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MIB के नए TRP नियम से पारदर्शिता बढ़ेगी या विश्वसनीयता गिरेगी?
क्रॉस-होल्डिंग और बोर्ड-स्तरीय ओवरलैप पर लगी रोक को हटाने के इस कदम से एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है कि क्या यह मापन तकनीक को लोकतांत्रिक बनाएगा या इसकी साख को नुकसान पहुंचाएगा?
समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। 7 months ago
सूचना-प्रसारण मंत्रालय (MIB) द्वारा जारी किए गए नए मसौदा दिशानिर्देश भारत के टेलीविजन रेटिंग इकोसिस्टम की वर्षों पुरानी संरचनात्मक सुरक्षा को खत्म कर सकते हैं। क्रॉस-होल्डिंग और बोर्ड-स्तरीय ओवरलैप पर लगी रोक को हटाने के इस कदम से एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है कि क्या यह मापन तकनीक को लोकतांत्रिक बनाएगा या इसकी साख को नुकसान पहुंचाएगा?
वर्षों से BARC इंडिया देश की एकमात्र स्वीकृत टेलीविजन ऑडियंस मेजरमेंट एजेंसी रही है। इसकी साप्ताहिक रेटिंग्स ₹1.6 लाख करोड़ से अधिक के विज्ञापन बाजार में मीडिया प्लानिंग, विज्ञापन खर्च और चैनल की स्थिति तय करने का आधार रही हैं। अब, मंत्रालय ने ‘टेलीविजन रेटिंग एजेंसीज के लिए नीति दिशानिर्देश’ में बड़ा बदलाव करते हुए पात्रता मानकों को ढीला कर दिया है और हितों के टकराव से जुड़ी अहम धाराएं हटा दी हैं।
2 जुलाई को जारी किए गए प्रस्ताव में धारा 1.5 और 1.7 को हटा दिया गया है, जो अब तक रेटिंग एजेंसीज को प्रसारकों, विज्ञापनदाताओं या विज्ञापन एजेंसीज से जुड़े लोगों को बोर्ड में रखने या उनमें हिस्सेदारी रखने से रोकती थीं। कई जानकारों का मानना है कि इस बदलाव से बड़ी मीडिया कंपनियों, ओटीटी प्लेटफॉर्म्स, केबल ऑपरेटर्स और विज्ञापन समूहों को अपनी खुद की रेटिंग एजेंसियां शुरू करने का मौका मिल सकता है।
इंडस्ट्री विशेषज्ञ राजीव खट्टर ने कहा, “हम धारा 1.4 में किए गए बदलावों का स्वागत करते हैं, लेकिन जब धारा 1.5 और 1.7 को हटा दिया गया है तो धारा 1.4 की मूल भावना ही समाप्त हो जाएगी। यदि एक ही व्यक्ति रेटिंग एजेंसी और प्रसारक या विज्ञापनदाता दोनों के बोर्ड में है, तो रेटिंग प्रक्रिया पर प्रभाव डाला जा सकता है, इसके लिए कोई सुरक्षा तंत्र नहीं छोड़ा गया है।”
धारा 1.4 में कहा गया है कि “कंपनी कोई भी ऐसा परामर्श या सलाहकार कार्य नहीं करेगी जिससे उसके रेटिंग कार्य से हितों का टकराव उत्पन्न हो।”
BARC पर लंबे समय से डिजिटल और ओटीटी डिस्ट्रीब्यूशन को शामिल करने के लिए पैनल कवरेज बढ़ाने और पद्धति को आधुनिक बनाने का दबाव रहा है। ऐसे में यह उदारीकरण ऐसे समय में आया है जब इंडस्ट्री विश्वसनीय और एकीकृत मापन की जरूरत को लेकर पहले ही असमंजस में है।
एक मीडिया विश्लेषक ने कहा, “क्रॉस-होल्डिंग पर रोक हटाने से आवश्यक सुरक्षा कमजोर होती है। यदि बड़ी कंपनियां खुद को रेट कर सकती हैं तो मापन का मतलब ही क्या रह जाता है? यह वैसा ही है जैसे एक स्कूल का शिक्षक खुद की ट्यूशन चला रहा हो, ऐसे में निष्पक्षता खतरे में पड़ जाती है।”
एक वरिष्ठ एजेंसी प्रमुख ने नाम न बताने की शर्त पर कहा, “अब कोई भी एजेंसी बन सकता है- केबल ऑपरेटर, विज्ञापनदाता समूह, या कोई बड़ा प्रसारक। लेकिन इससे सबसे अधिक फायदा उन मार्केट लीडर्स को होगा जो अपनी पहुंच और नियंत्रण बढ़ाना चाहते हैं।”
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि हालांकि हितों के टकराव से जुड़ी धाराएं हटा दी गई हैं, लेकिन संशोधित धारा 1.4 अब भी ऐसी गतिविधियों पर रोक लगाती है, जिससे टकराव उत्पन्न हो, जिससे नियमों की व्याख्या और अनुपालन को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं।
धारा 1.5 और 1.7 को हटाने के दूरगामी प्रभाव हो सकते हैं- जैसे रेटिंग एजेंसीज और प्रसारण जगत के अन्य हितधारकों (DPOs, विज्ञापनदाताओं आदि) के बीच स्वामित्व संबंध और बोर्ड-स्तर पर निष्पक्षता का खत्म होना। अब Big Tech कंपनियों, ओटीटी प्लेटफॉर्म्स और DPOs को भी रेटिंग एजेंसीज का मालिक या नियंत्रक बनने की अनुमति मिल सकती है।
इससे निष्पक्षता पर बड़ा सवाल खड़ा होता है। उदाहरण के लिए, यदि कोई ओटीटी प्लेटफॉर्म किसी रेटिंग एजेंसी का मालिक हो, तो वह आंकड़ों को अपने पक्ष में मोड़ सकता है। पहले की नीति का मकसद “सामान्य दूरी पर संचालन” सुनिश्चित करना था। अब इन धाराओं को हटाने से ₹30,000 करोड़ से अधिक के विज्ञापन खर्चों को प्रभावित करने वाले डेटा की विश्वसनीयता पर संकट आ सकता है।
एक कानूनी विशेषज्ञ अलाय रजवी ने कहा, “ये बदलाव Big Tech (जैसे Google, Meta), ओटीटी प्लेटफॉर्म (Netflix, JioCinema), और DPOs (Tata Play, Airtel) को TRP रेटिंग एजेंसियां शुरू करने या उनमें निवेश करने की अनुमति दे सकते हैं। छोटे या स्वतंत्र खिलाड़ी तब तक टिक नहीं पाएंगे जब तक एक मजबूत नियामक ढांचा डेटा इंटरऑपरेबिलिटी और मानकीकरण सुनिश्चित न करे।”
हालांकि कुछ विशेषज्ञ इसे एक स्वागतयोग्य और लंबे समय से जरूरी सुधार मानते हैं।
TAM Media Research के CEO एलवी कृष्णन ने कहा, “बेशक, यह एक प्रगतिशील और सकारात्मक कदम है। ये संशोधन क्षेत्र को और अधिक प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए महत्वपूर्ण हैं। यह सिर्फ TAM के लिए नहीं, बल्कि किसी भी वैश्विक मापन कंपनी के लिए एक गेम-चेंजर है।”
विज्ञापनदाताओं की प्रतिक्रिया
एक वरिष्ठ मीडिया प्लानर ने कहा, “इस कदम से नए खिलाड़ी या निष्क्रिय एजेंसियां फिर से सक्रिय हो सकती हैं। इससे नवाचार बढ़ेगा और मूल्य निर्धारण बेहतर हो सकता है। विज्ञापनदाताओं को अब कई और विकल्प मिल सकते हैं, लेकिन मानकीकरण और विश्वसनीयता अहम रहेंगे।”
वहीं कुछ ब्रैंड्स को डर है कि यह प्रणाली को और अधिक बिखरा सकती है।
एक अन्य विज्ञापनदाता ने कहा, “पात्रता मानकों में ढील से गुणवत्ता के मानदंड कमजोर हो सकते हैं। जब अरबों रुपए मीडिया में खर्च होते हैं, तो रेटिंग पर विश्वास जरूरी होता है। नए या फिर से शुरू हुए खिलाड़ियों को भरोसा अर्जित करने में समय लगेगा।”
BFSI सेक्टर के एक विज्ञापनदाता ने कहा, “जब इतने पैसे इन नंबरों पर निर्भर हों, तो किसी भी प्रकार की पक्षपातपूर्ण या अपारदर्शी स्वामित्व तकनीक बाजार को बिगाड़ सकती है।”
GoNews इंडिया के संस्थापक पंकज पचौरी ने कहा, “भारतीय टीआरपी एजेंसीज की साख आम नागरिकों और मार्केटर्स दोनों में घटी है। टीवी चैनलों पर अक्सर टीआरपी के लिए सनसनीखेज और असत्यापित कंटेंट चलाने का आरोप लगता है, जैसा कि हालिया भारत-पाक युद्ध कवरेज में देखा गया।”
उन्होंने कहा, “विश्वसनीयता बहाल करने के लिए पारदर्शिता जरूरी है। MIB ने इन दो धाराओं को हटाकर स्थिति और बिगाड़ दी है। अगर रेटिंग एजेंसीज के निदेशक कंटेंट निर्माताओं से व्यापारिक रिश्ते बना सकें, तो उनकी निष्पक्षता और घटेगी। रेटिंग एजेंसीज को अपने व्यावसायिक हितों का खुलासा करना चाहिए, जैसे कि शेयर बाजार के विश्लेषक अपने होल्डिंग्स का करते हैं। MIB को क्लैश-ऑफ-इंटरस्ट डिस्क्लोजर अनिवार्य करना चाहिए, वो उल्टा कर रहा है।”
RSH Global की CMO पौलोमी रॉय ने कहा, “नियमों को प्रसारकों के प्रभाव को रोकने के लिए और सख्त बनाया गया है। अगर इसे उसी तरह पढ़ा जाए, तो आंकड़े और डेटा अधिक वास्तविक हो सकते हैं।”
उन्होंने कहा, “पहले से बनी धारणाओं को चुनौती दी जा सकेगी। ब्रॉडकास्टर का वितरण नेटवर्क नंबर तय करने में बड़ी भूमिका निभाएगा। दरें दोबारा तय की जा सकती हैं। इस अस्थिर वातावरण में सफल अभियान चलाना चुनौतीपूर्ण होगा।”
अब जब मंत्रालय अगले 30 दिनों के लिए सार्वजनिक टिप्पणियों को आमंत्रित कर चुका है, तो इंडस्ट्री एक केंद्रीय प्रश्न से जूझ रही है- क्या एक उदार, बहु-एजेंसी प्रणाली पारदर्शिता और जवाबदेही ला सकती है या यह विशेष हितों से संचालित अराजकता में बदल जाएगी?
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