ब्रॉडकास्ट ऑडियंस रिसर्च काउंसिल ने भी केंद्र सरकार का समर्थन करते हुए अदालत में कहा कि लैंडिंग पेज पर दिखाई देने वाली व्यूअरशिप वास्तविक दर्शकों की पसंद नहीं, बल्कि "फोर्स्ड व्यूइंग" होती है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
केरल हाईकोर्ट में मंगलवार को सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (एमआईबी) की टेलीविजन रेटिंग पॉलिसी, 2026 को लेकर महत्वपूर्ण सुनवाई हुई। विवाद का केंद्र नीति की वह धारा है, जिसके तहत टीवी सेट-टॉप बॉक्स के "लैंडिंग पेज" से मिलने वाली दर्शक संख्या (व्यूअरशिप) को आधिकारिक टीवी रेटिंग (टीआरपी) में शामिल नहीं किया जाएगा। ऑल इंडिया डिजिटल केबल फेडरेशन (AIDCF) और डेन नेटवर्क्स (DEN Networks) ने इस प्रावधान को चुनौती देते हुए कहा है कि केंद्र सरकार वही काम अप्रत्यक्ष रूप से कर रही है, जिसे भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (TRAI) सीधे तौर पर लागू नहीं कर सका था और जिस पर सुप्रीम कोर्ट में मामला लंबित है।
याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अरुण काथपालिया ने अदालत को बताया कि वर्ष 2018 में ट्राई ने प्रसारकों और वितरकों को लैंडिंग पेज पर रेटेड चैनलों को रखने से रोकने का निर्देश जारी किया था। हालांकि, दूरसंचार विवाद निपटान एवं अपीलीय अधिकरण (TDSAT) ने इस निर्देश को रद्द कर दिया था। ट्रिब्यूनल ने कहा था कि वितरकों के व्यावसायिक अधिकारों पर रोक केवल ट्राई अधिनियम की धारा 36 के तहत विधिवत बनाए गए विनियमों (Regulations) के माध्यम से ही लगाई जा सकती है, न कि केवल प्रशासनिक आदेश से। यह मामला अभी सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है।
याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि नई टीवी रेटिंग नीति लैंडिंग पेज पर चैनल दिखाने पर सीधे रोक नहीं लगाती, लेकिन उसकी व्यूअरशिप को टीआरपी से बाहर करके उसकी व्यावसायिक उपयोगिता समाप्त कर देती है। उनका कहना है कि सरकार वह परिणाम हासिल करना चाहती है, जिसे सीधे लागू करने पर कानूनी विवाद है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के टाटा प्रेस, साकाल पेपर्स और बेनेट कोलमैन जैसे फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि विज्ञापन और व्यावसायिक अभिव्यक्ति भी संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हिस्सा हैं। इसलिए विज्ञापन से जुड़े आर्थिक अधिकारों को प्रभावित करना मौलिक अधिकारों पर प्रत्यक्ष असर डालता है।
वहीं केंद्र सरकार ने इस दलील का विरोध करते हुए कहा कि यह नीति केवल रेटिंग मापने की कार्यप्रणाली (Measurement Methodology) से जुड़ी है और इसमें न तो लैंडिंग पेज पर चैनल रखने पर रोक है और न ही विज्ञापन देने पर। सरकार का कहना है कि केवल इतना तय किया गया है कि लैंडिंग पेज से उत्पन्न व्यूअरशिप को आधिकारिक टीआरपी गणना में शामिल नहीं किया जाएगा। सरकार ने यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामला ट्राई के अधिकार क्षेत्र (Jurisdiction) से संबंधित है, जबकि वर्तमान विवाद पूरी तरह रेटिंग पद्धति का है, इसलिए दोनों मामलों को एक जैसा नहीं माना जा सकता।
ब्रॉडकास्ट ऑडियंस रिसर्च काउंसिल (BARC) ने भी केंद्र सरकार का समर्थन करते हुए अदालत में कहा कि लैंडिंग पेज पर दिखाई देने वाली व्यूअरशिप वास्तविक दर्शकों की पसंद नहीं, बल्कि "फोर्स्ड व्यूइंग" होती है। BARC के अनुसार, उसकी डेटा वैलिडेशन क्वालिटी इनिशिएटिव और 2020 में लागू किए गए लैंडिंग पेज एल्गोरिद्म से यह पाया गया था कि इस तरह की व्यूअरशिप टीआरपी को कृत्रिम रूप से बढ़ाती है। इसलिए नई नीति केवल उसी सिद्धांत को औपचारिक रूप से लागू करती है, जिसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी स्वीकार किया जाता है। हालांकि याचिकाकर्ताओं का कहना है कि BARC का मौजूदा एल्गोरिद्म पहले से ही ऐसी गड़बड़ियों को रोकता है और सरकार ने यह साबित नहीं किया कि वह व्यवस्था पर्याप्त नहीं थी।
दोनों पक्षों की विस्तृत दलीलें सुनने के बाद न्यायमूर्ति बेचू कुरियन थॉमस ने कहा कि वह सभी तर्कों पर विचार करने के बाद शुक्रवार को अंतरिम राहत से जुड़े मामले पर आदेश देंगे। इस मामले पर पूरे प्रसारण उद्योग, केबल और डीटीएच कंपनियों, विज्ञापनदाताओं तथा BARC की नजर है, क्योंकि अदालत का फैसला भविष्य में भारत में टीवी रेटिंग प्रणाली और लैंडिंग पेज विज्ञापनों के व्यावसायिक महत्व को प्रभावित कर सकता है।
विकास खनचंदानी (Vikas Khanchandani) और राज नायक (Raj Nayak) का पेशेवर संबंध काफी पुराना है। दोनों ने स्टार इंडिया (Star India) में साथ काम किया था।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
मीडिया और मनोरंजन उद्योग के वरिष्ठ पेशेवर विकास खनचंदानी का दंगल टीवी (Dangal TV) के साथ कंसल्टिंग अनुबंध जल्द समाप्त होने वाला है। इस घटनाक्रम की पुष्टि उद्योग से जुड़े सूत्रों ने की है। दंगल टीवी के साथ अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने सलाहकार (Advisor) के रूप में नेटवर्क की रणनीतिक दिशा तय करने और उसके विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
विकास खनचंदानी ने दंगल टीवी के लिए बिजनेस स्ट्रैटेजी (Business Strategy), डिस्ट्रीब्यूशन (Distribution) और तेजी से विकसित हो रहे डिजिटल तथा FAST (Free Ad-Supported Streaming Television) इकोसिस्टम से जुड़े कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में योगदान दिया।
वर्तमान में विकास खनचंदानी (Vikas Khanchandani) मीडिया और एंटरटेनमेंट सेक्टर की कई कंपनियों के साथ सलाहकार के रूप में जुड़े हुए हैं। वह दीपक धर (Deepak Dhar) के नेतृत्व वाली बनिजय एशिया (Banijay Asia) के साथ भी कंसल्टिंग भूमिका निभा रहे हैं, जो देश की प्रमुख कंटेंट प्रोडक्शन कंपनियों में शामिल है।
इस घटनाक्रम के बाद उद्योग में यह चर्चा भी तेज हो गई है कि क्या विकास खनचंदानी (Vikas Khanchandani) राज नायक (Raj Nayak) के चेयरमैन एवं मैनेजिंग डायरेक्टर (Chairman & Managing Director) बनने के बाद YAAP Digital के साथ कंसल्टिंग भूमिका में जुड़ सकते हैं। हालांकि, इस संबंध में न तो विकास खनचंदानी और न ही YAAP Digital की ओर से कोई आधिकारिक पुष्टि की गई है।
विकास खनचंदानी (Vikas Khanchandani) और राज नायक (Raj Nayak) का पेशेवर संबंध काफी पुराना है। दोनों ने स्टार इंडिया (Star India) में साथ काम किया था, जहां विकास खनचंदानी ने अपने मीडिया करियर की शुरुआत सेल्स और मार्केटिंग रणनीतियों से की थी।
ब्रॉडकास्ट ऑडियंस रिसर्च काउंसिल (BARC) द्वारा टीवी ऑडियंस रेटिंग्स (TRP) जारी किए जाने पर लगी रोक का असर अब टीवी इंडस्ट्री के अंदर साफ तौर पर दिखने लगा है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
ब्रॉडकास्ट ऑडियंस रिसर्च काउंसिल (BARC) द्वारा टीवी ऑडियंस रेटिंग्स (TRP) जारी किए जाने पर लगी रोक का असर अब टीवी इंडस्ट्री के अंदर साफ तौर पर दिखने लगा है। अब तक जहां चैनलों के प्रोग्रामिंग प्रमुख हर सप्ताह मिलने वाली रेटिंग्स के आधार पर नए शो, कहानी, टाइम स्लॉट और कलाकारों से जुड़े फैसले लेते थे, वहीं अब उन्हें बिना किसी ठोस दर्शक डेटा के ही निर्णय लेने पड़ रहे हैं।
अब तक इस फैसले को विज्ञापन कारोबार के नजरिए से देखा जा रहा था, लेकिन टीवी इंडस्ट्री के अधिकारियों का कहना है कि इसका सबसे बड़ा असर कंटेंट और प्रोग्रामिंग टीमों पर पड़ रहा है। ये टीमें किसी भी शो के प्रदर्शन का आकलन करने और आगे की रणनीति तय करने के लिए BARC की रेटिंग्स पर काफी हद तक निर्भर रहती थीं। ऐसे समय में जब टीवी चैनल त्योहारी सीजन की तैयारी में जुटे हैं और बड़े पैमाने पर नए शो लॉन्च कर रहे हैं, रेटिंग्स का न होना उनके लिए बड़ी चुनौती बन गया है।
हाल ही में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (MIB) ने BARC को निर्देश दिया था कि वह नई टेलीविजन रेटिंग्स पॉलिसी-2026 के तहत पंजीकरण पूरा होने तक सभी श्रेणियों की टीवी रेटिंग्स प्रकाशित करना बंद कर दे। इसके बाद पूरे टीवी उद्योग के पास प्रदर्शन मापने का साझा और विश्वसनीय पैमाना फिलहाल उपलब्ध नहीं है।
नए शो लॉन्च हो रहे, लेकिन नहीं मिल रहा दर्शकों का फीडबैक
पिछले कुछ हफ्तों में कई बड़े मनोरंजन चैनलों ने अपने नए शो लॉन्च किए हैं। इनमें Star Plus का 'Sairaab', Colors का 'Juhi Mui', Zee TV के 'Tu Hi Re Dil Mein' और 'Dilo Ki Ram Leela', तथा Sony SAB का 'Hastinapur Ke Veer' शामिल हैं।
आम तौर पर इन शो के प्रसारण के बाद प्रोग्रामिंग टीमें हर हफ्ते आने वाली रेटिंग्स का विश्लेषण करतीं और यह तय करतीं कि कहानी, कलाकार, प्रोमोशन या टाइम स्लॉट में किसी बदलाव की जरूरत है या नहीं। लेकिन अब ये सभी फैसले बिना दर्शकों के वास्तविक डेटा के लिए जा रहे हैं।
उद्योग से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि यह स्थिति सिर्फ शो के प्रदर्शन का आकलन करने में देरी नहीं कर रही, बल्कि टीवी चैनलों की जोखिम लेने की क्षमता पर भी असर डाल सकती है। खासकर ऐसे समय में, जब त्योहारी सीजन टीवी कारोबार का सबसे महत्वपूर्ण दौर माना जाता है।
'अब डेटा नहीं, अनुभव के भरोसे हो रहे फैसले'
मार्केटिंग विशेषज्ञ और कॉलमनिस्ट शुभ्रांशु सिंह का कहना है कि BARC रेटिंग्स बंद होने से यह साफ हो गया है कि टीवी इंडस्ट्री किस हद तक लगातार मिलने वाले दर्शक डेटा पर निर्भर हो चुकी है।
उनके मुताबिक, टीवी इंडस्ट्री में लंबे समय से भरोसे के साथ रेटिंग्स का इस्तेमाल किया जाता रहा है। अब रेटिंग्स नहीं होने पर चैनलों को वैकल्पिक आंकड़ों जैसे Connected TV, डिजिटल व्यूअरशिप, रीच अनुमान और अन्य स्वतंत्र मापन उपकरणों पर ज्यादा भरोसा करना पड़ सकता है।
हालांकि उनका मानना है कि सबसे ज्यादा असर प्रोग्रामिंग टीमों पर पड़ा है।
उन्होंने कहा कि भारतीय जनरल एंटरटेनमेंट चैनलों (GEC) की प्रोग्रामिंग हर सप्ताह मिलने वाले मिनट-दर-मिनट डेटा के आधार पर लगातार बदली जाती है। अब फैसले अनुभव और अनुमान के आधार पर लिए जा रहे हैं। यह रचनात्मक प्रक्रिया के लिए तो ठीक हो सकती है, लेकिन बजट और कारोबारी बैठकों में ऐसे फैसलों को सही ठहराना आसान नहीं होगा।
उनका कहना है कि जब किसी के पास स्पष्ट डेटा नहीं होता तो संस्थाएं आमतौर पर सुरक्षित विकल्प चुनती हैं और नए प्रयोगों से बचती हैं।
त्योहारी सीजन में बढ़ी चिंता
शुभ्रांशु सिंह के अनुसार, त्योहारी सीजन वह समय होता है जब नए शो लॉन्च होते हैं, विज्ञापन खर्च बढ़ता है और प्रीमियम विज्ञापन स्लॉट की सबसे ज्यादा मांग रहती है। ऐसे में रेटिंग्स उपलब्ध न होने से विज्ञापन दर तय करना भी मुश्किल हो सकता है।
उन्होंने कहा कि बड़े शो भले ही विज्ञापनदाताओं को आकर्षित करते रहें, लेकिन वे कार्यक्रम जिनकी प्रीमियम कीमतें रेटिंग्स के आधार पर तय होती थीं, उन्हें ज्यादा मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है।
उन्होंने यह भी कहा कि न्यूज चैनलों के पास डिजिटल प्लेटफॉर्म पर YouTube, ऐप ट्रैफिक और सोशल मीडिया जैसे कई रियल-टाइम संकेत उपलब्ध हैं, लेकिन ये टीवी दर्शकों का पूरा प्रतिनिधित्व नहीं करते। इसलिए किसी नए शो की सफलता का आकलन फिलहाल उसके प्रभाव और चर्चा के आधार पर होगा, न कि किसी आधिकारिक आंकड़े से।
न्यूजरूम में भी बदल रहा है फैसला लेने का तरीका
शुभ्रांशु सिंह का कहना है कि टीवी न्यूज रूम में भी रेटिंग्स न होने से निर्णय लेने का तरीका बदल गया है।
उनके मुताबिक, अब वह स्कोरबोर्ड ही नहीं रहा जिसके आधार पर संपादकीय फैसलों की तुलना की जाती थी। ऐसे में संपादकीय अनुभव और निर्णय क्षमता फिर से सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।
हालांकि उनका यह भी मानना है कि जब अलग-अलग कार्यक्रमों के प्रदर्शन का स्पष्ट डेटा नहीं होगा, तो ज्यादातर चैनल सुरक्षित और एक जैसे फॉर्मेट अपनाने लगेंगे। इसका सबसे ज्यादा असर नए और तेजी से आगे बढ़ रहे चैनलों पर पड़ सकता है।
'हर गुरुवार का कामकाज प्रभावित हुआ'
SUN Udaya की प्रोग्रामिंग हेड वैष्णवी एचएस का कहना है कि साप्ताहिक BARC रेटिंग्स हमेशा से प्रोग्रामिंग और क्रिएटिव टीमों के लिए निर्णय लेने का सबसे महत्वपूर्ण आधार रही हैं। उन्होंने कहा कि BARC रेटिंग्स न मिलने से सिर्फ उनका हर गुरुवार प्रभावित नहीं हुआ है, बल्कि नए शो और नए आईपी (IP) लॉन्च करने की योजना बनाना भी मुश्किल हो गया है।
हालांकि वह मानती हैं कि हर चुनौती अपने साथ नए अवसर भी लेकर आती है।
उनके मुताबिक, जिस तरह कोविड-19 के दौरान इंडस्ट्री ने नए प्रयोग किए थे, उसी तरह यह दौर भी प्रोग्रामिंग में नए प्रयोगों के लिए अवसर बन सकता है।
उन्होंने बताया कि फिलहाल उनकी टीम अपने अनुभव, ब्रांड की ताकत और पिछले वर्षों की रेटिंग्स के आधार पर दर्शकों के व्यवहार का अनुमान लगा रही है। साथ ही उम्मीद है कि त्योहारी सीजन शुरू होने से पहले BARC रेटिंग्स दोबारा शुरू हो जाएंगी।
'डेटा नहीं तो सबसे ऊंची आवाज ही सच बन जाएगी'
Sales Strategist LLP के संस्थापक और Connected TV विशेषज्ञ विशाल खन्ना का कहना है कि यह सिर्फ अस्थायी समस्या नहीं, बल्कि एक बड़ा संरचनात्मक बदलाव है।
उनके मुताबिक, टीवी प्रोग्रामिंग पूरी तरह साप्ताहिक फीडबैक सिस्टम पर चलती है। सप्ताह के बीच में डेटा आता है और उसी के आधार पर सप्ताहांत तक कलाकार, कहानी, टाइम स्लॉट और अन्य बदलाव किए जाते हैं। उन्होंने कहा कि अब यह प्रक्रिया धीमी नहीं हुई है, बल्कि पूरी तरह टूट गई है। फैसले अब भी लिए जा रहे हैं, लेकिन बिना किसी मापन प्रणाली के।
विशाल खन्ना का कहना है कि जब निष्पक्ष आंकड़े उपलब्ध नहीं होते, तब संगठन में सबसे प्रभावशाली व्यक्ति की राय ही सबसे बड़ा 'डेटा' बन जाती है।
उन्होंने कहा कि पहले जिन फैसलों का आधार आंकड़े होते थे, अब वे वरिष्ठता और अनुभव के आधार पर लिए जा रहे हैं। इनमें कुछ फैसले सही भी होंगे, लेकिन यह पता लगाने का कोई तरीका नहीं होगा कि कौन-सा फैसला वास्तव में सफल रहा।
नए शो लॉन्च करने से भी बच सकते हैं चैनल
विशाल खन्ना का मानना है कि इस पूरी स्थिति का सबसे बड़ा असर उन नए कार्यक्रमों पर पड़ेगा जिन्हें अभी मंजूरी मिलनी है। उनके मुताबिक, कोई भी प्रोग्रामिंग प्रमुख ऐसी स्थिति में किसी नए और जोखिम वाले शो को लॉन्च नहीं करना चाहेगा, जब उसके प्रदर्शन को मापने का कोई भरोसेमंद तरीका ही मौजूद न हो।
ऐसे में पहले से सफल फॉर्मेट को आगे बढ़ाया जाएगा, लोकप्रिय चेहरों को फिर से मौका मिलेगा और नए प्रयोगों को कुछ समय के लिए टाल दिया जाएगा।
उनका कहना है कि BARC रेटिंग्स पर लगी रोक सिर्फ दर्शकों की माप को नहीं रोक रही, बल्कि यह चुपचाप यह भी तय कर रही है कि आने वाले महीनों में टीवी पर किस तरह के शो बनेंगे और कौन-से नहीं।
अनुभव और अनुमान के सहारे आगे बढ़ रही इंडस्ट्री
कुल मिलाकर, टीवी इंडस्ट्री फिलहाल ऐसे दौर से गुजर रही है जहां नए शो लॉन्च हो रहे हैं, विज्ञापन सौदे भी हो रहे हैं और प्रोग्रामिंग टीमों को हर सप्ताह फैसले भी लेने पड़ रहे हैं। लेकिन BARC के दर्शक आंकड़ों के बिना अब ये निर्णय वास्तविक डेटा के बजाय अनुभव, अनुमान और पुराने रुझानों के आधार पर लिए जा रहे हैं। ऐसे में टीवी इंडस्ट्री के सबसे महत्वपूर्ण कारोबारी सीजन से ठीक पहले यह बदलाव आने वाले महीनों में चैनलों की कंटेंट रणनीति और नए शो लॉन्च करने के तरीके को भी प्रभावित कर सकता है।
देश की DTH और केबल टीवी कंपनियों ने सरकार से मांग की है कि टीवी सेवाएं चाहे सैटेलाइट, केबल या इंटरनेट के जरिए दी जाएं, सभी के लिए एक जैसे नियम बनाए जाएं।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
देश की DTH और केबल टीवी कंपनियों ने सरकार से मांग की है कि टीवी सेवाएं चाहे सैटेलाइट, केबल या इंटरनेट के जरिए दी जाएं, सभी के लिए एक जैसे नियम बनाए जाएं। कंपनियों का कहना है कि अलग-अलग प्लेटफॉर्म पर अलग-अलग नियम होने से प्रतिस्पर्धा का संतुलन बिगड़ रहा है।
यह मांग ऐसे समय में आई है, जब सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (MIB) टेलीकम्युनिकेशंस एक्ट के तहत Telecommunications (Television, Radio and Associated Services) Rules, 2026 को अंतिम रूप देने की तैयारी कर रहा है। इन मसौदा नियमों को 12 जून को सार्वजनिक सुझावों के लिए जारी किया गया था।
उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि नए नियमों में पुराने लाइसेंसिंग सिस्टम को हटाकर एक नई ऑथराइजेशन व्यवस्था लाना स्वागत योग्य कदम है। लेकिन उनका मानना है कि मसौदे में अभी भी अलग-अलग प्लेटफॉर्म के लिए अलग वित्तीय और नियामकीय शर्तें रखी गई हैं, जिससे समान प्रतिस्पर्धा नहीं हो पा रही है।
फिलहाल निजी DTH कंपनियों को हर साल ऑथराइजेशन शुल्क देना पड़ता है, बैंक गारंटी जमा करनी होती है और कई तरह के नियामकीय नियमों का पालन करना पड़ता है।
वहीं, प्रसार भारती के मुफ्त DTH प्लेटफॉर्म DD Free Dish पर ऐसे नियम लागू नहीं हैं। दूसरी ओर, इंटरनेट आधारित नई सेवाएं जैसे Application-based Linear Television Distribution (ALTD) और Free Ad-supported Streaming Television (FAST) चैनल भी प्रस्तावित नियमों के दायरे से बाहर हैं।
केबल ऑपरेटर भी अभी केबल टेलीविजन नेटवर्क्स एक्ट के तहत काम कर रहे हैं। उद्योग का कहना है कि इससे भी नियामकीय असमानता बनी हुई है।
उद्योग के अधिकारियों के मुताबिक, DTH कंपनियां जल्द ही मसौदा नियमों पर अपनी आधिकारिक प्रतिक्रिया सरकार को सौंपेंगी। उनकी कई मांगें ऑल इंडिया डिजिटल केबल फेडरेशन (AIDCF) द्वारा पहले से दिए गए सुझावों से मिलती-जुलती हैं।
इन मांगों में TRAI की कई पुरानी सिफारिशों को लागू करना भी शामिल है। TRAI पहले ही ALTD और FAST सेवाओं पर परामर्श प्रक्रिया पूरी कर चुका है और जल्द ही अपनी सिफारिशें सरकार को सौंप सकता है।
उद्योग चाहता है कि DTH कंपनियों पर लगने वाला ऑथराइजेशन शुल्क मौजूदा 8% से घटाकर 3% किया जाए। इसके अलावा बैंक गारंटी की राशि कम करने, ग्रॉस रेवेन्यू (AGR) की परिभाषा स्पष्ट करने और सरकार के ऑडिट अधिकारों पर भी स्पष्ट नियम बनाए जाएं।
AIDCF ने यह भी मांग की है कि सभी टीवी प्लेटफॉर्म पर एक समान प्रोग्रामिंग और विज्ञापन संहिता (Programming & Advertisement Code) लागू हो। साथ ही DD Free Dish पर चरणबद्ध तरीके से एन्क्रिप्शन लागू किया जाए और ग्राउंड-आधारित प्रसारण सेवाओं से जुड़ी TRAI की सिफारिशों को भी नए नियमों में शामिल किया जाए।
यह मांग ऐसे समय में आई है, जब देश में पेड टीवी बाजार लगातार सिकुड़ रहा है।
FICCI-EY मीडिया एंड एंटरटेनमेंट रिपोर्ट 2026 के अनुसार, भारत में DTH ग्राहकों की संख्या घटकर 4.9 करोड़ रह गई है, जबकि दो साल पहले यह 6.2 करोड़ से अधिक थी।
इसी अवधि में लीनियर टीवी वितरण से होने वाली आय 2024 के 38,500 करोड़ रुपये से घटकर 2025 में 35,400 करोड़ रुपये रह गई। इसकी बड़ी वजह यह रही कि करीब 1.15 करोड़ परिवारों ने पेड टीवी सेवाएं लेना बंद कर दिया। हालांकि, प्रति उपभोक्ता औसत आय (ARPU) 2.4% बढ़कर 288 रुपये हो गई।
उद्योग का कहना है कि आज दर्शक एक ही टीवी चैनल को केबल, DTH और इंटरनेट- तीनों माध्यमों से देख सकते हैं। ऐसे में अलग-अलग प्लेटफॉर्म के लिए अलग नियम अब व्यावहारिक नहीं रह गए हैं।
कंपनियों का तर्क है कि यदि ALTD, FAST और DD Free Dish जैसी सेवाओं पर समान नियम लागू नहीं किए गए, तो कुछ प्लेटफॉर्म बिना अतिरिक्त लागत और नियमों का पालन किए बाजार में प्रतिस्पर्धा करेंगे, जबकि लाइसेंस प्राप्त कंपनियों पर पूरा नियामकीय बोझ बना रहेगा।
अब मीडिया, प्रसारण और निवेश जगत की नजर सरकार के अंतिम फैसले पर टिकी है। माना जा रहा है कि यदि सरकार TRAI की सिफारिशों को शामिल करते हुए सभी टीवी प्लेटफॉर्म के लिए समान नियामकीय ढांचा लागू करती है, तो इससे भारत के टीवी वितरण उद्योग की प्रतिस्पर्धा और भविष्य की दिशा पर बड़ा असर पड़ सकता है।
संसद ने सरकार के प्रस्तावित 'टेलीकम्युनिकेशंस (टेलीविजन, रेडियो और संबद्ध सेवाएं) नियम, 2026' पर भी चर्चा शुरू कर दी है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
इमरान फजल, असिसटेंट एडिटर, एक्सचेंज4मीडिया ।।
सरकार की ओर से भारत की टेलीविजन ऑडियंस मीजरमेंट व्यवस्था में बड़े बदलाव और पूरे ब्रॉडकास्टिंग सेक्टर को एकीकृत नियामक ढांचे के तहत लाने की योजना अब संसद की जांच के दायरे में आ गई है। राज्यसभा और लोकसभा, दोनों सदनों के सांसदों ने सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (MIB) से ब्रॉडकास्ट ऑडियंस रिसर्च काउंसिल (BARC) के भविष्य, प्रस्तावित टेलीविजन रेटिंग्स पॉलिसी-2026 और मसौदा टेलीकम्युनिकेशंस (टेलीविजन, रेडियो एंड एसोसिएटेड सर्विसेज) रूल्स-2026 को लेकर विस्तृत जानकारी मांगी है।
संसद के दोनों सदनों में पूछे जाने वाले सवालों से साफ है कि सांसद सरकार की दो महत्वपूर्ण नीतिगत पहलों पर स्पष्टता चाहते हैं, जो भारत के ब्रॉडकास्टिंग सेक्टर की तस्वीर बदल सकती हैं। एक ओर सवाल टीवी ऑडियंस मीजरमेंट सिस्टम और रेटिंग एजेंसियों के नियामक ढांचे से जुड़े हैं, वहीं दूसरी ओर सरकार की उस योजना पर सवाल उठाए गए हैं, जिसके तहत टेलीकम्युनिकेशंस एक्ट-2023 के अंतर्गत ब्रॉडकास्टिंग से जुड़े कई नियमों को एक ही ढांचे में लाने का प्रस्ताव है।
राज्यसभा में BARC और नई टीवी रेटिंग नीति पर उठे सवाल
राज्यसभा में सांसद डॉ. जॉन ब्रिटास ने प्रस्तावित टेलीविजन रेटिंग्स पॉलिसी-2026 को लेकर कई सवाल उठाए हैं। उनके सवालों का केंद्र BARC है, जो फिलहाल देश में टीवी दर्शकों की रेटिंग मापने वाली प्रमुख संस्था है।
उन्होंने सरकार से पूछा है कि क्या सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने BARC को निर्देश दिया है कि वह प्रस्तावित टेलीविजन रेटिंग्स पॉलिसी-2026 के तहत पंजीकरण पूरा होने तक सभी श्रेणियों की टीवी रेटिंग प्रकाशित करना बंद कर दे।
उन्होंने यह भी जानना चाहा है कि यदि ऐसा कोई निर्देश दिया गया है, तो इसके पीछे क्या कारण हैं और टीवी रेटिंग्स दोबारा कब से जारी होने की संभावना है।
डॉ. ब्रिटास ने सरकार से यह भी पूछा है कि क्या नई नीति के तहत मौजूदा व्यवस्था की जगह एक से अधिक टीवी ऑडियंस मीजरमेंट एजेंसियों को काम करने की अनुमति देने की योजना है।
इसके अलावा उन्होंने यह भी जानना चाहा है कि इन एजेंसियों के चयन, पंजीकरण, मान्यता, नियमन और आवश्यकता पड़ने पर उन्हें हटाने की प्रक्रिया में केंद्र सरकार की क्या भूमिका होगी। साथ ही उन्होंने यह भी पूछा है कि इन एजेंसियों की परिचालन और कार्यात्मक स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए सरकार कौन-कौन से सुरक्षा उपाय प्रस्तावित कर रही है।
उन्होंने सरकार से यह भी जानकारी मांगी है कि टेलीविजन रेटिंग्स पॉलिसी-2026 के तहत पारदर्शिता बढ़ाने, प्रतिस्पर्धा को प्रोत्साहित करने, सैंपल कवरेज का विस्तार करने और टीवी ऑडियंस मीजरमेंट सिस्टम की विश्वसनीयता बढ़ाने के लिए कौन-कौन से बड़े सुधार प्रस्तावित किए गए हैं।
ये सवाल ऐसे समय में उठाए गए हैं, जब पूरा मीडिया उद्योग सरकार की नई टीवी रेटिंग व्यवस्था को लेकर नजर बनाए हुए है। संसद में उठे इन सवालों से संकेत मिलता है कि सांसद यह जानना चाहते हैं कि क्या नई नीति के तहत कई रेटिंग एजेंसियों को अनुमति देकर टीवी ऑडियंस मीजरमेंट सिस्टम की मौजूदा संरचना में बड़ा बदलाव किया जाएगा और इस पूरे सिस्टम में सरकार की निगरानी की भूमिका क्या होगी।
ब्रॉडकास्टिंग नियमों के मसौदे पर भी दोनों सदनों में चर्चा
संसद ने सरकार के प्रस्तावित टेलीकम्युनिकेशंस (टेलीविजन, रेडियो एंड एसोसिएटेड सर्विसेज) रूल्स-2026 पर भी सवाल उठाए हैं। इन नियमों का उद्देश्य ब्रॉडकास्टिंग से जुड़े कई मौजूदा दिशा-निर्देशों को टेलीकम्युनिकेशंस एक्ट-2023 के तहत एकीकृत नियामक ढांचे में शामिल करना है।
राज्यसभा में सांसद नरेश बंसल, डॉ. कविता पाटीदार और रामराव सखाराम वडकुटे ने सरकार से पूछा है कि क्या सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने इन मसौदा नियमों को जारी कर दिया है और क्या इनका उद्देश्य मौजूदा ब्रॉडकास्टिंग नियमों को एकीकृत ढांचे में लाना है।
उन्होंने सरकार से मसौदा नियमों की प्रमुख विशेषताओं, इन्हें अंतिम रूप देने और लागू करने की समयसीमा तथा नए नियामक ढांचे में उद्योग को सहज रूप से स्थानांतरित करने के लिए उठाए जाने वाले कदमों की भी जानकारी मांगी है।
लोकसभा में भी उठे वही सवाल
यह मुद्दा लोकसभा में भी उठाया गया है, जिससे साफ है कि प्रस्तावित ब्रॉडकास्टिंग सुधार दोनों सदनों के सांसदों की प्राथमिकता में शामिल हैं।
लोकसभा सांसद मुकेशकुमार चंद्रकांत दलाल और दिनेशभाई मकवाणा ने सरकार से पूछा है कि क्या टेलीकम्युनिकेशंस (टेलीविजन, रेडियो एंड एसोसिएटेड सर्विसेज) रूल्स-2026 का मसौदा जारी किया जा चुका है। उन्होंने इन नियमों की प्रमुख विशेषताओं की भी जानकारी मांगी है।
दोनों सांसदों ने सरकार से यह भी पूछा है कि इन नियमों को लागू करने की क्या योजना है और नए ढांचे में ब्रॉडकास्टर्स तथा अन्य संबंधित पक्षों को सहयोग देने के लिए कौन-कौन से कदम उठाए जाएंगे।
लोकसभा सदस्यों ने यह भी जानना चाहा है कि क्या मसौदा नियमों में उभरते डिजिटल मीडिया को बढ़ावा देने, स्थानीय ब्रॉडकास्टर्स और कम्युनिटी रेडियो को मजबूत करने तथा ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों में ब्रॉडकास्टिंग इंफ्रास्ट्रक्चर बेहतर बनाने के लिए विशेष प्रावधान किए गए हैं।
इसके अलावा उन्होंने यह भी पूछा है कि क्या सरकार प्रस्तावित ढांचे के तहत मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले के दूरस्थ क्षेत्रों में नए सूचना केंद्र और कम्युनिटी रेडियो स्टेशन स्थापित कर डिजिटल कनेक्टिविटी और स्थानीय प्रसारण नेटवर्क का विस्तार करने पर विचार कर रही है।
ब्रॉडकास्टिंग सुधारों पर संसद ने मांगा रोडमैप
राज्यसभा और लोकसभा में उठाए गए सवालों से स्पष्ट है कि संसद केवल सरकार के व्यापक ब्रॉडकास्टिंग सुधारों की ही समीक्षा नहीं कर रही, बल्कि भारत के टीवी ऑडियंस मीजरमेंट सिस्टम के भविष्य को लेकर भी जवाब चाहती है।
BARC की भूमिका, एक से अधिक रेटिंग एजेंसियों को अनुमति देने की संभावना, ऑडियंस मीजरमेंट संस्थाओं की स्वतंत्रता और टेलीकम्युनिकेशंस एक्ट-2023 के तहत ब्रॉडकास्टिंग नियमों के एकीकरण जैसे मुद्दों पर सांसद यह जानना चाहते हैं कि इन प्रस्तावित सुधारों का असर ब्रॉडकास्टर्स, विज्ञापनदाताओं, रेटिंग एजेंसियों, स्थानीय प्रसारकों और पूरे मीडिया उद्योग पर किस तरह पड़ेगा।
अब सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय से उम्मीद की जा रही है कि वह संसद में इन सभी सवालों का औपचारिक जवाब देगा। माना जा रहा है कि इन जवाबों से टेलीविजन रेटिंग्स पॉलिसी-2026 के तहत BARC के भविष्य, सरकार की टीवी ऑडियंस मीजरमेंट को लेकर नीति और टेलीकम्युनिकेशंस (टेलीविजन, रेडियो एंड एसोसिएटेड सर्विसेज) रूल्स-2026 को लागू करने के रोडमैप पर पहली आधिकारिक तस्वीर सामने आएगी।
Zee एंटरटेनमेंट (ZEEL) अपने म्यूजिक कारोबार Zee Music में 49 फीसदी हिस्सेदारी बेचने की संभावना तलाश रही है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
Zee एंटरटेनमेंट (ZEEL) अपने म्यूजिक कारोबार Zee Music में 49 फीसदी हिस्सेदारी बेचने की संभावना तलाश रही है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस प्रक्रिया के तहत कंपनी पहले Zee Music को अपने मौजूदा बिजनेस यूनिट ढांचे से अलग कर एक स्वतंत्र सब्सिडियरी (सहायक कंपनी) बनाएगी। इसके बाद हिस्सेदारी बिक्री की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाएगी।
रिपोर्ट के अनुसार, Zee Entertainment ने Zee Music का करीब 6,000 करोड़ रुपये का वैल्यूएशन तय किया है और 49 फीसदी हिस्सेदारी के लिए संभावित निवेशकों से बातचीत की जा सकती है।
फिलहाल Zee Music, Zee Entertainment के भीतर एक बिजनेस यूनिट के रूप में काम कर रही है। कंपनी का मानना है कि इसे अलग सब्सिडियरी बनाने से निवेशकों के लिए इसमें निवेश करना आसान होगा और हिस्सेदारी बिक्री की प्रक्रिया भी बेहतर तरीके से पूरी की जा सकेगी।
बताया जा रहा है कि Zee Entertainment इस कदम के जरिए अपने म्यूजिक कारोबार की वास्तविक वैल्यू को सामने लाना चाहती है। कंपनी का उद्देश्य रणनीतिक निवेशकों को जोड़कर इस बिजनेस को आगे बढ़ाना और इसके विस्तार के लिए नई पूंजी जुटाना है।
प्रस्तावित योजना के तहत:
Zee Music को पहले बिजनेस यूनिट से बदलकर अलग सब्सिडियरी बनाया जाएगा।
इसके बाद कंपनी इसमें 49 फीसदी हिस्सेदारी बेचने की संभावनाएं तलाशेगी।
Zee Music का अनुमानित वैल्यूएशन 6,000 करोड़ रुपये रखा गया है।
हालांकि, कंपनी की ओर से इस संभावित हिस्सेदारी बिक्री को लेकर अभी तक कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, Zee Entertainment फिलहाल इस रणनीतिक पुनर्गठन (Strategic Restructuring) पर काम कर रही है और संभावित निवेशकों के विकल्पों का आकलन कर रही है।
अगर यह सौदा पूरा होता है, तो इससे Zee Entertainment को अपने म्यूजिक कारोबार की वैल्यू अनलॉक करने, नई पूंजी जुटाने और बिजनेस को अलग पहचान के साथ आगे बढ़ाने में मदद मिल सकती है।
न्यू दिल्ली टेलीविजन लिमिटेड (NDTV) ने GoodTimes चैनल के अधिग्रहण (Acquisition) को लेकर नया अपडेट जारी किया है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
न्यू दिल्ली टेलीविजन लिमिटेड (NDTV) ने GoodTimes चैनल के अधिग्रहण (Acquisition) को लेकर नया अपडेट जारी किया है। कंपनी ने बताया कि यह सौदा अब तय समय पर पूरा नहीं हो पाएगा और इसके पूरा होने में करीब तीन महीने और लग सकते हैं।
NDTV ने बताया कि उसने 18 जून 2026 को Lifestyle & Media Broadcasting Limited से GoodTimes चैनल के बिजनेस अंडरटेकिंग (Business Undertaking) के अधिग्रहण की घोषणा की थी। हालांकि, फिलहाल इस सौदे से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण पहलुओं पर दोनों पक्षों के बीच बातचीत जारी है।
कंपनी के मुताबिक, इन्हीं लंबित मुद्दों के चलते अब इस अधिग्रहण के पूरा होने में लगभग तीन महीने का अतिरिक्त समय लगने की उम्मीद है।
NDTV ने यह भी स्पष्ट किया कि यह सौदा अभी भी विभिन्न वैधानिक (Statutory) और नियामकीय (Regulatory) मंजूरियों के साथ-साथ अन्य आवश्यक शर्तों के पूरा होने पर निर्भर करेगा।
कंपनी ने कहा कि सभी जरूरी मंजूरियां और औपचारिकताएं पूरी होने के बाद ही GoodTimes चैनल के अधिग्रहण की प्रक्रिया पूरी की जाएगी।
NDTV ने यह जानकारी सेबी (SEBI) के लिस्टिंग नियमों के तहत बीएसई (BSE) और नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) को भेजी है।
GTC Network के फाउंडर व मैनेजिंग डायरेक्टर डॉ. रवींद्र नारायण ने सूचना एवं प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव को एक पत्र लिखा है
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
GTC Network के फाउंडर व मैनेजिंग डायरेक्टर (Founder & MD) डॉ. रबिन्द्र नारायण ने सूचना एवं प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव को एक पत्र लिखकर 15 जनवरी 2025 को जारी TRAI की ग्राउंड-बेस्ड ब्रॉडकास्टर्स (Ground-based Broadcasters) संबंधी सिफारिशों को जल्द लागू करने की मांग की है। उन्होंने कहा है कि टीवी चैनलों के प्रसारण के लिए केवल सैटेलाइट पर निर्भर रहने की अनिवार्यता अब खत्म की जानी चाहिए।
उन्होंने कहा कि इस सुधार प्रक्रिया की शुरुआत खुद सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (MIB) ने की थी। TRAI अपनी सिफारिशें दे चुका है और अब सिर्फ इन्हें लागू किया जाना बाकी है।
MIB ने शुरू की थी यह प्रक्रिया
22 मई 2024 को सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने TRAI अधिनियम, 1997 की धारा 11(1)(a) के तहत ग्राउंड-बेस्ड ब्रॉडकास्टर्स के लिए नियामकीय ढांचे (Regulatory Framework) पर TRAI से सिफारिशें मांगी थीं।
इसके बाद TRAI ने पूरी परामर्श प्रक्रिया पूरी की। 18 अक्टूबर 2024 को परामर्श पत्र (Consultation Paper) जारी किया गया, 20 दिसंबर 2024 को ओपन हाउस चर्चा आयोजित हुई और 15 जनवरी 2025 को अंतिम सिफारिशें जारी कर दी गईं। हालांकि, सिफारिशें जारी हुए 18 महीने बीत चुके हैं, लेकिन अब तक इन्हें अधिसूचित (Notification) नहीं किया गया है।
TRAI ने क्या सिफारिश की है?
2022 की अपलिंकिंग और डाउनलिंकिंग गाइडलाइंस के तहत टीवी चैनलों को अपना सिग्नल डिस्ट्रीब्यूशन प्लेटफॉर्म ऑपरेटर्स (DPOs) तक पहुंचाने के लिए सैटेलाइट का उपयोग करना अनिवार्य है। TRAI ने सिफारिश की है कि इस अनिवार्यता को समाप्त किया जाए और ब्रॉडकास्टर्स को किसी भी स्थलीय (Terrestrial) माध्यम जैसे केबल, फाइबर, सेल्युलर नेटवर्क, माइक्रोवेव, वाई-फाई, इंटरनेट और क्लाउड के जरिए चैनल पहुंचाने की अनुमति दी जाए। साथ ही किसी एक तकनीक को अनिवार्य न बनाया जाए और ब्रॉडकास्टर्स को अपनी व्यावसायिक जरूरत के अनुसार एक या कई तकनीकों के इस्तेमाल की स्वतंत्रता दी जाए।
TRAI ने यह भी सिफारिश की है कि ग्राउंड-बेस्ड ब्रॉडकास्टर्स (GBBs) और सैटेलाइट-बेस्ड ब्रॉडकास्टर्स (SBBs) के लिए समान नियामकीय ढांचा हो। कोई भी ब्रॉडकास्टर केंद्र सरकार की अनुमति से सैटेलाइट और स्थलीय दोनों माध्यमों का इस्तेमाल कर सके या जरूरत के अनुसार एक से दूसरे माध्यम में बदलाव कर सके।
TRAI ने यह भी स्पष्ट किया है कि सेवा क्षेत्र (Service Area) राष्ट्रीय स्तर पर ही रहेगा। आयोग का कहना है कि राष्ट्रीय स्तर पर तकनीक-तटस्थ (Technology Neutral) और ट्रांसमिशन माध्यम से स्वतंत्र व्यवस्था होने से निगरानी करना आसान रहेगा। यदि राज्यवार अनुमति दी गई तो सरकार के लिए निगरानी करना अधिक कठिन हो जाएगा। कंटेंट रेगुलेशन, प्रोग्राम कोड और विज्ञापन कोड से जुड़े सभी मौजूदा नियम पहले की तरह लागू रहेंगे।
जल्द लागू करने से देश को क्या फायदा होगा?
डॉ. रबिन्द्र नारायण ने अपने पत्र में कहा है कि इन सिफारिशों को जल्द लागू करने से कई बड़े फायदे होंगे।
सबसे पहला फायदा विदेशी मुद्रा (Foreign Exchange) की बचत का होगा। वर्तमान में हर टीवी चैनल को सैटेलाइट ट्रांसपोंडर क्षमता किराये पर लेनी पड़ती है, जिसका भुगतान अधिकांश मामलों में विदेशी कंपनियों को अमेरिकी डॉलर में किया जाता है। यदि फाइबर, ब्रॉडबैंड और क्लाउड के जरिए चैनल डिलीवरी की अनुमति मिलती है तो यह खर्च भारतीय इंफ्रास्ट्रक्चर पर होगा और भुगतान रुपये में किया जाएगा।
दूसरा बड़ा फायदा नए चैनलों की लागत कम होने का होगा। किसी नए चैनल के लिए सैटेलाइट अपलिंकिंग सबसे बड़ा निश्चित खर्च होता है। स्थलीय तकनीक अपनाने से यह लागत काफी कम हो जाएगी, जिससे क्षेत्रीय और छोटी भाषाओं के चैनलों के लिए बाजार में प्रवेश करना आसान होगा। इससे सरकार की Ease of Doing Business नीति को भी मजबूती मिलेगी।
उन्होंने यह भी कहा कि दुनिया भर में क्लाउड प्लेआउट और IP आधारित डिलीवरी अब ब्रॉडकास्टिंग का नया मानक बन चुके हैं। लेकिन मौजूदा व्यवस्था भारतीय ब्रॉडकास्टर्स को पुरानी तकनीक अपनाने के लिए मजबूर कर रही है।
डिजिटल इंडिया अभियान के तहत भारतनेट, 5G नेटवर्क और देश के डेटा सेंटर आज इस तरह के ट्रैफिक को संभालने में पूरी तरह सक्षम हैं। ऐसे में यह सुधार पूरी वैल्यू चेन को भारत के भीतर रखने में मदद करेगा।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि इस बदलाव से नियामकीय व्यवस्था कमजोर नहीं होगी। TRAI ने ऐसा ढांचा तैयार किया है जो 2022 की गाइडलाइंस जैसा ही है। केवल सैटेलाइट से जुड़ी अनिवार्यता हटाई गई है। मंत्रालय की निगरानी और नियंत्रण की व्यवस्था पहले की तरह बनी रहेगी।
मंत्रालय से क्या मांग की गई है?
डॉ. रबिन्द्र नारायण ने अनुरोध किया है कि सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय 15 जनवरी 2025 को जारी TRAI की सिफारिशों को जल्द स्वीकार करे और अधिसूचित करे। साथ ही 2022 की अपलिंकिंग एवं डाउनलिंकिंग गाइडलाइंस में संशोधन कर सैटेलाइट आधारित डिलीवरी को अनिवार्य के बजाय वैकल्पिक (Optional) बनाया जाए। इससे मई 2024 में मंत्रालय द्वारा शुरू की गई सुधार प्रक्रिया पूरी हो जाएगी।
ओपन हाउस चर्चा में भी रखा था पक्ष
डॉ. रबिन्द्र नारायण ने बताया कि उन्होंने 20 दिसंबर 2024 को आयोजित TRAI की ओपन हाउस चर्चा में भी हिस्सा लिया था। उस दौरान उन्होंने कहा था कि ब्रॉडकास्टिंग राष्ट्रीय महत्व का विषय है, जिसका संबंध कानून-व्यवस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा से भी है। इसलिए इसका नियमन राष्ट्रीय स्तर पर किसी केंद्रीय संस्था के अधीन ही रहना चाहिए, न कि राज्यवार अलग-अलग व्यवस्था के तहत।
उन्होंने कहा कि TRAI की अंतिम सिफारिशों में इसी सोच को शामिल किया गया है। उनके अनुसार, मंत्रालय के सामने जो नियामकीय ढांचा मौजूद है, वह संतुलित, सुरक्षा के लिहाज से उपयुक्त और तुरंत लागू किए जाने के लिए पूरी तरह तैयार है।
फेस्टिव सीजन से पहले टीवी ब्रॉडकास्टर्स ने सरकार से 10+2 विज्ञापन नियम (Ad Cap) में बदलाव की मांग फिर से तेज कर दी है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
फेस्टिव सीजन से पहले टीवी ब्रॉडकास्टर्स ने सरकार से 10+2 विज्ञापन नियम (Ad Cap) में बदलाव की मांग फिर से तेज कर दी है। इस मुद्दे पर सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (MIB) ने इंडस्ट्री से विस्तृत प्रस्ताव (Representation) मांगा है। मंत्रालय ने यह भी पूछा है कि मौजूदा व्यवस्था की जगह विज्ञापनों की कितनी सीमा व्यावहारिक और उपयुक्त हो सकती है।
जानकारी के मुताबिक, हाल ही में इंडियन ब्रॉडकास्टिंग एंड डिजिटल फाउंडेशन (IBDF), न्यूज ब्रॉडकास्टर्स एंड डिजिटल एसोसिएशन (NBDA) और कई बड़े टीवी नेटवर्क्स के वरिष्ठ अधिकारियों ने मंत्रालय के अधिकारियों से मुलाकात की। इस दौरान 10+2 विज्ञापन नियम को लेकर इंडस्ट्री की चिंताओं पर विस्तार से चर्चा हुई।
दिलचस्प बात यह है कि मंत्रालय न्यूज और गैर-न्यूज चैनलों के साथ अलग-अलग बैठकें कर रहा है। इससे संकेत मिल रहे हैं कि सरकार भविष्य में अलग-अलग श्रेणी के चैनलों के लिए अलग विज्ञापन नियमों पर विचार कर सकती है।
दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले के बाद बढ़ी चिंता
यह बैठकें ऐसे समय में हुई हैं, जब हाल ही में दिल्ली हाईकोर्ट ने टीवी चैनलों पर प्रति घंटे अधिकतम 12 मिनट विज्ञापन सीमा लागू करने के नियम को बरकरार रखा है। इस फैसले के बाद ब्रॉडकास्टर्स की चिंता बढ़ गई है कि यदि नियमों को सख्ती से लागू किया गया तो उनकी कमाई पर असर पड़ सकता है।
सूत्रों के अनुसार, मंत्रालय ने फिलहाल ब्रॉडकास्टर्स से कहा है कि उनकी बात सुनी जाएगी और इस मामले पर विचार पूरा होने तक तत्काल कोई सख्त कार्रवाई नहीं की जाएगी।
बदल चुका है मीडिया का पूरा माहौल
टीवी इंडस्ट्री का कहना है कि 10+2 विज्ञापन नियम उस समय बनाए गए थे, जब टीवी विज्ञापन का सबसे बड़ा माध्यम था। लेकिन पिछले एक दशक में मीडिया इंडस्ट्री पूरी तरह बदल चुकी है।
अब डिजिटल प्लेटफॉर्म, ओटीटी और ग्लोबल टेक कंपनियों की वजह से दर्शकों की देखने की आदतें बदल गई हैं। विज्ञापनदाता भी तेजी से डिजिटल की ओर जा रहे हैं। ऐसे में पुराने नियम आज की परिस्थितियों के अनुरूप नहीं रह गए हैं।
एक वरिष्ठ ब्रॉडकास्टिंग अधिकारी ने कहा कि सरकार को मौजूदा मीडिया माहौल को ध्यान में रखते हुए संतुलित फैसला लेना चाहिए, ताकि टीवी उद्योग की प्रतिस्पर्धा बनी रहे।
डिजिटल प्लेटफॉर्म से कड़ी टक्कर
ब्रॉडकास्टर्स का कहना है कि आज उन्हें यूट्यूब, ओटीटी और अन्य वैश्विक डिजिटल प्लेटफॉर्म्स से मुकाबला करना पड़ रहा है। इन प्लेटफॉर्म्स पर विज्ञापनों की कोई तय सीमा नहीं है, जबकि टीवी चैनलों पर सख्त नियम लागू हैं।
इंडस्ट्री का मानना है कि यदि टीवी चैनलों पर जरूरत से ज्यादा पाबंदियां लगाई गईं तो उनकी विज्ञापन आय और घटेगी, जबकि कंटेंट और स्पोर्ट्स राइट्स की लागत लगातार बढ़ रही है।
दर्शकों का भी रखना होगा ध्यान
इंडस्ट्री के एक अन्य अधिकारी का कहना है कि कोई भी चैनल जरूरत से ज्यादा विज्ञापन दिखाकर अपने दर्शकों को खोना नहीं चाहता। अगर विज्ञापन बहुत बढ़ेंगे तो दर्शक खुद ही डिजिटल प्लेटफॉर्म की ओर चले जाएंगे। इसलिए बाजार खुद ही एक संतुलन बनाए रखता है।
क्या हो सकता है समाधान?
सूत्रों के मुताबिक, सरकार के सामने कई विकल्पों पर चर्चा हो रही है। इनमें न्यूज और मनोरंजन चैनलों के लिए अलग-अलग विज्ञापन सीमा तय करना, मौजूदा सीमा में बदलाव करना या फिर अधिक लचीला नियम लागू करना शामिल है।
मीडिया विशेषज्ञों का भी मानना है कि 10 साल पहले बने नियमों की आज के डिजिटल दौर में दोबारा समीक्षा की जानी चाहिए। उनका कहना है कि दर्शकों के हितों की सुरक्षा जरूरी है, लेकिन साथ ही टीवी उद्योग को प्रतिस्पर्धी बनाए रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
इंडस्ट्री को उम्मीद है कि सरकार जल्द ही ऐसा समाधान निकालेगी, जिससे दर्शकों के हित भी सुरक्षित रहें और टीवी ब्रॉडकास्टर्स को भी कारोबार चलाने के लिए पर्याप्त अवसर मिल सकें।
ब्रॉडकास्टर JioStar की शिकायत पर ओडिशा पुलिस ने कथित केबल पाइरेसी नेटवर्क के खिलाफ बड़ी कार्रवाई की है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
ब्रॉडकास्टर JioStar की शिकायत पर ओडिशा पुलिस ने कथित केबल पाइरेसी नेटवर्क के खिलाफ बड़ी कार्रवाई की है। पुलिस ने मामला दर्ज कर छापेमारी की, जिसमें टीवी चैनलों के अवैध प्रसारण में इस्तेमाल होने वाले कई उपकरण जब्त किए गए। इस मामले में एक केबल ऑपरेटर को हिरासत में लेकर पूछताछ की जा रही है।
जानकारी के मुताबिक, 14 जुलाई को जाजपुर जिले के कोरेई पुलिस स्टेशन में एफआईआर दर्ज की गई। मामला भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धारा 303(2) और कॉपीराइट एक्ट, 1957 की धाराओं 37, 51, 63 और 65 के तहत दर्ज किया गया है। JioStar ने आरोप लगाया कि एक स्थानीय केबल नेटवर्क उसकी अनुमति के बिना उसके टीवी चैनलों का प्रसारण कर रहा था।
शिकायत मिलने के बाद ओडिशा पुलिस ने कोरेई स्थित आरोपी केबल ऑपरेटर के ठिकाने पर छापा मारा। इस दौरान पुलिस ने 9 मॉड्यूलेटर, 20 डीटीएच सेट-टॉप बॉक्स, एक ऑप्टिकल नोड और एक मिक्सर जब्त किया। जांच एजेंसियों का आरोप है कि इन उपकरणों का इस्तेमाल टीवी चैनलों के अवैध प्रसारण के लिए किया जा रहा था।
JioStar का कहना है कि आरोपी उपभोक्ताओं के लिए जारी किए गए डीटीएच सेट-टॉप बॉक्स के जरिए उसके चैनलों का सिग्नल लेकर उन्हें केबल नेटवर्क के माध्यम से व्यावसायिक रूप से दोबारा प्रसारित कर रहा था। कंपनी के अनुसार, ऐसे सेट-टॉप बॉक्स केवल घरेलू उपयोग के लिए होते हैं और उनका व्यावसायिक इस्तेमाल नियमों के खिलाफ है।
ब्रॉडकास्टर ने अपनी शिकायत के साथ इलेक्ट्रॉनिक सबूत भी पुलिस को सौंपे हैं, जिनमें कथित तौर पर चैनलों के अवैध प्रसारण का रिकॉर्ड शामिल है। कंपनी का दावा है कि इन सबूतों से आरोपी की भूमिका स्पष्ट होती है।
JioStar के मुताबिक, पुलिस की कार्रवाई के बाद इलाके में उसके चैनलों का अवैध प्रसारण पूरी तरह बंद हो गया है। कंपनी की ओर से की गई निगरानी में छापेमारी के बाद पाइरेसी का कोई नया मामला सामने नहीं आया।
यह कार्रवाई ऐसे समय में हुई है जब ब्रॉडकास्टर्स और कंटेंट कंपनियां केबल पाइरेसी पर सख्ती से रोक लगाने की मांग कर रही हैं। इंडस्ट्री का मानना है कि अवैध री-ट्रांसमिशन से न सिर्फ कॉपीराइट का उल्लंघन होता है, बल्कि अधिकृत डिस्ट्रीब्यूटर्स और सब्सक्रिप्शन से होने वाली आय पर भी असर पड़ता है, खासकर प्रीमियम मनोरंजन और स्पोर्ट्स चैनलों के मामले में।
फिलहाल पुलिस मामले की जांच कर रही है और जांच के नतीजों के आधार पर आगे भी कार्रवाई की जा सकती है।
रिलायंस जियो (Reliance Jio) ने अपने ग्राहकों के लिए नया JioTV Pro ऐड-ऑन प्लान लॉन्च किया है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
रिलायंस जियो (Reliance Jio) ने अपने ग्राहकों के लिए नया JioTV Pro ऐड-ऑन प्लान लॉन्च किया है। 55 रुपये की कीमत वाले इस प्लान के जरिए प्रीपेड और पोस्टपेड दोनों तरह के यूजर्स 30 दिनों तक 1,000 से ज्यादा लाइव टीवी चैनल अपने स्मार्टफोन पर देख सकेंगे।
कंपनी के मुताबिक, यह प्लान MyJio ऐप के जरिए उपलब्ध है। रिचार्ज करने के बाद यूजर्स को कई ऐसे प्रीमियम HD टीवी चैनल भी देखने को मिलेंगे, जो JioTV के मुफ्त वर्जन में उपलब्ध नहीं हैं।
इस प्लान में JioStar, Sony, Sun TV Network और Warner Bros. Discovery जैसे प्रमुख ब्रॉडकास्टर्स के चैनल शामिल हैं। यूजर्स 16 से अधिक भारतीय और अंतरराष्ट्रीय भाषाओं में कंटेंट का आनंद ले सकेंगे।
हालांकि, इस प्लान में एक बड़ी सीमा भी है। इसके तहत JioStar और Sony के प्रीमियम लाइव स्पोर्ट्स चैनलों का एक्सेस नहीं मिलेगा। यानी क्रिकेट या अन्य बड़े खेल आयोजनों की लाइव स्ट्रीमिंग देखने के लिए ग्राहकों को अलग सब्सक्रिप्शन या महंगे प्लान लेने होंगे।
जियो ने इस प्लान के साथ 10MB मोबाइल डेटा भी दिया है। हालांकि, यह डेटा नियमित इंटरनेट इस्तेमाल के लिए काफी नहीं है, लेकिन मुख्य डेटा पैक खत्म होने पर आपात स्थिति में काम आ सकता है।
कंपनी के अनुसार, इस प्लान को एक्टिवेट करने के लिए यूजर्स को MyJio ऐप में जाकर Recharge सेक्शन के Entertainment Plans में 55 रुपये का JioTV Pro प्लान चुनना होगा। रिचार्ज पूरा होने के बाद ग्राहक अपने जियो मोबाइल नंबर से JioTV ऐप में लॉग इन कर लाइव टीवी देख सकते हैं।
लाइव टीवी के अलावा JioTV ऐप पर Sony LIV, ZEE5 और MX Player जैसे प्लेटफॉर्म का कुछ ऑन-डिमांड कंटेंट भी उपलब्ध है, जिससे यूजर्स एक ही ऐप में लाइव टीवी और चुनिंदा डिजिटल कंटेंट का आनंद ले सकते हैं।
जियो का यह नया प्लान ऐसे ग्राहकों को ध्यान में रखकर लाया गया है, जो कम कीमत में समाचार, मनोरंजन, फिल्में और क्षेत्रीय चैनलों का आनंद लेना चाहते हैं। कंपनी का मानना है कि मोबाइल पर टीवी देखने की बढ़ती मांग को देखते हुए यह प्लान यूजर्स के लिए किफायती विकल्प साबित होगा।