हिंदी दैनिक ‘अमर उजाला’ (Amar Ujala) से एक बड़ी खबर निकलकर सामने आई है। दरअसल, खबर यह है कि यहां कई संपादकों के कार्यक्षेत्र में बदलाव किया गया है।
हिंदी दैनिक ‘अमर उजाला’ (Amar Ujala) से एक बड़ी खबर निकलकर सामने आई है। दरअसल, खबर यह है कि यहां कई संपादकों के कार्यक्षेत्र में बदलाव किया गया है। इन बदलावों के तहत आगरा संस्करण में संपादक विनोद पुरोहित का तबादला कानपुर किया गया है। जल्द ही वह वहां जॉइन करेंगे। देहरादून के न्यूज एडिटर कुमार अतुल को अलीगढ़ में संपादक बना कर भेजा गया है। अभी तक अलीगढ़ यूनिट की जिम्मेदारी विनोद पुरोहित ही संभाल रहे थे।
इसके साथ ही बतौर संपादक कानपुर में अपनी जिम्मेदारी संभाल रहे विजय त्रिपाठी को लखनऊ में राजीव सिंह की जगह संपादक बनाकर भेजा गया है। उन्होंने वहां जॉइन भी कर लिया है। बता दें कि लखनऊ के संपादक राजीव सिंह सेवानिवृत्त हो गए हैं। सूत्रों से मिली खबर के अनुसार, सेवानिवृत्ति के बाद भी राजीव सिंह अमर उजाला समूह से जुड़े रहेंगे और उन्हें नोएडा में नई जिम्मेदारी दी जा सकती है।
पिछले दिनों हिंदी दैनिक ‘दैनिक जागरण’ (Dainik Jagran) की आगरा यूनिट में न्यूज एडिटर पद से इस्तीफा देने वाले वरिष्ठ पत्रकार नवीन पटेल को अमर उजाला, प्रयागराज का नया एडिटर नियुक्त किया गया है। नई व्यवस्था के तहत उन्होंने अपना कार्यभार ग्रहण भी कर लिया है।
इसके अलावा खबर यह भी है कि अमर उजाला, नोएडा के स्थानीय संपादक भूपेंद्र कुमार को आगरा भेजा जा रहा है। अंदरखाने के सूत्रों के हवाले से मिली खबर के अनुसार, इलाहाबाद (अब प्रयागराज) के संपादक मनोज मिश्रा को नोएडा में भूपेंद्र कुमार की जगह भेजा जा रहा है। हालांकि, प्रबंधन की ओर से आधिकारिक रूप से इसकी पुष्टि नहीं की गई है।
'BW बिजनेसवर्ल्ड' ने अपना नवीनतम अंक जारी किया है। यह अंक उस ‘मोड़’ का गहन विश्लेषण प्रस्तुत करता है, जो देश के सबसे गतिशील डिजिटल इंडस्ट्रीज में से एक के सामने आया है।
देश की प्रमुख बिजनेस पत्रिका 'BW बिजनेसवर्ल्ड' ने अपना नवीनतम अंक जारी किया है, जिसमें ऑनलाइन गेमिंग प्रमोशन और विनियमन विधेयक 2025 के पारित होने के बाद भारत के गेमिंग इकोसिस्टम को झकझोर देने वाले बदलावों पर विस्तृत रिपोर्ट शामिल है। यह अंक उस ‘मोड़’ का गहन विश्लेषण प्रस्तुत करता है, जो देश के सबसे गतिशील डिजिटल इंडस्ट्रीज में से एक के सामने आया है।
इस अंक की कवर स्टोरी बताती है कि किस तरह संसद के निर्णय ने रियल मनी गेम्स- जैसे रम्मी, पोकर और फैंटेसी स्पोर्ट्स को प्रतिबंधित करके भारत के गेमिंग परिदृश्य की रूपरेखा ही बदल दी। विश्लेषण दर्शाता है कि किस तेजी से यह विधेयक पारित हुआ और सिर्फ 72 घंटों में दोनों सदनों से मंजूरी मिल गई, जिससे Dream11, MPL, Gameskraft, Zupee, WinZO और PokerBaazi जैसी दिग्गज कंपनियों के संचालन तुरंत ठप हो गए।
यह केवल एक नियामक बदलाव नहीं बल्कि पूरे इंडस्ट्री की रीसेटिंग है। हम उन प्लेटफॉर्म्स के टूटने के गवाह हैं, जो करोड़ों भारतीयों के लिए घरेलू नाम और सांस्कृतिक पहचान बन चुके थे।
आर्थिक विश्लेषण इस कानून की मानवीय कीमत को सामने लाता है। 250 मिलियन उपभोक्ताओं को अचानक अपने पसंदीदा गेमिंग प्लेटफॉर्म से अलग कर दिया गया। वित्तीय नुकसान ने भारत के निवेश परिदृश्य को गहराई तक प्रभावित किया, जिसमें प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के ₹65,000 करोड़ एक ही विधायी कदम में मिटा दिए गए।
सबसे स्पष्ट असर विज्ञापन क्षेत्र पर पड़ा, जहां ₹10,000 करोड़ का वार्षिक बाजार पूरी तरह मिट जाने के कगार पर है। यह उथल-पुथल ₹4,500 करोड़ के गेमिंग विज्ञापन इकोसिस्टम में फैल गई है, जिससे मशहूर हस्तियों- एमएस धोनी, विराट कोहली, शाहरुख खान और अमिताभ बच्चन के लिए तुरंत अनुबंधीय संकट खड़ा हो गया है, क्योंकि अब उनके हाई-प्रोफाइल एसोसिएशन गेमिंग प्लेटफॉर्म्स के साथ कानूनी रूप से असंभव हो गए हैं।अस
इस नए अंक की जांच यह उजागर करती है कि प्रतिबंध ने कैसे गेमिंग कंपनियों से कहीं आगे तक संकट को फैला दिया है। डिजिटल विज्ञापन दिग्गज Google, YouTube और Meta भी भारी राजस्व प्रभाव के लिए तैयार हो रहे हैं, क्योंकि उनके विज्ञापन इन्वेंट्री का बड़ा हिस्सा गेमिंग-प्रेरित खर्च पर निर्भर है।
अंक में संतुलित कवरेज है, जिसमें केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव के इस बयान को शामिल किया गया है कि यह कानून ‘उपभोक्ताओं की रक्षा करने, युवाओं को सुरक्षित रखने और लत व धोखाधड़ी के खतरे को समाप्त करने की एक निर्णायक पहल है।’ साथ ही, इसमें इंडस्ट्री की उन चिंताओं की भी चर्चा की गई है, जो प्रतिबंध की अनुपातिकता पर सवाल उठाती हैं।
विश्लेषण इंडस्ट्री की इस केंद्रीय चेतावनी पर भी प्रकाश डालता है कि ‘प्रतिबंध शायद ही कभी मांग को समाप्त करता है, यह उसे केवल भूमिगत ले जाता है।’ इससे यह सवाल उठता है कि कहीं यह बदलाव उपभोक्ता सुरक्षा के सरकार के घोषित उद्देश्यों को कमजोर न कर दे, क्योंकि लोग अब असं regulated या ऑफशोर प्लेटफॉर्म्स की ओर रुख कर सकते हैं।
अंक में यह भी विस्तार से बताया गया है कि विधेयक किस तरह निषिद्ध रियल मनी वाले फॉर्मेट और अनुमेय श्रेणियों- जैसे ईस्पोर्ट्स और कैजुअल गेम्स के बीच अंतर करता है। यह carve-out (इंडस्ट्री के एक हिस्से को अलग कर देना), जहां नए विकास मार्ग खोल सकता है, वहीं इंडस्ट्री के सामने वर्गीकरण और अनुपालन को लेकर बड़ी जटिलताएं भी खड़ी करता है।
अंक गेमिंग इंडस्ट्री की नियामक चुनौतियों की तुलना फिनटेक सेक्टर के सफल विकास से करता है। फिनटेक उदाहरण बताता है कि कैसे वह इंडस्ट्री उपभोक्ता सुरक्षा और इनोवेशन के बीच प्रभावी संतुलन स्थापित करने में कामयाब रहा। जैसे ही भारत का गेमिंग इंडस्ट्री अपनी नई हकीकत से जूझ रहा है, फिनटेक मॉडल नियामकों, इंडस्ट्री और उपभोक्ता समर्थकों के बीच रचनात्मक संवाद का सबक देता है। लेकिन यह अभी भी खुला सवाल है कि क्या ऐसे सहयोगी दृष्टिकोण गेमिंग संकट में लागू हो सकते हैं।
'BW बिजनेसवर्ल्ड' का यह नया अंक डिजिटल और प्रिंट दोनों फॉर्मैट में उपलब्ध है। इसके डिजिटल संस्करण में और गहरी जानकारियाँ और पूरी रिपोर्ट पढ़ी जा सकती हैं।
44 साल की विरासत के साथ 'BW बिजनेसवर्ल्ड' भारत का सबसे तेजी से बढ़ता 360-डिग्री बिजनेस मीडिया हाउस है। 23 विशेष व्यावसायिक समुदायों और 10 मैगजीन के नेटवर्क के साथ, यह घरेलू और वैश्विक वर्टिकल्स में सक्रिय है, जहां सम्मेलन और मंच आयोजित करके व्यावसायिक नेताओं के बीच संवाद और सहयोग का अनुकूल माहौल बनाया जाता है। BW के सभी अंक डिजिटल रूप से भी उपलब्ध हैं, जिनमें ऑनलाइन और वीडियो स्टोरीज शामिल होती हैं, और हर अंक का ई-मैगजीन भी मिलता है।
देश की शीर्ष प्रिंट मीडिया कंपनियों ने Q1 FY26 में मिश्रित प्रदर्शन दर्ज किया, जिसने यह दर्शाया कि एक ओर विज्ञापन मांग में मजबूती रही तो दूसरी ओर प्रसार पर लगातार बने ढांचागत दबाव ने चुनौती पेश की।
चहनीत कौर, सीनियर कॉरेस्पोंडेंट, एक्सचेंज4मीडिया ।।
देश की शीर्ष प्रिंट मीडिया कंपनियों ने Q1 FY26 में मिश्रित प्रदर्शन दर्ज किया, जिसने यह दर्शाया कि एक ओर विज्ञापन मांग में मजबूती रही तो दूसरी ओर प्रसार पर लगातार बने ढांचागत दबाव ने चुनौती पेश की। जहां कुछ हिस्सों में विज्ञापन मजबूत रहा, वहीं सब्सक्रिप्शन राजस्व पर दबाव बना रहा, जो बदलते कंजप्शन पैटर्न के बीच पाठकों से कमाई की लगातार चुनौती को उजागर करता है।
DB कॉर्प, एचटी मीडिया और जागरण प्रकाशन के लाभप्रदता रुझानों ने कंपनी-विशेष रणनीतियों और व्यापक उद्योग गतिशीलताओं दोनों को दर्शाया- चाहे वह उच्च लागत वाले इवेंट हों या डिजिटल विस्तार की पहल। तिमाही ने क्षेत्रीय और अंग्रेजी भाषा के प्रकाशकों के बीच स्पष्ट अंतर भी दिखाया। हिंदी अखबार, जिनकी स्थानीय बाजारों में गहरी पैठ है, अपेक्षाकृत मजबूत रहे और मुख्य बाजारों में स्थिर विज्ञापन खर्च से लाभान्वित हुए। वहीं, अंग्रेजी प्रकाशकों को अधिक दबाव झेलना पड़ा, क्योंकि मौसमी सुस्ती और प्रसार से कमाई की चुनौतियों ने राजस्व और लाभ दोनों को प्रभावित किया।
प्रिंट के लिए विज्ञापन जीवनरेखा बना हुआ है, लेकिन तीनों प्रकाशकों के प्रदर्शन में अलग-अलग रुझान दिखे।
DB कॉर्प का विज्ञापन राजस्व साल-दर-साल 7% घटा, जिसका मुख्य कारण Q1FY25 में चुनाव से जुड़े बड़े खर्चों से बनी उच्च आधार रेखा रही। हालांकि समायोजित आधार पर प्रबंधन ने उच्च सिंगल-डिजिट वृद्धि पर जोर दिया, जो मुख्य बाजारों में मजबूत विज्ञापनदाता मांग को दर्शाता है।
जागरण ने सुस्ती को मात देते हुए विज्ञापन राजस्व में 5% की वृद्धि दर्ज की, जो बढ़कर ₹311.6 करोड़ हो गया। वृद्धि कई श्रेणियों में व्यापक रही, जिसमें एफएमसीजी, शिक्षा और सरकारी अभियानों ने गति दी। डिजिटल राजस्व ने भी सहारा दिया, जो साल-दर-साल लगभग 5% बढ़कर ₹23.4 करोड़ हो गया।
एचटी मीडिया ने विज्ञापन राजस्व में 17% साल-दर-साल बढ़त दर्ज की, जो ₹255 करोड़ तक पहुंचा। इसके अंग्रेजी अखबारों का विज्ञापन राजस्व 19% बढ़कर ₹140 करोड़ रहा, जबकि हिंदी खंड में 14% की वृद्धि होकर ₹116 करोड़ तक पहुंचा। हालांकि क्रमिक आधार पर, मार्च तिमाही के बाद मौसमी कमजोरी के चलते अंग्रेजी और हिंदी दोनों विज्ञापन राजस्व घटे।
प्रसार आय के मोर्चे पर मिश्रित तस्वीर रही।
DB कॉर्प का प्रसार राजस्व स्थिर रहा, जो ₹120.3 करोड़ रहा जबकि पिछले साल यह ₹119.2 करोड़ था। कंपनी को अनुशासित सब्सक्रिप्शन प्राइसिंग और स्थिर पाठक आधार से लाभ हुआ।
जागरण का प्रसार राजस्व भी लगभग अपरिवर्तित रहा, ₹84.9 करोड़ जबकि पिछले साल यह ₹85.5 करोड़ था, जो बताता है कि मूल्य निर्धारण अनुशासन और वॉल्यूम प्रबंधन ने कठिनाइयों के बावजूद आय को स्थिर बनाए रखा।
एचटी मीडिया का प्रसार राजस्व 22% घटकर ₹39 करोड़ रहा। प्रबंधन ने इसका कारण छूट वाले सब्सक्रिप्शन ऑफ़र्स के जरिए पाठक आधार बढ़ाने की रणनीति को बताया, जिसने अस्थायी रूप से राजस्व को दबा दिया, भले ही प्रसार वॉल्यूम में सुधार हुआ।
रेडियो और डिजिटल जैसे सहायक कारोबारों ने प्रिंट-विशेष दबाव को संभालने और धीरे-धीरे मल्टी-प्लेटफॉर्म राजस्व मॉडल की ओर बढ़ने में मदद की।
DB कॉर्प की रेडियो डिवीजन ने स्थिर आय दी। रेडियो विज्ञापन राजस्व ₹39.2 करोड़ रहा, जो पिछले साल के ₹38.8 करोड़ से थोड़ा अधिक है। हालांकि, रेडियो EBITDA ₹13.2 करोड़ से घटकर ₹11.5 करोड़ रह गया। प्रबंधन ने कहा कि स्थानीय विज्ञापन मांग बढ़ रही है, लेकिन मार्जिन पर दबाव बना हुआ है।
जागरण के डिजिटल राजस्व Q1FY26 में बढ़कर ₹23.4 करोड़ हो गए, जो पिछले साल ₹22.3 करोड़ थे। यह वृद्धि कंपनी के मल्टी-प्लेटफॉर्म उपस्थिति बनाने में किए निवेश को दर्शाती है।
एचटी मीडिया को अपने रेडियो सेगमेंट में दबाव झेलना पड़ा। रेडियो राजस्व घटकर ₹31 करोड़ रह गया, जो पिछले साल ₹36 करोड़ था। कंपनी ने कहा कि यह आंशिक रूप से उच्च आधार प्रभाव के कारण हुआ। मार्जिन माइनस 21% रहा। इसके विपरीत, एचटी मीडिया के डिजिटल पोर्टफोलियो ने स्वस्थ वृद्धि दिखाई। इस खंड का राजस्व बढ़कर ₹56 करोड़ हो गया, जो साल-दर-साल 21% की वृद्धि है, हालांकि परिचालन मार्जिन अभी भी माइनस 38% पर है।
तीनों कंपनियों के शुद्ध लाभ में तीखा अंतर रहा।
DB कॉर्प का PAT 31% घटकर ₹80.8 करोड़ रहा, जो कम विज्ञापन राजस्व और EBITDA में कमी (₹190.9 करोड़ से घटकर ₹138.4 करोड़) के कारण हुआ। हालांकि क्रमिक आधार पर EBITDA 45% बढ़ा, क्योंकि न्यूजप्रिंट लागत में नरमी और खर्च प्रबंधन से मार्जिन 31% तक सुधरा।
जागरण ने 62.8% की मजबूत वृद्धि के साथ PAT ₹66.8 करोड़ दर्ज किया। इसे उच्च विज्ञापन राजस्व और अन्य आय में 123% उछाल (₹51.5 करोड़) से समर्थन मिला। हालांकि परिचालन लाभ ₹65.5 करोड़ से घटकर ₹63.8 करोड़ रहा, जिससे स्पष्ट हुआ कि शुद्ध लाभ वृद्धि में गैर-परिचालन आय का बड़ा योगदान था।
एचटी मीडिया Q1FY26 में ₹11.4 करोड़ के घाटे में चला गया, जबकि पिछली तिमाही में इसे ₹51.4 करोड़ का लाभ हुआ था। प्रबंधन ने कमजोर प्रसार राजस्व और उच्च लागत को मुख्य कारण बताया। हालांकि घाटा Q1FY25 के ₹27.6 करोड़ से कम रहा, जो साल भर में परिचालन लाभांश में कुछ सुधार को दर्शाता है।
प्रिंट क्षेत्र विज्ञापनदाताओं के भरोसे पर टिका हुआ है, लेकिन प्रसार पर संरचनात्मक दबाव और डिजिटल की ओर बदलाव चुनौती बने हुए हैं।
DB कॉर्प और जागरण के स्थिर विज्ञापन और प्रसार आंकड़े क्षेत्रीय बाजारों में हिंदी अखबारों की मजबूती को रेखांकित करते हैं। वहीं, एचटी मीडिया की मुश्किलें अंग्रेजी प्रकाशन की कठिनाइयों को उजागर करती हैं, जहां प्रसार से कमाई अभी भी कठिन बनी हुई है।
आने वाले समय में लागत प्रबंधन और न्यूजप्रिंट मूल्य प्रवृत्तियां मार्जिन को बनाए रखने में अहम होंगी। साथ ही, रेडियो और डिजिटल जैसे सहायक कारोबार राजस्व की अस्थिरता को संतुलित करने में और भी बड़ी भूमिका निभा सकते हैं।
रोहित भटनागर इससे पहले करीब तीन साल से ‘द फ्री प्रेस जर्नल’ (The Free Press Journal) में अपनी भूमिका निभा रहे थे।
‘एचटी सिटी’ (HT City) दिल्ली ने रोहित भटनागर को अपना नया एंटरटेनमेंट एडिटर नियुक्त करने की घोषणा की है। वह इससे पहले ‘द फ्री प्रेस जर्नल’ (The Free Press Journal) में इसी पद पर तीन साल तक अपनी भूमिका निभा चुके हैं।
रोहित भटनागर को प्रिंट, डिजिटल और टेलीविजन मीडिया में 16 साल से अधिक का अनुभव है।
भटनागर मुंबई की कई प्रमुख मीडिया संस्थाओं का हिस्सा रह चुके हैं, जिनमें ‘B4U’, ‘CNN-IBN’, ‘E24’, ‘Bollywood Now’, ‘डेक्कन क्रॉनिकल’, ‘मुंबई मिरर’ और ‘PeepingMoon’ भी शामिल हैं।
भारत की सबसे सम्मानित बिजनेस मैगजीन 'BW बिजनेसवर्ल्ड' ने अपनी 45वीं वर्षगांठ पर विशेष अंक की घोषणा की है।
भारत की सबसे सम्मानित बिजनेस मैगजीन 'BW बिजनेसवर्ल्ड' ने अपनी 45वीं वर्षगांठ पर विशेष अंक की घोषणा की है। अपनी स्थापना के बाद से ही यह पत्रिका भारत की कॉर्पोरेट और आर्थिक यात्रा का दस्तावेजीकरण करने, महत्वपूर्ण चर्चाओं को आकार देने और अहम पड़ावों को दर्ज करने में अग्रणी रही है।
भविष्य की ओर देखता विशेषांक
यह स्मारक अंक निम्न विषयों पर प्रकाश डालेगा:
India@2047: विकसित भारत के लिए विजन और रोडमैप
The Changing Face of Leadership: यह समझ कि लीडर्स भविष्य की तैयारी किस तरह कर रहे हैं
Voices That Matter: नीतिनिर्माताओं, उद्यमियों और उद्योग जगत के अग्रणी हस्तियों के दृष्टिकोण, जो कल को आकार दे रहे हैं
संग्रहणीय अंक
45वीं वर्षगांठ का यह अंक न सिर्फ अतीत पर नजर डालेगा, बल्कि आने वाले समय का खाका भी प्रस्तुत करेगा। इसमें विशेष निबंध, गहन फीचर और भारत के सबसे प्रभावशाली निर्णयकर्ताओं के लिए थॉट लीडरशिप शामिल होगी।
विस्तृत प्रभाव
यह ऐतिहासिक अंक विस्तारित प्रसार और डिजिटल प्रसार-प्रचार से और अधिक प्रभावी होगा, जिससे यह बिजनेस लीडर्स, नीतिनिर्माताओं, उद्यमियों और बदलाव लाने वाले व्यापक पारिस्थितिकी तंत्र तक अधिकतम दृश्यता सुनिश्चित करेगा। यह संगठनों के लिए भारत की विकास यात्रा के एक निर्णायक क्षण से जुड़ने का अनोखा अवसर प्रदान करता है।
BW बिजनेसवर्ल्ड का 45वीं वर्षगांठ विशेषांक सितंबर 2025 में जारी किया जाएगा।
छह साल के अंतराल के बाद, मीडिया रिसर्च यूजर्स काउंसिल ऑफ इंडिया (MRUCI) तीन शहरों में पायलट इंडियन रीडरशिप सर्वे (IRS) करने पर विचार कर रहा है
कंचन श्रीवास्तव, सीनियर एडिटर, एक्सचेंज4मीडिया ।।
छह साल के अंतराल के बाद, मीडिया रिसर्च यूजर्स काउंसिल ऑफ इंडिया (MRUCI) तीन शहरों में पायलट इंडियन रीडरशिप सर्वे (IRS) करने पर विचार कर रहा है, ताकि बदलते रीडरशिप पैटर्न को प्रिंट और डिजिटल दोनों न्यूज प्लेटफॉर्म्स पर ट्रैक किया जा सके। इंडस्ट्री सूत्रों ने यह जानकारी एक्सचेंज4मीडिया को दी।
अधिकारियों ने एक्सचेंज4मीडिया को बताया, “काउंसिल ने इस महीने की शुरुआत में अपनी बोर्ड मीटिंग में तीन मार्केट्स में पायलट सर्वे करने पर चर्चा की थी, जिसमें प्रिंट और डिजिटल न्यूज रीडरशिप दोनों को कवर किया जाएगा। हालांकि, इन मार्केट्स के चयन पर अभी सहमति नहीं बन पाई है।”
अधिकारियों का कहना है कि अगले मीटिंग में मार्केट्स के नाम, सैंपल साइज, मेथडोलॉजी और सर्वे की टाइमलाइन को अंतिम रूप दिए जाने की संभावना है। सर्वे में शहरी और अर्ध-शहरी आबादी को शामिल किया जाना चाहिए।
सूत्रों के अनुसार, काउंसिल संभवतः इस बहुप्रतीक्षित सर्वे को अंजाम देने के लिए रिसर्च फर्म Inteliphyle को शामिल कर सकता है, जिसका नेतृत्व प्रसून बासु कर रहे हैं, जो पहले कंतार और नीलसन में एग्जिक्यूटिव रह चुके हैं।
जब एक्सचेंज4मीडिया ने IRS पायलट टेस्ट के विवरण के बारे में पूछा, तो MRUCI के चेयरमैन शैलेश गुप्ता ने कहा, “इस समय कोई भी बयान देना जल्दबाजी होगी।”
गौरतलब है कि MRUCI ने पिछले साल के दौरान इस सर्वे पर कई मीटिंग्स कीं, लेकिन सदस्य कभी सहमति पर नहीं पहुंचे। फंडिंग फॉर्मूला से लेकर सर्वे मेथडोलॉजी, एजेंसी के चयन और सर्वे के दायरे तक- कई पहलुओं पर व्यापक बहस हुई लेकिन कोई समाधान नहीं निकला।
एक्सचेंज4मीडिया ने पहले रिपोर्ट किया था कि काउंसिल के कई प्रमुख सदस्य पारंपरिक डोर-टू-डोर सर्वे मॉडल के प्रति बढ़ती शंका जता रहे हैं। उन्होंने कहा कि COVID के बाद हाउसिंग सोसायटीज तक पहुंच सीमित हो गई है और प्राइवेसी को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं। उन्होंने यह भी बताया कि मेट्रो शहरों के निवासी 45 मिनट इंटरव्यू देने के लिए कम इच्छुक हैं, जिससे अर्बन डेटा की विश्वसनीयता और बदले में IRS की साख प्रभावित हो सकती है।
पब्लिशर्स ने यह तर्क भी दिया कि सर्वे को फिर से शुरू करने की लागत और जटिलता अब उचित नहीं ठहराई जा सकती, खासकर जब इसकी प्रासंगिकता पर बढ़ते हुए डिजिटल-चालित प्लानिंग माहौल में सवाल उठ रहे हैं।
2019 में हुआ था आखिरी सर्वे
आखिरी सर्वे 2019 में किया गया था। उसके बाद पहले महामारी के कारण और फिर फंडिंग चुनौतियों की वजह से इसका रोलआउट रुक गया।
इस बीच, भारत का विज्ञापन इंडस्ट्री 2024 में ₹1.1 लाख करोड़ को पार कर गया, जिसमें कुल विज्ञापन खर्च में प्रिंट की हिस्सेदारी 15–16% रही। इसका मतलब है कि प्रिंट इंडस्ट्री अब भी ₹15,000–16,000 करोड़ के विज्ञापन राजस्व पर अधिकार रखता है, जिससे यह करेंसी विज्ञापनदाताओं के लिए और भी अहम हो जाती है, खासकर आज के कठिन आर्थिक माहौल में, जहां हर मार्केटिंग रुपये पर बारीकी से नजर रखी जा रही है।
इस गतिरोध ने इंडस्ट्री-स्तरीय बहस को जन्म दिया है कि क्या पारंपरिक रीडरशिप सर्वे पूरे परिदृश्य को कैप्चर कर सकता है, जब डिजिटल न्यूज, शॉर्ट-फॉर्म वीडियो और सोशल मीडिया खपत में विस्फोटक वृद्धि हो रही है। कई पर्यवेक्षक प्रिंट के साथ-साथ सभी मीडिया प्लेटफॉर्म्स की खपत को समझने के लिए एक व्यापक अध्ययन की भी मांग कर रहे हैं।
डाबर इंडिया के वाइस प्रेसिडेंट और हेड ऑफ मीडिया, राजीव दुबे, इस पुराने दृष्टिकोण को एक अधिक AI-संचालित “मीडिया यूनिवर्स सर्वे” से बदलने की वकालत करते हैं।
राजीव दुबे ने सोमवार को अपने एक्सचेंज4मीडिया कॉलम में लिखा, “यह सर्वे सिर्फ इम्प्रेशंस को नहीं गिनेगा, यह प्रिंट, टीवी, मैगजीन, सोशल, शॉर्ट-फॉर्म वीडियो, ओटीटी, डिजिटल न्यूज और ई-कॉमर्स तक फैला होगा और पूरी शॉपर जर्नी को मैप करेगा और क्रॉस-चैनल व्यवहार को कैप्चर करेगा। यह डायनेमिक और ऑलवेज-ऑन होगा, कोई धुंधली वार्षिक रिपोर्ट नहीं, यह प्लेटफॉर्म्स, चैनल्स और डिवाइसेज पर रियल-टाइम, एक्शन योग्य इनसाइट्स देगा।”
इंडस्ट्री के एक लीडर ने कहा, यह देखना दिलचस्प होगा कि IRS एक टेक-संचालित, हाइब्रिड मीजरमेंट तकनीक में विकसित होता है या अपने पारंपरिक प्रिंट-फर्स्ट दृष्टिकोण को जारी रखता है या फिर हमेशा के लिए अपनी प्रासंगिकता खो देता है।
आईटीसी लिमिटेड में मार्केटिंग व एक्सपोर्ट्स के एग्जिक्यूटिव वाइस प्रेजिडेंट करुणेश बजाज साल 2025-26 के लिए ऑडिट ब्यूरो ऑफ सर्कुलेशंस (ABC) के नए चेयरमैन बन सकते हैं।
आईटीसी लिमिटेड में मार्केटिंग व एक्सपोर्ट्स के एग्जिक्यूटिव वाइस प्रेजिडेंट करुणेश बजाज साल 2025-26 के लिए ऑडिट ब्यूरो ऑफ सर्कुलेशंस (ABC) के नए चेयरमैन बन सकते हैं। इस संबंध में उच्च पदस्थ सूत्रों ने एक्सचेंज4मीडिया को जानकारी दी है।
परंपरा के अनुसार, बजाज वर्तमान चेयरमैन रियाद मैथ्यू, जो मलयाला मनोरमा ग्रुप के चीफ एसोसिएट एडिटर और डायरेक्टर हैं, की जगह लेंगे। औपचारिक पुष्टि आगामी वार्षिक आम बैठक (AGM) में होगी और इसके बाद 2 सितंबर से बजाज पदभार ग्रहण करेंगे।
जब इस विकास पर रियाद मैथ्यू से सवाल किया गया, तो उन्होंने कहा, “यह एक वार्षिक प्रक्रिया है। हर साल ABC में नए चेयर और वाइस चेयर का चुनाव होता है।”
सूत्रों के अनुसार, बेनेट, कोलमैन एंड कंपनी लिमिटेड (टाइम्स ऑफ इंडिया ग्रुप) के चीफ ऑपरेटिंग ऑफिसर और बोर्ड मेंबर मोहित जैन वाइस चेयरमैन बनाए जा सकते हैं। वह बजाज की जगह लेंगे, जो फिलहाल इस पद पर कार्यरत हैं।
बजाज एक अनुभवी बिजनेस लीडर हैं, जिन्हें दो दशकों से अधिक का इंडस्ट्री अनुभव है। मार्केटिंग इनसाइट और बिजनेस अक्यूमेन के दुर्लभ संयोजन के कारण उनकी भूमिका को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
मोहित जैन भी टाइम्स ऑफ इंडिया ग्रुप से बीते दो दशकों से जुड़े हुए हैं। इससे पहले उन्होंने जीएसके कंज्यूमर हेल्थकेयर और Huhtamaki में काम किया है। समय के साथ उन्होंने रणनीतिक समझ और मीडिया बिजनेस की गहरी जानकारी के लिए मजबूत प्रतिष्ठा अर्जित की है।
ABC हर छह महीने में अपने सदस्य प्रकाशकों को ABC सर्टिफिकेट जारी करता है, जिनका सर्कुलेशन डेटा उसके नियमों और विनियमों के अनुरूप होता है। यह संस्था प्रकाशकों के लिए योग्य सर्कुलेशन प्रतियों की गणना हेतु मानकीकृत ऑडिट प्रक्रिया भी निर्धारित करती है।
ABC की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार, संस्था की सदस्यता में वर्तमान में 562 दैनिक, 107 साप्ताहिक और 50 मैगजींस शामिल हैं। इसके अलावा 125 विज्ञापन एजेंसियां, 45 विज्ञापनदाता और 22 समाचार एजेंसियां एवं प्रिंट मीडिया और विज्ञापन से जुड़ी संस्थाएं भी इसका हिस्सा हैं।
1995 जब में मीडिया रिसर्च यूजर्स काउंसिल (MRUC) द्वारा पहला इंडियन रीडरशिप सर्वे (IRS) किया गया, तब का भारतीय विज्ञापन इंडस्ट्री आज की तुलना में लगभग पहचानी ही नहीं जा सकती थी
राजीव दुबे, वाइस प्रेजिडेंट, हेड ऑफ इंडिया, डाबर इंडिया लिमिटेड ।।
1995 जब में मीडिया रिसर्च यूजर्स काउंसिल (MRUC) द्वारा पहला इंडियन रीडरशिप सर्वे (IRS) किया गया, तब का भारतीय विज्ञापन इंडस्ट्री आज की तुलना में लगभग पहचानी ही नहीं जा सकती थी। उस समय यह सेक्टर सिर्फ ₹3,000–4,500 करोड़ का था और कुल विज्ञापन खर्च का 70% प्रिंट पर जाता था। टेलीविजन अभी उभर रहा था और केबल टीवी बस क्षितिज पर दिखाई देने लगी थी।
आज की स्थिति देखें तो उद्योग ₹1.1 लाख करोड़ से ज्यादा का हो चुका है और कहानियां कहने के तरीक़े में जबरदस्त बदलाव आया है। IRS ने इन बदलावों के साथ 30 साल की यात्रा तय की है, अब समय है एक अपग्रेड का। 1995 के पहले IRS ने उसी वास्तविकता को दिखाया था- एक ऐसा दौर, जब प्रिंट मीडिया ही राजा था और बाकी सब पीछे थे।
आज का परिदृश्य
आज तस्वीर बिल्कुल अलग है। उद्योग ₹1.1 लाख करोड़ से अधिक पर पहुंच चुका है और इसका इंजन कहानियों और फॉर्मैट्स जितना ही एल्गोरिद्म और स्क्रीन से भी चलता है। प्रिंट का हिस्सा, जो कभी हावी था, अब लगभग 17%-19% पर आ गया है। डिजिटल विज्ञापन सबसे आगे है और कुल विज्ञापन खर्च का लगभग आधा हिस्सा लेता है, जबकि टेलीविजन का हिस्सा एक-तिहाई से भी कम है। यह वह दौर है जब स्क्रॉलिंग थंब और पलक झपकते ध्यान का राज है, जब OTT शो डिमांड पर देखे जाते हैं, न्यूज In Shorts जैसी ऐप्स पर पढ़ी जाती है, और शॉपिंग सर्च से शुरू होकर स्मार्टफोन पर टैप के साथ खत्म हो जाती है।
क्या बदला है और क्यों मीजरमेंट पीछे है?
लेकिन समस्या यह है कि इस बड़े बदलाव के बावजूद हमारी ट्रैकिंग, समझ और रणनीति बनाने के औजार पीछे रह गए हैं। IRS (Indian Readership Survey) अभी भी प्रिंट पर ज्यादा केंद्रित है, जो पुराने (एनालॉग) जमाने की सोच को दर्शाता है। जबकि मीडिया और विज्ञापन इंडस्ट्री अब डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन को अपना चुकी है। आखिरी बार IRS ने सभी स्टेकहोल्डर्स की जरूरत को ठीक से 2019 में पूरा किया था, जब डिजिटल और ब्रॉडकास्ट चैनलों की भूमिका अपेक्षाकृत सीमित थी।
सच्चाई यह है कि विज्ञापन की सफलता अब “opportunity to see” (यानी कितने लोगों ने विज्ञापन देखा) से आगे निकल चुकी है। आज ब्रांड्स और एजेंसियां सिर्फ एक्सपोजर नहीं, बल्कि असली उपभोक्ता रुचि को पकड़ने और बनाए रखने पर ध्यान देती हैं। कंज्यूमर इंटरैक्शन से सीधे जुटाए गए first-party data signals अब कैंपेन रणनीति की नींव हैं। इन्हीं संकेतों से ब्रांड्स सचमुच पर्सनलाइज्ड कम्युनिकेशन कर पाते हैं, जिससे विज्ञापन ज्यादा प्रासंगिक होते हैं और कन्वर्जन बढ़ते हैं।
डेटा से आगे बढ़कर, कंज्यूमर cohorts यानी रुचियों, आदतों या व्यवहार के आधार पर बने समूहों की ताक़त को देखें—ये लेजर-फोकस्ड मैसेजिंग और बड़े पैमाने पर हाइपर-पर्सनलाइजेशन संभव बनाते हैं। या फिर वे प्रोग्रामैटिक प्लेटफॉर्म्स, जो मशीन लर्निंग से सही समय पर सही जगह विज्ञापन दिखाते हैं। उदाहरण के लिए, IPL 2023 से विज्ञापनदाताओं ने इन नए औजारों का असर पहली बार देखा—CTV प्लेटफॉर्म्स पर इंटरैक्टिव विज्ञापनों ने एंगेजमेंट पैदा किया। अब सिर्फ रीच नहीं, बल्कि एंगेजमेंट ही गोल्ड स्टैंडर्ड है।
भविष्य-तैयार, समग्र मीडिया सर्वे की जरूरत
इस वास्तविकता को देखते हुए, जरूरी है कि भारत अपने मीडिया यूनिवर्स को मीजरमेंटने का तरीक़ा दोबारा सोचे। कल्पना कीजिए, एक next-gen survey का जिसमें एक मिलियन से अधिक उत्तरदाता हों, और जो हर फॉर्मैट, क्षेत्र, आयु वर्ग और डेमोग्राफिक को कवर करे। भर्ती, इंटरव्यू और परिणाम AI एजेंट्स द्वारा संचालित हों—सर्वे ज्यादा संरचित, कुशल और ऑडिटेबल हो—और डेटा पारदर्शी व भरोसेमंद हो।
यह सर्वे सिर्फ impressions नहीं गिनेगा। इसमें प्रिंट, टीवी, मैगजीन, सोशल, शॉर्ट-फॉर्म वीडियो, OTT, डिजिटल न्यूज, ई-कॉमर्स—सब शामिल होंगे और उपभोक्ताओं की पूरी shopper journey को कैप्चर किया जाएगा। यह दिखाएगा कि भारतीय उपभोक्ता वास्तव में किन-किन क्रॉस-चैनल रास्तों से गुजरते हैं। यह हमेशा सक्रिय रहेगा, न कि सालाना धूल जमी हुई रिपोर्ट की तरह—और रियल टाइम में उपयोगी actionable insights देगा। यह वास्तव में cross-channel, cross-platform, cross-devices survey होगा।
उद्योग सहयोग: किन्हें शामिल होना चाहिए
इतनी महत्वाकांक्षी व्यवस्था अकेले नहीं बन सकती। हमें पूरे उद्योग का गठबंधन चाहिए—एजेंसियां, विज्ञापनदाता, मीडिया मालिक, ब्रॉडकास्टर, टेक कंपनियां, प्रोग्रामैटिक और ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स, स्ट्रीमिंग खिलाड़ी और अन्य। जब पूरा इकोसिस्टम भाग लेगा, तभी भारत की बदलती मीडिया आदतों की व्यापक और समग्र तस्वीर मिलेगी।
एक व्यावहारिक क़दम यह होगा कि विज्ञापनदाताओं, पब्लिशर्स, एजेंसियों और टेक्नोलॉजी कंपनियों के प्रतिनिधियों के साथ एक स्वतंत्र task force बने। यह संस्था मजबूत मीजरमेंटदंड तय करेगी, पारदर्शिता सुनिश्चित करेगी और इंटीग्रेशन की चुनौतियों को हल करेगी। जैसे-जैसे हम और डेटा स्रोतों का उपयोग करेंगे, हमें उपयोगकर्ता की प्राइवेसी को प्राथमिकता देनी होगी, विविध आवाजों को शामिल करना होगा और टेक्नोलॉजी शिफ्ट्स के साथ बने रहना होगा।
फंडिंग: उद्योग के भविष्य में साझा निवेश
एक ऐसा सर्वे जो सबकी सेवा करे, उसकी फंडिंग सिर्फ कुछ लोग नहीं कर सकते। पारंपरिक रूप से प्रिंट पब्लिशर्स ने अधिकतर लागत उठाई है—लेकिन यह ढाँचा अब प्रासंगिक नहीं है। अब फंडिंग सामूहिक होनी चाहिए।
पब्लिशर्स और ब्रॉडकास्टर्स, जिन्हें प्रासंगिकता और विकास चाहिए
विज्ञापनदाता और एजेंसियां, जिन्हें सटीकता और actionable intelligence की जरूरत है
टेक कंपनियां और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स, जिनके प्लेटफॉर्म, एल्गोरिद्म और ऐड प्रोडक्ट्स मजबूत और विश्वसनीय रीच व एंगेजमेंट डेटा पर निर्भर हैं
केवल तभी जब हर लाभार्थी निवेश भी करेगा, हमें न्यायपूर्ण गवर्नेंस, व्यापक भागीदारी और भरोसेमंद परिणाम मिलेंगे।
भारत के लिए क्यों जरूरी है- अभी और भविष्य में
एक आधुनिक, एकीकृत मीजरमेंट व्यवस्था सिर्फ तकनीकी अपग्रेड नहीं है- यह स्मार्ट कैंपेन प्लानिंग, क्रिएटिव इनोवेशन और उद्योग की विश्वसनीयता की नींव है। इसके साथ मार्केटर्स को साफ समझ मिलेगी, एजेंसियां आत्मविश्वास के साथ खर्च बांट सकेंगी, और जनता को ज्यादा प्रासंगिक और कम दखल देने वाले संदेश मिलेंगे। यह सिर्फ बराबरी करने की बात नहीं है, बल्कि नेतृत्व करने की है।
मैंने उद्योग को उसके स्याही-सने प्रिंट शुरुआती दौर से लेकर उसके आज के गतिशील डिजिटल वर्तमान तक विकसित होते देखा है। मुझे पूरा यक़ीन है: समय अब है। भारत को मानक तय करना चाहिए, सिर्फ पीछे नहीं चलना चाहिए।
आइए, वह मीजरमेंट व्यवस्था बनाएं जिसे एक दिन दुनिया अपनाना चाहेगी।
स्रोत और संदर्भ:
India Today Archive — Historic Industry Size
(ये लेखक के निजी विचार हैं)
इससे पहले रवीन्द्रन करीब एक साल तक 'द टाइम्स ऑफ इंडिया' के साथ एसोसिएट वाइस प्रेसिडेंट और रिस्पॉन्स हेड के रूप में जुड़े हुए थे।
HT मीडिया ग्रुप ने स्वप्निल रवीन्द्रन को साउथ का चीफ रेवेन्यू ऑफिसर नियुक्त किया है। इस खबर की घोषणा रवीन्द्रन ने अपने लिंक्डइन प्रोफाइल के जरिए की है।
एचटी मीडिया में अपनी भूमिका का वर्णन करते हुए रवीन्द्रन ने लिखा, “हिन्दुस्तान टाइम्स, हिन्दुस्तान हिंदी और मिंट के लिए प्रिंट और डिजिटल दोनों प्लेटफॉर्म पर रेवेन्यू ग्रोथ पहलों का नेतृत्व करना, दक्षिण क्षेत्र के लिए ‘वन एचटी’ नैरेटिव को और मजबूत बनाना। क्रॉस-फंक्शनल टीमों के साथ सहयोग करते हुए इनोवेटिव रणनीतियों को लागू करना, जिससे मार्केट शेयर में वृद्धि हो रही है।”
इससे पहले रवीन्द्रन करीब एक साल तक 'द टाइम्स ऑफ इंडिया' के साथ एसोसिएट वाइस प्रेसिडेंट और रिस्पॉन्स हेड के रूप में जुड़े हुए थे।
अतीत में उन्होंने 'इनमोबी' और 'द हिंदू' के साथ भी काम किया है।
देश के प्रमुख अखबारों ने महामारी के बाद से अपने सर्कुलेशन और पेज संख्या में भारी कटौती की है, जिसके चलते पिछले पांच वर्षों में अखबारों में इस्तेमाल होने वाले न्यूजप्रिंट में 25–30% की गिरावट आई है।
अंग्रेजी के शीर्ष दैनिक समेत देश के प्रमुख अखबारों ने महामारी के बाद से अपने सर्कुलेशन (प्रसार) और पेज संख्या में भारी कटौती की है, जिसके चलते पिछले पांच वर्षों में अखबारों में इस्तेमाल होने वाले न्यूजप्रिंट में 25–30% की गिरावट आई है।
जो स्थिति बाहर से देखने पर एक झटका या नुकसान जैसी लग रही थी, वास्तव में वही प्रकाशकों के लिए एक “बचाव की रणनीति” बन गई। इसी रणनीति ने उन्हें अपने विज्ञापन राजस्व को बनाए रखने और कुछ मामलों में बढ़ाने तक में मदद की है।
नाम का खुलासा न करने की शर्त पर अखबारों से जुड़े अधिकारियों ने एक्सचेंज4मीडिया को बताया, “कॉपी और पन्ने घटाने से उत्पादन लागत कम हुई, जिससे कोविड के बाद विज्ञापनदाताओं द्वारा हासिल की गई 10–15% विज्ञापन दरों की गिरावट को संतुलित किया जा सका। नतीजतन, मैदान में कम कॉपियां होने के बावजूद मौजूदा विज्ञापन वॉल्यूम पर मार्जिन बेहतर हुए। यही वजह है कि ज्यादातर कंपनियों की विज्ञापन आय 2020 के स्तर के बराबर या उससे भी ज्यादा है, जबकि सर्कुलेशन घट चुका है।”
हालांकि विज्ञापनदाताओं के लिए तस्वीर उतनी आश्वस्त करने वाली नहीं है। ज्यादातर विज्ञापनदाता अपने बजट का लगभग 10–15% प्रिंट पर खर्च करते हैं, लेकिन वास्तविक सर्कुलेशन आंकड़े स्पष्ट न होने और इंडियन रीडरशिप सर्वे (IRS) के स्थगित रहने के कारण कई लोग अपने कैंपेंस की असली पहुंच से अनजान हैं।
विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि भले ही यह रणनीति अल्पकालिक सहारा बनी हो, लेकिन लंबे समय तक टिकाऊ नहीं होगी। एक अधिकारी ने कहा, “फिलहाल पब्लिशर्स ने अपने लिए समय खरीदा है, लेकिन सवाल यह है कि कितने समय तक प्रिंट पतले कागज पर टिकेगा? सर्कुलेशन के लंबे समय तक कम आंकड़े दिखाना और पाठकों का घटता आधार अंततः विज्ञापनदाताओं का भरोसा कमजोर कर सकता है, खासकर तब, जब डिजिटल प्लेटफॉर्म लगातार और सटीक मेट्रिक्स और जवाबदेही प्रदान कर रहे हैं।”
गौरतलब है कि IRS, जिसे भारत के प्रिंट मीडिया इंडस्ट्री के लिए लंबे समय तक एकमात्र विश्वसनीय करंसी माना जाता रहा है, पिछले पांच वर्षों से रुका हुआ है। पहले कोविड-19 और फिर फंडिंग विवादों को कारण बताया गया, हालांकि इंडस्ट्री से जुड़े लोग मानते हैं कि असली बाधा पब्लिशर्स की घटती सर्कुलेशन संख्या का सामना करने में अनिच्छा है।
एक अखबार संपादक ने स्वीकार किया, “पेज और कॉपियां घटाए जाने के बावजूद, बड़ी संख्या में कॉपियां पाठकों तक पहुंचती ही नहीं, बल्कि पब्लिशर्स उन्हें कबाड़ के तौर पर बेच देते हैं और फिर भी बढ़े-चढ़े सर्कुलेशन आंकड़े दिखाते हैं। एक नया सर्वे इन असहज सच्चाइयों को उजागर कर सकता है और उनकी विज्ञापन पिच को कमजोर कर सकता है।”
सोमवार को एक्सचेंज4मीडिया ने रिपोर्ट दी कि पब्लिशर्स की मांग है कि IRS को पहले एक पायलट टेस्ट से गुजारा जाए, ताकि यह आंका जा सके कि महामारी के बाद के दौर में फिजिकल सर्वे विशेष रूप से महानगरों में अभी भी व्यावहारिक हैं या नहीं।
मीडिया रिसर्च यूजर्स काउंसिल ऑफ इंडिया (MRUCI) ने अपनी बोर्ड मीटिंग्स में इस मुद्दे पर लंबी चर्चा की, लेकिन अभी तक पायलट का दायरा, सैंपल साइज और लोकेशन तय नहीं की है, क्योंकि सदस्य पारंपरिक डोर-टू-डोर सर्वे मॉडल को लेकर बढ़ती चिंता जता रहे हैं।
MRUCI सदस्यों ने एक्सचेंज4मीडिया से कहा, “हाउसिंग सोसाइटीज पहले से ज्यादा प्रतिबंधात्मक हो गई हैं, जिससे सर्वेयर को एंट्री मिलना बेहद मुश्किल होता जा रहा है। इसके अलावा, परिवार अब निजता को ज्यादा महत्व देते हैं। मुंबई और दिल्ली जैसे शहरों में पुरुष और महिलाएं दोनों सुबह से देर रात तक घर से बाहर रहते हैं, और भले ही आप उनसे मिल भी लें, वे 45 मिनट सर्वे के लिए निकालने को तैयार नहीं होते।”
यह मुद्दा MRUCI के भीतर नई चिंता पैदा कर रहा है कि क्या IRS को फिर से शुरू करने की लागत और जटिलता, जो 2019 में खर्च हुए ₹20 करोड़ से भी ज्यादा होने की संभावना है, डिजिटल-फर्स्ट मार्केट में, जहां सर्वे की उपयोगिता पर ही सवाल उठ रहे हैं, उचित ठहराई जा सकती है।
विडंबना यह है कि तेजी से बढ़ते ई-कॉमर्स और क्विक-कॉमर्स सेक्टर, जिनके डिलीवरी स्टाफ रोज इन्हीं गेट्स से आसानी से गुजरते हैं, यह संकेत देते हैं कि यह बाधा वास्तविक से ज्यादा धारणा-आधारित हो सकती है।
फिर भी, यह सर्वे, जो भारत के प्रिंट इंडस्ट्री के लिए एकमात्र करंसी माना जाता है, वापस आएगा या नहीं, यह अंततः पब्लिशर्स की इच्छा पर निर्भर करेगा।
महामारी के बाद हुए सामाजिक बदलाव भारतीय रीडरशिप सर्वे (IRS) के लिए सबसे बड़ी बाधा के रूप में सामने आ रहे हैं।
कंचन श्रीवास्तव, सीनियर एडिटर, एक्सचेंज4मीडिया ।।
पांच वर्षों की देरी और व्यवधानों के बाद पहले कोविड-19 महामारी के कारण, फिर कार्यप्रणाली और फंडिंग से जुड़े विवादों के चलते और अब महामारी के बाद हुए सामाजिक बदलाव भारतीय रीडरशिप सर्वे (IRS) के लिए सबसे बड़ी बाधा के रूप में सामने आ रहे हैं।
परंपरा से हटकर, लंबे समय से प्रतीक्षित IRS पहले एक पायलट टेस्ट से गुजर सकता है ताकि यह आंका जा सके कि मौजूदा परिस्थितियों में विशेषकर मेट्रो शहरों में, फिजिकल रीडर सर्वे संभव है या नहीं। मीडिया रिसर्च यूजर्स काउंसिल ऑफ इंडिया (MRUCI) की तकनीकी समिति ने अभी तक इस पायलट टेस्ट के दायरे, सैंपल साइज और स्थानों पर निर्णय नहीं लिया है।
कई इंडस्ट्री सूत्रों के अनुसार, काउंसिल के प्रमुख सदस्य पारंपरिक डोर-टू-डोर मॉडल को लेकर बढ़ती शंकाएं जता रहे हैं। कुछ का कहना है कि कोविड के बाद हाउसिंग सोसाइटीज पहले की तुलना में कहीं अधिक सख्त हो गई हैं, जिससे सर्वेयर का पहुंच पाना मुश्किल हो गया है।
भारतीय समाचार पत्र सोसाइटी (INS) के अध्यक्ष एम.वी. श्रेयम्स कुमार ने कहा, “कुछ मीडिया हाउसेज का मानना है कि महामारी के बाद के दौर में हाउसिंग सोसाइटीज काफी हद तक प्रतिबंधात्मक हो गई हैं, जिससे सर्वेयर के लिए प्रवेश पाना कठिन हो गया है। आवासीय नियमों में यह बदलाव बड़े पैमाने पर डोर-टू-डोर सर्वे करने में बड़ी चुनौती पेश करता है, खासकर शहरी क्षेत्रों में।”
गौरतलब है कि पिछला सर्वे 2019 में किया गया था और MRUC ने इस बार भी वही कार्यप्रणाली अपनाने का निर्णय लिया था।
एक अन्य सदस्य ने e4m को बताया, “अब परिवार निजता को अधिक महत्व देते हैं। मुंबई और दिल्ली जैसे शहरों में, पुरुष और महिलाएं सुबह से देर रात तक बाहर रहते हैं और यदि आप उनसे मिल भी जाएं तो वे शायद ही सर्वे के लिए 45 मिनट निकालने को तैयार हों। 2019 तक जो कार्यप्रणाली चल रही थी, वह अब काम करने की संभावना नहीं रखती।”
चिंता यह है कि इससे शहरी सर्वेक्षण को प्रतिनिधित्वकारी और विश्वसनीय रूप से करना कठिन हो जाएगा। और अगर शहरी डेटा असंगत या अधूरा हुआ, तो इससे पूरे IRS आउटपुट की विश्वसनीयता कमजोर हो जाएगी, सदस्यों का कहना है।
सूत्रों ने एक्सचेंज4मीडिया को बताया, “इस मुद्दे ने MRUC के भीतर गंभीर चिंता पैदा कर दी है, कई सदस्यों का सुझाव है कि IRS को फिर से शुरू करने की लागत और जटिलता अब न्यायसंगत नहीं रह गई है, खासकर तब जब डिजिटल-प्रधान प्लानिंग माहौल में सर्वे की उपयोगिता पर बहस चल रही है। इसलिए, पायलट टेस्ट पर चर्चा की जा रही है।”
विडंबना यह है कि तेजी से बढ़ते ई-कॉमर्स और क्विक-कॉमर्स सेक्टर, जिनके डिलीवरी स्टाफ रोजाना इन्हीं गेट्स से होकर गुजरते हैं, यह संकेत देते हैं कि यह बाधा वास्तविक से अधिक धारणा आधारित हो सकती है।
इसके अलावा, हाल के वर्षों में कई अखबारों ने डिजिटल खपत बढ़ने के बीच भारी प्रसार गिरावट देखी है। असर इतना गहरा है कि एक प्रमुख अंग्रेजी दैनिक का मुंबई प्रसार 2020 के 5.5 लाख प्रतियों से घटकर अब मुश्किल से 1.5 लाख पर आ गया है। इंडस्ट्री पर्यवेक्षकों का कहना है कि यही कारण है कि कई मीडिया हाउसेज सर्वे से बच रहे हैं और अड़चनें खड़ी कर रहे हैं, ताकि ऐसे असहज परिणामों से बचा जा सके जो विज्ञापन राजस्व को चोट पहुंचा सकते हैं।
फिर भी, संभावना यही है कि IRS का पूर्ण संस्करण, जिसे प्रिंट इंडस्ट्री की करेंसी माना जाता है और जिसे पूरा होने में आमतौर पर छह से आठ महीने लगते हैं, उम्मीद से कहीं अधिक देर तक टल सकता है। यह आगे बढ़ेगा भी या नहीं, यह पूरी तरह पायलट के नतीजों पर निर्भर करेगा।
आगामी सर्वे की अनुमानित लागत 2019 में खर्च हुए 20 करोड़ रुपये से अधिक होने की उम्मीद है, जो इसके लॉन्च में एक और बड़ी बाधा है, खासकर मौजूदा आर्थिक दबावों के बीच।
एक अधिकारी ने कहा, “इंडस्ट्री के बड़े खिलाड़ियों की आय हजारों करोड़ में है, तो यह राशि बहुत छोटी है। साफ़ तौर पर, वे अपने प्रसार में गिरावट छिपाना चाहते हैं और इसी बहाने देरी कर रहे हैं।”
MRUCI के चेयरमैन शैलेश गुप्ता से संपर्क करने की कई कोशिशें नाकाम रहीं।
IRS कभी दुनिया का सबसे बड़ा वार्षिक रीडरशिप सर्वे माना जाता था, जिसमें 2.56 लाख से अधिक उत्तरदाता शामिल होते थे। इसकी लंबी देरी अब कुछ अहम सवाल खड़े करती है: क्या प्रिंट को अब सिर्फ ABC ऑडिट, प्रकाशकों के आंतरिक डेटा और विज्ञापन बिक्री नैरेटिव्स पर निर्भर रहना पड़ेगा? क्या कोई नया हाइब्रिड या तकनीक-आधारित मॉडल भरोसे की इस खाई को भर सकता है?
हालांकि MRUCI ने कोई औपचारिक बयान नहीं दिया है, लेकिन सूत्रों का कहना है कि चुपचाप एक सहमति बन रही है कि मौजूदा स्वरूप में IRS शायद लौटकर न आए। कुछ सदस्य वैकल्पिक कार्यप्रणालियों की पड़ताल कर रहे हैं, जैसे फोन-सहायता प्राप्त सर्वे या डिजिटल के लिए ऐप-आधारित मीटरिंग, लेकिन इनमें से किसी को अभी तक मान्यता नहीं मिली है या बड़े पैमाने पर अपनाया नहीं गया है।
IRS को नई ऊर्जा मिलेगी या इसे किसी छोटे और तकनीक-प्रेरित मॉडल से बदल दिया जाएगा, यह देखना बाकी है।
रीडरशिप डेटा विज्ञापनदाताओं के लिए बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे यह तय होता है कि उन्हें किन प्रिंट प्रकाशनों को टारगेट करना चाहिए। IRS भारत के प्रिंट और मीडिया खपत पैटर्न, जनसांख्यिकी, उत्पाद स्वामित्व और उपयोग पर अंतर्दृष्टि प्रदान करता है, जिसमें सर्वे किए गए परिवारों में 100 से अधिक उत्पाद श्रेणियाँ शामिल होती हैं।
एक ऐसे मीडिया परिदृश्य में जहां डिजिटल प्लेटफॉर्म लगातार हावी हो रहे हैं, प्रिंट प्रकाशकों पर अनुकूलन का दबाव बढ़ता जा रहा है। इंडस्ट्री सूत्रों का कहना है कि कई अखबारों ने लाभप्रदता सुधारने के प्रयास में प्रसार में 15–20% कटौती की है और घाटे में चलने वाले संस्करणों को बंद कर दिया है।
हालांकि प्रिंट विज्ञापन राजस्व में हाल में कुछ वृद्धि देखी गई है, लेकिन यह मुख्य रूप से घटती विज्ञापन दरों की वजह से है, न कि ब्रैंड मार्केटिंग खर्च में किसी ठोस वृद्धि के कारण। आज, अपनी निरंतर प्रासंगिकता के बावजूद, प्रिंट मीडिया भारत के विज्ञापन खर्च का केवल 20% ही संभालता है, जबकि डिजिटल प्लेटफॉर्म्स का हिस्सा 44% और टेलीविजन का 32% है।