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मज़हबी जुनून और पाकिस्तानी क्रिकेट की असली दिक्कत : नीरज बधवार
आप पिछले 5 ओलंपिक खेलों की पदक तालिका उठाकर देख लीजिए। सबसे ज़्यादा मेडल उन्हीं देशों ने जीते हैं, जिनकी प्रति व्यक्ति आय भी सबसे ज़्यादा है।
समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। 11 months ago
नीरज बधवार, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक।
किसी भी मुल्क में खेलों की स्थिति उस मुल्क की आर्थिक या सामाजिक स्थिति से बहुत ज़्यादा अलग नहीं हो सकती। इसलिए जब लोग पाकिस्तानी क्रिकेट टीम के खराब खेलने को सिर्फ क्रिकेट से जोड़कर देखते हैं, तो मुझे हैरानी होती है। अगर एक मुल्क आज हर तरह से बर्बाद है, तो ऐसा कैसे हो सकता है कि उसकी टीम एकदम परफेक्ट हो या वह वर्ल्ड क्लास हो जाए? आप पिछले 5 ओलंपिक खेलों की पदक तालिका उठाकर देख लीजिए।
सबसे ज़्यादा मेडल उन्हीं देशों ने जीते हैं, जिनकी प्रति व्यक्ति आय (per capita income) भी सबसे ज़्यादा है। भारत में भी पारंपरिक तौर पर क्रिकेट में सबसे ज़्यादा खिलाड़ी दिल्ली, महाराष्ट्र, पंजाब, गुजरात, कर्नाटक, तमिलनाडु, तेलंगाना या आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों से आते दिखते हैं, जो आर्थिक तौर पर बाकी राज्यों से बेहतर हैं। इसलिए पाकिस्तानी क्रिकेट टीम की खराब हालत के लिए सिर्फ उसके खिलाड़ियों को भला-बुरा कहना बड़ी मासूमियत होगी।
इसे थोड़ा और विस्तार से समझते हैं। किसी भी मुल्क के पास मोटे तौर पर तीन तरीकों से पैसा हो सकता है—या तो उसके पास अरब देशों की तरह ऑयल मनी हो, या उसके पास ऐसे प्राकृतिक संसाधन (natural resources) हों, या फिर उसके पास ऐसी तकनीक (technology) हो, जिसे दुनिया को बेचकर वह पैसा कमा सके। अफसोस कि पाकिस्तान में इन तीनों में से कुछ भी नहीं है। एक वक्त तक पाकिस्तान को आतंकवाद की लड़ाई में अमेरिका का कथित सहयोग करने के नाम पर पैसा मिलता रहा, मगर आज वह भी नहीं है। ले-देकर पाकिस्तान में आज सिर्फ पीसीबी (PCB) एक ऐसा संस्थान है, जिसके पास कुछ पैसा आता है—वह भी उसे आईसीसी (ICC) का पार्टनर होने के नाते ही मिलता है।
पाकिस्तान में अब जो भी हुकूमत में आता है, उसकी इस पैसे पर नज़र होती है। और जहाँ पैसा और नेता होते हैं, वहाँ क्या होता है, यह समझना मुश्किल नहीं है। यही वजह है कि पाकिस्तान में पिछले 3 सालों में 9 कोच बदले गए हैं। इस दौरान अलग-अलग फॉर्मेट में तकरीबन आधा दर्जन खिलाड़ियों को कप्तान बनाया गया है। घरेलू (domestic) क्रिकेट बर्बाद हो चुका है। पीएसएल (PSL) सिर्फ मन बहलाने के अलावा और कुछ नहीं है। जो खिलाड़ी जिस सीरीज़ में नहीं खिलाया जाता, वह उसी सीरीज़ में टीवी पर एक्सपर्ट बनकर उन खिलाड़ियों की आलोचना करने लगता है, जिनके साथ वह एक हफ्ते पहले तक खेल रहा था।
भारत में क्या आप इन सब चीज़ों की कल्पना भी कर सकते हैं?और जिस भी टीम में ऐसा माहौल होगा, जहाँ इतनी अनिश्चितता होगी, वहाँ खिलाड़ी और कोच कैसे परफॉर्म करेंगे, यह समझना मुश्किल नहीं है। पाकिस्तान बनने के इतने सालों बाद भी वहाँ के हुक्मरानों को यह समझ नहीं आया कि कभी भी "लॉटरी माइंडसेट" के साथ देश नहीं बनते। लॉटरी माइंडसेट मतलब—आतंकवाद के नाम पर लड़ाई के जरिए अमेरिका से पैसा मिल जाए, चीन को कॉरिडोर बनाने के लिए अपना देश दे दो ताकि वहाँ से पैसा आ जाए, यहाँ-वहाँ खुदाई करवा लो ताकि कहीं से कोई गैस या सोना मिल जाए।
ऐसा नहीं है कि यह काम बाकी मुल्क नहीं करते, मगर आप पाकिस्तान के आर्थिक विकास से जुड़ी ख़बरें इंटरनेट पर पढ़ें, तो आपको पता लगेगा कि इसके अलावा उनकी कोई और रणनीति (strategy) नहीं है।इन सालों में न उन्होंने संस्थानों में निवेश (investment) किया, न अपनी कोई स्वतंत्र विदेश नीति (independent foreign policy) बनाई, न लोकतंत्र को मज़बूत किया, न किसी संवैधानिक संस्थान को खड़ा होने दिया।
पाकिस्तान की सेना और सेना की चुनी हुई सरकारों ने पिछले 77 सालों से वहाँ की आवाम को सिर्फ मज़हब की अफीम चटाकर मूर्ख बनाया, और लोग खुशी-खुशी मूर्ख बनते भी रहे। पूरे मुल्क में नेताओं से लेकर खिलाड़ियों तक हर कोई इसी कोशिश में रहता है कि कैसे हर बार खुद को धर्म का रक्षक बनाकर लोगों की सहानुभूति बटोरी जाए। वरना ऐसा कैसे हो सकता है कि पाकिस्तानी क्रिकेट टीम के खिलाड़ी और कप्तान भी एथलीट की तरह कम और मौलवियों की तरह ज़्यादा बर्ताव करते हैं?
पीएसएल के दौरान बाहर से आए खिलाड़ियों को "कन्वर्ट" करने की कोशिश करते हैं। कोचिंग देने आए मैथ्यू हेडन को कन्वर्ट करने की बातें होती हैं। इंग्लैंड खेलने जाते हैं, तो वहाँ के खिलाड़ियों को कन्वर्ट करने का प्रयास किया जाता है। इमरान खान कहते थे कि हिंदुस्तान से हर मैच हमारे लिए "जिहाद" की तरह होता था। इस टूर्नामेंट से पहले खुद पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ कह रहे थे कि "तुम्हें हर हाल में हिंदुस्तान को हराना होगा।" क्या किसी मुल्क का प्रधानमंत्री किसी एक देश का नाम लेकर इस तरह की बातें करता है?
अब ऐसा कैसे हो सकता है कि जब मुल्क के तौर पर आपके पास तरक्की करने को लेकर कोई रोडमैप न हो, और आपकी टीम 2025 में भी यह सोचती हो कि हम धार्मिक जुनून के दम पर जीत जाएंगे? फिर आपका वही हश्र होगा, जो हो रहा है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि 80 और 90 के दशक में जब तक खेलों में तकनीक नहीं आई थी, जब तक स्पोर्ट्स उतना डिमांडिंग नहीं हुआ था, तब तक जोश और जज़्बे से भी काम चल जाता था। लेकिन हॉकी से लेकर क्रिकेट तक जैसे-जैसे खेल प्रतिस्पर्धात्मक (competitive) होते गए और उनमें तकनीक का दखल बढ़ता गया, तो पाकिस्तान की टीम पीछे छूटती गई। उनकी हॉकी टीम तो ख़त्म हो चुकी है, और क्रिकेट टीम भी लगभग उसी स्थिति में पहुँच चुकी है—क्योंकि आज भी वे 30-40 साल पुराने माइंडसेट में जी रहे हैं कि "हममें तो बहुत जज़्बा है।"
ठीक इसी माइंडसेट के चलते पाकिस्तान भारत से चार-चार जंगें भी हार चुका है। जैसा कि पाकिस्तानी सीनियर पत्रकार हसन निसार कहते हैं, "पाकिस्तान ने चारों जंगें भारत पर थोपी हैं।" क्योंकि अरसे तक ये लोग इस माइंडसेट में जीते रहे कि "एक-एक मुसलमान चार-चार हिंदुओं को परास्त कर देगा।" मगर इन लोगों ने यह नहीं सोचा कि आज कोई 1650 वाले तरीकों से हाथों से लड़ाई नहीं लड़ी जा रही। आज युद्ध तकनीक से लड़े जाते हैं, न कि हाथ से। और यही समझने वाली बात है—कोई भी देश अगर तरक्की करना चाहता है, तो उसे तकनीकी विकास (technological advancement) करना होगा।
तकनीकी विकास तब होगा, जब देश का मिज़ाज (temperament) वैज्ञानिक होगा।वैज्ञानिक सोच अपनाने में सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि जैसे ही आप इसे अपनाना शुरू करते हैं, तो सबसे पहले आपको अपने ही मज़हबी विश्वास दकियानूसी लगने लगते हैं और वे आपसे छूटने लगते हैं। और जो भी मुल्क या समाज इस धार्मिक कट्टरता की गर्त में धंसे रहना चाहता है, वह खुद को विज्ञान और तकनीक के जाल में फंसने ही नहीं देता।
यही सबसे बड़ा विरोधाभास (paradox) है। आप कट्टर बने रहकर उस चीज़ में विजेता बनना चाहते हैं, जिसकी पहली शर्त ही यह है कि आप कट्टरता त्याग कर विज्ञान को अपनाएँ। मगर आप अपनी धार्मिक कट्टरता की गुनूदगी में इतने मदहोश हैं कि न आप सच देख पा रहे हैं, न सुन पा रहे हैं... बस हैरान हुए जा रहे हैं कि "ऊपरवाला हमारे साथ यह क्या कर रहा है !"
( यह लेखक के निजी विचार हैं ) साभार - फेसबुक
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