क्या वाकई तुम मेरे जैसा सोचते हो?

वरिष्ठ पत्रकार डॉ. विनोद पुरोहित ने कविता के माध्यम से इस दुनिया को कहीं ऐसी जगह ले जाने की बात कही है, जहां पर हालात बेहतर हों

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Thursday, 05 September, 2019
Last Modified:
Thursday, 05 September, 2019
Vinod Purohit

डॉ.विनोद पुरोहित, संपादक
अमर उजाला, आगरा संस्करण।।

तुम भी मेरे जैसा सोचते हो...
तो चलो...
धरती को कांधे पर उठाकर
कहीं और ले चलें,
जहां बांहे फैलाकर उसका
स्वागत हो और संकल्प हो
उसे सेहतमंद रखने का...

यहां तो बड़ी घुटन है,
नोंच-नोंच कर उसकी छाती-पसलियां
छलनी कर दीं...
खुद को ईश्वर
बनाने की होड़ में
सब कुछ ' आर्टिफिशियल' गढ़ लिया है...

सबके अपने सूरज-चांद
सबके अपनी हवा और पानी,
और तो और मूर्ति खुद की बना
चल रहा है गगनभेदी स्वस्ति गान,
घट रहा है कद, मन हो रहा गरिष्ठ।

तो चलो...
इस बोझ को कहीं उतार आएं
फिर वो सूरज बांध लाएं
वहीं गढ़ेगा फिर सौंधा मानव
यही वह गुनगुनी उम्मीद है
जिससे भुरभुरी होगी माटी।
...क्या वाकई तुम मेरे जैसा सोचते हो?

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जब समय नहीं कटता

अक्सर कई लोग कहते हुए मिल जाते हैं कि उनका समय नहीं कटता, लेकिन इसी समय में कितनी चीजें कट जाती हैं, कवि ने अपनी कविता के माध्यम से इसका बखूबी वर्णन किया है

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Thursday, 26 December, 2019
Last Modified:
Thursday, 26 December, 2019
Time

राधेश्याम तिवारी, वरिष्ठ पत्रकार और कवि।।

जब समय नहीं कटता
तब भी कट ही जाता है समय
उसके साथ
बहुत कुछ कट जाता है
कितनी पतंगें कट जाती हैं
कितने लोग कट जाते हैं
कितनी मछलियां कट जाती हैं
कितनी जेबें कट जाती हैं
मालिकों के लिए
गुलाम कट जाते हैं
और कट जाते हैं नाम
स्कूल से बच्चों के

फिर भी किसी का समय
अगर खुशी-खुशी कट रहा है
तो इसलिए
कि वह अपने समय में
किसी के कटने को शामिल नहीं करता।।

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‘हर बार एक नया तजुर्बा साथ में लाए’

डॉ. विनोद पुरोहित ने अपने विचारों को इस कविता के माध्यम से खूबसूरत अंदाज में पिरोने का काम किया है

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Wednesday, 11 December, 2019
Last Modified:
Wednesday, 11 December, 2019
Vinod Purohit

डॉ.विनोद पुरोहित, संपादक
अमर उजाला, आगरा संस्करण।।

हाथ हिलाकर वो वहां से लौट तो आए
जाने कितने फीसदी खुद को छोड़ आए।

अब तक जाने कितने कदम नाप आए
हर बार एक नया तजुर्बा साथ में लाए।

वो तो हर किसी की सिर्फ सुनते आए
बस बुजुर्ग होने का फर्ज निभाते आए।

सुना है वो सबको मिठास बांटते आए
घना दरख्त है, फल के साथ छाया लाए।

पुराने खत लेकर कल रात आए
यादों की कंदील जलाकर लाए।

चेहरे पर मजाल है एक शिकन आए
किसी को दिया वादा है, निभाते आए।

अजीब शख्स है, सारे रिश्ते निभाता जाए
क्या इसने पैर परों से भी हल्के पाए।

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'आइए जलते हैं'

इस कविता के माध्यम से कवि का कहना है कि यदि जलना ही है तो इस तरह जलें जिससे किसी को फायदा हो न कि नुकसान

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Friday, 01 November, 2019
Last Modified:
Friday, 01 November, 2019
Chandresh Chhatlani

डॉ. चंद्रेश कुमार छतलानी।।

आइए जलते हैं
दीपक की तरह।
आइए जलते हैं
अगरबत्ती-धूप की तरह।
आइए जलते हैं
धूप में तपती धरती की तरह।
आइए जलते हैं
सूरज सरीखे तारों की तरह।
आइए जलते हैं
अपने ही अग्नाशय की तरह।
आइए जलते हैं
रोटियों की तरह और चूल्हे की तरह।
आइए जलते हैं
पक रहे धान की तरह।
आइए जलते हैं
ठंडी रातों की लकड़ियों की तरह।
आइए जलते हैं
माचिस की तीली की तरह।
आइए जलते हैं
ईंधन की तरह।
आइए जलते हैं
प्रयोगशाला के बर्नर की तरह।
क्यों जलें जंगल की आग की तरह।
जलें ना कभी खेत लहलहाते बन के।
ना जलें किसी के आशियाने बन के।
नहीं जलना है ज्यों जलें अरमान किसी के।
ना ही सुलगे दिल… अगर जिंदा है।
छोड़ो भी भई सिगरेट की तरह जलना!
नहीं जलना है
ज्यों जलते टायर-प्लास्टिक।
क्यों बनें जलता कूड़ा?
आइए जल के कोयले सा हो जाते हैं
किसी बाती की तरह।

(लेखक जनार्दन राय नागर राजस्थान विद्यापीठ विश्वविद्यालय, उदयपुर (राजस्थान) में सहायक आचार्य (कंप्यूटर विज्ञान) के पद पर कार्यरत हैं।)

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‘मेरी मुश्किल समझो’

इस कविता के माध्यम से कवि बताना चाहता है कि वह बहुत कुछ करना चाहता है, लेकिन उसे इसका रास्ता नहीं सूझ रहा है

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Thursday, 31 October, 2019
Last Modified:
Thursday, 31 October, 2019
Arun Aditya

अरुण आदित्य, संपादक
अमर उजाला, अलीगढ़ संस्करण।।

तुम्हारे लिये मैं छांव हो जाना चाहता हूं,
पर धूप तो यूं ही नहीं फटकती तुम्हारे आस-पास

तुम्हारे लिये मैं रोशनी हो जाना चाहता हूं
पर सूरज तो खुद डूबता उगता है तुम्हारे हुक्म पर

तुम्हारे लिये मैं तारे तोड़कर लाना चाहता हूं
पर आसमान तो कसमसा रहा है तुम्हारी ही मुट्ठी में

तुम्हारे लिये मैं गीत गाना चाहता हूं
पर सातों सुर तो डेरा जमाए हुए हैं तुम्हारे ही कंठ में

तुम्हारे लिये मैं एक मनोरम चित्र बनाना चाहता हूँ
पर रंग तो सब तुम्हारी आंखों मे जा बसे हैं

मेरी मुश्किल समझो और तुम्हीं बताओ
कि मैं क्या कर सकता हूं तुम्हारे लिए।

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‘इतनी तेज चलेगी आंधी, हमको ये मालूम न था’

इस गजल के द्वारा कवयित्री ने यह बताने की कोशिश की है कि दुनिया व जिंदगी में काफी कुछ घटित होने के बावजूद किस तरह इनसे अनभिज्ञता बनी रहती है

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Saturday, 12 October, 2019
Last Modified:
Saturday, 12 October, 2019
Dr Kamini

डॉ. कामिनी कामायनी।।

बरकरार थी दिल की तमन्ना, हमको ये मालूम न था
खुद से ही कोई बात कही क्या? हमको ये मालूम न था।

बरस पड़ी थी गरज गरज कर, मौसम देख बहारों का
इतनी तेज चलेगी आंधी, हमको ये मालूम न था।

तोड़ दिया था दरो दीवारें, हसरत के इमारत की
फिर से ये अंगड़ाई लेगी, हमको ये मालूम न था।

मस्त कलंदर समझ के खुद को, दुनिया में खुश रहते थे
दिल के भी कई दरवाजे थे, हमको ये मालूम न था।

बंद पड़े जो मृदंग तबले, उछल उछल सब गाने लगे
सरगम ने क्या शोर मचाया, हमको ये मालूम न था।

हम तो खड़े खड़े उलझे थे, रहबर के मयखाने में
महफिल ने क्यों हमें पुकारा, हमको ये मालूम न था।

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‘और बर्फ में उग रही तनी हुई मुट्ठियां’

अपनी कविता के माध्यम से कवि ने वर्तमान दौर में कश्मीर के हालात को बयां करने का प्रयास किया है

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Saturday, 05 October, 2019
Last Modified:
Saturday, 05 October, 2019
Gunanand Jakhmola

गुणानंद जखमोला, वरिष्ठ पत्रकार।।

बधाई हो मोदी जी, ऐसे लोकतंत्र के लिए जहां
80 लाख लोग 60 दिन से खुली जेल में बंद हैं।
हम खुश हैं कि हमने कश्मीर को जीत लिया।
हम खुश हैं कि वो जो देशद्रोही थे, अब बंद हैं।
और वो भी जो कश्मीर में हमारे साथ खड़े थे।

वो छोटे-छोटे बच्चे जो स्कूल जाते थे कभी
गर्मियों की छुट्टियों का सा आनंद ले रहे सभी।
मां डरी हुई कि बच्चे गली में खेल रहे हैं
पता नहीं कहां से सनसनी हुई मौत आ जाएं।
वो नहीं जाने देती बच्चों को खेलने बाहर
क्योंकि जिंदगी संगीनों के साये में गुजर रही है।

वो गुलमर्ग की खुली वादियां जो बुलाती थीं प्रेमियों को कभी
अब सहमी सी हैं, क्योंकि स्वर्ग अब जमीं पर उतर आया है।
हां, डर के साये में कट रही है जिंदगी
और बर्फ में उग रही तनी हुई मुट्ठियां।

एक बाबा खटखटता है डरे हुए लोगों का द्वार।
हौले से एक सुंदर गोरा मुखड़ा झांकता है अधखुले दरवाजे से
बाबा पूछता है बिटिया, कहां मिलेगी जन्नत।
वह हौले से डरी आवाज में कहती है
गर फिरदौस बर रूये जमी अस्त
हमी अस्तो, हमी अस्तो, हमी अस्त।।

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‘नौ दिन के उपासन में रमजान की खुशबू हो’

इस कविता में कवि एक ऐसे दौर की बात कर रहा, जिसमें शांति व सद्भाव का माहौल हो

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Tuesday, 01 October, 2019
Last Modified:
Tuesday, 01 October, 2019
Aalok Shrivastav

आलोक श्रीवास्तव, वरिष्ठ पत्रकार व कवि।।

वो दौर दिखा जिसमें इन्सान की खुशबू हो
इन्सान की आखों में ईमान की खुशबू हो

पाकीजा अजाओं में मीरा के भजन गूंजें
नौ दिन के उपासन में रमजान की खुशबू हो

मैं उसमें नजर आऊं वो मुझमें नजर आये
इस जान की खुशबू में उस जान की खुशबू हो

मस्जिद की फिजाओं में महकार हो चन्दन की
मंदिर की फिजाओं में लोबान की खुशबू हो

हम लोग भी फिर ऐसे बेनाम कहां होंगे
हममें भी अगर तेरी पहचान की खुशबू हो

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‘मैं फिर इंसान होना चाहता हूं’

इस कविता के माध्यम से कवि ने अपनी इच्छाओं के बारे में बताया है कि आखिर वे जिंदगी से क्या चाहते हैं

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Monday, 30 September, 2019
Last Modified:
Monday, 30 September, 2019
Dr Vinod Purohit

डॉ.विनोद पुरोहित, संपादक
अमर उजाला, आगरा संस्करण।।

ये बंदिशें, ये वर्जनाएं और बड़प्पन बेपनाह।
बहुत हुआ अब खत्म कर देना चाहता हूं।
वो बेपरवाह वक्त, बेहिसाब भूख मुझे वापस दे दो,
उड़ने की वो ख्वाहिशें, तूफान सा जज्बा और सच्ची चाहतें,
हर शै को जान लेने की तड़फ
वो उन्मुक्त आसमान और अनथक पंख
सब वापस चाहता हूं....
मैं फिर बच्चा होना चाहता हूं।

ये घड़ी में कैद जिंदगी, जज्बातों के जंजाल में जकड़ी जिंदगी
रवायतों की भारी और बोझिल होती जंजीरें
उतार फेंकना चाहता हूं।
नकल के इस दौर में,
रंग बदलने की इस दौड़ में,
मतलबपरस्ती की बेतहाशा भीड़ में,
भेड़ियों की खाल के इस निर्मम बाजार में
बहुत हुआ, अब मुक्त होना चाहता हूं...
मैं फिर इंसान होना चाहता हूं।

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अब कतारों में खड़े हैं, लेने झलक बस आपकी

इस कविता के माध्यम से लेखिका ने शिकायत व मनुहार भरे लहजे में मन के भावों को व्यक्त करने का प्रयास किया है

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Tuesday, 01 October, 2019
Last Modified:
Tuesday, 01 October, 2019
Kamini Kamayani

डॉ. कामिनी कामायनी।।

इस मसर्रत का सबब नजरे इनायत आपकी,
कितने मुद्दत से मिले, खातिर करूं क्या आपकी।

क्या मुनासिब ये नहीं कि पहलूनशीं हम भी बनें,
इंतहा अब और न लें, तो करम है आपकी।

आपका कुर्ब रश्क खुद बन गया मेरे लिए,
आपने हमको तलब की, मेहरबानी आपकी।

बदगुमां हमसे हुआ, तकरार तल्खी से भरा,
जज्ब करना था खलिश को, दरियादिली भी आपकी।

दोस्त! तुझसे गुफ्तगू करने का अब मकसद ही क्या,
सब हुकुम सिर आंखों पर अब, हुक्मरां भी आपकी।

अर्ज हमने ही किया था, दानिशों के सामने,
अब कतारों में खड़े हैं, लेने झलक बस आपकी।

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उस चौखट को जा खूब सजातीं, जिस घर से होती अनजान हैं ये

लेखक ने इस कविता में बताया है कि बेटियां किस तरह पूरे घर की आन-बान-शान होती हैं और घर में किस तरह रौनक बिखेरती रहती हैं

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Monday, 23 September, 2019
Last Modified:
Monday, 23 September, 2019
Vikas Gaur

विकास गौड़

खिलती कलियों का क्या कहना!
मिश्री डलियों का क्या कहना!!
पल भर में मूड बदल जाये!
मीठे नखरों का क्या कहना!!

माना घर की मेहमान हैं ये!
पर घर की होती जान हैं ये!!
उस चौखट को जा खूब सजातीं!
जिस घर से होती अनजान हैं ये!!

रिश्ते-नातों का मोल सिखातीं!
घर भर में फिरती इठलाती!!
जिस देहरी पर ये दीप जलायें!
उस घर की रौनक का क्या कहना!!

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