुए हैं। संसद के इतिहास में यह पहली बार है, जब पत्रकारों पर इस तरह पाबंदी लगाई गई है।

‘प्रेस क्लब ऑफ इंडिया‘ के अध्यक्ष उमाकांत लखेड़ा का स्पष्ट आरोप है कि निर्वाचित प्रतिनिधियों और पत्रकारों के बीच संपर्क-संवाद तोड़ने की साजिश की जा रही है। यह एक किस्म से अघोषित सेंसरशिप है। पिछले सात साल से सरकार का रवैया पत्रकार विरोधी है। कमोबेश ऐसी ही राय राज्यसभा में प्रतिपक्ष के नेता खड़गे ने सभापति एम वेंकैया नायडू को लिखे अपने पत्र में प्रकट की है। उन्होंने कहा है कि स्थायी पास वाले पत्रकारों तक को दीर्घा में जाने से रोक दिया गया है। सेट्रल हॉल तथा पुस्तकालय जाकर सांसदों से मिलने और उनसे बात करने पर रोक लगा दी गई है। ऐसा तो कभी नहीं हुआ। कोविड प्रोटोकॉल के नाम पर अभिव्यक्ति की आजादी रोकने की साजिश है।   

यह ठीक है कि संविधान में अभिव्यक्ति की आजादी के बारे में पत्रकारों को अलग से विशेषाधिकार नहीं है, लेकिन हमारा संवैधानिक लोकतंत्र  सर्वोच्च पदों को भी यह अधिकार नहीं देता कि वह संसद जैसी सर्वोच्च पंचाट की रिपोर्टिंग से बेवजह संवाददाताओं को रोक दे। चाहे वह लोक सभा अध्यक्ष हो या राज्य सभा का सभापति। दोनों पद नियमों और संसदीय प्रक्रियाओं से बंधे हैं। वे मनमर्जी से निर्णय नहीं ले सकते। इसलिए पत्रकारों को अपने कर्तव्य से रोकने के आदेश पर गंभीर सवाल उठाए जा रहे हैं।

संसद के पचास बरस पूरे होने पर एक दुर्लभ शोधपरक दस्तावेज तैयार किया गया था। इस दस्तावेज के पृष्ठ 625 से 631 के बीच स्वयं वेंकैया नायडू ने पत्रकारिता और संसद के बेहतर रिश्तों की वकालत की है। यहां उनके कुछ कथन प्रस्तुत हैं-प्रेस के माध्यम से जनता को संसद के घटनाक्रम के बारे में जानकारी मिलती है, इसलिए इसे कभी-कभी संसद का विस्तार भी कहा जाता है। यदि मीडिया संसद अथवा सरकार के साथ निकट के संबंध स्थापित कर लेता है तो वह प्रत्येक घटना की सच्ची और यथार्थ सूचना देने के अपने दायित्व का निर्वहन नहीं कर सकता। प्रेस और मीडिया पर किसी भी प्रकार का प्रतिबंध लगाना लोकतांत्रिक मूल्यों और संस्थाओं पर प्रतिबंध लगाने के समान है। इसके अतिरिक्त प्रेस के क्रियाकलापों को किसी भी तरह के संहिताबद्ध नियम-विनयमों में बांधने के दुष्परिणाम होंगे। प्रेस पर किसी भी प्रकार का अंकुश लगाने से कोई अनुकूल परिणाम नहीं मिलने वाला है। भारत का राष्ट्रीय और क्षेत्रीय मीडिया अपने उत्तरदायित्वों को पूरी जिम्मेदारी और सावधानी से निभा रहा है।

यह अजीब विरोधाभास है कि सभापति के रूप में वेंकैया नायडू मीडिया के मामले में कठोरता का परिचय देते हैं और उसी संसद के दस्तावेज में उलट विचार प्रकट करते हैं। इसी तरह लोकसभा अध्यक्ष भी बहुत सकारात्मक नहीं दिखाई देते। यह स्थिति पत्रकारों के लिए खतरे की घंटी है मिस्टर मीडिया!

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल की 'मिस्टर मीडिया' सीरीज के अन्य कॉलम्स आप नीचे दी गई हेडलाइन्स पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं-

यह गंभीर सच परदे पर पत्रकारिता करने वालों को समझना पड़ेगा मिस्टर मीडिया!

कंटेंट के मामले में चैनलों व अखबारों को सतर्क और संवेदनशील होने की जरूरत है मिस्टर मीडिया

मिस्टर मीडिया: यह कैसा मानसिक दिवालियापन हमारे इस पेशे में दाखिल हो गया है

इस तरह किसी की यश हत्या से हमें बचना होगा मिस्टर मीडिया!

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यह गंभीर सच परदे पर पत्रकारिता करने वालों को समझना पड़ेगा मिस्टर मीडिया!

अजीब सा नजारा था। अरसे बाद या शायद पहली बार मीडिया के अनेक अवतार पिछले दिनों इस तरह विलाप करते दिखाई दिए।

राजेश बादल by
Published - Tuesday, 23 November, 2021
Last Modified:
Tuesday, 23 November, 2021
Mister Media

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।

अजीब सा नजारा था। अरसे बाद या शायद पहली बार मीडिया के अनेक अवतार पिछले दिनों इस तरह विलाप करते दिखाई दिए। जब केंद्र सरकार ने तीनों विवादित कृषि कानून वापस लेने का ऐलान किया तो भारतीय पत्रकारिता का यह नया रूप सामने आया। वैसे तो सारे मुल्क ने और कई देशों में बसे हिंदुस्तानियों ने हुकूमत के इस फैसले पर राहत की सांस ली थी। इसका कारण भी था। साल भर से आंदोलन कर रहे किसानों से सरकार का संवाद टूटा हुआ था। सैकड़ों किसानों की जान जा चुकी थी और कृषि आधारित उद्योगों की कमर टूट गई थी। किसी की दृष्टि में इसकी वजह सरकार की हठधर्मिता थी तो एक वर्ग ऐसा भी था, जो अन्नदाताओं  को कोस रहा था। लोकतंत्र में किसी को अपनी बात रखने से रोका नहीं जा सकता। आप आंदोलनकारियों से असहमत हो सकते हैं, मगर उन्हें अलगाववादी, उग्रवादी, राष्ट्रद्रोही और हिंसक प्रवृत्ति का ठहराकर उनकी देशभक्ति को चुनौती नहीं दे सकते। खासतौर पर उस हाल में, जब किसानों के तमाम मान्यता प्राप्त संगठन गांधीवादी तरीके से अपना संघर्ष छेड़े हुए थे। उनके आंदोलन को कई बार हिंसक रूप देने की कोशिशें की गईं, लेकिन उन्होंने अपना धीरज और संयम नहीं खोया।

ऐसे में घटनाक्रम की निरपेक्ष रिपोर्टिंग करने के बजाय पत्रकारिता का एक बड़ा धड़ा सरकार को ही कोसने लगा, मानों उसने कोई जघन्य पाप कर दिया हो। एक निर्वाचित प्रधानमंत्री अचानक इस धड़े के लिए खलनायक बन गए। उसे कृषि कानूनों की चिंता नहीं थी, बल्कि लंबे समय से वे जो प्रशंसा गीत गा रहे थे, अचानक उनकी धुन बेसुरी हो जाने से ज्यादा दुखी थे। वे अपनी अवधारणा गलत साबित होने से भी परेशान थे, जिसके चलते वे सरकार के इस कदम का स्तुतिगान कर रहे थे। करीब साल भर से पत्रकारों के इस वर्ग ने किसानों के खिलाफ मोर्चा खोल रखा था। यह वर्ग नाना प्रकार से खेती-किसानी के बारे में अजीबोगरीब कुतर्क गढ़ रहा था और कृषि कानूनों को जायज ठहराने का प्रयास करता रहा था। संसदीय पराक्रम से इन कानूनों को पारित किया गया था। वह प्रक्रिया यकीनन लोकतांत्रिक नहीं थी, पर माध्यमों के इन पैरोकारों को उसमें भी कोई दोष नजर नहीं आया । पत्रकारिता में संतुलन की भावना का विलोप होना इस कालखंड पर एक काला धब्बा है।

सरकार एक सियासी संस्था है, जो देश के लिए काम करती है, मगर अपना राजनीतिक चरित्र नहीं भूलती। जब उसने देखा कि उत्तरप्रदेश में उसकी राज्य सत्ता की चूलें हिलने लगी हैं और आने वाले विधानसभा चुनाव में उसे पराजय का सामना करना पड़ सकता है तो उसने यू टर्न लेने से कोई गुरेज नही किया। सरकार ने तो गिरगिट की तरह रंग बदल लिया, पर जो शब्द बिरादरी सरकारी रंग में रंगी हुई थी, इस विकट हाल में वह क्या करती? जाहिर है उसके लिए मुंह छिपाना भी मुश्किल हो गया। नहीं कहा जा सकता कि उसने किसान आंदोलन का जंग की हद तक जाकर विरोध क्यों किया। वह सरकार के दबाव में थी अथवा मैनेजमेंट के, वह सरकारी प्रतिष्ठानों से उपकृत थी या फिर किसी के इशारे पर काम कर रही थी।

हो सकता है उसके अपने निजी हित भी इस भूमिका के पीछे छिपे हुए हों। कई बार देखा गया है कि तमाम पत्रकार सम्मानों, राजनीतिक पदों के लालच या अन्य आर्थिक प्रलोभन में भी ऐसी भूमिका निभाते हैं। यानी कुछ न कुछ तो था, जिसके कारण उसने पत्रकारिता की निष्पक्षता और संतुलन की सीमा रेखा पार करने का काम किया। इससे समूची पत्रकारिता की किरकिरी हुई। बेजोड़ संपादक राजेंद्र माथुर पत्रकारिता के क्षेत्र में बढ़ती इस प्रवृति के खिलाफ थे। उनका कहना था कि संपादक के अपने या किसी अन्य के हित निष्पक्ष पत्रकारिता को प्रभावित करते हैं। स्वतंत्रता के बाद पत्रकारिता के इन पूर्वजों ने यदि संतुलन बिंदु पर टिके रहने के सिद्धांत प्रतिपादित किए हैं, तो उनके पीछे यही मंशा रही होगी कि आखिर इस पाक पेशे को नापाक होने से बचाए रखा जाए, लेकिन उनका पालन नहीं हुआ। जब उल्लंघन हुआ तो सारी बिरादरी बदनाम हो गई। साख दांव पर लग गई। नहीं भूलना चाहिए कि इस आंदोलन में एक दौर ऐसा भी आया था, जब कुछ संवाददाताओं और एंकरों को हड़ताली कृषकों ने कवरेज करने में सहयोग से इनकार कर दिया था । यदि आंदोलन की कवरेज कर रहे ऐसे पत्रकारों की नीयत साफ होती तो वैसे अप्रिय दृश्य देखने को नहीं मिलते।

वैसे भी बाजार तथा अन्य दबावों के चलते इन दिनों भारतीय पत्रकारिता अपनी साख के संक्रमण काल से गुजर रही है। दशकों तक बेहतरीन पत्रकारिता के नमूने प्रस्तुत करके उसने वैश्विक स्तर पर प्रतिष्ठा कमाई थी। लेकिन हालिया दौर ने उसे चोट पहुंचाई है। टेलिविजन पत्रकारिता खासतौर पर इस बिगड़ती स्थिति के लिए जिम्मेदार मानी जा सकती है। उसे समझना होगा कि आज का दर्शक पच्चीस-तीस बरस पहले का दर्शक नहीं है। वह जागरूक है और जब पत्रकार परदे पर संतुलन की मर्यादा लांघता है तो वह छिपता नहीं है। समाचार पत्र के बारे में राय बनाने के लिए तो उसका पढ़ा-लिखा होना जरूरी है, मगर टेलिविजन समाचार देखकर तो कम पढ़ा-लिखा या एकदम अनपढ़ दर्शक भी अपनी राय बना लेता है। उसे चैनल बदलने में एक सेकंड भी नहीं लगता। यह गंभीर सच परदे पर पत्रकारिता करने वालों को समझना पड़ेगा। क्या यह खतरे की घंटी नहीं है कि नौजवान पीढ़ी टेलिविजन पर खबरें देखने से करीब करीब किनारा कर चुकी है मिस्टर मीडिया!   

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

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कंटेंट के मामले में चैनलों व अखबारों को सतर्क और संवेदनशील होने की जरूरत है मिस्टर मीडिया

मिस्टर मीडिया: यह कैसा मानसिक दिवालियापन हमारे इस पेशे में दाखिल हो गया है

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‘उधार का सिंदूर’ संसद टीवी की प्रतिष्ठा नहीं बढ़ाएगा मिस्टर मीडिया!

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कंटेंट के मामले में चैनलों व अखबारों को सतर्क और संवेदनशील होने की जरूरत है मिस्टर मीडिया

विडंबना तो यह है कि इस झूठ को दबंगी के साथ फैलाने के बाद लोकतंत्र के कमोबेश सारे प्रतीकों की खामोशी रहस्यमय है। एक अपात्र से पद्म सम्मान वापस लेने का साहस भी नहीं दिखाया गया।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Tuesday, 16 November, 2021
Last Modified:
Tuesday, 16 November, 2021
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राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार ।।

हमारे देश की एक सम्मानित महिला ने एक टीवी चैनल पर कहा कि देश को आजादी भीख में मिली है। असली स्वतंत्रता तो 2014 के बाद मिली है। जब इसकी तीखी और व्यापक आलोचना हुई तो उन्होंने खेद प्रकट करना तो दूर, उल्टा यह कहा कि उस साल तो कोई युद्ध ही नहीं हुआ था तो आजादी कैसे मिली? इस मानसिक दिवालिएपन पर कोई टिप्पणी ही व्यर्थ है। मेरा सरोकार तो उस चैनल और उसकी विद्वान एंकर के विवेक तथा सामजिक-राष्ट्रीय जिम्मेदारी पर उनकी असंवेदनशीलता को लेकर है। आम तौर पर पत्रकारिता के काम में बुनियादी शिक्षा यह होती है कि आप पहले राष्ट्र की चिंता करिए, उसके बाद अपने कारोबार या व्यवसाय की। जब पद्म सम्मान से अलंकृत कोई व्यक्तित्व खुलेआम देश के लिए नुकसानदेह कथन बार-बार दोहराता हो तो चैनल के एंकर, उसके संपादक और प्रबंधक को तत्काल उस शो को ऑफ एयर करने का विवेक क्यों नहीं जागा? अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हम समर्थन करते हैं लेकिन उसके नाम पर स्वच्छंदता, उच्श्रृंखलता और अराजकता को बढ़ावा नहीं दिया जा सकता।

विडंबना तो यह है कि इस झूठ को दबंगी के साथ फैलाने के बाद लोकतंत्र के कमोबेश सारे प्रतीकों की खामोशी रहस्यमय है। एक अपात्र से पद्म सम्मान वापस लेने का साहस भी नहीं दिखाया गया। एक अभिनेता के बेटे के ड्रग मामले पर दिन रात भौंपू की तरह शोर करने वाले चैनलों को एक अभिनेत्री के एक ऐतिहासिक तथ्य के बारे में अपराध की हद को छूने वाला कुकृत्य नहीं दिखाई दिया और न ही कोई संगठन या पत्रकारिता के हितैषी महापुरुष सामने आए। शास्त्रीय बहस छेड़नी हो तो अनेक तर्क दिए जा सकते हैं। यदि आजादी भीख में मिली थी तो यह देश सरकारी स्तर पर 75 साल पूरे होने पर अमृत महोत्सव क्यों मना रहा है? बीजेपी के पितृपुरुष जैसा स्थान प्राप्त श्यामाप्रसाद मुखर्जी भारत की पहली राष्ट्रीय सरकार में क्यों शामिल हुए? यदि यह आजादी भीख में मिली तो भीख पच्चीस या पचास बरस पहले क्यों नहीं मांग ली गई?

सरदार भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, नेताजी सुभाषचंद्र बोस और महात्मा गांधी जैसे अवतार पुरुषों की कुर्बानियां बच जातीं। जलियांवाला बाग नरसंहार नहीं होता। भीख मांग लेते तो कामागाटामारू जहाज जैसा हादसा नहीं होता और कनाडा जैसा देश हिन्दुस्तान से सौ साल बाद माफी नहीं मांगता। और तो और भीख के प्रताप से मुल्क का बंटवारा भी टल जाता।

दरअसल कुछ गलती भारतीय समाज की भी है, जो मीडिया के ऐसे ब्लंडर्स पर चुप्पी साधे रहता है। टीवी चैनल और अखबार उपभोक्ता उत्पाद हैं। यदि भारत का उपभोक्ता फफूंद लगी ब्रेड बेचने के खिलाफ कोर्ट जा सकता है तो चैनलों, पोर्टलों और समाचार पत्रों के खिलाफ दूषित सामग्री परोसने पर न्यायालय की शरण लेने में देरी क्यों होनी चाहिए? इसके लिए एक जबरदस्त राष्ट्रीय उपभोक्ता आंदोलन की जरूरत है, जिस पर महान संपादक राजेंद्र माथुर जोर दिया करते थे। आज यह आंदोलन वक्त की मांग है। यदि चैनल और समाचारपत्र इस आंदोलन का सामना नहीं करना चाहते तो उन्हें कंटेंट के बारे में बेहद सतर्क और संवेदनशील होने की आवश्यकता है। मुद्रित और दृश्य माध्यमों के प्रतिनिधि संगठनों को भी इसकी जवाबदेही लेनी पड़ेगी।

चंद रोज पहले एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के पदाधिकारियों का चुनाव हुआ है। सीमा मुस्तफा और उनकी टीम ने दूसरी पारी शुरू कर दी है। इस सर्वोच्च शिखर संस्था को समाचारपत्रों और टीवी चैनलों पर इस संबंध में कारगर कदम उठाने का दबाव डालना चाहिए। अनेक समाचार पत्रों और चैनलों के संपादक इस शीर्ष संस्था के सदस्य हैं और वे किसी आभूषण की तरह सजावट की वस्तु नहीं हैं। उन्हें एक्शन लेना ही होगा। यदि उन्होंने ध्यान नहीं दिया तो फिर दो चार पीढ़ियों के बाद इस नेक व्यवसाय की बची खुची छवि भी मिट्टी में मिल जाएगी मिस्टर मीडिया!  

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

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सियासत में गलत फैसलों की भरपाई नहीं होती: राजेश बादल

सियासत की भी अपनी मनोवैज्ञानिक समझ होती है। यह कला प्रत्येक राजनेता को यूं ही हासिल नहीं होती। वर्षो की कठिन साधना के बाद ही यह हुनर प्राप्त होता है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Tuesday, 09 November, 2021
Last Modified:
Tuesday, 09 November, 2021
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राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार ।।

सियासत की भी अपनी मनोवैज्ञानिक समझ होती है। यह कला प्रत्येक राजनेता को यूं ही हासिल नहीं होती। वर्षो की कठिन साधना के बाद ही यह हुनर प्राप्त होता है। लाखों में कोई एकाध बिरला ही होता है, जो वक्त की चाल समझ पाता है। चोटी पर बैठे लीडरों के लिए तो यह और भी कठिन है। ऐसे शिखर पुरुष अपने निर्णयों को हमेशा सही मानते रहते हैं। 

सियासत के सफर में उन्हें कई फैसले लेने पड़ते हैं। लेकिन उनमें से कोई एक कब हानिकारक हो जाता है, इसका पता ही नहीं चलता। इनमें कुछ तो उसके अपने हित साधने के लिए भी होते हैं। कभी-कभी उसका अहसास राजनेता को हो जाता है, पर उसके दंभ या अहं के कारण वे बने रहते हैं। कुछ निर्णयों से हो रही क्षति की भरपाई के लिए वह कुछ कदम उठाता है, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। 

इस मामले में उसकी अपनी गलती तो होती ही है, सरकार में बैठे उसके सहयोगी और नौकरशाह भी सच से उसका संवाद नहीं कराते। वे सोचते हैं कि किसी फैसले में दोष निकालने से उनकी कुर्सी या करियर ही कहीं दांव पर न लग जाए। मौजूदा कालखंड इस मायने में रीढ़विहीन कहा जा सकता है।

हाल ही में पेट्रोल-डीजल के दामों में कटौती का निर्णय कुछ ऐसा ही है। यह फैसला लेने में सरकार से विलंब हुआ लेकिन जिस तरह से लगातार कीमतें बढ़ाई गईं, उनके पीछे कोई ठोस आधार नहीं था। अंतरराष्ट्रीय बाजार में जब कच्चे तेल के मूल्य गिर रहे थे, तब भी भारत में डीजल-पेट्रोल के मूल्य आसमान छू रहे थे। 

एक तरफ केंद्र सरकार दावा कर रही थी कि आर्थिक रफ्तार कुलांचे भर रही है, तो दूसरी ओर डायन महंगाई ने अवाम का जीना मुहाल कर दिया था। यदि देश संकट में होता, जंग हो रही होती, कोई दैवीय आपदा आई होती तो लगातार कीमतें बढ़ाने का वाजिब कारण समझ में आता। कोरोना के असाधारण आक्रमण काल को छोड़ दें तो लगातार मूल्यों में इजाफे की वजह समझ से परे है। 

विडंबना यह है कि डीजल-पेट्रोल के दाम बढ़ने से रोजमर्रा की जिंदगी में उपभोक्ता वस्तुओं के दाम भी लोगों को रुलाते हैं। दूध, सब्जी, किराना, यातायात किराया, बिजली, पानी, स्वास्थ्य सेवाएं, आवास और औद्योगिक उत्पादन सब महंगा हो जाता है। इस हिसाब से व्यवस्था-नियंताओं से बड़ी चूक हुई। 

एक जमाने में प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री ने अन्न संकट के मद्देनजर हिन्दुस्तान से प्रार्थना की थी कि वह एक समय ही भोजन करें तो करोड़ों लोगों ने एक जून का खाना छोड़ दिया था। विकट हालात में जनता भी सरकार को सहयोग करती है।

कमोबेश ऐसा ही कुछ किसान आंदोलन के बारे में है। अफसोस यह है कि लीडरान अपनी राजनीतिक पारी में ढेरों अनुचित और अनैतिक निर्णय लेते हैं मगर किसी अहं या छिपे हित के चलते सही फैसले को ताक में रख देते हैं। किसानों का आंदोलन इसी जिद का शिकार हुआ है। 

सरकार समझने को तैयार नहीं है कि वह जिस डाल पर बैठी है, उसी को काटने पर उतारू है। वक्त गुजरने के बाद गलती दुरुस्त करने का लाभ नहीं मिलता। जनता सब समझती है पर बोलती नहीं। उसके बोलने का वक्त मुकर्रर है, उसी समय वह न्यायाधीश की भूमिका निभाती है।

आजादी के बाद इतिहास में ऐसे अनेक साक्ष्य मौजूद हैं। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने आपातकाल लगाया। उस दरम्यान महंगाई काबू में आ गई थी, भ्रष्टाचार पर लगाम लगी थी। सरकारी कार्यालयों में बिना घूस काम होने लगे थे। हम लोगों ने पत्रकारिता दायित्व निभाते हुए यह दौर देखा है। विनोबा भावे जैसे संत ने यदि उसे अनुशासन पर्व कहा तो उसके पीछे यही कारण थे। 

इसके बाद भी आपातकाल के निर्णय का नुकसान इंदिरा गांधी को उठाना पड़ा। उस समय उनके सलाहकार तथा नौकरशाह रिपोर्ट देते रहे कि वे चुनाव जीत रही हैं। हालांकि खुद इंदिरा गांधी को अंदेशा था कि उनसे बड़ी भूल हुई है इसलिए उन्होंने भरपाई के लिए आम जनता से माफी भी मांगी थी और कुछ निर्णयों को ठीक करने का प्रयास किया था लेकिन तब तक काफी समय निकल चुका था। 

उन्होंने 18 जनवरी 1977 को राष्ट्र के नाम संदेश में इशारा भी किया था। वे उस दिन सफाई देने की मुद्रा में थीं पर अवाम ने 1977 के चुनाव में उन्हें सत्ता छोड़ने का आदेश दिया और इंदिरा गांधी के सारे अच्छे काम भुला दिए। इस पराक्रमी नेत्री को पटखनी देते समय मुल्क को याद नहीं रहा कि उस महिला ने देश को अनाज संकट से उबार कर हरित क्रांति की थी। देश में श्वेत क्रांति की थी और दूध उत्पादन में रिकॉर्ड कायम किया था, हिन्दुस्तान को परमाणु शक्ति बनाया था और अंतरिक्ष में किसी भारतीय ने अपने कदम उनके कार्यकाल में ही रखे थे। 

यही नहीं, बांग्लादेश को आजाद कराकर भारत को एक सीमा से स्थायी खतरे से मुक्ति दिलाई थी और सिक्किम नामक देश को भारत में शामिल करके अपना राज्य बनाया था, जो चीन के लिए करारा तमाचा था।

पंजाब में आतंकवाद का करीब-करीब खात्मा उनके जमाने में ही हो गया था। वास्तव में भारत महाशक्ति के रूप में विश्व मंच पर अवतरित हुआ तो इंदिरा गांधी का योगदान भुलाया नहीं जा सकता। मगर भारतीय मतदाता ने उन्हें उस अपराध के लिए दंडित किया, जिससे उसका अपना जीवन आसान बना था। 

एक खराब फैसला बहुत से अच्छे कार्यो पर पानी फेर देता है, इसे समझने के लिए इंदिरा गांधी से बेहतर कोई अन्य उदाहरण नहीं हो सकता। जिस तरह इंसान अपनी जिंदगी में कोई अवसर खोकर दोबारा नहीं पाता, उसी तरह सियासत में भी अवसर निकल जाने के बाद हितकारी और कल्याणकारी निर्णय कोई काम नहीं आते।

(साभार: लोकमत)

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