किसान ट्रस्ट देश के पूर्व प्रधानमंत्री व दिग्गज किसान नेता चौधरी चरण सिंह की याद में एक बार फिर पुरस्कार वितरण समारोह के आयोजन की घोषणा की है
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समाचार4मीडिया ब्यूरो
किसानों के लिए काम करने वाला संस्थान किसान ट्रस्ट देश के पूर्व प्रधानमंत्री व दिग्गज किसान नेता चौधरी चरण सिंह की याद में एक बार फिर पुरस्कार वितरण समारोह के आयोजन की घोषणा की है। ये पुरस्कार उन व्यक्तियों और संगठनों को सम्मानित करते हैं, जिन्होंने पत्रकारिता और मानवता की सेवा में असाधारण योगदान दिया है।
चौधरी चरण सिंह पुरस्कार के अंतर्गत कई श्रेणियां हैं, जो विभिन्न क्षेत्रों में योगदान को पहचान दिलाती हैं:
कृषि रत्न पुरस्कार (Krishi Ratna Award): यह पुरस्कार उन व्यक्तियों को दिया जाता है, जिन्होंने कृषि के क्षेत्र में अपनी उपलब्धियों और नवाचारों के माध्यम से एक नई मिसाल पेश की है।
किसान पुरस्कार (Kisan Puraskar): यह पुरस्कार किसानों और उनके प्रेरक कार्यों को पहचान दिलाने के लिए दिया जाता है।
कृषक उत्थान पुरस्कार (Krishak Utthaan Puraskar): इस पुरस्कार के तहत उन व्यक्तियों और संगठनों को सम्मानित किया जाता है, जिन्होंने कृषि क्षेत्र में बदलाव लाने और इस क्षेत्र को सशक्त बनाने के लिए असाधारण काम किया है।
सेवा रत्न पुरस्कार (Seva Ratna Award): यह पुरस्कार उन लोगों और संगठनों को दिया जाता है, जिन्होंने निःस्वार्थ सेवा और दूसरों के जीवन को बेहतर बनाने में योगदान दिया है।
कलम रत्न पुरस्कार (Kalam Ratna Award): इस श्रेणी में उन पत्रकारों को सम्मानित किया जाता है, जिन्होंने साहसी और प्रभावी पत्रकारिता के माध्यम से समाज पर सकारात्मक प्रभाव डाला है।
पुरस्कार की स्थापना और महत्व:
इस पुरस्कार की स्थापना वर्ष 2000 में की गई थी। इसका उद्देश्य भारतीय कृषि को बढ़ावा देने वाले लेखन, विश्लेषण और रिपोर्टिंग के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान देने वाले व्यक्तियों और संगठनों को पहचानना और प्रोत्साहित करना है।
चौधरी चरण सिंह पुरस्कार, न केवल कृषि पत्रकारिता को प्रोत्साहित करता है, बल्कि समाज के उन हीरोज को भी सम्मानित करता है, जो निःस्वार्थ सेवा और नवाचारों के माध्यम से समाज और देश के उत्थान में योगदान दे रहे हैं।
किसान ट्रस्ट के अध्यक्ष डॉ. यशवीर सिंह ने एक बयान में कहा कि यह सम्मान समारोह चौधरी चरण सिंह की जयन्ती (23 दिसम्बर) के उपलक्ष्य में हर साल दिसंबर माह में आयोजित किया जाता है। इस बार यह 21 दिसंबर को आयोजित किया जाएगा।
बयान में कहा गया है कि इन पुरस्कारों का मकसद पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह द्वारा किसान हित में किए गए कार्यों के बारे में लोगों को बताना है। पुरस्कारों के लिए नामांकन की अंतिम तिथि को बढ़ाकर 10 दिसंबर कर दी गई है। किसान ट्रस्ट को नामांकन ई-मेल और पत्र के माध्यम से भेजा जा सकता है।
दिल्ली हाई कोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) सूचना का अधिकार (RTI) कानून के तहत 'पब्लिक अथॉरिटी' (सार्वजनिक प्राधिकरण) है।
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Samachar4media Bureau
दिल्ली हाई कोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) सूचना का अधिकार (RTI) कानून के तहत 'पब्लिक अथॉरिटी' (सार्वजनिक प्राधिकरण) है। इसका मतलब है कि अब NSE पर भी RTI Act के प्रावधान लागू होंगे और कानून के तहत उससे जानकारी मांगी जा सकेगी।
जस्टिस सी. हरि शंकर और ओम प्रकाश शुक्ला की खंडपीठ ने वर्ष 2010 में दिए गए एकल पीठ के फैसले को बरकरार रखते हुए NSE की अपील खारिज कर दी।
हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि वह एकल पीठ के इस निष्कर्ष से पूरी तरह सहमत है कि NSE, RTI Act की धारा 2(h) के तहत "अथॉरिटी" यानी सार्वजनिक प्राधिकरण की श्रेणी में आता है।
क्या था मामला?
साल 2010 में तत्कालीन जस्टिस संजीव खन्ना ने अपने फैसले में कहा था कि भले ही NSE की स्थापना कंपनी अधिनियम के तहत एक निजी कंपनी के रूप में हुई हो, लेकिन Securities Contracts (Regulation) Act, 1956 के तहत उसे स्टॉक एक्सचेंज के रूप में मिली मान्यता उसे सार्वजनिक कार्य करने वाली संस्था बना देती है।
कोर्ट ने यह भी कहा था कि NSE को मिली यह मान्यता पहले केंद्र सरकार और बाद में SEBI के जरिए दी गई। इसलिए यह संस्था RTI कानून के तहत सार्वजनिक प्राधिकरण मानी जाएगी। साथ ही, एकल पीठ ने यह भी माना था कि NSE पर केंद्र सरकार का नियंत्रण है।
NSE ने क्या दलील दी?
NSE ने इस फैसले को चुनौती देते हुए कहा था कि वह Companies Act, 1956 के तहत पंजीकृत एक निजी कंपनी है, इसलिए उसे सरकारी संस्था या सार्वजनिक प्राधिकरण नहीं माना जा सकता।
हालांकि, दिल्ली हाई कोर्ट की खंडपीठ ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया और कहा कि एकल पीठ का फैसला पूरी तरह तर्कसंगत और कानून के अनुरूप है। कोर्ट ने कहा कि उसके निष्कर्षों में हस्तक्षेप करने की कोई वजह नहीं है।
इस फैसले के साथ ही दिल्ली हाई कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि NSE सूचना का अधिकार कानून के दायरे में आएगा और उससे RTI के तहत जानकारी मांगी जा सकेगी।
दिल्ली हाई कोर्ट ने मशहूर संगीतकार इलैयाराजा को बड़ा झटका देते हुए सारेगामा इंडिया लिमिटेड के पक्ष में पहले से जारी अंतरिम रोक (इंटरिम इंजंक्शन) को हटाने से इनकार कर दिया है।
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Samachar4media Bureau
दिल्ली हाई कोर्ट ने मशहूर संगीतकार इलैयाराजा को बड़ा झटका देते हुए सारेगामा इंडिया लिमिटेड के पक्ष में पहले से जारी अंतरिम रोक (इंटरिम इंजंक्शन) को हटाने से इनकार कर दिया है। अदालत ने कहा कि फिलहाल यह रोक जारी रहेगी।
जस्टिस तुषार राव गेडेला ने इलैयाराजा की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने फरवरी में जारी अंतरिम आदेश को रद्द करने की मांग की थी। इस आदेश के तहत इलैयाराजा को उन गीतों और संगीत रचनाओं का इस्तेमाल करने, उनका लाइसेंस जारी करने या उन पर स्वामित्व का दावा करने से रोका गया है, जिन पर सारेगामा अपना कॉपीराइट होने का दावा करती है।
यह मामला 134 फिल्मों के गीतों और संगीत रचनाओं से जुड़ा है। इनमें Annakkili, 16 Vayathiniley, Kavikkuyil, Bharathi, Pallavi Anu Pallavi, Mullum Malarum, Raaja Paarvai, Netrikkann और Kalyanaraman जैसी कई चर्चित फिल्में शामिल हैं।
सारेगामा ने अदालत में दायर अपनी याचिका में कहा था कि कंपनी की स्थापना वर्ष 1901 में हुई थी और पहले इसका नाम The Gramophone Company of India Limited था। कंपनी का दावा है कि वर्ष 1976 से 2001 के बीच उसने कई फिल्म निर्माताओं के साथ समझौते किए थे, जिनके तहत इन फिल्मों के गीतों की साउंड रिकॉर्डिंग, संगीत और साहित्यिक रचनाओं के कॉपीराइट उसे सौंपे गए थे।
सारेगामा का यह भी कहना है कि उसके पास तमिल, हिंदी, मलयालम, कन्नड़, तेलुगु सहित कई भाषाओं के गीतों का बड़ा कैटलॉग है और वह इनका लाइसेंस तीसरे पक्ष को देती है।
कंपनी के मुताबिक, फरवरी 2026 की शुरुआत में उसे पता चला कि उसके कॉपीराइट वाले गीत Amazon Music, iTunes और JioSaavn जैसे प्लेटफॉर्म पर कथित तौर पर बिना अनुमति इस्तेमाल किए जा रहे हैं। साथ ही, इलैयाराजा इन रचनाओं पर अपना स्वामित्व भी जता रहे थे।
सारेगामा ने यह भी बताया कि इलैयाराजा ने 13 जनवरी 2026 को एक कानूनी नोटिस जारी कर दावा किया था कि जिन संगीत रचनाओं को उन्होंने तैयार, कंपोज, अरेंज और ऑर्केस्ट्रेट किया है, उन पर उनका अधिकार है। इनमें वे रचनाएं भी शामिल थीं, जो इस मुकदमे का हिस्सा हैं।
इसी आधार पर हाई कोर्ट ने 13 फरवरी 2026 को अंतरिम राहत देते हुए कहा था कि पहली नजर में सारेगामा का पक्ष मजबूत दिखाई देता है। अदालत ने माना था कि यदि कंपनी को अंतरिम संरक्षण नहीं दिया गया, तो उसे अपूरणीय नुकसान हो सकता है। इसलिए इलैयाराजा और उनके प्रतिनिधियों को इन गीतों का व्यावसायिक इस्तेमाल करने, लाइसेंस जारी करने या उन पर स्वामित्व का दावा करने से रोक दिया गया था।
बाद में इलैयाराजा ने इस अंतरिम आदेश को हटाने की मांग करते हुए अदालत का रुख किया, लेकिन बुधवार को दिल्ली हाई कोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी। इसके साथ ही सारेगामा के पक्ष में जारी अंतरिम रोक फिलहाल बरकरार रहेगी।
पत्रकार शादमा शेख (Shadma Shaikh) ने चैनल न्यूज एशिया (Channel News Asia) में साउथ एशिया कॉरेस्पोंडेंट के रूप में नई जिम्मेदारी संभाली है।
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वरिष्ठ पत्रकार शादमा शेख (Shadma Shaikh) ने चैनल न्यूज एशिया (Channel News Asia-CNA) में "साउथ एशिया कॉरेस्पोंडेंट (South Asia Correspondent)" के रूप में नई पारी की शुरुआत की है। इसकी जानकारी उन्होंने लिंक्डइन (LinkedIn) पर एक पोस्ट के जरिए साझा की।
शादमा शेख (Shadma Shaikh) बेंगलुरु (Bengaluru) में ही कार्यरत रहेंगी, जहां चैनल न्यूज एशिया (Channel News Asia-CNA) अपना पहला भारत ब्यूरो (India Bureau) स्थापित कर रहा है।
अपने लिंक्डइन (LinkedIn) पोस्ट में उन्होंने कहा कि उनके करियर का बड़ा हिस्सा टेक्नोलॉजी (Technology) रिपोर्टिंग पर केंद्रित रहा है। उन्होंने लिखा कि ऐसे समय में भारत (India) पर रिपोर्टिंग करने का अवसर मिलना उनके लिए उत्साहजनक है, जब देश के आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (Artificial Intelligence-AI), डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर (Digital Infrastructure), मैन्युफैक्चरिंग (Manufacturing), क्लाइमेट (Climate), हेल्थकेयर (Healthcare) और जियोपॉलिटिक्स (Geopolitics) से जुड़े फैसले एशिया (Asia) और दुनिया भर की चर्चाओं को प्रभावित कर रहे हैं।
शादमा शेख (Shadma Shaikh) सोशल इम्पैक्ट न्यूज़रूम (Social Impact Newsroom) फैक्टरडेली (FactorDaily) की सह-संस्थापक (Co-Founder) भी हैं। टेक्नोलॉजी और डिजिटल इकोसिस्टम की रिपोर्टिंग में उनका लंबा अनुभव रहा है।
भारत के वरिष्ठ पत्रकार आर. राजगोपाल का पासपोर्ट नवीनीकरण (Passport Renewal) वोटर लिस्ट से नाम हटने के कारण अटक गया है। इस मामले को लेकर एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने गहरी चिंता जताई है
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Samachar4media Bureau
भारत के वरिष्ठ पत्रकार आर. राजगोपाल का पासपोर्ट नवीनीकरण (Passport Renewal) वोटर लिस्ट से नाम हटने के कारण अटक गया है। इस मामले को लेकर एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने गहरी चिंता जताई है और कहा है कि यह मामला दिखाता है कि देश के लाखों लोग Special Intensive Revision (SIR) प्रक्रिया की वजह से किस तरह की परेशानियों का सामना कर रहे हैं।
राजगोपाल, जो पहले The Telegraph के संपादक रह चुके हैं, का कहना है कि पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण (SIR) के दौरान उनका नाम वोटर लिस्ट से हटा दिया गया। इसके बाद उनके पासपोर्ट के नवीनीकरण की प्रक्रिया भी प्रभावित हो गई।
क्या है पूरा मामला?
भारतीय निर्वाचन आयोग ने 4 नवंबर 2025 से 12 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में Special Intensive Revision (SIR) अभियान शुरू किया था। इसका उद्देश्य अयोग्य मतदाताओं की पहचान कर मतदाता सूची को अपडेट करना बताया गया था।
हालांकि, इस प्रक्रिया को लेकर लगातार विवाद बना हुआ है। आलोचकों का आरोप है कि इस अभियान के दौरान लाखों योग्य मतदाताओं के नाम भी वोटर लिस्ट से हटा दिए गए, जबकि चुनाव आयोग इन आरोपों को खारिज करता रहा है।
अब तक इस प्रक्रिया के तहत करीब 6 करोड़ मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटाए जा चुके हैं। इनमें से लगभग 90 लाख नाम केवल पश्चिम बंगाल से हटाए गए हैं। राजगोपाल भी उन हजारों लोगों में शामिल हैं जिन्होंने इस फैसले को अदालत में चुनौती दी है।
25 साल से एक ही इलाके में रह रहे थे
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, राजगोपाल ने बताया कि वह पिछले 25 वर्षों से कोलकाता के बालीगंज इलाके में रह रहे हैं। उन्होंने कहा कि वर्ष 2010 से वह नियमित मतदाता रहे हैं और 2016 से 2023 तक कोलकाता के प्रमुख दैनिक अखबार 'द टेलीग्राफ' के संपादक रहे। इसके बावजूद उनका नाम इसलिए हटा दिया गया क्योंकि उनके और उनके पिता का नाम वर्ष 2002 की मतदाता सूची में नहीं मिला।
उन्होंने बताया कि उन्होंने अपना मैट्रिक प्रमाणपत्र भी जमा किया, लेकिन इसके बावजूद उनका नाम दोबारा नहीं जोड़ा गया। फिलहाल उनकी अपील संबंधित ट्रिब्यूनल में लंबित है।
पासपोर्ट नवीनीकरण भी रुका
राजगोपाल का कहना है कि बाद में अधिकारियों ने उन्हें बताया कि कोलकाता पुलिस पासपोर्ट नवीनीकरण के लिए आवश्यक पुलिस सत्यापन (Police Verification) पूरा नहीं कर सकी, क्योंकि उनका नाम वोटर लिस्ट में नहीं था।
उन्होंने कहा कि उन्हें यह बात हैरान करने वाली लगी, क्योंकि उन्हें ऐसा कोई सार्वजनिक नियम नहीं मिला जिसमें पासपोर्ट नवीनीकरण के लिए वोटर आईडी को अनिवार्य दस्तावेज बताया गया हो। इस पूरे मामले पर निर्वाचन आयोग की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है।
एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने क्या कहा?
एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने अपने बयान में कहा कि अगर एक जाने-माने पत्रकार और पूर्व संपादक के साथ ऐसा हो सकता है, तो आम नागरिकों, खासकर समाज के कमजोर वर्गों की स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है।
गिल्ड ने कहा कि यह मामला सिर्फ एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि उन लाखों भारतीयों की परेशानी को सामने लाता है जिनके नाम SIR प्रक्रिया के दौरान मतदाता सूची से हटाए गए हैं।
सोशल मीडिया पर मिला समर्थन
राजगोपाल के मामले को सोशल मीडिया पर भी व्यापक समर्थन मिला है। वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा कि वह राजगोपाल के साथ खड़े हैं। उन्होंने कहा कि सबसे डराने वाली बात यह है कि ऐसा किसी के साथ भी हो सकता है।
वहीं, सुप्रिया श्रीनेत ने आरोप लगाया कि राजगोपाल को उनकी पत्रकारिता और जवाबदेही की मांग की कीमत चुकानी पड़ रही है।
केरल से भी उठा मामला
इस बीच वी.डी. सतीशन ने पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी से इस मामले में हस्तक्षेप करने की अपील की है। उन्होंने कहा कि कोलकाता पुलिस की प्रतिकूल सत्यापन रिपोर्ट की वजह से राजगोपाल का पासपोर्ट नवीनीकरण रुक गया। उनके मुताबिक, वोटर लिस्ट से नाम हटने के कारण ही यह स्थिति पैदा हुई है। उन्होंने यह भी बताया कि राजगोपाल ने अपना नाम दोबारा मतदाता सूची में शामिल कराने के लिए अपील दायर कर दी है।
वहीं, पिनरयी विजयन ने भी फेसबुक पोस्ट के जरिए इस मामले पर हैरानी जताई। उन्होंने कहा कि SIR प्रक्रिया के कारण राजगोपाल का नाम वोटर लिस्ट से हटा और इसी वजह से उनका पासपोर्ट भी नवीनीकृत नहीं हो सका।
फूड ब्रैंड Del Monte India ने अपनी क्रिएटिव कम्युनिकेशन की जिम्मेदारी Creativeland Asia की दिल्ली टीम को सौंप दी है।
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फूड ब्रैंड Del Monte India ने अपनी क्रिएटिव कम्युनिकेशन की जिम्मेदारी Creativeland Asia की दिल्ली टीम को सौंप दी है। यह फैसला कई एजेंसियों के बीच हुए मूल्यांकन (Multi-Agency Evaluation) के बाद लिया गया।
इस नई साझेदारी के तहत Creativeland Asia, Del Monte India के लिए ब्रैंड और प्रॉडक्ट कम्युनिकेशन की पूरी रणनीति तैयार करेगी। एजेंसी का फोकस अलग-अलग प्रोडक्ट कैटेगरी के लिए क्रिएटिव कैंपेन विकसित करने, ग्राहकों के साथ ब्रैंड की मजबूत पहचान बनाने और Del Monte की फूड एक्सपर्टीज और विरासत को और मजबूती से पेश करने पर रहेगा।
इस साझेदारी पर Creativeland Asia के चीफ बिजनेस ऑफिसर मयूर चंद्रा ने कहा कि Del Monte एक ऐसा ब्रैंड है, जिसकी वैश्विक विरासत काफी मजबूत है और जो आज भी ग्राहकों के बीच अपनी प्रासंगिकता बनाए हुए है।
उन्होंने कहा कि भारत में लोगों की खाने-पीने की पसंद लगातार बदल रही है। ऐसे में उपभोक्ता ऐसे ब्रैंड चाहते हैं जो किचन में नए प्रयोग करने की प्रेरणा दें और रोजमर्रा के खाने को ज्यादा स्वादिष्ट और खास बनाएं। उनके मुताबिक, Del Monte की विशेषज्ञता, बेहतर प्रोडक्ट्स और बेहतरीन भोजन के अनुभव को एक अलग और प्रभावशाली कहानी के रूप में पेश करने का अच्छा अवसर है। उन्होंने कहा कि कंपनी Del Monte के साथ मिलकर ब्रैंड की अगली विकास यात्रा का हिस्सा बनने को लेकर उत्साहित है।
वहीं, Del Monte Foods की डिप्टी जनरल मैनेजर (मार्केटिंग) किरणप्रीत कौर ने कहा कि ग्राहकों की अपेक्षाएं लगातार बदल रही हैं। ऐसे में कंपनी की खासियतों को ऐसे तरीके से पेश करना जरूरी है जो लोगों के लिए प्रासंगिक भी हो और उन्हें प्रेरित भी करे।
उन्होंने कहा कि Creativeland Asia ने कंपनी के विजन और फूड कैटेगरी की अच्छी समझ दिखाई है। उन्हें उम्मीद है कि दोनों मिलकर ऐसे ब्रैंड कैंपेन तैयार करेंगे जो ग्राहकों पर मजबूत प्रभाव छोड़ें।
कंपनी के अनुसार, इस पूरे अकाउंट का संचालन Creativeland Asia के दिल्ली कार्यालय से किया जाएगा।
मान लीजिए आपने गूगल पर सवाल सर्च किया और AI बॉक्स में तुरंत जवाब मिल गया, बिना किसी लिंक पर जाए आपने पढ़ा और पेज बंद कर दिया—यही बदलाव अब पब्लिशर्स के लिए बड़ी चुनौती है।
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Vikas Saxena
गूगल ने मई 2024 में अमेरिका में AI Overview (AIO) लॉन्च किया था। मई 2025 तक यह फीचर 200 से ज्यादा देशों और 40 भाषाओं तक पहुंच गया। इसमें भारत की हिंदी, तमिल और तेलुगू जैसी भाषाएं भी शामिल हैं। नतीजा? मीडिया इंडस्ट्री के लिए बड़ा झटका।
प्यू रिसर्च सेंटर (Pew Research Center) ने मार्च 2025 में अमेरिका के 900 लोगों की इंटरनेट इस्तेमाल करने की आदतों को ट्रैक किया और गूगल पर की गई 68 हजार से ज्यादा सर्च का विश्लेषण किया। रिपोर्ट में सामने आया कि जब AI Overview दिखाई देता है, तो लोग सिर्फ 8 फीसदी मामलों में ही किसी लिंक पर क्लिक करते हैं। जबकि बिना AI Overview के यह आंकड़ा 15 फीसदी था। यानी क्लिक में करीब 47 फीसदी की गिरावट आई। सबसे बड़ी बात यह कि AI Overview में दिए गए स्रोतों पर सिर्फ 1 फीसदी लोगों ने क्लिक किया।
Similarweb के आंकड़ों के मुताबिक, मई 2024 से मई 2025 के बीच खबरों से जुड़ी सर्च में “जीरो-क्लिक” सर्च का हिस्सा 56 फीसदी से बढ़कर 69 फीसदी हो गया। आसान शब्दों में कहें तो खबरों से जुड़ी 10 में से करीब 7 सर्च ऐसी रहीं, जिनमें लोग किसी भी वेबसाइट पर नहीं पहुंचे।
वहीं, रॉयटर्स इंस्टीट्यूट फॉर द स्टडी ऑफ जर्नलिज्म (Reuters Institute for the Study of Journalism) की जनवरी 2026 की रिपोर्ट और ज्यादा चिंता बढ़ाने वाली है। दुनिया के 51 देशों के 280 मीडिया लीडर्स का सर्वे किया गया, जिनमें 64 एडिटर-इन-चीफ और 64 चीफ एग्जिक्यूटिव ऑफिसर्स (CEO) शामिल थे। उनका मानना है कि अगले तीन साल में सर्च इंजन से आने वाला ट्रैफिक औसतन 43 फीसदी तक गिर सकता है।
चार्टबीट ने 2,500 से ज्यादा न्यूज वेबसाइट्स के आंकड़ों का अध्ययन किया। इसमें पाया गया कि नवंबर 2024 से नवंबर 2025 के बीच गूगल सर्च से आने वाले विजिटर्स में 33 फीसदी की गिरावट आई। वहीं, गूगल डिस्कवर से आने वाला ट्रैफिक 21 फीसदी घट गया। अमेरिका में यह गिरावट और ज्यादा, यानी 38 फीसदी रही।
छोटे पब्लिशर्स का हाल सबसे बुरा
इस नुकसान का असर सभी पर एक जैसा नहीं पड़ा। बड़े पब्लिशर्स- जैसे The New York Times, जिसके 2025 के आखिर तक 1.278 करोड़ सब्सक्राइबर्स थे, अभी भी किसी तरह टिके हुए हैं। लेकिन छोटे पब्लिशर्स को सबसे बड़ा झटका लगा। 2025 में छोटे पब्लिशर्स का गूगल रेफरल ट्रैफिक करीब 60 फीसदी तक गिर गया, जबकि बड़े पब्लिशर्स में यह गिरावट 22 फीसदी रही।
Business Insider का ऑर्गेनिक सर्च ट्रैफिक अप्रैल 2022 से अप्रैल 2025 के बीच 55 फीसदी तक गिर गया। हालत ऐसी हुई कि कंपनी को मई 2025 में अपने 21 फीसदी एम्प्लॉयीज की छंटनी करनी पड़ी।
वहीं HuffPost की डेस्कटॉप और मोबाइल साइट्स पर सर्च से आने वाले विजिटर्स की संख्या आधी रह गई। यहां तक कि The New York Times का सर्च ट्रैफिक शेयर भी 2022 के 44 फीसदी से घटकर 2025 में 37 फीसदी पर आ गया।
DMG Media , जो MailOnline और Metro जैसे बड़े ब्रिटिश प्रकाशन चलाती है, ने सितंबर 2025 में बताया कि कुछ खास सर्च में क्लिक-थ्रू रेट 89 फीसदी तक गिर गई।
शिक्षा प्लेटफॉर्म Chegg को तो और बड़ा नुकसान हुआ। जनवरी 2024 से जनवरी 2025 के बीच कंपनी का गैर-सब्सक्राइबर ट्रैफिक 49 फीसदी तक गिर गया। इसके बाद कंपनी ने गूगल के खिलाफ प्रतिस्पर्धा विरोधी कानून (एंटीट्रस्ट) का मुकदमा भी दायर कर दिया।
Google की AI और SEO का बदलता मॉडल
कभी SEO यानी सर्च इंजन ऑप्टिमाइजेशन का सीधा मतलब होता था- सही कीवर्ड ढूंढो, अच्छा कंटेंट लिखो, गूगल पर ऊपर जगह बनाओ, ट्रैफिक आएगा और विज्ञापनों से कमाई होगी। यह मॉडल कई सालों तक चलता रहा। लेकिन 2026 तक आते-आते यह मॉडल बुरी तरह बदल चुका है।
Seer Interactive ने जून 2024 से सितंबर 2025 के बीच 42 संस्थाओं की 3,119 जानकारी आधारित सर्च को ट्रैक किया। रिपोर्ट में पाया गया कि जिन सर्च में AI Overview दिखाई देता था, वहां ऑर्गेनिक क्लिक-थ्रू रेट 1.76 फीसदी से गिरकर सिर्फ 0.61 फीसदी रह गई। यानी करीब 61 फीसदी की गिरावट। वहीं पेड क्लिक-थ्रू रेट 19.7 फीसदी से टूटकर 6.34 फीसदी पर आ गई, यानी 68 फीसदी की भारी गिरावट।
Semrush के आंकड़ों के मुताबिक, 2025 की तीसरी तिमाही तक गूगल की करीब 20 से 25 फीसदी सर्च में AI Overview दिखने लगा था। वहीं Gartner का अनुमान है कि 2026 के आखिर तक ऑर्गेनिक सर्च ट्रैफिक का 25 फीसदी हिस्सा AI चैटबॉट्स और वॉइस असिस्टेंट्स की तरफ चला जाएगा।
भारत में भी तेजी से बदलाव दिख रहा है। AI सर्च इंजन Perplexity ने 2024-25 के दौरान 640 फीसदी की बढ़त दर्ज की, खासकर Airtel के साथ साझेदारी के बाद। वहीं ChatGPT अब भारत में प्रोफेशनल्स के बीच दूसरा सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाला प्लेटफॉर्म बन चुका है।
टियर-2 और टियर-3 शहरों में 58 फीसदी सर्च अब आवाज के जरिए हो रही हैं। लोग हिंदी, तमिल, तेलुगू और बंगाली जैसी भाषाओं में सवाल पूछ रहे हैं।
इस बदलाव ने SEO इंडस्ट्री की दिशा ही बदल दी है। पहले कीवर्ड रैंकिंग सबसे ज्यादा मायने रखती थी, लेकिन अब “जनरेटिव इंजन ऑप्टिमाइजेशन” यानी GEO का दौर शुरू हो गया है। इसका मतलब है कि AI के जवाबों में आपके ब्रैंड या कंटेंट का जिक्र हो, चाहे यूजर आपकी वेबसाइट पर आए या नहीं।
अहरेफ्स की दिसंबर 2025 की स्टडी के मुताबिक, जिन कीवर्ड्स पर AI Overview दिखती है, वहां पहले नंबर पर आने वाली वेबसाइट की क्लिक-थ्रू रेट में 34.5 फीसदी तक गिरावट दर्ज की गई।
Ad Revenue की तस्वीर: पब्लिशर्स का दर्द
पब्लिशर्स भी चुप नहीं बैठे हैं। वे इस संकट से निपटने के लिए कई मोर्चों पर लड़ाई लड़ रहे हैं।
बड़े पब्लिशर्स अब AI कंपनियों के साथ समझौते कर रहे हैं। मतलब- AI कंपनियां उनका कंटेंट इस्तेमाल करें और बदले में उन्हें पैसा दें।
News Corp ने OpenAI के साथ 5 साल की 25 करोड़ डॉलर से ज्यादा की डील की है। वहीं The New York Times को Amazon की एलेक्सा और रूफस शॉपिंग असिस्टेंट सेवाओं से हर साल करीब 2 से 2.5 करोड़ डॉलर मिल रहे हैं।
इसके अलावा Associated Press, Time, Fortune, CNN, The Washington Post और Condé Nast जैसी कई बड़ी मीडिया कंपनियां किसी न किसी AI कंपनी के साथ समझौते कर चुकी हैं।
लेकिन यह मॉडल फिलहाल सिर्फ बड़े खिलाड़ियों के लिए फायदेमंद दिख रहा है। मिड-साइज पब्लिशर्स को 10 लाख से 50 लाख डॉलर तक की डील मिल सकती है, जो उनके ट्रैफिक नुकसान की भरपाई के लिए काफी नहीं है। वहीं छोटे पब्लिशर्स और स्वतंत्र कंटेंट क्रिएटर्स के लिए अभी ऐसे समझौतों के दरवाजे लगभग बंद हैं।
इसी बीच Cloudflare ने “पे पर क्रॉल” नाम का एक मार्केटप्लेस शुरू किया है। इसमें पब्लिशर्स तय कर सकते हैं कि AI कंपनियां उनके कंटेंट को स्कैन करने के बदले कितना पैसा देंगी।
जून 2025 में Cloudflare के आंकड़ों ने एक चौंकाने वाली तस्वीर दिखाई। गूगल हर 9 से 14 पेज स्कैन करने पर एक विजिटर वेबसाइट को भेजता है। लेकिन OpenAI करीब 1,700 पेज स्कैन करने के बाद सिर्फ एक विजिटर भेजता है। वहीं Anthropic का अनुपात तो 73,000 पेज पर सिर्फ एक विजिटर का रहा।
यही वजह है कि दुनिया की 79 फीसदी बड़ी न्यूज वेबसाइट्स ने कम से कम एक AI ट्रेनिंग बॉट को ब्लॉक कर दिया है।
जो पब्लिशर्स AI की मार से बचे हैं, उनका एक कॉमन सिक्रेट है- उन्होंने गूगल पर निर्भरता कम की।
The New Yorker ने 2025 में रिकॉर्ड कमाई, रिकॉर्ड मुनाफा और रिकॉर्ड सब्सक्राइबर्स हासिल किए। वहीं The New York Times के 2025 के आखिर तक 1.278 करोड़ सब्सक्राइबर्स हो चुके थे। कंपनी का लक्ष्य 2027 तक इसे बढ़ाकर 1.5 करोड़ तक पहुंचाने का है।
Time मैगजीन का अनुमान है कि 2026 में उसकी कुल कमाई का 50 फीसदी हिस्सा इवेंट्स से आएगा, जबकि 2023 में यह हिस्सा 28 फीसदी था। वहीं Bloomberg Media के ग्लोबल फोरम्स से 2025 में स्पॉन्सरशिप कमाई में 30 फीसदी की बढ़त दर्ज की गई।
रॉयटर्स इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट के मुताबिक, 76 फीसदी मीडिया लीडर्स का कहना है कि अब वे चाहते हैं कि उनके कर्मचारी “क्रिएटर्स” की तरह काम करें। यानी सिर्फ खबर लिखना नहीं, बल्कि ऑडियंस के साथ सीधा जुड़ाव बनाना भी जरूरी हो गया है।
इसके अलावा 50 फीसदी पब्लिशर्स अब क्रिएटर पार्टनरशिप्स पर काम कर रहे हैं, ताकि नए दर्शकों तक पहुंच बनाई जा सके।
ChatGPT से Traffic: उम्मीद कम, हकीकत और कम
कुछ लोगों को लगता है कि अगर गूगल से ट्रैफिक कम हो रहा है, तो उसकी भरपाई ChatGPT जैसे AI प्लेटफॉर्म्स से हो जाएगी।
सितंबर से नवंबर 2025 के बीच ChatGPT ने पब्लिशर्स को करीब 1.2 अरब आउटगोइंग रेफरल्स भेजे, जो पिछले साल के मुकाबले 52 फीसदी ज्यादा थे। सुनने में यह आंकड़ा अच्छा लगता है, लेकिन असली तस्वीर अलग है।
कंडक्टर की रिसर्च के मुताबिक, सभी AI प्लेटफॉर्म्स मिलकर भी पब्लिशर्स के कुल ट्रैफिक का सिर्फ 1 फीसदी हिस्सा ही भेज पा रहे हैं।
वहीं रॉयटर्स इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट बताती है कि अकेला गूगल, ChatGPT के मुकाबले 500 गुना ज्यादा रेफरल्स भेजता है। अगर गूगल सर्च और गूगल डिस्कवर को साथ जोड़ दें, तो यह अंतर 1,300 गुना तक पहुंच जाता है।
यानी AI सर्च अभी नया ट्रैफिक स्रोत नहीं बन पाया है। उल्टा, उसने पब्लिशर्स का पुराना ट्रैफिक कम कर दिया है।
भारत के पब्लिशर्स के लिए क्या मायने रखता है?
भारत में internet users की संख्या 2025 के अंत तक 1.03 billion यानी एक अरब तीन करोड़ पार कर गई। यहाँ digital news market 2026 के अंत तक $1 billion revenue generate करने का अनुमान है।
लेकिन AI का असर भारत पर भी उतना ही गहरा है। Perplexity अब India में US से भी बड़ा market बन गया है। ChatGPT फरवरी 2026 तक 900 मिलियन वीकली एक्टिव यूजर्स तक पहुंच गया और भारत में भी 10 करोड़ weekly users। Google AI Overviews 40 भाषाओं में हैं जिनमें हिंदी भी शामिल है।
भारत के हिंदी न्यूज़ पोर्टल्स, regional language sites और छोटे digital पब्लिशर्स — जो Google Search से अपना ज़्यादातर traffic पाते थे — अब एक बड़े transition के मुहाने पर खड़े हैं।
असली सवाल: कंटेंट बनाने वाले को पैसा कौन देगा?
यह सिर्फ बिजनेस मॉडल का मामला नहीं है, बल्कि पत्रकारिता के अस्तित्व का सवाल बन चुका है।
अगर पब्लिशर्स कमाई नहीं कर पाएंगे, तो वे रिपोर्टर्स नहीं रख पाएंगे। रिपोर्टर्स नहीं होंगे, तो ग्राउंड रिपोर्टिंग कम हो जाएगी। और जब ग्राउंड रिपोर्टिंग ही नहीं होगी, तो एआई के पास इस्तेमाल करने के लिए ओरिजिनल कंटेंट भी नहीं बचेगा। बिना ओरिजिनल कंटेंट के एआई सिस्टम भी ज्यादा समय तक टिक नहीं पाएंगे।
यानी यह एक खतरनाक चक्र बनता जा रहा है, जो पूरे कंटेंट इकोसिस्टम को नुकसान पहुंचा सकता है।
Cloudflare के मुख्य कार्यकारी अधिकारी Matthew Prince ने जुलाई 2025 में पब्लिशर्स को ऐसे टूल्स दिए, जिनकी मदद से वे एआई बॉट्स को ब्लॉक कर सकते हैं। नए Cloudflare ग्राहकों के लिए यह सुविधा डिफॉल्ट रूप से शुरू की गई।
इसका मतलब है कि अब पब्लिशर्स अपने कंटेंट को एआई कंपनियों के लिए मुफ्त में उपलब्ध नहीं कराना चाहते। वे अपने कंटेंट की अहमियत और कमी दोनों बनाए रखना चाहते हैं। लेकिन गूगल को पूरी तरह ब्लॉक करना आसान नहीं है, क्योंकि सर्च बाजार में उसकी हिस्सेदारी 90 फीसदी से ज्यादा है। अगर कोई पब्लिशर गूगल को ब्लॉक कर दे, तो उसकी वेबसाइट इंटरनेट पर लगभग गायब जैसी हो सकती है।
आगे का रास्ता
एक युग का अंत, एक नई शुरुआत
जिस क्लिक इकॉनमी पर पिछले 20 साल की डिजिटल पत्रकारिता टिकी हुई थी, वह अब तेजी से बदल रही है। AI ने सामान्य कंटेंट को लगभग एक जैसी चीज बना दिया है। अब साधारण सवालों के जवाब AI खुद देने लगा है।
ऐसे में वही पत्रकारिता टिक पाएगी, जिसमें ओरिजिनल रिपोर्टिंग हो, एक्सक्लूसिव आंकड़े हों, विशेषज्ञों का विश्लेषण हो और ऐसा कंटेंट हो जिसे AI आसानी से कॉपी न कर सके।
2026 की मीडिया दुनिया की सबसे बड़ी चिंता यही है — “इनविजिबल पब्लिशर”। यानी वह पब्लिशर जो कंटेंट तो बना रहा है, जवाब भी उसी के कंटेंट से तैयार हो रहे हैं, लेकिन लोग उसकी वेबसाइट तक पहुंच ही नहीं रहे।
हालांकि इतिहास बताता है कि हर बड़ी तकनीकी क्रांति के समय मीडिया इंडस्ट्री ने खुद को बदला है। जब रेडियो आया तो अखबारों को डर लगा। टीवी आया तो रेडियो को खतरा महसूस हुआ। इंटरनेट आया तो टीवी इंडस्ट्री चिंतित हो गई। लेकिन हर दौर में मीडिया ने खुद को नए तरीके से ढाला।
अब AI सर्च के दौर में भी पब्लिशर्स को खुद को बदलना होगा। सिर्फ गूगल के हिसाब से नहीं, बल्कि अपने पाठकों और दर्शकों की जरूरतों के हिसाब से।
अकाल तख्त सचिवालय के मीडिया सलाहकार जसकरण सिंह ने हरियाणा पुलिस द्वारा कथित फर्जी फॉरेंसिक रिपोर्ट तैयार किए जाने के मामले में दर्ज की गई एफआईआर को बेहद गंभीर बताया है।
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Samachar4media Bureau
पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान से जुड़े कथित आपत्तिजनक वीडियो विवाद में एक नया मोड़ सामने आया है। अकाल तख्त सचिवालय के मीडिया सलाहकार जसकरण सिंह ने हरियाणा पुलिस द्वारा कथित फर्जी फॉरेंसिक रिपोर्ट तैयार किए जाने के मामले में दर्ज की गई एफआईआर को बेहद गंभीर बताया है। उन्होंने मामले से जुड़े सभी लोगों की भूमिका उजागर करने की मांग की है।
दरअसल, गुरुग्राम पुलिस ने मंगलवार को दो लोगों को गिरफ्तार किया था। पुलिस ने एक व्यक्ति की शिकायत के आधार पर मामला दर्ज किया, जिसमें आरोप लगाया गया था कि उससे वायरल वीडियो के संबंध में एक मनगढ़ंत फॉरेंसिक रिपोर्ट तैयार कराने के लिए संपर्क किया गया था।
बुधवार को प्रतिक्रिया देते हुए जसकरण सिंह ने कहा कि कथित आपत्तिजनक वीडियो के संबंध में फर्जी फॉरेंसिक रिपोर्ट तैयार करने का मामला अत्यंत गंभीर है। उन्होंने आरोप लगाया कि यह सब सिख समुदाय और पंजाब के लोगों को गुमराह करने तथा अकाल तख्त को गलत साबित करने की मंशा से किया गया।
उन्होंने कहा कि इस पूरे मामले में शामिल सभी लोगों को बेनकाब किया जाना चाहिए। जसकरण सिंह ने यह भी कहा कि इतिहास गवाह है कि अकाल तख्त को चुनौती देने वालों को हमेशा प्रतिकूल परिणामों का सामना करना पड़ा है। उन्होंने दावा किया कि सिख विरोधी ताकतों और अकाल तख्त को चुनौती देने वालों को यह याद रखना चाहिए कि सांसारिक मामलों में लोगों को भ्रमित किया जा सकता है, लेकिन गुरु साहिब और उनके तख्त को नहीं।
उन्होंने कहा कि इस कथित साजिश में शामिल लोगों को अपने अंतर्मन की आवाज सुननी चाहिए और यह याद रखना चाहिए कि गुरु से विमुख होने वालों को कहीं सहारा नहीं मिलता तथा ऐसे कर्मों का दाग पीढ़ियों तक बना रहता है।
गौरतलब है कि इस कथित वीडियो को लेकर पहले ही राजनीतिक विवाद खड़ा हो चुका है। अकाल तख्त ने 15 जून को मुख्यमंत्री भगवंत मान के खिलाफ आदेश जारी करते हुए उन्हें ‘गुरु दोखी’ और ‘खालसा पंथ विरोधी’ घोषित किया था। यह फैसला अकाल तख्त के जत्थेदार ज्ञानी कुलदीप सिंह गर्गज्ज के उस दावे के बाद आया था, जिसमें उन्होंने कहा था कि दो फॉरेंसिक प्रयोगशालाओं की जांच में वीडियो को “प्रामाणिक” पाया गया है।
हालांकि, भगवंत मान पहले ही इस वीडियो को खारिज कर चुके हैं। उनका कहना है कि यह उन्हें बदनाम करने के उद्देश्य से फैलाया गया “झूठा प्रचार” है। वहीं, पंजाब में आम आदमी पार्टी ने भी दावा किया था कि दो फॉरेंसिक जांचों में यह निष्कर्ष सामने आया कि कथित वीडियो में दिखाई देने वाला व्यक्ति भगवंत मान नहीं है।
दिसंबर 2003 में चैनल से जुड़ने वाले प्रियदर्शन ने यहां 23 साल से अधिक समय तक अपनी सेवाएं दीं और संपादकीय टीम के अहम स्तंभ के रूप में पहचान बनाई।
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हिंदी पत्रकारिता के प्रतिष्ठित नाम, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक और संपादक प्रियदर्शन मंगलवार (23 जून) को ‘एनडीटीवी इंडिया’ (NDTV India) से सेवानिवृत्त हो गए। दिसंबर 2003 में चैनल से जुड़ने वाले प्रियदर्शन ने यहां 23 साल से अधिक समय तक अपनी सेवाएं दीं और संपादकीय टीम के अहम स्तंभ के रूप में पहचान बनाई। उनके रिटायरमेंट पर सहयोगियों ने उन्हें शानदार विदाई दी और पत्रकारिता में उनके योगदान को याद किया।
प्रियदर्शन की पहचान केवल एक टीवी पत्रकार के रूप में नहीं, बल्कि एक गंभीर लेखक, स्तंभकार और सांस्कृतिक विश्लेषक के रूप में भी है। साहित्य, सिनेमा, राजनीति, समाज और मीडिया जैसे विषयों पर उनकी गहरी पकड़ है। उनकी लेखन शैली में तथ्यपरकता, भाषा की सादगी और विषय की गहराई का संतुलित मेल देखने को मिलता है।
यह भी पढ़ें: NDTV से प्रियदर्शन के रिटायरमेंट पर भावुक हुए रवीश रंजन शुक्ला, साझा कीं यादें
मूल रूप से झारखंड की राजधानी रांची के रहने वाले प्रियदर्शन ने रांची विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में एमए किया। छात्र जीवन के दौरान ही उन्होंने अखबारों के लिए लिखना शुरू कर दिया था। पढ़ाई के दिनों में वे कुछ समय तक आकाशवाणी, रांची से कैजुअल आधार पर भी जुड़े रहे।
पत्रकारिता में उनका पेशेवर सफर फ्रीलांस लेखन से शुरू हुआ। वर्ष 1993 से 1996 तक उन्होंने दिल्ली में स्वतंत्र पत्रकार के रूप में काम किया। इसके बाद 1996 में वे हिंदी के प्रतिष्ठित समाचारपत्र ‘जनसत्ता’ से जुड़े, जहां उन्होंने करीब सात वर्षों तक सेवाएं दीं। वर्ष 2003 में उन्होंने एनडीटीवी इंडिया का रुख किया और फिर चैनल के साथ उनकी लंबी और उल्लेखनीय पारी चली।
एनडीटीवी इंडिया में अपने कार्यकाल के दौरान प्रियदर्शन ने संपादकीय संचालन, कंटेंट निर्माण और भाषा की शुद्धता को लेकर महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। न्यूजरूम में उन्हें ऐसे संपादक के रूप में जाना जाता रहा, जो तथ्यों से समझौता किए बिना संवाद, बहस और नए विचारों को प्रोत्साहित करते थे। कई पीढ़ियों के पत्रकारों ने उनके साथ काम करते हुए भाषा, संपादन और पत्रकारिता की बारीकियां सीखीं।
पत्रकारिता के साथ-साथ साहित्य में भी प्रियदर्शन का योगदान उल्लेखनीय रहा है। अब तक उनकी 20 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं, जबकि उन्होंने सात पुस्तकों का अनुवाद भी किया है।
NDTV इंडिया से उनके रिटायरमेंट को हिंदी पत्रकारिता के एक महत्वपूर्ण अध्याय के समापन के रूप में देखा जा रहा है। मीडिया जगत के अनेक पत्रकारों, सहयोगियों और शुभचिंतकों ने उनके योगदान को याद करते हुए उन्हें नई पारी के लिए शुभकामनाएं दी हैं।
एनडीटीवी इंडिया से प्रियदर्शन के फेयरवेल की कुछ तस्वीरें आप यहां देख सकते हैं-



बदलते दौर में बहुत कम लोग होते हैं जो हर बदलाव के साथ खुद को ढालते हुए लगातार प्रासंगिक बने रहते हैं। के. माधवन ऐसे ही चुनिंदा मीडिया नेताओं में शामिल हैं।
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मीडिया इंडस्ट्री में बदलाव हमेशा तेजी से होते रहे हैं। नई तकनीकें आती हैं, दर्शकों की पसंद बदलती है और बिजनेस मॉडल भी लगातार बदलते रहते हैं। लेकिन ऐसे दौर में बहुत कम लोग होते हैं जो हर बदलाव के साथ खुद को ढालते हुए लगातार प्रासंगिक बने रहते हैं। के. माधवन ऐसे ही चुनिंदा मीडिया नेताओं में शामिल हैं।
उनके जन्मदिन के मौके पर मीडिया जगत एक ऐसे पेशेवर को याद कर रहा है, जिनका प्रभाव सिर्फ कॉर्पोरेट बोर्डरूम तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पिछले दो दशकों में करोड़ों भारतीय दर्शकों तक पहुंचा है, जिन्होंने टीवी मनोरंजन की दुनिया को करीब से देखा और जिया है।
के. माधवन ने अपने करियर की शुरुआत फाइनेंस और बैंकिंग सेक्टर से की थी। इसके बाद 1999 में उन्होंने एशियानेट कम्युनिकेशंस का रुख किया। यहां उन्होंने क्षेत्रीय प्रसारण नेटवर्क को दक्षिण भारत के सबसे प्रभावशाली मीडिया नेटवर्क्स में बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
जब स्टार ने एशियानेट का अधिग्रहण किया, तब माधवन ने आसानी से स्टार नेटवर्क के बड़े इकोसिस्टम में खुद को स्थापित किया। रीजनल मार्केट्स की उनकी गहरी समझ आगे चलकर स्टार नेटवर्क की सबसे बड़ी ताकतों में से एक बनी।
वर्षों के दौरान वह स्टार नेटवर्क के विस्तार की रणनीति तैयार करने वाले प्रमुख चेहरों में शामिल रहे। उन्होंने यह साबित किया कि क्षेत्रीय भाषाओं और स्थानीय कहानियों पर आधारित कंटेंट भी राष्ट्रीय स्तर पर बड़ी सफलता हासिल कर सकता है। स्थानीय सोच और वैश्विक मीडिया रणनीतियों के संतुलन ने भारतीय टेलीविजन इंडस्ट्री के विकास का नया मॉडल तैयार किया।
बाद में डिज्नी स्टार के कंट्री मैनेजर और प्रेसिडेंट के रूप में उन्होंने देश के सबसे बड़े मीडिया संगठनों में से एक का नेतृत्व किया। यह वह दौर था जब डिजिटल प्लेटफॉर्म्स का तेजी से विस्तार हो रहा था, प्रतिस्पर्धा बढ़ रही थी और दर्शकों की आदतों में बड़ा बदलाव आ रहा था।
मनोरंजन, खेल प्रसारण, स्ट्रीमिंग सेवाओं और स्टूडियो कारोबार जैसे विभिन्न क्षेत्रों में उनके नेतृत्व ने यह दिखाया कि कंटेंट, तकनीक और वितरण व्यवस्था को साथ-साथ विकसित करना ही भविष्य की सफलता की कुंजी है।
कॉर्पोरेट नेतृत्व के अलावा भी उनकी भूमिका काफी अहम रही है। इंडस्ट्री से जुड़े लोग उन्हें ऐसे नेता के रूप में देखते हैं जो सुर्खियां बटोरने के बजाय टीम को साथ लेकर चलने और संस्थानों को मजबूत बनाने में विश्वास रखते हैं। यही वजह है कि प्रतिस्पर्धी कंपनियों, कारोबारी साझेदारों और नीति निर्माताओं के बीच भी उन्हें समान रूप से सम्मान मिलता है।
आज जब टेलीविजन, स्ट्रीमिंग और डिजिटल मीडिया के बीच की सीमाएं लगातार धुंधली होती जा रही हैं, तब के. माधवन का करियर इस बात का उदाहरण बनकर सामने आता है कि स्थायी नेतृत्व केवल बदलावों के अनुसार खुद को ढालने से नहीं, बल्कि आने वाले बदलावों को पहले से पहचानने से बनता है।
उनकी प्रोफेशनल जर्नी भारतीय प्रसारण इंडस्ट्री के विकास की कहानी भी है। सैटेलाइट टेलीविजन से लेकर कनेक्टेड स्क्रीन तक और क्षेत्रीय नेटवर्क्स से लेकर वैश्विक मीडिया प्लेटफॉर्म्स तक, उन्होंने इस बदलाव को न सिर्फ देखा बल्कि उसे दिशा देने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
एक और नए वर्ष की शुरुआत के साथ के. माधवन की विरासत मीडिया जगत की नई पीढ़ी को प्रेरित करती रहेगी। उनका करियर यह बताता है कि दूरदृष्टि, अनुशासन और शांत लेकिन प्रभावी नेतृत्व किसी भी इंडस्ट्री की दिशा बदल सकता है।
इस पहल का उद्देश्य छात्रों तक ज्ञान को उनकी अपनी भाषा में पहुंचाना है, ताकि वे पढ़ाई को बेहतर ढंग से समझ सकें और अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े रहकर सीख सकें।
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