रेवेन्यू बढ़ाने के लिए ‘प्रसार भारती’ के CEO कर रहे हैं ये प्रयास...

देश की पब्लिक ब्रॉडकास्ट कंपनी ‘प्रसार भारती’ के सीईओ का पदभार संभाले हुए शशि शेखर...

Last Modified:
Tuesday, 21 August, 2018
Shashi Shekhar Vempati

 रुहैल अमीन ।।

देश की पब्लिक ब्रॉडकास्ट कंपनी ‘प्रसार भारती’ के सीईओ का पदभार संभाले हुए शशि शेखर वेम्पती को एक साल से ज्‍यादा समय हो चुका है। अपने इस कार्यकाल में उनके द्वारा प्रसार भारती को एक नई दिशा देने का उनका प्रयास धीरे-धीरे रंग ला रहा है। वेम्‍पती का फोकस डिजिटल की ओर है और उनके नेतृत्‍व में प्रसार भारती में काफी बदलाव देखने को भी मिले हैं।

इस कार्यकाल के दौरान 'एक्‍सचेंज4मीडिया' (exchange4media) को दिए गए अपने दूसरे इंटरव्‍यू में वेम्‍पती ने अपनी तमाम योजनाओं पर चर्चा की और बताया कि कैसे वह प्रसार भारती को एक नई पहचान दिलाना चाहते हैं और इसे सफलता के नए दौर में ले जाना चाहते हैं।

प्रस्‍तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश :

प्रसार भारती के सीईओ का पद संभाले हुए आपको एक साल से अधिक समय हो चुका है। इस एक साल में आपका सबसे बड़ा फोकस किस चीज पर रहा और आप अपने मकसद में कितने सफल रहे हैं?

एक साल में मेरा सबसे ज्‍यादा फोकस प्रसार भारती में डिजिटल को बढ़ावा देने का रहा है और इस दिशा में हमने बहुत काम किया है। यही कारण है कि इन दिनों हमारे नेटवर्क में 37 से ज्‍यादा एक्टिव यूट्यूब चैनल हैं। ऐसा पहली बार हुआ है जब आप दूरदर्शन (DD) और ऑल इंडिया रेडियो (AIR) के कंटेंट को यूट्यूब पर विभिन्‍न भाषाओं में देख सकते हैं।

इसके अलावा हमारे पास 250 से ज्‍यादा एक्टिव ट्विटर हैंडल्‍स हैं, जहां पर आप विभिन्‍न भाषाओं में पूरे दिन के अपडेट हासिल कर सकते हैं। 'एआईआर न्‍यूज ऐप' (AIR News App) के नए वर्जन में भी हमने इन सब चीजों को शामिल किया है। इसके अलावा इस ऐप में एक और खास बात यह है कि आप इस पर विभिन्‍न विदेशी भाषाओं में भी न्‍यूज पढ़ सकते हैं। एक बात और आपको बता दूं कि 'बार्क इंडिया' (BARC India) के डाटा के अनुसार इस एक साल में हमारे कई प्रादेशिक चैनलों के प्रदर्शन में काफी सुधार हुआ है। हमारा ध्‍यान सिर्फ दिल्‍ली पर न होकर पूरे नेटवर्क में बदलाव करने पर है और इस बदलाव व प्रगति को देखकर मैं खुश हूं।

अपने कार्यकाल की तीन बड़ी चुनौतियां के बारे में बताएं ?

सबसे बड़ी चुनौती तो सांस्‍कृतिक बदलाव (cultural shift) की है, जो पूरे संस्‍थान में हो रहा है। यह पूरा बदलाव सिर्फ नेशनल चैनल पर नहीं हो रहा है बल्कि प्रादेशिक स्‍तर पर भी बदलाव हो रहे हैं। हमारे पास ऑल इंडिया रेडियो दरभंगा का ट्विटर हैंडल भी है। कोई भी यह उम्‍मीद नहीं कर सकता है कि दरभंगा जैसी जगह पर सोशल मीडिया की इतनी ज्‍यादा मौजूदगी हो सकती है। इसी तरह हमारे पास लेह लद्दाख में भी ट्विटर हैंडल है। ऐसे में आप कह सकते हैं कि सांस्‍कृतिक रूप से काफी बदलाव हो रहे हैं और यह प्रक्रिया जारी है।   

दूसरी सबसे बड़ी चुनौती है कि चूंकि प्रसार भारती बहुत पुराना संगठन है। ऐसे में हमारे साथ बहुत बड़ी विरासत (legacy) का मुद्दा जुड़ा हुआ है, जिसे समय के साथ अब तार्किकता के मुद्दे पर देखने की जरूरत है। इस दिशा में भी काम चल रहा है।

तीसरी सबसे बड़ी चुनौती रेवेन्‍यू की है। हम अपने रेवेन्‍यू को बढ़ाने के लिए प्रयास कर रहे हैं। इसके लिए हमने अपने रेवेन्‍यू ढांचे में भी कुछ बदलाव करने का प्रयास किया है। हमारे कुछ ऐसी कवरेज भी की हैं जो काफी खास हैं और प्राइवेट सेक्‍टर में किसी के पास उनकी उपलब्धता नहीं है, ऐसे में हम इसे लेकर भी कुछ प्लान कर रहे हैं। 

स्‍वतंत्रता दिवस की कवरेज के लिए आपने गूगल के साथ पार्टनरशिप की थी, इसके बारे में थोड़ा विस्‍तार से बताएं ?

दूरदर्शन के लिए स्‍वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस की कवरेज काफी खास होती है। इस दौरान दूरदर्शन की व्‍युअरशिप भी काफी बढ़ जाती है। ऐसे में इसे ज्‍यादा से ज्‍यादा लोगों तक पहुंचाने के लिए हमने गूगल और यूट्यूब के साथ मिलकर काम किया। स्‍वतंत्रता दिवस की ही बात करें तो उस दिन गूगल ने इस कवरेज का सजीव प्रसारण किया था। इससे अपने आप ही व्‍युअरशिप काफी बढ़ गई। गूगल ने यह सब अभी करना शुरू किया है। उन्‍होंने अमेरिकी राष्‍ट्रपति डोनाल्‍ड ट्रंप के शपथ ग्रहण समारोह में भी ऐसा ही किया था। इसके अलावा हमने अगले दिन प्रधानमंत्री के भाषण का प्रादेशिक भाषा में रेडियो नेटवर्क पर प्रसारण किया। इस अवसर पर हमने अपने नेटवर्क पर शंकर महादेवन के विशेष गाने का प्रसारण भी किया था।

जहां तक ऐडवर्टाइजिंग रेवेन्यू की बात करें तो इस तरह के बड़े आयोजनों के लाइव प्रसारण शुरू होने से पहले काफी ऐडवर्टाइजर्स इसमें अपनी रुचि दिखाते हैं और रेवेन्‍यू बहुत बढ़ जाता है। सबसे बड़ी बात यह है कि व्‍युअरशिप और रेवेन्‍यू के मामले में यह हमारे लिए बहुत बड़ा और खास दिन रहा।   

निजी एफएम स्‍टेशनों पर ऑल इंडिया रेडियो की न्‍यूज के प्रसारण का मामला अभी नहीं सुलझ पा रहा है जबकि इससे प्रसार भारती को काफी रेवेन्‍यू मिल सकता है। आपको क्‍या लगता है, कब तक यह मामला सुलझ सकता है ?

इस बारे में पॉलिसी तो बनी हुई है लेकिन अभी इसमें कुछ बाधाएं हैं। इन बाधाओं को समझने के लिए हम फीडबैक का सहारा ले रहे हैं। वास्‍तव में हम इन बाधाओं को दूर करने का प्रयास कर रहे हैं ताकि निजी एफएम चैनलों पर भी ऑल इंडिया रेडियो की न्‍यूज का प्रसारण हो सके। इसके लिए पायलट प्रोजेक्‍ट शुरू किया जाएगा और यदि यह सफल रहता है तो इसे लागू कर दिया जाएगा।

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TRP-सोशल मीडिया को लेकर उठ रहे सवालों का सूचना प्रसारण मंत्री ने यूं दिया जवाब

‘न्यूज18 इंडिया’ पर वरिष्ठ टीवी पत्रकार अमिश देवगन से बातचीत में सूचना प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने कई अहम मुद्दों पर रखी अपनी राय

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Friday, 27 November, 2020
Last Modified:
Friday, 27 November, 2020
Amish Devgan

डिजिटल पर जो भी कंटेंट जनरेट होता है उसकी देखभाल करना भी अब जरूरी हो गया है, फिर चाहे न्यूज पोर्टल्स ही क्यों न हो और इसके लिए हमारी तैयारी चल रही है।’ यह बात केंद्रीय सूचना-प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने वरिष्ठ टीवी पत्रकार और न्यूज18 (हिंदी) के मैनेजिंग एडिटर अमिश देवगन द्वारा पूछे गए एक सवाल के जवाब में कही। इस दौरान सूचना-प्रसारण मंत्री ने अमिश देवगन के कार्यक्रम ‘आरपार’ और उनके एंकरिंग की तरीफ भी की। उन्होंने अमिश देवगन से कहा कि वे जिस जोशीले अंदाज से एंकरिंग करते हैं, उससे एक अच्छी डिबेट होती है। इसके लिए उन्होंने अमिश देवगन को बधाई भी दी।

इसके बाद सवाल-जवाबों का सिलसिला शुरू हुआ और अमिश देवगन ने सूचना-प्रसारण मंत्री से एक-एक कर कई ऐसे सवाल पूछे, जो हाल ही में चर्चा का विषय बने हुए हैं। अपने इंटरव्यू के दौरान अमिश देवगन ने टीआरपी के मुद्दे पर भी उनसे सवाल पूछा। उन्होंने पूछा कि टीआरपी का विवाद बहुत बड़ा है, इस मामले पर सरकार की सोच क्या है? इस सवाल का जवाब देते हुए केंद्रीय सूचना-प्रसारण मंत्री ने कहा कि ब्रॉडकास्टर्स और एडवर्टाइजर्स दो लोग होते हैं, जिन्हें विज्ञापन लेना और देना है। लिहाजा वे जानना चाहते हैं कि कौन सा कार्यक्रम और चैनल लोकप्रिय है। इसके लिए ब्रॉडकास्टर्स और एडवर्टाइजर्स ने ही साथ आकर टीआरपी की रचना की है। सरकार ने दोनों को सिर्फ समर्थन दिया है, पर ये सरकार की मान्यता से ही यह चल रहा है। लिहाजा अब सरकार ने इसके लिए कमेटी भी बनायी है, ताकि सही रास्ता बताया जा सके। इसका मैनिपुलेशन की आशंका को खत्म किया जा सके, जोकि मुख्य काम है। उन्होंने कहा कि अभी नई टेक्नोलॉजी तैयार है, जिससे ज्यादा लोगों की पसंद को देखा जा सकेगा, ताकि सही नतीजे आएंगे, ऐसा मुझे विश्वास है।

जब अमिश देवगन ने उनसे पूछा किया क्या वर्तमान में चल रहे सिस्टम को पूरी तरह से रिप्लेस कर दिया जाएगा, इस पर केंद्रीय मंत्री ने जवाब दिया कि ये हम नहीं तय करते हैं बल्कि एसोसिशन तय करती हैं, हम ब्रॉकास्टर्स के नाते जाते हैं। सरकार की एक भूमिका है। कमेटी जो रिकमेंड करेगी, उसके बाद हम करेंगे। रिकमेन्डेशन के आधार पर ही काम करेंगे। हमारी कमेटी टेक्नोलॉजी और टेक्नीशियंस की बनी है और उसके द्वारा ही हम टेक्नोलॉजिकल प्रिंसिपल सॉल्यूशन देंगे, जिसके आधार पर काम होगा। इस तरीके से सबको सुकून मिलेगा कि अब सही तरीके से मापन हो रहा है। इसकी रिपोर्ट एक महीने में आ जाएगी।

वहीं अमिश देवगन ने पूछा कि ये मुद्दा विवादास्पद है, क्योंकि मुंबई पुलिस ने भी एक एफआईआर रजिस्टर कर रखी है। प्रवर्तन निदेशालय और सीबीआई ने भी केस दर्ज कर रखा है। इस पर आप क्या कहना चाहेंगे, तो उन्होंने कहा कि यह एफआईआर का मुद्दा है, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने गाइडेंस दिया है कि किसी एक चैनल या एक व्यक्ति को टारगेट करके एफआईआर नहीं होनी चाहिए। एफआईआर एक सामान्य कानूनी प्रक्रिया है, इस पर हम क्या कहेंगे, लेकिन न्याय कैसे होगा ये मुद्दा है और इसके बारे में सुप्रीम कोर्ट ने सभी कोर्टों का मार्गदर्शन किया है।

ओटीटी प्लेटफॉर्म्स को लेकर भी अमिश देवगन ने केंद्रीय सूचना प्रसारण मंत्री से सवाल किया  कि अब ओटीटी प्लेटफॉर्म्स आपके मंत्रालय की निगरानी में आ गए हैं, क्या हम ये मान सकते हैं?  इस पर उन्होंने कहा कि हां, डिजिटल पर जो भी कंटेंट जनरेट होता है उसकी देखभाल करना भी अब जरूरी हो गया है, फिर चाहे न्यूज पोर्टल्स ही क्यों न हो और इसके लिए हमारी तैयारी चल रही है। ओटीटी प्लेटफॉर्म्स को लेकर हमारे पास सैकड़ों शिकायत आती हैं, क्योंकि ओटीटी पर कोई सेंसर बोर्ड नही है। जैसाकि अन्य फिल्मों को लेकर होता है कि भारत में फिल्में रिलीज करनी है तो सेंसर बोर्ड से सर्टिफिकेट लेना होता है, लेकिन ओटीटी के लिए ऐसा नहीं है। इसलिए इसके लिए अब सेंसर बोर्ड लाना है या सेल्फ रेगुलेशन लाना है ये चॉइस है, लेकिन कुछ न कुछ तो व्यवस्था करनी ही पड़ेगी। मै भी ओटीटी पर सीरियल देखता हूं, यहां हर कैटगरी के सीरियल्स और फिल्में होती हैं। लेकिन ये जो बहुत बुरी वाली कैटेगरी है, इसको लेकर लगातार शिकायतें मिल रही हैं। इसके लिए मेरा मानना है कि कुछ न कुछ व्यवस्था तैयार करनी चाहिए और हम करेंगे।

इसके बाद अमिश देवगन ने उनसे अगला सवाल किया कि नेटफ्लिक्स के ऊपर हाल ही में एक एफआईआर दर्ज की गई है, जिस पर बवाल मचा हुआ है। इस पर एक वर्ग सरकार पर आरोप लगा रही है कि सरकार सब कुछ कंट्रोल करना चाहती है, इस पर आपकी क्या राय है? इसका जवाब देते हुए जावड़ेकर ने कहा कि देखिए, ये वर्ग सेंसर बोर्ड के खिलाफ कुछ नही बोलता है। हमारे यहां आजादी का गला नही घोंटा जा रहा है। कोई भी व्यवस्था करना, आजादी का गला घोंटना नही है। 

अमिश देवगन के यह पूछे जाने पर कि केरल सरकार ने हाल ही में सोशल मीडिया पर पाबंदी लगाने वाला एक अध्यादेश जारी किया, जिसे विरोध के बाद वापस भी ले लिया गया। इसके बाद केरल सरकार की सोच पर काफी सवाल उठे, क्या सोशल मीडिया पर पाबंदी जरूरी है, इस पर आपकी क्या राय है, प्रकाश जावड़ेकर ने कहा कि मैं सोशल मीडिया पर पाबंदी की जरूरत नहीं मानता, लेकिन सोशल मीडिया या कोई भी मीडिया जिम्मेदारी से चलने चाहिए, क्योंकि आजादी जिम्मेदारी से ही और जिम्मेदार पत्रकार से ही सार्थक होती है। सोशल मीडिया पर तो कोई भी कुछ लिख सकता है, यहां हर व्यक्ति पत्रकार होता है, इसलिए एक झूठ पल भर में इतना प्रचारित हो जाता है कि वही सच लगने लगता है, जिसके बाद सभी जगह से वही मैसेज आने शुरू हो जाते हैं, जोकि गलत है। इसलिए सच दिखाना चाहिए, गलत नहीं। इसलिए जो कंटेंट जनरेट करता है, ये उसकी जिम्मेदारी है कि उसे सच को समझना चाहिए। 

सूचना-प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर का पूरा इंटरव्यू आप यहां देख सकते हैं-

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मीडिया में इस 'बर्बादी' के लिए जिम्मेदार कौन: सुप्रिया श्रीनेत

‘गवर्नेंस नाउ’ के एमडी कैलाशनाथ अधिकारी के साथ एक बातचीत में कांग्रेस की राष्ट्रीय प्रवक्ता और पूर्व पत्रकार सुप्रिया श्रीनेत ने तमाम पहलुओं पर अपने विचार रखे

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Thursday, 26 November, 2020
Last Modified:
Thursday, 26 November, 2020
Supriya-Shrinate

 

आर्थिक विकास में कमी, बेरोजगारी और छंटनी जैसे तमाम मुद्दों पर नरेंद्र मोदी सरकार को घेरते हुए कांग्रेस की राष्ट्रीय प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत का कहना है कि देश में कोविड महामारी आने से पहले ही अर्थव्यवस्था लगातार आठ तिमाहियों से नीचे जा रही थी।

‘गवर्नेंस नाउ’ (Governance Now) के एमडी कैलाशनाथ अधिकारी के साथ एक बातचीत में पूर्व पत्रकार सुप्रिया श्रीनेत का कहना था कि एक तरफ दुनिया की अर्थव्यवस्था ऊपर जा रही थी, वहीं इसके विपरीत भारत की अर्थव्यवस्था नीचे गिर रही थी। मीडिया का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि यहां तमाम टेक्निशियंस, कैमरापर्सन्स, प्रड्यूसर्स, प्रॉडक्शन असिस्टेंट्स और पत्रकारों समेत कई लोगों की बड़े पैमाने पर छंटनी हुई है। उन्होंने कहा, ‘इन लोगों को नौकरी नहीं मिल रही है। आखिर इस बर्बादी के लिए कौन जिम्मेदार है? भारतीय अर्थव्यवस्था की इस स्थिति के लिए आखिर कौन जिम्मेदार है?’

पब्लिक पॉलिसी प्लेटफॉर्म पर ‘विजिनरी टॉक सीरीज’ (Visionary Talk series) के तहत होने वाले इस वेबिनार के दौरान सुप्रिया श्रीनेत ने कहा, ‘भारतीय अर्थव्यवस्था के गिरने की शुरुआत सरकार की अक्षमता और गलत फैसले लेने के कारण हुई। वित्तीय वर्ष 2017 (FY 2017) से वित्तीय वर्ष 2020 (FY 2020) तक आर्थिक विकास की दर यानी जीडीपी का ग्रोथ रेट आधा हो गया। 8.2 प्रतिशत से घटकर वित्तीय वर्ष 2020 में यह 4.3 प्रतिशत पर आ गया। वित्तीय वर्ष 2021 में यह और प्रभावित होगी। यहां तक कि कोविड से पहले ही भारतीय अर्थव्यवस्था लगाता आठ हफ्तों से फिसलने लगी थी। एक तरफ दुनिया की जीडीपी का ग्रोथ रेट बढ़ रहा था, जबकि भारत का नीचे गिर रहा था।’ 

नरेंद्र मोदी सरकार को घेरते हुए श्रीनेत का कहना था कि कोविड से पहले भी नोटबंदी के करण देश में बेरोजगारी 45 साल के उच्चतम स्तर पर थी और जल्दबाजी में जीएसटी लागू करने से आर्थिक तौर पर बर्बादी हुई। जीडीपी ग्रोथ के अलावा जीडीपी वॉल्यूम यानी जीडीपी की मात्रा भी कम हो रही है। आर्थिक अवसर, रोजागर सृजन, स्वरोजगार और मजदूरी में कमी आ रही है।

सरकार के 20 लाख करोड़ रुपए के आत्मनिर्भर पैकेज के बारे में जिसे सरकार देश की जीडीपी का 10 प्रतिशत बता रही है, श्रीनेत ने कहा कि जब कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी. चिदंबरम, तमाम शोधकर्ताओं, वैश्विक पर्यवेक्षकों, अर्थशास्त्रियों और यहां तक कि सरकारी कर्मचारियों ने बैठकर गणना की तो पाया कि यह खर्च (fresh expenditure outlay) वास्तव में 1.86 लाख रुपए था, जो जीडीपी के एक प्रतिशत से भी कम है। बाकी सब फरवरी 2020 में घोषित केंद्रीय बजट का नवीनीकरण था।

इस बातचीत के दौरान श्रीनेत ने इस बात को लेकर भी सरकार की आलोचना की कि लोन के लिए जोर दिया जा रहा है। जब तमाम लोगों में अपनी नौकरी को लेकर अनिश्चितता है और उनकी सैलरी आधी तक घट गई है, ऐसे में क्या ये लोग लोन लेंगे? सरकार ने एमएसएमई (MSMEs) सेक्टर को 3 लाख करोड़ रुपए के ऋण आवंटित किए हैं, इस धन का आधा हिस्सा अभी भी सरकार के पास पड़ा है, क्योंकि लोगों को पता नहीं है कि वर्तमान आर्थिक स्थिति में वे इन लोन को कैसे चुकाएंगे?

सुप्रिया श्रीनेत का कहना था कि इसके बजाय सरकार को खपत को बढ़ावा देना चाहिए, जिससे उत्पादन बढ़ेगा और अधिक लोगों को रोजगार मिलेगा और इसके परिणामस्वरूप रोजगार सृजन होगा। अन्यथा आर्थिक पुनरुद्धार केवल सपना बनकर रह जाएगा।

जबरन धर्म परिवर्तन या कथित लव-जेहाद के खिलाफ अध्यादेश को उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा मंजूरी दिए जाने के सवाल पर श्रीनेत का कहना था कि मध्य प्रदेश में वर्ष 1968 में जबरन अथवा धोखे से धर्म परिवर्तन को रोकने के लिए धर्म स्वातंत्र्य अधिनियम के नाम से कानून बनाया गया था। जिसमें साल 2013 में संशोधन कर धर्मांतरण से पहले राज्य सरकार से मंजूरी लेना अनिवार्य किया गया। वहीँ जबरन धर्म परिवर्तन कराने पर इसमें सजा का प्रावधान किया गया। इस तथ्य के बावजूद कि जबरन धर्म परिवर्तन के खिलाफ भारतीय दंड संहिता के कम से कम 10 खंड हैं, जिन्हें लागू किया जा सकता है। ऐसे में सरकार ने मौजूदा कानूनों पर भरोसा क्यों नहीं किया। उन्होंने कहा कि एक युवा भारतीय के रूप में वह इसे हास्यास्पद मानती हैं कि दो युवा ये तय नहीं कर सकते कि वे किससे शादी करना चाहते हैं।

इलाहाबाद हाई कोर्ट द्वारा 11 नवंबर को दिए गए उस फैसले का उदाहरण देते हुए जिसमें कोर्ट ने कहा है (अपनी पसंद के व्यक्ति के साथ रहने का अधिकार, इसके बाद भी कि आपने किस धर्म को स्वीकार किया है, जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार में अंतर्निहित है) श्रीनेत का कहना था कि तनिष्क का विज्ञापन भारतीय संस्कृति की बहुलता को दर्शाने वाला था।

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भारत-ऑस्ट्रेलिया क्रिकेट सीरीज में रेवेन्यू को लेकर SONY के राजेश कौल ने कही ये बात

‘एक्सचेंज4मीडिया’ से बातचीत में ‘सोनी पिक्चर्स नेटवर्क्स इंडिया’ के चीफ रेवेन्यू ऑफिसर (डिस्ट्रीब्यूशन) और हेड (स्पोर्ट्स बिजनेस) राजेश कौल ने ऐड रेवेन्यू और सबस्क्रिप्शन रेवेन्यू को लेकर चर्चा की।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Monday, 23 November, 2020
Last Modified:
Monday, 23 November, 2020
Rajesh Kaul

भारत-ऑस्ट्रेलिया के बीच 27 नवंबर से शुरू होने वाली क्रिकेट सीरीज के लिए 15-16 स्पॉन्सर्स को अपनी झोली में डालने के बाद ‘सोनी पिक्चर्स स्पोर्ट्स नेटवर्क्स’ (SPSN) इसके प्रसारण के लिए पूरी तरह तैयार है। इस सीरीज का Sony Ten 1, Sony Ten 3 और Sony Six चैनल्स पर लाइव प्रसारण किया जाएगा। लगभग नौ महीने के ब्रेक के बाद विराट कोहली की टीम इंडिया के लिए यह पहली अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट सीरीज़ होगी, जिसमें तीन टी20, तीन वनडे और चार टेस्ट मैच खेले जाने हैं। हमारी सहयोगी वेबसाइट ‘एक्सचेंज4मीडिया’ (exchange4media) के साथ एक बातचीत में ‘सोनी पिक्चर्स नेटवर्क्स इंडिया’ के चीफ रेवेन्यू ऑफिसर (डिस्ट्रीब्यूशन) और हेड (स्पोर्ट्स बिजनेस) राजेश कौल ने इस सीरीज के दौरान मिलने वाले ऐड रेवेन्यू और सबस्क्रिप्शन रेवेन्यू को लेकर विस्तार से चर्चा की। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:  

कोविड-19 के कहर के कारण यह साल ब्रॉडकास्टर्स समेत लगभग प्रत्येक बिजनेस के लिए मुश्किलों भरा रहा है। ऐसे में ऐड रेवेन्यू के मामले में आपको इस सीरीज से क्या उम्मीदें हैं?

लॉकडाउन के बाद हमने स्पोर्ट्स इवेंट को लेकर व्युअरशिप में काफी इजाफा देखा है, यहां तक कि उन सीरीज में भी, जिनमें भारत शामिल नहीं रहा है। ऐसे में भारत-ऑस्ट्रेलिया सीरीज को लेकर भी हमें इसी तरह का ट्रेंड बरकरार रहने की उम्मीद है। 

इस सीरीज को लेकर लोगों के बीच काफी चर्चा है और हम सब इसे अपने नेटवर्क, नेटवर्क के बाहर, रीजनल चैनल्स पर, प्रिंट और डिजिटल पर प्रमोट करने जा रहे हैं। इसके साथ ही यह सीरीज नौ महीने के ब्रेक के बाद हो रही है, ऐसे में मुझे उम्मीद है कि पिछली बार के मुकाबले व्युअरशिप के मामले में यह काफी आगे निकलेगी।

हमें डिजिटल (SonyLIV) और अन्य चैनल्स पर एडवर्टाइजर्स और स्पॉन्सर्स की ओर से भी काफी अच्छी प्रतिक्रिया मिली है। व्युअरशिप और एड रेवेन्यू के मामले में यह सीरीज हमारे अनुमान से कहीं ज्यादा बेहतर होने जा रही है। एडवर्टाइजर्स और स्पॉन्सरशिप के अलावा हमें सबस्क्रिप्शन बिजनेस में भी बढ़ोतरी की उम्मीद है। इन सबका वास्तविक प्रभाव तो सीरीज शुरू होने के 10-15 दिन बाद ही पता चलेगा, लेकिन शुरुआती ट्रेंड्स काफी सकारात्मक हैं। हमें उम्मीद है कि सीरीज के अंत तक हमें 15-20 प्रतिशत का इजाफा देखने को मिलेगा।

लॉकडाउन के दौरान डिजिटल के उपभोग (consumption) में कई गुना बढ़ोतरी हुई है। क्या आपको लगता है कि टीवी व्युअरशिप पर इसका असर पड़ेगा?

यह सही है कि लॉकडाउन के दौरान डिजिटल का उपभोग बढ़ा है। हालांकि, स्पोर्ट्स में हमें इस तरह का ट्रेंड देखने को नहीं मिला है। यह जॉनर अभी इससे प्रभावित नहीं हुआ है। हां, समग्र रूप से देखा जाए तो डिजिटल की व्युअरशिप बढ़ रही है और आने वाले वर्षों में ऐसा होना तय है। लेकिन भारत विविधताओं भरा देश है और यहां एक टीवी वाले घरों की संख्या ज्यादा है। इसलिए, खासकर क्रिकेट के लिए जिसे ज्यादातर परिवार के लोग मिलकर देखते हैं, हमें नहीं लगता कि टीवी व्युअरशिप पर इसका कोई प्रभाव पड़ेगा।

उदाहरण के लिए-जिन सीरीज में इंडियन टीम नहीं खेल रही थी, जैसे-जुलाई में वेस्ट इंडीज और इंग्लैंड के बीच व अगस्त में पाकिस्तान और इंग्लैंड के बीच सीरीज के दौरान भी व्युअरशिप में 200 प्रतिशत की बढ़ोतरी देखने को मिली है। हालांकि इस दौरान दर्शक बहुत अधिक डिजिटल कंटेंट का उपभोग कर रहे होंगे, लेकिन टीवी दर्शकों की संख्या 200 प्रतिशत बढ़ गई है। जैसा कि मैंने कहा कि डिजिटल संख्या बढ़ती रहेगी, लेकिन टीवी व्युअर्स की संख्या भी बढ़ेगी।  

इस साल सीरीज के लिए किस तरह की प्रोग्रामिंग की योजना बनाई गई है?

कोविड-19 से जुड़े प्रतिबंधों के चलते यह हमारे लिए सबसे बड़ी चुनौती थी, लेकिन शूटिंग के दौरान तमाम सुरक्षा मापदंडों का पालन करते हुए आगे बढ़ते चले गए। कुछ कंटेंट हमारे चैनल्स पर पहले से ही प्रसारित होना शुरू हो गया है, जिनमें भारत-ऑस्ट्रेलिया की पूर्व में हुई बेहरतीन ‘भिड़ंत’ शामिल हैं। सीरीज के दौरान हमारे पास हमारा फ्लैगशिप शो ‘Extraaa Innings’ होगा, जिसमें ग्लेन मैकग्रा, संजय मांजरेकर, वीरेंद्र सहवाग जैसे तमाम दिग्गज शामिल होंगे। हमारे पास ऑस्ट्रेलिया से आ रहा लाइव फीड होगा। इसके साथ ही हम अंग्रेजी फीड भी तैयार कर रहे हैं। हम अपने ऑडियंस को हरसंभव श्रेष्ठ कवरेज उपलब्ध कराना सुनिश्चित कर रहे हैं। यही नहीं, इस सीरीज के दौरान लगभग नौ महीने के बाद स्टेडियम में दर्शक मौजूद रहेंगे, इसलिए इस सीरीज का लुक और अनुभव कुछ अलग ही होने वाला है।  

क्या आपको लगता कि इस साल टाइमिंग का कोई इश्यू नहीं होगा, क्योंकि अधिकांश लोग अभी भी घर से काम (working from home) कर रहे हैं?

इस सीरीज में सभी वनडे, टी20 और टेस्ट मैच भारतीय समयानुसार प्रसारित किए जाएंगे। डे-नाइट मैच सुबह और टी20 मैच दोपहर में शुरू होंगे, जो काफी अच्छी टाइमिंग है। चूंकि अधिकांश लोग अभी भी घरों से काम कर रहे हैं, ऐसे में यह सभी के लिए सही होगा।

इस साल आप स्पोर्ट्स जॉनर को किस तरह से बढ़ते हुए देख रहे हैं?

इस साल की शुरुआत में ज्यादा स्पोर्ट्स इवेंट नहीं हुए। ओलंपिक्स जो इस साल जून में प्रस्तावित था, समेत कुछ स्पोर्ट्स इवेंट्स स्थगित कर दिए गए, लेकिन अब सभी चीजें धीरे-धीरे पटरी पर लौट रही हैं। ऐसे मुश्किल समय में लोग लाइव स्पोर्ट्स का लुत्फ उठाना चाहते हैं। अब लोगों का स्टेडियम में आना भी शुरू होगा और इससे स्पोर्टस जॉनर के समग्र विकास में मदद मिलेगी। मुझे उम्मीद है कि आने वाले वर्षों में इस जॉनर में बड़ी ग्रोथ दिखाई देगी।

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काफी पसंद किए जा रहे हैं Hindustan Times में किए गए ये बदलाव: राजन भल्ला

‘एचटी मीडिया’ (HT Media) ग्रुप के सीएमओ राजन भल्ला ने रीब्रैंडिंग के बाद हमारी सहयोगी वेबसाइट ‘एक्सचेंज4मीडिया’ के साथ बातचीत में तमाम पहलुओं पर अपने विचार रखे।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Tuesday, 10 November, 2020
Last Modified:
Tuesday, 10 November, 2020
Rajan Bhalla

‘कोरोनावायरस’ (कोविड-19) का संक्रमण फैलने से रोकने के लिए देशभर में किए गए लॉकडाउन के कारण अन्य तमाम उद्योग धंधों के साथ प्रिंट मीडिया भी काफी प्रभावित हुआ। निस्संदेह प्रिंट मीडिया के लिए यह बहुत कठिन समय था। लेकिन, कुछ ब्रैंड्स ने इस समय का उपयोग अपने प्रॉडक्टस में नए परिवर्तन लाने में किया। ‘हिन्दुस्तान टाइम्स’ (Hindustan Times) ने भी अपने आपको पूरी तरह री-डिजाइन किया और दावा किया कि ब्रैंड को युवा पीढ़ी के अनुकूल बनाया गया है।

यह भी पढ़ें: HT Media ने Hindustan Times में किए ये बड़े बदलाव

नए डिजाइन और फॉर्मेट को लागू करने के करीब दो महीने बाद हमारी सहयोगी वेबसाइट ‘एक्सचेंज4मीडिया’ (exchange4media) के साथ एक बातचीत में ‘एचटी मीडिया’ (HT Media) ग्रुप के सीएमओ राजन भल्ला ने तमाम पहलुओं पर अपने विचार रखे। उन्होंने बताया कि न सिर्फ पेज डिजाइन में बदलाव किया गया है, बल्कि इसे मल्टी-प्लेटफॉर्म शेयरेबल फॉर्मेट के साथ फिर से लॉन्च किया है, यानी इसे किसी भी फॉर्मेट पर आसानी से शेयर किया जा सकता है। इस बातचीत के दौरान उनका यह भी कहना था, ‘ब्रैंड के लिए नए प्रॉडक्ट का फीडबैक बहुत ही अच्छा रहा है। सभी बदलावों को काफी पसंद किया गया है।’  

प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

इस री-लॉन्च के बारे में कुछ बताएं ? आपने अब इसे करने का चुनाव क्यों किया?

पिछले दशक में मीडिया परिदृश्य में काफी बड़े बदलाव देखने को मिले हैं और ऐसे समय के बावजूद देश भर में आठ मिलियन पाठक संख्या के साथ एचटी मीडिया मार्केट में सबसे आगे रहा है। ऐसे में न्यूज कंज्यूमर्स की मांग व जरूरत को देखते हुए यह बदलाव किए गए हैं। हम लंबे समय से देश के युवा वर्ग से ये जानने की कोशिश कर रहे थे और पिछले एक साल में हमने इस बात को गहराई से समझा है कि लोग कैसी और किस तरह की खबर पढ़ना पसंद करते हैं। उनके नजरिये को हमने री-डिजाइन में शामिल करने की कोशिश की है। हालांकि, इन बदलावों से पुरानी पीढ़ी दूर न हो जाए, इसके लिए भी एक अच्छा संतुलन बनाए रखने की कोशिश की है, क्योंकि वे भी हमारे लॉयल रीडर्स हैं। प्रॉड्कट में इन बदलावों के लिए मीडिया इंडस्ट्री के जाने-माने नाम डॉ. मारिया गार्सिया (Dr Mario Garcia) ने एचटी मीडिया की टीम के साथ मिलकर काम किया, ताकि इसमें अंतरराष्ट्रीय स्तर को भी शामिल किए जा सके।   

री-लॉन्च को करीब दो महीने हो चुके हैं, शुरुआती फीडबैक कैसा रहा है? प्रिंट और डिजिटल क्या अब बेहतर तरीके से जुड़े हैं?

नई पेशकश का फीडबैक बहुत ही अच्छा रहा है। सभी बदलावों को काफी पसंद किया गया है। इस 'ऑल-न्यू डिजिटल-फर्स्ट' वर्जन में ऐसे एलिमेंट्स जोड़े गए हैं, जो आपको प्रिंट से डिजिटल की ओर ले जाने की पेशकश करते हैं, जैसे QR कोड्स, वीडियो पॉइंटर्स, पॉडकास्ट के लिंक्स और फोटो गैलरीज जैसे डिजिटल इंटीग्रेशन। ये पाठकों को HT के डिजिटल प्लेटफॉर्म पर ले जाते हैं। अब हर पृष्ठ पर एक सोशल कार्ड है जो रीडर्स को प्रिंट से डिजिटल प्लेटफॉर्म पर नेविगेट करने में सक्षम बनाएगा। हम लगातार अपने प्रॉडक्ट और कंटेंट को अपने पाठकों के लिए और अधिक आकर्षक बनाने पर काम कर रहे हैं।

री-लॉन्चिंग का काम पहले ही शुरू कर दिया गया था, लेकिन इसके बाद महामारी और फिर लॉकडाउन शुरू हो गया, ऐसे में यह सफर कितना मुश्किल रहा?

एचटी मीडिया परिवार अपने जुनून के कारण महामारी के बीच इस फ्लैगशिप ब्रैंड को री-लॉन्च करने में कामयाब रहा। चीजों को सामान्य करते हुए हम सभी इसे शुरू करने को लेकर काफी गर्व महसूस कर रहे हैं। हम इस लॉन्चिंग को आगे बढ़ा सकते थे, लेकिन हम महामारी के बीच अपने पाठकों को कुछ नया और फ्रेश देना चाहते थे। यह एक साहसिक कदम था और हमने इसे पूरा करने में कोई कसर नहीं छोड़ी।    

आपके पास न केवल संपादकीय टीमों, बल्कि प्रिंट और डिजिटल की सेल्स टीमों को मिलाने के लिए न्यूयॉर्क टाइम्स (NYT) जैसी योजना है, क्या आपको लगता है कि इस तरह के प्रयास से ज्यादा रिटर्न हासिल होगा? क्या इस पूरी कवायद ने ज्यादा एडवर्टाइजर्स को अपनी ओर आकर्षित करने में मदद की?

अपने एडवर्टाइजर्स और अपने पाठकों दोनों के लिए हमारा फोकस नए बदलावों पर रहा है। अपने एडवर्टाइजर्स के लिए अब हम इंटीग्रेटेड प्रिंट और डिजिटल सॉल्यूशन पेश कर रहे हैं। एचटी मार्केट में आठ मिलियन से ज्यादा रीडरशिप और HT.com पर 65 मिलियन से ज्यादा यूनिक विजिटर्स के साथ अब हम नए एचटी में प्रिंट और डिजिटल दोनों का समावेश उपलब्ध करा रहे हैं। डिजिटल में एचटी मीडिया जैसे प्लेयर्स अधिकांश सेगमेंट जैसे-डिस्प्ले/ब्रैंडेड कंटेंट/प्रोग्रामैटिक ऐड्स में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ऐसे में हम एडवर्टाइजर्स को काफी बेहतर सॉल्यूशंस उपलब्ध करा पाते हैं। महामारी निश्चित रूप से उपभोक्ताओं के व्यवहार में बदलाव ला रही है, लेकिन मजबूत पत्रकारिता और अच्छी टेक्नोलॉजी का लाभ उठाने वाले ब्रैंड्स कंज्यूमर्स और एडवर्टाइजर्स के लिए प्रासंगिक रहेंगे।

आपके द्वारा री-लॉन्च किए गए प्रॉडक्ट के लिए वे तीन प्रमुख क्षेत्र कौन से होंगे, जिन पर आप काम करना चाहेंगे?

सबसे पहले तो इस री-लॉन्च के साथ प्रयास हमारे ऑडियंस की बदलती समाचार खपत (news consumption) की आदतों को समझने और उन्हें वे देने की कोशिश करना है, जो वे चाह रहे हैं। इस 'ऑल-न्यू डिजिटल-फर्स्ट' वर्जन में ऐसे एलिमेंट्स जोड़े गए हैं, जो आपको प्रिंट से डिजिटल की ओर ले जाने की पेशकश करते हैं, जैसे QR कोड्स, वीडियो पॉइंटर्स, पॉडकास्ट के लिंक्स और फोटो गैलरीज जैसे डिजिटल इंटीग्रेशन। ये पाठकों को HT के डिजिटल प्लेटफॉर्म पर ले जाते हैं।

दूसरी बात, युवाओं पर ज्यादा फोकस किया जा रहा है। इस दिशा में तमाम कदम उठाए जा रहे हैं, ताकि नए एचटी के साथ प्रिंट की पेशकश बहुत आकर्षक और प्रासंगिक बनी रहे। आखिर बात, अपने एडवर्टाइजर्स को वैल्यू प्रदान करना हमेशा हमारे सभी प्रयासों के मूल में रहा है। यह नई पेशकश अपने कंज्यूमर्स पर फोकस करने के साथ ही अपने कस्टमर्स को सॉल्यूशंस उपलब्ध कराने में और अपने पार्टनर्स को ज्यादा रिटर्न ऑन इंन्वेस्टमेंट (ROI) हासिल करने में मदद करती है।

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डेलीहंट के फाउंडर्स बोले, भारत में एंटरप्रिन्योर बनना कमजोर दिल वालों का काम नहीं

डेलीहंट के फाउंडर वीरेंद्र गुप्ता व को-फाउंडर उमंग बेदी ने अपने शॉर्ट वीडियो ऐप जोश समेत तमाम मुद्दों पर रखी राय

Last Modified:
Monday, 05 October, 2020
Josh

लोकल मार्केट में अपना दबदबा बढ़ाने के बाद ‘डेलीहंट’ (Dailyhunt) ने पिछले दिनों शॉर्ट वीडियो ऐप ‘जोश’ (Josh) लॉन्च किया था, जिसे पहले हफ्ते से ही लोगों द्वारा काफी पसंद किया जा रहा है। ‘डेलीहंट’ के फाउंडर वीरेंद्र गुप्ता और को-फाउंडर उमंग बेदी ने ‘बिजनेस वर्ल्ड’ और ‘एक्सचेंज4मीडिया’ ग्रुप के चेयरमैन व एडिटर-इन-चीफ डॉ. अनुराग बत्रा और ‘एक्सचेंज4मीडिया’ ग्रुप के डायरेक्टर नवल आहूजा से अपनी नई पेशकश, भारतीय ऐप मार्केट पर बढ़ते फोकस और डिजिटल कंटेंट पब्लिशर्स के आगे बढ़ने समेत तमाम मुद्दों पर बातचीत की। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

इस समय नए शॉर्ट वीडियो ऐप जोश को लॉन्च करने के पीछे आपकी क्या सोच रही, इस बारे में कुछ बताएं?

उमंग बेदी: हम देश के डिजिटल सिस्टम में एक बिलियन लोगों को शामिल करना चाहते हैं, जो स्थानीय भाषाओं द्वारा संचालित है। हमारा मानना है कि डेलीहंट के साथ स्थानीय भाषाओं को लेकर एक सामाजिक क्रांति शुरू हो रही है। हम सबसे बड़ा डिजिटल मीडिया बनना चाहते हैं जो एक अरब भारतीयों को इंफॉर्म करने, उनका ज्ञान बढ़ाने और मनोरंजन करने वाले कंटेंट को डिस्ट्रीब्यूट करने और कंज्यूम करने के लिए सशक्त बना रहा है। हमारी स्ट्रैटेजी अपने यूजर्स, कंज्यूमर्स, पब्लिशर्स, पार्टनर्स और ऐडवर्टाइजर्स के लिए उनकी पसंद का ऐसा प्लेटफॉर्म तैयार करना है, जो स्थानीय भाषाओं पर केंद्रित हो। हम इस बात को लेकर पूरी तरह स्पष्ट हैं कि हम स्थानीय भाषा के यूजर्स (लोकल लैंग्वेज यूजर्स) के लिए अपना माइंडशेयर (mindshare), टाइमशेयर (timeshare) और रेवेन्यू शेयर (revenue share) चाहते हैं। पिछले दो वर्षों में हमने काफी ज्यादा ग्रोथ देखी है। यहां तक कि मार्च से जब पूरे देश में लॉकडाउन लगा हुआ था, डेलीहंट ने काफी ज्यादा कंटेंट को प्राथमिकता देना और उसे बनाना शुरू कर दिया था। जब प्रधानमंत्री ने देश को आत्मनिर्भर बनाने के बारे में बात की तो इस बात ने डेलीहंट को प्रोत्साहन के साथ एक अतिरिक्त जिम्मेदारी भी प्रदान की। जैसा कि हमने कहा है कि हम शार्ट वीडियो के फॉर्मेट द्वारा स्थानीय भाषा के यूजर्स (लोकल लैंग्वेज यूजर्स) के लिए अपना माइंडशेयर (mindshare), टाइमशेयर (timeshare) और रेवेन्यू शेयर (revenue share) चाहते हैं, हमने दो हफ्ते के समय में जोश को लॉन्च किया। हमारा यह शॉर्ट वीडियो ऐप पूरी तरह स्वदेशी है और यह देश का तेजी से बढ़ता ऐप है, जिसे लोगों द्वारा काफी पसंद किया जा रहा है।

जोश को लॉन्च किए हुए कुछ हफ्ते हो गए हैं, इसका अब तक का रिस्पॉन्स कैसा रहा है?

उमंग बेदी: जोश देश के टॉप 200 क्रिएटर्स का अनूठा संगम है, जिनका विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर सामूहिक यूजर बेस 300-400 मिलियन है। शुरुआती हफ्तों की बात करें तो जोश को बेहतरीन प्रतिक्रिया मिली है। 45 दिनों में ही हम टॉप रेटेड ऐप बन गए हैं, जिसके 50 मिलियन डाउनलोड्स हो गए हैं। रोजाना इस ऐप पर 23 मिलियन लोग आते हैं और औसतन 21 मिनट व्यतीत करते हैं। इसमें रोजाना एक बिलियन वीडियो प्ले होते हैं और पांच मिलियन लोग कंटेंट बना रहे हैं। जिस हिसाब से हमारी ग्रोथ हो रही है, हमें उम्मीद है कि इस तरह अगले 60 से 90 दिनों में हम इन आंकड़ों के दोगुने तक पहुंच जाएंगे। हमने इसे पूरी तरह भारत में, भारत के लिए 14 भारतीय भाषाओं में तैयार किया है और हमारा मानना है कि यूजर बेस के मामले में इसने टिकटॉक को रिप्लेस कर दिया है।

वीरेंद्र गुप्ता: विदेशी कंपनियां जब भारत को सिर्फ अंग्रेजी भाषी मार्केट के तौर पर देखती हैं, डेलीहंट स्थानीय भाषाओं में काम कर रहा है। हम काफी समय से इस मार्केट में हैं। हमने इस मार्केट के लिए टूल्स, टेक्नोलॉजी और कंटेंट तैयार किया है। अभी तक इस मार्केट पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया गया था और हमने अपनी पेशकश के द्वारा इस दिशा में काफी काम किया है। जोश हमारी नवीनतम पेशकश है।

भारतीय ऐप के ईकोसिस्टम की बात करें तो इसमें रोजाना प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है, ऐसे में आप किस तरह आगे बने हुए हैं?

वीरेंद्र गुप्ता: यह बहुत अच्छी बात है कि बहुत सारी भारतीय कंपनियां नए ऐप बना रही हैं। हमें एक नए भारत की कल्पना करने की जरूरत है। हम जानते हैं कि इस खेल को कैसे जीता जाता है। मेरा मानना है कि यदि मार्केट में ज्यादा प्लेयर्स आते हैं तो इससे आगे बढ़ने में मदद मिलेगी और हमें एक-दूसरे से काफी कुछ सीखने को मिलेगा। इससे शॉर्ट वीडियो ऐप्स और अन्य ऐप्स पर काफी प्रभाव पड़ेगा, क्योंकि युवा एंटरप्रिन्योर्स नए-नए आइडियाज के साथ आ रहे हैं, इससे भारतीय ऐप का ईकोसिस्टम आगे बढ़ेगा।

उमंग बेदी: भारतीय स्टार्ट-अप इकोसिस्टम को लेकर मैं बहुत प्रोत्साहित और उत्साहित हूं। मैं हमेशा से कहता हूं कि भारत में एंटरप्रिन्योर बनना कमजोर दिल वालों का काम नहीं है। इस मार्केट में काफी भीड़भाड़ है, लेकिन प्रत्येक वर्टिकल की तरह चाहे वह ऑटोमोबाइल्स हो, हैंडसेट्स हो, टेलिकॉम या ई-कॉमर्स हो, मार्केट में दो प्लेयर्स बड़े शेयर्स के साथ उभरकर सामने आते हैं।

मेरा मानना है कि अगले छह महीनों में यह मार्केट नया रूप लेने जा रहा है। यदि आप कुछ बड़ी टेक कंपनियों की तरफ देखें, जिन्होंने अपने मार्केट में स्थानीय भाषाओं पर काम किया है, ऐसे में उन्हें किस वजह के आगे निकलने का अधिकार है?

पहली बात तो यह है कि उन्हें विभिन्न भाषाओं में विभिन्न फॉर्मेट्स में कंटेंट की गहरी समझ है। कंटेंट को समझने के लिए उनके पास आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस (AI) है। दूसरी बात यह है कि वह गहरी समझ का इस्तेमाल कर रहे हैं। तीसरी बात यह है कि उनमें बड़े पैमाने पर मुद्रीकरण (monetisation) को तैयार करने की क्षमता है। हम इस बात की काफी कद्र करते हैं कि ग्लोबल कंपनियों ने किस तरह से अपना बिजनेस तैयार किया है, लेकिन हम पूरी तरह स्पष्ट हैं कि वे सिर्फ देश के खास तबके तक सीमित हैं। हम इस मायने में उनसे अलग हैं कि हम भारत को अच्छे से समझते हैं, हम स्थानीय भाषाओं को समझते हैं। देश में 21000 पिन कोड में से हमें 19000 से ट्रैफिक मिलता है। हमें लगता है कि दो बड़े प्लेयर्स के लिए एक-दूसरे से आगे बढ़ने के लिए मार्केट काफी बड़ा है और अपने आप को लेकर हम काफी आश्वस्त हैं।

यदि टिकटॉक की भारतीय मार्केट में दोबारा से एंट्री होती है या जियो कोई इसी तरह का प्रॉडक्ट लॉन्च कर देता है तो उस दौरान आपकी स्ट्रैटेजी क्या रहेगी?

कंप्टीशन को लेकर हम चिंतित नहीं हैं। हम प्रतिस्पर्धा का स्वागत करते हैं। हम ऐसे मार्केट में प्रतिस्पर्धा करते हैं, जहां पर डिजिटल एडवर्टाइजिंग की बात आती है तो एकाधिकार हावी हो जाता है। हमने चीन के बड़े ऐप्स के साथ प्रतिस्पर्धा की है और हमने वह लड़ाई जीती भी है। यदि टिकटॉक या इसी तरह का कोई ऐप वापस भी आ जाता है, तो भी हमें कोई दिक्कत नहीं है। हमारा मानना है कि यह मार्केट दो या तीन प्लेयर्स के लिए पर्याप्त बड़ा है और हमें पूरा विश्वास है कि हम उन दो प्लेयर्स में शामिल होंगे।

आपकी नजर में, क्या मार्च 2020 के बाद विज्ञापन खर्च में कुछ परिवर्तन आया है, मार्केट को लेकर आपका क्या कहना है?

उमंग बेदी: आप जिस क्षण डिजिटल में आते हैं, प्रत्येक मार्केटर आपकी परफॉर्मेंस मांगता है। चाहे पहुंच अथवा फ्रीक्वेंसी की बात हो, चाहे क्लिक की बात हो या फिर एडवर्टाइजिंग का प्रदर्शन हो।

गूगल, फेसबुक और डेलीहंट के अलावा कितने प्लेटफॉर्म्स हैं, जहां पर आप परफॉर्मेंस के आधार पर विज्ञापन हासिल कर सकते हैं?

जो मैंने देखा है, उसके अनुसार, कोविड-19 की तिमाही के दौरान हमारे रेवेन्यू में साल दर साल 100 प्रतिशत तक का इजाफा हुआ है। अब हम ब्रैंड एडवर्टाइजिंग में काफी उछाल देख रहे हैं। मुझे लगता है कि परफॉर्मेंस एक यात्रा है और हमने 100000 पब्लिशर्स व लोगों के साथ मिलकर डाटा इंटीग्रेशन तैयार किया है, जो हमें कंटेंट दे रहे हैं। परफॉर्मेंस की बात करें तो हमारे पास 250 एडवर्टाइजर्स हैं, जिनके साथ हमने डाटा इंटीग्रेशन (डाटा एकीकरण) किया है, जिसके द्वारा हम यूजर को ट्रैक कर सकते हैं और उसी हिसाब से टार्गेट कर सकते हैं। यही कारण है कि देश में गूगल और फेसबुक के बाद हम एकल गंतव्य (single destination) के मामले में रेवेन्यू के हिसाब से तीसरे स्थान पर हैं। हम अभी इनसे काफी दूर हैं, क्योंकि देश में ये कंपनियां रेवेन्यू और पहुंच के मामले में काफी बड़ी हैं। मुझे पूरा विश्वास है कि आने वाले तीन वर्षों में भारत में डिजिटल टीवी के बराबर आ जाएगा या इससे आगे निकल जाएगा।  

वीरेंद्र गुप्ता: हमारे पास डेलीहंट के ऐप्स पर रोजाना दो घंटे से ज्यादा समय बिताने वाले 500 मिलियन लोकल लैंग्वेज यूजर्स होंगे। और जब आप ऐसा करते हैं, तो मेरा मानना ​​है कि विज्ञापन और बढ़ेंगे, क्योंकि यह भारत है और यह एक अंडरस्कोर मार्केट है। जैसा कि हम जानते हैं, विज्ञापन का पैसा बड़े पैमाने पर चलता है और यही वह जगह है, जहां हम आगे बढ़ रहे हैं।

यदि हम कंटेंट के विमुद्रीकरण (monetising) की बात करें देश में डिजिटल न्यूज पब्लिशिंग ईकोसिस्टम के लिए आगे बढ़ने का क्या तरीका है?

उमंग बेदी: यदि आप भारत और यहां के इंटरनेट ईकोसिस्टम के बारे में सोचते हैं तो आज की तारीख तक हम ओपन और न्यूट्रल इंटरनेट में विश्वास रखते हैं। हम मल्टीस्टेकहोल्डर तंत्र में विश्वास रखते हैं। रही बात सही और गलत स्ट्रैटेजी की तो मेरा मानना है कि इस पर गंभीर बहस किए जाने की जरूरत है। इसके अलावा टीवी ने भी काफी यूनिक और अलग कंटेंट तैयार किया है। जब मैं पांच अलग-अलग चैनल्स पर न्यूज देखता हूं तो यह वैचारिकता से प्रभावित लगती है, जो तथ्य नहीं हैं। यह न्यूज का विश्लेषण और उस न्यूज के बारे में राय है। मुझे लगता है कि एक पब्लिशिंग ईकोसिस्टम के रूप में हमें इससे प्रेरणा लेने की आवश्यकता है।

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IIMC के DG प्रो.संजय द्विवेदी बोले- दो आधारों पर खड़ी है आज की पत्रकारिता

मेरे जीवन में किस्से बहुत नहीं हैं, संघर्ष तो बिल्कुल नहीं। मेरे पास यात्राएं हैं, कर्म हैं और उससे उपजी सफलताएं हैं। बहुत संघर्ष की कहानियां नहीं हैं, जिन्हें सुना सकूं।

विकास सक्सेना by
Published - Monday, 17 August, 2020
Last Modified:
Monday, 17 August, 2020
Sanjay Dwivedi

प्रो.संजय द्विवेदी देश के जाने-माने पत्रकार, संपादक, लेखक, संस्कृतिकर्मी और मीडिया प्राध्यापक हैं। अनेक मीडिया संगठनों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभालने के बाद वे माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल में 10 वर्ष मास कम्युनिकेशन विभाग के अध्यक्ष, विश्वविद्यालय के कुलपति और कुलसचिव भी रहे। राजनीतिक, सामाजिक और मीडिया के मुद्दों पर निरंतर लेखन से उन्होंने खास पहचान बनाई है। अब तक 25 पुस्तकों का लेखन और संपादन करने वाले प्रो.  द्विवेदी को अनेक संगठनों ने मीडिया क्षेत्र में योगदान के लिए सम्मानित किया है। हाल ही में उन्हें देश के प्रतिष्ठित मीडिया प्रशिक्षण संस्थान- भारतीय जनसंचार संस्थान का महानिदेशक नियुक्त किया गया है। भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC) के 56वें स्थापना दिवस पर समाचार4मीडिया ने उनसे खास बातचीत की - 

आपने अब तक तमाम मीडिया संस्थानों और शैक्षणिक संस्थानों में अपनी सेवाएं दी हैं, अपने अब तक के सफर के बारे में कुछ बताएं?

मैं खुद को आज भी मीडिया का विद्यार्थी ही मानता हूं।  पत्रकारिता में मेरा सफर 1994 में दैनिक भास्कर, भोपाल से प्रारंभ हुआ। उसके बाद स्वदेश-रायपुर, नवभारत- मुंबई, दैनिक भास्कर-बिलासपुर, दैनिक हरिभूमि-रायपुर, इंफो इंडिया डॉटकॉम-मुंबई, जी 24 घंटे छत्तीसगढ़ जो छत्तीसगढ़ का पहला सैटेलाइट चैनल था के साथ रहा। पत्रकारिता में संपादक, स्थानीय संपादक, समाचार संपादक, इनपुट एडिटर, एंकर जैसी जिम्मेदारियां मिलीं, उनका निर्वाह किया। मीडिया शिक्षा में आया तो कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय, रायपुर में पत्रकारिता विभाग का संस्थापक विभागाध्यक्ष रहा। बाद में माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय में कुलपति, कुलसचिव जैसे पदों के साथ जनसंचार विभाग के अध्यक्ष के रूप में भी दस साल दायित्व रहा। बचपन के दिनों के में दोस्तों के मिलकर‘बालसुमन’ नाम की पत्रिका निकाली। यह लिखने-पढ़ने का शौक ही बाद में जीविका बन गया  तो सौभाग्य ही था।

 इस दौरान का कोई ऐसा खास वाक्या जो आपको अभी तक याद हो?

मेरे जीवन में किस्से बहुत नहीं हैं, संघर्ष तो बिल्कुल नहीं। मेरे पास यात्राएं हैं, कर्म हैं और उससे उपजी सफलताएं हैं। बहुत संघर्ष की कहानियां नहीं हैं, जिन्हें सुना सकूं। अपने काम को पूरी प्रामणिकता, ईमानदारी से करते रहे। अपने अधिकारी के प्रति ईमानदार रहे, यात्रा चलती रही। मौके मिलते गए। मुंबई, भोपाल, रायपुर, बिलासपुर और अब दिल्ली में काम करते हुए कभी चीजों के पीछे नहीं भागा। नकारात्मकता और नकारात्मक लोगों से दूरी से बनाकर रखी। साधारण तरीके से चलते चले गए। यह सहज जीवन ही मुझे पसंद है। सफलता से बड़ा मैंने हमेशा सहजता को माना। कुछ दौड़कर, छीनकर नहीं चाहिए। स्पर्धा और संघर्ष मेरे स्वभाव में नहीं है। मैं अपना आकलन इस तरह करता हूं कि मैं कोई विशेष प्रतिभा नहीं हूं। सकारात्मक हूं और सबको साथ लेकर चलना मेरा सबसे खास गुण है। मैं जो कुछ भी हूं अपने माता-पिता, मार्गदर्शकों, शिक्षकों और दोस्तों की बदौलत हूं।   

 'कोविड-19 के दौरान पढ़ाई-लिखाई की पुरानी व्यवस्था पर काफी फर्क पड़ा है। नए दौर में ऑनलाइन पढ़ाई पर ज्यादा जोर दिया जा रहा है। आईआईएमसी में इसके लिए किस तरह की तैयारी पर जोर है?

ऑनलाइन कक्षाएं हमारी मजबूरी हैं। कोरोना  जैसे संकट से डील करने का न हमारे तंत्र का अभ्यास, न हमारा है। लोंगों की जिंदगी अहम है। खासकर हमारे विद्यार्थी किसी संकट का शिकार न हों यही चिंता है। पहला सेमेस्टर ऑनलाइन ही चलेगा। तैयारी पूरी है। हमारा प्रशासनिक तंत्र और अध्यापकगण इसके लिए तैयार हैं। विद्यार्थी तो वैसे भी नए माध्यमों और  प्रयोगों का स्वागत ही करते हैं। ई-माध्यमों के साथ हमारी पीढ़ी भले सहज न हो, किंतु हमारे विद्यार्थी बहुत सहज हैं। 

पिछले दिनों आईआईएमसी में फीस बढ़ोतरी का मुद्दा काफी गरमाया रहा है, हालांकि फिलहाल यह मामला शांत है, इस बारे में आपका क्या कहना है और इस तरह के मुद्दों से किस तरह निपटेंगे?

किसी भी मामले में अपना अभ्यास निपटने-निपटाने का नहीं है। सहज संवाद का है, बातचीत का है। बातचीत से चीजें हल नहीं होतीं, तो लोग अन्य मार्ग भी अपनाते हैं। एक शासकीय संगठन होने के नाते हमारी सीमाएं हैं, हम हर चीज को मान नहीं सकते। किंतु छात्र हित सर्वोपरि है।  संवाद से रास्ते निकालेंगे। अन्यथा अन्य फोरम भी जहां लोग जाते रहे हैं, जाएंगे, जाना भी चाहिए।

पत्रकारिता में व्यावहारिक रूप में काफी बदलाव आए हैं। कोरोना काल में पत्रकारों ने अपनी जान जोखिम में डालकर ड्यूटी को अंजाम दिया है, यह बिल्कुल नई तरह की आपदा है। पत्रकारों की नई पौध को इस तरह की किसी भी स्थिति के लिए किस तरह व्यावहारिक रूप से तैयार करेंगे?

मैंने आपसे पहले भी कहा इस तरह के संकटों से निपटने का अभ्यास हमारे पास नहीं है। हम सब सीख रहे हैं। बचाव के उपाय भी अब धीरे-धीरे आदत में आ चुके हैं। पत्रकारिता हमेशा जोखिम भरा काम था। खासकर जिनके पास मैदानी या रिपोर्टिंग  दायित्व हैं। जान जोखिम में डालकर पत्रकार अपने कामों को अंजाम देते रहे हैं। कोरोना संकट में भी पत्रकारों के सामने सिर्फ संक्रमण के खतरे ही नहीं थे, कम होते वेतन, जाती नौकरियों के भी संकट थे। सबसे जूझकर उन्हें निकलना  होता है। फिर भी वे काम कर रहे हैं, समाज को संबल देने का काम कर रहे हैं। हमें भी ऐसी पीढ़ी का निर्माण करना है, जो जरा से संकटों से घबराए नहीं, संबल और साहस बनाए रखे। एक संचारक के नाते हम सबकी कोशिश होनी चाहिए कि समाज में गलत खबरें न फैलें, नकारात्मकता न फैले, लोग निराशा और अवसाद के शिकार न हों। उन्हें उम्मीदें जगाने वाली खबरें और सूचनाएं देनी चाहिए। हमारे विद्यार्थी बहुत प्रतिभावान हैं। वे अपने सामने उपस्थित सवालों और उनके ठोस तथा वाजिब हल निकालने की क्षमताओं से भरे हैं। मैं उन्हें बहुत आशा और उम्मीदों से देखता हूं। 

इस प्रतिष्ठित मीडिया शिक्षण संस्थान से पढ़कर निकले तमाम विद्यार्थी विभिन्न संस्थानों में ऊंचे पदों पर काम कर रहे हैं। IIMC को और अधिक ऊंचाइयों पर ले जाने के लिए क्या आपने किसी तरह की खास स्ट्रैटेजी बनाई है?

हमारे संस्थान की स्थापना की आज हम 56वीं वर्षगांठ मना रहे हैं। 17 अगस्त,1965 को तत्कालीन सूचना एवं प्रसारण मंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने इसका शुभारंभ किया था। मेरा सौभाग्य है कि एक खास  समय में मुझे इस महान संस्थान की सेवा करने का अवसर मिला है। मेरी कोशिश होगी इस महान संस्था की गौरवशाली परंपराओं में कुछ और सार्थक जोड़ सकूं। इसे भारतीय भाषाओं की पत्रकारिता का केंद्र बनाने, उन पर शोध अनुसंधान का काम हो, इसकी कोशिश होगी। अपने बहुत प्रतिभावान पूर्व विद्यार्थियों, पूर्व प्राध्यापकों, पूर्व महानिदेशकों से संवाद करते हुए, उनकी सलाह लेते हुए इसे जीवंत व ऊर्जावान परिसर बनाने की कोशिश होगी। जहां बिना छूआछूत के सभी विचारों और प्रतिभाओं का स्वागत होगा। एक समर्थ भारत बनाने में कम्युनिकेशन और कम्युनिकेटर्स बहुत खास भूमिका है, हम इस ओर जोर देंगे। 

नई शिक्षा नीति कितनी सही, कितनी गलत, इस बारे में क्या है आपका मानना?

नई शिक्षा बहुत सुविचारित और सुचिंतित तरीके से प्रकाश में आई है। इसको बनाने के पहले जो मंथन हुआ है, जिस तरह पूरे देश  के लोगों की राय ली गयी है, वह प्रक्रिया बहुत खास  है। इसमें भारतीयता, भारत बोध, नैतिक शिक्षा, पर्यावरण और भारतीय भाषाओं को सम्मान देने के विषय जिस तरह से संबोधित किए गए हैं, उसके कारण यह विशिष्ट बन गयी  है। उच्च शिक्षा को स्ट्रीम से मुक्त करना एक तरह का क्रांतिकारी फैसला है। 0 से  8 साल के बच्चों का विचार। जन्म से लेकर पीएचडी तक बच्चे की परवाह यह शिक्षा नीति करती है। मुझे लगता है कि नीति के तौर इसमें कोई समस्या  नहीं है। इसे जमीन पर उतारना एक कठिन काम है। इसलिए शिक्षाविदों, शिक्षा से जुड़े अधिकारियों और संचारकों की जिम्मेदारी बहुत बढ़ गयी है। इस शिक्षा नीति को हम उसके वास्तविक संकल्पों के साथ जमीन पर उतार पाए तो एक ऐसा भारत बनेगा जिसकी कल्पना हमारे राष्ट्रीय आंदोलन के नायकों ने की थी। मुझे लगता है कि हमारे प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी और केंद्र सरकार की मंशाएं बहुत स्पष्ट हैं, अब समय हमारे द्वारा किए जाने वाले क्रियान्वयन और डिलेवरी का है। निश्चय ही इस कठिन दायित्वबोध ने हम सबमें ऊर्जा का संचार भी किया है। 

एक आखिरी सवाल, पत्रकारिता के क्षेत्र में आने वाले नए विद्यार्थियों के लिए क्या संदेश देना चाहेंगे?

आज की पत्रकारिता दो आधारों पर खड़ी है, एक भाषा, दूसरा तकनीकी ज्ञान। तकनीक दिन-प्रतिदिन और माध्यमों के अनुसार बदलती रहती है। तकनीक ज्यादातर अभ्यास का मामला भी है। हम करते और सीखते जाते हैं। भाषा एक कठिन स्वाध्याय से अर्जित की जाती है। किंतु हमें हर तरह से भाषा में ही व्यक्त होना है। इसलिए हमारे युवा पत्रकारों को भाषा के साथ रोजाना का रिश्ता बनाना होगा। एक अच्छी भाषा में सही तरीके कही गयी बात का कोई विकल्प नहीं है। दूसरा हमें सिर्फ सवाल खड़े करने वाला नहीं बनना है, इस देश के संकटों के ठोस  और वाजिब हल तलाशने वाला पत्रकार बनना है। मीडिया का उद्देश्य अंततः लोकमंगल ही है। यही साहित्य का भी उद्देश्य है, हमारी सारी प्रदर्शन कलाओं का भी यही ध्येय है। इसके साथ ही देश की समझ। देश के इतिहास, भूगोल, संस्कृति, परंपरा, आर्थिक-सामाजिक चिंताओं,  संविधान की मूलभूत चिंताओं की गहरी समझ हमारी पत्रकारिता को प्रामणिक बनाती है। तभी हम समाज के दुखः-दर्द, उसकी चिंताओं को समझकर तथ्य और सत्य पर आधारित पत्रकारिता करने में समर्थ होते हैं। सामाजिक-आर्थिक न्याय से  युक्त, न्यायपूर्ण-समरस समाज हम सबका साझा स्वप्न है। पत्रकारिता अपने इस कठिन दायित्वबोध से अलग नहीं हो सकती।

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BCCI और IPL को लेकर वरिष्ठ खेल पत्रकार बोरिया मजूमदार ने कही ये बात

बीसीसीआई 18 अगस्त को आईपीएल के टाटइल स्पॉन्सर की घोषणा कर सकता है।

Last Modified:
Sunday, 16 August, 2020
boria-majumdar

‘इंडियन प्रीमियर लीग’ (आईपीएल) 2020 की टाइटल स्पॉन्सर चीनी कंपनी ‘वीवो’ (VIVO) ने इस साल लीग से हाथ खींच लिए हैं। वीवो ने पिछले दिनों घोषणा की है कि वह साल इस आयोजन की फ्रेंचाइजी का हिस्सा नहीं रहेगा। अब सबकी निगाहें बीसीसीआई पर लगी हुई हैं। इसके साथ ही बीसीसीआई ने नए टाइटल स्पॉन्सर की तलाश शुरू कर दी। अब खबर है कि बीसीसीआई 18 अगस्त को टाइटल स्पॉन्सर की घोषणा कर सकती है।

इस बारे में क्रिकेट की गहराई से समझ रखने वाले जाने-माने खेल पत्रकार, लेखक और शिक्षाविद बोरिया मजूमदार से हमारी सहयोगी वेबसाइट एक्सचेंज4मीडिया (exchange4media) ने बातचीत की। इस दौरान मजूमदार ने बताया कि इस साल टाइटल स्पॉन्सरशिप के लिए किस तरह भारतीय कंपनियां आगे आ रही हैं और बीसीसीआई कैसे इसे अपनी प्रतिष्ठा के रूप में देखता है।  

पेश हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

क्या बीसीसीआई दोबारा से अपनी पूर्ववत स्थिति में आ सकता है?

इस स्वतंत्रता दिवस पर भारतीय खेल गलियारों में सबसे ज्यादा यही सवाल उठा। आईपीएल की टाइटल स्पॉन्सरशिप के लिए कई बड़ी भारतीय कंपनियां आगे आई हैं। इसमें कोई शक नहीं है कि यह आयोजन एक बार फिर मार्केट के सारे अनुमानों को मात दे देगा और आश्चर्यचकित कर देगा। इस साल वीवो के अलग हटने से 440 करोड़ रुपये के नुकसान के बाद तमाम लोगों को लगता है कि वर्तमान आर्थिक परिस्थितियों में बीसीसीआई 200 करोड़ रुपये कमा लेगा।   

संभावना है कि यह कम से कम 100 करोड़ रुपए ज्यादा यानी कुल 300 करोड़, जिनमें से 200 करोड़ से ज्यादा टाइटल स्पॉन्सरशिप से और 100 करोड़ दो अन्य ऑफिशियल पार्टनर से कमा लेगा। खास बात यह है कि अनिश्चितता के इस दौर में भी भारतीय कंपनियां (India Inc) इस आयोजन का सपोर्ट करने के लिए पूरी तरह दृढ़ हैं। दूसरा आप इन कंपनियों को देखें और तीसरा लोकल फ्लेवर भी इसमें अपनी भूमिका निभाएगा।  

यदि हम इंडिया इंक की बात करें तो आपको क्या लगता है, कौन सा ब्रैंड्स इस साल प्रमुख भूमिका निभाएगा?

टाटा, जो 2017 के बाद से क्रिकेट में अपने पहले प्रमुख स्थान पर नजर जमाए हुई है, इस भारतीय दिग्गज की वैश्विक मार्केट में भी अच्छी पकड़ है। इसने वर्ष 1920 के ओलंपिक्स में न सिर्फ इंडियन टीम को फंड दिया था, बल्कि भारतीय स्पोर्ट्स की दुनिया में लगातार बने हुए हैं। ऐसे समय में उनका आगे आना और इस तरह का कदम उठाना कोई आश्चर्य की बात नहीं है, जब प्रधानमंत्री लगातार आत्मनिर्भरता की बात कर रहे हैं।

टाइटल स्पॉन्सरशिप की इस दौड़ में ‘ड्रीम11’ (Dream11) और ‘बायजूस’ (Byju’s) जैसे दो बड़े ब्रैंड्स भी शामिल हैं। वहीं, हमें ‘अनएकैडमी’ (Unacademy) को भी नहीं भूलना चाहिए, जो डिजिटल एजुकेशन के क्षेत्र में तेजी से उभरता हुआ ब्रैंड है। दो युवा भारतीय एंटरप्रिन्योर्स द्वारा शुरू की गई ‘ड्रीम11’ का अब आठ करोड़ से ज्यादा सबस्क्राइबर बेस है और इसे सिर्फ इंडिया में खेला जाता है। वहीं, ‘बायजूस’ भी पूरी तरह इंडियन ब्रैंड है, जिसने डिजिटल एजुकेशन को पूरी तरह बदल दिया है।

खास बात यह है कि दोनों ब्रैंड्स भारतीय क्रिकेट से काफी नजदीकी से जुड़े हुए हैं और एक बार फिर जरूरत के समय ‘आईपीएल’ के लिए आगे आए हैं। ‘अनएकैडमी’ (Unacademy) जो डिजिटल एजुकेशन के क्षेत्र में कड़ी टक्कटर दे रही है, उसके लिए ‘आईपीएल’ के साथ तेजी से आगे बढ़ने का अच्छा मौका है।

क्या टाइटल स्पॉन्सरशिप का मुद्दा अब बीसीसीआई के लिए प्रतिष्ठा का मुद्दा बन गया है?

जी, यह बीसीसीआई के लिए प्रतिष्ठा का सवाल है। इन भारतीय कंपनियों के लिए खेल में गहरी दिलचस्पी के साथ-साथ ब्रैंड की मजबूती के लिए आईपीएल की रक्षा करना एक गंभीर प्रतिबद्धता है। तमाम लोगों ने सौरव गांगुली के बयान को लेकर बीसीसीआई की क्षमता पर संदेह जताया है, लेकिन तमाम लोगों ने इस इंडियन क्रिकेट ब्रैंड की ताकत को नहीं समझा है। त्योहारी सीजन पर आईपीएल शुरू होने से यह संभावना है कि टेलीविजन पर इस टूर्नामेंट को अब तक सबसे अधिक दर्शक देखेंगे। ऐसा इसलिए क्योंकि मेजबान ब्रॉडकास्टर ‘स्टार स्पोर्ट्स’ टूर्नामेंट को 7 से अधिक भाषाओं में कवर करेगा, जिसकी जड़ें देश के हर कोने-कोने तक जुड़ी हुई हैं।

हालांकि टाटा कंपनी सर्वव्यापी है, लेकिन ‘बायजूस’ की डिजिटल तकनीक का उपयोग अब उपनगरीय भारत में भी है। इनके लिए आईपीएल एक ऐसा खेल है, जिसे हर कोई देखना पसंद करता है। लिहाजा इनके लिए अगली बड़ी छलांग के लिए यह एकदम सही लॉन्चिंग पैड है। फिर चाहे उनका प्रतिद्वंद्वी ‘अनएकैडमी’ ही क्यों न हो, IPL के जरिए हर  भारतीय के ड्राइंग रूम में प्रवेश करने का अवसर है। ‘ड्रीम11’  से जुड़े लोग भी लगभग हर जगह हैं। 8 करोड़ भारतीय फैंटेसी गेम खेलते हैं,  जिनमें एक दिहाड़ी मजदूर से लेकर कॉरपोरेट सीईओ तक शामिल हैं। लगभग हर भारतीय की एक फैंटेसी स्पोर्ट्स टीम है, जिसमें मैं भी शामिल हूं।

18 अगस्त को टाइटल स्पॉन्सरशिप की घोषणा होने की संभावना है, आपको क्या लगता है कि परिणाम क्या होगा?

इन परिस्थितियों से आश्चर्यचकित न हों, मंगलवार को ही बीसीसीआई आने वाले आईपीएल टाइटल स्पॉन्सरशिप की घोषणा करेगा। भविष्यवाणी करें, तो यह  अपेक्षित राजस्व से अधिक उत्पन्न करेगा और फिर एक स्ट्रॉन्ग स्टेटमेंट देगा, जो इंडियन स्पोर्ट्स इंडस्ट्री के लिए प्रोत्साहन का काम करेगा।

वहीं, कुछ लोगों ने आईपीएल के संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) में होने पर सवाल उठाए हैं और इस तरह की दलीलें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। आईपीएल सिर्फ विराट कोहली या महेंद्र सिंह धोनी के बारे में नहीं है। जब हम उन्हें खेल में सबसे आगे देखते हैं, तो यह पूरी स्पोर्ट्स इंडस्ट्री को प्रभावित करता है, जिसमें ब्रॉडकास्टर, मीडिया, स्टेट एसोसिएशन, स्पोर्ट्स गुड्स कंपनीज, फर्स्ट क्लास क्रिकेटर्स और कई अन्य शामिल हैं।

मनी जनरेट होती है, तो इससे हर कोई जुड़ा होता है, हर किसी को लाभ होता है और यदि टूर्नामेंट आयोजित नहीं किया जाता, तो इससे कई लोगों की जिंदगी  और उनकी आजीविका पर असर पड़ता। हालांकि फ्रंट रैंक्ड के स्टार्स को तो इतना नहीं, लेकिन बैकग्राउंड से लोगों पर बहुत ज्यादा प्रभाव पड़ेगा, जो इस प्रतियोगिता में समान हितधारक हैं। वैसे मैं यह देखने के लिए उत्सुक हूं कि मंगलवार को क्या होगा। लेकिन एक बार फिर कहना चाहूंगा कि पुरानी बातों पर न जाएं, बीसीसीआई इंडिया इंक (India Inc) के सपोर्ट से मार्केट को सरप्राइज करेगा।

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पिता से सीखीं इन तीन खास बातों का हमेशा ध्यान रखती हैं इंडिया टुडे समूह की कली पुरी

‘बिजनेस वर्ल्ड’ और ‘एक्सचेंज4मीडिया’ ग्रुप के चेयरमैन व एडिटर-इन-चीफ डॉ. अनुराग बत्रा के साथ इंडिया टुडे ग्रुप की वाइस चेयरपर्सन कली पुरी ने तमाम पहलुओं पर बातचीत की

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Thursday, 06 August, 2020
Last Modified:
Thursday, 06 August, 2020
Kalli Purie

एक्सचेंज4मीडिया (exchange4media) समूह की जानी-मानी वीकली मैगजीन ‘इम्पैक्ट’ (IMPACT) द्वारा मीडिया, एडवर्टाइजमेंट और मार्केटिंग में इस साल अपनी खास पहचान बनाने वाली 50 महिलाओं की लिस्‍ट (IMPACT’s 50 Most Influential Women, 2020) से पांच अगस्त को पर्दा उठ गया। शाम पांच बजे से वर्चुअल रूप से आयोजित एक कार्यक्रम में इस लिस्ट से पर्दा उठाया गया। इस साल इस लिस्ट में ‘इंडिया टुडे’ (India Today) समूह की वाइस चेयरपर्सन कली पुरी ने पहला स्थान हासिल किया है।

इस मौके पर ‘बिजनेस वर्ल्ड’ और ‘एक्सचेंज4मीडिया’ ग्रुप के चेयरमैन व एडिटर-इन-चीफ डॉ. अनुराग बत्रा के साथ एक बातचीत में कली पुरी ने अपने पिता अरुण पुरी के साथ काम करने के अपने अनुभव और आज के डिजिटल युग में न्यूज टेलिविजन की स्थिति समेत तमाम पहलुओं पर अपने विचार रखे। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

इंडिया टुडे ग्रुप के चेयरमैन और एडिटर-इन-चीफ अपने पिता अरुण पुरी के साथ काम करने के अनुभव के बारे में बताएं?

इस ग्रुप में मुझे 21 साल और कुल मिलाकर 25 साल काम करते हुए हो गए हैं। इस दौरान मुझे उनके (पिता के) साथ काम करने का काफी समय मिला है। उनके साथ काम करना काफी अच्छा लगता है, क्योंकि हम काफी प्रोफेशनल तरीके से काम करते हैं। काम के दौरान वह सिर्फ एपी होते हैं, जबकि घर पर ऐसा नहीं होता है। इसी तरह, घर पर क्या होता है, यह हम ऑफिस से पूरी तरह अलग रखते हैं। काफी शुरुआत में जब हमने साथ काम करना शुरू किया था, तभी इस बारे में यह फैसला ले लिया था कि हमें प्रोफेशनल व पारिवारिक रिश्तों को अलग-अलग रखना है। इसने हमें साथ-साथ मिलकर काम करने में काफी मदद की है। एक बॉस के रूप में उन्हें हर काम में परफेक्शन चाहिए होता है, लेकिन वह दूसरों को अपने आइडिया व दृष्टिकोण रखने का भी मौका देते हैं। इतने वर्षों में संस्थान को आगे ले जाने में उन्होंने जो दृष्टिकोण अपनाया है और पत्रकारिता के लिए उनका जो प्यार है, वह आपको अपने पथ से भटकने नहीं देता। इसलिए एक लाइट हाउस के रूप में हमारा मार्ग हमेशा काफी बेहतर रहा है। इस बात को लेकर हम पूरी तरह स्पष्ट हैं कि हम किस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।

ऐसी कौन से तीन प्रमुख बातें हैं, जो आपने अपने पिता से सीखी हैं?

अपने पिता से जो तीन खास चीजें मैंने सीखी हैं, वे हैं चीजों पर विस्तार से ध्यान देना, दूसरा अपने बिजनेस अथवा काम पर पूरा ध्यान लगाना और तीसरी बात यह है कि हमेशा सही चीजें करना। सही चीजें करें और लंबे समय में हमेशा आपको इसका फायदा मिलता है।

न्यूज टेलिविजन को लेकर आपका क्या कहना है, खासकर कोविड-19 के बाद डिजिटल युग की बात करें तो? इंडिया टुडे ग्रुप किस तरह से इसकी तैयारी कर रहा है?

जब इंडिया टुडे पाक्षिक (fortnightly) से साप्ताहिक (weekly) में तब्दील हुई थी, तब मैं वहीं थी। तब ग्रुप में मेरी एंट्री हुई ही थी और मैं एक इंटर्न के तौर पर उनके लिए क्रिएटिव एडवर्टाइजिंग कर रही थी। टीवी का जो सफर है, वह रोलर कोस्टर (roller-coaster) की तरह रहा है। मैं प्रिंट बैकग्राउंड से आई थी और मैंने डिजिटल में 20 साल से ज्यादा समय गुजारा है। अब के टीवी में पहले की टीवी जैसा कुछ नहीं है। शुरुआती दिनों में चेयरमैन खुद बैठते थे और प्रत्येक एंकर द्वारा बोले गए हर शब्द पर नजर रखते थे, क्योंकि ‘आजतक’ की शुरुआत सिर्फ 30 मिनट के बुलेटिन के तौर पर हुई थी और इसके बाद यह 24x7  चैनल बन गया। मैं अब उस तरह इसे कंट्रोल नहीं कर सकती, क्योंकि हमारे पास अब पूरा डिजिटल सिस्टम और सोशल मीडिया है।

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पत्रकारिता में होनी चाहिए सच की 'वैक्सीन': सुधीर चौधरी

टीवी न्यूज की दुनिया में पिछले 20 वर्षों में काफी परिवर्तन आए हैं। इस दौरान इसकी व्युअरशिप में काफी वृद्धि हुई है।

Last Modified:
Monday, 27 July, 2020
Sudhir Chaudhary Dr Annurag Batra

टीवी न्यूज की दुनिया में पिछले 20 वर्षों में काफी परिवर्तन आए हैं। इस दौरान इसकी व्युअरशिप में काफी वृद्धि हुई है। हालांकि डिजिटल के आने से इस पर थोड़ा प्रभाव जरूर पड़ा है, इसके बावजूद इसका आगे बढ़ना जारी है। कोविड-19 के दौरान टीवी न्यूज की व्युअरशिप में काफी इजाफा देखने को मिला है। इस तरह की तमाम बातों को लेकर ‘बिजनेस वर्ल्ड’ और ‘एक्सचेंज4मीडिया’ ग्रुप के चेयरमैन व एडिटर-इन-चीफ डॉ. अनुराग बत्रा ने शनिवार को ‘जी न्यूज’ (Zee News) के एडिटर-इन-चीफ सुधीर चौधरी के साथ ‘वन टू वन’ (One To One) बातचीत की। वेबिनार सीरीज के तहत दोपहर तीन दस बजे से हुए इस कार्यक्रम का टॉपिक ' 20 Years of News TV and its Growing Relevance' रखा गया था, जिसमें सुधीर चौधरी ने खुलकर अपनी बात रखी।

प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

पिछले 120 दिन आपके लिए किस तरह के रहे हैं?

पिछले दो-तीन महीने खासकर मार्च के बाद से लेकर दिन काफी मुश्किल भरे रहे हैं। हालांकि, लोगों को हम स्क्रीन पर काफी रिलैक्स दिखाई देते हैं, क्योंकि हम लगातार अपना काम कर रहे हैं, लेकिन मुझे लगता है कि पहली बार देश ने इस समय पहचाना कि मीडिया एक आवश्यक सेवा (Essential Service) है। मीडिया को इस तरह की पहचान मिलना एक बड़ी बात है। इससे यह पता चलता है कि इस तरह की महामारी में मीडिया की कितनी अहम भूमिका होती है। 

दूसरी बात ये कि यह हमारे लिए कितना चैलेंजिग है। देखिए, लगातार 24 घंटे काम करना है। संक्रमित नहीं होना है और न्यूज रूम के ऑपरेशंस भी नहीं रुकने चाहिए। आपको खुद स्वस्थ रहना है और अपने परिवार की देखभाल भी करनी है। यह भी देखना है कि इस महामारी से कैसे निपटना है, क्योंकि इसका फुटप्रिंट दुनिया में कहीं नहीं है, इस तरह की स्थिति पहली बार आई है। इस समय जब 24 घंटे के न्यूज ऑपरेशंस लगातार चल रहे हैं, मुझे लगता है कि इसका एक पहलू तो ये है कि हमने अपने ऑफिस में क्या सुरक्षात्मक कदम उठाए, लेकिन उससे बड़ा पहलू ये है कि इस समय भावनात्मक मजबूती चाहिए थी। आपको पता ही है कि ‘जी न्यूज’ में शुरुआत में ही कई सारे लोग इस महामारी से संक्रमित हो गए थे। हमारे ऑफिस में बड़ी संख्या में हमारे रिपोर्टर्स कोविड पॉजिटिव हो गए थे। उसके बाद अजीब सा माहौल था, हमें ये देखना था कि हमारे न्यूजरूम के ऑपरेशंस चलते रहें और हमारे और लोग बीमार न पड़ें। एक समय ऐसा था कि जी न्यूज का पूरा परिचालन सिर्फ दस प्रतिशत कार्यबल पर चल रहा था। हमने ज्यादातर लोगों को घर से काम (वर्क फ्रॉम होम) का ऑप्शन दे दिया था।

एक टीम लीडर के रूप में मेरे सामने सबसे बड़ी चुनौती थी कि मैं क्या करूं? उस समय सारे लोग कहते थे कि वर्क फ्रॉम होम करो। लेकिन मैंने उस समय ये निर्णय लिया कि मैं तमाम एहतियात बरतते हुए रोजाना ऑफिस जाऊंगा। कोविड-19 के दौर में एक दिन भी ऐसा नहीं हुआ, जब मैं ऑफिस नहीं गया और वहां जाकर मैंने लोगों को प्रोत्साहित किया। देखिए, भावनात्मक मजबूती को बढ़ाना और उस डर को दूर करना बहुत जरूरी था। लोगों को ये बात पता नहीं चल पाती कि जब एक रिपोर्टर कंटेंटमेंट जोन में रिपोर्टिंग के लिए जाता है या किसी अस्पताल में रिपोर्टिंग के लिए जाता है तो उस रिपोर्टर के मन में क्या चल रहा होता है, उसकी फैमिली के मन में क्या चल रहा होता है और जब आपको पता होता है कि जी न्यूज में 50 कोविड19 पॉजिटिव लोग हैं तो बाकी के लोग काम करना चाहते हैं या उन पर क्या गुजरती है, समझ सकते हैं। मुझे लगता है कि टीम भावना की इससे बड़ी मिसाल कोई हो नहीं सकती, जब लोगों ने इस सबके बावजूद कहा कि हम काम करेंगे।

हम लोग एक दिन के लिए भी, एक मिनट के लिए भी इस ऑपरेशन को रोकेंगे नहीं। तमाम जरूरी एहतियात बरतते हुए सभी ने यहां अपना काम किया। चैनल्स में कार्यरत एम्पलॉयीज की फैमिली की बात करें तो उन्होंने भी काफी सपोर्ट किया और उनको एक दिन भी काम पर जाने के लिए नहीं रोका। इसलिए मेरा मानना है कि यह काफी मुश्किल और चुनौतीपूर्ण समय रहा, जिसने यह दिखा दिया कि कौन इस तरह की परिस्थितियों का मजबूती से सामना कर सकता है और कौन नहीं। यह हमारे लिए बहुत बड़ी सीख थी। आपने यह भी देखा होगा कि इस दौरान बहुत सारे लोगों की नौकरियां चली गईं और तमाम लोगों की सैलरी में कटौती हुई, लेकिन मुझे यह बताते हुए काफी खुशी है कि न तो हमारे यहां से किसी की नौकरी गई और न ही किसी की सैलरी में कटौती की गई।

‘जी’ में काम करते हुए आपको आठ साल हो गए हैं। ‘जी’ के साथ आपका अब तक का यह सफर कैसा रहा है?

‘जी’ में मेरा अब तक का सफर बहुत ही शानदार रहा है। पहली बात तो यह है कि मुझे इस ब्रैंड पर काफी गर्व है। ‘जी’ एक ऐसा ब्रैंड है, जिसे देश में लगभग हर परिवार में बच्चों से लेकर घर के बुजुर्ग तक सभी जानते हैं। ‘जी’ इस देश का पहला सैटेलाइट चैनल है। पहला एंटरनेटनमेंट चैनल है। ‘जी न्यूज’ पहला न्यूज चैनल है। जब मैं 2012 में यहां आया था, तब कॉम्प्टीशन बहुत बढ़ रहा था, लोग लगातार आगे निकल रहे थे। ‘जी’ को उस समय 2.0 वर्जन में जाने की बहुत ज्यादा जरूरत थी। मैं जब आया तो मैंने देखा कि अब हमें अगले लेवल पर जाना होगा और जी 2.0 लॉन्च करना होगा। इसके लिए हमने अपनी प्रोग्रामिंग में थोड़ा बदलाव किया। आपको याद होगा कि वर्ष 2013 के आसपास नेशनलिज्म यानी राष्ट्रवाद का कॉन्सैप्ट जिसे कुछ लोग आजकल एक निगेटिव शब्द मानते हैं, इस राष्ट्रवाद को सबसे पहले इंट्रोड्यूस करने वाला सबसे पहला चैनल ‘जी’ था। इसी चैनल ने सबसे पहले यह बताया था कि लोगों का मन बदल रहा है। लोग न सिर्फ सत्ता में परिवर्तन चाहते हैं, लोग विचारधारा में परिवर्तन चाहते हैं और लोगों की विचारधारा को लंबे समय से दबाया जा रहा है। मीडिया में यह बात खुलकर किसी में कहने की हिम्मत नहीं थी, क्योंकि इसमें रिस्क था। रिस्क ये था कि ये आरोप लग सकता था कि आप एक खास विचारधारा को सपोर्ट कर रहे हैं, किसी खास पार्टी को आप सपोर्ट कर रहे हैं और सांप्रदयिक कहलाने का रिस्क था। लेकिन मेरा मानना है कि राष्ट्रवाद एक पॉजिटिव शब्द है। सभी को अपने देश को और देश के लोगों को प्यार करना चाहिए। आपने देखा होगा कि राष्ट्रवाद अब एक फैशन बन गया है और बाकी के तमाम चैनल भी उस लाइन को फॉलो करते हैं।

आप उन संपादक/एंकर्स और मीडिया प्रोफेशनल्स में से हैं, जिन्होंने टीवी से अपना करियर शुरू किया और पिछले 20 वर्षों में आपने न्यूज चैनल्स में हर तरह की पोजीशन निभाई है। आपने इनपुट में काम किया है, आउटपुट में काम किया है, स्क्रिप्ट राइटिंग में काम किया है, रिपोर्टिंग की, संपादक बने और बड़े एंकर बने और अब सीईओ हैं, ये बताएं कि सुधीर चौधरी किस तरह से हरफनमौला बन गए?

देखिए, इसका एक बड़ा कारण तो यह था कि जब मैं ‘इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मास कम्युनिकेशन’ (IIMC) से पढ़कर बाहर निकला तो उस समय मैं इस बात को लेकर पूरी तरह स्पष्ट था कि मुझे क्या करना है। आज जो छात्र पढ़ाई कर रहे हैं, यह उनके लिए भी काफी महत्वपूर्ण है कि क्या वो इस बात को लेकर बिल्कुल स्पष्ट हैं कि वो क्या करना चाहते हैं और क्या नहीं करना चाहते हैं। अपनी बात करूं तो आईआईएमसी में पढ़ाई के दौरान 1994 में मैंने ये तय किया था कि मैं टीवी करना चाहता हूं और इसी में अपना करियर बनाना है। मैं सोच रखा था कि मुझे प्रिंट मीडिया में नहीं जाना है। मुझे लगता था कि मैं टीवी के लिए बना हूं। उस समय देश में एक भी न्यूज चैनल नहीं था, सिर्फ दूरदर्शन था। उस समय मेरे प्रोफेसर्स समेत सभी लोगों ने कहा था कि आप गलत रास्ते का चुनाव कर रहे हो, क्योंकि उस समय टीवी न्यूज इंडस्ट्री नहीं थी। उस समय संसाधन भी काफी सीमित थे। लेकिन मैंने कोशिश की और शुरू से ही टीवी में नौकरी की। इसलिए मैं कह सकता हूं कि टीवी में छोटे पद से लेकर सीईओ तक का सफर मैंने किस तरह तय किया है। टीवी का कोई ऐसा विभाग नहीं है, जहां मैंने काम न किया हो। मेरी नजर में दो तरह के संपादक होते हैं। एक वो जो नीचे से ऊपर जाते हैं, और दूसरे वो जो ‘पैरा जंपिंग’ करके यानी सीधे ऊपर से आते हैं। मैं नीचे से ऊपर जाने वाले संपादकों में से हूं। मैं एक-एक सीढ़ी चढ़कर यहां तक पहुंचा हूं। इससे एक फायदा ये हुआ कि एक तो प्रैक्टिस अच्छी हो गई, दूसरा मैं इस मीडियम को समझने लगा। इसमें सबसे आसानी होती है कि आप अपनी टीम के प्रत्येक मेंबर को बहुत अच्छे से समझते हो, क्योंकि आप जानते हो कि जहां आज वह काम कर रहा है, वहां आप एक समय रह चुके हो।  

अब आप एडिटर और एंकर के साथ सीईओ भी हैं। आपने बिजनेस पक्ष को कैसे समझा और आप जी न्यूज में क्या बदलाव ला रहे हैं? आप एडिटोरियल और बिजनेस में किस तरह सामंजस्य बिठाकर चलते हैं?

आप सही कह रहे हैं। किसी समय में सेल्स और न्यूजरूम के बीच एक ‘चाइनीज वॉल’ हुआ करती थी। हालांकि, धीरे-धीरे वह खत्म होती चली गई। जिस दिन से न्यूज चैनल्स को लेकर टैम की रेटिंग आनी शुरू हुई, उसके कुछ दिनों के बाद ही इस ‘चाइनीज वॉल’ में दरार आने लगी थी, क्योंकि सेल्स टीम आपको बताने लगी थी कि हमारी सेल इस स्टेट में कम है, इस स्टेट में ज्यादा है या इस मार्केट में कम है और इस मार्केट में ज्यादा है। मेरा आज भी मानना है कि चाहे टैम की रेटिंग्स हों या बार्क की, ये एडवर्टाइजर्स के लिए होती हैं। ये रेटिंग्स हमारे बिजनेस क्लाइंट्स के लिए होती हैं। जब सेल्स और न्यूजरूम के बीच ये दीवार खत्म हुई तो लगभग सभी चैनल्स अपना कंटेंट बार्क रेटिंग के लिए बनाने लगे। आज भी जब प्रत्येक गुरुवार को बार्क की रेटिंग आती है तो हर चैनल लेकर बैठता है कि मेरा कौन सा शो अच्छा कर रहा है और कौन सा शो खराब कर रहा है। वह बार्क की रेटिंग के हिसाब से देखता है कि लोगों की पसंद क्या है, नापसंद क्या है। मेरा ये कहना है कि इसमें हमारी थोड़ी सी कैलकुलेशन गलत है। जिस दिन हम यो सोचने लगेंगे कि मैं अपना कंटेंट लोगों (आम दर्शकों) के लिए बनाऊंगा और लोग उसे देखेंगे तो रेटिंग तो आपकी अपने आप आएगी ही। और यदि आपकी रेटिंग आ रही है तो आपको रेवेन्यू तो आएगा ही। मैं इसमें एंटरटेनमेंट चैनल्स की बात नहीं कर रहा हूं। उनका अलग हिसाब-किताब है, लेकिन न्यूज में आपकी एक सामाजिक जिम्मेदारी होती है। आप न्यूज में रेटिंग्स के लिए एक ‘लक्ष्मण रेखा’  को पार नहीं कर सकते हैं।

बतौर एडिटर हमेशा मैंने इस बात का ध्यान रखा कि उस चाइनीज वॉल में भी एक लक्ष्मण रेखा रहे। वो टूट तो गई है, लेकिन एक लक्ष्मण रेखा रहे। एक एडिटर की बात करें तो उसे अपने सभी प्रोग्राम अच्छे लगते हैं और सीईओ उस प्रॉडक्ट को अपने दिमाग से सोचता है, बस ये दिल और दिमाग का तालमेल रहता है। कई बार यदि दो अलग-अलग लोगों के लिए इस तरह की स्थिति आती है कि एक दिल से चल रहा है और दूसरा दिमाग से तो कई बार अप्रिय स्थिति आ जाती है और कई बार ऐसा लगता है कि दोनों एक-दूसरे के साथ नाइंसाफी कर रहे हैं। इसलिए मुझे ऐसा लगा कि स्टार्टअप कल्चर अपनाना चाहिए। यदि मैं संपादक और सीईओ दोनों की भूमिका में हूं तो मैं इस बात को ज्यादा बेहतर समझ सकता हूं कि मैं अपने बनाए हुए प्रॉडक्ट को मार्केट में क्लाइंट्स के बीच लेकर जाता हूं और उन्हें चैनल पर आने के लिए कहता हूं तो उसमें काफी आसानी होती है, क्योंकि मैं अपने प्रॉडक्ट को बहुत अच्छे से समझता हूं और मैंने काफी मेहनत व दिल से उसे तैयार किया है।

आप ट्विटर पर काफी सक्रिय रहते हैं। इतनी व्यस्तता के बावजूद आखिर ट्विटर के लिए इतना समय कैसे निकाल लेते हैं?

तमाम लोग इस बात को नहीं समझते हैं कि अब व्युअर्स की रिदम बदल चुकी है और अब ट्विटर इस गेम का अहम हिस्सा है और ट्विटर मेरे संस्थान का हिस्सा है। पहले हम कहते थे कि टीवी स्क्रीन हमारी फर्स्ट स्क्रीन है और स्मार्ट फोन स्क्रीन हमारी सेकेंड स्क्रीन है। हम दोनों को ध्यान में रखकर चलते थे, लेकिन फर्स्ट स्क्रीन को ज्यादा महत्व देते थे, लेकिन अब हमने अपनी अप्रोच बदली है और सेकेंड स्क्रीन को फर्स्ट स्क्रीन कहना शुरू किया है और सेकेंड स्क्रीन को फर्स्ट स्क्रीन कहना शुरू किया है। ट्विटर या यूं कहें कि सोशल मीडिया पर एक बहुत बड़ा वर्ग है, जो हर समय टीवी के सामने नहीं है। मैंने सोशल मीडिया को एक टूल की तरह इस्तेमाल किया है।

जैसे-जैसे सोशल मीडिया का विस्तार होता जा रहा है, क्या न्यूज चैनल इस ग्रोथ के साथ तालमेल बिठा पा रहे हैं। क्या आपको लगता है कि किसी स्टेज पर आकर पूरी तरह डिजिटली प्रॉडक्ट पारंपरिक प्रॉडक्ट्स के मुकाबले ज्यादा प्रभावकारी होंगे या हाइब्रिड मिक्स प्रॉडक्ट होंगे?   

मुझे लगता है कि भारत जैसे देश में शुरुआती स्टेज पर कुछ समय के लिए हाइब्रिड मॉडल काम करेगा। क्योंकि अभी ‘भारत’ और ’इंडिया’ में बहुत फर्क है। भारत को ध्यान में रखते हुए कुछ वर्षों तक आपको समानांतर फीड चलानी पड़ेगी, लेकिन यह गैप बहुत तेजी से कम होता जा रहा है और आपने देखा होगा कि कोविड-19 के दौरान यह गैप और ज्यादा तेजी से भर गया है। आने वाले दिनों में मुझे लगता है कि ऐप्स नए टेलिविजन बनने जा रहे हैं। कोई भी प्रॉडक्ट चाहे वो न्यूज का हो अथवा एंटरटेनमेंट का, वह आप तक अपने ऐप के जरिये पहुंचेगा, टीवी के जरिये नहीं।

आपका शो ‘डीएनए’ लंबे समय से नंबर वन बना हुआ है। इस बारे में कुछ बताएं?  

जब हमने डीएनए शो शुरू किया था तो हमारे सभी रिसर्चर्स ने ये बताया था कि न्यूज सिर्फ पुरुष देखते हैं। महिलाएं, युवा और बच्चे न्यूज नहीं देखते हैं। इसलिए सिर्फ पुरुष ओरिएंटेड कंटेंट बनाइए और उसमें अपनी व्युअरशिप डालिए। लगभग सारा मीडिया यही कर रहा था। उस समय जब मुझे ये बताया गया तो उस समय मेरे दिमाग में ये चल रहा था कि महिलाएं न्यूज क्यों नहीं देखतीं। इस देश में बच्चे और युवा न्यूज क्यों नहीं देखते? इसका कारण पता लगाना चाहिए और जब हम इसमें गहराई में गए तो हमें लोगों की पसंद का पता चला। इसके लिए हम देश के कोने-कोने में गए और लोगों से बात की कि आखिर वे किस तरह का कंटेंट देखना चाहते हैं। इसके बाद हमने यह बदलाव किए और ये बदलाव मैंने सबसे पहले अपने शो में किए। इसलिए आपने देखा होगा कि डीएनए की व्युअरशिप अलग है, क्योंकि हमारे सब्जेक्ट्स अलग होते हैं, हमारी भाषा अलग होती है। आपको ऐसा नहीं लगेगा कि आप एक विशुद्ध हिंदी चैनल देख रहे हैं, जिसमें क्लिष्ट भाषा होती है। मीडिया की जो भाषा आप पढ़ते हैं और सुनते हैं, वह कभी आप बोलचाल में इस्तेमाल नहीं करते। यही कारण है कि हमारे देश के लोग टीवी चैनल्स से कनेक्ट नहीं कर पाते, क्योंकि वे इसकी भाषा को समझ नहीं पाते।

कई बार आपकी आलोचना होती है कि आप एक पार्टी या विचारधारा को ज्यादा महत्व देते हैं, इस पर आपका क्या कहना है?
अपने बारे में ये आरोप मैं बहुत सुनता हूं। हमारे देश में जो ट्रेडिशनल पत्रकारिता है अथवा जो ट्रेडिशनल पत्रकार काम कर रहे हैं, वो जर्नलिज्म में ये समझते हैं कि जितना सरकार के खिलाफ स्टोरी करेंगे, उतना ज्यादा उनका नाम होगा। उतना ज्यादा उनका न्यूज सेंस वैल्यू होगा, चाहे उसमें दम हो या न हो। वे सोचते हैं कि यही पत्रकारिता है। दूसरा ये कि हमारे यहां तमाम पत्रकारों को सेक्युलर बनने का बहुत शौक है, लेकिन उन्हें सब धर्मों को बराबर का दर्जा तो देना चाहिए। गलवान में इतने भारतीय सैनिक शहीद हुए। ऐसे लोग अपनी सेना से तो ये सवाल पूछते हैं कि आप वहां हथियार लेकर क्यों नहीं गए, आपने ये क्यों नहीं किया या वो क्यों नहीं किया, लेकिन ये लोग चीन के बारे में एक शब्द भी नहीं बोलना चाहते और जो बोलना भी चाहता है, उसे ट्रोल करते हैं।

एक चीज और मैं बोलना चाहता हूं, जो बहुत खतरनाक ट्रेंड है कि यदि ऐसा कोई बोलता है, तो उसके खिलाफ एफआईआर होगा, उसे कानूनी केसों में फंसाया जाएगा। जान से मारने की धमकियां दी जाएंगी। ट्विटर पर आपकी ट्रोलिंग होगी, दुष्प्रचार होगा। मेरे विकिपीडीया पेज पर जाकर लोग मेरे बारे में गलत जानकारी लिखते हैं। आज यदि आप मेरे विकिपीडिया पेज पर जाएंगे तो मेरे बारे में सारी जानकारी गलत मिलेगी। 
मैं बहुत खुश हूं कि अब सिस्टम बदल रहा है और जनता इस एजेंडे को बहुत अच्छे से समझ गई है। इसलिए आपने देखा होगा कि जो इस तरह का एजेंडा चलाते थे, उन चैनल्स/रिपोर्टर्स की व्युअरशिप काफी नीचे गिरी है। आज जब लोग पूरी दुनिया में कोविड-19 की वैक्सीन ढूंढ रहे हैं, मैं बस ये चाहता हूं कि इस देश में, जर्नलिज्म में एक सच की वैक्सीन होनी चाहिए। आपका सच कुछ और है, मेरा सच कुछ और है। आपकी न्यूट्रेलिटी की परिभाषा कुछ और है, मेरी न्यूट्रैलिटी की परिभाषा कुछ और है। हमेशा लोग तटस्थ और निष्पक्ष में कंफ्यूज करते हैं। आप तटस्थ नहीं रह सकते, आपको निष्पक्ष रहना चाहिए। मीडिया को क्रिकेट के अंपायर की तरह होना चाहिए, जिसमें वह लोगों को यह बताए कि यह सही है और यह गलत है।

मैं खुश हूं कि अब मीडिया में तमाम विकल्प मौजूद हैं। जब मैंने बीस साल पहले ये सफर शुरू किया था, तब कोई नरैटिव (Narative) होता ही नहीं था, एक ही नरैटिव था। चैनल ही नहीं होते थे। आज देखिए, कितने सारे चैनल्स, कितनी सारी वेबसाइट्स, कितने सारे जर्नलिस्ट्स एक ही खबर को तमाम अलग-अलग तरीकों से समझाएंगे, बताएंगे। यह लोग तय करेंगे कि उन्हें इनमें से किसके ऊपर विश्वास करना है।

आपने कई बेहतरीन इंटरव्यूज किए हैं। तमाम स्टोरी ब्रेक की हैं। कई ऐसे शो किए हैं, जिनकी काफी चर्चा हुई है। आप इनमें से पांच ऐसे इंटरव्यू, स्टोरीज और शो बताएं, जिनके साथ आप जुड़े रहे हैं और आपके लिए वो स्पेशल क्यों हैं?

इसमें मेरी प्लेलिस्ट बिल्कुल अलग है। सबसे पहले मुझे कारगिल वॉर को कवर करने का मौका मिला था। यह मेरे जीवन में काफी यादगार है। कारगिल वॉर के दौरान मैंने कारगिल में कैप्टन विक्रम बत्रा का एक इंटरव्यू किया था। उस समय तकनीकी इतनी ज्यादा विकसित नहीं थी। तब लाइव कुछ नहीं होता था। किसी टेप को वहां से दिल्ली पहुंचने में तीन दिन लगते थे। दुर्भाग्य से जब तक वह टेप दिल्ली जी न्यूज के ऑफिस पहुंचा, तब तक कैप्टन विक्रम बत्रा शहीद हो चुके थे। मुझे आज भी इस बात का दुख है कि मेरा इंटरव्यू जब तक दिल्ली पहुंचा, तब तक वह नहीं रहे। ये मेरे जीवन में बहुत बड़ी घटना थी। पार्लियामेंट पर जब अटैक हुआ, मैं ठीक वहीं सामने पार्लियामेंट में था। उन सब आतंकवादियों को मैंने नजदीक से देखा था और पूरी नॉनस्टॉप कवरेज की थी। यह मेरे जीवन में बहुत बड़ा अनुभव था। ये मुझे हमेशा याद रहेगा। निर्भया रेप केस जब हुआ था और निर्भया का जो दोस्त था, उसका पहला इंटरव्यू मैंने किया था।

आपको जानकर हैरानी होगी कि उस इंटरव्यू को करने पर दिल्ली पुलिस ने मेरे खिलाफ एफआईआर कर दी थी। 2016 में मैं उस समय सीरिया गया था, जब सीरिया कोई जाना नहीं चाहता था। उस समय मैंने पहली बार देश के लोगों को ये दिखाया था कि सीरिया की जो लड़ाई है, वह कैसी है। इसके अलावा मैंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ चार बार इंटरव्यू किया है। उनके साथ जब मैं इंटरव्यू करता हूं, तो जिस ईमानदारी से वो जवाब देते हैं, वह मैंने बहुत एंज्वॉय किया। जब आप किसी ऐसे व्यक्ति के साथ इंटरव्यू करते हैं, जिसके बारे में लगता है कि यह व्यक्ति काफी ईमानदारी के साथ जवाब देगा, तो इंटरव्यू करने का आनंद और बढ़ जाता है। ये मेरी प्लेलिस्ट है, जिसके बारे में मैं कहूंगा कि ये मेरे जीवन के बड़े क्षण हैं, जो मुझे याद रहेंगे। 

जब अमेरिका के राष्ट्रपति भारत आए और उस समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आपका उनसे परिचय करवाया, तब आपको कैसा लगा?

यह क्षण मेरे लिए बहुत ही खास है। इसे मैंने अपनी प्लेलिस्ट में वैसे रखा नहीं है, क्योंकि ये एक अलग तरह का वाकया है। पहली बात तो यह कि जब प्रधानमंत्री ने मुझे कार्यक्रम के लिए आमंत्रित किया तो मैं खुद काफी आश्चर्यचकित और खुश था। जब मैं वहां गया तो अन्य लोगों की तरह डोनाल्ड ट्रंप के साथ मेरा भी परिचय कराया गया। वहां काफी सीमित संख्या में लोग थे, मुझे लगता है कि 25-30 लोग रहे होंगे। उस समय मैंने डोनाल्ड ट्रंप से गुजारिश की कि क्या मैं आपके साथ सेल्फी ले सकता हूं। मैंने उन्हें यह भी कहा कि आप हमेशा लाल टाई पहनते हैं और मैं आज आपसे मिलने वाला था, इसलिए मैं भी आपके सम्मान में लाल टाई पहनकर आया हूं। यह सुनकर वह काफी हंसे और मैंने उनके साथ सेल्फी ली। इसके बाद मैं प्रधानमंत्री से मिला। उस समय मैंने उनसे कहा कि यदि मैं आपके और डोनाल्ड ट्रंप के साथ एक सेल्फी लूं तो यह अब तक की बेहतरीन सेल्फी होगी। उन्होंने कहा कि मैं डिनर के बाद ट्राई करूंगा। डिनर के बाद प्रधानमंत्री ने मुझे बुलाया और डोनाल्ड ट्रंप के साथ अलग से मेरा परिचय कराया और मेरे व मेरे शो के बारे में उन्हें काफी बताया। इसके बाद मैंने उन दोनों के साथ ऐतिहासिक सेल्फी ली। मेरे फोन में वह सबसे स्पेशल सेल्फी है, जिसे मैं सबसे ऊपर लगाकर रखता हूं।     

आपने रामनाथ गोयनका अवॉर्ड जीता, आपको एक्सचेंज4मीडिया न्यूज ब्रॉडकास्टिंग अवॉर्ड (enba) भी मिल चुका है। इसके अलावा भी आपने तमाम अवॉर्ड्स जीते हैं, क्या सुधीर चौधरी को अगले साल पद्मश्री मिलेगा, क्या आप इसकी आशा करते हैं, क्या ये आपके लिए अहमियत रखता है?

मैं आपको बता दूं कि अभी तक एक्सचेंज4मीडिया की तरफ से ही मुझे तमाम अवॉर्ड्स दिए जा चुके हैं, लेकिन आपने नोट किया होगा कि मैं कभी भी अवॉर्ड्स लेने नहीं आता। जब अवॉर्ड्स के लिए आपकी जूरी बैठती है तो मैं कभी जूरी के सामने नहीं आता हूं कि मुझे अवॉर्ड दीजिए। मैं इस अवॉर्ड के कॉन्सैप्ट को अपने लिए अनकंफर्टेबल मानता हूं। मेरा मानना है कि असली पद्मश्री ये नहीं बल्कि /ये है कि इस देश के लोग आपके ऊपर विश्वास करते हैं। आप जो कहते हैं, उसे मानते हैं, आपको देखते हैं और सबसे बड़ी बात कि अगर आपको प्यार करते हैं तो मुझे लगता है कि उससे बड़ा पुरस्कार कोई हो नहीं सकता। मुझे नहीं पता कि पद्मश्री मिलेगा या नहीं मिलेगा, लेकिन मुझे लगता है कि नहीं मिलेगा और मुझे इसका कोई दुख भी नहीं होगा, क्योंकि मैंने कभी इसके बारे में ये सोचा भी नहीं है कि ये मुझे मिलना चाहिए। मुझे देश के लोगों से इतना प्यार मिल रहा है, यह अपने आप में बहुत बड़ा पुरस्कार है।

आपको टीवी न्यूज इंडस्ट्री में काम करते हुए काफी लंबा समय हो गया है। आपको क्या लगता है कि आने वाले तीन सालों में न्यूज टेलिविजन में किस तरह का बदलाव आने वाला है?
पहला बदलाव मैं ये देखता हूं कि टीवी न्यूज में व्युअरशिप और रेवेन्यू के मामले में काफी उछाल आएगा। आज यदि आप न्यूज चैनल्स की तुलना जनरल एंटरटेनमेंट चैनल्स (GEC) से करें तो इनमें काफी बड़ा गैप है। मुझे लगता है कि अगले तीन सालों में भारत में न्यूज का मार्केट काफी तेजी से आगे बढ़ेगा। रीजनल चैनल्स और रीजनल मीडिया हाउसेज में जबर्दस्त विस्तार देखने को मिलेगा और न्यूज टीवी की बजाय ऐप में आ जाएगी। दूसरी बात मुझे ये लगती है कि न्यूजरूम के वर्कफ्लो में भी आपको बदलाव लाना होगा। इसके लिए पत्रकारों को अपना स्किल बढ़ाना होगा और मल्टीमीडिया के लिए तैयार करना पड़ेगा। अभी तक जो रिपोर्टर टीवी के लिए रिपोर्ट फाइल करता है, आने वाले समय में शायद उसे पहले डिजिटल के लिए पहले अपनी रिपोर्ट फाइल करनी पड़ेगी। कई बार मैं ये भी सोचता हूं कि इस दौरान जो बेसिक थे जर्नलिज्म के, उनको हमने थोड़ा सा पीछे छोड़ दिया था और हम न्याय नहीं कर पा रहे थे। मुझे लगता है कि एक न एक दिन ये पूरी इंडस्ट्री जर्नलिज्म के बेसिक की ओर वापस लौटेगी। 

आपका शो ‘डीएनए’ काफी लोकप्रिय है। उसकी रेटिंग्स भी आती है। उस पर प्रतिक्रियाएं भी आती हैं, आप अपने शो का मुद्द् कैसे तय करते हैं और कैसे इसकी तैयारी करते हैं?
मेरा शो दूसरों से अलग है। पहली बात तो यही है कि मेरे इस डेढ़ घंटे के शो में कोई डिबेट नहीं है। इसमें कोई इंटरव्यू भी नहीं है। ऐसे में डेढ़ घंटे का शो बनाने के लिए सब्जेक्ट को ऑर्गेनिक होना चाहिए। मतलब, यह देश के ज्यादा से ज्यादा लोगों से जुड़ा हुआ सब्जेक्ट होना चाहिए। दूसरी बात ये कि यह एक टीम वर्क है। चौबीसों घंटे और सातों दिन हमारा काम चालू रहता है। डीएनए में काम करने वाला व्यक्ति लगातार इस शो के बारे में और इसे बेहतर बनाने के बारे में सोचता रहता है। रिसर्च के ऊपर हमारा बहुत जोर रहता है। इसके अलावा हम सिर्फ समस्या को ही नहीं उठाते, बल्कि उसका समाधान क्या हो, यह बताने का भी प्रयास करते हैं।  

अब तक के सफर में आपने तमाम दिग्गजों के साथ काम किया है। मुझे ऐसे लोगों के नाम बताएं, जिनका आप पर प्रभाव हो और जिनसे आपने कुछ सीखा हो?

आपने सही कहा कि मैंने तमाम दिग्गजों के साथ काम किया है और इनके साथ काम करके मैंने अपने स्किल्स को काफी डेवलप किया है। अपने करियर के शुरुआती दिनों में मैंने रजतजी के साथ काम किया था। वे काफी हार्ड वर्किंग और अनुशासन प्रिय हैं और उनसे मैंने बहुत कुछ सीखा है। इसके बाद मैंने मार्कंड अधिकारीजी के साथ काम किया। उन्होंने ही मुझे सबसे पहली बार सीईओ बनाया था। उससे पहले मैं एडिटर था। उनकी मार्केट पर काफी अच्छी पकड़ है और एक प्रॉडक्ट को कैसे शून्य से ऊचाइयों पर ले जाना है यह उन्हें बखूबी आता है, मैंने उनसे काफी सीखा है। फिर मैं जी में आया और सुभाष चंद्रा जी को रिपोर्ट करने लगा। उनकी एडिटोरियल, बिजनेस पर काफी अच्छी पकड़ है और वे काफी आगे के बारे में सोचते हैं। जब मैं उनसे 2012 में मिला था, उस समय वे 2020 के बारे में सोचते थे। उनके काम करने का स्टैंडर्ड बहुत हाई है, उनसे भी मैंने बहुत कुछ सीखा है।      

ऐसे कौन से लोग हैं, जिनके साथ आपने काम नहीं किया, लेकिन काम करना चाहेंगे, चाहे आप उनकी विचारधारा से सहमत हों अथवा नहीं?
चूंकि मैंने ऐसे लोगों के साथ कभी काम नहीं किया है और बहुत ज्यादा करीब से इन लोगों को देखा भी नहीं है, इसलिए मैं इन्हें एक कॉम्पटीटर की तरह देखता हूं, कभी वे मुझसे आगे निकल जाते हैं तो मैं ये समझने की कोशिश करता हूं कि उन्होंने ऐसा क्या किया जो मैं नहीं कर पाया। मैं उनके बिजनेस मॉडल को समझने की कोशिश करता हूं। पर ऐसा ख्याल मेरे दिमाग में कभी नहीं आया कि मैं इसके साथ जाकर काम करूं या इस चैनल के साथ जाकर काम करूं। लेकिन मैं ये सोचता हूं कि क्या-क्या दूसरों से सीख सकता हूं। ऐसे में मेरे लिए ये बताना मुश्किल होगा कि मैं किसके साथ काम करना चाहता हूं। 

आपने जीवन में पद-प्रतिष्ठा सब कुछ हासिल कर लिया है। आपकी नजर में क्या अभी कुछ बचा है, आपकी बकेट लिस्ट की बात करें तो इस बारे में आपका क्या कहना है?

यह देश बहुत बड़ा है। यहां करीब 135 करोड़ आबादी है। मैं पत्रकारिता के जरिये देश के अंदर और बदलाव लाना चाहता हूं। हमारे देश में आज भी मानसिक गुलामी बरकरार है। मैं उस मानसिक गुलामी से लड़ना चाहता हूं। मैं चाहता हूं कि लोग कुछ खास मुद्दों पर अपनी सोच रखें। इसके अलावा मैं ये सोचता हूं कि देश के युवाओं की मैं किस तरह से मदद कर सकता हूं। 

WION चैनल के बारे में कुछ बताएं?
 
WION डॉ. सुभाष चंद्रा का ड्रीम प्रोजेक्ट था। जब मैं उनके साथ जुड़ा था तो वो उस जमाने से यह कहते थे कि मुझे इस बात का बड़ा दुख होता है कि भारत इतना बड़ा देश है, लेकिन आज भी हम कोई वर्ल्ड क्लास ग्लोबल चैनल हम लॉन्च नहीं कर पाए। जो ग्लोबल चैनल आज हैं, उनमें भारत के लिए और यहां की बात रखने के लिए कोई जगह नहीं है। इसलिए वह ऐसा चैनल लॉन्च करना चाहते थे, जहां भारत अपनी बात रख सके। WION के जरिये ये हमने लॉन्च किया और मुझे काफी खुशी है कि दो-तीन साल के अंदर इस चैनल ने अपनी एक जगह बना ली है और करीब 80 देशों में यह देखा जाता है।

चैनल्स की रेटिंग्स की बात करें तो जिसकी रेटिंग ऊपर जाती है, वह तो इसे सही बताता है, लेकिन जिसकी रेटिंग नीचे जाती है, वह इस मीजरमेंट प्रणाली को खराब बताता है, इस बारे में आपका क्या सोचना है?

देखिए, मेरा ये मानना है कि आप अपना कंटेंट रेटिंग के लिए बनाते हैं या लोगों के लिए। अगर कोई चैनल ये तय कर ले कि मैं बार्क रेटिंग में आगे बढ़ने के लिए उसी हिसाब से काम करूंगा तो वह काफी आसानी से कर सकता है। लेकिन मेरा ये मानना है कि जितने चैनल्स आप देखते हैं, जो बार्क रेटिंग में ऊपर हैं, उनके बारे में बाहर कितने लोग चर्चा करते हैं कि उन्होंने फलां खबर फलां चैनल पर देखी। मैं चैनल्स के लैंडिंग पेज में विश्वास नहीं करता। मैं दर्शकों के ऊपर अपना कंटेंट थोपने पर विश्वास नहीं करता। हमारी व्युअरशिप काफी लॉयल है और जितनी भी है, हम उससे बहुत खुश हैं। 

आप तमाम आलोचनाओं और दवाबों का सामना किस तरह करते हैं?

शुरू में जब मैं सोशल मीडिया पर अपने बारे में तमाम तरह के निगेटिव कमेंट्स और ट्रोलिंग देखता था तो काफी परेशान होता था। कुछ दिन तक इसने मुझे काफी आहत किया, लेकिन फिर मैंने देखा कि मैं इस बारे में जितना ज्यादा सोचता हूं, उससे मेरा कंटेंट प्रभावित होता है। इसके बाद से मैंने सोचा कि मैं इन ट्रोलर्स की वजह से खुद को नहीं बदलूंगा और मैंने अपने आसपास एक तरह की शील्ड विकसित कर ली और अब मुझे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि लोग मेरे बारे में सोशल मीडिया पर क्या कहते हैं। अब मैंने ये नया तरीका अपनाया है कि मुझे सोशल मीडिया पर जो कहना होता है, लिखना होता है, वह लिखता हूं और उसके बाद आगे बढ़ जाता हूं। मैं वापस मुड़कर नहीं देखता कि मुझे कौन ट्रोल कर रहा है। हां, जो लोग मुझे प्यार करते हैं और मुझे सही फीडबैक देना चाहते हैं, उसके लिए मैं जरूर सोशल मीडिया का इस्तेमाल करता हूं। आज ट्रोलिंग एक तरह की इंडस्ट्री हो गई है, जहां पर आप पैसा देकर किसी की भी ट्रोलिंग करा सकते हैं।

जहां तक बात असहिष्णुता की है, तो जोग लोग कहते हैं कि भारत में लोग असहिष्णु हो गए हैं, सबसे ज्यादा असहिष्णु वही लोग हैं और ऐसे ही लोग सोशल मीडिया पर वापस आकर आपको ट्रोल करते हैं। ट्रोलिंग और धमकियां आपको काफी प्रभावित करती है। यही कारण है कि मैं अपने परिवार के बारे में खुलकर कभी बात नहीं कर पाता हूं, मैं अपने परिवार के लिए काफी चिंतित रहता हूं। इस ट्रोलिंग और धमकियों की वजह से मैं उनके साथ कहीं बाहर नहीं जा पाता। मैं कभी सोशल मीडिया पर उनकी तस्वीर नहीं डाल पाता, सिर्फ इसलिए कि बेवजह उन्हें ट्रोल किया जाएगा। इसलिए आपको सोशल मीडिया पर मेरे परिवार की कोई फोटो नहीं मिलेगी।   

इस पूरी बातचीत को आप यहां इस वीडियो में देख सकते हैं-

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‘फ्री एंड फेयर’ मीडिया देखना है तो इस दिशा में उठाना होगा कदम: शशि शेखर

हिन्दुस्तान के एडिटर-इन-चीफ ने कहा, ‘कंटेंट के लिए कुछ भुगतान करना चाहिए ताकि मीडिया कंटेंट पर जिंदा रह सके।

Last Modified:
Sunday, 26 July, 2020
Shekhar

इन दिनों मीडिया का परिदृश्य काफी तेजी से बदल रहा है। पिछले वर्षों की तुलना करें तो समय के साथ मीडिया में टेक्नोलॉजी काफी बढ़ी है, तमाम नए प्लेटफॉर्म्स का उदय भी हुआ है, इसके साथ ही तमाम चुनौतियां भी बढ़ी हैं। ऐसे में आज से करीब चालीस साल पूर्व की पत्रकारिता, इतने वर्षों में मीडिया के क्षेत्र में आए बदलाव और वर्तमान में पत्रकारिता की दशा व दिशा को लेकर ‘बिजनेस वर्ल्ड’ और ‘एक्सचेंज4मीडिया’ ग्रुप के चेयरमैन व एडिटर-इन-चीफ डॉ. अनुराग बत्रा ने शनिवार को ‘हिन्दुस्तान’ के एडिटर-इन-चीफ शशि शेखर के साथ ‘वन टू वन’ (One To One) बातचीत की। वेबिनार सीरीज के तरह सुबह साढ़े दस बजे से साढ़े 11 बजे तक हुए इस कार्यक्रम का टॉपिक 'The Rise of Language Press, has Bharat Overtaken India in Setting the National Agenda...' रखा गया था, जिसमें शशि शेखर ने खुलकर अपने विचार व्यक्त किए।

प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

आप चार दशक से पत्रकारिता में हैं। ये बताएं कि पिछले 40 साल में पत्रकारिता में कितना फर्क आया है और इस दौरान आपने कैसे-कैसे दौर देखे हैं?

असल में हमारे देश में एक परंपरागत बुराई है। हम पुरानी चीजों को बहुत कहते हैं कि हमारी पुरानी संस्कृति बहुत अच्छी थी। पुराने लोग बड़े बहादुर थे। उस समय हम यह भूल जाते हैं कि बहुत सी लड़ाइयां हम हारे भी हैं। तो जब हम पुरानों की बात करते हैं तो हम उस समय के बारे में ज्यादा सोचने लगते हैं और कभी-कभी सच को दरकिनार कर देते हैं। मैं 1980 में अचानक ‘आज’ अखबार के दफ्तर में चला गया था। उस समय मुझे मालूम नहीं था कि मेरी पूरी जिंदगी अब इसी दिशा में आगे बढ़ेगी। मैं तो आर्कियोलॉजिस्ट यानी पुरातत्वविद् बनना चाहता था। लेकिन मैं जब पीछे पलटकर देखता हूं तो पत्रकारिता के उसूल वही थे, आज भी वही हैं। पत्रकारिता की चुनौतियां तब भी वही थीं और आज भी वही हैं। यदि 1980 की बात करें तो उस समय आपातकाल को लगे हुए कुल पांच साल हुए थे, तो लोग ये कहते थे कि अभी तो हमारी आजादी ही पूरी नहीं हुई है, कोई भी तानाशाह आ सकता है। आज देश के लोग कुछ और तानाशाही का राग अलापते रहते हैं। मुझे ऐसा लगता है कि पत्रकारिता के बदलाव को हम टेक्नोलॉजी के बदलाव से मिक्स कर देते हैं। पत्रकारिता में तकनीकी रूप से काफी परिवर्तन आए हैं। इस वजह से पत्रकारिता में तब्दीली आ गई। उसके मीडियम्स बदल गए, लेकिन उसके उसूल नहीं बदले। आखिर खबर क्या है, खबर का मतलब है सिर्फ सच्चाई। सच को अगर आप किसी भी चीज से मिला देते हैं तो वह खबर नहीं रह जाती, स्टोरी रह जाती है। ऐसे में एक तो खबर और कहानी का तालमेल हो गया और दूसरी बात कि टेक्नोलॉजी की वजह से हमने बहुत एक्सक्यूज तलाश लिए।

आपने करीब 20 साल तक ‘आज’ अखबार में काम किया। फिर आपने लगभग दो साल ‘आजतक’ टीवी चैनल में काम किया, पिछले 20 सालों में आपकी नजर में टीवी न्यूज में किस तरह का परिवर्तन आया है?

असल में जब बहुत विस्तार होता है, तो चीजों को समेटना बहुत मुश्किल हो जाता है। मैं ‘आजतक’ की बहुत इज्जत करता हूं, क्योंकि इस चैनल ने मुझे बहुत सिखाया है। जहां तक 20 साल में टीवी न्यूज में आए परिवर्तन की बात है तो मुझे लगता है कि उस समय के टेलिविजन की आज से तुलना करना थोड़ा सा अन्याय होगा। आप उन दो सालों को देखें तो गुजरात का भूकंप रहा हो, नेपाल के राजघराने की हत्या रही हो, 9/11 की घटना रही हो, हमारे यहां संसद पर हमला रहा हो, ऑपरेशन पराक्रम रहा हो, वो खबर भरे दिन थे। ऐसा लगता था कि जैसे खबर ही खबर पैदा हो रही हैं और उस जमाने में खबर ऐसी नहीं थी, वह दुनिया को बदलने वाली थी। 9/11 से पहले और बाद की स्थिति में जमीन-आसमान का अंतर है। वो ऐसा समय था, जब हमें खबर से फुर्सत नहीं रहती थी। तब के राजनेता भी अलग थे। उस समय जॉर्ज फर्नाडिस रक्षा मंत्री थे, हमने उन्हें स्टूडियो में बुलाया और वे आगे गए। मुझे नहीं लगता कि अब तो कोई भी रक्षामंत्री किसी भी चैनल के स्टूडियो में जाने वाला है। उस समय आशुतोष ने करीब पौने दो घंटे का लाइव इंटरव्यू किया, जो अभूतपूर्व था। मैं और उदय शंकर पीसीआर में खड़े हुए थे और लगातार आशुतोष से बात कर रहे थे और जॉर्ज थे कि जवाब पर जवाब दिए जा रहे थे। उस समय ऐसे नेता थे जो सवालों को लेने से नहीं डरते थे। पत्रकारों को वैसे इस्तेमाल नहीं करते थे। मैं क्षमा के साथ कहना चाहूंगा कि आज के लीडर और फिल्म स्टार एक ही तरह के हैं, सिनेमा का स्टार स्क्रीन पर तभी दिखाई देता है, जब उसकी कोई नई मूवी आती है, आज का पॉलिटिशियन भी तभी इंटरव्यू देता है, जब उसे चुनाव लड़ना हो अथवा अपना कोई संदेश जनता तक पहुंचाना हो। ये एक बहुत बड़ा परिवर्तन आया है। ऐसे में मीडिया का दायित्व और चुनौतियां बहुत बढ़ जाती हैं। मैं मानता हूं कि अभी भी देश के कुछ न्यूज चैनल्स बहुत ही ईमानदारी से काम कर रहे हैं। दूसरी बात ये रही कि विस्तार बहुत तेजी से हुआ, जिससे तमाम चैनल जल्दी में आ गए कि टीआरपी बहुत जल्दी ले लेनी है या कोई अन्य काम बहुत जल्दी कर लेना है, लेकिन इन सबके बीच दर्शक/पाठक अथवा श्रोताओं की चिंता करनी छोड़ दी है, जबकि इनकी और इनकी भावनाओं की रक्षा करना भी हमारा दायित्व है। शायद थोड़ा से इसमें घालमेल हो गया है।

आजकल टीवी देखने पर ऐसा लगता है कि जैसे दो सच्चाई हैं। आज तमाम संपादक/न्यूज एंकर/पत्रकार देखकर लगता है कि खबर दिखाने की बजाय खबर बना रहे हैं। कभी-कभी तो ये प्रवक्ता जैसे लगने लगते हैं, इस पर आपका क्या कहना है?

मुझे लगता है कि हम पत्रकारों पर सारा दोष मढ़ देते हैं, जो गलत बात है। हमें अपने इस प्रोफेशन की कुछ जरूरी बातों को समझना पड़ेगा। इतिहास सिर्फ तीन लोगों को याद करता है। हीरोज को, विलेन्स को और जोकर्स को। इतिहास आम आदमी को दर्ज नहीं करता जबकि बताया ये जाता है कि इतिहास आम आदमी की गाथा बयां करता है।

इन 70 सालों में जो वैचारिक द्वंद्व पैदा हुआ है, उसके शिकार हम सभी हुए हैं। इसके शिकार हम तीन तरह से हुए हैं। पहले तो हमने ‘चश्मे’ पहन लिए हैं। कहने का मतलब है कि हम चीजों को अपने हिसाब से देखने लगे हैं। दूसरी बात ये कि हमें कंटेंट के बिजनेस पर भी नजर डालनी होगी। हमें मीडिया को इंडस्ट्री का दर्जा देना होगा। मुझे ऐसा लगता है कि कंटेंट फ्री नहीं होना चाहिए। जब कंटेंट फ्री होता है तो इंडस्ट्री को चलने के लिए एडवर्टाइजर्स पर निर्भर होना पड़ता है। इस देश में एडवर्टाइजर्स सिर्फ दो हैं। या तो सरकार अथवा कॉरपोरेट हाउस। ऐसे में यदि लोगों को वास्तव में ‘फ्री एंड फेयर’ मीडिया देखना है तो कंटेंट के लिए कुछ भुगतान करना चाहिए ताकि मीडिया कंटेंट पर जिंदा रह सके। यह एक सोसायटी के लिए जरूरी है। जिस सोसायटी को प्रोफेशनल वकील की जरूरत है, प्रोफेशनल डॉक्टर की जरूरत है, जिस सोसायटी को अपराधियों को फांसी पर चढ़ाने के लिए प्रोफेशनल जल्लाद की जरूरत है, उस सोसायटी को क्या प्रोफेशनल ट्रुथ टैलर्स (Truth Tellers) की जरूरत नहीं है? कहने का मतलब है कि कंटेंट के पैसे मिलने चाहिए, ताकि यह दबाव मुक्त रह सके।

आपने कंटेंट के लिए भुगतान करने की बात कही है। पिछले चार महीनों में कोरोनावायरस (कोविड-19) ने काफी चीजों को बदल दिया है। तमाम लोग अब भी न्यूज वेबसाइट की जगह अखबार पढ़ना पसंद करते हैं। कोविड के बाद क्या कंटेंट को पेड होना चाहिए? न्यूज पसंद करने वालों तमाम लोगों ने इसके लिए भुगतान करना भी शुरू कर दिया है, इस बारे में आपका क्या कहना है?

मेरा मानना है कि कंटेंट को पेड होना चाहिए। कोविड की वजह से तमाम अखबारों ने अपने ईपेपर को पेड कर दिया है, जो पहले फ्री देते थे। यहां मैं बताना चाहूंगा कि पिछले एक महीने में मीडिया संस्थानों को जो सबस्क्रिप्शन मिले, वह उम्मीद से बहुत बेहतर थे। कोविड ने बहुत सी चीजों के प्रोसेस को तय कर दिया है। मीडिया में भी काफी परिवर्तन आ रहा है। मुझे लगता है कि भाषाई अखबारों के लिए रनवे बचा हुआ है और 90 प्रतिशत सर्कुलेशन पटरी पर लौटना इसकी गवाही देता है।  

अगर हम हिंदुस्तानी न्यूज टेलिविजन की बात करें और आपको उसमें दो-तीन चीजों को बेहतर करना हो, तो वो कौन सी होंगी?

मैंने शुरू में 20 साल अखबार में काम किया, फिर मैं टेलिविजन में गया। अखबार में तो बात करके भी चीजें लिख सकता था, लेकिन टीवी के लिए मुझे बाइट लेने के लिए कैमरा और टीम भेजनी पड़ती थी। टीवी में काम करते समय मुझे लगने लगा कि मैं एडिटर नहीं, बल्कि लॉजिस्टिक मैनेजर हूं। टीवी की यह समस्या तब भी थी और आज भी है कि उसे दिखाना होता है। उसकी ये ताकत भी है और उसकी ये कमजोरी भी है। हम शायद दिखाने के चक्कर में ज्यादा पड़ गए। न्यूज को सिर्फ दिखाकर ही काम नहीं चलता, न्यूज बहुत से तरीकों से अभिव्यक्त की जा सकती है। ऐसे में पहला सवाल ये उठता है कि कहीं हम दिखाने के चक्कर में लोगों की संवेदनाओं से तो खिलवाड़ नहीं करने लगे हैं? दूसरा सवाल ये उठता है कि लोगों की सत्य के प्रति जो आस्था है, उससे तो हम खिलवाड़ नहीं करने लगे हैं? तीसरा सवाल ये उठता है कि महावीर ने कहा था कि सत्य के सात स्वरूप होते हैं, आपको एक स्वरूप दिखाई पड़ता है। इसलिए अंग्रेजी में कहते हैं, ‘Truth is nothing but is version’ यानी हर आदमी का अपना वर्जन होता है सत्य का। तो हम शायद दिखाने के चक्कर में और वर्जन के चक्कर में सच की जो सार्वभौमिकता है, उसको शायद थोड़ा सा भुला बैठे हैं।  

अपने करियर में आपने अब तक तमाम दिग्गजों के इंटरव्यूज किए हैं। इनमें से आपके दो सबसे ज्यादा यादगार इंटरव्यू कौन से हैं और क्यों? इसके अलावा इतने लंबे समय में आपकी नजर में संपादक और सब्जेक्ट के बीच आपसी संबंध में कितना बदलाव आया है?

पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर जी का इंटरव्यू मेरे लिए काफी यादगार है। चंद्रशेखर जी उस समय प्रधानमंत्री थे और उनकी कुर्सी जाने वाली थी कुछ दिनों में, यह बात वे जानते थे। मैं उनका इंटरव्यू करने गया। उस समय सत्यप्रकाश मालवीय जी भी वहां बैठे हुए थे। चंद्रशेखर जी का बात करने का अलग ही अंदाज था। उनका ट्रुथ का एक वर्जन होता था और बड़ा तीखा होता था। मैंने उनसे कहा कि आप तो ये कह रहे हैं और राजीव गांधी जी ने यह बात कही है तो उन्होंने मेरी ओर देखते हुए कहा कि अगर कोई अपनी झोपड़ी को राजमहल समझता है तो मुझे उस पर तरस आता है। उन्होंने यह राजीव गांधी के लिए कहा था उनका कहना था कि राजा तो वही होता है, जो राजमहल में बैठा होता है और फैसला भी वही लेगा जो राजमहल में बैठा हुआ है। ये शक्ति और अपने गठबंधन से न दबने की कुव्वत और पत्रकारों से सीधे-सीधे बोलने की ताकत चंद्रशेखर जी में थी, ये बात अलग है कि मेरे उनके अनुभव थोड़े अलग तरीके के थे। तो एक इंटरव्यू वो जिसमें एक आदमी इतनी ताकत के साथ उस व्यक्ति के लिए बोल सकता है, जिसके बूते पर सरकार हो, काफी बड़ी बात थी।

इस इंटरव्यू से काफी पहले मैंने रविशंकर जी का इंटरव्यू किया था, यह भी मेरे लिए काफी यादगार है। रविशंकर जी ने इलाहाबाद में सितार बजाया। मैं उन चंद भाग्यशाली लोगों में से हूं, जिन्होंने रविशंकर जी को मन से बजाते हुए देखा है। उस सितार को सुनकर मेरे रोंगटे खड़े हो गए। उस समय इंटरव्यू में एक प्रचलित सवाल था कि ये बताएं, आप आम आदमी के लिए क्या करेंगे? मैंने भी रविशंकर जी ये यह सवाल पूछ लिया। उन्होंने कहा कि मैं कुछ नहीं करूंगा, मैं क्यों करूं? मैं कोई आम आदमी का गायक या बजाने वाला थोड़े ही हूं। मैं तो शास्त्रीय संगीत (Classical Music) का साधक हूं और इसी के लिए बजाता हूं। मुझे उनकी सच्चाई और जो क्लासिफिकेशन था, उसने बहुत सिखाया। ये दो इंटरव्यूज मेरे जीवन में बहुत अच्छे थे।

पहले यदि संपादक किसी राजनेता का इंटरव्यू करता था तो ये राजनेता की खुशकिस्मती होती थी, आजकल कई इंटरव्यूज देखकर लगता है कि राजनेता से ज्यादा पत्रकार या संपादक की खुशकिस्मती है, इस पर आपका क्या कहना है?

यह थोड़ी गलतफहमी है। मेरा मानना है अच्छाई और बुराई हमेशा से थी। 1980 में मीडिया इंडस्ट्री इससे बहुत खराब हालत में थी। आज तो तमाम तरह का मीडिया है, तमाम तरह के लोग हैं, तमाम तरह के लोग अपनी बात कहने वाले हैं। ऐसा नहीं है कि उस समय संपादक इतने महान और धाकड़ हुआ करते थे कि लोग उनसे कांपते थे। आज भी जो लोग सच बोलते हैं और जो उनसे कुछ मांगने नहीं जाते, जिन्हें पद्मश्री नहीं चाहिए, जिन्हें लोकसभा या राज्यसभा नहीं चाहिए, जिन्हें किसी तरह का कोई कोटा नहीं चाहिए, तो आज भी उनकी इज्जत होती है। मुझे नहीं लगता कि तब से अब में कोई बहुत बड़ा अंतर आया है। बस एक अंतर आया है, क्योंकि तब बहुत ही कम अखबार होते थे। चूंकि उस समय संपादक कम होते थे, इसलिए लोगों की नजर में कम आते थे और दिखाई नहीं पड़ते थे। आज मीडियम बदल गया है, दिखाई पड़ते हैं। हम बार-बार पत्रकारों को दोष देते हैं। पत्रकारों को दोष देना या कुछ भी बोल देना आसान है, ऐसा नहीं हैं। आज भी तमाम लोग सच्चाई को लेकर अड़े हुए हैं। इन दिनों जयपुर और गुड़गांव के मामलों में कुछ हिंदी चैनल्स की रिपोर्टिंग वाकई में बहुत अच्छी है। मैं अंग्रेजी चैनल्स की बात नहीं कर रहा। मैं हिंदी के चैनल्स की बात कर रहा हूं, जिनके अधिकांश संपादकों को रीढ़ विहीन कहा जाता है। वे काफी अच्छे पत्रकार हैं।

टीवी न्यूज की दुनिया में आपकी नजर में पिछले 20 सालों में कौन सी ऐसी घटनाएं या रिपोर्टिंग हैं, जो आपको आज भी याद हैं और आप समझते हैं कि उनकी टीवी न्यूज रिपोर्टिंग सबसे अच्छी रही है या कह सकते हैं कि उनकी कवरेज टर्निंग प्वाइंट है?

इसमें मैं कारगिल की लड़ाई का जिक्र करना चाहूंगा। उस समय जो रिपोर्टिंग हुई, उससे पहले कभी युद्ध क्षेत्र से रिपोर्टिंग नहीं हुई थी, जो इस तरह दिखाई गई। हालांकि जो दिखाया गया, वह लड़ाई नहीं थी, लेकिन फिर भी रिपोर्टर काफी दूर तक गए। इतना आगे भी पहले कभी नहीं जाते थे। अफगानिस्तान में जब लड़ाई हुई तो उस समय मैं जिस चैनल में था, वहां से दो पत्रकारों को वहां भेजा गया और उन लोगों ने अद्भुत रिपोर्टिंग की। कहने का मतलब है कि उस समय इन घटनाओं ने भारतीय न्यूज टेलिविजन को एक नई दिशा दी, जो उससे पहले हम विदेशी चैनल्स पर देखा करते थे। कोविड-19 की बात करें तो अब सिर्फ टीवी में ही नहीं, मोबाइल जर्नलिज्म (मोजो) में भी और तरह-तरह से हमें जर्नलिज्म के बहुत से स्वरूप दिखाई पड़ रहे हैं। इस दौरान लोग भूखे-प्यासे सड़कों पर पैदल अपने घर जा रहे थे। उनके पैरों में छाले थे और उन छालों को पोंछने का काम भी कई पत्रकारों ने किया है। हमने भी अपने नेटवर्क की टीम को विभिन्न संस्थाओं के सहयोग से लोगों का दुख-दर्द दूर करने के लिए कहा।

यंग रिपोर्टर्स को आप क्या संदेश देना चाहते हैं। आज के दौर में कैसे वे अच्छी पत्रकारिता करें, इस बारे उन्हें क्या कहना चाहते हैं?

भविष्य सबसे उज्जवल आने वाला है। इसका कारण यह है कि जब ट्रुथ के तमाम वर्जन सामने आने लगे हैं, तो उसे उसी के अनुसार बिना मिलावट के रखने के लिए नौजवानों  के पास तमाम तरह के मीडियम्स आ गए हैं। जब मैं काफी युवा था तो तमाम मैगजींस में हाथ से लिखकर भेजता था, कभी छपता था तो कभी नहीं भी छपता था। आज तो इतने सारे मीडियम्स हैं कि हम अपनी बात को पहुंचा सकते हैं और उसके आर्थिक पक्ष भी काफी अच्छे हैं। मैं एक्सचेंज4मीडिया का उदाहरण देना चाहूंगा कि आपने कितना सफल वेंचर खड़ा किया है। आज से 15-20 साल पहले लगता नहीं था कि मीडिया पर इस तरह से कोई साइट करेगी, ईमानदारी से काम करके। मैं यूक्रेन के एक वीडियो चैनल का भी उदाहरण देना चाहूंगा। तीन लड़कों ने उसे मिलकर बनाया और वह आज काफी सफल चैनल है और वे सिर्फ अपने फोन से शूट करते हैं। फिलीपींस का एक चैनल भी यही कर रहा है। दुनिया में ऐसे बहुत से उदाहरण हैं, जहां सच को लेकर लोग सामने आए लोगों ने उन्हें अपने सिर पर बिठाया।

आपने 40 साल के इस लंबे कार्यकाल में बहुत लोगों के साथ काम किया है, आप प्रसार भारती के बोर्ड में भी रहे हैं। आपकी नजर में ऐसे कौन से लोग हैं, जिन्होंने पत्रकारिता में काफी बड़ा योगदान दिया है? मीडिया मालिकों और संपादकों के बीच के रिलेशंस पर आप क्या कहेंगे?

मुझे ऐसा लगता है कि एडिटर्स भी अपनी बात को ठीक से कहते नहीं हैं। मुझे कभी भी बहुत दबाव का सामना नहीं करना पड़ा। आपके अंदर शक्ति होनी चाहिए जो उस समय की स्थिति है, उससे रूबरू होने की। मुझे लगता है कि एडिटर में यह शक्ति होनी चाहिए कि वह आंख में आंख डालकर बात कर सके। फिर चाहे सामने लीडर हो या कोई और हो और जब आप ऐसे बोलते हैं तो कोई दिक्कत नहीं होती। दरअसल, हम जब खुद अंदर से कांप रहे होंगे, तो बड़ी खराब बात होगी। दूसरी बात ये कि पत्रकार को सेलिब्रिटी नहीं बनना चाहिए। तीसरी बात ये यदि पत्रकार पैकेज सिस्टम के पीछे भागेंगे तो वैल्यू सिस्टम पर आघात लगेगा। मैंने जब टीवी छोड़ा और अखबार में गया तो आधी सैलरी पर गया था। कहने का मतलब है कि हमारा सच यही है कि हम सच के साथ खड़े रहें, इसके अलावा कुछ नहीं।  

चालीस साल के पत्रकारिता जीवन के बाद भी क्या आपको ऐसा लगता है कि कुछ चीजें रह गई हैं जो आप नहीं कर पाए हैं और करना चाहते हैं?

नहीं, ऐसा कुछ नहीं है। मैंने बकेट लिस्ट कभी बनाई ही नहीं। मेरे लिए आज का काम बहुत महत्वपूर्ण होता है। हम खबर में जीते हैं। हम खबर बनाते नहीं, बल्कि उसे कवर करते हैं। खबर कभी भी, कैसी भी आ सकती है, मुझे ऐसा लगता है कि हम आज का काम बेहतर तरीके से करें, क्योंकि आने वाले कल की बुनियाद सिर्फ इस आज पर टिकी हुई है। ईश्वर ने मुझे 24 साल की उम्र में एडिटर के पद पर बैठा दिया। मैं अपने आप को एडिटर भी नहीं कहता, मैं खुद को पत्रकार या प्रोफेशनल ट्रुथ टैलर बोलता हूं। ये एक पद है, लेकिन 24 साल की उम्र में हासिल हो गया था। आज 36 सालों से मैं अलग-अलग संस्थानों में उसी कुर्सी पर बैठा हुआ हूं। मुझे ऐसा लगता है कि यह अचीवमेंट नहीं है। अचीवमेंट यह है कि इन 36 सालों में जिस संस्थान में रहा, उस संस्थान में थोड़ी सी भूमिका अदा कर पाया और उसके जरिये उस समय समाज में भूमिका अदा कर पाया। ये सारी बातें बाद में होती हैं कि किसने क्या किया, किसने क्या नहीं तिया। ये सब बातें दूसरों के हवाले कर देता हूं। कुछ तारीफ करते हैं, कुछ बुराई करते हैं। बुराई करने वाले भी मुझे नहीं जानते और तारीफ करने वाले भी बहुत कम मुझसे मिले हुए हैं तो उससे फर्क नहीं पड़ता। आज का काम करता हूं बस।  

यहां देखें इस बातचीत का पूरा वीडियो:

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