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मिस्टर मीडिया: हम कितने ग़ैर ज़िम्मेदार और देहाती हैं 

 पत्रकारिता अभिव्यक्ति का माध्यम है। पेशा नहीं। यह दाल रोटी की जुगाड़ का ज़रिया हो सकता है

राजेश बादल 6 years ago

राजेश बादल

वरिष्ठ पत्रकार 

पत्रकारिता अभिव्यक्ति का माध्यम है। पेशा नहीं। यह दाल रोटी की जुगाड़ का ज़रिया हो सकता है। किसी भी अन्य रोज़गार की तरह, लेकिन अभिव्यक्ति रोज़गार नहीं हो सकती। स्वतंत्र अभिव्यक्ति हमारा मौलिक अधिकार है। बशर्ते उसमें कोई दुर्भावना न छिपी हो। 

अफ़सोस यह है कि पत्रकारिता में भी एक वर्ग ऐसा पनप रहा है,जो रोज़गार देने वाले संस्थान के पास अपनी अभिव्यक्ति भी जैसे गिरवी रख देता हैं। किसी के आठ घंटे उसे सौंपे गए काम का हिस्सा हो सकते हैं। उस काम को उसे पेशेवर (प्रोफेशनल) तरीक़े से करना ही चाहिए। इसमें दो मत नहीं हो सकते। मगर, सौंपे गए काम से उसके विचारों की उड़ान के पंख नहीं कुतरे जा सकते। जहां यह घालमेल होता है, उस प्रोफेशनल की अपनी पहचान ख़त्म हो जाती है।

बीते सप्ताह अनेक उदाहरण देखने को मिले। सबसे बड़ा सुबूत पाकिस्तान के मामले में सामने आया। पाकिस्तान को एक शत्रु देश की श्रेणी में रखे जाने पर शायद ही किसी को एतराज हो। अपने जन्म से ही वह एक ऐसे नक़ली मुल्क़ के रूप में उभरकर सामने आया है, जो सिर्फ़ हिन्दुस्तान से नफ़रत के आधार पर जीवित है। अवाम वही है, जो शान्ति से दो पड़ोसियों की तरह रहना चाहती है, पर हुक़्मरानों ने उसे केवल अपने स्वार्थों के लिए एक सत्यानाशी देश की श्रेणी में खड़ा किया है। 

भारतीय मीडिया में हाल के दिनों में पाकिस्तान का ज़िक्र कुछ इसी तरह हो रहा है। विडंबना यह है कि पाकिस्तान को मीडिया नष्ट करने के लिए जिस भाषा का इस्तेमाल करता है, वह किसी भी सूरत में शिष्ट नहीं है। हम उस देश को कुछ इस तरह प्रस्तुत करते हैं, जैसे उसकी हैसियत एक चींटी से अधिक नहीं है और उसे आप चुटकियों में मसल कर रख देंगे। निवेदन है कि मौजूदा माहौल में दो मुल्क़ों के बीच जंग लड़ना भी इतना आसान नहीं रहा है। पाकिस्तान के मित्र देश भले ही अधिक न हों, लेकिन अकेला चीन ही पर्याप्त है। 

परदे पर या अख़बार के पन्नों पर जंग की भाषा का प्रस्तुतिकरण शर्मनाक और स्तरहीन हो सकता है, हाल के दिनों का कवरेज उसका नमूना है। ऐसा लगता है कि अगर न्यूज़रूम के प्रोड्यूसरों के हाथ में रायफलें दे दी जाएं तो लाहौर से लेकर पेशावर तक ये लोग क़ब्ज़ा करके तिरंगा लहरा देंगे। भारतीय सेना को अपने क़दम बैरकों से निकालने की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी। आज समूचे संसार में जितने भी संवेदनशील जंगी मसले हैं ,कृपया उनका कवरेज भी अंतर्राष्ट्रीय चैनलों और माध्यमों में देखिए। साफ़ पता लगता है कि हम कितने ग़ैर ज़िम्मेदार और देहाती हैं। जंग के लिए आम अवाम को उकसाना और भड़काना ही देशभक्ति नहीं है। मसले का तर्कपूर्ण, तथ्यपरक और संतुलित विश्लेषण भी देशभक्ति है मिस्टर मीडिया !  


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