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अरुण जेटली को राजदीप सरदेसाई ने यूं किया याद, उनकी दिसंबर की पार्टी होती थी खास
उनका सेंस ऑफ ह्यूमर गजब था। एक बार उनके पास बैठ जाओ तो बहुत सी इनसाइट स्टोरीज का पता चलता। मैं अक्सर उनसे कहता था कि सर आप अगर इन कहानियों को लेकर एक किताब लिख दो तो वे तो पक्का बेस्टसेलर होगी ही
समाचार4मीडिया ब्यूरो 6 years ago
राजदीप सरदेसाई, वरिष्ठ पत्रकार
मुझे लगता है कि दिल्ली में बहुत कम पत्रकार ऐसे होंगे जो पॉलिटिक्स कवर करते हो और उनका वास्ता अरुण जेटली से न रहा हो। जेटली की खासियत थी कि उनके पत्रकारों के साथ बहुत अच्छे संबंध रहते थे। वे कई घंटों तक ससद भवन में पत्रकारों के साथ बतियाते रहते थे। जटली की विशेषता थी कि चाहे व सत्ता में रहे या विपक्ष में, पत्रकारों के साथ उनका संपर्क हमेशा बना रहता था। जहां आज कई नेता सत्ता में आने के बाद वीवीआईपी कल्चर का हिस्सा बन जाते हैं, ऐसे में जेटली इस कल्चर से कोसो दूर थे, वे पत्रकारों के साथ घंटा-डेढ़ घंटा खूब बतियाया करते थे। उनके पास कहानी-किस्सों का खजाना था, जिसे वे पत्रकारों के साथ खुलकर शेयर करते थे।
भारतीय राजनीति के हर दौर का वे अहम हिस्सा रहे। इमरजेंसी में जेल गए, तो बोफोर्स में राजीव गाधी के खिलाफ रहे, वीपीसिंह, अटल बिहारी बाजपेयी और नरेंद्र मोदी के दौर में राजनीति के अहम किरदार रहे।
उनका सेंस ऑफ ह्यूमर गजब था। एक बार उनके पास बैठ जाओ तो बहुत सी इनसाइट स्टोरीज का पता चलता। मैं अक्सर उनसे कहता था कि सर आप अगर इन कहानियों को लेकर एक किताब लिख दो तो वे तो पक्का बेस्टसेलर होगी ही। पर दुर्भाग्य कि अब उनके साथ ये सब कहानी-किस्से भी अतीत में समा गए।
अगर जेटली वकील नहीं होते, तो मेरा मानना है कि वे बहुत अच्छे पत्रकार बनते। खबरों के मामले में वे बहुत जानकार थे। वे स्टूडियो डिबेट में माहिर थे। मुझे याद है कि जब मेरे शो ‘बिग फाइट’ में अरुण जेटली, कपिल सिब्बल और सीताराम येचुरी आते थे, तो क्या जबर्दस्त शो होता था वो। सब एक से बढ़कर एक तर्क रखते थे। कई बार तो एंकर को शो में कुछ करना ही नहीं होता, ये गेस्ट ही शो को आगे बढ़ा देते थे। स्टूडियो डिबेट में जहां वे एक दूसरे के विरोधी नजर आते, तो डिबेट खत्म होने के बाद आपस में खूब गपियाते। जेटली की बड़ी खासियत ये भी थी कि अंग्रेजी हो या हिंदी, दोनों भाषाओं पर उनकी बढ़िया कमान थी, इसलिए हर टीवी चैनल उन्हें अपने शो में लाना चाहता था। वे जब मंत्री भी बने तो भी उन्होंने कभी स्टूडियो डिबेट से किनारा नहीं किया। वे आज के मंत्रियों के तरह ओबी वैन या वन टू वन इंटरव्यू की मांग नहीं करते थे। उन्होंने कभी एटिट्यूड शो नहीं किया।
जेटली खुले व्यक्तित्व के इसान थे। बहुत बड़े दिल वाले व्यक्ति थे। सामान्य लोगों से भी खूब बात करते थे। हमारे वॉकिंग क्लब में वे ही वीवीआईपी थे यानी कहने का मतलब ये है कि वे हम सब साधारण लोगों के साथ सुबह टहलते थे और कहानी-किस्से शेयर करते थे। बातों के शौकीन जेटली से मैं अक्सर कहता भी था कि आप वॉक कम, टॉक ज्यादा करते हैं। शनिवार को वॉकिंग के बाद हम सब मिलकर खाना भी खाते थे। सर्दी में भी सुबह 7 बजे पार्क में पेड़ के नीचे बैठकर वो कई रोचक बातें बताते थे।
हर साल दिसंबर के आखिरी हफ्ते या जनवरी के पहले हफ्ते वे एक पार्टी देते थे। इस पार्टी की खासियत थी कि इसमें उनके सभी पुराने दोस्त आमंत्रित होते थे। 25-30 सालों से वे जिसे जानते थे, उसे भूलते नहीं थे। अमृतसरी कुलछा से लेकर भेजाफ्राई समेत कई नोर्थ इंडियन डिसेज इस पार्टी के मेन्यू में होती। वे खाने के बड़े शौकीन थे।
वे बड़े दिलवाले थे। हर राजनैतिक दल में उनके दोस्त थे। जीएसटी ऐसा विधेयक था, जिसे सरकार आम सहमति मे पास करवाना चाहती थी और ऐसे में अरुण जेटली ने एक बड़ी भूमिका निभाई थी। उनके बड़प्पन की एक बात और याद आ रही है। जब 2014 में मेरी बुक लॉन्च का कार्यक्रम था, तो लोग कह रहे थे कि बीजेपी ने मेरा बहिष्कार किया है, इसलिए अरुण जेटली उस कार्यक्रम में नहीं आएंगे। पर न सिर्फ अरुण जेटली उस कार्यक्रम का हिस्सा बने, बल्कि उन्होंने चिदंबरम के साथ मंच भी शेयर किया। ये उनका बड़प्पन था कि वे निजी रिश्तों को बहुत अहमियत देते थे।
पढ़ने की रुचि उन्हे बहुत थी। खूब किताबें पढ़ते थे। न्यूजपेपर के आर्टिकल्स भी अक्सर पढ़ते थे। न्यूज चैनल्स पर भी नजर रहती थी उनकी। कई बार फोन करके पत्रकारों को बताते थे कि आपका फलां शो बढ़िया रहा या फलां शो ठीक नहीं था। मैं तो उनमे एक अच्छा एडिटर भी देखता था, वे खबरें पर बारीकी से नजर रखते थे।
एक और चीज जो अरुण बहुत पसंद करते थे, वो था क्रिकेट। जब वो वित्तमंत्री थे और अगर कोई क्रिकेट मैच चल रहा हो तो उनके एक टीवी पर बिजनेस चैनल और दूसरे पर स्पोर्ट्स चैनल हमेशा चलता मिलता था। मुझे याद है कि जब सहवाग दिल्ली की टीम का हिस्सा बने थे, तो जेटली ने मुझसे कहा था कि ये लड़का एक दिन नेशनल टीम में खेलेगा।
एक बड़ी बात ये भी है कि जब कोई मुसीबत में होता और उनके पास जाता, तो वे हमेशा मदद करते। मुझे पता है कि कई पत्रकार-संपादकों के कहने पर उन्होंने कई मुसीबत के मारे लोगों की सहायता की है। वे अपने स्टाफ का भी बहुत ध्यान रखते थे। स्टाफ के लोगों के परिवार की भी पूरी मदद करते थे। अरुण जेटली खाना खिलाने और मदद करने के लिए हमेशा त्तत्पर रहते थे।
अगर एक लाइन में कहूं तो अरुण जेटली मास लीडर भले ही न बने हो, लेकिन वो ऐसे पॉलिटिकल ऑलराउंडर थे जिन्होंने सबका साथ, सबका विश्वास अपने जीवन में हमेशा आगे रखा। पार्टी से लेकर परिवार तक, पत्रकारों से लेकर वकीलों तक, सब उनकी दुनिया में शामिल थे।
बड़ा दिल, बड़ी शख्सियत, जो दोस्ती निभाना जानते थे।
(अभिषेक मेहरोत्रा से बातचीत पर आधारित)
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