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हरिवंश नारायण ने पूर्व पीएम चंद्रशेखर की जिंदगी के अनछुए पन्नों से कुछ यूं कराया रूबरू
पत्रकारिता से राजनीति में आए हरिवंश नारायण सिंह इन दिनों राज्यसभा के उप सभापति की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं
समाचार4मीडिया ब्यूरो 6 years ago
पत्रकारिता से राजनीति में आए हरिवंश नारायण सिंह इन दिनों राज्यसभा के उप सभापति की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। पत्रकारिता में अपना लोहा मनवाने के बाद हरिवंश नारायण सिंह राजनीति में भी सफलता के नए आयाम स्थापित कर चुके हैं। वह जदयू सांसद हैं और अपनी नई भूमिका में अक्सर हो-हंगामे के बीच बेहतरीन तरीके से उच्च सदन को संभालते हुए नजर आते हैं। सभापति की गैरमौजूदगी में जिस तरह वह सदन का कामकाज संभालते हैं, वह काबिले तारीफ है। इंडियन एक्सप्रेस ने भी उनकी इसी काबिलियत को प्रमुख आधार मानते हुए पिछले दिनों उन्हें 100 असरदार भारतीयों की सूची में शामिल किया है।
संसदीय प्रतिनिधिमंडल के हिस्से के रूप में दुनिया भर में यात्रा करते हुए वह भारत विरोधी प्रोपेगैंडा अपनाने के लिए अक्सर पाकिस्तान को निशाने पर लेते रहते हैं। सबसे शक्तिशाली भारतीयों की सूची में भी हरिवंश को शामिल किया जा चुका है। एक पत्रकार और ‘प्रभात खबर’ के संपादक के तौर पर झारखंड में ग्राउंड रिपोर्ट तैयार करने में उन्होंने बहुत काम किया है।
एक घंटे से ज्यादा की इस बातचीत के दौरान हरिवंश नारायण सिंह का कहना था, ‘राजनीति में आने से पहले मैं एक पत्रकार रहा हूं और धर्मयुग, रविवार जैसे पब्लिकेशंस से जुड़ा रहा हूं। मैं उत्तर प्रदेश और बिहार के बॉर्डर पर स्थित बलिया का रहने वाला हूं और संयोग से जेपी (जयप्रकाश नारायण) भी उसी क्षेत्र के थे। ऐसे में मुझे छात्र जीवन और इसके बाद करियर के दौरान जेपी और उनके बाद चंद्रशेखर जी से जुड़े रहने का मौका मिला।’
हरिवंश नारायण के अनुसार, ‘वर्ष 1972 में जब मैं बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी (BHU) में था तो उस दौरान जेपी आमतौर पर वहां सभाओं को संबोधित करने आते थे। शुरू में वहां 100 छात्र भी नहीं आए। कुछ महीनों बाद उन्हें सुनने के लिए 1.5 लाख लोग जुड़े। जो मुद्दा वह उठा रहे थे, उसकी बदौलत यह भीड़ बढ़ती गई। यह मार्च 1977 की बात है, मैं काम की वजह से मुंबई में था और तभी आपातकाल (Emergency) के बाद हुए लोकसभा चुनावों का परिणाम आया था। मुझे याद है कि इन आंकड़ों को मंत्रालय के बाहर बोर्ड पर लिखा गया था। इन परिणामों की झलक पाने के लिए आम आदमी के साथ ही फिल्म स्टार्स और नेताओं की भीड़ जुट गई थी। तब चंद्रशेखर ‘यंग इंडियन’ (Young Indian) नाम से साप्ताहिक पत्रिका मैगजीन निकालते थे। वह जो संपादकीय लिखते थे, वह आए दिन अखबारों की हेडलाइंस बना करती थी। पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से जुड़ा ऐसा ही एक वाक्या मुझे आज भी याद है।’
हरिवंश नारायण ने बताया, ‘जब चंद्रशेखर जी से मेरी मुलाकात हुई, उस दौरान मैं ‘धर्मयुग’ (Dharmayug) में थे। उस दौरान जेपी को मुंबई के जसलोक अस्पताल में भर्ती कराया गया था। चंद्रशेखर ने पास में ही एक गेस्ट हाउस लिया हुआ था और वह अधिकतर समय उनके साथ ही रहते थे। उसी दौरान जेपी के निधन की किसी ने अफवाह उड़ा दी। यहां तक कि संसद ने भी उन्हें श्रद्धांजलि दे दी। जब जसलोक अस्पताल के बाहर बहुत ज्यादा भीड़ एकट्ठी हो गई, तो चंद्रशेखर ने वहां आकर कहा कि यह फर्जी खबर है और जेपी उनके साथ हैं। फिर मैंने उनका इंटरव्यू लिया। उस दौरान भी मैं धर्मयुग में था। इसके बाद मैं उनके संपर्क में बना रहा। जब चंद्रशेखर प्रधानमंत्री बने तो मैं बतौर जॉइंट सेक्रेटरी (अतिरिक्त सूचना सलाहकार) के तौर पर प्रधानमंत्री कार्यालय से जुड़ गया। प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया (PTI) से जुड़े मिस्टर श्रीवास्तव उनके प्रेस एडवाइजर हुआ करते थे। यह भारतीय राजनीति की काफी बड़ी घटना थी, जब कोई बिना मंत्री बने सीधे प्रधानमंत्री बन गया था। वह काफी निर्णायक नेता थे और यदि उन्हें जनादेश मिला होता तो वह सबसे सफल प्रधानमंत्री साबित होते। यह सिर्फ मेरा मानना ही नहीं है, बल्कि आर वेंकटरमण, प्रणब मुखर्जी, मुचकुंद दुबे और एमके नारायणन जैसे तमाम दिग्गजों ने उनके बारे में लिखा है। पूर्व प्रधानमंत्री नरसिंह राव ने लिखा भी था कि यदि चंद्रशेखर प्रधानमंत्री पद पर बने रहते तो अयोध्या विवाद का सौहार्दपूर्ण ढंग से तभी समाधान हो जाता। चंद्रशेखर ने उस दौरान कई चुनौतीपूर्ण मुद्दों का सामना किया। लेकिन उन्हें कभी इसका श्रेय नहीं मिला। इसी वजह से मेरे मन में यह किताब लिखने का ख्याल आया और मैंने इसका नाम ‘चंद्रशेखर: द लास्ट आइकन ऑफ आइडियोलॉजिकल पॉलिटिक्स’ चुना।‘
इस बातचीत के दौरान हरिवंश नारायण सिंह ने यह भी बताया, ‘चंद्रशेखर गरीब परिवार से थे। उनके पास एक विकल्प यह भी था कि वह शिक्षा प्राप्त करने के बाद अपने परिवार की अच्छे से देखभाल करते, लेकिन इसके बजाय उन्होंने एक कठिन रास्ता चुना, यह जानते हुए भी कि यह काफी कठिन, चुनौतीपूर्ण और अनिश्चितताओं भरा होगा। चंद्रशेखर आचार्य नरेंद्र देव के सिद्धांतों से बहुत प्रभावित थे और वह लगातार उसी विचारधारा पर चलते रहे। अगले 15-20 साल काफी कठिन और चुनौतीपूर्ण रहे। पार्टी के काम के दौरान उन्होंने कई बार पार्टी कार्यालय में साफ-सफाई भी की। यह उनकी लीडरशिप का ही कमाल था कि ‘प्रजा सोशलिस्ट पार्टी’ (PSP) कांग्रेस के बाद उत्तर प्रदेश में दूसरी सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी बन गई थी। वर्ष 1962 में उन्होंने संसद में प्रवेश किया।’
हरिवंश नारायण के अनुसार, ‘चंद्रशेखर का मानना था कि मुद्दे हमेशा व्यक्तित्व से बड़े होते हैं और ये मुद्दे ही देश को आगे ले जाने का काम करेंगे। वह हमेशा बैंकों, बीमा और कोयला सेक्टर का राष्ट्रीयकरण चाहते थे। इन मुद्दों के लिए लड़ते हुए वह कांग्रेस में शामिल हो गए। ‘प्रजा सोशलिस्ट पार्टी’ ने उन्हें निष्कासित कर दिया। छह-सात महीने तक वह इससे अलग रहे। कांग्रेस में रहते हुए इंदिरा गांधी के विरोध के बावजूद वह कांग्रेस वर्किंग कमेटी के लिए चुन लिए गए थे। बाद में इंदिरा गांधी ने उन्हें पार्टी से निकाल दिया। इसके बाद उन्होंने जनता पार्टी जॉइन कर ली। इंमरजेंसी के बाद इंदिरा गांधी चाहती थीं कि चंद्रशेखर कांग्रेस में वापस आ जाएं, लेकिन चंद्रशेखर ने इसमें जरा भी दिलचस्पी नहीं दिखाई। इसके बाद समाजवादी जनता पार्टी का उदय हुआ। चंद्रशेखर पर कई बार पार्टी छोड़ने (दल बदलने) के आरोप लगते रहते हैं, लेकिन सच बात तो यह है कि उन्होंने कभी किसी पार्टी को नहीं छोड़ा। उन्हें उस पार्टी से निकाला गया था। चंद्रशेखर का मानना था कि हमारी आर्थिक नीतियों से अमीरों को फायदा हुआ है। सिर्फ अमीरों को ही लाइसेंस क्यों मिलना चाहिए? यही कारण था कि वह संसाधनों के राष्ट्रीयकरण पर जोर देते थे। यहां तक कि जब देश ने उदारीकरण को अपनाया, उदारीकरण-निजीकरण-वैश्वीकरण पर जोर देने के साथ ही चंद्रशेखर ने अकेले इसके खिलाफ आवाज उठाई। उनका मानना था कि इस रास्ते पर चलकर देश कमजोर होगा। उनका मानना था कि लोग रातोंरात अमीर बनना चाहते हैं। उन्होंने अपनी अंतिम पदयात्रा ‘एलपीजी’ (LPG) और ‘गैट’ (GATT) के खिलाफ की थी।’
चंद्रशेखर के बारे में हरिवंश नारायण सिंह ने बताया, ‘वह आरएसएस और उसकी विचारधारा के खिलाफ थे, लेकिन ‘स्वदेशी’ को लेकर उन्होंने उसके साथ मंच शेयर किया था। एक बार किसी ने टिप्पणी कि भारत में ज्यादा नोबेल विजेता पैदा क्यों नहीं होते हैं, उन्होंने कहा था कि यह मत भूलो के यह संत ग्यानेश्वर और तुकाराम जैसे संतों की भूमि भी है। इंदिरा गांधी के साथ बातचीत के दौरान चंद्रशेखर की विचारधारा के बारे में साफ पता चलता है। उस समय इंदिरा गांधी ने चंद्रशेखर से पूछा था कि आपने कांग्रेस को क्यों चुना? तो चंद्रशेखर का कहना था कि मैंने ‘PSP’ के साथ 15 साल तक काम किया, लेकिन मुझे लगा कि यह आगे बढ़ने में विफल रही। इंदिरा गांधी ने उनसे अगला सवाल किया कि वह कांग्रेस के साथ क्या करेंगे? तो चंद्रशेखर का कहना था कि वह इसे समाजवादी पार्टी बनाएंगे। जब इंदिरा गांधी ने यह पूछा कि यदि वह ऐसा करने में विफल रहे तो, इस पर चंद्रशेखऱ ने जो जवाब दिया उससे इंदिरा गांधी सन्न रह गईं। चंद्रशेखर का कहना था कि उस स्थिति में वह पार्टी को तोड़ देंगे यानी छिन्न-भिन्न कर देंगे। कांग्रेस उस समय एक काफी बड़ी पार्टी बन चुकी थी और किसी नई विचारधारा का इसके तहत पनपना मुश्किल था। इसके बाद भी चंद्रशेखर का यह सोचना उनके साहस को दर्शता है। प्रधानमंत्री के रूप में उनका छोटा सा कार्यकाल शायद आजाद भारत में काफी मुश्किलों भरा समय था।’
हरिवंश नारायण सिंह के अनुसार, ‘बेशक, आर्थिक चुनौती बहुत महत्वपूर्ण थी और जब वित्त सचिव ने प्रधानमंत्री को बताया कि विदेशी मुद्रा भंडार खत्म हो रहा है और भारत जल्द ही डिफॉल्टर देश हो सकता है, चंद्रशेखर का कहना था कि क्या यह संकट मेरा ही इंतजार कर रहा था। इससे पता चलता है कि पहले राज करने वालों ने अपनी जिम्मेदारियों को सही से नहीं निभाया था। चंद्रशेखर के अंदर दृढ़ विश्वास और साहस के साथ अकेले चलने की क्षमता थी। एक बार जब उनसे पूछा गया कि वह विश्वनाथ प्रताप सिंह के मंत्रालय में शामिल क्यों हुए, तो उनका कहना था कि वह उन सरकारों में शामिल नहीं हो सकते, जिनसे उनके विचार मेल नहीं खाते हैं, फिर चाहे वो इंदिरा गांधी की सरकार हो या मोरारजी की। प्रधानमंत्री के रूप में उन्होंने टीवी पर देश को संबोधित किया था। उस समय आरक्षण की आग धधक रही थी और अयोध्या विवाद भी गहरा रहा था। लोगों को लग रहा था कि वह इन सबसे पार पा लेंगे। वह अयोध्या विवाद में एक समाधान तक पहुंच भी गए थे। उन्होंने संविधान के दायरे में रहते हुए कश्मीरियों से बातचीत शुरू कर दी थी। उनकी विचारधारा में देश सबसे पहले शामिल रहता था, राजनीतिक पार्टियों को वह इसके बाद रखते थे। उनके पास अकेले आगे बढ़ने की क्षमता थी। उनके पास साहस, दृढ़ विश्वास और दूरदर्शिता थी। सच कहूं तो वह देश की वैचारिक राजनीति के आखिरी मोती (आइकन) थे।’
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