वरिष्ठ अधिवक्ता सुधीर मिश्रा की पुस्तक ‘Climate Justice’ का दिल्ली में हुआ भव्य विमोचन

सुप्रीम कोर्ट के 75 ऐतिहासिक फैसलों पर आधारित इस पुस्तक के विमोचन समारोह में विधि जगत की जानी-मानी हस्तियां, न्यायविद, नीति-निर्माता और पर्यावरणविद उपस्थित थे।

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Monday, 08 June, 2026
Sudhir Mishra


सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता और ट्रस्ट लीगल, एडवोकेट्स एंड सॉलिसिटर्स के संस्थापक एवं मैनेजिंग पार्टनर सुधीर मिश्रा की बहुप्रतीक्षित पुस्तक ‘Climate Justice – Celebrating 75 Years of Supreme Court of India: 75 Judgments that Built Climate Jurisprudence in India’ का नई दिल्ली में भव्य विमोचन किया गया। इस पुस्तक को ओकब्रिज पब्लिशिंग (OakBridge Publishing) ने प्रकाशित किया है।

पुस्तक विमोचन समारोह का आयोजन नई दिल्ली स्थित द ललित होटल में किया गया, जिसमें देश के कई प्रतिष्ठित विधि विशेषज्ञ, न्यायविद, नीति-निर्माता और पर्यावरण संरक्षण से जुड़े लोग शामिल हुए। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि दिल्ली हाईकोर्ट के अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल चेतन शर्मा रहे। वहीं भारतीय कॉर्पोरेट मुकदमेबाजी के वरिष्ठ विधि विशेषज्ञ और भसीन एंड कंपनी के मैनेजिंग पार्टनर डॉ. ललित भसीन ने कार्यक्रम की अध्यक्षता की तथा मुख्य अतिथि और लेखक के साथ मिलकर पुस्तक का औपचारिक विमोचन किया।

इस अवसर पर वरिष्ठ अधिवक्ता जॉय बसु, उत्तम दत्त, पद्मश्री सम्मानित वरिष्ठ पत्रकार आलोक मेहता, वरिष्ठ अधिवक्ता मेघना मिश्रा, एलजी इलेक्ट्रॉनिक्स के जनरल काउंसिल राजीव मलिक तथा एक्सचेंज4मीडिया एवं बीडब्ल्यू बिजनेसवर्ल्ड के चेयरमैन एवं एडिटर-इन-चीफ डॉ. अनुराग बत्रा सहित कई गणमान्य अतिथि मौजूद रहे।

यह पुस्तक भारतीय पर्यावरणीय न्यायशास्त्र और संवैधानिक विकास की यात्रा को क्रमबद्ध तरीके से प्रस्तुत करती है। इसमें उन 75 महत्वपूर्ण फैसलों का विश्लेषण किया गया है, जिन्होंने भारत में पर्यावरण संरक्षण को एक प्रशासनिक विषय से आगे बढ़ाकर संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार से जोड़ते हुए एक मूलभूत संवैधानिक जिम्मेदारी के रूप में स्थापित किया।

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे डॉ. ललित भसीन ने कहा कि सुधीर मिश्रा का यह कार्य संवैधानिक आदर्शों और उनके व्यावहारिक क्रियान्वयन के बीच की दूरी को प्रभावी ढंग से पाटता है। उन्होंने कहा कि भविष्य की पीढ़ियों को सुरक्षित रखने के लिए पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक यथार्थवाद का साथ-साथ चलना आवश्यक है।

मुख्य अतिथि चेतन शर्मा ने पुस्तक की सराहना करते हुए कहा कि इसके अध्याय संक्षिप्त, सटीक और अत्यंत प्रभावशाली हैं। उन्होंने कहा कि प्रत्येक ऐतिहासिक फैसले का सार डेढ़ पृष्ठ के भीतर प्रस्तुत करना लेखक की बड़ी उपलब्धि है। उन्होंने यह भी कहा कि यह पुस्तक कानूनी साहित्य में अपनी तरह का पहला प्रयास है, जो यह स्पष्ट रूप से बताती है कि विषाक्त कचरा किस प्रकार वर्षों से भारत तक पहुंचता रहा है।

स्वामी अद्वैतानंद गिरि ने पर्यावरण संरक्षण को आध्यात्मिक दृष्टिकोण से जोड़ते हुए दिल्ली में मौजूद कीकर के जंगलों के बीच बड़े पैमाने पर पीपल के पेड़ लगाने का सुझाव दिया। उनके अनुसार यह शहरी पर्यावरणीय चुनौतियों से निपटने का एक व्यावहारिक उपाय हो सकता है।

वरिष्ठ अधिवक्ता श्रीधर पोटाराजू ने कहा कि सुधीर मिश्रा ने देश के दूर-दराज़ क्षेत्रों और जंगलों तक यात्रा कर पर्यावरणीय मुद्दों को समझने का प्रयास किया है। उन्होंने कहा कि उनकी प्रतिबद्धता ने पर्यावरण कानून को भारत में मुख्यधारा की विधिक प्रैक्टिस का हिस्सा बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

पुस्तक के लेखक सुधीर मिश्रा ने कहा कि यह पुस्तक पर्यावरण कानून को मुख्यधारा में स्थापित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास है। उन्होंने कहा कि उनकी इच्छा है कि यह पुस्तक आने वाले समय में पर्यावरण कानून के क्षेत्र में एक मानक संदर्भ ग्रंथ के रूप में स्थापित हो। उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन अब केवल पर्यावरण का विषय नहीं रह गया है, बल्कि यह संवैधानिक और भावनात्मक दोनों दृष्टियों से महत्वपूर्ण मुद्दा बन चुका है।

सुधीर मिश्रा ने इस पुस्तक को अपने बच्चों और आम जनता को समर्पित किया। कार्यक्रम की एक विशेष पहल के तहत पुस्तक खरीदने वाले प्रत्येक व्यक्ति को एक पौधा भेंट किया गया, जो पर्यावरण संरक्षण के प्रति आयोजन की प्रतिबद्धता का प्रतीक था।

कार्यक्रम के समापन पर ट्रस्ट लीगल की पार्टनर पेटल चंडोक ने सुधीर मिश्रा को इस उपलब्धि के लिए बधाई दी और पुस्तक के प्रकाशन एवं प्रस्तुति के लिए ओकब्रिज पब्लिशिंग की सराहना की। यह पुस्तक अब देशभर में प्रमुख कानूनी पुस्तक विक्रेताओं और प्रमुख रिटेल प्लेटफॉर्म्स पर उपलब्ध है।

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INS के सरचार्ज फैसले से गरमाई बहस, क्या IRS के बिना बढ़ सकती हैं प्रिंट विज्ञापन दरें?

इंडियन न्यूजपेपर सोसाइटी (INS) द्वारा 22 जुलाई को सदस्य प्रकाशनों को 1 अगस्त से विज्ञापनों पर 15% सरचार्ज लगाने की सिफारिश के बाद भारतीय प्रिंट मीडिया इंडस्ट्री में नई बहस शुरू हो गई है।

Last Modified:
Friday, 24 July, 2026
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कंचन श्रीवास्तव, सीनियर एडिटर, समाचार4मीडिया ।।

इंडियन न्यूजपेपर सोसाइटी (INS) द्वारा 22 जुलाई को सदस्य प्रकाशनों को 1 अगस्त से विज्ञापनों पर 15% सरचार्ज लगाने की सिफारिश के बाद भारतीय प्रिंट मीडिया इंडस्ट्री में नई बहस शुरू हो गई है। यह बहस अब सिर्फ बढ़ती न्यूजप्रिंट लागत तक सीमित नहीं रह गई है।

जहां अखबारों के प्रकाशकों का कहना है कि बढ़ती लागत के कारण विज्ञापनों से ज्यादा कमाई जरूरी हो गई है, वहीं विज्ञापनदाताओं का मानना है कि प्रिंट मीडिया तभी ज्यादा विज्ञापन दरें वसूल सकता है, जब उसके पास रीडरशिप मापने का भरोसेमंद और स्वीकार्य सिस्टम हो।

सात साल बाद भी नहीं लौटा IRS

करीब सात साल बीत जाने के बाद भी Indian Readership Survey (IRS) दोबारा शुरू नहीं हो पाया है। मार्केटिंग विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे समय में अखबार विज्ञापन दरें बढ़ाने की बात कर रहे हैं, जबकि पूरे इंडस्ट्री के पास ऐसा कोई साझा और विश्वसनीय पैमाना नहीं है, जिससे पाठकों की संख्या, उनकी गुणवत्ता और विज्ञापन की प्रभावशीलता का आकलन किया जा सके।

हालांकि Media Research Users Council (MRUC) ने पिछले साल काफी चर्चा के बाद दो शहरों में पायलट सर्वे शुरू करने की घोषणा की थी, लेकिन वह भी अब तक शुरू नहीं हो सका। ऐसे में प्रिंट मीडिया की रीडरशिप मापने की व्यवस्था अब भी अधूरी बनी हुई है।

विज्ञापनदाता बोले- बिना डेटा के बढ़ी कीमत कैसे मानें?

मार्केटर्स का कहना है कि IRS नहीं होने के बावजूद विज्ञापनदाता लगातार प्रिंट मीडिया में निवेश करते रहे हैं। लेकिन अब जब उनसे अतिरिक्त 15% सरचार्ज देने को कहा जा रहा है, तो खरीद (Procurement) और मार्केटिंग टीमों के सामने कई सवाल खड़े हो रहे हैं। वे सिर्फ अतिरिक्त 15% पर ही नहीं, बल्कि पूरे प्रिंट मीडिया बजट पर दोबारा विचार कर सकती हैं।

डाबर इंडिया के वाइस प्रेसिडेंट, हेड- मीडिया और हेड- ब्रांड एक्टिवेशन राजीव दुबे का कहना है कि IRS की अनुपस्थिति ने प्रिंट मीडिया की बेहतर विज्ञापन दरें तय करने की क्षमता को कमजोर कर दिया है।

उन्होंने कहा, "आज विज्ञापनदाता ज्यादा भुगतान करने से पहले स्वतंत्र और भरोसेमंद ऑडियंस डेटा चाहते हैं। IRS जैसी साझा रीडरशिप प्रणाली के बिना पूरे इंडस्ट्री के लिए ऊंची विज्ञापन दरों को सही ठहराना मुश्किल हो जाता है। हालांकि मजबूत क्षेत्रीय (वर्नाक्युलर) अखबार आज भी प्रीमियम दरें हासिल कर सकते हैं। लेकिन यह बताना मुश्किल हो जाता है कि प्रिंट कितनी अतिरिक्त पहुंच (Reach) दे रहा है और उस पहुंच की वास्तविक लागत क्या है।"

राजीव दुबे का कहना है कि भरोसेमंद ऑडियंस मापन ही प्रिंट मीडिया की कीमत तय करने की ताकत वापस ला सकता है। इससे विज्ञापनदाताओं का भरोसा बढ़ेगा और प्रकाशक केवल बढ़ी हुई लागत नहीं, बल्कि साबित मूल्य (Proven Value) के आधार पर प्रीमियम कीमत मांग सकेंगे।

उन्होंने आगे कहा कि मीडिया प्लानिंग में अब एक पीढ़ीगत बदलाव आ चुका है। फैसले अब डेटा के आधार पर लिए जा रहे हैं। ऐसे में मजबूत और व्यापक रूप से स्वीकार्य IRS विज्ञापनदाताओं का भरोसा दोबारा जीतने में मदद करेगा और प्रिंट मीडिया को बेहतर विज्ञापन दरें दिलाने में सहायक होगा।

अब सिर्फ लागत नहीं, जवाबदेही भी अहम

कई विज्ञापनदाताओं के लिए यह बहस अब सिर्फ बढ़ती लागत की नहीं, बल्कि जवाबदेही की भी है।

Acer के हेड- मार्केटिंग एवं एसोसिएट डायरेक्टर सूरज बालकृष्णन का कहना है कि आज लोग पहले की तुलना में कहीं ज्यादा अलग-अलग माध्यमों से खबरें पढ़ते और देखते हैं। वे प्रिंट, डिजिटल, सोशल मीडिया, वीडियो, पॉडकास्ट और न्यूज एग्रीगेटर जैसे कई प्लेटफॉर्म्स के बीच लगातार आते-जाते रहते हैं।

उन्होंने कहा कि इसके बावजूद प्रिंट मीडिया आज भी अपनी विश्वसनीयता, भरोसे और पाठकों के ध्यान (Attention) की वजह से बेहद प्रासंगिक बना हुआ है।

बालकृष्णन के मुताबिक, "जैसे-जैसे मीडिया प्लानिंग डेटा आधारित होती जा रही है, वैसे-वैसे प्रिंट और अन्य सभी प्लेटफॉर्म्स के लिए मजबूत और भरोसेमंद ऑडियंस मापन जरूरी हो गया है।"

उन्होंने कहा कि प्रकाशकों के पास कीमतें बढ़ाने के अपने कारण हो सकते हैं, लेकिन पारदर्शी मापन प्रणाली विज्ञापनदाताओं का भरोसा मजबूत करती है और निवेश के फैसले मापे जा सकने वाले नतीजों (Measurable Outcomes) के आधार पर लेने में मदद करती है। उनके मुताबिक, किसी भी मीडिया की असली कीमत उसकी लगातार साबित होने वाली कारोबारी उपयोगिता से तय होती है।

मार्केटर्स का तर्क- सिर्फ लागत से नहीं मिलती प्रीमियम कीमत

मार्केटिंग विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी मीडिया की प्राइसिंग सिर्फ बढ़ी हुई लागत से तय नहीं होती। इसके लिए भरोसेमंद ऑडियंस डेटा और मापे जा सकने वाले नतीजों के जरिए अपनी उपयोगिता साबित करनी पड़ती है।

IRS नहीं होने के कारण आज विज्ञापनदाता अलग-अलग सर्कुलेशन ऑडिट, निजी रिसर्च और अभियान के प्रदर्शन से जुड़े आंकड़ों का सहारा लेते हैं, लेकिन इनमें से कोई भी पूरे प्रिंट इंडस्ट्री के लिए साझा मानक उपलब्ध नहीं कराता।

'सिर्फ IRS से तय नहीं होगी प्रिंट की कीमत'

दूसरी ओर प्रकाशकों की राय इससे अलग है। 'मातृभूमि' के मैनेजिंग डायरेक्टर और INS के पूर्व अध्यक्ष श्रेयांस कुमार का कहना है कि भरोसेमंद ऑडियंस मापन निश्चित रूप से जरूरी है, क्योंकि इससे विज्ञापनदाताओं का विश्वास बढ़ता है और मीडिया प्लानिंग में पारदर्शिता आती है।

लेकिन उनका कहना है कि प्रिंट मीडिया की कीमत केवल एक आंकड़े से तय नहीं हो सकती।

उन्होंने कहा, "डिजिटल मीडिया के विपरीत अखबारों की ताकत सिर्फ रीडरशिप सर्वे में नहीं है। उनकी विश्वसनीयता स्वतंत्र रूप से प्रमाणित सर्कुलेशन, रीडरशिप स्टडी, संपादकीय गुणवत्ता, मार्केट में नेतृत्व और सबसे अहम, विज्ञापनदाताओं को मिलने वाले कारोबारी नतीजों से बनती है।"

श्रेयांस कुमार का कहना है कि ओणम जैसे बड़े अवसरों पर विज्ञापनदाता आज भी प्रिंट मीडिया में निवेश करते हैं, क्योंकि उन्हें अखबारों पर भरोसा है और उनका प्रभाव आज भी मजबूत है। उन्होंने माना कि बेहतर ऑडियंस मापन प्रिंट की स्थिति को और मजबूत करेगा, लेकिन उसकी असली ताकत वर्षों में कमाए गए भरोसे और प्रभाव से आती है।

बीच में फंसी विज्ञापन एजेंसीज

इस पूरे विवाद में विज्ञापन एजेंसीज दोनों पक्षों के बीच फंसी हुई हैं। एक तरफ प्रकाशक बढ़ती लागत की भरपाई के लिए ज्यादा विज्ञापन दरें चाहते हैं, जबकि दूसरी ओर विज्ञापनदाता अतिरिक्त खर्च उठाने के लिए तैयार नहीं हैं। ऐसे में मीडिया खरीद से जुड़ी बातचीत के दौरान एजेंसियों को दोनों पक्षों के हितों के बीच संतुलन बनाना पड़ रहा है।

dentsuX के मीडिया हेड अनिल सोलंकी का कहना है कि ऊंची विज्ञापन दरों को सही ठहराने के लिए भरोसेमंद रीडरशिप डेटा बेहद जरूरी है।

उन्होंने कहा, "बड़े और प्रतिष्ठित अखबार आज भी प्रीमियम कीमत हासिल कर सकते हैं, लेकिन स्वतंत्र ऑडियंस मापन के बिना विज्ञापन दरें तथ्यों की बजाय धारणा (Perception) के आधार पर तय होती हैं।"

इस मामले पर exchange4media ने INS से भी प्रतिक्रिया मांगी है। उनका जवाब मिलने पर खबर को अपडेट किया जाएगा।

IRS अब तक क्यों नहीं लौट पाया?

इंडस्ट्री से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि IRS दोबारा शुरू न होने की एक बड़ी वजह प्रकाशकों के बीच फंडिंग और सर्वे की कार्यप्रणाली को लेकर सहमति का अभाव है।

सूत्रों के मुताबिक, कई प्रकाशकों को आशंका है कि नए IRS के नतीजे उनकी मार्केट स्थिति को प्रभावित कर सकते हैं और महामारी के बाद मुश्किल से पटरी पर लौटी विज्ञापन आय पर असर डाल सकते हैं।

Bhasin Consulting Group के फाउंडर और dentsu Asia Pacific के पूर्व CEO आशीष भसीन का मानना है कि प्रिंट मीडिया बेहतर विज्ञापन दरों का हकदार है, लेकिन इसके लिए उसे ठोस प्रमाण भी देने होंगे। 

उन्होंने कहा, "प्रिंट आज भी एक मजबूत माध्यम है, लेकिन प्रकाशकों ने इंडस्ट्री से जुड़ी रिसर्च में पर्याप्त निवेश नहीं किया। कई वर्षों से IRS जैसे विश्वसनीय रीडरशिप डेटा की कमी के कारण प्रिंट मीडिया के लिए अपनी वास्तविक उपयोगिता साबित करना कठिन हो गया है।"

उन्होंने उम्मीद जताई कि प्रिंट मीडिया को बेहतर कीमत मिलेगी, लेकिन इसके साथ ही इंडस्ट्री को रीडरशिप रिसर्च और मापन प्रणाली में भी निवेश करना चाहिए। आखिरकार यही विज्ञापनदाताओं को प्रीमियम भुगतान करने का भरोसा देगा। हालांकि मार्केट अंततः उतनी ही कीमत देगा, जितनी मार्केट की ताकतें तय करेंगी।

बदलते दौर में प्रिंट की कीमत तय करने की चुनौती

यह बहस ऐसे समय में हो रही है, जब प्रिंट मीडिया का कारोबार अलग-अलग मार्केटों में अलग-अलग स्थिति में है।

इंडस्ट्री के जानकारों का कहना है कि खासकर अंग्रेजी अखबारों का सर्कुलेशन अभी तक महामारी से पहले के स्तर तक पूरी तरह नहीं पहुंच पाया है। उनका मानना है कि विज्ञापन दरें अभी तक इस बदलाव को पूरी तरह नहीं दर्शाती हैं। ऐसे में यदि इस समय 15% सरचार्ज लागू किया जाता है, तो कई विज्ञापनदाता सिर्फ अतिरिक्त लागत ही नहीं, बल्कि प्रिंट मीडिया में अपने कुल निवेश पर भी दोबारा विचार कर सकते हैं।

Pitch Madison Annual Report के अनुसार, वर्ष 2025 में प्रिंट मीडिया का विज्ञापन कारोबार 3% बढ़कर 20,866 करोड़ रुपये हो गया, जबकि 2024 में यह 20,272 करोड़ रुपये था। हालांकि कुल विज्ञापन मार्केट (AdEx) में प्रिंट मीडिया की हिस्सेदारी 19% से घटकर 18% रह गई। यह दिखाता है कि डिजिटल मीडिया की बढ़ती लोकप्रियता के बीच प्रिंट की हिस्सेदारी धीरे-धीरे कम हो रही है।

उधर INS की यह सलाह ऐसे समय आई है, जब वैश्विक आर्थिक चुनौतियों और ईरान-अमेरिका तनाव जैसे अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों ने भी मार्केट की धारणा को प्रभावित किया है।

PMAR और dentsu की हालिया रिपोर्ट्स के अनुसार, आने वाले समय में प्रिंट विज्ञापन मार्केट में सीमित बढ़ोतरी की ही उम्मीद है, जबकि डिजिटल मीडिया तेजी से आगे बढ़ता रहेगा। वहीं FMCG और ऑटोमोबाइल जैसे बड़े विज्ञापनदाता भी कमजोर उपभोक्ता मांग के कारण फिलहाल सतर्क रुख अपनाए हुए हैं।

इंडस्ट्री के अधिकारियों का मानना है कि इन परिस्थितियों में विज्ञापनदाता अब अतिरिक्त मीडिया निवेश को लेकर पहले से कहीं ज्यादा सावधानी बरतेंगे।

 

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INS का 15% सरचार्ज का फैसला, क्या प्रकाशकों पर ही पड़ सकता है भारी?

इंडियन न्यूजपेपर सोसाइटी ने 22 जुलाई को अपने सदस्य प्रकाशनों को सलाह दी कि वे 1 अगस्त से विज्ञापनों पर 15% का समान सरचार्ज (अतिरिक्त शुल्क) लागू करें।

Last Modified:
Thursday, 23 July, 2026
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कंचन श्रीवास्तव, सीनियर एडिटर, एक्सचेंज4मीडिया ।।

इंडियन न्यूजपेपर सोसाइटी (INS) ने 22 जुलाई को अपने सदस्य प्रकाशनों को सलाह दी कि वे 1 अगस्त से विज्ञापनों पर 15% का समान सरचार्ज (अतिरिक्त शुल्क) लागू करें। इस कदम का मकसद अखबार प्रकाशकों पर बढ़ रहे आर्थिक दबाव को कम करना है।

हालांकि, इस फैसले के साथ एक नई बहस भी शुरू हो गई है। सवाल यह उठ रहा है कि जब अलग-अलग भाषाओं, क्षेत्रों और अखबारों की विज्ञापन दरें पहले से ही अलग-अलग हैं, तो क्या सभी प्रकाशन वास्तव में एक समान 15% की बढ़ोतरी लागू कर सकते हैं?

दरअसल, पिछले कई वर्षों से अखबार प्रकाशक न्यूजप्रिंट, प्रिंटिंग और वितरण की बढ़ती लागत का हवाला देते हुए विज्ञापन दरों में बढ़ोतरी की मांग करते रहे हैं। लेकिन विज्ञापनदाताओं की ओर से इन मांगों को ज्यादा समर्थन नहीं मिला। इस महीने की शुरुआत में exchange4media (e4m) ने भी अपनी रिपोर्ट में इस बात का जिक्र किया था।

प्रिंट मीडिया की आर्थिक स्थिति सुधारने की कोशिश

इसी पृष्ठभूमि में INS की यह सलाह प्रिंट मीडिया की आर्थिक स्थिति को मजबूत करने की सामूहिक कोशिश के रूप में देखी जा रही है। अब तक हर प्रकाशन अपने स्तर पर विज्ञापन दरें बढ़ाने के लिए बातचीत करता था, लेकिन INS की सलाह इस मुद्दे को उद्योग स्तर पर उठाने की कोशिश मानी जा रही है।

देश के कई बड़े मीडिया समूहों ने इस फैसले का स्वागत किया है। एचटी मीडिया के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर सत्यजीत सेनगुप्ता ने कहा, "इनपुट कॉस्ट लगातार बढ़ रही है, ऐसे में यह कदम बेहद जरूरी था।"

हालांकि, INS की यह सलाह अनिवार्य नहीं बल्कि सिफारिश मात्र है। इसके बावजूद इसने विज्ञापन उद्योग में हलचल पैदा कर दी है। विज्ञापनदाताओं का कहना है कि जब पूरा मार्केट अलग-अलग मूल्य और क्षमता के आधार पर चलता है, तब एक समान प्रतिशत की बढ़ोतरी व्यावहारिक नहीं लगती।

हर अखबार की कीमत अलग, फिर एक जैसा सरचार्ज क्यों?

एक प्रमुख FMCG कंपनी के चीफ मार्केटिंग ऑफिसर (CMO) ने कहा कि अखबारों के कवर प्राइस की तरह विज्ञापन दरें तय नहीं होतीं। विज्ञापन की कीमत हर प्रकाशन और विज्ञापनदाता के बीच अलग-अलग बातचीत के जरिए तय होती है।

उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय अंग्रेजी अखबार, क्षेत्रीय भाषा के समाचार पत्र, बिजनेस अखबार और छोटे स्थानीय प्रकाशनों की विज्ञापन दरें अलग-अलग होती हैं। ये दरें पाठकों की संख्या, प्रसार (सर्कुलेशन), मार्केट हिस्सेदारी, संपादकीय माहौल, विज्ञापन की मांग, उपलब्ध विज्ञापन स्पेस और वर्षों पुराने कारोबारी संबंधों जैसे कई कारकों पर निर्भर करती हैं।

'मार्केट तय करेगा, सलाह नहीं'

भसीन कंसल्टिंग ग्रुप के संस्थापक और डेंट्सू एशिया पैसिफिक के पूर्व सीईओ आशीष भसीन भी इसी राय से सहमत हैं। उनका कहना है कि आखिरकार विज्ञापनदाता कितना भुगतान करेगा, यह किसी सलाह से नहीं बल्कि मार्केट की मांग और आपूर्ति तय करती है।

उन्होंने कहा, "प्रकाशक 15% का सरचार्ज वसूल पाएंगे या नहीं, यह पूरी तरह मार्केट पर निर्भर करेगा। अगर कोई अखबार अपने पाठकों की गुणवत्ता, कंटेंट और प्रभाव के आधार पर ज्यादा कीमत वाजिब ठहरा सकता है तो मीडिया खरीदार भुगतान करेंगे। लेकिन कीमत तय करना आदर्श रूप से खरीदार और विक्रेता के बीच का फैसला होना चाहिए, किसी तीसरे पक्ष द्वारा तय नहीं किया जाना चाहिए।"

उनका कहना है कि यही इस पूरे विवाद का सबसे अहम मुद्दा है। जो अखबार किसी महानगर में नंबर-1 है, किसी भाषा मार्केट में मजबूत पकड़ रखता है या बेहद सक्रिय और भरोसेमंद पाठक वर्ग रखता है, उसकी कीमत तय करने की क्षमता छोटे प्रकाशनों की तुलना में कहीं ज्यादा हो सकती है।

दूसरी ओर, कई छोटे प्रकाशनों के लिए मामूली बढ़ोतरी भी लागू करना मुश्किल हो सकता है, क्योंकि विज्ञापनदाताओं के पास टीवी, डिजिटल और रिटेल मीडिया जैसे कई दूसरे विकल्प पहले से मौजूद हैं। यही वजह है कि अलग-अलग मूल्य वाले मार्केट में एक समान 15% सरचार्ज को लेकर विज्ञापन जगत में बहस तेज हो गई है।

कमजोर आर्थिक स्थिति और मार्केट की हकीकत आमने-सामने

यह बहस ऐसे समय में हो रही है जब प्रिंट मीडिया की आर्थिक स्थिति अभी भी पूरी तरह सामान्य नहीं हुई है। उद्योग से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि खासकर अंग्रेजी अखबारों का सर्कुलेशन अभी तक कोविड महामारी से पहले के स्तर पर नहीं पहुंच पाया है।

हालांकि विज्ञापन दरों में इस बदलाव का पूरा असर अभी नहीं दिखा है, लेकिन उनका मानना है कि यदि 15% का अतिरिक्त शुल्क लगाया गया तो कई मार्केटिंग कंपनियां केवल इस बढ़ी हुई लागत ही नहीं बल्कि प्रिंट मीडिया पर अपने कुल विज्ञापन बजट की भी दोबारा समीक्षा कर सकती हैं।

रेडिफ्यूजन के मैनेजिंग डायरेक्टर डॉ. संदीप गोयल का कहना है, "15% का सरचार्ज विज्ञापनों के प्रवाह को और धीमा कर सकता है, जो पहले से ही दबाव में है। महंगे न्यूजप्रिंट की लागत कम करने के बजाय यह फैसला विज्ञापन की स्थिति को और खराब कर सकता है और पूरे प्रिंट उद्योग के लिए दोहरी मार साबित हो सकता है।"

'मुद्दा सही है, लेकिन समाधान कितना कारगर?'

टाटा मोटर्स कमर्शियल व्हीकल्स के पूर्व ग्लोबल चीफ मार्केटिंग ऑफिसर शुभ्रांशु सिंह का मानना है कि प्रकाशकों की आर्थिक परेशानियां वास्तविक हैं और इस पर चर्चा होना जरूरी है। लेकिन उनका कहना है कि यह तय नहीं है कि सभी विज्ञापनदाता 15% का समान सरचार्ज स्वीकार कर लेंगे।

उन्होंने कहा, "प्रकाशकों की बात सही है कि न्यूजप्रिंट का पूरा आर्थिक समीकरण बिगड़ चुका है। यह दबाव वास्तविक है और इस पर काफी पहले चर्चा होनी चाहिए थी। लेकिन असली सवाल यह है कि क्या 15% का समान सरचार्ज उनके मुनाफे को बढ़ाएगा या फिर विज्ञापन बजट को और तेजी से डिजिटल की ओर धकेल देगा, जिसका सबसे ज्यादा नुकसान प्रिंट मीडिया को ही होगा।"

उनका कहना है कि मीडिया इंडस्ट्री तेजी से बदल रही है। अब मार्केटर्स बेहतर मापने की सुविधा और सटीक टार्गेटिंग की वजह से डिजिटल प्लेटफॉर्म को प्राथमिकता दे रहे हैं। ऐसे में प्रिंट और टेलीविजन दोनों की विज्ञापन हिस्सेदारी धीरे-धीरे घट रही है और हर विज्ञापन रुपये के लिए प्रतिस्पर्धा पहले से ज्यादा बढ़ गई है।

उन्होंने यह भी कहा कि कई विज्ञापनदाता पहले ही पूरे साल के लिए विज्ञापन दरों पर समझौते (Annual Rate Agreements) कर चुके हैं। ऐसे में सभी पर एक साथ नया सरचार्ज लागू करना व्यावसायिक रूप से आसान नहीं होगा।

शुभ्रांशु सिंह ने कहा, "ज्यादातर CMO जिनसे मैं बात करता हूं, उन्होंने सालभर के रेट एग्रीमेंट पहले ही साइन कर रखे हैं। ऐसे में कई कंपनियां अतिरिक्त भुगतान करने के बजाय पूरे विज्ञापन प्लान की दोबारा समीक्षा करना ज्यादा उचित समझ सकती हैं।"

विज्ञापन दरें सिर्फ लागत से तय नहीं होतीं

मीडिया खरीदारों का कहना है कि मामला केवल 15% बढ़ोतरी का नहीं है। विज्ञापन दरें केवल प्रिंटिंग लागत के आधार पर तय नहीं होतीं। इनमें अखबार के पाठकों की प्रोफाइल, किसी विशेष श्रेणी में उसकी पकड़, उपलब्ध विज्ञापन स्पेस, मार्केट में उसकी स्थिति, पैकेज ऑफर और विज्ञापनदाता के साथ उसके लंबे कारोबारी संबंध जैसी कई बातें शामिल होती हैं।

मीडिया और एंटरटेनमेंट कंसल्टेंट तथा WPP और Publicis के पूर्व अधिकारी तरुण निगम इस मुद्दे को संतुलित नजरिए से देखते हैं।

उन्होंने कहा, "मैंने मीडिया और एजेंसी दोनों पक्षों पर कई वर्षों तक काम किया है, इसलिए इस फैसले के पीछे की आर्थिक मजबूरी को समझता हूं। लेकिन मुझे नहीं लगता कि 15% का सरचार्ज इसका सही समाधान है।"

उन्होंने आगे कहा, "आज सबसे बड़ी चुनौती यह है कि मीडिया प्लान में प्रिंट की हिस्सेदारी पहले ही लगातार घट रही है। ग्राहक अब डिजिटल-फर्स्ट रणनीति अपनाने की बात कर रहे हैं। हर निवेश को अब ROAS (रिटर्न ऑन एड स्पेंड) के आधार पर परखा जा रहा है और मार्केटर्स के पास पहले से कहीं ज्यादा ऐसे विकल्प मौजूद हैं जिनके नतीजे आसानी से मापे जा सकते हैं। ऐसे माहौल में अगर प्रिंट को 15% और महंगा कर दिया गया, तो यह उसे विज्ञापन योजनाओं में और पीछे धकेल सकता है।"

उनके मुताबिक असली सवाल यह नहीं है कि प्रकाशकों की लागत बढ़ी है या नहीं, क्योंकि इसमें कोई संदेह नहीं है। असली सवाल यह है कि क्या इस पूरी लागत का बोझ एक समान तरीके से विज्ञापनदाताओं पर डालने से समस्या हल होगी या फिर इससे एक नई समस्या खड़ी हो जाएगी।

आने वाले हफ्तों में यह साफ होगा कि कितने प्रकाशक 15% का सरचार्ज लागू करते हैं और कितने विज्ञापनदाता इसे स्वीकार करते हैं। लेकिन इतना तय है कि INS की इस सलाह ने चर्चा का दायरा केवल बढ़ती न्यूजप्रिंट लागत तक सीमित नहीं रखा, बल्कि प्रिंट मीडिया के कारोबारी मॉडल, विज्ञापन मूल्य निर्धारण और उसके भविष्य को लेकर भी एक बड़ी बहस शुरू कर दी है।

 

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अखबारों में विज्ञापन हो सकते हैं महंगे: 'INS' ने 15% सरचार्ज की सिफारिश की

इंडियन न्यूज़पेपर सोसाइटी (Indian Newspaper Society-INS) ने बढ़ती न्यूजप्रिंट और परिचालन लागत के मद्देनजर सदस्य प्रकाशनों को 1 अगस्त 2026 से विज्ञापनों पर 15% सरचार्ज लगाने की सलाह दी है।

Last Modified:
Wednesday, 22 July, 2026
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इंडियन न्यूज़पेपर सोसाइटी (Indian Newspaper Society-INS) ने अपने सदस्य प्रकाशनों को 1 अगस्त 2026 से विज्ञापनों पर 15% सरचार्ज (Surcharge) लगाने की सलाह दी है। संस्था का कहना है कि न्यूजप्रिंट (Newsprint) और अन्य परिचालन लागत में लगातार हो रही बढ़ोतरी के कारण समाचार पत्र उद्योग गंभीर आर्थिक दबाव का सामना कर रहा है।

आईएनएस (INS) की महासचिव (Secretary General) मैरी पॉल (Mary Paul) द्वारा जारी एडवाइजरी के अनुसार, यह फैसला 17 जुलाई 2026 को मुंबई (Mumbai) में आयोजित 665वीं कार्यकारी समिति (Executive Committee) की बैठक में लिया गया। बैठक में सदस्यों ने घरेलू और आयातित न्यूजप्रिंट की कीमतों में तेज वृद्धि के साथ-साथ बढ़ते परिचालन खर्चों पर चिंता जताई।

आईएनएस (INS) ने सदस्य प्रकाशनों से यह भी आग्रह किया है कि वे सरचार्ज लागू करने से पहले विज्ञापन एजेंसियों (Advertising Agencies) को औपचारिक रूप से इसकी जानकारी दें। संस्था का कहना है कि यदि एजेंसियों को पहले से लिखित सूचना नहीं दी गई, तो अतिरिक्त शुल्क के साथ ग्राहकों के लिए बिल जारी करने में व्यावहारिक कठिनाइयां आ सकती हैं।

एडवाइजरी में कहा गया है कि 15% सरचार्ज लागू करने वाले सदस्य प्रकाशन स्पष्ट नोटिस जारी कर समय रहते विज्ञापन एजेंसियों को इसकी जानकारी दें। इससे मीडिया एजेंसियों के साथ बेहतर व्यावसायिक संबंध बनाए रखने में मदद मिलेगी और बिलिंग प्रक्रिया भी सुचारु रहेगी।

आईएनएस (INS) का मानना है कि बढ़ती लागत के मौजूदा दौर में यह कदम समाचार पत्र उद्योग पर पड़ रहे आर्थिक दबाव को कुछ हद तक कम करने में सहायक साबित हो सकता है।

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पवन अग्रवाल और गिरीश अग्रवाल ने निवेशकों को बताया कैसे बढ़ रही है डी.बी. कॉर्प की ग्रोथ

पवन अग्रवाल ने निवेशकों के साथ कॉन्फ्रेंस कॉल में बताया कि अप्रैल-जून 2026 तिमाही में कंपनी का समेकित कुल राजस्व सालाना आधार पर लगभग 8 प्रतिशत बढ़कर 6,220 मिलियन रुपये पहुंच गया।

Last Modified:
Tuesday, 21 July, 2026
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दैनिक भास्कर समूह की कंपनी डी.बी. कॉर्प लिमिटेड ने वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में मजबूत वित्तीय प्रदर्शन दर्ज किया है। कंपनी का कहना है कि बढ़ती न्यूजप्रिंट कीमतों और चुनौतीपूर्ण कारोबारी माहौल के बावजूद राजस्व, मुनाफे और ऑपरेटिंग मार्जिन में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। कंपनी ने लागत नियंत्रण, विज्ञापन कारोबार में मजबूती और परिचालन दक्षता को इस प्रदर्शन का प्रमुख कारण बताया।

कंपनी के डिप्टी मैनेजिंग डायरेक्टर पवन अग्रवाल ने निवेशकों के साथ कॉन्फ्रेंस कॉल में बताया कि अप्रैल-जून 2026 तिमाही में कंपनी का समेकित कुल राजस्व सालाना आधार पर लगभग 8 प्रतिशत बढ़कर 6,220 मिलियन रुपये पहुंच गया। वहीं EBITDA में करीब 19 प्रतिशत की वृद्धि हुई और यह 1,647 मिलियन रुपये हो गया। EBITDA मार्जिन भी 23.6 प्रतिशत से बढ़कर 26.1 प्रतिशत हो गया, जो कंपनी की लागत नियंत्रण रणनीति की सफलता को दर्शाता है।

उन्होंने बताया कि कर के बाद कंपनी का शुद्ध लाभ (PAT) भी करीब 25 प्रतिशत बढ़कर 1,007 मिलियन रुपये हो गया, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यह 808 मिलियन रुपये था। उनके अनुसार बेहतर राजस्व, खर्चों में अनुशासन और परिचालन दक्षता ने मुनाफे को मजबूत किया है।

पवन अग्रवाल ने कहा कि कंपनी की विज्ञापन आय लगातार मजबूत बनी हुई है। पहली तिमाही में विज्ञापन राजस्व करीब 10 प्रतिशत बढ़कर 4,320 मिलियन रुपये पहुंच गया। उन्होंने कहा कि कंपनी के प्रमुख बाजारों में प्रिंट विज्ञापन की मांग बनी हुई है और अधिकांश उद्योगों से बेहतर विज्ञापन मिला है।

प्रिंट और अन्य कारोबार का EBITDA भी सालाना आधार पर लगभग 18 प्रतिशत बढ़कर 1,499 मिलियन रुपये हो गया। वहीं सर्कुलेशन से होने वाली आय लगभग 1,204 मिलियन रुपये पर स्थिर रही। उन्होंने कहा कि बदलते मीडिया परिदृश्य के बावजूद पाठकों का भरोसा दैनिक भास्कर पर कायम है।

रेडियो कारोबार का प्रदर्शन भी उत्साहजनक रहा। इस कारोबार का राजस्व 392 मिलियन रुपये से बढ़कर 425 मिलियन रुपये हो गया, जबकि EBITDA में लगभग 29 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई और यह 148 मिलियन रुपये तक पहुंच गया। उन्होंने कहा कि रेडियो कारोबार में ऑपरेटिंग लीवरेज लगातार बेहतर हो रहा है।

उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि पहली तिमाही में न्यूजप्रिंट की कीमतों पर वैश्विक आर्थिक और भू-राजनीतिक परिस्थितियों का असर पड़ा। हालांकि कंपनी ने खरीद प्रक्रिया में सुधार, लागत नियंत्रण और बेहतर प्रबंधन के जरिए इस दबाव का काफी हद तक सामना किया और इसी वजह से मार्जिन में सुधार दर्ज किया गया।

डिजिटल कारोबार को लेकर पवन अग्रवाल ने कहा कि यह कंपनी के लिए लंबी अवधि का सबसे महत्वपूर्ण ग्रोथ इंजन है। मई 2026 तक दैनिक भास्कर और गुजराती न्यूज ऐप्स के करीब 2 करोड़ मासिक सक्रिय उपयोगकर्ता (Monthly Active Users) रहे, जिससे कंपनी हिंदी और गुजराती डिजिटल समाचार क्षेत्र में अग्रणी बनी हुई है। उन्होंने कहा कि बेहतर कंटेंट, तकनीक और यूजर एक्सपीरियंस पर लगातार निवेश जारी रहेगा।

इसके बाद कंपनी के डायरेक्टर गिरीश अग्रवाल ने कहा कि यह तिमाही कंपनी के मजबूत बिजनेस मॉडल और बाजार नेतृत्व का प्रमाण है। उन्होंने कहा कि अखबार आज भी पाठकों और विज्ञापनदाताओं दोनों के लिए विश्वसनीय माध्यम बना हुआ है और कंपनी अनुशासित तरीके से लाभदायक वृद्धि पर काम कर रही है।

निवेशकों के सवालों के जवाब में गिरीश अग्रवाल ने बताया कि पहली तिमाही में दैनिक भास्कर का औसत सर्कुलेशन लगभग 38 लाख प्रतियों का रहा। गर्मियों के मौसम का कुछ असर जरूर पड़ा, लेकिन कंपनी इस स्तर को बनाए रखने में सफल रही है। उन्होंने कहा कि राजस्थान और मध्य प्रदेश जैसे कई बाजारों में कंपनी ने अपना मार्केट शेयर बढ़ाया है, जबकि पूरे उद्योग में सर्कुलेशन पर दबाव बना हुआ है।

उन्होंने माना कि कुछ पाठक धीरे-धीरे डिजिटल माध्यमों की ओर जा रहे हैं, जिससे उद्योग के कुल सर्कुलेशन में मामूली गिरावट आई है। इसके बावजूद कंपनी की कोशिश नए पाठकों को जोड़ने और बाजार हिस्सेदारी बढ़ाने की है। उन्होंने कहा कि कंपनी फिलहाल अखबार की कीमत बढ़ाकर पाठकों पर अतिरिक्त बोझ नहीं डालना चाहती। औसत कवर प्राइस लगभग 4.93 रुपये है और इसमें पिछले साल के मुकाबले लगभग कोई बदलाव नहीं किया गया है। केवल कुछ शहरों में सप्ताहांत के दाम और कुछ विशेष दिनों की बिक्री में मामूली बदलाव किया गया है।

विज्ञापन कारोबार के बारे में गिरीश अग्रवाल ने बताया कि शिक्षा और ऑटोमोबाइल सेक्टर को छोड़कर लगभग सभी प्रमुख उद्योगों से अच्छी वृद्धि दर्ज की गई। उन्होंने कहा कि शिक्षा क्षेत्र में विज्ञापन इसलिए नहीं बढ़ पाए क्योंकि NEET परीक्षा रद्द होने और दोबारा आयोजित होने के कारण उससे जुड़े विज्ञापन पहली तिमाही से दूसरी तिमाही में चले गए। वहीं ऑटोमोबाइल उद्योग पर वैश्विक भू-राजनीतिक परिस्थितियों, ईंधन से जुड़ी चिंताओं और बाजार की अनिश्चितता का असर पड़ा, जिससे कंपनियों ने विज्ञापन खर्च कम रखा।

उन्होंने बताया कि पहली तिमाही में शिक्षा क्षेत्र का विज्ञापन योगदान लगभग 20 प्रतिशत, सरकारी विज्ञापन 14-15 प्रतिशत और रियल एस्टेट 11-12 प्रतिशत के आसपास रहा। ज्वेलरी, एफएमसीजी, अस्पताल, बैंकिंग, इलेक्ट्रॉनिक्स और अन्य अधिकांश श्रेणियों में भी अच्छी वृद्धि दर्ज की गई। उन्होंने यह भी कहा कि सरकार द्वारा DAVP विज्ञापन दरों में की गई बढ़ोतरी का लाभ अब कंपनी को मिलना शुरू हो गया है, जिससे सरकारी विज्ञापनों में दोहरे अंकों की वृद्धि देखने को मिली।

न्यूजप्रिंट की कीमतों पर उन्होंने बताया कि पहली तिमाही में सालाना आधार पर करीब 13 प्रतिशत और पिछली तिमाही की तुलना में लगभग 8 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। दूसरी तिमाही में भी कीमतें ऊंची रहने की संभावना है, लेकिन कंपनी को उम्मीद है कि तीसरी और चौथी तिमाही में इनमें नरमी आ सकती है।

डिजिटल कारोबार को लेकर गिरीश अग्रवाल ने कहा कि कंपनी फिलहाल कमाई से ज्यादा मजबूत पाठक आधार तैयार करने पर ध्यान दे रही है। डिजिटल प्लेटफॉर्म पर उपयोगकर्ताओं की संख्या करीब 1.9 से 2 करोड़ के बीच बनी हुई है। उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश कंपनी के लिए बड़ा अवसर है क्योंकि वहां उसका प्रिंट संस्करण नहीं है। इसी वजह से कंपनी वहां डिजिटल कंटेंट, एनीमेशन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आधारित नए प्रयोग कर रही है। अगले वर्ष होने वाले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को भी कंपनी डिजिटल विस्तार का बड़ा अवसर मान रही है।

उन्होंने बताया कि कंपनी ने न्यूज आधारित AI माइक्रो ड्रामा और भास्कर सीरीज जैसे नए डिजिटल फॉर्मेट शुरू किए हैं, जिन्हें पाठकों से अच्छा प्रतिसाद मिल रहा है। इन वीडियो को यूट्यूब और अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म पर भी प्रचारित किया जा रहा है। हालांकि फिलहाल इनका विस्तार हिंदी और गुजराती तक सीमित रहेगा, जबकि अंग्रेजी संस्करण बाद में शुरू किया जाएगा।

डिजिटल राजस्व के बारे में उन्होंने कहा कि अभी इसका योगदान कंपनी की कुल आय में बहुत कम है और 5 प्रतिशत से भी नीचे है। हालांकि विज्ञापन आय लगातार बढ़ रही है, लेकिन इसे कारोबार में बड़ा योगदान देने में अभी कुछ वर्ष लगेंगे।

लागत नियंत्रण को लेकर गिरीश अग्रवाल ने कहा कि कंपनी में अब केवल मुख्यालय ही नहीं बल्कि हर कर्मचारी को खर्च बचाने की जिम्मेदारी दी गई है। यात्रा, प्रशासन और अन्य सभी खर्चों पर नजर रखी जा रही है। इसी रणनीति की वजह से ऑपरेटिंग मार्जिन में उल्लेखनीय सुधार हुआ है।

पूंजीगत निवेश (Capex) के बारे में उन्होंने कहा कि कंपनी इस वित्त वर्ष में भी लगभग 150 से 160 करोड़ रुपये निवेश करेगी। यह निवेश मुख्य रूप से उन शहरों में अपनी इमारतें बनाने पर किया जा रहा है, जहां अभी तक कंपनी किराये के भवनों से काम कर रही है। भोपाल समेत कई शहरों में जमीन खरीदकर अपने कार्यालय और अन्य ढांचे विकसित किए जा रहे हैं ताकि भविष्य में किराये का खर्च कम हो और संपत्तियों का मूल्य भी बढ़े।

रेडियो कारोबार पर उन्होंने कहा कि कंपनी के 37 रेडियो स्टेशन अच्छी वृद्धि दर्ज कर रहे हैं और सात नए स्टेशन भी शुरू किए जाने की तैयारी है। रेडियो विज्ञापन कारोबार में लगभग 12 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। उन्होंने कहा कि रेडियो में प्रसारण का समय सीमित होता है, इसलिए दोहरे अंकों की वृद्धि हासिल करना आसान नहीं है। इसके बावजूद कंपनी राजस्व बढ़ाने और लागत नियंत्रण दोनों पर समान रूप से काम कर रही है।

अन्य परिचालन आय (Other Operating Income) में वृद्धि के बारे में कंपनी ने बताया कि इसमें जॉब वर्क और वेस्टेज बिक्री से होने वाली आय का योगदान रहा।

गिरीश अग्रवाल ने यह भी कहा कि कंपनी भविष्य के प्रदर्शन को लेकर कोई औपचारिक अनुमान नहीं दे रही है, लेकिन हर टीम सदस्य कारोबार को आगे बढ़ाने के लिए पूरी मेहनत कर रहा है। उन्होंने कहा कि विज्ञापन कारोबार में लगातार मिल रही वृद्धि इस बात का संकेत है कि कंपनी का बाजार हिस्सा मजबूत हो रहा है और यही उसकी सबसे बड़ी ताकत है।

कॉन्फ्रेंस कॉल के अंत में पवन अग्रवाल ने निवेशकों का आभार जताते हुए कहा कि कंपनी आने वाले समय में भी मजबूत प्रदर्शन जारी रखने के लिए प्रतिबद्ध है और निवेशकों की सभी जिज्ञासाओं का समाधान करने के लिए उसका इन्वेस्टर रिलेशंस विभाग हमेशा उपलब्ध रहेगा।

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DB कॉर्प: प्रमोटर ग्रुप में होगा बदलाव, दो कंपनियों को पब्लिक कैटेगरी में भेजने की मंजूरी

मीडिया कंपनी डी.बी. कॉर्प लिमिटेड (D.B. Corp) के निदेशक मंडल (बोर्ड) ने प्रमोटर ग्रुप से जुड़ी दो कंपनियों को 'प्रमोटर ग्रुप' से 'पब्लिक' कैटेगरी में री-क्लासिफाई करने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है

Last Modified:
Thursday, 16 July, 2026
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मीडिया कंपनी डी.बी. कॉर्प लिमिटेड (D.B. Corp) के निदेशक मंडल (बोर्ड) ने प्रमोटर ग्रुप से जुड़ी दो कंपनियों BEDR Realcon Private Limited और Diligent Pinkcity Center Private Limited को 'प्रमोटर ग्रुप' से 'पब्लिक' कैटेगरी में री-क्लासिफाई (पुनर्वर्गीकृत) करने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। हालांकि, यह बदलाव संबंधित स्टॉक एक्सचेंजों की मंजूरी और सेबी (SEBI) के नियमों के अनुपालन के बाद ही प्रभावी होगा।

कंपनी ने गुरुवार (16 जुलाई) को स्टॉक एक्सचेंज को दी गई जानकारी में बताया कि बोर्ड की बैठक में दोनों कंपनियों की ओर से भेजे गए री-क्लासिफिकेशन के अनुरोध पर विचार किया गया। बोर्ड ने उनके द्वारा दिए गए कारणों, घोषणाओं और आवश्यक आश्वासनों की समीक्षा करने के बाद इस प्रस्ताव को मंजूरी दी।

कंपनी के मुताबिक, बोर्ड ने यह भी रिकॉर्ड पर लिया कि BEDR Realcon और Diligent Pinkcity Center तथा उनसे जुड़े लोगों की स्थिति सेबी के नियमों के अनुरूप है। दोनों कंपनियां मिलकर डी.बी. कॉर्प के कुल वोटिंग अधिकारों का 10 फीसदी से अधिक हिस्सा नहीं रखतीं। साथ ही उनका कंपनी के संचालन पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष नियंत्रण नहीं है।

इसके अलावा, दोनों कंपनियों के पास कंपनी में कोई विशेष अधिकार नहीं हैं, उनका निदेशक मंडल में कोई प्रतिनिधि या नामित निदेशक नहीं है और न ही वे कंपनी के की मैनेजेरियल पर्सनल (KMP) का हिस्सा हैं। कंपनी ने यह भी बताया कि दोनों संस्थाएं न तो भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की परिभाषा के अनुसार जानबूझकर कर्ज नहीं चुकाने वाली (Wilful Defaulter) हैं और न ही उन्हें भगोड़ा आर्थिक अपराधी (Fugitive Economic Offender) घोषित किया गया है।

बोर्ड ने इस प्रस्ताव को मंजूरी देने के साथ ही संबंधित स्टॉक एक्सचेंजों के पास आवश्यक आवेदन दाखिल करने की भी स्वीकृति दे दी है।

डी.बी. कॉर्प के बोर्ड की यह बैठक गुरुवार सुबह 10:30 बजे शुरू हुई और 11:40 बजे समाप्त हुई। 

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केरल में द पायनियर का विस्तार : नए कार्यालय का हुआ उद्घाटन

द पायनियर (The Pioneer) ने केरल संस्करण (Kerala Edition) के विस्तार के तहत तिरुवनंतपुरम (Thiruvananthapuram) में अपने नए कार्यालय का उद्घाटन किया।

Last Modified:
Wednesday, 15 July, 2026
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अंग्रेजी समाचार पत्र द पायनियर (The Pioneer) ने केरल (Kerala) में अपने विस्तार की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए तिरुवनंतपुरम (Thiruvananthapuram) में केरल संस्करण (Kerala Edition) के नए कार्यालय का उद्घाटन किया।

नए कार्यालय का उद्घाटन केरल विधानसभा (Kerala Legislative Assembly) के अध्यक्ष तिरुवंचूर राधाकृष्णन (Thiruvanchoor Radhakrishnan) और केरल के पुलिस महानिदेशक (Director General of Police-DGP) रवाडा ए. चंद्रशेखर (Ravada A. Chandrashekhar, IPS) ने संयुक्त रूप से किया।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, उद्घाटन समारोह की मेजबानी अमोघ पब्लिकेशन नेटवर्क्स प्राइवेट लिमिटेड (Amogh Publication Networks Pvt. Ltd.) के चेयरमैन एवं प्रबंध निदेशक (Chairman & Managing Director) सुधाकर गौड़ बांदी (Sudhakar Goud Bandi) ने की। यही कंपनी द पायनियर (The Pioneer) के केरल संस्करण का प्रकाशन कर रही है।

इस अवसर पर कर्नाटक कांग्रेस कमेटी (Karnataka Congress Committee) के उपाध्यक्ष एम. नागेश राव वंसे (M. Nagesh Rao Vanse), फादर जैकब वडक्केल (Father Jacob Vadakkel), मीडिया जगत से जुड़े प्रतिनिधि, जनप्रतिनिधि, वरिष्ठ सरकारी अधिकारी और अन्य आमंत्रित अतिथि भी उपस्थित रहे।

केरल संस्करण के नए कार्यालय की शुरुआत के साथ द पायनियर (The Pioneer) ने राज्य में अपनी उपस्थिति को मजबूत करने की दिशा में एक और महत्वपूर्ण कदम बढ़ाया है।

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पी. श्रीधर को ''साक्षी तेलुगु डेली'' में मिली अहम जिम्मेदारी

साक्षी तेलुगु डेली ने पी. श्रीधर को Director – Advertising & Marketing नियुक्त किया है। नई भूमिका में वह विज्ञापन, सेल्स, मार्केटिंग, बिजनेस डेवलपमेंट और रणनीतिक साझेदारियों का नेतृत्व करेंगे।

Last Modified:
Tuesday, 14 July, 2026
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साक्षी तेलुगु डेली (Sakshi Telugu Daily) ने पी. श्रीधर (P. Sridhar) को पदोन्नत करते हुए Director – Advertising & Marketing नियुक्त किया है। अपनी नई और विस्तारित जिम्मेदारी में वह विज्ञापन (Advertising), सेल्स (Sales), मार्केटिंग (Marketing), रणनीतिक साझेदारियों (Strategic Partnerships) और बिजनेस डेवलपमेंट (Business Development) का नेतृत्व करेंगे। कंपनी का उद्देश्य अपनी व्यावसायिक गतिविधियों को मजबूत करने और विज्ञापनदाताओं के साथ संबंधों को और सशक्त बनाना है।

पी. श्रीधर (P. Sridhar) भारतीय प्रिंट मीडिया उद्योग में तीन दशक से अधिक का अनुभव रखते हैं। साक्षी तेलुगु डेली (Sakshi Telugu Daily) की स्थापना के समय से ही वह संगठन के साथ जुड़े रहे हैं और अखबार को देश के प्रमुख क्षेत्रीय समाचार पत्रों में स्थापित करने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है।

अपने लंबे करियर के दौरान उन्होंने एफएमसीजी (FMCG), ऑटोमोबाइल (Automobile), बैंकिंग एवं वित्तीय सेवाएं (Banking & Financial Services), रियल एस्टेट (Real Estate), शिक्षा (Education), रिटेल (Retail), कंज्यूमर ड्यूरेबल्स (Consumer Durables), टेलीकॉम (Telecommunications), ई-कॉमर्स (E-commerce), हेल्थकेयर (Healthcare) और सरकारी संचार (Government Communications) जैसे विभिन्न क्षेत्रों के लिए बड़े विज्ञापन अभियानों का सफलतापूर्वक नेतृत्व किया है।

मीडिया और विज्ञापन जगत में पी. श्रीधर (P. Sridhar) को उनकी पेशेवर ईमानदारी, सहयोगात्मक नेतृत्व शैली और दीर्घकालिक व्यावसायिक साझेदारियां विकसित करने की क्षमता के लिए जाना जाता है। उनका मानना है कि नवीन मीडिया समाधानों, मजबूत बाजार विश्लेषण और उत्कृष्टता के प्रति प्रतिबद्धता के माध्यम से विज्ञापनदाताओं को बेहतर और मापनीय परिणाम उपलब्ध कराए जा सकते हैं।

कंपनी के अनुसार, Director – Advertising & Marketing के पद पर उनकी पदोन्नति साक्षी तेलुगु डेली (Sakshi Telugu Daily) की विकास यात्रा में उनके महत्वपूर्ण योगदान और विज्ञापन एवं मार्केटिंग कार्यों में उनके नेतृत्व की पहचान है। नई भूमिका में वह संगठन के अगले विकास और नवाचार चरण को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।

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HT Media के बोर्ड ने दी ₹95.30 करोड़ जुटाने की मंजूरी, प्रेफरेंशियल वारंट होंगे जारी

मीडिया कंपनी HT Media Limited के निदेशक मंडल (बोर्ड) ने कंपनी के लिए करीब 95.30 करोड़ रुपये जुटाने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है।

Last Modified:
Monday, 13 July, 2026
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मीडिया कंपनी HT Media Limited के निदेशक मंडल (बोर्ड) ने कंपनी के लिए करीब 95.30 करोड़ रुपये जुटाने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। यह राशि प्रेफरेंशियल आधार पर वारंट (Warrants) जारी करके जुटाई जाएगी। हालांकि, इस प्रस्ताव को लागू करने से पहले कंपनी के शेयरधारकों और संबंधित नियामकीय संस्थाओं की मंजूरी जरूरी होगी।

कंपनी ने शेयर बाजार को दी जानकारी में बताया कि बोर्ड की बैठक 11 जुलाई 2026 को हुई, जिसमें 3,87,87,137 वारंट जारी करने को मंजूरी दी गई। प्रत्येक वारंट धारक को बाद में कंपनी का एक पूर्ण चुकता इक्विटी शेयर लेने का अधिकार देगा। इन वारंटों का इश्यू प्राइस 24.57 रुपये प्रति वारंट तय किया गया है। इसके जरिए कंपनी अधिकतम 95.30 करोड़ रुपये जुटाएगी।

कंपनी के अनुसार, ये वारंट छह निवेशकों को आवंटित किए जाएंगे। इनमें प्रमोटर समूह की कंपनी The Hindustan Times Ltd. को 1,34,31,013 वारंट मिलेंगे। इसके अलावा Tremis Consultancy LLP को 1,24,13,512, Kiran Vyapar Limited को 71,22,507, Zafar Ahmadullah को 40,70,004, Zapfin Teknologies Private Limited को 4,07,000 और Peanence Commercial Private Limited को 13,43,101 वारंट आवंटित किए जाएंगे।

कंपनी ने बताया कि यदि सभी वारंट शेयरों में बदल दिए जाते हैं, तो प्रमोटर कंपनी The Hindustan Times Ltd. की हिस्सेदारी 69.50 प्रतिशत से घटकर 64.52 प्रतिशत रह जाएगी। ऐसा इसलिए होगा क्योंकि नए शेयर जारी होने से कंपनी की कुल शेयर पूंजी बढ़ जाएगी। वहीं, अन्य निवेशकों की भी कंपनी में हिस्सेदारी बनेगी।

कंपनी के मुताबिक, प्रमोटर समूह को जारी किए जाने वाले वारंटों की अवधि 18 महीने होगी, जबकि अन्य निवेशकों को जारी वारंट 12 महीने के भीतर इक्विटी शेयरों में बदले जा सकेंगे।

बोर्ड ने इस प्रस्ताव को मंजूरी दिलाने के लिए 7 अगस्त 2026 को असाधारण आम बैठक (EGM) बुलाने का भी फैसला किया है। इस बैठक में शेयरधारकों से प्रेफरेंशियल इश्यू को मंजूरी देने का प्रस्ताव रखा जाएगा।

कंपनी ने कहा कि EGM का नोटिस और इससे जुड़ी अन्य जानकारी नियामकीय प्रावधानों के तहत तय समय पर शेयर बाजार को उपलब्ध करा दी जाएगी।

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7 साल बाद भी नहीं लौटी IRS : रीडरशिप सर्वे पर फिर अटका मामला

करीब सात वर्षों से नई इंडियन रीडरशिप सर्वे (IRS) रिपोर्ट जारी नहीं हो सकी है जिससे प्रिंट उद्योग, विज्ञापनदाताओं और मीडिया प्लानिंग के लिए साझा रीडरशिप डेटा का संकट बना हुआ है।

Last Modified:
Monday, 13 July, 2026
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करीब सात वर्षों के बाद भी भारतीय प्रिंट मीडिया उद्योग को अब तक नई इंडियन रीडरशिप सर्वे (IRS) रिपोर्ट का इंतजार है। सितंबर 2025 में इसकी वापसी की दिशा में पायलट सर्वे की घोषणा की गई थी, लेकिन यह अभी तक योजना के चरण से आगे नहीं बढ़ पाया है। मीडिया रिसर्च यूजर्स काउंसिल ऑफ इंडिया (MRUC) सर्वे के ढांचे और प्रश्नावली में लगातार बदलाव कर रहा है, लेकिन प्रकाशकों के बीच सहमति नहीं बनने से फील्डवर्क शुरू नहीं हो सका है।

सूत्रों के अनुसार प्रस्तावित पायलट सर्वे शहरी और अर्ध-शहरी भारत के तीन बाजारों में किया जाना है। हालांकि कई प्रमुख प्रकाशकों का मानना है कि वर्तमान प्रश्नावली काफी लंबी है और आज के समय में 30-40 मिनट का इंटरव्यू लेना व्यावहारिक नहीं है। इसके अलावा गेटेड सोसायटी और प्रीमियम आवासीय परिसरों तक पहुंच जैसी चुनौतियां भी सर्वे की गुणवत्ता को प्रभावित कर सकती हैं। प्रकाशकों का कहना है कि नई IRS केवल पाठक संख्या ही नहीं, बल्कि पाठकों की भागीदारी (Engagement) और भरोसे (Trust) को भी मापने में सक्षम होनी चाहिए।

गौरतलब है कि अंतिम IRS रिपोर्ट 2019 में जारी हुई थी। इसके बाद फंडिंग, कार्यप्रणाली, रिसर्च पार्टनर और सर्वे के दायरे को लेकर मतभेदों के कारण इसकी वापसी लगातार टलती रही। करीब 40-50 करोड़ रुपये लागत वाले इस सर्वे का खर्च प्रकाशक मिलकर उठाते हैं, लेकिन प्रिंट सर्कुलेशन में गिरावट और बदलती मीडिया खपत के बीच कई प्रकाशक इसकी उपयोगिता और निवेश पर मिलने वाले लाभ को लेकर आश्वस्त नहीं हैं।

IRS की अनुपस्थिति में विज्ञापनदाता फिलहाल सर्कुलेशन डेटा, प्रकाशकों के अपने शोध और फर्स्ट-पार्टी एनालिटिक्स पर निर्भर हैं। बड़े मीडिया समूहों ने अपने डेटा सिस्टम विकसित कर लिए हैं, लेकिन छोटे और क्षेत्रीय प्रकाशकों के लिए यह स्थिति चुनौतीपूर्ण बनी हुई है। ऐसे में उद्योग का मानना है कि लगभग 20,000 करोड़ रुपये के प्रिंट विज्ञापन बाजार के लिए एक विश्वसनीय और सार्वभौमिक रीडरशिप सर्वे आज भी बेहद आवश्यक है। फिलहाल सबसे बड़ी चुनौती पायलट सर्वे को शुरू करना और उसके बाद नई IRS को जमीन पर उतारना है।

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राम के मानवीय स्वरूप को नई दृष्टि देती आशुतोष अग्निहोत्री की 'सब पर राम तपस्वी राजा'

भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) के वरिष्ठ अधिकारी और लेखक आशुतोष अग्निहोत्री की पुस्तक 'सब पर राम तपस्वी राजा' आजकल काफी चर्चा में है।

Last Modified:
Saturday, 11 July, 2026
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भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) के वरिष्ठ अधिकारी और लेखक आशुतोष अग्निहोत्री की पुस्तक 'सब पर राम तपस्वी राजा' आजकल काफी चर्चा में है। यह पुस्तक भगवान श्रीराम के व्यक्तित्व को एक नई और मानवीय दृष्टि से प्रस्तुत करती है। यह कृति श्रीराम को केवल एक आराध्य या दैवीय स्वरूप तक सीमित नहीं रखती, बल्कि उन्हें त्याग, करुणा, कर्तव्य, संवेदना और आदर्श जीवन-मूल्यों के प्रतीक के रूप में देखने का दृष्टिकोण भी प्रदान करती है।

कविता के रूप में लिखी गई यह पुस्तक रामायण के अनेक पात्रों और प्रसंगों को नए नजरिए से सामने लाती है। शिव-पार्वती संवाद, कौशल्या, कैकेयी, भरत, शबरी सहित कई पात्रों के माध्यम से लेखक ने मानवीय भावनाओं, आत्मसंघर्ष, कर्तव्यबोध और रिश्तों की गहराई को प्रभावशाली ढंग से अभिव्यक्त किया है। पुस्तक का उद्देश्य केवल रामकथा का पुनर्पाठ करना नहीं, बल्कि उसके माध्यम से जीवन के शाश्वत मूल्यों को पाठकों तक पहुंचाना भी है।

पुस्तक की सबसे बड़ी विशेषता इसकी सहज, सरल और भावपूर्ण भाषा है। छंद और लय से सजी कविताएं पाठक को श्रीराम के जीवन और उनके निर्णयों के पीछे छिपे मानवीय पक्ष से जोड़ती हैं। यही कारण है कि यह कृति पारंपरिक धार्मिक विमर्श से आगे बढ़कर आज के सामाजिक और मानवीय संदर्भों में भी अपनी प्रासंगिकता बनाए रखती है।

आशुतोष अग्निहोत्री ने इस पुस्तक में श्रीराम के चरित्र को मनोवैज्ञानिक और मानवीय दृष्टि से समझने का प्रयास किया है। विभिन्न प्रसंगों के माध्यम से उन्होंने उन भावनाओं और परिस्थितियों को स्वर दिया है, जिन पर सामान्यतः कम चर्चा होती है। यही दृष्टिकोण इस पुस्तक को समकालीन हिंदी साहित्य में अलग पहचान देता है।

भक्ति, साहित्य और मानवीय संवेदनाओं का सुंदर समन्वय प्रस्तुत करती यह पुस्तक पाठकों को रामकथा को एक नए दृष्टिकोण से समझने का अवसर देती है। इसकी लयात्मक अभिव्यक्ति और विचारप्रधान रचनाएं पाठक को अंत तक बांधे रखती हैं और जीवन-मूल्यों पर गंभीर चिंतन के लिए प्रेरित करती हैं।

'सब पर राम तपस्वी राजा' का प्रथम संस्करण वर्ष 2026 में राधाकृष्ण प्रकाशन द्वारा प्रकाशित किया गया है। पुस्तक का मूल्य 495 रुपये है।

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