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भास्करहिंदी डॉट कॉम के संपादक धर्मेंद्र पैगवार का विश्लेषण, भोपाल से क्यों हारी कांग्रेस

अपने बयानों को लेकर काफी विवादों में रही थीं भोपाल में बीजेपी की कैंडिडेट प्रज्ञा ठाकुर

समाचार4मीडिया ब्यूरो 6 years ago

इस बार के लोकसभा चुनाव में बहुत कुछ अप्रत्याशित रहा। सबसे पहला तो भाजपा को 300 से ज्यादा सीटें मिलना, दूसरा अमेठी से राहुल गाँधी का हारना और तीसरा साध्वी प्रज्ञा ठाकुर का संसद पहुंचना। चुनाव पूर्व जिस तरह का रुख स्थानीय भाजपा नेताओं में प्रज्ञा को लेकर था और जिस तरह से वह बयानबाजी कर रहीं थीं, उसे देखते हुए यह कहना बेहद मुश्किल था कि भाजपा भोपाल सीट बचा पायेगी।

हालांकि, भास्करहिंदी डॉट कॉम के संपादक धर्मेंद्र पैगवार शुरू से ही कहते आ रहे थे कि भाजपा बड़े मार्जिन से यह सीट जीतेगी। उन्होंने यहां तक कहा था कि जीत का अंतर दो लाख से ज्यादा वोटों से होगा। हमने पैगवार से यह जानने का प्रयास किया कि वो इस जीत को किस नजरिये से देखते हैं और एक ऐसी सीट पर जहां साढ़े चार लाख से ज्यादा मुस्लिम वोटर हैं, वहां एक कट्टर हिंदूवादी प्रत्याशी की जीत कैसी मुमकिन हुई?

धर्मेंद्र पैगवार के मुताबिक, भोपाल में साढ़े चार लाख मुसलमान आज नहीं हुए हैं, यहां नवाबों की रियासत रही है। कांग्रेस ने यहां मुस्लिम वोटों के लिए जितने भी प्रयोग किये हैं, सभी असफल रहे हैं। नवाब मंसूर अली खान पटौदी को 1991 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने प्रत्याशी बनाया था और वह भी दो लाख से ज्यादा मतों से हारे थे। नवाब पटौदी के चुनाव प्रचार में राजीव गांधी ने सभा की थी। क्रिकेटर कपिल देव और पटौदी की पत्नी शर्मिला टैगोर भी चुनाव प्रचार के लिए आई थीं। इसके बावजूद उन्हें बेहद अंजान चेहरे सुशीलचंद्र वर्मा के हाथों शिकस्त का सामना करना पड़ा। सुशील रिटायर्ड आईएएस थे और उनकी भी भाजपा में एंट्री साध्वी की तरह हुई थी, यानी वह भी पैराशूट कैंडिडेट थे।

भोपाल में हमेशा से मतों का ध्रुवीकरण होता रहा है, फिर भले ही चेहरा कोई भी हो। यहां व्यक्ति नहीं, बल्कि पार्टी जीतती है। कांग्रेस की समस्या है कि वो हमेशा से मुस्लिम-मुस्लिम करती है, जिसकी वजह से हिंदू वोट एक पक्ष में चला जाता है। दिग्विजय सिंह ने इस बार कुछ अलग करने का प्रयास किया, मगर उनकी रणनीति में कई पेंच थे। वो बाबाओं को लेकर घूमे, उन्होंने पहले ही सोच लिया कि साढ़े चार मुस्लिम वोट उनकी झोली में आने हैं और बाबाओं के सहारे हिंदू वोटरों का कुछ प्रतिशत भी उन्हें मिलेगा, यहीं वह सबसे बड़ी गलती कर बैठे।

सोशल मीडिया पर उनके पिछले बयानों को वायरल किया जाने लगा, जो उन्होंने हिंदुओं या बाटला हाउस मुठभेड़ आदि के संबंध में दिए थे। विपक्ष यह साबित करने में सफल रहा कि दिग्गी राजा महज वोटों की खातिर हिंदू नाम जप रहे हैं। इससे हिंदू वोटरों को प्रभावित करने की उनकी कोशिशों को तो झटका लगा ही, साथ ही मुस्लिम मतदाता भी कुछ हद तक उनसे दूर चले गए। इसके अलावा उन्होंने शुरुआत में कांग्रेस विधायक आरिफ अकील से यह बयान दिलवाकर कि ‘दिग्विजय सिंह हिंदूवादी नेता हैं’, बड़ी गलती कर दी।

दूसरा, दिग्विजय किस सोच के साथ पायलट बाबा के साथ घूमे, यह भी समझ से परे रहा। पायलट बाबा का भोपाल से कोई वास्ता नहीं है, इसके बजाय यदि वह किसी स्थानीय धर्मगुरु को साथ लाते, तो उन्हें इसका फायदा मिल सकता था। इसके अतिरिक्त सबसे बड़ी बात यह रही कि इस बार का लोकसभा चुनाव हिंदू-मुस्लिम पर नहीं, बल्कि मोदी पर केन्द्रित था। नरेंद्र मोदी को ही केंद्र में रखकर चुनाव लड़ा गया। यदि चुनाव प्रज्ञा सिंह बनाम दिग्विजय सिंह होता तो निश्चित ही जीत दिग्विजय की होती, क्योंकि उन्हें राजनीति का लंबा अनुभव है। लेकिन चुनाव भाजपा बनाम कांग्रेस हो गया। इसलिए मोदी फैक्टर के सहारे प्रज्ञा जीत हासिल करने में कामयाब रहीं।

हर चुनाव में मतदाता और जागरूक होता जा रहा है और इस बार भी उसने राष्ट्रीय मुद्दों को ध्यान में रखते हुए मोदी के नाम पर वोट दिए। इतना ज़रूर है कि साध्वी के शुरूआती बयानों से भाजपा को कुछ नुकसान हुआ, मगर मोदी फैक्टर ने नुकसान की खाई को चौड़ा नहीं होने दिया। गौर करने वाली बात यह है कि सरकारी अधिकारियों के वोट भी सत्तासीन कांग्रेस के बजाय भाजपा के पक्ष में रहे। कुल मिलाकर कांग्रेस और दिग्विजय सिंह अपनी रणनीति को लेकर शुरू से ही भ्रमित रहे, उन्होंने मन में वोटों का गणित तैयार किया और उसी के इर्द-गिर्द प्रयास करते रहे, जिसका फायदा साध्वी को मिला जो पहले से ही मोदी की बदौलत फायदे में थीं। अब देखने वाली बात यह होगी कि यह शिकस्त दिग्विजय के राजनीतिक करियर को कहां ले जाती है।

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