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हिमालयी तीर्थों को इतना एक्सेसिबल क्यों बनाना : मीनाक्षी कंडवाल

लोग तो अपने घर के मंदिर तक में पर्दा लगाते हैं और प्राइवेसी बना कर रखते हैं कि हर आने-जाने वाले को एक्सेस ना मिले,तो फिर हिमालयी तीर्थों को इतना एक्सेसिबल क्यों बनाना है?

समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। 6 months ago

सरकार ने उत्तराखंड के केदारनाथ धाम को अधिक सुगम और सुरक्षित बनाने के लिए एक बड़ी योजना पर काम शुरू किया है। इस योजना के तहत सोनप्रयाग से केदारनाथ तक लगभग 7 किलोमीटर लंबी सुरंग बनाने का प्रस्ताव है। यह सुरंग अत्याधुनिक तकनीक से बनाई जाएगी, जिससे श्रद्धालुओं को पैदल यात्रा से राहत मिलेगी और खराब मौसम में भी यात्रा बाधित नहीं होगी। इस मामले पर पत्रकार मीनाक्षी कंडवाल का कहना है कि हिमालयी तीर्थों को इतना एक्सेसिबल क्यों बनाना है?

उन्होंने एक्स पर लिखा, बाबा केदार की यात्रा सुगम-सरल-सुलभ हो, एक तरफ़ ये प्रयास है। और दूसरी तरफ़ बारह हज़ार फीट की ऊँचाई पर साधना, तपस्या और ध्यान की तपस्थली के सरंक्षण की चुनौती है। किसी दुर्गम क्षेत्र में एडवेंचर और फन के लिए जाना अलग बात है, और एक तीर्थ पर जाना अलग बात है। हमने धर्म के जानकर, गुरू और विद्वानों से सुना है कि बाबा केदार की यात्रा वहाँ जाने के विचार से प्रारंभ हो जाती है। और वहाँ जाने के विचार से लेकर वहाँ पहुँच जाने के संकल्प पूर्ति तक का “समय” भी साधना है।

प्रश्न ये है कि हम ये बात समझ रहे हैं ?क्योंकि किसी तीर्थ और साधना स्थली तक पहुँचने का आधार अगर ये विचार (यानी साधना) होगा तो वहाँ पहुँचने वाले सीमित होंगे, ये यात्रा “सभी के लिए” नहीं होगी, और तीर्थ को सुगम और बारह मासों उपलब्ध रखने की अपेक्षा हमारा ध्यान उसकी “शक्ति और सम्मान” बचाने की तरफ़ ज़्यादा होगा।छोटी सी बात है। लोग तो अपने घर के मंदिर तक में पर्दा लगाते हैं और प्राइवेसी बना कर रखते हैं कि हर आने-जाने वाले को एक्सेस ना मिले,तो फिर हिमालयी तीर्थों को इतना एक्सेसिबल क्यों बनाना है?

बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री, यमुनोत्री में तो स्वयं वहाँ के देवता पूरे साल नहीं विराजते और छह महीने के लिए दूसरे स्थान पर उनकी गद्दी विराजती है,और उनकी डोली जब मंदिर से निकलकर दूसरे मंदिर जाती है तो वो अपने आप में एक उत्सव होता है। कोई तो वजह रही होगी जो हिमालयी क्षेत्रों में ये पूजा-पद्धतियाँ बनाई गईं होंगी।

लेकिन क्या आज हमारे निर्णयों के केंद्र में ये विश्वास, तीर्थ की रक्षा, भीड़ और व्यापारीकरण से उनका संरक्षण जैसी कसौटियां हैं? अगर नहीं, तो शिव की शक्ति अपना संतुलन स्थापित करने में सक्षम हैं। आपको बता दें, यह सुरंग केदारनाथ यात्रा मार्ग के सबसे कठिन हिस्से को पार कराएगी, जिससे समय की भी बचत होगी। साथ ही आपदा के समय बचाव व राहत कार्य भी तीव्र गति से संभव होंगे।


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