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अब जब मंदी की मार पड़ी तो आंखें खुलीं और फिर याद आ रहे हैं राजेन्द्र माथुर: राजेश बादल

राजेश बादल एग्जिक्यूटिव डायरेक्टर, राज्यसभा टीवी ।। 25 बरस पहले की भारतीय पत्रकारिता। टाइम्स ऑफ इंडिया समूह की लोकप्रिय स

समाचार4मीडिया ब्यूरो 9 years ago

राजेश बादल एग्जिक्यूटिव डायरेक्टर, राज्यसभा टीवी ।।

25 बरस पहले की भारतीय पत्रकारिता। टाइम्स ऑफ इंडिया समूह की लोकप्रिय साहू अशोक जैन-रमेश जैन की जोड़ी हाशिए पर जा रही थी। नई पीढ़ी को मेनैजमेंट सम्भालने के अवसर मिलने लगे थे। यह पीढ़ी अपनी अवधारणा के साथ समाचार पत्र का संचालन करना चाहती थी। याने अखबार और पत्रिकाएं अभिव्यक्ति का सकारात्मक स्वर और लोकतांत्रिक प्रणाली में चौथे खंभे का प्रतीक न माने जाएं तो समाचार पत्र प्रबंधन को क्या फर्क पड़ता है? दूसरी तरफ पत्रकारिता, प्रॉडक्ट बन जाए तो मैनेजमेंट की जेब भारी हो जाती है।

नई पीढ़ी इसी सोच के साथ जवान हुई थी और वो धर्मयुग, दिनमान और नवभारत टाइम्स की तुलना में साबुन, शैंपू और डिजर्जेंट से करने लगी थी। मेरी नजर में तो भारतीय पत्रकारिता का ये संक्रमण काल शुरू हो रहा था। 1982 से लेकर 87-88 तक राजेन्द्र माथुर ने नवभारत टाइम्स के पन्नों पर पत्रकारिता के जितने प्रयोग किए वे अद्भुत और चौंकाने वाले थे।

अखबार के संस्करण दिल्ली और मुंबई से निकलकर पटना, लखनऊ और जयपुर जैसे प्रादेशिक अवतारों में प्रकट हुए। बताने की जरूरत नहीं कि इन अखबारों ने निष्पक्ष, निर्भीक और जिम्मेदार पत्रकारिता के एक से बढ़कर एक नमूने पेश किए। भारत की आजादी के बाद कभी ऐसा नहीं हुआ था। करीब-करीब हर संस्करण एक लाख की प्रसार संख्या छू रहा था। 25 साल पहले के हालात में यह एक करिश्मा ही था। एक तरफ पत्रकारिता के नित नए कीर्तिमान रचते राजेन्द्र माथुर तो दूसरी तरफ प्रबंधन पत्रकारिता को साबुन बनाकर बेचने की कोशिश कर रहा था। जहाज के नाविक बनकर माथुर जी उसे फुल स्पीड पर दौड़ाने के प्रयास में थे तो दूसरी ओर जहाज के पेंदे में छोटे-छोटे सुराख भी जहाज बनाने वाले कर रहे थे। पत्रकारिता की ऊंचाई छूते पेशेवर तो दूसरी तरफ पत्रिकाओं की हत्या भी हो रही थी। वह एक भयावह दौर था। यह दौर बाद में सारे प्रादेशिक संस्करणों की जान ले बैठा।

9 अप्रैल 1991 को अचानक राजेन्द्र माथुर ने हमसे विदा ले ली। सिर्फ 56 साल उमर। संवेदनाओं के किसी धरातल पर कलम का यह महानायक इस दौर के क्रूर चेहरे को महसूस करता रहा और अभिन्यु की तरह अकेला मुकाबला करता रहा। उनकी विदाई के बाद अखबार के प्रादेशिक संस्करणों ने भी विदा ले ली। इसके बाद नरसिंहराव के नेतृत्व में बनी सरकार ने उदारीकरण का पाठ पढ़ा और देश को पढ़ाया। इस पाठ से राष्ट्रीय स्वाभिमान, मूल्यों की पत्रकारिता और निष्पक्षता वाले पन्ने गायब थे। बचे हुए पन्ने थे बाजारवाद, उसके दबाब में टूटते आदर्श औऱ देश की देह पर लगते चीरे।

मैं और मेरी माथुर-युग की पत्रकारिता के सारे गवाह हक्का-बक्का थे। हमले हो रहे थे और उनसे मुकाबला करने वाला नाविक हमारे बीच नहीं था। शायद हम चक्रव्यूह से बाहर निकलने का हुनर नहीं जानते थे और जब हमने पाया कि जहाज के सुराख काफी बड़े हो चुके हैं, तब तक काफी देर हो चुकी थी।

इसी बीच टेलिविजन पत्रकारिता का नन्हा सा बच्चा दाखिल होकर एक बिगड़ैल जवान बन गया। पत्रकारिता ‘टीवी इंडस्ट्री’ के रूप में सारे रोगों और कुरुपताओं के साथ पनप चुकी थी। बाजार के दबाव तथा आधुनिक तकनीक के शोर में गुम हो गईं पेशागत प्राथमिकताएं और गुम हो गए राजेन्द्र माथुर। नतीजा क्या निकला। पेड न्यूज जैसी महामारी, पत्रकारिता के धंधे की अधकचरी ट्रेनिंग देने वाले कुकुरमुत्ते की तरह उग आए संस्थान, गैर जिम्मेदार और अपने को समाज में उपहास का केंद्र बना बैठी पत्रकारिता।

नहीं कह सकता कि मौजूदा दौर कब तक चलेगा। हां- यह जरूर कह सकता हूं कि हमेशा नहीं चलेगा। सुबह का भूला शाम को वापस आ जाए तो भूला नहीं कहलाता।

राजेन्द्र माथुर कुछ समय के लिए भारतीय हिंदी पत्रकारिता में अदृश्य जरूर हुए थे, लेकिन हाल के वर्षों में उन्हें शिद्दत से याद किया जा रहा है। यह राहत की बात है। कई बार मंच से अनुपस्थित होने क बाद अभिनेता के काम और कद का मुल्यांकन होता है। उसकी कमी गहराई तक महसूस होती है। शायद राजेंद्र माथुर के मामले में ऐसा ही हुआ है। एक अंधी सुरंग से बाहर निकलने का रास्ता देने वाले सिर्फ और सिर्फ राजेन्द्र माथुर हैं। 1955 से 1991 के बीच लिखा हुआ उनका एक-एक शब्द पढ़ जाइए। उजाले का एक सूरज चमकता मिलेगा। एक ऐसा सूरज, जो कभी अस्त नहीं होता।

 जिन लोगों ने राजेन्द्र माथुर को नहीं पढ़ा है या जिन पत्रकारों/संपादकों ने उनके साथ काम नहीं किया है। इन्हें मेरे विचार अतिशयोक्ति भरे लग सकते हैं। लेकिन जो लोग इनके संपर्क में रहे हैं या उनके साथ काम कर चुके हैं या उनके लेखन की गहराई से परिचित हैं, वे यकीनन जानते हैं कि आज के दौर की पत्रकारिता के सामने खड़े सारे मुश्किल सवालों का हल राजेन्द्र माथुर के विचारो में है। आवश्यकता इस बात की है कि इन विचारों और लेखन को नई नस्लों तक उतने ही महत्व के साथ पहुंचाया जाए, जितना हम लोगों ने समझा है तो बहुत बड़ा काम हो जाएगा। यदि हम लोग ऐसा नहीं कर पाए तो ये देश और हिंदी पत्रकारिता हमें कभी माफ नहीं करेगी। जो कर्ज राजेन्द्र माथुर से हमने लिया है, उसे लौटाने का वक्त आ गया है।

कितना दिलचस्प होता है कि पत्रकारिता को धंधा बनाने की वकालत करने वाले भी इन दिनों सरोकारों की बात करते नजर आते हैं। अपने-अपने शैंपू, साबुन बनाकर उन्होंने मुनाफा तो जरूर कमाया,लेकिन साख पर बट्टा लगा बैठे। क्या आज का पाठक और दर्शक हर अखबार या चैनल को एक ही तराजू  पर नहीं तौल रहा है? क्या हर समाचार चैनल एक-दूसरे की कार्बन कॉपी नहीं लगता? जिस अखबार में संपादक के नाम पर छपने पर सरकार में खलबली मच जाती थी, अब आठ कॉलम बैनर छपने पर भी असर नहीं होता। कभी खबरिया चैनल में केवल यही चलने पर हड़कंप मच जाता। अब आधा-आधा घंटे की एक खबर भी प्रभाव नहीं डालती। साफ है कि प्रॉडक्ट स्वाद और रंगरूप से नहीं, बल्कि सरोकारों और सिद्धांतों से चलेगा। यही बात राजेन्द्र माथुर सारी जिंदगी कहते रहे।

उस समय तो धंधेबाजी के पैरोकारों ने उसूलों की होली जला दी, लेकिन । अखबार हों या समाचार चैनल वापस खबरों पर लौट रहे हैं। पटरी से उतरी गाड़ी को पटरी पर लाने में वक्त लगेगा। उम्मीद नहीं करनी चाहिए कि दो चार महीनों में चमत्कार हो जाएगा। पर यह तय है कि मूल्यों और सरोकारों वाली पत्रकारिता का युग एक बार फिर आएगा। इतिहास अपने को दोहराएगा और राजेन्द्र माथुर एक बार फिर संकट मोचक के रूप में नजर आएंगे। विचारों के शक्तिपुंज  की तरह वे हमेशा हमारे साथ रहेंगे।

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