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नही रहे पत्रकारिता के युगपुरुष पं. धर्मशील चतुर्वेदी
समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। जाने माने साहित्यकार और पत्रकारिता के युगपुरुष पं. धर्मशील चतुर्वेदी अब हमारे बीच नहीं रहे। बीएचयू के सर सुंदर लाल अस्पताल में उनका निधन हो गया। फेफड़े में संक्रमण के चलते पांच दिन पहले उन्हें बीएचयू के आईसीयू में भर्ती कराया गया था। वह 83
समाचार4मीडिया ब्यूरो 9 years ago
समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
जाने माने साहित्यकार और पत्रकारिता के युगपुरुष पं. धर्मशील चतुर्वेदी अब हमारे बीच नहीं रहे। बीएचयू के सर सुंदर लाल अस्पताल में उनका निधन हो गया। फेफड़े में संक्रमण के चलते पांच दिन पहले उन्हें बीएचयू के आईसीयू में भर्ती कराया गया था। वह 83 वर्ष के थे।
निधन की जानकारी मिलने के बाद काशी के साहित्यकारों, पत्रकारों और संस्कृति कर्मियों में शोक की लहर दौड़ गई। उनका अंतिम संस्कार रविवार की सुबह नौ बजे मणिकर्णिका श्मशान घाट पर हुआ।
उनके दो पुत्र विक्रम शील चतुर्वेदी और विवेकशील चतुर्वेदी और एक पुत्री मनीषा हैं।
पंडित धर्मशील चतुर्वेदी काशी की सभ्यता, संस्कृति और कला को जीवन भर निभाते रहे। पंडित जी अक्खड़ बनारसी थे, लिहाजा कहीं भी अगर काशी को लेकर अवमानना नजर आती थी तो वो अपने शब्द तर्क लेकर खड़े हो जाते थे। फिर चाहे वो बनारस की अड़ी हो या फिर कोई कवि सम्मलेन या साहित्यिक गोष्ठी। उनका अक्खड़पन हर जगह अपनी काशी के सम्मान के लिए किसी से भी दो-दो हाथ करता नजर आता था।
सिर्फ यही नहीं, धर्मशील चतुर्वेदी काशी के कण-कण से वाकिफ थे। जिस भी विधा का पन्ना कोई भी खोलता था, वहां उनकी के विद्धवता का हस्ताक्षर जरूर नजर आते थे।
वे विख्यात लेखक होने के अलावा सफल व्यंगकार और स्तंभकार भी थे। उन्होंने काशी के कई पर्वो पर लेख लिखा है। उन्हें हास्य कविताएं और कहानियां लिखना भी उनका शौक था। उन्होंने वकालत भी की, तो एक मुकाम तक पहुंचायी। कहते है उन्होंने जिस मुकदमें की पैरवी की तो हारे नहीं और अपनी दलीलों से मुअक्कील को इंसाफ दिलाई। खास यह है कि वह न केवल हास्य व्यंग्य लिखते थे, बल्कि तमाम कवि सम्मेलनों में अपनी रचनाओं से लोगों को मंत्रमुग्ध भी कर देते थे। वह अपने मस्तमौला और खाटी बनारसी अंदाज के लिए जाने जाते थे।
काशी का कवि सम्मलेन उनकी अध्यक्षता और ठहाके के बिना सूना नजर आता था। जिस भी मंच पर वो रहते थे, उनके दाद देने के अंदाज और ठहाके भर से महफ़िल में जान आ जाती थी। इतना ही नहीं, वो काशी के कवि सम्मेलनों की परंपरा के ध्वजवाहक भी थे। आज के बदलते परिवेश की तमाम चुनौतियों के बीच उसी अल्लहड़पन के साथ वे महालंठ सम्मलेन, महामूर्ख सम्मलेन, उलूक महोत्सव जैसे कार्यक्रमो को जीवित किए हुए थे।
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