दो नावों पर सवारी करने में माहिर थे अरुण जेटली

वह अक्सर मुझसे कहते थे कि जो लोग हर छोटी-छोटी बात पर मानवाधिकारों की दुहाई देते हुए सुप्रीम कोर्ट जाते हैं, वे अंततः देश को कमजोर कर रहे हैं

Last Modified:
Sunday, 25 August, 2019
Arun jaitley

भूपेंद्र चौबे, वरिष्ठ टीवी पत्रकार

‘दिल्ली का एक ऐसा सूत्र’ जिसे लगभग हर व्यक्ति के बारे में कुछ न कुछ पता होता था। कॉरपोरेट टाइकून से लेकर पत्रकार, क्रिकेटर, कलाकार और कानूनविद तक जेटली का मिलना जुलना सभी से था। उनका दायरा इतना विस्तृत था कि आपके लिए यह पता लगाना मुश्किल हो जाता था कि आप उसमें कहाँ शामिल होते हैं।

लेकिन जैसा कि आज मैं स्टूडियो में बैठा हूं, उनकी पार्टी के साथियों और ऐसे लोगों से बात कर रहा हूं, जिनकी जिंदगी में जेटली की एक अलग ही भूमिका थी, मैं यह कह सकता हूं कि जेटली एक ऐसे राजनेता थे, जिसके पास दूसरों को विशेष महसूस कराने की अद्वितीय क्षमता थी।

आप संपादकों से लेकर जूनियर पत्रकारों तक के ट्विटर या फ़ेसबुक पोस्ट को देखकर यह अंदाज़ा लगा सकते हैं कि हर किसी के पास जेटली के बारे में कुछ न कुछ है। मेरे पास मेरा भी है, लेकिन उस पर बाद में बात करेंगे। क्या हमें जेटली को एक ऐसे उदार चेहरे के रूप में देखना चाहिए जिन्होंने रणनीति को "कठिन राष्ट्रवाद" के रूप में बदल दिया, और 2014 स के बाद राजनीतिक ज़रूरत बन गया? 

एक ऐसा व्यक्ति जो बेबाक था, फिर चाहे सत्तापक्ष में हो या विपक्ष में। भाजपा के संक्रमण काल में यह सच स्वीकारने का साहस केवल उन्हीं में था कि पार्टी अलगाव की स्थिति में इसलिए पहुंची है, क्योंकि वह दूसरे दलों को अपने साथ जोड़ने में उतनी सफल नहीं हुई, जितनी कि होना चाहिए था। जेटली हमेशा दो नावों पर सवारी करते थे, और हमेशा उसमें कामयाब भी रहे। किसी भी मुद्दे पर वह हर दृष्टिकोण से विचार करते और फिर उसके अनुरूप आगे बढ़ते। सबरीमाला विवाद पर भी उन्होंने ऐसा ही किया था। वह मानते थे कि संविधानविदों की नज़र में सुप्रीम कोर्ट पहले आता है और भगवान बाद में, लेकिन आस्था में विश्वास रखने वालों की सोच इसके विपरीत होगी। आमतौर पर कहा जाता है कि दो नावों की सवारी नहीं करनी चाहिए, लेकिन जेटली ने कभी इन ‘आम’ बातों पर गौर नहीं किया। बल्कि उन्होंने यह सिद्ध किया कि दो नावों की सवारी, निरंतर विकसित होने और अपने आप को पुन: उत्पन्न करने के लिए एक अद्वितीय राजनीतिक गुण है।  

वह अक्सर मुझसे कहते थे कि जो लोग हर छोटी-छोटी बात पर मानवाधिकारों की दुहाई देते हुए सुप्रीम कोर्ट जाते हैं, वे अंततः देश को कमजोर कर रहे हैं। लेकिन यह तब था जब वह सत्ता में थे। जबकि विपक्ष में रहने के दौरान उन्होंने 2012 -13 में जंतर-मंतर जाने से पहले एक बार भी नहीं सोचा, ये वो दौर था जब अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार विरोधी धर्मयुद्ध अपने चरम पर था। अरविंद केजरीवाल बाद में उनके प्रतिद्वंद्वी बन गए, लेकिन जेटली को उस वक़्त सत्ताविरोधी आवाजों से सुर मिलाने में कुछ गलत नहीं लगा।

मुझे लगता है कि राजनीतिक बातों से इतर, भोजन के प्रति जेटली के प्रेम को रेखांकित किए बिना उन्हें दी जाने वाली हर श्रद्धांजलि अधूरी होगी। जैसा कि अभिषेक मनु सिंघवी ने मुझसे ‘सीएनएन न्यूज 18’ पर बात करते हुए कहा, ‘अरुण जेटली के जीवन में खाने-पीने से जुड़े कई रोचक किस्से थे।’ ‘एम्बेसी रेस्टोरेंट’ उनका पसंदीदा रेस्टोरेंट था। जहां वह अक्सर मटन रारा या दाल का लुत्फ़ उठाते। छोले भटूरे उन्हें बेहद पसंद थे, इतना ही नहीं वह आपको ये भी बता सकते थे कि दिल्ली में सबसे अच्छा कीमा कहां मिलता है।

जेटली के साथ बात करने का अपना अलग ही रोमांच होता था, फिर चाहे विषय कोई भी हो। मैं अक्सर मजाकिया अंदाज़ में उनसे कहा करता था कि यदि वह राजनीतिज्ञ नहीं होते तो एक उत्कृष्ट संपादक बनते। मीडिया के साथ उनके समीकरणों को लेकर आलोचक उन्हें निशाना भी बनाते रहते थे। उन्हें ‘मीडिया ब्यूरो चीफ’ कहा जाता था, लेकिन जेटली इससे बिल्कुल भी विचलित नहीं होते, बल्कि उन्हें अपने इस नए नाम पर गर्व होता था।

एक ही समय में विविध क्षेत्रों से जुड़ने की अपनी क्षमता के चलते अरुण जेटली ने एक ऐसा स्थान हासिल कर लिया था, जिस तक पहुंचना किसी भी समकालीन राजनीतिज्ञ के लिए मुश्किल है। उन्होंने अपने जीवन में भले ही कोई लोकसभा चुनाव नहीं जीता, लेकिन यह सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई कि उनके पार्टी के उम्मीदवार बार-बार चुनकर आते रहें। उनके निधन से भाजपा ने अपने सबसे अच्छे रणनीतिकार और भारतीय राजनीति के चाणक्य को खो दिया है।
 

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इस ओर ध्यान नहीं दिया तो किसी दिन भारी ब्लंडर हो जाएगा मिस्टर मीडिया!

गुरुवार को एक खबर भारत की प्रतिष्ठित एजेंसी ‘प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया’ से प्रसारित हुई। इसके मुताबिक भारतीय सेना ने पाक अधिकृत कश्मीर में एयर स्ट्राइक की है।

राजेश बादल by
Published - Friday, 20 November, 2020
Last Modified:
Friday, 20 November, 2020
Mister Media

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।

गुरुवार को एक खबर भारत की प्रतिष्ठित एजेंसी ‘प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया’ (पीटीआई) से प्रसारित हुई। इसके मुताबिक भारतीय सेना ने पाक अधिकृत कश्मीर में एयर स्ट्राइक की है। देखते ही देखते जंगल में आग की तरह यह समाचार फैल गया। सोशल मीडिया के तमाम अवतारों पर और कुछ टीवी चैनलों ने इसे ब्रेक कर दिया। लेकिन शाम होते होते डायरेक्टर जनरल (मिलिट्री ऑपरेशंस) ने इसका खंडन जारी कर दिया।

‘प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया’ भारत की ऐसी समाचार एजेंसी है, जिसकी साख दशकों से दुनिया भर में है। इसकी खबर सौ फ़ीसदी सत्यता की गारंटी मानी जाती रही है। सरकारी मंत्रालय और आला अफसर तक पीटीआई के समाचार पर आंख मूंदकर भरोसा करते रहे हैं। जब ऐसी संस्था से गलत जानकारी जारी हो जाती है तो आप अंदाजा लगा सकते हैं कि राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसकी प्रतिक्रिया कैसी होगी? ताज्जुब है कि इस समाचार संस्था ने खंडन तो जारी किया मगर खेद प्रकट करने की जरूरत तक नहीं समझी। इन दिनों ‘प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया’ पर वैसे भी संकट के बादल मंडरा रहे हैं। ऐसे में असत्य सूचना से उसकी छवि पर यकीनन आंच आएगी। एजेंसी से यह देश जानने का हक रखता है कि इतना संवेदनशील समाचार उसने किस आधार पर जारी किया?

गौरतलब यह है कि जम्मू कश्मीर प्रदेश में आने वाले दिन स्थानीय चुनाव की सरगर्मियों से भरे होंगे। इसके बाद बंगाल राज्य के विधानसभा चुनाव सिर पर हैं। इस चुनावी माहौल में सियासी फ़ायदा उठाने के लिए कुछ राजनीतिक दल और असामाजिक तत्व अक्सर झूठे समाचारों के जरिये अफ़वाहों का बाजार गर्म करने का प्रयास करते हैं। जाहिर है कि वे पत्रकारों के कंधे पर से बंदूक चलाते हैं। उनका उल्लू सीधा हो जाता है,  लेकिन पत्रकारिता को नुक़सान हो जाता है।

गंभीर प्रश्न यह है कि पत्रकारिता में हमेशा तथ्य की दोबारा पड़ताल करने और जांचने की समझाइश दी जाती है। राष्ट्रीय सुरक्षा और सैनिक ऑपरेशन जैसे संवेदनशील मामलों में तो यह और भी आवश्यक है कि प्राप्त सूचना को क्रॉस चेक किया जाए। एजेंसी को अपनी साख के कारण इस पर ध्यान देना जरूरी था। यह नहीं हुआ। पीटीआई की खबर थी, इसलिए चैनलों के पास अविश्वास करने का कोई आधार नहीं था। गनीमत थी कि यह समाचार उसने दिन में जारी किया। इससे अखबारों में छपने से पहले ही डीजीएमओ ने उसके गलत होने का प्रतिवाद जारी कर दिया। यदि यही सूचना रात में जारी होती तो बेहद मुश्किल हो जाती। अखबारों और सोशल मीडिया के तमाम अवतारों को भी अब यह ध्यान देना पड़ेगा कि एजेंसी की खबर की भी सरकारी या अधिकृत प्रवक्ता से पुष्टि कर ली जाए। बिना जांच पड़ताल के खबर प्रकाशित और प्रसारित करना तो अपराध ही है। इस पर ध्यान नहीं दिया तो किसी दिन भारी ब्लंडर हो जाएगा मिस्टर मीडिया!

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल की 'मिस्टर मीडिया' सीरीज के अन्य कॉलम्स आप नीचे दी गई हेडलाइन्स पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं-

अरनब की गिरफ्तारी पर बोले वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल, अनुचित था पुलिस का यह तरीका

सरकार की गोद में बैठना या हरदम तलवार तानना संतुलित पत्रकारिता नहीं मिस्टर मीडिया!

मिस्टर मीडिया: TRP के खेल में उलझ गया बाजार!

मिस्टर मीडिया: क्या पत्रकारिता भी संसदीय पत्रकारिता के मापदंडों की अवहेलना पर उतर आई है?

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भारत-अमेरिकी संबंध: रिश्ते देश से होते हैं न कि किसी व्यक्ति से: पूरन डावर

डोनाल्ड ट्रम्प के अमेरिकी राष्ट्रपति के रूप में विश्व में उस देश की छवि बिगड़ी है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Saturday, 07 November, 2020
Last Modified:
Saturday, 07 November, 2020
PuranDabar

पूरन डावर, चिंतक एवं विश्लेषक।।

डोनाल्ड ट्रम्प के अमेरिका के राष्ट्रपति के रूप में अमेरिका की छवि विश्व में बिगड़ी है। पहले चुनाव में जब अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव के लिए ट्रम्प की प्रत्याशी के रूप में घोषणा हुई थी। मैं अमेरिका में ही व्यावसायिक भ्रमण पर था और उनका पहला भाषण टीवी पर सुनकर लगा कि ऐसा व्यक्ति अमेरिका का राष्ट्रपति कभी हो ही नहीं सकता। भारतीय राजनीति से भी कहीं नीचा स्तर और मेरे दिमाग में अमेरिका की इमेज सदैव ब्रह्मा जी की तरह रही। मेरा मानना था कि अमेरिकी जनता ऐसे व्यक्ति को कभी स्वीकार कर ही नहीं सकती।

उसके बाद पूरा चुनाव फॉलो ही नहीं किया। यदा कदा मेरे एक मित्र मुझे बताते थे कि ट्रम्प जीत रहा है तो मैं उन पर बिगड़ जाता और कहता कि अमेरिका भारत नहीं है, ऐसा हो ही नहीं सकता, लेकिन ऐसा ही हुआ। अमेरिका में अधिकांशतः हर राष्ट्रपति को दो टर्म मिले हैं। अमेरिका ने गलती सुधारी और एक टर्म में उतरना पड़ा। हालांकि जो बिडेन का स्तर भी कमोबेश एक सा है।

विश्व में अमेरिका के आधिपत्य के ह्रास के लक्षण हैं। स्पष्ट है कि जहां तक भारत के अमेरिका से संबंध की बात है तो दोनों विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र हैं। दोनों को सदैव एक-दूसरे की आवश्यकता है। ओबामा से भी उतने ही संबंध थे, ट्रम्प से भी हैं और अब बिडेन से भी रहेंगे। वैसे भारत सहित एशियंस ने ट्रम्प को कतई वोट नहीं किया। उनके रहते सबकी नौकरियां-वीजा खतरे में थे। जहां तक मोदी जी की बात है, उन्हें ट्रम्प हों या बिडेन कोई फर्क नहीं पड़ता। रिश्ते देश से होते हैं, न कि किसी व्यक्ति से। कल ट्रम्प थे, आज मोदी हैं कल कोई और...।

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अरनब की गिरफ्तारी पर बोले वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल, अनुचित था पुलिस का यह तरीका

मुंबई में रिपब्लिक टीवी के संपादक अरनब गोस्वामी की गिरफ्तारी के बाद पत्रकारिता जगत में एक नई बहस चल पड़ी है

राजेश बादल by
Published - Thursday, 05 November, 2020
Last Modified:
Thursday, 05 November, 2020
Rajesh Badal

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार ।।

मुंबई में रिपब्लिक टीवी के संपादक अरनब गोस्वामी की गिरफ्तारी के बाद पत्रकारिता जगत में एक नई बहस चल पड़ी है। एक वर्ग अरनब पर इस कार्रवाई के खिलाफ है और मानता है कि अरनब गोस्वामी लगातार महाराष्ट्र सरकार को निशाने पर लेते हुए चैनल में खबरें और बहसें चला रहे थे। इस वजह से यह एक्शन हुआ। दूसरा धड़ा यह मानता है कि अरनब अपनी पत्रकारिता में संतुलन का पालन नहीं कर रहे थे। उन्होंने महाराष्ट्र सरकार, शिवसेना और कांग्रेस के खिलाफ निंदनीय अभियान छेड़ दिया था। यह एक पक्षीय पत्रकारिता इस पेशे के सिद्धांतों का पालन नहीं करती। इसलिए ऐसी कार्रवाई तो होनी ही थी।

दोनों पक्ष अपनी अपनी जगह सच हैं, लेकिन मेरा नजरिया कुछ हटकर है। मेरा निवेदन है कि जब हम पत्रकारिता के पेशे में कदम रखते हैं तो खोजी, निष्पक्ष और साहसी पत्रकारिता के लिए सरकार या किसी अन्य पक्ष की ओर से बदले की कार्रवाई के लिए भी तैयार रहते हैं। अगर आप किसी पर हमला करते हैं तो वह पक्ष जवाबी कार्रवाई के लिए आजाद है। ऐसी स्थिति में लोकतांत्रिक भावना पत्रकार को संरक्षण देने की होनी चाहिए। पर यह संरक्षण उसके कर्तव्य निर्वहन के कारण ही मिलना चाहिए। अरनब गोस्वामी को उनके पत्रकारिता कर्म के कारण हिरासत में नहीं लिया गया है। वह एक आपराधिक मामला है, जो पहले से चल रहा था। किसी आपराधिक कृत्य के लिए किसी पत्रकार को अपनी बिरादरी, समाज अथवा सरकार से संरक्षण नहीं मिलना चाहिए। हम तहलका के संपादक के मामले में यह देख चुके हैं।

पर मुंबई पुलिस ने जिस तरीके से हिरासत में लिया, वह उचित नहीं था। अरनब का कोई आपराधिक इतिहास नहीं था और न ही वे कोई शातिर बदमाश हैं। वैसे तो भारतीय दण्ड संहिता भी किसी अपराधी तक को इस तरह अरेस्ट करने की अनुमति नहीं देती। इसलिए मैं कहूंगा कि अरनब गोस्वामी की गिरफ्तारी का तरीका अनुचित है। मगर महाराष्ट्र पुलिस का यह कदम देश के पत्रकारों के लिए यह गंभीर संदेश है कि अगर वे संतुलन की लक्ष्मण रेखा लांघेंगे तो फिर किसी भी कार्रवाई के लिए तैयार रहें मिस्टर मीडिया!

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

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अरनब की गिरफ्तारी पर बोले डॉ. अनुराग बत्रा, मीडिया के लिए इससे बुरा दौर नहीं हो सकता

चुप रहने से ज्यादा किसी मुद्दे पर अपनी आवाज उठाना ज्यादा सही है। मीडिया में मेरे मित्रों, यह समय आगे बढ़कर अपनी बात रखने का है। इसे अपने लोकतंत्र के लिए काला दिवस कहा जा सकता है

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Wednesday, 04 November, 2020
Last Modified:
Wednesday, 04 November, 2020
Arnab Goswami

डॉ. अनुराग बत्रा, चेयरमैन व एडिटर-इन-चीफ, एक्सचेंज4मीडिया ग्रुप ।।

चुप रहने से ज्यादा किसी मुद्दे पर अपनी आवाज उठाना ज्यादा सही है। मीडिया में मेरे मित्रों, यह समय आगे बढ़कर अपनी बात रखने का है। इसे अपने लोकतंत्र के लिए काला दिवस कहा जा सकता है और इस तरह का कृत्य कल को किसी दूसरे के घर को भी निशाना बना सकता है। हमारे लोकतंत्र में, कानून का शासन सर्वोपरि है और यह सिर्फ मीडिया प्रोफेशनल्स और पत्रकारों पर सबसे ज्यादा लागू होता है। इसलिए, मीडिया और देश में हम सभी के लिए अरनब गोस्वामी को गिरफ्तारी के दौरान घसीटे जाने और उनसे दुर्व्यवहार किए जाने के जो दृश्य देखने को मिले हैं, उनके खिलाफ आगे आना चाहिए। अरनब की गिरफ्तारी के दौरान जिस तरह के दृश्य देखने को मिले, वह मुझे काफी हैरान और परेशान करने वाले लगे।

पिछले करीब आठ हफ्तों से टीआरपी पर विवाद और न्यूज चैनल्स व मीडिया संगठनों के बीच झगड़ा देखने को मिल रहा है, लेकिन एक्सचेंज4मीडिया के रूप में हमने तथ्यात्मक और संतुलित रुख अपनाए रखा है। हमारा मानना है कि सही चीजों को सही कारण के लिए और सही तरीके से करना चाहिए और हमने वही किया है।

हालांकि आज जो कुछ भी हुआ, वह काफी डराने वाला है। हम इस तरह के दृष्टिकोण से सहमत नहीं हैं। अगर मुंबई में अरनब के साथ ऐसा हो सकता है तो नोएडा में किसी भी मीडिया मालिक या संपादक, पत्रकार या देश के किसी भी हिस्से में किसी भी अन्य मीडिया पेशेवर के साथ ऐसा हो सकता है।

इससे बुरी मिसाल नहीं हो सकती

मैंने एक सम्मानित मीडिया कंपनी के और बेहद ही संतुलित सीईओ को फोन किया, जिन्हें मैं अपना मित्र कहता हूं और उन्होंने मुझसे कहा कि मुझे यह कॉलम नहीं लिखना चाहिए। उन सीईओ ने मुझसे कहा कि उन्हें (अरनब को) आत्महत्या के एक पुराने मामले में गिरफ्तार किया गया है। मैं अपने दोस्त और आप सभी से कहता हूं कि आज जो कुछ हुआ और पुराने मामले को महत्वहीन नहीं बताया जाना चाहिए और इसे प्राथमिकता के तौर पर देखा जाना चाहिए। यह पुराना केस था जिसे बंद कर दिया गया था। लोग ये मानेंगे कि इसे सामान्य के अलावा अन्य कारणों से फिर से खोला गया।

मैं यहां दो अक्टूबर 2020 को लोकतंत्र के सबसे बड़े मंदिर सुप्रीम कोर्ट के बयान का उल्लेख करना चाहता हूं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था,  'उकसाने के अपराध में दोषी ठहराने के लिए अपराध विशेष को अंजाम देने की मनोदशा दिखनी चाहिए।'

अरनब को साथ दुर्व्यवहार और बाद में उनकी गिरफ्तारी पुलिसिया कार्यशैली का सबसे खराब उदाहरण है और यह सरकारी मशीनरी और शक्ति का दुरुपयोग है। मीडिया प्रोफेशनल्स के रूप में यह हमारा कर्तव्य कि हम इसके खिलाफ अपनी आवाज उठाएं, भले ही हमें इस तरह की पत्रकारिता पसंद हो अथवा नहीं।

फ्रांसीसी दार्शनिक वोल्टेयर (Voltaire) का कहना था, ‘हो सकता है कि मैं आपके विचारों से सहमत न हो पाऊं। परन्तु विचार प्रकट करने के आपके अधिकार की रक्षा करूंगा।’

मुझे आज भी यह याद है। मैं किसी भी प्रोफेशनल, पत्रकार, मीडिया मालिक के साथ खड़ा रहूंगा, भले ही मैं उनके संपादकीय विचारों से असहमत होऊं। यदि अरनब गोस्वामी जैसी मीडिया हस्ती इस तरह की पुलिसिया बर्बरता और सत्ता के दुरुपयोग का शिकार हो सकती है, तो हमें मीडिया के रूप में इसके खिलाफ आवाज उठानी चाहिए। चुप रहना मेरे या हमारे लिए कोई विकल्प नहीं है, न ही आपमें से किसी के लिए एक विकल्प होना चाहिए।

कुछ अन्य प्रमुख मीडिया मालिकों के खिलाफ भी विभिन्न तरह की जांच चल रही हैं। यह मानकर चलना चाहिए कि उनके साथ भी भविष्य में इस तरह हो सकता है। इसलिए उन सभी को अरनब का समर्थन करना चाहिए ताकि भारतीय मीडिया की रीढ़ न टूटे।

लोकतंत्र की रक्षा करने वालों और कानून की नुमाइंदगी करने वालों ने खुद का आज एक बुरा चेहरा दिखाया है।

भारतीय मीडिया प्रोफेशनल्स के रूप में हमारे विभिन्न दृष्टिकोण  अथवा विचारधाराएं हो सकती हैं, लेकिन आज जो कुछ हुआ, उसकी एकतरफा निंदा किए जाने और अरनब को सुरक्षित रखने व न्याय दिलाने में मदद करने का समय है। 

मुझे आज महात्मा गांधी की वह बात याद आ रही है, जो उन्होंने कई दशक पहले कही थी-

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मीडिया में एंटरप्रिन्योर बनने के लिए यह सबसे अच्छा समय है: डॉ. अनुराग बत्रा

28 अक्टूबर को माखनलाल यूनिवर्सिटी के तीन दिवसीय कार्यक्रम के समापन सत्र के दौरान  'बिजनेस वर्ल्ड' और 'एक्सचेंज4मीडिया' ग्रुप के चेयरमैन व एडिटर-इन-चीफ डॉ. अनुराग बत्रा ने भी अपने विचार व्यक्त किए।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Thursday, 29 October, 2020
Last Modified:
Thursday, 29 October, 2020
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देश के विख्यात माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में 26 अक्टूबर से नवागत विद्यार्थियों के आत्मीय प्रबोधन और करियर मार्गदर्शन के लिए तीन दिवसीय ‘सत्रारंभ 2020’ का आयोजन किया गया। कार्यक्रम के तीसरे दिन 28 अक्टूबर को समापन सत्र के दौरान 'बिजनेस वर्ल्ड' और 'एक्सचेंज4मीडिया' ग्रुप के चेयरमैन व एडिटर-इन-चीफ डॉ.अनुराग बत्रा ने भी नवागत विद्यार्थियों के लिए अपने विचार व्यक्त किए।

‘मीडिया मैनेजमेंट’ विषय पर डॉ. अनुराग बत्रा ने कहा कि अगर मीडिया में रहना चाहते हैं तो जितना हो सके मीडिया को पढि़ए, मीडिया को देखिए और मीडिया को सुनिए। उन्होंने कहा कि मीडिया में उद्यमी बनने के लिए यह सबसे अच्छा समय है। एक सफल मीडिया एंटरप्रिन्योर बनने के लिए जुनून, सकारात्मकता और उद्देश्य प्रमुख हैं। उन्होंने नवागत विद्यार्थियों की जिज्ञासाओं का समाधान करते हुए कहा कि आप लक्ष्य बनाइए, महत्वाकाक्षांए पालिए, ऊर्जा अपने आप आएगी।

नवागत विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि मूलभूत रूप से हम कॉन्टेंट किएटर्स हैं। कॉन्टेंट को चाहे ऑडियो, वीडियो या फिर टेक्स्ट के जरिए क्रीएट किया जाए, लेकिन उसका डिस्ट्रीब्यूशन जरूरी है फिर चाहे वह किसी भी माध्यम से ही क्यों न किया जाए। उन्होंने कहा कि 14 साल पहले मैंने एक कॉलम लिखा था, जोकि आज के दौर के हिसाब से बिल्कुल फिट बैठता है। डॉ. बत्रा ने बताया कि उन्होंने उस कॉलम में ‘टीएमटी’ का जिक्र किया था, जिसका मतलब था टेलीकॉम, मीडिया और टेक्नोलॉजी। इसमें बताया था कि ये आने वाले समय में एक साथ आएंगे और इसका रूपांतरण होगा, जो सही मायनों में हुआ भी। ऐडवर्टाइजिंग मैडिसन रेवेन्यू बन गया है, एंटरटेनमेंट कॉन्टेंट का मतलब हॉलीवुड से है और टेक्नोलॉजी सिलिकॉन वैली बन गया है। उन्होंने कहा कि आज हर कोई एक मीडिया ब्रैंड है। कोई भी डोमेन एक्सपर्ट एक मीडिया ब्रैंड्स बना सकते हैं।  

माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के सत्रारंभ-2020 के समापन सत्र में महात्मा गांधी केन्द्रीय विश्वविद्यालय, मोतिहारी के कुलपति प्रो. संजीव शर्मा ने‘संचार में शोध: भारतीय दृष्टि’ विषय पर नवागत विद्यार्थियों को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि शोध एक गंभीर मुद्दा है इसलिए उसमें एक दृष्टि होना आवश्यक है। शोध एक उपाधि प्राप्त करना नहीं है, बल्कि वह तपस्या है। यह बहुत परिश्रम और गहन अध्ययन का विषय है। भारतीय संदर्भों के बिना भारतीय समाज को समझना मुश्किल है। इसलिए शोध में भारतीय दृष्टिकोण महत्वपूर्ण है। मनुष्य जैसे-जैसे शास्त्र के पास जाता है, वैसे-वैसे वह जानने लगता है, उसे बोध होने लगता है, विज्ञान की समझ बढ़ती है।   

प्रो. संजीव शर्मा ने कहा कि पढऩा ही पर्याप्त नहीं, यह आवश्यक है कि हमने जो पढ़ा है उसका बोध कितना है। जो सीखा है, उसको आत्मसात कर, उसे अभिव्यक्त करने की क्षमता विकसित करना भी जरूरी है। हमारा अध्ययन हमारी समझ को विकसित करता है। उन्होंने कहा कि भारतीय दर्शन कहता है कि सत्य बोलना ही महत्वपूर्ण नहीं है, अपितु उसकी प्रस्तुति भी महत्व रखती है। हमारी प्रस्तुति सुरुचिपूर्ण हो। भाषा शुद्ध हो। शब्दों के चयन में बहुत सावधानी रखनी चाहिए। उन्होंने कहा कि पत्रकारों को भी कोई सूचना को समाचार के रूप में प्रकाशित करने से पहले पर्याप्त जानकारी प्राप्त कर लेना चाहिए ताकि बाद में उसके लिए खेद प्रकट न करना पड़े।

समापन सत्र में माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. केजी सुरेश ने कहा कि कुछ लोगों ने गूगल सर्च को ही रिसर्च समझ लिया है। शोध एक वृहद विषय है। उन्होंने बताया कि आज ऐसे शोध की आवश्यकता है, जो समाज के हित में हो। जिस समय में पत्रकारिता में फेक कंटेंट की भरमार है, तब पत्रकारिता में शोध की अत्यंत आवश्यकता है। आज मीडिया में विशेषज्ञता की आवश्यकता है। इसलिए नवागत विद्यार्थियों को अध्ययन की प्रवृत्ति विकसित करना चाहिए।

‘मीडिया मैनेजमेंट’ विषय पर कुलपति प्रो. केजी सुरेश ने कहा कि मीडिया मैनेजमेंट के पाठ्यक्रम को हमें मीडिया गवर्नेंस के तौर पर पढ़ाना चाहिए। आज अनेक युवा मीडिया के क्षेत्र में अपने स्टार्टअप शुरू कर रहे हैं। मीडिया गवर्नेंस पाठ्यक्रम के माध्यम से उन्हें प्रशिक्षित किया जा सकता है ताकि वे अपने स्टार्टअप को अच्छी प्रकार से स्थापित कर सकें।

 ‘कम्प्यूटर विज्ञान के क्षेत्र में संभावनाएं’ विषय पर स्कूल ऑफ कम्प्यूटर साइंस यूपीएस, देहरादून के डीन डॉ. मनीष प्रतीक ने कहा कि प्रोग्राम लैंग्वेज हिन्दी और अंग्रेजी भाषा से अलग नहीं है, ये भी एक भाषा ही है। आज प्रोग्राम लैंग्वेज के साथ ही एल्गोरिदम को सीखना बहुत जरूरी है। उन्होंने कहा कि आईटी का उपयोग करके आप अच्छे पत्रकार बन सकते हैं। आईटी के माध्यम से आप डेटा का विश्लेषण कर सकते हैं। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के माध्यम से मीडिया के क्षेत्र में फेक कंटेंट की पहचान करने की व्यवस्था बनाई जा सकती है। 

‘ऑडियो स्ट्रीमिंग का भविष्य’ जैसे नवाचारी विषय पर सुप्रसिद्ध आरजे और कम्युनिकेशन विशेषज्ञ सुश्री सिमरन कोहली ने कहा कि पॉडकास्ट के क्षेत्र में बड़े संस्थान निवेश कर रहे हैं। इसका अर्थ यही है कि भारत में रेडियो का विस्तार हो रहा है। पॉडकास्ट के क्षेत्र में आने से पहले विद्यार्थियों को इसकी तकनीक को समझ लेना चाहिए। यूनिसेफ जैसी संस्थाएं भी रेडियो और पॉडकास्ट के माध्यम से जन-जागरूकता के कार्यक्रम चला रही हैं। उन्होंने कहा कि सामुदायिक रेडियो भारत में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

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सरकार की गोद में बैठना या हरदम तलवार तानना संतुलित पत्रकारिता नहीं मिस्टर मीडिया!

भारत में संपादकों की सबसे बड़ी संस्था एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ऐतिहासिक मोड़ पर है। पहली बार इसने अपने अध्यक्ष और महासचिव को  बाकायदा मतदान के जरिए चुना

राजेश बादल by
Published - Monday, 19 October, 2020
Last Modified:
Monday, 19 October, 2020
Mister Media

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार ।।

भारत में संपादकों की सबसे बड़ी संस्था एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ऐतिहासिक मोड़ पर है। पहली बार इसने अपने अध्यक्ष और महासचिव को  बाकायदा मतदान के जरिए चुना। खास बात यह है कि चुनाव की समूची प्रक्रिया ऑन लाइन संपन्न हुई। यह भी पहली बार है, जब एक महिला संपादक सीमा मुस्तफा इसकी अध्यक्ष निर्वाचित हुई हैं और महासचिव के रूप में संजय कपूर होंगे। अब नए पदाधिकारी दो-चार दिन में अपना कार्यभार संभाल लेंगे। उनसे मुल्क की पत्रकारिता को ताकत मिलनी चाहिए। इस कारण इस बार इस स्तंभ में गिल्ड की चर्चा का संदर्भ सिर्फ चुनावी नहीं, बल्कि इस शिखर संस्था से मौजूदा पत्रकारिता की विराट अपेक्षाएं हैं।  

इस तथ्य से कोई इनकार नहीं कर सकता कि मुल्क में इन दिनों प्रिंट और टीवी पत्रकारिता की साख पर गंभीर संकट है। खबरिया चैनल के परदे और समाचार पत्रों के पन्ने जिस तरह की खबरें उगल रहे हैं, उनसे उनकी स्थिति उपहासपूर्ण और कुछ कुछ विदूषक जैसी हो गई है। तमाम तरह के दबावों ने पत्रकारिता का चेहरा टेढ़ा मेढ़ा कर दिया है। निष्पक्ष, निर्भीक और बेधड़क अखबारनवीसी कहीं हाशिए पर  चली गई है और हुक्मरान इसका फायदा उठाते नजर आते हैं। इसमें उनकी क्या गलती है? कोई भी सरकार अपनी आलोचना बर्दाश्त नहीं करती। जब उसे लगता है कि मीडिया को बांटकर वह अपने पक्ष में भी संपादकों की एक जमात खड़ी कर सकती है तो वह नहीं चूकती। ऐसे में निष्पक्ष पत्रकारिता पर उल्टा असर पड़ता है। पत्रकारों पर हमले बढ़ जाते हैं, तीखी आलोचना करने वालों को बेरोजगार होना पड़ता है और पेशागत सरोकार सत्तारूढ़ दल की मुट्ठी में कैद हो जाते हैं। इन दिनों कमोबेश यही स्थिति है। पिछले चवालीस साल की पत्रकारिता अनुभव के आधार पर कह सकता हूं कि इतने खराब हालात कभी नही बने। 

एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के लिए हाल के बर्षों में यह एक बड़ी चुनौती रही है। अंदरूनी तौर पर निश्चित ही गिल्ड के पदाधिकारी इस दुविधा से गुजरे होंगे। पिछले महीने जब सदस्यों की ऑन लाइन आम सभा हुई तो अनेक सदस्यों ने इस पवित्र पेशे पर छाई काली घटाओं को रेखांकित किया था। उन्होंने उलाहना दिया था कि गिल्ड अपनी भूमिका का निर्वहन ठीक से नहीं कर रही है। इसी के बाद नए चुनाव जल्द कराने का फैसला हुआ। अभी तक इस संस्था में कभी मतदान की स्थिति नहीं बनी, मगर इस बार तीन सदस्यों की एक समिति बनाई गई। इसमें  कमर वहीद नकवी, राजदीप सरदेसाई और सच्चिदानंद मूर्ति शामिल थे। समिति ने ऑन लाइन मतदान की एक गोपनीय प्रणाली ईजाद की और यह कामयाब रही।

अब गिल्ड को समग्र हिन्दुस्तान के संपादकों की प्रतिनिधि संस्था में तब्दील करना नए अध्यक्ष और महासचिव की जिम्मेदारी है। भाषाई, क्षेत्रीय और प्रादेशिक स्तर पर अनुभवी और निष्पक्ष संपादकों को इसमें जगह देनी होगी तथा पत्रकारों-संपादकों का एक मुखर स्वर बनाना होगा। तभी इसकी सार्थकता है। याद करना होगा कि भारत के इतिहास में बिहार प्रेस बिल और उसके बाद मानहानि विधेयक का समूची पत्रकार बिरादरी ने विरोध किया था। तब सरकार को झुकना पड़ा था। इसके लिए सरकार से निरपेक्ष रिश्ता रखना होगा। अच्छे कदम के लिए तारीफ करें और खराब रवैए की निंदा करें यही अच्छी पत्रकारिता  की निशानी है। सरकार की गोद में बैठना या उसके सामने हरदम तलवार ताने रहना संतुलित पत्रकारिता नहीं है मिस्टर मीडिया!        

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

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लोकमंगल की पत्रकारिता और वर्तमान चुनौतियां

पत्रकारिता का मूल स्वर विरोध का है और यही विरोध लोकमंगल के दायित्वों की पूर्ति की आश्वस्ती है। हिक्की ने अखबार का प्रकाशन इसलिए आरंभ किया था कि वह समाज को असली चेहरा दिखा सके।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Thursday, 15 October, 2020
Last Modified:
Thursday, 15 October, 2020
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मनोज कुमार, वरिष्ठ पत्रकार ।।

अपने जन्म से लेकर अब तक की पत्रकारिता लोकमंगल की पत्रकारिता रही है। लोकमंगल की पत्रकारिता की चर्चा जब करते हैं तो यह बात शीशे की तरह साफ होती है कि हम समाज के हितों के लिए लिखने और बोलने की बात करते हैं। लोकमंगल के वृहत्तर दायित्व के कारण ही पत्रकारिता को समाज का चौथा स्तम्भ कहा गया है। वर्तमान समय में सबसे ज्यादा आलोचना के केन्द्र में पत्रकारिता है और समाज सवाल कर रहा है कि पत्रकारिता अपने लोकमंगल के निहित दायित्वों से दूर कैसे हो रहा है? वह कैसे किसी के पक्ष में बोल रहा है या किसी के खिलाफ मोर्चाबंदी कर रहा है? यह सवाल भी पत्रकारिता के समक्ष यक्ष प्रश्र की तरह खड़ा है कि पत्रकारिता पर समाज का भरोसा टूट रहा है। निश्चित रूप से यह सवाल बेबुनियाद नहीं हो सकते हैं। कोई बड़ा बदलाव पत्रकारिता के निश्चित उद्देश्यों से भटकने के कारण उपजा होगा लेकिन पत्रकारिता अपने लोकमंगल के दायित्व से भटकी है अथवा समाज की अपेक्षा पत्रकारिता से बढ़ी है, इस पर विवेचन करने की आवश्यकता है।

पत्रकारिता के समक्ष उपजे सवालों को टाला नहीं जा सकता है लेकिन जो आरोप दागे जा रहे हैं, उन्हें यथास्थिति भी नहीं माना जा सकता है। पत्रकारिता ने स्वाधीनता संग्राम में ओज भरने का कार्य किया। यह वही पत्रकारिता है जिसने स्वाधीनता प्राप्ति के पश्चात नए भारत के निर्माण में अपनी सशक्त भूमिका निर्वहन किया है। स्मरण रहे कि यही पत्रकारिता है जिसने पूरी ताकत के साथ आपातकाल का प्रतिकार किया। यह वही पत्रकारिता है जिसने उन हिस्सों से पर्दा उठाने का काम किया है जिसके पीछे जाने कितने राज दफन हो चुके थे। हालांकि इन सब बातों को देखें और समझें तो लगता नहीं कि पत्रकारिता अपने लोकमंगल के दायित्व से परे हो गया है।

पत्रकारिता का मूल स्वर विरोध का है और यही विरोध लोकमंगल के दायित्वों की पूर्ति की आश्वस्ती है। हिक्की ने अखबार का प्रकाशन इसलिए आरंभ किया था कि वह समाज को असली चेहरा दिखा सके। स्वाधीनता संग्राम में अखबारों ने समाज में जन-जागरण का महती जवाबदारी का निर्वहन किया। लोगों में देश-प्रेम जगाया और अंग्रेज शासकों के खिलाफ उनके मन में क्रांति का भाव उत्पन्न किया। परिणामस्वरूप अंग्रेजों को भारत छोडऩे के लिए मजबूर होना पड़ा। स्वाधीनता के बाद नए भारत के निर्माण की जवाबदारी पत्रकारिता की थी। पंचवर्षीय योजना के माध्यम से विकास कार्यों का श्रीगणेश हुआ और इसके साथ ही घपले-घोटाले भी शुरू हो गए थे जिस पर से पर्दा उठाने का काम पत्रकारिता ने किया। यह लोकमंगल की ही पत्रकारिता ही थी। यह वह दौर था जब अखबारों में छपने वाली खबरों से पूरा तंत्र हिल जाया करता था। गांधी समाचार-पत्र को सबसे बड़ी ताकत मानते थे। इस ताकत से शासकों में भय था और इस बात का प्रमाण खुले तौर पर 1975 में आपातकाल के दरम्यान मिला जब पत्रकारिता पर बंदिशें लगा दी गई। उस दौर के शासकों को इस बात का इल्म था कि जो पत्रकारिता अंग्रेजों को देश-निकाला दे सकती है, वही पत्रकारिता उनकी कुर्सी भी डुला सकती है। आपातकाल में पत्रकारिता पर जो जोर-जुल्म हुए वह इतिहास के पन्नों में दर्ज है तो यह बात भी गर्व के साथ पत्रकारिता के इतिहास में दर्ज है कि पत्रकारिता झुकने के बजाय प्रतिकार करती हुई गर्व से खड़ी रही। भाजपा के वरिष्ठ राजनेता लालकृष्ण आडवाणी का यह बयान हमेशा उल्लेख में आता है जिसमें उन्होंने कहा था कि ‘पत्रकारिता को झुकने के लिए कहा गया था, वह रेंगने लगी।’ यह बात सच हो सकती है लेकिन सौफीसदी सच नहीं क्योंकि बहुतेरे अखबार खिलाफ में खड़े थे अपनी बुनियादी उसूलों के साथ।

यह वह दौर था जब अधिकतम आठ पन्नों के अखबार हुआ करते थे। बहुत सारे अखबार तो चार पन्नों के ही थे। तब आधुनिक मशीनों की आमद नहीं हुई थी। पुरानी पद्धति से अखबारों का प्रकाशन होता था। यह वही दौर था जब संपादक की सत्ता सर्वोपरि थी। प्रबंधन पीछे हाथ बांधे खड़ा होता था। अखबार के पन्नों में पहले खबरों को जगह मिलती थी, विज्ञापन दूसरे क्रम पर था। साल 75 के बाद पत्रकारिता का चेहरा बदलता गया। शायद यह वही कालखंड था जब लोकमंगल की पत्रकारिता पर ग्रहण लगने लगा। अब नई तकनीक की प्रिंटिंग मशीनों का आगमन होने लगा था। अखबारों के पन्नों में भी एकाएक बढ़ोत्तरी होती गई। श्वेत-श्याम अखबार रंगीन होने लगे। पेज-थ्री का चलन उस दौर में नहीं था लेकिन छाया दिखने लगी थी। महंगी मशीनें और अखबार के पन्नों में वृद्धि से लागत में बढ़ोत्तरी होने लगी। पांच पैसे में बिकने वाला अखबार अब रुपय्या में बिकने लगा। हालांकि लागत और विक्रय मूल्य में अंतर काफी था और इस अंतर को पाटने के लिए विज्ञापनों का स्पेस लगातार बढऩे लगा। कंटेंट के स्थान पर विज्ञापनों को प्रमुखता मिलने लगी और संपादक की सत्ता भी तिरोहित होने लगी और प्रबंधन मुख्य भूमिका में आने लगा था। 

90 के दशक आते-आते लोकमंगल की पत्रकारिता की सूरत बदल चुकी थी। इधर टेलीविजन चैनल पसरने लगे थे। पाठक अब ग्राहक में और ग्राहक दर्शक में बदल रहे थे। साथ में पत्रकारिता मीडिया में हस्तांतरित हो चुका था। एक समय ऐसा आया कि लगने लगा कि मुद्रित माध्यम बीते जमाने की बात हो जाएगी और टेलीविजन पूरे समाज पर कब्जा कर लेगा। शुरुआत कुछ ऐसी ही थी लेकिन जल्द ही संकट के बादल छंट गए और संचार के दोनों माध्यमों ने अपना-अपना स्थान बना लिया। लेकिन पाठकों से दर्शकों में तब्दील हुए लोगों की लालसा-आकांक्षा बढऩे लगी। श्वेत-श्याम अखबारों की छपाई उन्हें उबाने लगी और अखबारों में भी वे टेलीविजन के अक्स देखने लगे। प्रबंधन ने इस अवसर का लाभ उठाया और अखबारों को टेलीविजन की शक्ल में बदलने में जुट गए। एकाएक अखबारों के खर्चों में मनमानी वृद्धि होने लगी और नुकसान का प्रतिशत बढ़ गया। ऐसे में विज्ञापन एकमात्र सहारा था और विज्ञापनों ने उस आधार को भी निरस्त कर दिया जिसमें तय था कि खबरें साठ प्रतिशत होंगी और विज्ञापन चालीस प्रतिशत। अब हालत यह हो गई कि जो स्थान बचा, वह खबरों के लिए। प्रतिशत की कोई भूमिका शेष नहीं रही। ऐसे में पत्रकारिता के समक्ष लोकमंगल की जवाबदारी पर सवाल उठने लगे। 

अखबारों के पन्नों से गांव की खबरें हाशिये पर चली गई और सामाजिक सरोकार की खबरों का स्थान भी अपेक्षित रूप में न्यूनतम हो गया। राजनीति खबरों ने स्थान अधिक ले लिया। इसी दौर में पेड-न्यूज नाम की बीमारी ने पत्रकारिता को घेर लिया। हालांकि किसी समय पीत-पत्रकारिता का रोग था जो अब बकायदा खबरों को बेचने के लिए कुख्यात होने लगा। पीत-पत्रकारिता में पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर किसी के पक्ष या विपक्ष में खबरें या लेख लिखे जाते थे लेकिन पेड-न्यूज में तो अखबारों के स्पेस बेचे जाने की शिकायतें मिलने लगी। इन सबके बावजूद अखबार लोकमंगल की खबरों से स्वयं को दूर नहीं कर पाए क्योंकि पाठकों के लिए इन खबरों का होना जरूरी था। घपले-घोटाले से पर्दा उठाने के साथ ही जन-समस्याओं को शासन-प्रशासन के समक्ष रखना भी लोकमंगल की पत्रकारिता का दायित्व था, सो पूरी जिम्मेदारी के साथ किया गया। 

एक सच यह भी है कि पाठकों को ग्राहक में बदलने का उपक्रम अखबारों से ही शुरू हुआ। स्मरण करना होगा कि अखबारों के साहित्यिक पृष्ठों पर सवाल के जवाब मांगे जाते थे और सही जवाब देने वालों के नाम और तस्वीर प्रकाशित करने का प्रलोभन दिया जाता था। शुरुआत यहां से होती है और बाद में अखबार बाल्टी और मग तक उपहार के रूप में देने लगते हैं। इसके लिए अखबार के ग्राहकों से महीना-दो-महीना इस बात की कसरत करायी जाती है कि वे अखबार के पन्ने पर छपे कूपन को सम्हाल कर रखें और नियत तिथि पर जमा करायें। ऐसा करके अखबार प्रबंधन अपनी प्रसार संख्या तो बढ़ा ही रहा था, लोगों में लालच का भाव पैदा हो रहा था जो उनके भीतर का विरोध खत्म कर रहा था। हैरानी तो इस बात की है कि जो लोग पत्रकारिता अथवा मीडिया पर सियापा करते हैं, वही लोग एक पचास रुपए की बाल्टी के लिए घर में कूपन चिपकाते बैठे रहते हैं। हालांकि सब शामिल नहीं हैं लेकिन बहुतेरे इसमें शामिल हैं। जब आप स्वयं पाठक से ग्राहक बन जाने के लिए तैयार हों तो प्रबंधन क्यों खुश नहीं होगा? टेलीविजन मीडिया के पास बेचने के लिए बाल्टी और मग नहीं है तो वह बेबुनियाद की बहस करा कर मनोरंजन के बहाने अपनी टीआरपी बढ़ाता है। सवाल यह है कि जो चीज आपको पसंद नहीं, उसे देख, सुन और पढ़ क्यों रहे हैं? क्यों उस पर टिप्पणी कर दूसरों को देने के लिए प्रेरित कर रहे हैं? सच तो यह है कि टेलीविजन की बहस चलती है आधे घंटे और उसकी चर्चा होती है 24 घंटे। ट्रोल करके हम आलोचना नहीं कर रहे हैं, बल्कि अपरोक्ष रूप से उन्हें लोकप्रिय बना रहे हैं।  

कोरोना के इस भयावह दौर में अखबार पूरी शिद्दत के साथ संकट की तस्वीर को सामने रख रहे थे तो जो कुछ अच्छा हो रहा है, उसकी तस्वीर से समाज का हौसला अफजाई कर रहे थे। यहां पर ठीक उलट टेलीविजन के पर्दे पर टीआरपी का खेल चल रहा था। हिन्दी सिनेमा के एक नायक की कथित आत्महत्या पर टेलीविजन चैनलों का ध्यान था और इसके बाद सिने-जगत में नशे के कारोबार को लेकर टेलीविजन बहस-मुबाहिस में जुट गया। कोरोना से समाज को किस संकट से गुजरना पड़ रहा है? सरकारें कितनी बेपरवाह हो रही हैं? प्रशासन हाथ पर हाथ धरे बैठा है, जैसे गंभीर और लोकमंगल के विषय नदारद थे। यह पहला मौका नहीं था जब टेलीविजन की पत्रकारिता लोकमंगल के विषय से स्वयं को दूर कर रही थी बल्कि उसका यह रवैया हमेशा से रहा है। कुछेक अवसरों को छोड़ दें तो अखबारों के मुकाबले टेलीविजन की पत्रकारिता में लोकमंगल कोई विषय नहीं है। 

24 घंटे के खबरिया चैनलों को देखते दर्शकों को लगा कि समूची पत्रकारिता से लोकमंगल नदारद है। इसलिए पत्रकारिता की विश्वसनीयता पर संदेह किया जाने लगा लेकिन यह अधूरा सच है। लोकमंगल के विषय का केन्द्र में रखे बिना पत्रकारिता हो नहीं सकती है। यही कारण है जिन विषयों से समाज का सीधा रिश्ता होता है, वह खबरें पाठकों तक पहुंचायी जाती हैं। प्राकृतिक आपदाएं हों, शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन, सडक़, सुरक्षा जैसे मुद्दों पर कवरेज लगातार मिलता है और लोकमंगल के लिए यह आवश्यक भी है। एक तरफ 24 घंटे के न्यूज चैनलों की चुनौती है कि वह लगातार ताजा खबरें कहां से लाए? तो दूसरी तरफ 24 घंटे में एक बार छपकर आने वाले अखबार पाठकों को निराशा में नहीं धकेलते हैं और ना ही टेलीविजन चैनलों की तरह शोर मचाते हैं। अखबारों और टेलीविजन दोनों के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती है तकनालाजी के खर्चों की भरपाई करने की। टेलीविजन चैनलों की टीआरपी गिरने का अर्थ है राजस्व में कमी आना और राजस्व में कमी होने से टेलीविजन का संचालन मुश्किल सा काम है। कुछ ऐसी ही हालत अखबारों की है। कोरोना के इस भयावह संकट के दरम्यान अखबारों ने अपने पैर समेट लिए हैं और अखबारों के पन्नों में कटौती कर कुछ राहत पाने की कोशिश की है। फिर भी कहा जा सकता है कि जिस दर पर पाठकों को अखबार मिलता है और जिस लागत पर अखबार प्रिंट होता है, उन दोनों में बड़ा अंतर है और इस अंतर को पाटने का एकमात्र जरिया विज्ञापन है। 

लोकमंगल की पत्रकारिता को तीन कालखंड में विभाजित करके देखना होगा। स्वाधीनता के पहले की पत्रकारिता, स्वतंत्रता के बाद की पत्रकारिता और आपातकाल के बाद की पत्रकारिता। स्वाधीनता के पहले लोकमंगल अर्थात स्वराज्य प्राप्ति के लक्ष्य के साथ पत्रकारिता हो रही थी। स्वाधीनता प्राप्ति के बाद नए भारत के निर्माण की पत्रकारिता थी और आपातकाल के बाद पत्रकारिता मिशन से प्रोफेशन और बीते तीन दशकों में प्रोफेशन से व्यवसाय में बदल गई है। लोकमंगल की पत्रकारिता को धक्का पत्रकारिता शिक्षण के कारण भी हुआ है, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है। दूसरे पाठ्यक्रमों की तरह पत्रकारिता की डिग्री कोर्स आरंभ किया गया और देशभर के सैकड़ों पत्रकारिता संस्थानों से हर वर्ष बहुसंख्या में युवा पत्रकारिता में आए। इनमें से चुनिंदा पत्रकारों ने लोकमंगल की पत्रकारिता के मर्म को समझा और कामयाब हो गए जबकि अधिकांश इसमें नाकामयाब रहे।

दरअसल, पत्रकारिता शिक्षा दूसरे पाठ्यक्रमों की तरह नहीं है। इसमें जमीनी अनुभव की जरूरत होती है जो पत्रकारिता को लोकमंगल की ओर ले जाती है। अधिसंख्य पत्रकारिता संस्थानों में पत्रकार नहीं पढ़ाते हैं बल्कि गैर-पत्रकार पढ़ाते हैं जो उन्हें किताबी ज्ञान तो दे देते हैं लेकिन स्वयं के पास व्यवहारिक ज्ञान नहीं होने के कारण गंभीर पत्रकार का निर्माण नहीं कर पाते हैं। अच्छे नम्बरों से पत्रकारिता की परीक्षा पास कर लेने का अर्थ अच्छा पत्रकार बन जाना नहीं है बल्कि कामयाब पत्रकार के लिए घिस-घिस कर चंदन होना पड़ता है। एक और बड़ी कमी यह है कि पत्रकारिता की शिक्षा ले रहे विद्यार्थियों को सपने दिखाये जाते हैं और जब वे जमीन पर काम करने आते हैं तो उन्हें सच्चाई का सामना करना पड़ता है जिससे उनके भीतर का साहस टूटने लगता है। आज भी पत्रकारों के पास अच्छी सैलरी नहीं है बल्कि कहा जाए कि एक परिवार का गुजर-बसर भी बमुश्किल होता है तो गलत नहीं होगा। इसके बाद नौकरी की गारंटी नहीं होती है क्योंकि प्रबंधन अपनी मर्जी से कभी भी बाहर का रास्ता दिखा देता है। कोरोना के इस भयानक संकट के दौर में पत्रकार सबसे ज्यादा परेशानी में हैं, यह बात हम सब जानते हैं। 

कुछ चुनौतियां हैं जो लोकमंगल की पत्रकारिता को बाधित करती हैं, तो दूसरी तरफ पत्रकारिता के निहित उद्देश्य इस बात के लिए आश्वस्त करते हैं कि लोकमंगल की पत्रकारिता हमेशा कायम रहेगी। गांधी जी पत्रकारिता की जिस शुद्धता की बात करते थे, आज वह शायद संभव ना हो लेकिन पत्रकारिता में मिलावट हो, यह भी संभव नहीं। भारत सहित पूरी दुनिया के आंकड़ों का विशेषण करें तो पाएंगे कि सबसे खतरनाक कार्य पत्रकारिता का है। हर वर्ष बड़ी संख्या में पत्रकारीय दायित्व पूर्ण करते हुए पत्रकार मारे जाते हैं। लेकिन यह समाज को आश्वस्त करने की बात है कि पत्रकारिता पर मंडराते खतरा देखने के बाद भी डरने या पीछे हटने के स्थान पर प्रति वर्ष जज्बे से भरे युवा पत्रकारिता को करियर बनाने के लिए आते हैं और आ रहे हैं। 

लोकमंगल की पत्रकारिता पर संकट पत्रकारिता से या पत्रकारों से नहीं है बल्कि यह संकट प्रबंधन से है। प्रबंधन अपने निहित आर्थिक स्वार्थ के लिए किसी भी तरह का करार कर लेता है और लोकमंगल से जुड़ी कई बातें दबकर रह जाती है। किसी समय शशि कपूर अभिनीत फिल्म ‘न्यू देहली टाइम्स’ इस बात का गवाह है। पत्रकारिता में आने वाले प्रत्येक विद्यार्थी को एक बार यह फिल्म जरूर दिखायी जानी चाहिए। यह वह सच है जो लोकमंगल की पत्रकारिता के रास्ते में तब भी बाधा थी और आज तो इसका स्पेस लगातार बढ़ रहा है। हालांकि यह भी सच है कि जब-जब पत्रकारिता के समक्ष संकट बढ़ा है, तब-तब पत्रकारिता और तल्ख हुई है। वर्तमान समय का संकट यह है कि हर कोई पत्रकारिता से उम्मीद रखता है कि वह उसके पक्ष में बोले और ऐसा नहीं करने पर पत्रकारिता को अनेक उपमा दी जाती है। इस बात को मान लेना अनुचित नहीं होगा कि किसी दौर में सहिष्णुता अधिक थी तो किसी दौर में यह सहिष्णुता कम हुई है लेकिन सत्ता के लिए पत्रकारिता हमेशा से संकट रही है और बनी रहेगी क्योंकि समाज के चौथे स्तम्भ होने के कारण यह उसका मूल कर्तव्य है। सबसे बड़ी बात यह है कि पत्रकारिता पर समाज एक तरफ अविश्वास करता है और अखबार और टेलीविजन की खबरें समाज के लिए नजीर बनती हैं। अब समय आ गया है कि प्रेस काउंसिल जैसी संस्था का अधिकार क्षेत्र बढ़ना चाहिए और बेलाग होती मीडिया पर नियंत्रण हो। यह एक पहल है जिसकी जरूरत वर्तमान समय को है। हालांकि दौर कितना भी बुरा आए और कैसी भी परिस्थिति हो, पत्रकारिता अपने लोकमंगल की जवाबदारी से विमुख नहीं हो सकती है। क्योंकि लोकमंगल की पत्रकारिता की नींव में गांधी, तिलक और विद्यार्थीजी की सोच और दृष्टि समाहित है। 

(लेखक शोध पत्रिका ‘समागम’ के संपादक हैं और ये उनके निजी विचार हैं।)

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डॉ. वैदिक बोले, सराहनीय हैं केंद्र की ये दो पहल, राज्य सरकार को भी देना चाहिए ध्यान

भारत सरकार ने इधर दो उल्लेखनीय पहल की हैं। ये दोनों पहल सराहनीय हैं लेकिन देश के करोड़ों मजदूर के बारे में भी कुछ पहल शीघ्र होनी चाहिए।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Thursday, 15 October, 2020
Last Modified:
Thursday, 15 October, 2020
Modi

डॉ. वेद प्रताप वैदिक, वरिष्ठ पत्रकार ।।

भारत सरकार ने इधर दो उल्लेखनीय पहल की हैं। एक तो किसानों को संपत्ति कार्ड देने की घोषणा और दूसरा केंद्रीय सरकार के कर्मचारियों के हाथ में नोटों की गड्डी देना ताकि वे जमकर खर्च करें, त्यौहार मनाएं और बाजारों में खरीदी का दौरदौरा आ जाए।

देश के करोड़ों किसानों के पास अपने झोपड़े, मकान और खेती की जमीन भी है। उनकी कीमत चाहे बहुत कम हो, लेकिन उनके लिए तो वही सब कुछ है। उनका वह सब कुछ है लेकिन उनके पास ऐसा कुछ नहीं है, जो यह सिद्ध कर सके कि वे उसके मालिक हैं। सरकार यह काम पहली बार कर रही है कि कानूनी तौर पर उनकी संपत्ति पर उनका स्वामित्व स्थापित होगा। शुरू-शुरू में एक लाख किसानों को ये कार्ड मिलेंगे। ये किसान छह राज्यों के 750 गांवों में होंगे। धीरे-धीरे देश के सभी किसानों को यह सुविधा उपलब्ध हो जाएगी। लेकिन इस किसान-लाभकारी योजना के मार्ग में कई बाधाएं हैं। सबसे पहले तो यही कि जब जमीनें नपेंगी तो पड़ौसियों से बड़ी तकरारें होंगी। फिर स्वामित्व को लेकर भाई-बहनों में झड़प हो सकती है। लेकिन यह भी सत्य है कि भारतीय खेती को हम बहुत उपजाऊ और आधुनिक बनाना है, बैंकों से कर्ज लेना है और कंपनियों से अनुबंध करना है तो स्वामित्व पर कानूनी मुहर जरूरी है। यह व्यवस्था भारतीय किसानों के लिए काफी लाभदायक सिद्ध हो सकती है।

आजकल कोरोना महामारी की वजह से बाजार ठंडे पड़ गए हैं। बाजार तो हैं लेकिन खरीददार नहीं है। सरकार ने बाजारों में चमक लाने के लिए एक आकर्षक योजना की चूसनी लटकाई है। इसका आनंद सिर्फ सरकारी कर्मचारी ही ले पाएंगे। सभी कर्मचारियों को 10-10 हजार रुपए अग्रिम मिलेंगे। यह कर्ज ब्याजमुक्त होगा। इसे दस किस्तों में लौटाना होगा। इसके अलावा कर्मचारियों को तीन साल में एक बार देश में यात्रा करने का जो भत्ता मिलता है, वह उन्हें बिना यात्रा किए ही मिलेगा लेकिन उन्हें उसका तीन गुना पैसा खरीदी पर लगाना होगा। उसकी रसीद भी देनी होगी। वे ऐसा माल खरीद सकेंगे, जिस पर 12 प्रतिशत या उससे ज्यादा जीएसटी देनी पड़ती है। इसका अर्थ क्या हुआ? यही न कि सरकार जितना पैसा देगी, उससे तीन गुना ज्यादा बाजार में आ जाएगा। उम्मीद है कि एक लाख करोड़ से ज्यादा रुपया बाजार में चला आएगा। यदि राज्य-सरकारें भी ऐसी पहल करें तो देश के बाजार चमक उठेंगे। केंद्र सरकार राज्यों की सरकारों को भी 12 हजार करोड़ रु. का कर्ज दे रही है और 25 हजार करोड़ रु. बुनियादी ढांचे पर खर्च करेगी।

ये दोनों पहल सराहनीय हैं लेकिन देश के करोड़ों मजदूर के बारे में भी कुछ पहल शीघ्र होनी चाहिए।

(साभार: http://www.drvaidik.in/ )

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TV चैनल्स के 'युद्ध' का भंडाफोड़ रंग दिखाने के साथ कुछ सुधर भी सकता है: आलोक मेहता

टीवी चैनल्स के बीच टीआरपी की ‘जंग’ के साथ अब उसके भंडाफोड़ की नौबत आ गई है |

आलोक मेहता by
Published - Monday, 12 October, 2020
Last Modified:
Monday, 12 October, 2020
Alok Mehta

आलोक मेहता, वरिष्ठ पत्रकार।।  

टीवी चैनल्स के बीच टीआरपी की ‘जंग’ के साथ अब उसके भंडाफोड़ की नौबत आ गई है। इस मामले में भले ही मुंबई पुलिस पर कुछ पत्रकारों पर बदले की कार्रवाई और महाराष्ट्र के सत्तारूढ़ नेताओं का समर्थन करने के आरोप लग रहे हों, लेकिन पूरे विवाद का दुर्भाग्यपूर्ण पहलू यह है कि संपादकीय से जुड़े कुछ  वरिष्ठ साथी अपनी विश्वसनीयता खो रहे हैं। अब सवाल यह उठता है कि इस पूरे मामले में किसे दोष दिया जाए? 

इंडस्ट्री के कुछ बड़े खिलाड़ी इस मामले में परस्पर दोषारोपण कर रहे हैं और उन पर डाटा से छेड़छाड़ के आरोप लगा रहे हैं। वास्तव में न्यूज चैनल्स के टीआरपी का बिजनेस पिछले दो दशक से अनेक विवादों का विषय रहा है। वर्ष 2006-2007 के दौरान हिंदी मैगजीन ‘आउटलुक’ (Outlook) के संपादक के रूप में मैंने विस्तार से इस पर एक रिपोर्ट छापी थी और रेटिंग एजेंसी के एक वरिष्ठ अधिकारी ने मुझसे मिलकर अपना विरोध जताया और स्पष्टीकरण छापने के लिए कहा, लेकिन हम अपनी तथ्य होने से हमने रुख नहीं बदला और कोई स्पष्टीकरण प्रकाशित नहीं किया। इसलिए, हाल में हुए खुलासे से मीडिया के लोग आश्चर्यचकित नहीं हैं, लेकिन हम इससे बुरा महसूस करते हैं और दुखी है। हम चाहते हैं कि इसका कोई दीर्घकालिक समाधान सामने आए।  

देश में निजी टेलिविजन चैनल्स के विस्तार के साथ ही मीडिया बिजनेस में टीवी रेटिंग्स काफी विवादास्पद मुद्दा रहा है और अभी तक रेटिंग कंटेंट की प्राथमिकताओं को निर्धारित करना जारी रखे हुए है। टीआरपी जिस तरह से इंडस्ट्री का एक मापदंड बन गया है, वह अपरिहार्य और पेचीदा बन चुका है। ब्रॉडकास्टर्स ने अक्सर टीआरपी की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए हैं, लेकिन हाल के महीनों में यह एक ‘गंदे खेल’ (dirty game) में परिवर्तित हो गया है। पश्चिमी समाज का फॉर्मूला, विदेश एजेंसियों का कुछ नियंत्रण और मीडिया इंडस्ट्री में गलाकाट प्रतियोगिता के कारण इस तरह की समस्याएं बढ़ रही हैं।  

लेकिन इसके लिए सिर्फ इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को ही क्यों दोष दिया जाए? क्या हम प्रिंट मीडिया में प्रसार संख्या में भरी गड़बड़ियों से  परिचित नहीं हैं और क्या हमने इसका अनुभव नहीं किया है? दशकों से छोटी, मध्यम और बड़ी मीडिया कंपनियां दूसरे अखबारों और मैगजींस के सर्कुलेशन के आंकड़ों को चुनौती देती रही हैं। 

इसका दुर्भाग्यपूर्ण पहलू ये है कि सरकार और निजी बिजनेस ग्रुप भी इस ‘नंबर गेम’ (सर्कुलेशन/रीडरशिप/व्युअर्स) को प्राथमिकता देते हैं। निश्चित रूप से यह भी एक बड़ा मानदंड है, लेकिन इससे गुणवत्ता पर असर पड़ता है और कुछ मीडिया मालिक व मार्केटिंग से जुड़े लोग ज्यादा से ज्यादा एडवर्टाइजिंग पाने के लिए जोड़-तोड़ का ‘खेल’ शुरू कर देते हैं। लाखों की प्रसार संख्या दिखाने का हथकंडा अपनाते हैं | 

करीब दस साल पहले एक सेमिनार के दौरान मैंने एक न्यूज चैनल के वरिष्ठ संपादक को कुछ प्रिंट मीडिया में सर्कुलेशन के इस फर्जीवाड़े और आंखों में धूल झोंककर विज्ञापन से मोटी कमाई की समस्या पर स्टिंग करने का सुझाव दिया था। मैं और मेरे कई साथियों को इस बात की जानकारी थी कि किस तरह से तमाम पब्लिकेशंस द्वारा अखबार/मैगजींस की कॉपियों को गोदाम में डाल दिया गया और बाद में कचरे के रूप में छोड़ दिया गया। लेकिन इस मुद्दे पर अधिक हंगामा नहीं हुआ। स्टिंग भी नहीं हुआ। कुछ सुधरे, कुछ और बिगड़े | 

न्यूज चैनल्स में भी यही समस्या तब शुरू हो गई, जब हमने उन सभी लोगों के लिए दरवाजे खोल दिए जो किसी भी तरह पूंजी निवेश और कमाई कर सकते थे। तमाम नए प्लेयर्स हमेशा मुनाफा कमाने की जल्दी में रहते हैं। तमाम पॉलिटिकल पार्टीज, बिजनेस हाउसेज और अन्य लॉबी भी एक अथवा दूसरे चैनल का सपोर्ट करते हैं और ‘दुश्मनी’ (enemy) को नष्ट करने में मदद करते हैं।  

यदि हम इतिहास की बात करें तो एक किताब पर्याप्त नहीं होगी। जब हम चुनौतियों और संकट का सामना कर रहे हैं तो हमें सकारात्मक रूप से सोचने और विश्वसनीयता, अस्तित्व, विस्तार और रेवेन्यू के समाधान खोजने की कोशिश करने की जरूरत है। हमें ‘स्वदेशी’ बनने की कोशिश करने की जरूरत है। 

भारतीय मीडिया को पश्चिमी देशों के समाज और भारत के सामाजिक और पारिवारिक जीवन में अंतर के बारे में बेहतर जानकारी है। पश्चिमी देशों में लोगों की औसत आमदनी की क्षमता और जीवन शैली विभिन्न क्षेत्रों में ज्यादा अलग नहीं होती है, लेकिन भारत की बात करें तो यहां आपको अमीरों के बंगलों के पास गरीबों की बस्तियां भी भी मिलती हैं और आय वर्ग भी भिन्न है | इसके अलावा एक ही परिवार की तीन पीढ़यों में जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग पसंद हो सकती है।  

वैसे भी, न्यूज चैनल्स पर हालिया टीआरपी विवाद की वजह से सरकार को नए नियम, रेगुलेशंस अथवा कानून के साथ हस्तक्षेप करने का मौका मिल जाता है। मीडिया काउंसिल की मांग लंबे समय से लंबित है और अधिकांश राजनीतिक दल मीडिया पर कुछ नियंत्रण/निगरानी रखने के इच्छुक रहते हैं | राज्यों में तो बराबर दबाव बनते रहते हैं | 

दूसरा पहलू ज्यादा गंभीर है। यदि न्यूज बिजनेस/चैनल्स अपनी विश्वसनीयता खो देते हैं और आपस में लड़ने लगते हैं और पुलिस या रेवेन्यू विभाग निवेशकों अथवा एडवर्टाइजर्स से पूछताछ शुरू कर देते हैं तो उन्हें बचाने कौन आएगा? यह आत्मविश्लेषण का समय है। आत्म अनुशासन का मतलब आचार संहिता यानी ‘लक्ष्मण रेखा’ से है। हमें टीआरपी के लिए नए सिस्टम की जरूरत है। यह न सिर्फ भारतीय मीडिया की प्रतिष्ठा को सुधारने और उसे बढ़ाने में मददगार साबित होगा, बल्कि भारतीय लोकतंत्र और इसके भविष्य को मजबूत बनाएगा।  

(यह लेखक के निजी विचार हैं)  

(लेखक एडिटर्स गिल्ड ऑफ़ इंडिया के पूर्व अध्यक्ष और भारतीय प्रेस परिषद् के पूर्व सदस्य हैं | , नवभारत टाइम्स,  हिंदुस्तान , नई दुनिया , दैनिक भास्कर ,आउटलुक हिंदी सहित पत्र पत्रिकाओं में संपादक रहे हैं |  पद्मश्री और गणेश शंकर विद्यार्थी पुरस्कार से भी सम्मानित हैं |) 

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मिस्टर मीडिया: TRP के खेल में उलझ गया बाजार!

एक के बाद एक खुलासे हो रहे हैं। टीआरपी की होड़ में परदे के पीछे भी कुछ-कुछ होता है, दर्शकों को यह पता चल रहा है।

राजेश बादल by
Published - Saturday, 10 October, 2020
Last Modified:
Saturday, 10 October, 2020
TRP

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।

एक के बाद एक खुलासे हो रहे हैं। टीआरपी (TRP) की होड़ में परदे के पीछे भी कुछ-कुछ होता है, दर्शकों को यह पता चल रहा है। पर जो भी हो रहा है, वह ठीक नहीं है। अपने प्रॉडक्ट की क्वालिटी के आधार पर कोई खिलाड़ी विजेता बने तो बात समझ में आती है, लेकिन विजेता बनने के लिए कोई खेल के नियम ही बदल दे तो यह समझ से परे है। जब टॉप के खबरिया चैनलों पर आरोप लगने लगें तो अंदाज लगाया जा सकता है कि छोटे-छोटे चैनलों की बिसात ही क्या है।

समाचार चैनल ही नहीं, मनोरंजन चैनलों का भी टीआरपी के लिए गोरखधंधा शर्मनाक है। यह उजागर है कि विज्ञापनों के लिए ही इस रेटिंग की चिंता की जाती है। बाजार में इस गलाकाट स्पर्धा के कारण सारे नैतिक मूल्य धरे रह जाते हैं और उनकी जगह नकली मापदंड आ जाते हैं। यह स्थिति बाजार के लिए घातक है और उपभोक्ता के लिए भी। विडंबना यह है कि पैसे के लिए ये अनैतिक हथकंडे गांव का कोई अनपढ़ दुकानदार अपनाए तो बात समझ में आती है, पर बौद्घिक व्यापार इसका शिकार हो जाए,यह दुर्भाग्यपूर्ण है।

मुझे याद है, जब भारत का चैनल उद्योग पनप रहा था तो केबल संचालकों को चैनल के मार्केटिंग कार्यकर्ता अपने डिब्बे दिया करते थे। साथ में बेहतर स्थान देने की एवज में महंगे उपहार भी उन्हें भेंट किए जाते थे। कोई ऑपरेटर तो ऐसा भी होता था जो उपहार न लेकर हर साल कैश की मांग करता था। चैनल उन्हें नकद भी देता था। इसके अलावा समय-समय पर उन्हें पांच सितारा होटलों में दावत दी जाती थी। उन रात्रिभोजों में महंगी और उम्दा शराब परोसी जाती थी। यह करीब बीस बरस पहले की बात है। तब भी यह अनुचित था और आज भी इसे ठीक नहीं माना जाता। आशय यह है कि मुनाफे के लिए बेईमानी के बीज तो इस चैनल उद्योग की स्थापना के साथ ही पड़ गए थे। मगर हालत यहां तक जा पहुंचेगी, किसी ने नहीं सोचा था।

जब तक टीआरपी के परदे के पीछे की माया सामने नहीं आई थी, तब तक बहुत चिंता नहीं थी। मगर पैसों के लेन-देन का ख़ुलासा होने के बाद समाज के बुद्धिजीवी विचलित हैं। वे अपने आपको ठगा सा महसूस कर रहे हैं। सोच के किसी बिंदु पर वे अगर भ्रमित महसूस करते थे तो टीआरपी के पैमाने पर सबसे लोकप्रिय चैनल को देखते थे और उसकी बात मान लेते थे। वे सोचते थे कि चैनल जो दिखा रहा है, वह समाज की प्रतिनिधि राय हो सकती है, क्योंकि अधिकतर लोग इसी चैनल को देखते हैं। पर अब उन्हें लग रहा है कि वे ऐसे अनेक बौद्धिक विमर्शों में अनजाने में ही अपनी राय बना बैठे हैं, जो सच नहीं हो सकती।

यानी चैनल ने राजनीतिक अथवा सामाजिक या अन्य आधारों पर अपनी बात बड़ी सफाई से उनके दिमागों में दाखिल कर दी है। उस तथाकथित सच जानकारी के आधार पर वे अपने-अपने संपर्क संसार में उस विकृत सच का विस्तार कर चुके हैं। अपने साथ हुई इस वैचारिक धोखाधड़ी का मामला वे किस थाने या अदालत में लेकर जाएं। अब वे सावधान हैं। वे छोटे परदे के मायाजाल में नहीं फंसेंगे, यह उन्होंने तय कर लिया है और यह खतरे की घंटी है मिस्टर मीडिया!

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल की 'मिस्टर मीडिया' सीरीज के अन्य कॉलम्स आप नीचे दी गई हेडलाइन्स पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं-

मिस्टर मीडिया: क्या पत्रकारिता भी संसदीय पत्रकारिता के मापदंडों की अवहेलना पर उतर आई है?

पत्रकारिता के इस शर्मनाक दौर में हमारी चुप्पी को वक्त कभी माफ नहीं करेगा मिस्टर मीडिया!

क्या समाज जब खुलकर हमारे खिलाफ मोर्चा खोलेगा, तभी हम जागेंगे मिस्टर मीडिया!

इसी तर्ज पर हिन्दुस्तान में झोलाछाप मीडिया भी विकराल आकार लेता जा रहा है मिस्टर मीडिया!

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