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शिक्षा की भाषा पर प्रतिपक्ष की राजनीतिक आग के खतरें : आलोक मेहता

इस दृष्टि से गृह मंत्री अमित शाह ने पिछले दिनों राजभाषा विभाग की स्वर्ण जयंती समारोह में कहा कि हिंदी किसी भी भारतीय भाषा की विरोधी नहीं है, बल्कि सभी भारतीय भाषाओं की मित्र है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। 7 months ago

आलोक मेहता, पद्मश्री, वरिष्ठ पत्रकार।

राहुल गाँधी की कांग्रेस और उसके साथी तमिलनाडु के स्टालिन, महाराष्ट्र के उद्धव राज ठाकरे और शरद पंवार शिक्षा में हिंदी और भारतीय भाषाओं के महत्व का विरोध करके चुनावी लाभ पाने के लिए आक्रामक अभियान चला रहे हैं। नई शिक्षा नीति के तहत कई राज्य बच्चों को आठ वर्ष की आयु तक हिंदी और उनकी मातृभाषा में शिक्षा की व्यवस्था लागू कर दी है। मजेदार बात यह है की संस्कृत से तमिल, मराठी ,हिंदी सहित भारतीय भाषाओँ का अटूट रिश्ता रहा है। स्वतंत्रता सेनानी, संविधान निर्माता इन भाषाओँ के प्रबल समर्थक रहे हैं।

हिंदी दुनिया के 150 से ज्यादा देशों में बोली जाती है। दिलचस्प बात यह है कि हिंदी दुनिया भर के 200 से ज्यादा विश्वविद्यालयों में पढ़ाई भी जाती है। पूरी दुनिया की अगर बात करें तो तकरीबन एक अरब लोग हिंदी समझते बोलते हैं और भारत में क्षेत्रीय राजनीतिक स्वार्थ के लिए कुछ नेता जनता को भ्रमित कर भड़काने की हर संभव कोशिश कर रहे हैं।

इस दृष्टि से गृह मंत्री अमित शाह ने पिछले दिनों राजभाषा विभाग की स्वर्ण जयंती समारोह में कहा कि हिंदी किसी भी भारतीय भाषा की विरोधी नहीं है, बल्कि सभी भारतीय भाषाओं की मित्र है। हमें अपनी मातृभाषा पर गर्व भी करना चाहिए। उन्होंने कहा कि मातृभाषा में सोचने, बोलने के साथ-साथ अभिव्यक्त करने की भावना को प्रोत्साहित करना चाहिए। श्री शाह ने सभी राज्य सरकारों से आग्रह किया कि वे स्थानीय भाषाओं में चिकित्सा और इंजीनियरिंग जैसी उच्च शिक्षा प्रदान करने की पहल करें।

उन्होंने आश्वासन दिया कि केंद्र सरकार इस दिशा में राज्यों को हरसंभव सहयोग देगी। गृह मंत्री ने इस बात पर भी जोर दिया कि प्रशासनिक कार्यों में भारतीय भाषाओं का अधिक से अधिक उपयोग किया जाए। भाषाएं मिलकर देश के सांस्कृतिक आत्मगौरव को ऊंचाई तक ले जा सकती हैं। उन्होंने मानसिक गुलामी की भावना से मुक्ति पाने पर जोर दिया। शाह ने कहा कि जब तक कोई व्यक्ति अपनी भाषा पर गर्व महसूस नहीं करता और खुद को उसी भाषा में अभिव्यक्त नहीं करता, तब तक वह पूरी तरह आजाद नहीं हो सकता।

भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, यह राष्ट्र की आत्मा होती है। इसलिए भारतीय भाषाओं को जीवित और समृद्ध बनाए रखना बेहद जरूरी है। उन्होंने कहा कि सभी भारतीय भाषाओं का विकास हो, इसके लिए जरूरी है कि आने वाले समय में समर्पित प्रयास किए जाएं। भारतीय स्कूली पाठ्यक्रम के तहत बुनियादी शिक्षा में मातृभाषा को शामिल किया गया है। इसने छात्रों के लिए नए दरवाजे खोले हैं और उन्हें अधिक प्रभावी ढंग से सीखने में सक्षम बनाया है। इसने पारंपरिक और आधुनिक शिक्षा प्रणालियों के बीच की खाई को पाटने में भी मदद की है।

हिंदी भाषा भारत के बाहर 20 से अधिक देशों में बोली जाती है। भूटान नेपाल, म्यामांर, बांग्लादेश, पाकिस्तान, संयुक्त अरब अमीरात, सिंगापुर, मलेशिया, थाइलैंड, हांगकांग, फ़िजी, मॉरीशस, ट्रिनिडाड, गुयाना, सूरीनाम, इंग्लैंड, कनाडा, और अमेरिका में भी हिन्दी बोलने वालों की काफ़ी संख्या है। दक्षिण अफ्रीका, यमन, युगांडा और न्यूजीलैंड में रहने वाला एक पूरा वर्ग हिंदी बोलता है। अमेरिका, जर्मनी, ब्रिटेन जैसे कई देशों के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में हिंदी की शिक्षा और शोध कार्यों को महत्व मिल रहा है। विदेशी कंपनियां भारतीय बाजार में सफलता के लिए बड़े पैमाने पर हिंदी तथा भारतीय भाषाओँ के जानकार युवाओं को नौकरियां दे रहे हैं।

केंद्र सरकार मेडिकल इंजीनियरिंग आदि की शिक्षा हिंदी तथा भारतीय भाषाओँ की पुस्तकें तैयार करने के लिए विशेष अनुदान दे रही है। बताया जाता है कि मध्य प्रदेश में 2022 में मेडिकल कॉलेज के लिए पाठ्यक्रम हिंदी में शुरू किया गया। पहले वर्ष की तीन प्रमुख किताबें (एनाटॉमी, फिजियोलॉजी, बायोकेमिस्ट्री) हिंदी में उपलब्ध करवाई गईं। पहली बार हुआ कि कोई राज्य हिंदी में मेडिकल शिक्षा दे रहा है। उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़ और बिहार भी हिंदी में मेडिकल शिक्षा शुरू करने की योजना पर काम कर रहे हैं। हिंदी अनुवाद की राष्ट्रीय मेडिकल आयोग (NMC) द्वारा समीक्षा जारी है।तमिलनाडु और कर्नाटक में तमिल और कन्नड़ भाषा में चिकित्सा शब्दावली और कोर्सबुक्स का विकास कार्य प्रारंभ हो चुका है।

इसी तरह इंजीनियरिंग शिक्षा के लिए आईआईटी मद्रास, वाराणसी, मुंबई जैसे संस्थानों ने प्रयोग के तौर पर हिंदी, तमिल, मराठी में बी.टेक. कोर्स शुरू किए हैं।ऑल इंडिया काउंसिल फॉर टेक्निकल एजुकेशन के अनुसार 12 भारतीय भाषाओं में इंजीनियरिंग पाठ्यक्रमों का अनुवाद किया गया है। इनमें हिंदी, मराठी, तमिल, बंगाली, गुजराती, तेलुगु, उर्दू आदि शामिल हैं। मध्य प्रदेश में सरकारी इंजीनियरिंग कॉलेजों में भी हिंदी माध्यम से बी टेक पाठ्यक्रम प्रारंभ हुआ है। महाराष्ट्र में मराठी में इंजीनियरिंग शिक्षा देने के लिए कुछ विश्वविद्यालयों ने पाठ्यक्रम तैयार किए हैं। इंजीनियरिंग की पहले वर्ष की किताबें अब हिंदी, मराठी, तमिल, बांग्ला, उर्दू में उपलब्ध हैं।

खासकर ग्रामीण या कमजोर अंग्रेज़ी पृष्ठभूमि वाले छात्रों के लिए मातृभाषा में शिक्षा बहुत लाभदायक साबित हो रही है। हाँ, इतना अवश्य है कि अब भी हिंदी भाषी प्रदेशों में स्कूलों में एक अन्य भारतीय भाषा अनिवार्य रुप से पढ़ाने पढ़ने पर अधिक ध्यान नहीं दिया गया है। यहाँ तक कि फ्रेंच ,जर्मन भाषा सीखने का इंतजाम कई राज्यों के स्कूलों में है। जबकि हिंदी के साथ मराठी, गुजराती जैसी पडोसी राज्यों की भाषाएं सरलता से सीखी जा सकती है। सरकार से जमीन और अन्य सुविधाएं लेने वाले गैर सरकारी निजी स्कूलों में भी अंग्रेजी हिंदी के अलावा एक भारतीय भाषा के अध्यापन की व्यवस्था को मान्यता से जोड़ा जाना चाहिए। सारी स्वायत्तता के बावजूद राष्ट्रीय विकास और एकता के लिए कुछ कड़े नियम कानून भी होने चाहिए।

आश्चर्य की बात यह है कि वर्षों पहले त्रिभाषा नीति लागू करने का निर्णय कांग्रेस सरकार ने किया था लेकिन सही ढंग से पहले अमल नहीं किया। कांग्रेसी नेता अब क्रियान्वयन के अवसर पर इसका विरोध कर रहे हैं। उन्हें जाति, भाषा और धर्म की राजनीति से क्षेत्रीय दलों की बैसाखी मिलने की उम्मीद लगती है। लेकिन चुनावों में क्या जाति के नाम पर वे बिहार उत्तर प्रदेश में लालू यादव और अखिलेश यादव के परिवारों और पार्टियों से अधिक वोट सीटें ला सकती हैं? महाराष्ट्र में पवांर और ठाकरे परिवार समझौते चाहें कर लें, कांग्रेस को वोट नहीं दिलाने वाले हैं।

यह भी याद रखा जाना चाहिए कि पूर्व प्रधान मंत्री नरसिंहा राव दक्षिण भारतीय तेलुगु भाषी होते हुए भी हिंदी, मराठी सहित कई भाषाओं में बोलने लिखने में निपुण थे। कन्नड़ भाषी एच डी देवेगौड़ा ने प्रधान मंत्री बनने पर हिंदी सीखी और हिंदी में भाषण देने में सक्षम हुए। डॉक्टर मनमोहन सिंह अपने भाषण उर्दू या रोमन में लिखवाकर भाषण दे देते थे। लेकिन गृह मंत्री रहते कांग्रेसी चिदंबरम ने किसी कीमत पर हिंदी नहीं बोली और सरकार के राजभाषा विभाग के विभाग को प्रोत्साहित नहीं किया और न ही तमिल भाषा को आगे बढ़ाने के प्रयास किए। वह गाँधी परिवार के प्रमुख दरबारी सेनापति रहे हैं। इसलिए राहुल गाँधी को सरकार की शिक्षा नीति रास नही आ रही। उन्हें हारवर्ड, ऑक्सफ़ोर्ड को खुश रखते हुए भारतीय व्यवस्था को कोसना है।

( यह लेखक के निजी विचार हैं )


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