मीडिया की निष्पक्षता पर बहस नई नहीं, हर दौर में उठे विश्वसनीयता के सवाल: वाशिंद्र मिश्र

न्यूज इंडिया 24X7 के डायरेक्टर (न्यूज) वाशिंद्र मिश्र ने कहा कि मीडिया की निष्पक्षता, विश्वसनीयता और पत्रकारिता के तौर-तरीकों पर जो बहस आज हो रही है, वह नई नहीं है।

Vikas Saxena by
Published - Wednesday, 05 August, 2026
Last Modified:
Wednesday, 05 August, 2026
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समाचार4मीडिया के 'पत्रकारिता 40 अंडर 40' कार्यक्रम में न्यूज इंडिया 24X7 के डायरेक्टर (न्यूज) वाशिंद्र मिश्र ने कहा कि मीडिया की निष्पक्षता, विश्वसनीयता और पत्रकारिता के तौर-तरीकों पर जो बहस आज हो रही है, वह नई नहीं है। उनके मुताबिक, पत्रकारिता के लगभग हर दौर में ऐसे सवाल उठते रहे हैं। उन्होंने कहा कि आज जंतर-मंतर की घटना को लेकर जिस तरह की चर्चा हो रही है, वैसी ही बहसें पहले भी कई बड़े घटनाक्रमों के बाद होती रही हैं, लेकिन कुछ समय बाद सब कुछ सामान्य हो जाता है और पत्रकारिता फिर आगे बढ़ जाती है।

उन्होंने कहा कि वह कार्यक्रम में थोड़ी देर से पहुंचे क्योंकि बारिश की वजह से रास्ते में देर हो गई थी। सुबह से लगातार जंतर-मंतर की घटना पर चर्चा हो रही थी और कई वरिष्ठ पत्रकार इस विषय पर अपनी बात रख चुके थे। इसी वजह से उन्होंने अपनी बात वर्तमान से नहीं, बल्कि अतीत से शुरू करने का फैसला किया।

वाशिंद्र मिश्र ने कहा कि वह सभी को वर्ष 1989 में ले जाना चाहते हैं, जब अयोध्या में राम जन्मभूमि आंदोलन के दौरान गोलीबारी हुई थी। उस घटना में कई लोगों की जान गई थी और कई लोग घायल हुए थे। उन्होंने बताया कि उस समय देश में प्रिंट मीडिया का दौर था। उन्होंने अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत अंग्रेजी अखबारों से की थी और करीब 18 वर्षों तक टाइम्स ऑफ इंडिया, हिंदुस्तान टाइम्स और अमर उजाला जैसे संस्थानों में काम किया। इसलिए उन्होंने उस दौर की पत्रकारिता को बहुत करीब से देखा है।

उन्होंने कहा कि उस समय न सोशल मीडिया था और न ही आज जैसी डिजिटल तकनीक। मौके पर मौजूद पत्रकार ही घटनाओं की रिपोर्टिंग करते थे और पूरी दुनिया की नजर उन्हीं की खबरों पर होती थी। इसी दौरान कुछ भारतीय मीडिया संस्थानों ने अयोध्या गोलीकांड की रिपोर्टिंग करते हुए यह खबर प्रकाशित की कि इतने लोग मारे गए कि सरयू नदी का पानी खून से लाल हो गया। यह खबर बड़े-बड़े बैनर हेडलाइन के रूप में प्रकाशित हुई।

वाशिंद्र मिश्र ने बताया कि उस समय प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया काफी प्रभावशाली संस्था मानी जाती थी। सरकार और कई अन्य संगठनों ने प्रेस काउंसिल में शिकायत की कि इस तरह की रिपोर्टिंग से समाज में गलत संदेश जा रहा है और तथ्यों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया है। इसके बाद इस पूरे मामले की लंबे समय तक जांच हुई। एडिटर्स गिल्ड सहित कई पक्षों ने अपनी-अपनी बात रखी और इस मुद्दे पर वर्षों तक बहस चलती रही।

उन्होंने कहा कि आखिरकार उस बहस का भी वही हुआ जो आज जंतर-मंतर की घटना को लेकर हो रही चर्चा का भविष्य हो सकता है। कुछ समय बाद लोग उस घटना को भी भूल गए और पत्रकारिता आगे बढ़ गई।

अपने संबोधन में वाशिंद्र मिश्र ने वर्ष 1992 की अयोध्या घटना का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि जब बाबरी मस्जिद या विवादित ढांचा गिराया गया, तब वहां रिपोर्टिंग कर रहे पत्रकारों को भीड़ ने पकड़-पकड़कर पीटा। कई पत्रकार गंभीर रूप से घायल हुए। इस घटना की पूरे देश और दुनिया में निंदा हुई। इस पर भी कई वर्षों तक सेमिनार, संगोष्ठियां और बहसें होती रहीं, लेकिन धीरे-धीरे लोग इस घटना को भी भूल गए और पत्रकारिता का सफर आगे बढ़ता रहा।

उन्होंने कहा कि इसके बाद पत्रकारिता में पेड न्यूज का दौर आया। चुनावों के दौरान पैसे लेकर खबरें प्रकाशित करने और उम्मीदवारों या राजनीतिक दलों के पक्ष में सामग्री छापने को लेकर देशभर में बड़ी बहस छिड़ गई। इस मुद्दे को प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया ने भी गंभीरता से लिया। इसके लिए अलग-अलग समितियां बनाई गईं और कई संस्थाओं ने इस विषय पर चर्चा और सेमिनार आयोजित किए।

वाशिंद्र मिश्र ने कहा कि जिन मीडिया संस्थानों के मालिकों और संपादकों पर पेड न्यूज के आरोप लगे या जो इस मामले में पकड़े गए, उनके प्रभाव या स्थिति पर कोई खास फर्क नहीं पड़ा। वे उस समय भी प्रभावशाली थे और आज भी अपनी जगह बने हुए हैं।

उन्होंने कहा कि इसके बाद जब टीवी पत्रकारिता का दौर तेजी से आगे बढ़ा तो वह खुद 1999 में अखबार छोड़कर टीवी मीडिया में आ गए। कुछ वर्षों बाद टीवी पत्रकारिता को लेकर शिकायतें आने लगीं कि कई चैनल जिम्मेदार पत्रकारिता के मानकों का पालन नहीं कर रहे हैं और गैर-जिम्मेदाराना रिपोर्टिंग से माहौल खराब हो रहा है।

उन्होंने बताया कि इन्हीं शिकायतों को देखते हुए टीवी समाचार चैनलों के लिए एनबीएसए (News Broadcasting Standards Authority) जैसी नियामक संस्था बनाई गई। बाद में इसके स्वरूप में बदलाव हुआ और यह एनबीडीए (News Broadcasters & Digital Association) के रूप में सामने आई।

वाशिंद्र मिश्र ने कहा कि इन संस्थाओं में सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीशों को अध्यक्ष बनाया जाता था। समाज के विभिन्न क्षेत्रों के प्रतिष्ठित विशेषज्ञ और वरिष्ठ संपादक भी इन समितियों का हिस्सा होते थे। हर बैठक में उन समाचार चैनलों और संपादकों की शिकायतों पर सुनवाई होती थी जिन्होंने मॉडल कोड ऑफ कंडक्ट का उल्लंघन किया होता था।

उन्होंने बताया कि नियमों का उल्लंघन करने वाले चैनलों और संपादकों को फटकार लगाई जाती थी और उन पर प्रतीकात्मक जुर्माना भी लगाया जाता था। लेकिन बैठक खत्म होने के बाद कई बार वही संस्थान फिर पहले जैसी गलतियां दोहराने लगते थे और अगली बैठक में फिर उन्हें नोटिस और फटकार का सामना करना पड़ता था।

वाशिंद्र मिश्र ने कहा कि बाद में जब डिजिटल मीडिया तेजी से बढ़ा तो यह मांग उठी कि डिजिटल प्लेटफॉर्म को भी इस व्यवस्था में शामिल किया जाए। इसके बाद नियामक व्यवस्था का विस्तार किया गया और डिजिटल मीडिया को भी उसके दायरे में लाया गया।

उन्होंने कहा कि वह खुद को इस मामले में सौभाग्यशाली मानते हैं क्योंकि उन्हें प्रिंट, टीवी और डिजिटल- तीनों दौर की पत्रकारिता को करीब से देखने और इन नियामक समितियों में संपादक के रूप में सदस्य रहने का अवसर मिला। उनके मुताबिक, आज टीवी और सोशल मीडिया में कितनी जिम्मेदार पत्रकारिता हो रही है, इस पर चर्चा लगातार हो रही है, लेकिन पत्रकारिता की विश्वसनीयता और निष्पक्षता पर सवाल कोई नई बात नहीं है। यह बहस दशकों से चलती आ रही है और समय के साथ सिर्फ उसका स्वरूप बदलता रहा है।

वाशिंद्र मिश्र ने आगे कहा कि मीडिया की निष्पक्षता, विश्वसनीयता और किसी सरकार के पक्ष या विपक्ष में खड़े होने को लेकर जो बहस आज हो रही है, वह कोई नई बात नहीं है। उनके मुताबिक, पत्रकारिता में आने के बाद से ही वह इस तरह की चर्चाएं सुनते और देखते आए हैं। समय के साथ केवल बहस का स्वरूप बदला है, लेकिन सवाल वही बने हुए हैं।

उन्होंने कहा कि आज 'गोदी मीडिया' और 'दरबारी मीडिया' जैसे शब्दों का इस्तेमाल खूब होता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि वह अपने न्यूजरूम या अपनी लेखनी में कभी 'गोदी मीडिया' जैसे शब्दों का इस्तेमाल नहीं करते। हालांकि कार्यक्रम में इस विषय का जिक्र हुआ, इसलिए उन्होंने उसी संदर्भ में अपनी बात रखी।

वाशिंद्र मिश्र ने पूरे सम्मान के साथ कहा कि आज जिन वरिष्ठ पत्रकारों की चर्चा होती है, उनमें से कई ऐसे भी रहे हैं जिन्होंने पहले की सरकारों के दौर में सत्ता के पक्ष में लगातार लिखा। उस समय प्रिंट मीडिया का प्रभाव सबसे ज्यादा था और अनेक पत्रकार सरकारों के समर्थन में लेख लिखते थे। उन्होंने कहा कि वह पूरे देश के ऐसे दर्जनों उदाहरण दे सकते हैं।

उन्होंने कहा कि उस दौर में भी सत्ता के करीब रहने वाले पत्रकारों को पद्मश्री, पद्म विभूषण जैसे सम्मान दिए गए। इतना ही नहीं, उन्हें विभिन्न सरकारी नियामक संस्थाओं में नामित किया गया और कई पत्रकारों को विधान परिषद (एमएलसी) तथा राज्यसभा का सदस्य भी बनाया गया। उन्होंने कहा कि यह सिलसिला सिर्फ पहले नहीं था, बल्कि 2014 के बाद भी कई संपादकों और मीडिया मालिकों को राज्यसभा सहित विभिन्न जिम्मेदारियां मिली हैं।

वाशिंद्र मिश्र ने बिहार और झारखंड में सामने आए चारा घोटाले का जिक्र करते हुए कहा कि उस मामले को उजागर करने वाले कुछ पत्रकार बाद में राज्यसभा भी पहुंचे। उन्होंने किसी का नाम लेने से इनकार किया, लेकिन कहा कि ऐसे लोग आज भी राज्यसभा में मौजूद हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या उन्हें केवल निष्पक्ष पत्रकारिता के कारण यह जिम्मेदारी मिली या उसके पीछे अन्य कारण भी थे। उनका कहना था कि यह सवाल हर दौर में पूछा जाना चाहिए।

उन्होंने कहा कि दूसरी ओर ऐसे भी अनेक पत्रकार हैं जिन्होंने पूरी ईमानदारी और निष्पक्षता से पत्रकारिता की, लेकिन आज उनके सामने सबसे बड़ा संकट अपने अस्तित्व और रोजगार का है। उन्हें नौकरी तक नहीं मिल रही है। अगर वे पूरी ईमानदारी से काम करना चाहें तो कई संस्थानों में उन्हें काम करने ही नहीं दिया जाता।

उन्होंने कहा कि आज नैतिकता, पत्रकारिता के मूल्यों और मीडिया को सही दिशा देने की बड़ी-बड़ी बातें करने वाले लोगों का भी रिकॉर्ड देखा जाना चाहिए। यह देखना जरूरी है कि उन्होंने अपने करियर की शुरुआत कैसे की थी और बाद में वे राज्यसभा या अन्य बड़े पदों तक कैसे पहुंचे। उन्होंने कहा कि यह भी जांच का विषय होना चाहिए कि क्या वे पूरी तरह निष्पक्ष पत्रकारिता के दम पर वहां पहुंचे या उसके पीछे अन्य कारण भी रहे।

वाशिंद्र मिश्र ने कहा कि वह ऐसे कई नेताओं और अधिकारियों को जानते हैं जो वास्तव में निष्पक्ष पत्रकारिता करने वाले पत्रकारों से दूरी बनाकर रखते हैं। ऐसे पत्रकारों को कई बार उनके दफ्तरों और घरों तक में प्रवेश नहीं मिलता। राजनीतिक दल भी ऐसे पत्रकारों से दूरी बनाए रखते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि यदि कोई पत्रकार पहले भ्रष्टाचार के खिलाफ अदालत का दरवाजा खटखटा चुका है तो वह भविष्य में भी किसी के खिलाफ कार्रवाई कर सकता है।

उन्होंने बताया कि वह कई ऐसे पत्रकारों को व्यक्तिगत रूप से जानते हैं जिन्होंने नेताओं और अधिकारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामलों में सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में जनहित याचिकाएं (PIL) दायर कीं। बाद में सरकारें बदल गईं, लेकिन नए सत्ता पक्ष ने भी अपने लोगों से कहा कि ऐसे पत्रकारों से दूरी बनाए रखें क्योंकि वे किसी के भी खिलाफ कानूनी कार्रवाई कर सकते हैं।

उन्होंने कहा कि वास्तव में निष्पक्ष और ईमानदार पत्रकारिता से केवल नेता या अधिकारी ही नहीं, बल्कि पूरा सिस्टम असहज हो जाता है। व्यवस्था को अक्सर ऐसे लोगों की जरूरत होती है जो किसी न किसी पक्ष के साथ खड़े हों। लेकिन जो पत्रकार बीच का रास्ता अपनाकर सच को सच और गलत को गलत कहने की कोशिश करता है, वह न पहले पसंद किया जाता था और न आज पसंद किया जाता है।

वाशिंद्र मिश्र ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि 2014 से पहले वह और वरिष्ठ पत्रकार सुधीर एक ही मीडिया समूह में साथ काम करते थे। उस समय वह समूह के सभी क्षेत्रीय चैनलों के संपादक थे, जबकि सुधीर उसी समूह के राष्ट्रीय चैनल के संपादक थे। उन्होंने संस्थान का नाम नहीं लिया, लेकिन कहा कि उस दौर को उन्होंने बहुत करीब से देखा है।

उन्होंने कहा कि 2014 से पहले एक बड़ा नैरेटिव तैयार किया गया था कि असली आजादी तब मिलेगी जब सरकार बदलेगी। यह कहा गया कि 1947 से लेकर 2014 तक देश को गरीबी, बेरोजगारी और अव्यवस्था से वास्तविक मुक्ति नहीं मिली है। मीडिया के एक बड़े हिस्से ने भी इसी नैरेटिव को आगे बढ़ाया और उसे मजबूत करने का काम किया।

उन्होंने कहा कि अब सवाल यह है कि 2014 के बाद जिस बदलाव की बात कही गई थी, उसका रिपोर्ट कार्ड कौन तैयार करेगा। यह भी पूछा जाना चाहिए कि जिन वादों और अभियानों को आगे बढ़ाया गया था, उनमें से कितना पूरा हुआ, कितना बाकी है और जिन लक्ष्यों की बात की गई थी, उन्हें हासिल करने में अभी कितना समय लगेगा। उनके मुताबिक, यदि पहले की सरकारों का मूल्यांकन हो सकता है तो बाद की सरकारों का भी उसी पैमाने पर आकलन होना चाहिए।

उन्होंने कहा कि आज का दौर अवसरों का अधिकतम लाभ उठाकर अपना-अपना एजेंडा आगे बढ़ाने का दौर बन गया है। 2014 से पहले विपक्ष में रही पार्टियों ने जो बड़े-बड़े वादे किए थे, उनका भी रिपोर्ट कार्ड आज जनता के सामने है। उसी तरह 1947 से 2014 तक सत्ता में रही सरकारों का मूल्यांकन भी लोगों के सामने है। उनका मानना है कि यही स्थिति मीडिया पर भी लागू होती है।

वाशिंद्र मिश्र ने कहा कि उन्हें निकट भविष्य में कोई बहुत बड़ा क्रांतिकारी बदलाव दिखाई नहीं देता। जब तक समाज रहेगा और उसकी जरूरतें बनी रहेंगी, तब तक मीडिया भी इसी तरह चलता रहेगा। इसलिए 'दरबारी मीडिया' या 'गोदी मीडिया' की बहस को केवल वर्तमान तक सीमित नहीं देखना चाहिए। यह हर दौर में अलग-अलग रूप में मौजूद रही है।

अपने संबोधन के अंत में उन्होंने कहा कि पहले के समय में कई बड़े संपादक सत्ता के करीब रहे और उन्हें विधान परिषद या राज्यसभा जैसी जिम्मेदारियां मिलीं। उस समय यह जानकारी आसानी से लोगों तक नहीं पहुंचती थी क्योंकि सोशल मीडिया नहीं था। लेकिन आज स्थिति बदल चुकी है। अब सोशल मीडिया और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) के जरिए युवा किसी भी पत्रकार या सार्वजनिक व्यक्ति का पूरा रिकॉर्ड आसानी से देख सकते हैं और यह पता लगा सकते हैं कि वह किस दौर में किस भूमिका में रहा। इसी वजह से अब हर व्यक्ति के काम और उसके इतिहास की जांच पहले की तुलना में कहीं अधिक आसान हो गई है।

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जी एंटरटेनमेंट ने प्रशांत शेट्टी को सौंपी विज्ञापन कारोबार की कमान

जी एंटरटेनमेंट (Zee Entertainment) ने प्रशांत शेट्टी को Head – Advertisement Revenue, Broadcast & Digital नियुक्त किया है। वह प्रसारण और Zee5 के विज्ञापन कारोबार को नई दिशा देंगे।

Samachar4media Bureau by
Published - Tuesday, 04 August, 2026
Last Modified:
Tuesday, 04 August, 2026
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जी एंटरटेनमेंट एंटरप्राइजेज लिमिटेड (Zee Entertainment Enterprises Ltd-ZEEL) ने प्रशांत शेट्टी (Prashant Shetty) को हेड–एडवर्टाइजमेंट रेवेन्यू, ब्रॉडकास्ट एंड डिजिटल (Head – Advertisement Revenue, Broadcast & Digital) नियुक्त किया है। वह मुंबई स्थित कंपनी मुख्यालय से कार्य करेंगे और चीफ ऑपरेटिंग ऑफिसर–एडवर्टाइजमेंट रेवेन्यू (Chief Operating Officer – Advertisement Revenue) संदीप मेहरोत्रा (Sandeep Mehrotra) को रिपोर्ट करेंगे।

नई भूमिका में प्रशांत शेट्टी कंपनी के लीनियर टेलीविजन (Linear Television) और जी5 (Zee5) के विज्ञापन कारोबार को मजबूत बनाने की जिम्मेदारी संभालेंगे। उनका फोकस विज्ञापन राजस्व बढ़ाने, रणनीतिक क्लाइंट साझेदारियों को मजबूत करने, बाजार हिस्सेदारी बढ़ाने और विभिन्न प्लेटफॉर्म्स पर नए मुद्रीकरण (Monetisation) अवसर विकसित करने पर रहेगा।

प्रशांत शेट्टी कंपनी की एकीकृत बिक्री रणनीति (Integrated Sales Strategy) को भी आगे बढ़ाएंगे। इसके तहत ब्रॉडकास्ट और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के बेहतर समन्वय के जरिए विज्ञापनदाताओं और ब्रांड्स को व्यापक समाधान उपलब्ध कराए जाएंगे। यह रणनीति कंपनी की ओम्नी-चैनल (Omni-channel) कारोबारी योजना के अनुरूप होगी।

प्रशांत शेट्टी मीडिया और विज्ञापन उद्योग में लंबे अनुभव के साथ Zee Entertainment से जुड़े हैं। उनसे कंपनी को अपने प्रसारण और डिजिटल विज्ञापन कारोबार को नई गति देने तथा विभिन्न प्लेटफॉर्म्स पर राजस्व वृद्धि को मजबूत करने की उम्मीद है।

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डब्ल्यूपीपी प्रोडक्शन इंडिया के नए CEO बने सतीश नायर

डब्ल्यूपीपी प्रोडक्शन (WPP Production) इंडिया ने सतीश नायर (Satish Nair) को नया CEO नियुक्त किया है। वह कार्तिक नागराजन (Karthik Nagarajan) की जगह कंपनी का नेतृत्व संभालेंगे।

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Published - Tuesday, 04 August, 2026
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Tuesday, 04 August, 2026
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डब्ल्यूपीपी प्रोडक्शन (WPP Production) इंडिया ने सतीश नायर (Satish Nair) को नया मुख्य कार्यकारी अधिकारी (Chief Executive Officer-CEO) नियुक्त किया है। वह कार्तिक नागराजन (Karthik Nagarajan) का स्थान लेंगे, जिन्होंने लगभग चार वर्षों के कार्यकाल के बाद कंपनी छोड़ने का फैसला किया है।

सतीश नायर (Satish Nair) के पास 25 वर्षों का पेशेवर अनुभव है, जिसमें से 15 वर्ष उन्होंने WPP Production (पूर्व में हॉगार्थ-Hogarth) के साथ बिताए हैं। उन्होंने यूनाइटेड किंगडम (United Kingdom), वैश्विक बाजारों और भारत में कंपनी के लिए उत्पादन मॉडल (Production Models) को विकसित करने और बिजनेस ट्रांसफॉर्मेशन (Business Transformation) को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

अपने करियर के दौरान सतीश नायर ने द कोका-कोला कंपनी (The Coca-Cola Company-TCCC), फोर्ड (Ford) और डियाजियो (Diageo) जैसे वैश्विक ग्राहकों के साथ प्रमुख साझेदारियों का नेतृत्व किया। हाल ही में वह लंदन (London) में ग्लोबल चीफ ग्रोथ ऑफिसर (Global Chief Growth Officer) के रूप में कार्यरत थे। इसके बाद भारत लौटकर उन्होंने एशिया-प्रशांत (APAC) क्षेत्र के लिए चीफ क्लाइंट ऑफिसर (Chief Client Officer) की जिम्मेदारी संभाली।

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जन्मदिन विशेष: डॉ. राजी एम. शिंदे की दूरदृष्टि ने बदली पंजाबी मीडिया की तस्वीर

डॉ. शिंदे ने उस समय पंजाबी टेलीविजन की संभावनाओं को पहचाना, जब राष्ट्रीय ब्रॉडकास्टर्स का फोकस मुख्य रूप से हिंदी कार्यक्रमों पर था।

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Published - Monday, 03 August, 2026
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Monday, 03 August, 2026
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‘पीटीसी एंटरटेनमेंट चैनल्स’ (PTC Entertainment Channels) की चीफ एग्जिक्यूटिव ऑफिसर (CEO) और दादासाहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित डॉ. राजी एम. शिंदे का आज जन्मदिन है। क्षेत्रीय भाषा के कंटेंट को वैश्विक पहचान दिलाने वाले चुनिंदा मीडिया प्रोफेशनल्स में शामिल डॉ. शिंदे ने उस समय पंजाबी टेलीविजन की संभावनाओं को पहचाना, जब राष्ट्रीय ब्रॉडकास्टर्स का फोकस मुख्य रूप से हिंदी कार्यक्रमों पर था। उनके दूरदर्शी नेतृत्व ने पंजाबी एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

डॉ. राजी एम. शिंदे को आधुनिक पंजाबी ब्रॉडकास्टिंग जगत की प्रमुख हस्तियों में गिना जाता है। उन्होंने अपने लंबे करियर में कई टेलीविजन नेटवर्क की स्थापना और विस्तार में महत्वपूर्ण योगदान दिया। साथ ही ऐसे एंटरटेनमेंट प्लेटफॉर्म्स तैयार किए, जिनकी बदौलत पंजाबी संगीत, फिल्म और संस्कृति को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान मिली।

उनकी मीडिया यात्रा 'पंजाबी वर्ल्ड' के शुभारंभ से शुरू हुई। इस पहल ने पंजाबी भाषा, संस्कृति और मनोरंजन को एक समर्पित मंच दिया। इस चैनल की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक हरमंदिर साहिब से लाइव गुरबाणी का प्रसारण था, जिसके माध्यम से भारत के अलावा अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, यूरोप और न्यूजीलैंड में रहने वाले लाखों लोग अपनी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत से जुड़े रहे।

इसके बाद डॉ. शिंदे ने ज़ी पंजाबी (Zee Punjabi) और ईटीसी पंजाबी (ETC Punjabi) जैसे प्रमुख मीडिया ब्रैंड्स को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसके बाद उन्होंने पीटीसी नेटवर्क (PTC Network) को स्थापित करने और उसे वैश्विक पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जो आज दुनिया के प्रमुख पंजाबी मीडिया समूहों में गिना जाता है।

ईटीसी पंजाबी में बिजनेस हेड के रूप में उन्होंने भारत का पहला पंजाबी म्यूजिक टेलीविजन चैनल लॉन्च किया। उस दौर में पंजाबी संगीत के लिए समर्पित प्रसारण मंच बेहद सीमित थे। इसके बाद उन्होंने जी पंजाबी में कंटेंट स्ट्रैटेजी और क्रिएटिव दिशा का नेतृत्व करते हुए क्षेत्रीय कार्यक्रमों की पहुंच को और व्यापक बनाया।

क्षेत्रीय मीडिया से आगे बढ़ते हुए उन्होंने चीफ एग्जिक्यूटिव ऑफिसर के रूप में ईपीआईसी ग्रुप (EPIC Group) के तहत शोबॉक्स चैनल (Showbox Channel) की शुरुआत भी की। इस पहल ने राष्ट्रीय स्तर पर एक म्यूजिक टेलीविजन प्लेटफॉर्म स्थापित करने में अहम भूमिका निभाई।

पीटीसी नेटवर्क में उनके नेतृत्व के दौरान संगठन ने एक वैश्विक मीडिया कंपनी के रूप में अपनी पहचान बनाई। पीटीसी पंजाबी (PTC Punjabi) दुनिया के सबसे चर्चित पंजाबी टेलीविजन चैनलों में शामिल हुआ, जिसने विभिन्न देशों में दर्शकों तक पंजाबी संगीत, सिनेमा, लाइफस्टाइल और संस्कृति को पहुंचाया।

डॉ. राजी एम. शिंदे ने केवल टेलीविजन चैनलों के निर्माण तक ही अपनी भूमिका सीमित नहीं रखी। उन्होंने पंजाबी एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री के पहले रियलिटी टीवी शो की शुरुआत की, जिससे उभरते गायकों, कलाकारों और मनोरंजन जगत की नई प्रतिभाओं को अपनी पहचान बनाने का मंच मिला।

इसके अलावा उन्होंने पंजाबी म्यूजिक अवॉर्ड्स और पंजाबी फिल्म अवॉर्ड्स जैसे प्रतिष्ठित मंचों की भी स्थापना की। इन आयोजनों ने पंजाबी एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री को नई पेशेवर पहचान देने के साथ-साथ कलाकारों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी प्रतिभा प्रदर्शित करने का अवसर भी प्रदान किया।

डॉ. राजी एम. शिंदे का पूरा करियर ऐसे टेलीविजन चैनलों, मनोरंजन प्रारूपों और संस्थागत मंचों के निर्माण का उदाहरण है, जिन्होंने पंजाबी मीडिया की दिशा बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनका योगदान केवल प्रसारण तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उन्होंने क्षेत्रीय कंटेंट को व्यावसायिक रूप से सफल और वैश्विक स्तर पर विस्तार योग्य मॉडल के रूप में स्थापित करने में भी अहम योगदान दिया।

उनके प्रयासों से पंजाबी कलाकारों, फिल्मकारों और कहानीकारों की कई पीढ़ियों को अपनी प्रतिभा दुनिया तक पहुंचाने का मजबूत मंच मिला। समाचार4मीडिया की ओर से डॉ. राजी एम. शिंदे को जन्मदिन की ढेरों बधाई और शुभकामनाएं।

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वरिष्ठ पत्रकार भूपेंद्र चौबे की मां सीमा चौबे का निधन

करीब 73 वर्षीय सीमा चौबे कुछ समय से अस्वस्थ चल रही थीं। नोएडा स्थित श्मशान घाट में उनका अंतिम संस्कार किया गया।

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Published - Monday, 03 August, 2026
Last Modified:
Monday, 03 August, 2026
Seema Chaubey Death

वरिष्ठ पत्रकार और डिजिटल न्यूज प्लेटफॉर्म 'द स्क्विरल्स' (The Squirrels) के को-फाउंडर और एडिटर-इन-चीफ भूपेंद्र चौबे की माताजी सीमा चौबे का निधन हो गया है। करीब 73 वर्षीय सीमा चौबे कुछ समय से अस्वस्थ चल रही थीं। सीमा चौबे के निधन से परिवार के साथ-साथ मीडिया जगत में भी शोक की लहर है।

परिवार की ओर से जारी शोक संदेश के अनुसार, सीमा चौबे का जन्म 15 नवंबर 1952 को हुआ था और उनका निधन 2 अगस्त 2026 को हुआ। वह स्वर्गीय डॉ. इंद्रजीत चौबे की पत्नी थीं।

जारी सूचना के मुताबिक, अंतिम दर्शन के लिए सीमा चौबे के पार्थिव शरीर को एफ-13, सेक्टर-20, नोएडा-201301 स्थित आवास पर सुबह 10 बजे से दोपहर 12 बजे तक रखा गया। इसके बाद दोपहर 1 बजे सेक्टर-94, नोएडा स्थित श्मशान घाट में उनका अंतिम संस्कार किया गया।

समाचार4मीडिया परिवार दिवंगत आत्मा को श्रद्धांजलि अर्पित करता है और शोकाकुल परिवार के प्रति अपनी गहरी संवेदनाएं व्यक्त करता है।

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जन्मदिन विशेष: सिर्फ कॉमेडियन नहीं, विज्ञापनों के भी सुपरस्टार हैं सुनील ग्रोवर

'गुत्थी' जैसे लोकप्रिय किरदार से घर-घर में पहचान बनाने वाले सुनील ग्रोवर ने कई ऐसे विज्ञापनों में काम किया है, जिन्हें आज भी दर्शक याद करते हैं।

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Published - Monday, 03 August, 2026
Last Modified:
Monday, 03 August, 2026
Sunil Grover Birthday

अपनी शानदार कॉमिक टाइमिंग और अलग-अलग किरदारों से दर्शकों का दिल जीतने वाले अभिनेता और कॉमेडियन सुनील ग्रोवर का आज जन्मदिन है। सुनील ग्रोवर का नाम सिर्फ टीवी और फिल्मों तक सीमित नहीं है, विज्ञापन जगत में भी उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई है। जहां ज्यादातर सेलिब्रिटी विज्ञापनों में अपने असली अंदाज में नजर आते हैं, वहीं सुनील ग्रोवर हर बार किसी नए किरदार में दिखाई देते हैं। यही वजह है कि बड़े ब्रैंड्स उन्हें सिर्फ एक स्टार नहीं, बल्कि ऐसे कलाकार के रूप में देखते हैं जो अपने अभिनय से विज्ञापन को यादगार बना देते हैं।

यह भी पढ़ें: 'गुत्थी' बनने से पहले की कहानी, जानिए सुनील ग्रोवर की जिंदगी के 10 अनसुने पहलू

'गुत्थी' जैसे लोकप्रिय किरदार से घर-घर में पहचान बनाने वाले सुनील ग्रोवर ने कई ऐसे विज्ञापनों में काम किया है, जिन्हें आज भी दर्शक याद करते हैं। उनके जन्मदिन के मौके पर जानते हैं उनके पांच ऐसे विज्ञापन कैंपेन के बारे में, जिन्होंने मार्केटिंग की दुनिया में भी अपनी खास छाप छोड़ी।

Figaro Olive Oil: पांच किरदार, एक संदेश: इस साल Figaro Olive Oil ने अपनी नई ब्रैंड आइडेंटिटी के साथ एक विज्ञापन कैंपेन शुरू किया, जिसमें सुनील ग्रोवर एक साथ पांच अलग-अलग किरदार निभाते नजर आए। कहानी एक फिल्म की शूटिंग के दौरान घटती है, जहां उनके लगातार बदलते किरदार सभी को हैरान कर देते हैं।

विज्ञापन का मुख्य संदेश यह है कि जिस तरह सुनील ग्रोवर कई भूमिकाएं आसानी से निभा लेते हैं, उसी तरह Figaro Olive Oil भी कई तरह के उपयोग के लिए उपयुक्त है। कंपनी Deoleo के नए ब्रैंडिंग अभियान का यह हिस्सा था, जिसमें प्रॉडक्ट की खूबियां पारंपरिक तरीके से बताने के बजाय मनोरंजक अंदाज अपनाया गया।

Goibibo की 'Dealpanti' में बने डोनाल्ड ट्रंप: Goibibo के 'Dealpanti' अभियान में सुनील ग्रोवर ने अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की मजेदार नकल करते हुए होटल की कीमतों पर बहस करने वाला किरदार निभाया। इसके बाद क्रिकेटर ऋषभ पंत 'Dealpanti' का संदेश लेकर सामने आते हैं। इस डिजिटल अभियान की खासियत यह रही कि इसमें सुनील ग्रोवर और कॉमेडियन किकू शारदा दोनों ने अपने-अपने हास्य किरदारों से मनोरंजन किया, जबकि ब्रैंड का संदेश यात्रा में बचत पर केंद्रित रहा।

Airtel x Adobe Express: डिजाइन को बनाया आसान:  Airtel और Adobe Express के 'झटपट फटाफट' अभियान में सुनील ग्रोवर एक स्वयंभू पारिवारिक ज्योतिषी के किरदार में नजर आते हैं। वह एक शादी के निमंत्रण कार्ड की डिजाइन की आलोचना करते हैं और फिर गर्व से बताते हैं कि उन्होंने अपना कार्ड Adobe Express से तैयार किया है।

इस अभियान का उद्देश्य यह दिखाना था कि डिजाइनिंग सिर्फ पेशेवरों का काम नहीं, बल्कि आम लोग भी रोजमर्रा के कामों के लिए इसे आसानी से इस्तेमाल कर सकते हैं। बाद में इस अभियान का विस्तार जन्मदिन की शुभकामनाओं, मीम्स, व्हाट्सऐप क्रिएटिव, पार्टी निमंत्रण और छोटे कारोबारों के प्रचार सामग्री तक किया गया।

Mentos: 'एंग्री चिकन डैड' की आवाज बनी पहचान:  Perfetti Van Melle के Mentos के '#FarakPadega' अभियान में सुनील ग्रोवर ने गुस्सैल मुर्गे (Angry Chicken Dad) की आवाज दी। विज्ञापन में मुर्गा अपने बच्चे को पढ़ाई को लेकर डांटता है। इसी दौरान कोई उसे Mentos ऑफर करता है, लेकिन वह मशहूर संवाद बोलता है— "इनको फर्क नहीं पड़ेगा, लेकिन आपको #FarakPadega."

इस विज्ञापन की खास बात यह थी कि इसमें उत्पाद को किसी समस्या का समाधान बताने के बजाय हास्य के जरिए दर्शकों का मनोरंजन किया गया। यही वजह रही कि यह विज्ञापन बाद में सोशल मीडिया, खासकर इंस्टाग्राम रील्स और मीम पेजों पर भी खूब लोकप्रिय हुआ।

Kurkure: जूही चावला के साथ कॉमेडी का तड़का: OTT और रील्स के दौर से पहले ही सुनील ग्रोवर Kurkure के टीवी विज्ञापनों के जरिए दर्शकों के बीच लोकप्रिय हो चुके थे। इन विज्ञापनों में वह अभिनेत्री जूही चावला के साथ नजर आए और अपने मजेदार हाव-भाव व कॉमिक अंदाज से की चुलबुली पहचान को मजबूत किया।

इन कैंपेन में उन्होंने किसी पारंपरिक ब्रैंड एंबेसडर की तरह नहीं, बल्कि आम लोगों से जुड़े हास्यपूर्ण किरदार निभाए। यही वजह रही कि विज्ञापन मनोरंजक होने के साथ-साथ ब्रैंड का संदेश भी दर्शकों तक प्रभावी ढंग से पहुंचा।

किरदार याद रहते हैं, इसलिए याद रहते हैं ब्रैंड:  आज के दौर में जहां कई विज्ञापन सिर्फ सेलिब्रिटी की लोकप्रियता पर आधारित होते हैं, वहीं सुनील ग्रोवर की खासियत यह है कि वह हर बार एक नया किरदार बनकर सामने आते हैं। यही कारण है कि दर्शकों को उनका किरदार भी याद रहता है और उससे जुड़ा ब्रैंड भी। ऑलिव ऑयल से लेकर ट्रैवल बुकिंग, डिजाइन सॉफ्टवेयर, मिंट कैंडी और स्नैक फूड तक, सुनील ग्रोवर ने हर विज्ञापन में अपनी कॉमिक टाइमिंग और अभिनय से यह साबित किया है कि मजबूत कहानी और दमदार किरदार किसी भी ब्रैंड को लंबे समय तक लोगों की यादों में बनाए रख सकते हैं।

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'गुत्थी' बनने से पहले की कहानी, जानिए सुनील ग्रोवर की जिंदगी के 10 अनसुने पहलू

'गुत्थी' और 'डॉ. मशहूर गुलाटी' जैसे किरदारों से घर-घर में लोकप्रिय हुए सुनील की जिंदगी से जुड़े कई ऐसे दिलचस्प पहलू हैं, जिनके बारे में कम ही लोग जानते हैं।

Samachar4media Bureau by
Published - Monday, 03 August, 2026
Last Modified:
Monday, 03 August, 2026
Sunil Grover

कॉमेडी की दुनिया में अपनी अलग पहचान बना चुके सुनील ग्रोवर ने हर किरदार से दर्शकों का दिल जीता है। 'गुत्थी' और 'डॉ. मशहूर गुलाटी' जैसे किरदारों से घर-घर में लोकप्रिय हुए सुनील की जिंदगी से जुड़े कई ऐसे दिलचस्प पहलू हैं, जिनके बारे में कम ही लोग जानते हैं। आइए जानते हैं उनके जीवन से जुड़े 10 रोचक तथ्य।

जसपाल भट्टी ने पहचाना टैलेंट: कॉलेज के दिनों में मशहूर सटायरिस्ट जसपाल भट्टी ने उनके हुनर को पहचाना और उन्हें पहला ब्रेक दिया था।

थिएटर में मास्टर्स डिग्री: बहुत कम लोग जानते हैं कि सुनील सिर्फ गॉड-गिफ्टेड अभिनेता नहीं हैं, बल्कि उन्होंने पंजाब यूनिवर्सिटी, चंडीगढ़ से थिएटर में मास्टर्स डिग्री भी हासिल की है।

'गुत्थी' की असली प्रेरणा: उनका आइकॉनिक किरदार 'गुत्थी' कथित तौर पर उनके कॉलेज की एक क्लासमेट से प्रेरित था, जिसकी अनोखी आदतों पर सुनील अक्सर गौर किया करते थे।

रेडियो के मशहूर 'सुदर्शन': टीवी पर आने से पहले वह रेडियो मिर्ची में आरजे थे। वहां वह बेहद लोकप्रिय शो 'हंसी के फब्बारे' में 'सुदर्शन (सुद)' का किरदार निभाते थे।

पहली फिल्म अजय देवगन के साथ: सुनील ने बॉलीवुड में अपने करियर की शुरुआत 1998 में अजय देवगन और काजोल अभिनीत फिल्म 'प्यार तो होना ही था' से की थी, जिसमें उनका एक छोटा-सा रोल था।

पहले साइलेंट कॉमेडी शो का हिस्सा: वह सब टीवी (SAB TV) पर प्रसारित भारत के पहले साइलेंट कॉमेडी शो 'गुटर गू' के शुरुआती 26 एपिसोड का हिस्सा रह चुके हैं।

पत्नी हैं पहली ऑडियंस: सुनील किसी भी शो या जोक को फाइनल करने से पहले अपनी पत्नी आरती ग्रोवर को सुनाते हैं। अगर वह हंस दें, तभी वह उस जोक को मंच या स्क्रीन पर परफॉर्म करते हैं।

शानदार सिंगिंग टैलेंट: एक्टिंग और मिमिक्री के अलावा सुनील की गायकी भी बेहतरीन है। कहा जाता है कि संगीत उन्हें अपने परिवार से विरासत में मिला है।

'छोले कुलचे' हैं फेवरेट कम्फर्ट फूड: इंटरव्यू में सुनील बता चुके हैं कि जब भी वह उदास या परेशान होते हैं, तो 'छोले कुलचे' उनका मूड बेहतर कर देते हैं।

बायपास सर्जरी के बाद दमदार वापसी: फरवरी 2022 में उन्हें हार्ट अटैक आया था, जिसके बाद उनकी चार बायपास सर्जरी हुईं। अपनी मजबूत इच्छाशक्ति के दम पर उन्होंने शानदार वापसी की।

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AI पत्रकारों की जगह नहीं ले सकता, ओरिजिनल स्टोरीटेलिंग ही ताकत: डॉ. अनुराग बत्रा

एक्सचेंज4मीडिया ग्रुप और BW बिजनेसवर्ल्ड के चेयरमैन एवं एडिटर-इन-चीफ डॉ. अनुराग बत्रा ने कहा कि बदलते दौर में भी मीडिया समाज की सबसे महत्वपूर्ण संस्थाओं में से एक है।

Vikas Saxena by
Published - Monday, 03 August, 2026
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Monday, 03 August, 2026
DrAnnuragBatra5421

समाचार4मीडिया के 'पत्रकारिता 40 अंडर 40' कार्यक्रम को संबोधित करते हुए dउन्होंने कहा कि आज का दिन पत्रकारिता की कमियों पर चर्चा करने का नहीं, बल्कि उन युवा पत्रकारों की उपलब्धियों का सम्मान करने का है, जिन्होंने कठिन परिस्थितियों में भी अपने काम से पहचान बनाई है।

अपने संबोधन की शुरुआत करते हुए डॉ. अनुराग बत्रा ने सभी अतिथियों, जूरी सदस्यों और विजेताओं का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि यह उनके लिए सौभाग्य की बात है कि वे समाचार4मीडिया के 'पत्रकारिता 40 अंडर 40' के चौथे संस्करण में सभी के बीच मौजूद हैं।

उन्होंने उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री बृजेश पाठक का विशेष रूप से स्वागत करते हुए कहा कि वह इस आयोजन के मुख्य अतिथि हैं और लगातार तीसरी बार इस कार्यक्रम में शामिल हो रहे हैं। उन्होंने कहा कि यह समाचार4मीडिया परिवार के लिए गर्व की बात है कि बृजेश पाठक हर बार समय निकालकर इस मंच पर आते हैं और युवा पत्रकारों का उत्साह बढ़ाते हैं। उन्होंने उपस्थित लोगों से बृजेश पाठक के लिए तालियां बजाने का आग्रह भी किया।

डॉ. अनुराग बत्रा ने कहा कि उन्होंने बहुत कम ऐसे जनप्रतिनिधि देखे हैं, जो हर व्यक्ति से सहजता से मिलते हों। उन्होंने कहा कि उन्होंने बृजेश पाठक के साथ काम करने वाले अधिकारियों से भी यही सुना है कि वह सभी से आत्मीयता के साथ संवाद करते हैं। उन्होंने कहा कि पत्रकारों के बीच भी बृजेश पाठक की अच्छी छवि है और लगभग हर पत्रकार उनके व्यवहार की सराहना करता है। उनके अनुसार किसी भी जनप्रतिनिधि के लिए यह सबसे बड़ी उपलब्धि होती है।

उन्होंने कहा कि आज जब कई नेता मीडिया के सवालों का सामना करने से बचते हैं, ऐसे समय में बृजेश पाठक का इस कार्यक्रम में आना और पत्रकारों के बीच खुलकर मौजूद रहना सराहनीय है। इसके लिए उन्होंने उनका आभार व्यक्त किया।

इसके बाद डॉ. अनुराग बत्रा ने कार्यक्रम के जूरी चेयरमैन और हिन्दुस्तान के प्रधान संपादक शशि शेखर का विशेष धन्यवाद दिया। उन्होंने कहा कि जब पहली बार 'पत्रकारिता 40 अंडर 40' पुरस्कार शुरू करने का विचार आया, तो सबसे पहला नाम उनके मन में शशि शेखर का ही आया था। उन्होंने कहा कि शशि शेखर जिस भी जिम्मेदारी को स्वीकार करते हैं, उसे पूरी ईमानदारी, जिम्मेदारी और नैतिकता के साथ निभाते हैं।

उन्होंने कहा कि इस पुरस्कार की गरिमा बढ़ाने में शशि शेखर की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। इसके साथ ही उन्होंने जूरी के अन्य सदस्यों का भी आभार व्यक्त किया, जिन्होंने निष्पक्षता के साथ विजेताओं का चयन किया।

डॉ. अनुराग बत्रा ने इंडियन ब्रॉडकास्ट एंड डिजिटल फाउंडेशन (IBDF) के महासचिव अविनाश पांडे का भी उल्लेख करते हुए कहा कि मीडिया इंडस्ट्री की उनकी समझ बेहद गहरी है। उन्होंने बताया कि अविनाश पांडे पहले एबीपी न्यूज के ग्रुप सीईओ रह चुके हैं और कई प्रतिष्ठित जूरी का हिस्सा भी रहे हैं। 

उन्होंने मंच संचालन कर रहे वरिष्ठ पत्रकार अनुराग मुस्कान की भी विशेष प्रशंसा की। डॉ. बत्रा ने कहा कि अनुराग मुस्कान की दमदार आवाज, प्रभावशाली व्यक्तित्व और मीडिया इंडस्ट्री की गहरी समझ ने पूरे कार्यक्रम की गंभीरता और गुणवत्ता को और बढ़ाया है। उन्होंने उपस्थित लोगों से अनुराग मुस्कान के लिए भी तालियां बजाने का आग्रह किया।  

अपने संबोधन को आगे बढ़ाते हुए डॉ. अनुराग बत्रा ने कहा कि आज पत्रकारिता को लेकर अलग-अलग तरह की बातें हो रही हैं। कोई कहता है कि पत्रकारों को अपनी पहचान छिपानी पड़ रही है, तो कोई गर्व के साथ पत्रकार कहलाने की बात करता है। लेकिन उनका मानना है कि पत्रकारिता को उसके बदलते परिवेश में समझने की जरूरत है और इस पेशे से जुड़े लोगों को अपने काम पर गर्व होना चाहिए।

उन्होंने कहा कि समाज बदल गया है, राजनीति बदल गई है और लोगों की प्राथमिकताएं भी बदल गई हैं। ऐसे में पत्रकारिता का बदलना भी स्वाभाविक है। उन्होंने कहा कि वह यह नहीं कहेंगे कि यह बदलाव अच्छा है या बुरा, क्योंकि हर बदलाव का मूल्यांकन समय के साथ होता है। लेकिन इतना जरूर है कि मीडिया आज पहले की तुलना में कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण माहौल में काम कर रहा है।

डॉ. अनुराग बत्रा ने कहा कि उनके लिए पत्रकार, मीडिया मालिक और संपादक केवल पेशेवर साथी नहीं, बल्कि एक परिवार की तरह हैं। उन्होंने कहा कि वह पूरी मीडिया बिरादरी को एक समुदाय के रूप में देखते हैं और उन्हें पूरा विश्वास है कि बेहद कठिन परिस्थितियों के बावजूद पत्रकार और मीडिया संस्थान अपना काम पूरी निष्ठा से कर रहे हैं। उन्होंने उपस्थित सभी पत्रकारों से कहा कि वे खुद अपने लिए तालियां बजाएं, क्योंकि आज का दिन उनके योगदान और उपलब्धियों का जश्न मनाने का दिन है।

उन्होंने कहा कि निश्चित रूप से मीडिया पहले से बेहतर काम कर सकता है और उसे लगातार बेहतर करने की जरूरत भी है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि पत्रकारों की उपलब्धियों को नजरअंदाज कर दिया जाए। उन्होंने कहा कि आज का दिन आत्मालोचना का नहीं, बल्कि उन पत्रकारों का सम्मान करने का है, जिन्होंने अपने काम से पहचान बनाई है।

अपने संबोधन में डॉ. बत्रा ने एक दिलचस्प प्रसंग भी साझा किया। उन्होंने बताया कि एक बड़े उद्योगपति ने उनसे पूछा था कि आखिर पत्रकारों को पुरस्कार देने की जरूरत क्या है, वे ऐसा कौन-सा काम करते हैं? इस सवाल के जवाब में उन्होंने उद्योगपति से कहा कि कोई भी उद्योगपति, कारोबारी, संस्था या नेता अपनी मेहनत से काम जरूर करता है, लेकिन उसकी पहचान, उसकी छवि और उसके ब्रांड को मजबूत बनाने में मीडिया की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

उन्होंने कहा कि पत्रकार लोगों के काम को समाज के सामने लाते हैं। वे उनकी उपलब्धियों को प्रकाशित करते हैं, उनकी कहानियां बताते हैं और उनकी सार्वजनिक छवि को मजबूत बनाने में योगदान देते हैं। उन्होंने उद्योगपति से कहा कि मीडिया केवल खबरें नहीं लिखता, बल्कि समाज में व्यक्तियों, संस्थाओं और ब्रांडों की विश्वसनीयता को भी स्थापित करने में बड़ी भूमिका निभाता है। इसलिए पत्रकारों के काम का सम्मान होना चाहिए।

डॉ. अनुराग बत्रा ने कहा कि उन्होंने यह बात देश के शीर्ष उद्योगपतियों में शामिल उस व्यक्ति से पूरी विनम्रता के साथ कही थी। उनका मानना है कि जिस तरह दूसरे क्षेत्रों में उत्कृष्ट काम करने वालों को सम्मानित किया जाता है, उसी तरह पत्रकारों को भी उनके योगदान के लिए सम्मान मिलना चाहिए।

इसके बाद उन्होंने 'पत्रकारिता 40 अंडर 40' पुरस्कारों की चयन प्रक्रिया और आयोजन की पारदर्शिता पर भी विस्तार से बात की। उन्होंने कहा कि पहले इन पुरस्कारों के लिए एंट्री फीस ली जाती थी, क्योंकि यह एक प्रोफेशनल और लाभकारी कंपनी का आयोजन था और इसमें कुछ भी छिपाने जैसा नहीं है। उन्होंने कहा कि एक्सचेंज4मीडिया पिछले 26 वर्षों से मीडिया इंडस्ट्री पर काम कर रहा है और उसे हमेशा पाठकों तथा मीडिया समुदाय का सहयोग मिला है।

उन्होंने बताया कि जब पहले वर्ष का आयोजन हुआ, तब उन्होंने महसूस किया कि एंट्री फीस होने की वजह से बड़े मीडिया संस्थान अधिक संख्या में आवेदन भेज पाते थे, क्योंकि उनके पास संसाधन अधिक होते थे। वहीं छोटे संस्थानों या व्यक्तिगत पत्रकारों के लिए यह उतना आसान नहीं था। इसी अनुभव से सीख लेते हुए समाचार4मीडिया ने पिछले दो संस्करणों से एंट्री फीस पूरी तरह समाप्त कर दी।

उन्होंने कहा कि अब इस आयोजन के लिए प्रायोजकों का सहयोग लिया जाता है और भविष्य में और भी प्रायोजक जुड़ सकते हैं। लेकिन उनका उद्देश्य केवल आयोजन करना नहीं, बल्कि इसे देश का सबसे प्रतिष्ठित पत्रकारिता सम्मान बनाना है।

अपने संबोधन के अंतिम चरण में डॉ. अनुराग बत्रा ने कहा कि इस पुरस्कार का उद्देश्य केवल सम्मान देना नहीं, बल्कि इसे देश का सबसे विश्वसनीय और प्रतिष्ठित पत्रकारिता मंच बनाना है। उन्होंने कहा कि आने वाले वर्षों में इस आयोजन को और बड़े स्तर पर आयोजित किया जाएगा, ताकि देशभर के अधिक से अधिक पत्रकार इसमें शामिल हो सकें।  

उन्होंने पुरस्कारों की चयन प्रक्रिया पर भी विस्तार से बात की और कहा कि यह पूरी प्रक्रिया पूरी तरह निष्पक्ष और पारदर्शी है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि उन्हें स्वयं यह तक पता नहीं होता कि कौन विजेता बनने वाला है। जूरी की बैठक होती है, जिसमें जूरी चेयरमैन शशि शेखर और अन्य सदस्य सभी आवेदनों का मूल्यांकन करते हैं। अंतिम सूची तैयार होने के बाद उसे मंजूरी दी जाती है और तभी विजेताओं को सूचना भेजी जाती है। उन्होंने कहा कि इस प्रक्रिया में किसी तरह का हस्तक्षेप नहीं होता और यही इस सम्मान की सबसे बड़ी ताकत है।

डॉ. अनुराग बत्रा ने कहा कि आज पूरी दुनिया आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की चर्चा कर रही है और मीडिया इंडस्ट्री भी इससे अछूता नहीं है। लेकिन उनका मानना है कि एआई पत्रकारों की जगह नहीं ले सकता। उन्होंने कहा कि तकनीक चाहे जितनी भी विकसित हो जाए, ओरिजिनल स्टोरीटेलिंग, जमीनी रिपोर्टिंग और मानवीय दृष्टिकोण की जरूरत हमेशा बनी रहेगी। यही पत्रकारिता की सबसे बड़ी ताकत है और भविष्य में इसकी अहमियत और बढ़ेगी। उन्होंने कहा कि नए दौर की पत्रकारिता को एआई के साथ चलना होगा, लेकिन अपनी मौलिकता कभी नहीं छोड़नी चाहिए।

उन्होंने कहा कि वह मीडिया की आलोचना करने के लिए मंच पर नहीं आए हैं। उनका मानना है कि आज भी देश के पत्रकार बेहद कठिन परिस्थितियों में शानदार काम कर रहे हैं। उन्होंने कार्यक्रम में मौजूद युवा पत्रकारों की ओर इशारा करते हुए कहा कि उनकी मेहनत और समर्पण ही पत्रकारिता के भविष्य की सबसे बड़ी उम्मीद है।

डॉ. बत्रा ने यह देखकर खुशी जताई कि कार्यक्रम में केवल पत्रकार ही नहीं, बल्कि उनके परिवार के सदस्य भी बड़ी संख्या में मौजूद हैं। उन्होंने कहा कि कई विजेताओं के माता-पिता, पति-पत्नी, भाई-बहन और परिवार के अन्य सदस्य भी उन्हें सम्मानित होते देखने आए हैं। उन्होंने कहा कि किसी भी पत्रकार की सफलता केवल उसकी व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं होती, बल्कि उसके पूरे परिवार की मेहनत और त्याग का परिणाम होती है।

अपने संबोधन में उन्होंने युवा पत्रकारों को स्वास्थ्य का भी विशेष ध्यान रखने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि मीडिया पेशे में काम का दबाव बहुत अधिक होता है, लेकिन इसके बीच स्वास्थ्य की अनदेखी नहीं करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि भारत आज उन देशों में शामिल है, जहां लोग औसतन केवल साढ़े पांच घंटे की नींद लेते हैं, जबकि एक स्वस्थ व्यक्ति के लिए कम से कम आठ घंटे की नींद जरूरी है। उन्होंने पत्रकारों से अपील की कि वे अपने स्वास्थ्य और जीवनशैली का विशेष ध्यान रखें।

डॉ. अनुराग बत्रा ने मीडिया जगत की एक और कमजोरी की ओर ध्यान दिलाते हुए कहा कि इस इंडस्ट्री में लोग एक-दूसरे की तारीफ बहुत कम करते हैं। उन्होंने कहा कि पत्रकारों को अपने सहयोगियों, दोस्तों और यहां तक कि प्रतिस्पर्धियों के अच्छे काम की भी खुलकर सराहना करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि दुनिया में ऐसे बहुत लोग हैं, जो आपको नीचे खींचने की कोशिश करेंगे, इसलिए मीडिया के लोगों को कम से कम आपस में एक-दूसरे का हौसला बढ़ाना चाहिए, न कि एक-दूसरे को पीछे खींचना चाहिए। 

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मिशेल गुप्ता बनीं Hershey Canada की Head of Marketing

हर्शे कनाडा (Hershey Canada) ने मिशेल गुप्ता (Michelle Gupta) को Head of Marketing नियुक्त किया है। वह कंपनी की मार्केटिंग रणनीति और ब्रांड विकास का नेतृत्व करेंगी।

Samachar4media Bureau by
Published - Saturday, 01 August, 2026
Last Modified:
Saturday, 01 August, 2026
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हर्शे कनाडा (Hershey Canada) ने मिशेल गुप्ता (Michelle Gupta) को हेड ऑफ मार्केटिंग (Head of Marketing) नियुक्त किया है। उन्होंने लिंक्डइन (LinkedIn) पोस्ट के माध्यम से अपनी नई जिम्मेदारी की जानकारी साझा की।

मिशेल गुप्ता (Michelle Gupta) ने अपनी पोस्ट में कहा कि Hershey ऐसे प्रतिभाशाली लोगों का संगठन है, जहां मजबूत स्नैकिंग पोर्टफोलियो (Snacking Portfolio) और उपभोक्ताओं के लिए बेहतर अनुभव देने का जुनून साथ आता है। उन्होंने कहा कि वह इस नई यात्रा का हिस्सा बनने को लेकर उत्साहित हैं।

मिशेल गुप्ता (Michelle Gupta) हर्शे कनाडा (Hershey Canada) से पहले नौ वर्षों तक प्रॉक्टर एंड गैम्बल (Procter & Gamble-P&G) के साथ जुड़ी रहीं। अपने हालिया पद पर वह ब्रांड डायरेक्टर–बी2बी एंड बी2सी ओरल केयर (Brand Director – B2B & B2C Oral Care) थीं, जहां उन्होंने क्रेस्ट (Crest) और ओरल-बी (Oral-B) जैसे प्रमुख ब्रांड्स का नेतृत्व किया। वह वर्ष 2017 में P&G में ब्रांड मैनेजर (Brand Manager) के रूप में शामिल हुई थीं।

नई भूमिका में मिशेल गुप्ता कंपनी की मार्केटिंग रणनीति, ब्रांड निर्माण और उपभोक्ता जुड़ाव को मजबूत करने के साथ Hershey Canada के विकास को नई गति देने पर काम करेंगी।

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पीएम मोदी के AI वीडियो मामले में Meta इंडिया हेड अरुण श्रीनिवास पर FIR

पीएम नरेंद्र मोदी के फर्जी और एआई से तैयार किए गए वीडियो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म फेसबुक और इंस्टाग्राम पर वायरल होने के मामले में मेटा इंडिया के हेड अरुण श्रीनिवास के खिलाफ भी एफआईआर दर्ज की गई है।

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Published - Saturday, 01 August, 2026
Last Modified:
Saturday, 01 August, 2026
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के फर्जी और एआई (AI) से तैयार किए गए वीडियो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म फेसबुक और इंस्टाग्राम पर वायरल होने के मामले में मेटा इंडिया के हेड अरुण श्रीनिवास के खिलाफ भी एफआईआर दर्ज की गई है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह मामला हैदराबाद साइबर क्राइम पुलिस ने दर्ज किया है। इस मामले में कई सोशल मीडिया यूजर्स के खिलाफ भी केस दर्ज किया गया है।

पुलिस अब इन AI जनरेटेड वीडियो की पूरी जांच कर रही है। यह पता लगाया जा रहा है कि ये वीडियो सबसे पहले कहां से अपलोड किए गए, किस तरह सोशल मीडिया पर फैले और क्या इनके जरिए लोगों को गुमराह करने की कोशिश की गई।

जांच एजेंसियां यह भी पता लगा रही हैं कि इन वीडियो को रोकने या हटाने के लिए मेटा के सिस्टम ने क्या कार्रवाई की और क्या कंपनी की ओर से किसी तरह की लापरवाही हुई।

अरुण श्रीनिवास फिलहाल Meta India के प्रमुख हैं। उन्हें पिछले साल जुलाई में यह जिम्मेदारी सौंपी गई थी। उन्होंने वर्ष 1993 में मद्रास यूनिवर्सिटी से साइंस में ग्रेजुएशन किया। इसके बाद 1996 में आईआईएम कोलकाता (IIM Calcutta) से मार्केटिंग में पीजीडीएम किया। वर्ष 2007 में उन्होंने अमेरिका की नॉर्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी में एक प्रोफेशनल कोर्स भी किया।

अरुण श्रीनिवास ने अपने करियर की शुरुआत 1996 में स्पोर्ट्स शू कंपनी रीबॉक (Reebok) से की थी। इसके बाद 2001 में वह यूनिलीवर (Unilever) से जुड़े, जहां उन्होंने करीब 15 साल तक काम किया।

साल 2017 में यूनिलीवर छोड़ने के बाद वह बेंगलुरु स्थित निवेश कंपनी वेस्टब्रिज कैपिटल पार्टनर्स (WestBridge Capital Partners) में सलाहकार बने। वर्ष 2019 में उन्होंने ओला (Ola) जॉइन की और 2020 में Meta का हिस्सा बन गए। तब से वह कंपनी में अलग-अलग महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाते हुए अब Meta India के प्रमुख की भूमिका संभाल रहे हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक, एफआईआर दर्ज होने की वजह Facebook और Instagram पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के AI जनरेटेड वीडियो का प्रसार है। पुलिस यह जांच कर रही है कि इन वीडियो का मूल स्रोत क्या है, इन्हें किसने तैयार किया और सोशल मीडिया पर किस तरह फैलाया गया।

साथ ही यह भी जांच का हिस्सा है कि क्या इन वीडियो के जरिए लोगों को गुमराह करने की कोशिश की गई और इन्हें रोकने के लिए Meta के प्लेटफॉर्म पर मौजूद मॉडरेशन सिस्टम ने समय रहते क्या कदम उठाए। फिलहाल पुलिस पूरे मामले की जांच कर रही है और जांच पूरी होने के बाद आगे की कार्रवाई की जाएगी।

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हैप्पी बर्थडे डॉ. ऐश्वर्या पंडित: विचार, संवाद और नेतृत्व की मिसाल हैं आप

‘आईटीवी फाउंडेशन’ (ITV Foundation) की चेयरपर्सन डॉ. ऐश्वर्या पंडित शर्मा का आज जन्मदिन है।

Samachar4media Bureau by
Published - Thursday, 30 July, 2026
Last Modified:
Thursday, 30 July, 2026
DrAishwaryaPandit85421

‘आईटीवी फाउंडेशन’ (ITV Foundation) की चेयरपर्सन डॉ. ऐश्वर्या पंडित शर्मा का आज जन्मदिन है। डॉ. ऐश्वर्या पंडित शर्मा केवल एक शिक्षाविद् या मीडिया की आवाज नहीं हैं, बल्कि एक ऐसी शख्सियत हैं, जिनका काम इतिहास से जुड़ा है, सच्चाई में टिके हुए विचारों पर खड़ा है और जिनका मकसद समाज में बेहतर संवाद की दिशा बनाना है।

डॉ. शर्मा का ज्ञान केवल किताबों तक सीमित नहीं, बल्कि समाज के काम आ रहा है। वे बदलाव लाने के मकसद से काम करती हैं। उन्होंने ऐसा सफर तय किया है जो किसी एक पेशे या खांचे में समाया नहीं जा सकता। वे उन चंद लोगों में से हैं जो मानते हैं कि ज्ञान तब तक अधूरा है, जब तक उसे लोगों के साथ साझा न किया जाए और उसका इस्तेमाल समाज को बेहतर बनाने में न किया जाए।

डॉ. ऐश्वर्या पंडित शर्मा ने दिल्ली विश्वविद्यालय के मिरांडा हाउस इतिहास में फर्स्ट क्लास ऑनर्स के साथ स्नातक किया। इसके बाद वे लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स गईं और फिर कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी पहुंचीं, जहां उन्होंने ‘From United Provinces to Uttar Pradesh: Heartland Politics, 1947–1970’ विषय पर पीएचडी की। यह रिसर्च सिर्फ डिग्री के लिए नहीं था, बल्कि सत्ता, पहचान और भारतीय लोकतंत्र के बदलते रूपों पर एक गहन अध्ययन था।

लेकिन डॉ. शर्मा केवल शोध पत्रों और लाइब्रेरी तक सिमटी नहीं रहीं। उनके लिए ज्ञान का मतलब है जमीनी स्तर पर प्रासंगिक होना। इसी सोच के साथ वे कैम्ब्रिज से निकलकर पहले जिंदल ग्लोबल लॉ स्कूल की कक्षाओं तक पहुंचीं और फिर जन सरोकार के कामों में जुट गईं।

‘आईटीवी फाउंडेशन’ की चेयरपर्सन के रूप में उन्होंने मीडिया में नेतृत्व को एक नया रूप दिया है। आज जब मीडिया में अक्सर शोर और दिखावा हावी है, उन्होंने ठहराव, गहराई और गरिमा के साथ काम करने की परंपरा कायम की है। उनके नेतृत्व में फाउंडेशन ने ऐसे प्लेटफॉर्म्स तैयार किए हैं जहां इतिहास को केवल अतीत की बात मानकर छोड़ नहीं दिया जाता, बल्कि वर्तमान को समझने के लिए इस्तेमाल किया जाता है।

उनका पॉडकास्ट ‘Historically Speaking’ इसी सोच का शानदार उदाहरण है। इसमें वे भारत के इतिहास को आज के दौर के जटिल सवालों से जोड़ती हैं। चाहे वह आपातकाल की विरासत हो या भारत में राजनीतिक सोच की दिशा। वो न सिर्फ गहराई से शोध करती हैं, बल्कि इन बातों को निजी अनुभव और सरल भाषा में सामने लाती हैं।

उनका काम सिर्फ स्टूडियो या शिक्षण तक सीमित नहीं है। ‘आईटीवी फाउंडेशन’ के जरिये उन्होंने गोरखपुर, हरियाणा और पंजाब जैसे इलाकों में महिलाओं के स्वास्थ्य शिविर आयोजित कराए। डेटॉल के साथ मिलकर स्वच्छता अभियान चलाए और ‘We Women Want’ जैसे प्रोग्राम तैयार किए, जहां घरेलू हिंसा, मानसिक स्वास्थ्य, और बांझपन जैसे संवेदनशील मुद्दों पर खुलकर बात होती है। उनके लिए ये शब्द सिर्फ प्रचार नहीं, बल्कि जमीनी जरूरतें हैं।

उन्होंने ‘शक्ति अवॉर्ड्स’ की शुरुआत भी की है, जो हर साल उन महिलाओं को सम्मानित करता है जो बिना किसी शोहरत या मंच के, रोज़ाना जिंदगी की चुनौतियों से जूझती हैं और कामयाबी हासिल कर समाज के सामने उदाहरण पेश करती हैं। डॉ. शर्मा को यकीन है कि असली नेतृत्व अक्सर चुपचाप काम करने वालों में होता है।

उनके न्यूजरूम में ऐसा माहौल होता है, जहां हर आवाज की अहमियत होती है, चाहे वह पत्रकार हो या तकनीकी स्टाफ। वे पद और ओहदे से ज्यादा विचार और संवाद को महत्व देती हैं।

डॉ. शर्मा की सोच की सबसे खास बात है कि वे ज्ञान और संवेदना, दोनों को साथ लेकर चलती हैं। वे बातें थोपती नहीं, बातचीत करती हैं। दिखावा नहीं करतीं, बल्कि गहराई से सोचती हैं। आज के तेज रफ्तार, सतही दौर में वे यह याद दिलाती हैं कि इतिहास का नज़रिया रखना केवल पुरानी बातों में उलझना नहीं, बल्कि आगे का रास्ता समझने का तरीका है।

इस साल उन्होंने एक और अहम भूमिका निभाई है। वे हाल ही में आई किताब ‘Indian Renaissance: The Modi Decade’ की संपादक हैं। इस संकलन में उन्होंने ऐसे विचारों और लेखों को जगह दी है, जो केवल राजनीतिक घटनाओं का दस्तावेज नहीं, बल्कि भविष्य की दिशा पर सोचने का नजरिया हैं।

डॉ. ऐश्वर्या पंडित शर्मा मानती हैं कि कहानी सुनाने यानी स्टोरीटैलिंग का असली मकसद समाज को समझाना और बदलना है। वे एक ऐसी लीडर हैं जो जल्दीबाज़ी में नहीं, सोच-समझकर आगे बढ़ती हैं और सबसे बढ़कर, वे एक ऐसी महिला हैं जो इतिहास को अपने साथ आत्मविश्वास से लेकर चलती हैं।

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