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मीडिया में आने वाली हेल्थ की खबरों पर आंखमूंद कर भरोसा सही है?

‘भारतीय जनसंचार संस्थान’ के पूर्व महानिदेशक और वरिष्ठ पत्रकार केजी सुरेश ने कहा, एक गलत खबर बहुत कुछ बर्बाद कर सकती है

समाचार4मीडिया ब्यूरो 6 years ago

अखबार के पन्ने पलटते-पलटते कभी न कभी आपकी नजर किसी ऐसी खबर पर रुकी होगी, जो आपको पतला होने के राज, गोरे होने के नुस्खे या फिर मधुमेह को मात देने के तरीके बताती है। अमूमन ऐसी खबरों को हम केवल इसलिए सही मान लेते हैं, क्योंकि वह मीडिया में आई हैं और उनके अनुसार अपने खान-पान में बदलाव कर लेते हैं, लेकिन क्या ये सही है? 

क्या आम जनता तक स्वास्थ्य से जुड़ी खबरें पहुंचाने वाले पत्रकार इतने प्रशिक्षित हैं कि इनकी खबरों पर आंखमूंद कर भरोसा किया जा सकता है? हाल ही में हुए एक ऑनलाइन पोल से यह सवाल खड़ा हो गया है। दिल्ली में बीते दिनों नेशनल हेल्थ राइटर्स कन्वेंशन आयोजित किया गया था, जिसमें देश भर के कई हेल्थ जर्नलिस्ट शामिल हुए। इस मौके पर पत्रकारों का ज्ञान परखने के लिए उनसे कुछ सवाल पूछे गए, जिसके परिणाम बेहद चौंकाने वाले रहे। अधिकांश पत्रकारों को कम-कैलोरी वाले स्वीटनर, उसके लाभ और बच्चों एवं गर्भवती महिलाओं पर उसके प्रभाव के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। ऐसे समय में जब भारत को डायबीटीज की राजधानी कहा जाता है, हेल्थ जर्नलिस्ट का ये हाल बेहद चिंताजनक है। सोचने वाली बात यह भी है कि जब शहर के पत्रकारों की जानकारी इतनी सीमित है, तो फिर ग्रामीण इलाकों में कार्यरत पत्रकारों की स्थिति क्या होगी?

पिछले कुछ वक्त से स्वास्थ्य से जुड़े विषयों को मीडिया में काफी तवज्जो दी जाने लगी है। अखबारों में इस पर स्पेशल पेज तैयार किये जाते हैं। आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में लोगों को स्वास्थ्य के प्रति जागरूक रखना अच्छी बात है, लेकिन पाठकों या दर्शकों को जागरूक करने वाले पत्रकारों का जागरूक रहना भी जरुरी है। 

देश के प्रतिष्ठित मीडिया शिक्षण संस्थान ‘भारतीय जनसंचार संस्थान’ (IIMC) के पूर्व महानिदेशक और वरिष्ठ पत्रकार केजी सुरेश का भी यही मानना है। नेशनल हेल्थ राइटर्स कन्वेंशन में बतौर स्पीकर मौजूद रहे सुरेश हेल्थ जर्नलिस्ट के लिए ट्रेनिंग की वकालत करते आ रहे हैं। उनके पास ऐसे कई उदाहरण हैं, जो यह बताते हैं कि पत्रकारों के लिए ट्रेनिंग कोर्स कितना आवश्यक है। जैसे कि पिछले साल केरल में कहर बरपाने वाले निपा वायरस को लेकर कहा गया कि ये फलों से फैल रहा है, जबकि इसका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं था। नतीजा ये हुआ कि लोग इतने डर गए कि फल खाने ही बंद कर दिए। इसी तरह, कुछ साल पहले मीडिया ने भूलवश एएफपी या एक्यूट फ्लेसीड पैरालिसिस को पोलियो बता दिया था, क्योंकि दोनों में समान लक्षण थे।

हेल्थ रिपोर्टरों को किस तरह के कोर्स की जरूरत है, इसका खाका सुरेश पहले ही खींच चुके हैं। आईआईएमसी के महानिदेशक रहते वक्त उन्होंने यूनिसेफ, ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय, जॉर्ज इंस्टीट्यूट ऑफ ग्लोबल हेल्थ और थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन के सहयोग से देश का पहला पब्लिक हेल्थ कम्युनिकेशन कोर्स डिजाइन करवाया था, जिसे पीजी डिप्लोमा के सभी पाठ्यक्रमों शामिल किया गया। इसके अलावा, उन्होंने यूनिसेफ के साथ मिलकर मीडिया कर्मियों के लिए कई कार्यशालाएं भी आयोजित की। लेकिन जिस तरह के हालात अभी हैं उसे देखते हुए अब हेल्थ जर्नलिस्ट के लिए यह व्यवस्था अनिवार्य करने की आवश्यकता है, ताकि जिम्मेदार रिपोर्टिंग को बढ़ावा मिल सके। 

पत्रकारों के लिए ट्रेनिंग क्यों जरूरी है इसका सुरेश एक खूबसूरत उदाहरण देते हुए कहते हैं, ‘आज कानून की डिग्री के बिना आप सुप्रीम कोर्ट को कवर नहीं कर सकते, इसी तरह से डिफेंस संवाददाता को सेना कनफ्लिक्ट रिपोर्टिंग का कोर्स कराती है, तो फिर पब्लिक हेल्थ पर कोर्स क्यों नहीं हो सकता? स्वास्थ्य बेहद आवश्यक एवं गंभीर मुद्दा है। यदि आपको इसकी समझ नहीं है और आप अपराध की तरह इसकी सनसनीखेज रिपोर्टिंग करेंगे, तो इसका दूरगामी प्रभाव हमारे दर्शकों, पाठकों और श्रोताओं पर पड़ेगा। उदाहरण के लिए उत्तर प्रदेश में फैले इन्सेफेलाइटिस या जापानी बुखार और बिहार में कई मौतों के लिए जिम्मेदार इन्सेफेलाइटिस में फर्क है, अब यदि आप बिना इस अंतर को समझे रिपोर्ट करेंगे तो उससे सिर्फ घबराहट फैलेगी।’    

 आईआईएमसी के पूर्व महानिदेशक के अनुसार, ‘स्वास्थ्य के क्षेत्र में साक्ष्य आधारित रिपोर्टिंग होनी चाहिए, क्योंकि उसका परिणाम लोगों के स्वास्थ्य से जुड़ा होता है। गलत रिपोर्टिंग से बीमारियों को लेकर गलतफ़हमी पैदा होती है। डॉक्टरों के लिए सीएमई (कन्टिन्यूइंग मेडिकल एजुकेशन) प्रोग्राम चलाया जाता है, जिसमें बड़े से बड़े डॉक्टर शामिल होते हैं और नवीनतम डेवलपमेंट के बारे में समझते हैं। यदि आप 70 के दशक की बात करें तो उस दौर में मधुमेह पीड़ित को चावल से दूर रहने की सलाह दी जाती थी, लेकिन आजकल कम या सीमित मात्रा में इसका सेवन कर लिया जाता है। अब यदि डॉक्टर खुद को अपडेट नहीं करते तो वह सही इलाज कैसे बता पाते? 

इसी तरह पत्रकारों को भी अपने आप को अपडेट रखना चाहिए, लेकिन ऐसा होता नहीं है। हम टेक्नोलॉजी अपडेट पर तो ध्यान देते हैं, मगर कंटेंट जो हमने सीखा था उसे ही आगे बढ़ाते रहते हैं। जबकि कंटेंट में भी अपडेशन की जरूरत है। मैंने कन्टिन्यूइंग मेडिकल एजुकेशन प्रोग्राम की तरह कन्टिन्यूइंग मीडिया एजुकेशन प्रोग्राम की पेशकश की है। खासकर छोटे शहरों में, जिला स्तर पर काम करने वाले पत्रकारों को इसकी बेहद जरूरत है’। केजी सुरेश का मानना है कि जिस तरह से फेक न्यूज को लेकर सरकार, मीडिया हाउस और सोशल मीडिया प्लेटफार्म एक साथ आये हैं, उसी तरह पब्लिक हेल्थ के मुद्दे पर भी सभी को हाथ मिलाना होगा, तब ही स्वास्थ्य से जुड़ी फर्जी या भ्रामक खबरों पर लगाम लगाई जा सकेगी और पत्रकारों को प्रशिक्षित किया जा सकेगा।   


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