आज पत्रकारिता का चेहरा 'क्रूर' हो गया है, बोले वरिष्ठ पत्रकार संतोष भारतीय

‘आजकल ध्रुवीकरण का दौर है। राजनीति के साथ-साथ अब मीडिया में भी...

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Thursday, 28 February, 2019
Last Modified:
Thursday, 28 February, 2019
Santosh Bhartiya

समाचार4मीडिया ब्यूरो।।

‘आजकल ध्रुवीकरण का दौर है। राजनीति के साथ-साथ अब मीडिया में भी ध्रुवीकरण दिखाई दे रहा है। ऐसे में क्या समय के साथ मीडिया में फैला ध्रुवीकरण खत्म हो पाएगा?’ ऐसे ही तमाम सवालों को लेकर समाचार4मीडिया डॉट कॉम के संपादकीय प्रभारी अभिषेक मेहरोत्रा ने देश के शीर्ष पत्रकारों में शुमार और ‘चौथी दुनिया’ के प्रधान संपादक संतोष भारतीय से एक साक्षात्कार के दौरान उनकी राय जाननी चाही।

इस बारे में संतोष भारतीय का कहना था, ‘जिस ध्रुवीकरण की बात की जा रही है, उसे आजकल लोग अपने शब्दों में भी लिख रहे हैं। लेकिन मेरा कहना है कि यह हर दौर में रहा है। हमसे पहले के दौर में यह ‘प्रो पीपुल जर्नलिज्म’ और ‘पीआर जर्नलिज्म’ के रूप में माना जाता था। पत्रकारों में भी ‘पीआर जर्नलिज्म’ को लेकर बहस होती रहती थी। लेकिन उस समय इस तरह की चीजें सार्वजनिक नहीं थीं, लेकिन आज के जमाने में इसका चेहरा बहुत ही ‘क्रूर’ हो गया है। आज कई पत्रकार सीधे-सीधे सत्ता के साथ जुड़ गए हैं और उसके लिए तर्क तैयार करने का काम करते हैं। ऐसे भी पत्रकार हैं जो सत्ता के खिलाफ हैं, लेकिन वे विपक्ष की बोली बोलते हैं। इसके अलावा पत्रकारिता का एक और चेहरा ‘प्रो पीपुल जर्नलिज्म’ भी होता है। इसका बुनियादी सिद्धांत यही होता है कि आप जनता के हित की पत्रकारिता कर रहे हैं, किसी खास राजनीतिक दल अथवा संस्थान विशेष के हित की पत्रकारिता नहीं कर रहे हैं।’

इस दौरान संतोष भारतीय का यह भी कहना था, ‘आज के समय में ‘प्रो पीपुल जर्नलिज्म’ बहुत कम है। और चूंकि सत्ता यही चाहती है कि हर चीज उसके पक्ष में आए, इसलिए मुझे नहीं लगता कि हाल-फिलहाल इस स्थिति में कोई परिवर्तन आने वाला है।’

संतोष भारतीय के साथ बातचीत के विडियो को आप यहां देख सकते हैं-

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आने वाले समय में पत्रकारिता का भविष्य स्थानीय भाषा में ही होगा : प्रो. केजी सुरेश

'माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय' (MCU) के कुलपति व वरिष्ठ पत्रकार केजी सुरेश ने समाचार4मीडिया के साथ खास बातचीत की है।

Last Modified:
Friday, 18 June, 2021
Prof. KG Suresh

'माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय' (MCU) के कुलपति और देश के प्रतिष्ठित मीडिया शिक्षण संस्थान 'भारतीय जनसंचार संस्थान' (IIMC) के पूर्व महानिदेशक व वरिष्ठ पत्रकार केजी सुरेश ने समाचार4मीडिया के साथ खास बातचीत की है। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

आपने मीडिया जगत में पत्रकार से लेकर एक कुलपति तक के सफर को तय किया है। पत्रकार बनने का ख्याल कैसे आया?

मेरा जन्म एक साधारण परिवार में हुआ और मेरे पिताजी सरकारी नौकरी में थे। चूंकि वो खुद सरकारी नौकरी में थे तो उनकी इच्छा भी यही थी कि मैं भी सरकारी नौकरी में ही जाऊं। मेरे पिताजी ने मेरी एक बहुत अच्छी आदत डाल दी थी और वो थी समाचार पत्रों को पढ़ना। दरअसल, मेरे पापा खुद बहुत अच्छे से समाचार पत्रों का अध्ययन करते थे और कई महत्वपूर्ण घटनाओं की तो कटिंग तक वह संभालकर रखते थे। उन्हीं के साथ-साथ मेरी भी ये आदत हो गई और धीरे-धीरे मेरी रुचि लिखने में भी आ गई। मैं संपादक के नाम पत्र लिख देता था और धीरे-धीरे वो प्रकाशित होने लगे।

समाचार पत्र में अपना नाम देखकर मुझे बड़ी ख़ुशी होती थी। इसके बाद लेख लिखने का सिलसिला शुरू हो गया था। जब मेरे लेख छपते थे तो धीरे-धीरे सबको खबर होने लगी और मुझे लोगों से तारीफ भी मिलने लगी। इसके बाद स्कूल में भी कुछ निबंध प्रतियोगिताओं में मैंने पुरस्कार जीते और उसके बाद मुझे ऐसा लगने लगा कि मुझे पत्रकार बनना है।

हालांकि, मेरे पिताजी चाहते थे कि मैं सरकारी नौकरी करूं और उनके दबाब में आकर मैंने एक अनुवादक की सरकारी नौकरी को प्राप्त भी किया, लेकिन एक बौद्धिक वातावरण नहीं मिलने के कारण दो वर्ष तक भी मैं वो नौकरी नहीं कर पाया और मैंने वो नौकरी छोड़ दी।

उसी दौरान हमारे एक मित्र दीपक चौधरी जी ‘ऊर्जा‘ नाम की पत्रिका के संपादक हुआ करते थे, किन्ही कारणों से उनकी हत्या हुई, जिसका आज भी पता नहीं चल पाया है। जब उनके परिजन कोलकाता से आए तो उन्होंने इच्छा जताई कि इस पत्रिका का प्रकाशन बंद नहीं होना चाहिए। उनके कई दोस्त इस जिम्मेदारी को उठाने के लिए तैयार नहीं हुए। उस समय मैं एक मौके की तलाश में था तो जब मुझसे कहा गया तो मैंने हां कह दी।

हालांकि, उस समय मेरी उतनी उम्र नहीं थी और मैं संपादक बन गया था। उस वक्त कई पत्रकार और कर्मचारी मेरे नीचे काम करते थे। जैसा कि मैंने आपको बताया कि इतनी कम उम्र में मैं संपादक तो बन गया था और साहित्य के ज्ञान के कारण भाषा शैली भी ठीक थी, लेकिन मुझे अभी और अनुभव हासिल करना था।

इसके बाद मैंने ऐसी ही कई पत्रिकाओं में संपादक या सहायक संपादक के तौर पर काम किया। जब मैं किसी प्रेसवार्ता में जाता था तो देखता था कि मुख्यधारा के पत्रकारों को अधिक सम्मान मिलता था और मुझे ऐसा लगने लगा कि कहीं तो कोई कमी है।

उस समय पीटीआई में एक नियुक्ति होनी थी, लेकिन दिक्क्त ये थी कि उस दौर में सीनियर लेवल पर जगह सीधे नहीं मिलती थी, आपको ट्रेनी के तौर पर ही नियुक्ति मिलती थी। मुझे मुख्यधारा की मीडिया से जुड़ना था तो उस समय जो मेरी सैलरी थी, उससे एक चौथाई सैलरी पर मैंने पीटीआई जॉइन कर लिया।

‘एशियानेट‘ जो कि दक्षिण भारत का पहला न्यूज नेटवर्क था, उसका भी मैं संपादकीय सलाहकार बना। पीटीआई में नीचे से शुरू होकर मैं पॉलिटिकल करेसपॉन्डेंट तक के पद पर पहुंचा। उसके बाद मेरी एक यात्रा शुरू हुई, जिसमें दूरदर्शन में भी वरिष्ठ सलाहकार संपादक जैसे अहम पदों पर मैं रहा और आज ‘एमसीयू‘ के कुलपति के रूप में आप लोगों के सामने हूं।

आपको एक प्रयोगधर्मी व्यक्ति के रूप में जाना जाता है। आप 'एमसीयू' में कई भाषाओं के अलावा दक्षिण की भाषा में भी कोर्स शुरू करने वाले हैं। इसके बारे में कुछ बताएं।

अगर आप आकंड़ों की ओर देखें तो आने वाले समय में भाषा में ही पत्रकारिता का भविष्य है और इस बात को हम अच्छी तरह से समझते हैं। अगर आप इंग्लिश को देखें तो उसको पढ़ने वालों की संख्या कम होती जा रही है। लोग अपनी भाषा में पढ़ना पसंद करते हैं। जब मैं 'आईआईएमसी' में था तो अमरावती परिसर से मैंने मराठी भाषा में पाठ्यक्रम शुरू करवाया।

केरल में जो परिसर है, वहां से मैंने मलयालम में पत्रकारिता शुरू करवाई। इसके अलावा लाल बहादुर शास्त्री संस्कृत विद्यापीठ के साथ मिलकर संस्कृत का एक एडवांस कोर्स शुरू करवाया। अगर आप देखें तो पहले अखिल भारतीय परीक्षा पास करके कुछ छात्र केरल और बाकी राज्यों में भले ही चले जाते थे, लेकिन स्थानीय भाषा के बच्चों को वो मौका नहीं मिलता था।

हम सिर्फ ओडिशा के परिसर को छोड़ दें तो हर जगह सिर्फ इंग्लिश ही पढ़ाई जाती है। जब हमने मराठी में कोर्स शुरू किया तो गरीब से गरीब बच्चे को भी ये लगा कि अब वह भी 'आईआईएमसी' में पढ़ सकता है।

विदर्भ जैसे पिछड़े इलाके के बच्चों के अंदर भी हम वो उम्मीद जगाने में कामयाब रहे। मुझे एक छात्र ने बड़ी भावुक चिठ्ठी भी लिखी थी, जिसमें उसने कहा कि आज मैं मराठी मीडिया में सक्रिय रूप से काम कर रहा हूं और उसके पीछे आपका वो निर्णय था, जिसके कारण एक पिछड़ा और गरीब बच्चा भी 'आईआईएमसी' से पढ़ सका।

आज 'एमसीयू' भले ही प्रादेशिक भाषाओं में काम कर रहा है, लेकिन हमारा दृष्टिकोण राष्ट्रीय है। इसलिए हम 'भाषाई विभाग' और 'भाषाई पत्रकारिता' पर भी ध्यान दे रहे हैं, ताकि देश भर के बच्चों को एक विश्व स्तर का वातावरण मिल सके।

डिजिटल मीडिया के इस बढ़ते दौर में हिंदी पत्रकारिता के भविष्य को आप कैसे देख रहे हैं?

अगर आज हम 'वेबदुनिया' या 'जागरण' और इसके अलावा 'भास्कर' को देखें तो आप पाएंगे कि हिंदी पत्रकारिता ने डिजिटल को बहुत पहले ही भांप लिया था और अपनाना शुरू कर दिया था। आज जो लोग अखबार नहीं पढ़ पा रहे हैं, उनको अपने फोन में ही हिंदी भाषा में विश्वसनीय कंटेंट मिल रहा है।

एक अनुमान है कि प्रिंट सिर्फ तीन फीसदी की दर से आगे बढ़ रहा है, वहीं डिजिटल 36 फीसदी की ग्रोथ की ओर देख रहा है और विज्ञापन में भी डिजिटल आगे जा रहा है। इसके अलावा हम देखें तो आज जिला स्तर पर भी प्रिंट के संस्करण खुल रहे हैं और टीवी के बड़े-बड़े नेटवर्क आप देख लीजिए जो कभी सिर्फ इंग्लिश प्रोग्राम चलाया करते थे, वो आज हर भाषा में अपने चैनल खोल रहे हैं।

आप हाल ही में 'रिपब्लिक नेटवर्क' का उदाहरण देख लीजिए, इंग्लिश के बाद वह अपना हिंदी चैनल लाया और उसके बाद उन्होंने 'बांग्ला' भाषा में उसे लांच किया और यही मैं कह रहा हूं कि आने वाले समय में पत्रकारिता का भविष्य भाषा में ही होगा।

ओटीटी प्लेटफॉर्म्स की बढ़ती लोकप्रियता के बीच आपने फिल्म पत्रकारिता की ओर भी ध्यान देने की बात कही है! उसके पीछे आपको क्या कारण दिखाई दे रहे हैं?

हमने हाल ही में अपने खंडवा परिसर में फिल्म पत्रकारिता शुरू करने का निर्णय लिया है। खंडवा सिर्फ दादा माखनलाल की कर्मभूमि ही नहीं, बल्कि दादा किशोर कुमार की जन्मभूमि भी है। फिल्म स्टडी या सिनेमा के बारे में ज्ञान देना हो या फिल्म प्रोडक्शन हो, आज के समय में देश में बहुत कम जगह पर ये सिखाया जा रहा है, लेकिन पहली बार हम इसे शुरू करेंगे। हमारी इस मुहिम में देश के बड़े निर्देशक, निर्माता और कलाकार शामिल हैं जो बच्चों को मार्गदर्शन देंगे। हम सब जानते हैं कि फिल्में संवाद का एक सशक्त माध्यम हैं तो इसे क्यों नहीं पढ़ाया जाए?

आज ओटीटी के बढ़ते प्रयोग ने बाजार के लिए रास्ते खोल दिए हैं और हमें ऐसे पत्रकार तैयार करने होंगे, जिन्हें वाकई में इस पूरे प्रोसेस की समझ हो। आज इतने माध्यम हैं कि फिल्म की लागत अब उतनी नहीं रह गई है तो ऐसे समय में हमें इसे भी समानांतर तौर पर लेकर चलना होगा।

आज मैं देख रहा हूं कि भोपाल के कई कलाकार भी वेब सीरीज और फिल्मों में बहुत अच्छा काम कर रहे हैं। आज आम आदमी के घर तक मनोरंजन पहुंच गया है। मेरा ये आह्वान है कि छोटे-छोटे परिसरों में भी इन चीजों को लेकर जागरूक होने की जरूरत है और लोगों की सृजनात्मकता को बढ़ाने की जरूरत है।

वर्तमान समय में पत्रकारों पर दोहरे मापदंड अपनाने के आरोप लगाए जा रहे हैं और उन्हें लेकर देश के एक वर्ग में नाराजगी भी है। इसे आप किस तरह से लेते हैं?

ये सवाल बहुत महत्वपूर्ण है और इसलिए भी क्योंकि अब ये चीजें आम जनता के जहन में आ गई हैं, जिनका जवाब उन्हें मिलना भी चाहिए। दरअसल, मीडिया के एक बड़े वर्ग का ध्रुवीकरण हो गया है और अब पत्रकार कम पक्षकार अधिक हो गए हैं। पत्रकार आज भी हैं और बहुत बढ़िया काम भी कर रहे हैं।

कोरोना काल में जिस तरह से हमने फील्ड रिपोर्टिंग देखी, वो बहुत सराहनीय थी और खोजी पत्रकारिता भी बहुत बढ़िया हुई है लेकिन कई जगह पत्रकार मजबूत कम बल्कि मजबूर अधिक दिखाई देते हैं। देखिए, आज पक्षपात का आरोप तो लग रहा है लेकिन आपको पत्रकार और प्रबंधन को अलग-अलग देखना होगा। आज तमाम पत्रकार या तो अनुबंध पर हैं या बड़े-बड़े औद्योगिक घरानों से जुड़े हुए हैं। कई मालिक तो खुलकर अपनी सोच को बताते हैं और अलग-अलग दलों से सांसद भी बने हैं।

आज अगर किसी पत्रकार को निलंबित कर दिया जाता है तो वो कुछ अधिक नहीं कर सकता है और दूसरे अखबार भी उसके बारे में नहीं लिखते हैं। इसके अलावा अब पत्रकारों का कोई मंच भी नहीं रह गया है। पत्रकारों के पास आज सामाजिक सुरक्षा तक नहीं है। आज जिला और गांव स्तर पर जो पत्रकार हैं, वो तो हाशिये पर हैं और न ही उनकी उतनी आय है। हम सबकी विचारधारा अलग-अलग हो सकती है, लेकिन दिक्क्त तब आती है जब हम राजनीतिक हो जाते हैं। जब आपकी चर्चा मुद्दों से भटक जाती है तो दिक्क्त आने लगती है।

हम आज-कल हर चीज को राजनीतिक चश्मे से देखने लग गए हैं तो ये पहले नहीं होता था। समस्या यह है कि आज हम किसी और के प्रवक्ता बन गए हैं। अगर कोई अच्छा काम कर रहा है तो उसकी तारीफ हो और कोई गलत काम कर रहा है तो पूरी ईमानदारी से उसकी आलोचना हो।

एक चीज यह भी जरूरी है कि आप किसको वोट देते हैं, उसकी झलक आपकी रिपोर्ट में नहीं आनी चाहिए और सही मायनों में यही पत्रकारिता है। रिपोर्ट निष्पक्ष, सत्यपरक और वस्तुनिष्ठ होनी चाहिए और इसमें समझौता नहीं होना चाहिए।

आजकल सोशल मीडिया के माध्यम से फेक न्यूज फैला दी जाती है और उससे सामाजिक सौहार्द भी बिगड़ जाता है। आप अपने छात्रों को अच्छे फैक्ट चेकर बनाने के लिए क्या कर रहे हैं?

फेक न्यूज और फेक कंटेंट इस समाज के लिए बेहद खतरनाक है और ये आज से नहीं, बल्कि कई सालों से हो रहा है। बस अब डिजिटल से इसकी ताकत बढ़ गई है। आज पेंडेमिक की तरह इंफोडेमिक आ गया है और आज इतनी सूचनाओं का भंडार है कि लोग यह तय नहीं कर पा रहे हैं कि कौन सी सूचना सही है और कौनसी गलत?

मुझे ‘नागरिक पत्रकारिता‘ इस शब्द से परहेज है। हर नागरिक को अपनी बात कहने का हक है, लेकिन वो पत्रकार नहीं बन सकता है। उसके लिए कुछ मापदंड और योग्यता होती है। आप चार शब्द लिख लेते हैं और मोबाइल चला लेते हैं तो इसका मतलब ये नहीं है कि आप पत्रकार बन गए। अगर यही पत्रकार बनने की योग्यता है तो फिर इन विश्वविद्यालयों को बंद कर देते हैं, हमारी जरूरत ही क्या है?

‘झोलाझाप‘ शब्द क्यों इस्तेमाल किया जाता है? क्योंकि इसमें योग्यता नहीं है, लेकिन वो ऐसा होने का दिखावा कर रहा है और उनसे समाज को बचने की जरूरत है। फैक्ट चेक पत्रकार का मूल सिद्धांत है और आज से नहीं, ये सालों से चला आ रहा है। चेक और वेरीफाई शब्द तो पत्रकार की आत्मा होते हैं। एविडेंस आधारित रिपोर्टिंग करनी जरूरी है। 

हमने यूनिसेफ के साथ मिलकर भारत में पहला ‘पब्लिक हेल्थ कम्युनिकेशन‘ कोर्स जैसा प्रयोग किया है। ऑक्सफोर्ड के साथ मिलकर वर्ष 2016 में हमने ‘आईआईएमसी‘ में इसे लागू किया था। इसमें हमने पब्लिक हेल्थ को ध्यान में रखकर पत्रकारों को प्रशिक्षित किया था। आज के समय में भी हमारे सभी परिसर में लोकल स्वास्थ्य से जुड़े पत्रकारों के साथ मिलकर यह काम जारी है। आज समाज में जो गलत सूचना फैलाई जा रही है, उस पर कैसे एक करारा प्रहार हो, उसके लिए भी हम अपने छात्रों को तैयार कर रहे हैं।

कोरोना काल में परिसर में कक्षाएं कैसे हो रही हैं और आने वाले समय में कैसे तकनीक का प्रयोग आप करने वाले हैं, इसके बारे में हमे कुछ बताइये।

इस मामले में हम बड़े सक्रिय हैं। पूरे कोरोना काल में हमने तकनीक के जरिये सभी से संपर्क बनाए रखा है और सुचारु रुप से सभी चीजों को लागू किया गया है। मैं छात्रों के सहयोग से भी अभिभूत हूं और आप देखिए कि पूरा सिलेबस छात्रों को करवाया जा चुका है।

इस समय 1600 के करीब हमारे अध्ययन केंद्र हैं, जिनमें कई लाख छात्र पढ़ रहे हैं और फाइनल ईयर के जो छात्र हैं, जिनको प्रायोगिक शिक्षा मिलनी चाहिए थी, उनके साथ हम जुड़ने की कोशिश कर रहे हैं, ताकि वो अपने आस-पास के केंद्र में जाकर अपनी प्रैक्टिकल क्लास ले सकें।

जब कोरोना की पहली लहर के बाद कैंपस थोड़े दिन खुले, उसके बाद हमने छात्रों को बुलाना शुरू किया ताकि उन्हें एक्सपोजर मिले और हमारे जनसंचार विभाग के ही बच्चों ने 200 से ऊपर वीडियो घर बैठे तैयार किए थे और आज भी बच्चे घर बैठे वीडियो और पोस्टर बना रहे हैं लेकिन मैं इस बात को भी स्वीकार करता हूं कि जिस प्रभावी तरीके से उनको हम परिसर में ट्रेनिंग दे सकते थे, वो अभी नहीं दे पा रहे हैं। आज इस कठिन समय में मुझे चिंता उन विद्यार्थियों की होती है, जिनके पास स्मार्टफोन नहीं है, लैपटॉप नहीं है, वो कैसे पढ़ पाएंगे और उनके नुकसान की कैसे भरपाई होगी?

आज आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस (Artificial intelligence) का जमाना है और हमे वर्तमान समय में ही भविष्य की योजनाओं को बनाकर चलना होगा, ताकि छात्रों को भी इसका फायदा मिले, इस दिशा में आप क्या कदम उठा रहे हैं?

आपने बिल्कुल सही कहा है। अगर हम पुराने कोर्स पर चलते रहे तो आने वाले समय में मुश्किल तो होगी। एक रिपोर्ट कहती है कि आने वाले समय में कॉमिक और एनिमेशन उद्योग में सालाना 16000 लोगों की जरूरत पड़ेगी, जिसकी तैयारी आज हमारे पास नहीं है। इसी पर सोचते हुए ‘आईआईएमसी‘ में मेरे कार्यकाल में मुंबई फिल्म सिटी में 20 एकड़ जमीन ली गई थी लेकिन मेरे प्रस्थान के बाद अब ये निर्णय लिया गया कि अब सूचना प्रसारण मंत्रालय उस काम को देखेगा। इसके अलावा ग्राफिक और एनिमेशन के एक प्रोग्राम को जो कि बंद पड़ा हुआ था, उसे हमने वापस शुरू करने में सफलता हासिल की है।

वर्तमान की शिक्षा नीति को देखते हुए अब हम चार साल का यूजी प्रोग्राम शुरू कर रहे है। हमारी योजना है कि आने वाले समय में जो छात्र हम तैयार करें, वो मल्टी टास्किंग हों, जो कि प्रिंट, टीवी और डिजिटल में समान रूप से काम कर सकें।

इसके अलावा हम मोबाइल और ड्रोन पत्रकारिता पर भी ध्यान दे रहे हैं। अगर एक फोटोग्राफर शादी में ड्रोन का इस्तेमाल कर सकता है तो हमारा पत्रकार क्यों नहीं कर सकता है? अगर आप बाहर निकलने में असमर्थ हैं तो आप ड्रोन के माध्यम से रिपोर्टिंग कर सकते हैं। आने वाले भविष्य को ध्यान में रखकर ये सब चीजें हम अपने सिलेबस में समाहित करने जा रहे हैं। आज के इस समय में हम अपने छात्रों को यही सिखाते हैं कि आने वाले समय में नौकरी की कमी नहीं होगी, लेकिन मल्टीटास्किंग लोगों की जरूरत होगी और हम अब इसी दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।

समाचार4मीडिया के साथ केजी सुरेश की बातचीत का वीडियो आप यहां देख सकते हैं।

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मेरी सफलता में मां के इन शब्दों का बहुत बड़ा योगदान है: ऋचा अनिरुद्ध

ऋचा अनिरुद्ध की गिनती उन एंकर्स में होती है, जिन्होंने टीवी पत्रकारिता में भावनाओं को जिंदा रखा है। उन्होंने कभी अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया।

Last Modified:
Saturday, 12 June, 2021
Richa Anirudh

ऋचा अनिरुद्ध की गिनती उन एंकर्स में होती है, जिन्होंने टीवी पत्रकारिता में भावनाओं को जिंदा रखा है। उन्होंने कभी अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। ऋचा अनिरुद्ध ने समाचार4मीडिया से खास बातचीत की है और अपने जीवन के तमाम पहलुओं पर चर्चा की है। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

आपका एक विशाल व्यक्तित्व है। आप एक छोटे शहर से हैं तो एंकरिंग की दुनिया में कैसे आना हुआ?

कुछ चीजें आज आप शिद्द्त से चाहते हैं तो वो कहीं न कहीं घटित होती हैं, कुछ ख्वाब जब आप बच्चे होते हैं तब भी आपके मन में पलते हैं और आज ऐसा नहीं है कि सब कुछ क्रेडिट ऋचा ले ले। इसमें सबका योगदान है और आज मैं सबके सहयोग से यहां तक आई हूं।

सही समय पर सही लोग मिलते गए और सौभाग्य से यहां तक आ गई। झांसी जैसे छोटे शहर में जन्म हुआ है तो कभी सोचा नहीं था कि टीवी पर आएंगे लेकिन अच्छे लोग मिलते रहे और मैं आगे बढ़ती गई।

जब मैं छोटी थी तो सोचती थी कि जब मेरा स्वर्गवास हो तो मेरी एक फोटो अखबार में आए और उस वक्त तो टीवी भी उतना नहीं था। दरअसल, वो जो इच्छा थी उसका मतलब यह था कि मैं सामाजिक जीवन में सक्रिय रहूं। करियर को लेकर मेरा विजन स्पष्ट नहीं था तो एक दिन किसी ने परेशान होकर मुझसे कहा कि तुम करना क्या चाहती हो?

मेरा जवाब था कि मैं कुछ ऐसा करना चाहती हूं, जिसमें हर दिन कुछ नया हो तो शायद मीडिया जगत मेरी किस्मत में था। हालांकि, मैंने कंप्यूटर में तीन साल का डिप्लोमा कोर्स किया है, जिसमें से तीसरे साल के लिए मुझे दिल्ली आना पड़ा था।

मैं स्कूल में ही ‘स्पिक मैके’ (SPIC MACAY) संस्था से जुड़ी हुई थी, जो क्लासिकल म्यूजिक को प्रमोट करती है। बड़े-बड़े नाम जैसे पंडित शिवकुमार शर्मा और कृष्ण मोहन भट्ट जैसे लोग झांसी आते थे और मैं उनका कार्यक्रम संभालती थी।

मंच पर जाने का ऐसा शौक था कि ऐसा कोई कार्यक्रम नहीं था, जिसमें मैं मंच पर नहीं जाती थी तो कहीं न कहीं ये लगन वहीं से शुरू हुई थी। जब दिल्ली आई तो वापस इस संस्था से जुड़ गई। उनका एक कन्वेंशन मद्रास में होना था और उस पर कर्टेन रेजर (curtain-raiser) बनाने दूरदर्शन की टीम आ रही थी।

‘स्पिक मैके’ के फाउंडर किरण सेठ ने उस दौरान मेरी ओर इशारा करते हुए कहा कि ऋचा एक बाइट दे देगी। ये बात 1996 की है और मेरी बाइट कैमरापर्सन को बहुत अच्छी लगी। उस समय रमेश शर्मा जी थे, जिन्होंने मुझसे कहा कि कभी टीवी में आपने कोशिश की है? मैंने उस वक्त तो हां नहीं की, लेकिन उन्होंने मुझे अपना नंबर दे दिया था।

एक-दो महीने के बाद मेरा मन हुआ और मैं मिलने गई। रमेश शर्मा जी की टीम के एक व्यक्ति से मुलाक़ात हुई और उन्होंने मुझसे कहा कि एक व्यक्ति का इंटरव्यू करना है। उस कार्यक्रम का नाम था ‘अंकुर‘ और आप कह सकते हैं कि वहीं से मेरी शुरुआत हुई थी।

उसके बाद मेरी शादी हुई और मैं अजमेर आ गई। अब महीने के 1000 रुपये मिलते थे और उसके लिए दिल्ली रुकना समझदारी नहीं थी! रमेश जी ने मुझसे कहा कि मन हो तो कभी आ जाना और ‘अंकुर‘ का काम देखना। उस समय ‘दैनिक नवज्योति‘ में डेस्क जॉब निकली थी और चूंकि मैंने ‘दूरदर्शन‘ के साथ काम किया था तो वो आसानी से मुझे मिल गई। रिपोर्टर जो भी स्टोरी भेजते थे, उसे अच्छे से देखना-समझना और एडिट करना होता था।

उस समय 1500 रुपये महीना मिलता था और मैंने बच्चों को ट्यूशन भी पढ़ाया है। इसके अलावा ‘आकाशवाणी एफएम‘ में मेरी ट्रेनिंग जरुर हुई थी, लेकिन मैं कभी ‘ऑन एयर‘ नहीं हुई थी। इसके बाद साल 2001 वो समय था जब मैं अपनी बेटी को लेकर दिल्ली आ गई थी और ‘जी मीडिया‘ में भी कोशिश करती रहती थी।

कई बार तो गार्ड मुझे भगा देते थे लेकिन आखिरकार ‘जी मीडिया‘ से कॉल आया और अलका जी और सतीश जी ने मेरा इंटरव्यू किया था। मुझे अपनी पहचान छिपाकर रेडियो पर काम करने के लिए कहा गया था लेकिन मैंने मना कर दिया था। साल 2002 से लेकर 2005 तक मैंने ‘जी‘ के साथ ही काम किया था।

हमने ‘जावेद मियादाद‘ के साथ एक शो किया था, जिसका नाम था ‘जावेद आपके शहर में‘, जिसे काफी पसंद किया गया था। ऐसा कह सकते हैं कि मैंने ‘जी‘ में बहुत काम किया था। एक बार कोलकाता में कहीं आग लग गई थी और वो ‘ब्रेकिंग न्यूज‘ थी। उस समय रात में एंकरिंग नहीं होती थे तो डेस्क के पास जब बॉस का कॉल गया कि कौन है ऑफिस में? जवाब मिला कि ऋचा है तो उन्होंने कहा कि जाओ ऋचा से न्यूज करवाओ और उस दिन पहली बार मैंने ‘जी‘ में न्यूज पढ़ी थी।

आप एक छोटे शहर से हैं और आपने काफी तरक्की की है। क्या आपको कभी लड़की होने के नाते ताने सुनने पड़े हैं?

पर्सनल टिपण्णी तो मैंने बहुत झेली हैं, लेकिन मेरी सबसे बड़ी हिम्मत मेरी मां थीं। मेरी मां मुझसे कोई काम नहीं करवाती थीं। एक दिन मेरी नानी ने उनसे कहा कि तुम इसको कुछ सिखाती क्यों नहीं हो? इसके जवाब में मेरी मां ने कहा कि काम तो जब सर पर आता है तो लड़का हो या लड़की, कर ही लेते हैं। बाकी मेरी बेटी घर के काम के लिए नहीं बनी है, वो कुछ बड़ा करेगी।

मेरी मां के वो वाक्य मेरे जीवन में बहुत काम आए हैं। मेरी मां हमेशा मुझे कहतीं कि ‘किरण बेदी‘ की तरह बनना और मैं जब उनसे मिली तो मैंने उन्हें ये बात बताई थी। मुझे बचपन से पता था कि मुझे कुछ बड़ा करना है। जब एक साल की बेटी को लेकर दिल्ली आई, तब भी लोगों ने खूब ताने मारे थे। अफवाह उड़ी कि ये तो अलग हो गई है, पति को तलाक देकर आ गई है।

एक ऑफिसर की पत्नी यदि अच्छा घर छोड़कर एक कमरे में रह रही है तो ये सब बातें सुननी पड़ती थीं। उस समय भी मेरी मां ने मुझे पूरा सहयोग दिया और मेरे साथ आकर रहीं। मेरी मां ने मेरे लिए बहुत किया है। मुझे डर लगता था कि अगर मैं सफल नहीं हुई तो क्या होगा? लेकिन मेरी मां के आशीर्वाद और पति के सहयोग से सब ठीक हुआ।

आपके शो ‘जिंदगी लाइव‘ की रूपरेखा कैसे बनी? उस वक्त ऐसे शो करने में खतरा भी था! ये सब कैसे प्लान हुआ?

जब बात ‘जिंदगी लाइव‘ की आती है तो हर बार मैं यही कहूंगी कि ये हर उस व्यक्ति की सफलता है, जो इससे जुड़ा रहा है। ये एक टीम वर्क था और इसने जबरदस्त सफलता प्राप्त की थी। दरअसल, होता यह था कि जब मैं न्यूज पढ़ती थी तो मैं उससे जुड़ जाती थी। कई बार तो ऐसा हो जाता था कि मैं भावुक हो जाती थी।

मेरे ऊपर असर होने लगता था घटनाओं का और मुझे तो कई बार टोका जाता था कि एंकर को ऐसा नहीं होना चाहिए, तुम इतना भावुक क्यों हो जाती हो? मैं हमेशा एक ही चीज कहती थी कि शायद मेरे अंदर जो भावना है, उसके कारण ऐसा होता है।

इसके बाद ‘जिंदगी लाइव‘ की जब रूपरेखा बनी तो दरअसल इसे एक एक्ट्रेस करने वाली थीं। मुंबई में कुछ शूट भी हुआ था लेकिन उसके बाद मैनेजमेंट से उनकी बात नहीं बनी और वो स्थगित हो गया था।

अब इस कहानी में संजीव पालीवाल जी एक अहम किरदार हैं, हालांकि राजदीप और आशुतोष ने क्रिएटिव फ्रीडम दिया, लेकिन संजीव पालीवाल जी ने कहा कि हम इसको ऋचा से करवाएंगे और फिर इसकी पूरी रूपरेखा तैयार की और इसका नाम ‘जिंदगी लाइव‘ रखा।

एक बार जब मैं एडिट करवा रही थी तो मेरे एक सहयोगी ने मुझसे कहा कि ये रोने-धोने वाला शो कौन देखेगा? मेरा सिर्फ एक ही जबाब था कि कोई देखे या नहीं, देखे मेरा मन को सुकून मिल जाएगा।दो सीजन तक संजीव पालीवाल जी एडिट एरिया में बैठते थे, लेकिन बाद में उन्होंने कहा कि ऋचा सीख गई है और उसके बाद एडिट भी मैं ही करवाती थी।

आपके शो ‘जिंदगी लाइव‘ को काफी लोकप्रियता हासिल हुई थी,  इससे लोगों के जीवन में किस तरह बदलाव आया उसके बारे में कुछ बताइए।

इस शो के बाद हमें खूब कॉल्स आते थे। मैं एक बात आपको यहां बता दूं कि ‘सत्यमेव जयते‘ के कई गेस्ट पहले ही ‘जिंदगी लाइव‘ में आ चुके थे। मुझे एक नाम याद याद आ रहा है ‘नीतू खुराना‘ का, जिन्होंने अपने पति के खिलाफ केस किया था और उस समय उनकी बेटियों के एडमिशन में दिक्क्त आ रही थी और उन्होंने मुझे बताया था कि ‘जिंदगी लाइव‘ देखने के बाद उनकी ये समस्या खत्म हुई।

हमने कई ऐसे अपराधियों की भी कहानी दिखाई जो जेल से बाहर आकर एकदम बदल गए थे। उनमें से एक को नौकरी तक ऑफर हुई थी। इसके अलावा कुछ ऐसे मुस्लिम बच्चे जिनको सिर्फ शक के आधार पर पुलिस ले जाती है और बाद में वो छूट जाते हैं, उनके ऊपर भी हमने स्टोरी की और कई बच्चों के ऊपर इसका अच्छा असर देखने को मिला था।

एक इंजीनियरिंग का लड़का था जो बाद में छूट गया था, वो डेढ़ साल जेल में रहा था और उससे चर्चा भी बहुत भावुक कर देने वाली थी। इसके अलावा मेरे लिए वो ईमेल्स  बहुत मायने रखती हैं, जो आज तक आती हैं।

इलाहबाद की एक लड़की जो रोज नींद की गोली लेकर सोती थी, उसने लिखा कि अब मैं जीना चाहती हूं और शायद मुझसे भी कहीं अधिक दुःखी लोग हैं। जब किसी निराश को आशा मिलती है तो हमें लगता है कि हमने किसी के लिए कुछ किया। इसके बाद ईटीवी पर ‘जिंदगी लाइव रिटर्न्स‘ आया था। दरअसल उस समय ‘कलर्स‘ जिंदगी लाइव को लेना चाहता था, लेकिन उसमे मेरे अलावा किसी और को लेने की बात नहीं थी, क्योंकि उनका शो बहुत बड़े स्तर पर बनने वाला था।

उसके बाद हमें ये बताया गया कि सिद्दार्थ बासु इसको बनाने वाले हैं और मैं फिर उनकी टीम में चली गई। एक पूरी टीम उस समय तैयार की थी, लेकिन उसी समय ‘आईबीएन7‘ का पूरा मैनेजमेंट ट्रांसफर हुआ और जितने भी शो पाइपलाइन में थे, सबको होल्ड कर दिया गया था।

मैं पार्लर में थी और मुझे ‘सिद्दार्थ बासु‘ का कॉल आया था कि कहां हो? मैंने जवाब दिया कि मैं पार्लर में हूं और शूट की तैयारी कर रही हूं। उस समय उन्होंने मुझे कहा कि ठीक है, बाद में बात करते हैं, लेकिन मैं समझ गई थी और इस तरह ये ‘कलर्स‘ के लिए नहीं बन पाया।

स्टार एंकर होने के बाद भी आपने टीवी की नौकरी नहीं की, जबकि आपको काफी मौके मिल सकते थे! आपने ऐसा क्यों किया?

साल 2007 में ‘जिंदगी लाइव‘ शुरू हुआ था और साल 2010 तक मैंने न्यूज और शो दोनों में संतुलन बनाया, लेकिन उस शो का मेरे जीवन और मेरे व्यक्तित्व पर भी प्रभाव पड़ने लगा था। मैं स्क्रिप्ट लिखती थी और टीम को लीड भी करती थी तो जाहिर सी बात है असर तो होना था और उसके बाद देखा जाए तो टीवी पर ‘चीखना चिल्लाना‘ शुरू हो गया था।

उस समय मेरा न्यूज से ध्यान हटने लगा था और मुझे याद नहीं कि साल 2010 के बाद मैंने कोई न्यूज पढ़ी हो। साल 2014-15 में मुझे उमेश उपाध्याय जी का कॉल आया था और मैंने सिर्फ ये देखने के लिए कि क्या मैं न्यूज वाकई पढ़ सकती हूं या नहीं, जॉइन किया था। लेकिन उस एक साल में मुझे समझ आ गया था कि अब मैं शायद ये नहीं कर पाउंगी। उसके बाद न्यूज से रिश्ता टूट गया। 

रोहित सरदाना के निधन ने हम सबको दुःखी कर दिया है। आपने तो उनके साथ काम किया है, कुछ यादें जो आप बताना चाहें?

रोहित का जाना मेरे लिए किसी झटके से कम नहीं था। उसी के पहले मेरे एक बहुत पुराने मित्र अंशुमान का स्वर्गवास हुआ था और मेरा मन कुछ अच्छा नहीं था तो मैं पास ही नर्सरी तक चली गई। जब मैं वापस गाड़ी में आकर बैठी तो एक संदेश आया, जिसमें रोहित के निधन की बात थी। मैं कुछ करती, इससे पहले मालिनी अवस्थी जी का कॉल आया और वो रोए जा रही थीं।

जब मुझे कंफर्म हुआ कि रोहित इस दुनिया में नहीं हैं तो कलेजा बैठ गया था। रोहित की पत्नी प्रमिला को मैंने सिर्फ एक  संदेश भेजा, जिसमें मैंने लिखा कि मैं तुम्हे कॉल करने कि स्थिति में नहीं हूं। मैंने उस रोहित को नहीं देखा है, जिसे आप लोग जानते हैं और जो बहुत सीरियस और परिपक्व हो गया था। मैंने उस रोहित को देखा है जब वो साल 2004 में ‘सहारा‘ से ‘जी‘ आया था और वो बड़ा नटखट था।

वो मुझसे खूब बातें करता था। कहता कि मैं ‘जी‘ के रिसेप्शन पर कॉल करता था कि आपसे बात करा दें लेकिन ये आपसे बात नहीं कराते थे। ‘जी‘ छोड़ने के बाद एक कार्यक्रम में हम मिले, जिसमें मुझसे पहले रोहित ने उस कार्यक्रम में मौजूद बच्चों को संबोधित किया था।

उसने कहा कि कई बार रात को मेरी आंख लग जाती थी तो ऋचा जी मेरी न्यूज पढ़ आती थीं। मैंने उससे कहा कि मुझे ये याद नहीं है तो उसने कहा कि आपने किया है इसलिए याद नहीं है और मेरे लिए किया है तो मुझे याद है। अंजना, रोहित और मेरी अच्छी दोस्ती थी। हम भरोसा करते थे एक-दूसरे पर और हम खूब बातें करते थे। मैं पिछले साल ‘कुम्भ‘ में रोहित के साथ थी और हमने एक सेशन भी साथ में किया था।

एक कॉमन पार्टी में मेरी बेटी आई हुई थी तो उसने कहा कि आयशा आई है तो गाना सुनेंगे। रोहित के कहने पर आयशा ने ‘आज जाने की जिद न करो‘ गाना गाया था, जिसका वीडियो खुद मुझे आलोक श्रीवास्तव जी ने भेजा था। कभी-कभी ऐसा लगता है कि ये एक बुरा सपना है और हम नींद से जागेंगे और रोहित हमारे सामने होगा।

कोरोना काल में आपने अपने एनजीओ के माध्यम से लोगों की मदद की है, इसके बारे में कुछ बताइए।

कोरोना की दूसरी लहर ने इस देश को काफी नुकसान पहुंचाया है। सबसे पहले तो मैं खुद ही इस दौरान बीमार हो गई थी और उसके बाद मैंने अपनी टीम से बात करके इसकी रूपरेखा तैयार की। कई बार क्या होता है कि आपके पास किसी का संदेश आता है और आप उसे आगे किसी और को भेज देते हैं। मैंने अपनी टीम से कहा कि क्यों न इसे वेरीफाई किया जाए और लोगों की मदद की जाए।

उस समय क्या हो रहा था कि अगर किसी के पास ऑक्सीजन सिलेंडर था भी तो वो लोगों के कॉल से बड़ा परेशान हो जा रहा था और ये गारंटी नहीं थी कि समय आने पर हमें वहां से सिलेंडर मिल ही जाए तो हमने दूसरे तरीके से सोचना शुरू किया।

हम जब कंफर्म हो जाते थे तो सीधे उसका पता दे देते थे ताकि तुरंत जिसको जरुरत है, वो वहां जाकर ले ले। हालांकि विडंबना देखिए कि इस देश में अपने आप को महान पत्रकार कहने वाले लोगों ने मेरी इस मुहिम तक का मजाक बनाया था।

सरकार से सवाल एक अलग चीज है और लोगों की मदद करना अलग चीज है लेकिन दुःख इस बात का है कि हर चीज में कुछ लोगों को अपना एजेंडा थोपना होता है। सच बताऊं तो धीरे-धीरे ये चीज मुझ पर भी असर करने लगी और एक दिन ऐसा भी आया कि मेरी खुद की तबियत खराब होने लगी।

ये वो लोग हैं जो दूसरों को बिका हुआ कहते हैं और इससे इनको लगता है कि इन्हें ईमानदारी का सर्टिफिकेट मिल जाएगा। एक समय तो मैं अजीब बातें करनी लगी थी। मसलन, मुझे कुछ हो जाए तो मेरे पीछे से ऐसे-ऐसे करना तो एक दिन मेरी बेटी ने ही मुझसे कहा कि मां, आप प्लीज सोशल मीडिया छोड़ दो। कोरोना ने वाकई हम सबको बड़ा इफेक्ट किया है।

वर्तमान में आप अपने यूट्यूब चैनल  के अलावा क्या कर रही हैं और भविष्य में आपका क्या प्लान है?

2014 के बाद मैंने एक रेडियो शो किया था, जिसका नाम था ‘दिल्ली मेरी जान‘ तो वर्तमान में रेडियो भी चल रहा है और एक वीकेंड शो कर रही हूं, जिसका नाम ‘big heroes‘ है। इसके अलावा ‘इंडिया अहेड‘ चैनल के लिए टॉक शो भी कर रही हूं। इसके अलावा मैं लाइव शो भी करती हूं, लेकिन जैसा कि आपसे मैंने कहा कि मैं अधिक प्लान नहीं करती। ‘ओशो‘ को मानती हूं, थोड़ी आध्यात्मिक हूं। मेरे पास जो भी काम आता है उसे बड़ी शिद्द्त से करती हूं बाकी अधिक नहीं सोचती।

समाचार4मीडिया के साथ ऋचा अनिरुद्ध की बातचीत का वीडियो आप यहां देख सकते हैं।

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जीवन की थी ये सबसे कठिन रिपोर्टिंग, जब लगा कि चली जाएगी जान: प्रतीक त्रिवेदी

‘न्यूज18 इंडिया’ के सीनियर एडिटर और देश के बड़े रिपोर्टर्स में शुमार प्रतीक त्रिवेदी ने समाचार4मीडिया के साथ एक बातचीत में मीडिया में अपनी यात्रा को लेकर चर्चा की है।

Last Modified:
Tuesday, 08 June, 2021
Prateek Trivedi

‘न्यूज18 इंडिया’ (News18 India) के सीनियर एडिटर और देश के बड़े रिपोर्टर्स में शुमार प्रतीक त्रिवेदी ने समाचार4मीडिया के साथ एक बातचीत में मीडिया में अपनी यात्रा को लेकर चर्चा की है। इस दौरान उन्होंने अपने जीवन की एक से एक दिलचस्प बातें भी हमसे साझा कीं। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

मीडिया जगत में आपकी एक लंबी यात्रा रही है। क्या आप वाकई पत्रकार बनना चाहते थे? अपने बचपन के बारे में कुछ बताइए?

सबसे पहले तो आपको शुभकामनाएं। आपने ये जो सीरीज शुरू की है, उसकी अपार सफलता की कामना करता हूं। देखिए, मेरे जो गुरु हैं वो ‘टाइम्स ऑफ इंडिया‘ में रिपोर्टर थे और उन्होंने इस प्रोफेशन के लिए आईएएस छोड़ दिया था। मुझे उस वक्त ऐसा लगा कि जीवन में कुछ छोड़ा भी जा सकता है।

मैंने जिस परिवार में जन्म लिया था, उस परिवार में ड्रामा, आर्ट, कला, फिल्में यही सब था। मीडिया मेरा पहला प्यार नहीं था और मुझे तो स्टेज से मोहब्बत थी। मेरे दादाजी और पिताजी दोनों रेडियो में थे और मैंने अपने दादाजी के साथ नौ साल की उम्र में पहला लाइव रेडियो ब्रॉडकास्ट देखा था। सबका संघर्ष अलग-अलग होता है और हर मनुष्य को अपने हिस्से का संघर्ष भोगना भी पड़ता है। मुझे याद नहीं कि मैंने कभी किसी अभाव को देखा या महसूस किया था।

मेरी पहली नौकरी 2600 रुपये की थी जो कि उस जमाने में तो बहुत हुआ करते थे। मैं उस समय जर्मनी से एडवांस जर्नलिज्म पढ़कर आया था। उसके बाद यूनिसेफ में भी नौकरी करने का मौका मिला, पोस्ट ग्रेजुएशन भी मैंने बाद में की। इसके साथ ही मैंने ‘अमर उजाला‘ के साथ भी काम किया था।

मुझे ऐसा लगता था कि मैं अगर पत्रकार बन गया तो अपने पहले प्यार को जी सकता हूं। इस मसले पर मैंने ‘श्यामनन्द  जालान‘ जो कि एक बहुत बड़े निर्देशक थे, से भी मुलाकात की थी। उन्होंने मुझसे कहा कि जब तुम इश्क की परिणति तक पहुंच ही नहीं सकते तो अपने पहले प्यार ड्रामा को तो रहने दो। उस वक्त मेरे पिताजी ने भी मुझसे कहा कि संघर्ष तो ड्रामा और पत्रकारिता दोनों में है।

मैं एक चीज यकीन से कह सकता हूं कि पिछले 25 साल मैंने किसी निराशा और हताशा में नहीं बल्कि अपने पेशे को जीकर निकाले हैं। निराशा और हताशा तो मुझसे कोसों दूर रहती है। मैंने जिसके साथ भी काम किया, अपने काम को पूरा एन्जॉय किया।

आपने ‘आजतक‘ के साथ भी एक लंबे समय तक काम किया है। उस यात्रा के बारे में कुछ बताइए।

बात तब की है, जब मैं रजत शर्मा जी के साथ काम कर रहा था। साल 2000 से दिसंबर 2003 तक मैंने उनके साथ काम किया और उस समय मुझे ऐसा लगने लगा था कि मुझे अब अपना और विस्तार करना चाहिए।

अगर आप मेरी यात्रा देखें तो पाएंगे कि न तो मुझे ऑफिस में कोई ऐसा बड़ा पद मिला, न ही मुझे किसी चैनल में ‘मैनेजिंग एडिटर‘ का पद हासिल हुआ। मैंने बस एक चीज जो सीखी, वो ये कि अपनी लकीर को बड़ा करके चलते रहो। सामने वाले की लकीर को मत देखो, उससे कुछ हासिल नहीं होता है। मेरे कुछ मित्र थे ‘आजतक‘ में और ये वो समय था जब लोग छोड़कर भी जा रहे थे, कुछ लोग ‘दूरदर्शन‘ भी जा रहे थे, तो वहां जगह थी।

चूंकि 2004 का चुनाव था तो मेरा चयन हो गया और वहां उदय शंकर जी भी थे लेकिन मेरा और उनका एक दिन का भी साथ नहीं रहा। हालांकि, हमने पहले एक-दूसरे के साथ ‘सहारा‘ में काम किया हुआ था और दोनों एक-दूसरे को बेहद पसंद करते थे।

जब मैं ‘आजतक‘ में आया था तो उनका फेयरवेल था। इंटरव्यू का एक किस्सा आपको मैं बताता हूं, आखिरी दौर में मुझसे पूछा गया कि आपकी बीट क्या है? सीवी में लिखा हुआ था आरएसएस, वीएचपी और माइनॉरिटी, तो उन्होंने इसे ही लेकर सवाल किया की आप आरएसएस भी कवर करते है और मुस्लिम मुद्दे भी तो मैंने जवाब दिया कि मेरे घाट पर सब पानी पीते हैं। इसके बाद उन्होंने मुझसे पूछा कि बताइए मंदिर कब बनेगा?  मैंने कहा कि सर, नहीं बनेगा तो उन्होंने कहा कि क्यों नहीं बनेगा तो मैंने जवाब दिया कि सर, क्या आप मेरी बीट खत्म करना चाहते हैं? ये सुनकर वो मुस्कुराने लगे और इस प्रकार मेरी ‘आजतक‘ के साथ यात्रा शुरू हुई।

आपका शो ‘भैयाजी कहिन‘ बहुत अलग है। इसमें लोगों की भागीदारी होती है। इसकी रूपरेखा कैसे बनी?

‘दिल्ली आजतक‘ में मुझे शाम को छह से सात ये करने का मौका मिलता था और लगभग नौ साल तक मैं वही करता रहा। आज भी मेरा शो शाम को छह बजे ही आता है। जीवन में कुछ ऐसे हादसे होते हैं, जिसके बाद आपका जीवन बदल जाता है। दरअसल, मेरठ में एक जगह आग लगी हुई थी और मुझे वहां उस हादसे को कवर करने के लिए भेजा गया था।

उसी समय मैंने अलीगढ़ के दंगे भी कवर किए थे। रात के डेढ़ बज गए थे और सभी बड़े लोग जा चुके थे। उस हादसे में मां और बच्चे भी मारे गए थे। ऊपर चंद्रमा था और अपनी स्टोरी की शुरुआत मैंने एक लाइन से की और वो लाइन थी कि ‘चांद तो पूरा है, पर मां मैंने तेरा हाथ नहीं छोड़ा है‘ और इसके बाद मैंने पूरी स्टोरी फाइल की। जब मैं वापस आया तो मुझे नकवी जी ने कहा कि अरे, आप जो ऐसे घूम-घूमकर करते हैं न वैसा कुछ कीजिए और इसके बाद मैंने ये सब शुरू किया।

एक किस्सा आपको सुनाता हूं और वहीं से प्रतीक त्रिवेदी के ‘आजतक‘ में हस्ताक्षर हुए थे। अलीगढ़ यूनिवर्सिटी में एक प्रोग्राम मुझे करना था। दरअसल, निकाह पर कोर्ट का कोई निर्णय था तो मुझे वहां जाने को कहा गया था।

मैंने जब वो कार्यक्रम शुरू किया तो वो सिर्फ 30 मिनट का होना था, लेकिन जब वो शुरू हुआ तो वो कार्यक्रम तीन घंटे तक चलता रहा। उस दिन नकवी जी अपना केबिन छोड़कर बाहर आए और उस दिन पहली बार मुझे पहचान मिली। इसके बाद मुझे सिर्फ 15 दिन के लिए ‘दिल्ली आजतक‘ में ये शो करना था, लेकिन वो 9 साल तक ‘जनपथ‘ के नाम से चलता रहा। वहीं से इन सबकी शुरुआत हुई।

आपने कोरोना काल में भी अपने शो को जारी रखा था लेकिन आप खुद कोरोना पॉजिटिव हो गए थे। उस अनुभव के बारे में कुछ बताएं।

जब कोरोना की पहली लहर आई तो मेरे सामने सबसे बड़ी समस्या थी कि जो लोग मेरे शो के हीरो हुआ करते थे, अब वो लोग ही नहीं थे। मैं कनॉट प्लेस में शो करता था और वो सुनसान था। लोगों को अच्छा लगता था मेरे शो को देखना। जब वो एक आम आदमी को अपनी बात रखते हुए देखते थे तो इस बार मैंने अपनी यात्रा को शहर से गांव ले जाने का निर्णय लिया।

उस वक्त लोग गांवों की ओर पलायन कर चुके थे और जनता सड़कों से गायब हो चुकी थी। मेरा यह प्रयोग कामयाब रहा, क्योंकि लोग मुझे गांव में मिल रहे थे। स्टूडियो से निकलकर फुटपाथ पर आया और कोरोना में तो मैं लोगों के आँगन तक पहुंच गया था। आपके अपने दर्शकों के हिसाब से सोचना पड़ता है। 

जब मैं बिहार चुनाव कवर करके आया तो मुझे कोरोना हुआ। मेरे ऑफिस से भी मुझे मदद मिली। एक डॉक्टर मुझे मिले, जो रो रहे थे, डर रहे थे। मैं उन्हें कहानियां सुनाता रहता था तो वो खूब मुस्कुराते थे। अक्सर मेरे बिस्तर के आगे वो अपनी कुर्सी लगा देते थे। कभी-कभी आपको इन सबसे गुजरना होता है। जीवन का एक वो बड़ा कठिन दौर था। 20 दिन से भी अधिक समय आप अलग रहे, अकेले रहे तो अजीब तो लगता है, लेकिन धीरे-धीरे मैं उस दौर से बाहर आ गया। 

क्या आपको ऐसा लगता है कि कोरोना की दूसरी लहर में मीडिया के एक वर्ग ने नेगेटिव रिपोर्टिंग की है?

मेरा ऐसा मानना है कि अगर गंगा में लाशें बह रही हैं तो दिखाया जाना चाहिए। हमारा पहला धर्म है कि सवाल पूछा जाना चाहिए। अब वो किस नजरिए से पूछा जा रहा है, वो अलग बात है। मैं ये जानता हूं कि अगर प्रयागराज के तट पर लाशें मिल रही थीं तो सरकार से यह पूछा जाना चाहिए था कि क्या ये सही था या गलत था? लेकिन अगर कोई ये कहे कि देश में 40 करोड़ लोगों को कोरोना हो गया है या देश में छह लाख लोग मर गए हैं तो इसका कोई तर्क होना चाहिए!

रिपोर्टिंग हमेशा बैलेंस होनी चाहिए। मैंने हमेशा अपनी रिपोर्टिंग में इस बात का ध्यान रखा है, लेकिन हां, किसने कहां इसका इस्तेमाल किया, ये भी एक बड़ा सवाल है। हो सकता है कि जितने सरकार के आंकड़े हों, उससे अधिक लोग मरे हों लेकिन ये भी नहीं है कि आप इसे सीधे छह लाख कह दें।

जैसे कि एक सरकार कह रही है कि सिर्फ दो शिक्षक मरे, लेकिन अगर शिक्षक संघ कह रहा है कि 1400 से अधिक मरे तो आपको उसकी तुलना तो करनी होगी। मेरा काम बस यही है, बाकी फैसला जनता करती है। मेरा काम सारे तथ्यों को लाकर एक जगह रखना है, बाकी सरकार को अपना काम करना होता है।

जब अमेरिका और पेरिस में हमले होते हैं तो वहां की मीडिया किसी की लाश नहीं दिखाती है, लेकिन यहां लोगों ने उस पर राजनीति की! इस पर आपके क्या विचार हैं?

ये मीडिया तय करता है कि उसे क्या दिखाना चाहिए और क्या नहीं दिखाना चाहिए! आप मुझे बताइए कि इसे देश के सुप्रीम लीडर को कैसा दिखाई देना चाहिए? क्या वो कमजोर दिखाई देना चाहिए? नहीं! उसे ताकतवर दिखना चाहिए। हमने लोग खोए हैं और उसका हमें दुःख है और मैं हमेशा कहता हूं कि कोई भी हो, आंख में आंख डालकर सवाल पूछिए, लेकिन देश के सुप्रीम लीडर को कमजोर मत दिखाइए, राष्ट्र सर्वोपरि है।

देश के साथ कभी समझौता नहीं हो सकता है। जब मैं अलीगढ़ के दंगे कवर करने गया तो मुझसे कहा गया कि ये मत दिखाना वो मत दिखाना! हमें दंगे शांत करने हैं न कि उन्हें और भड़काना है। सवाल करने होते हैं लेकिन देश के ऊपर कोई नहीं है। आप सोचिए कि अगर आंख के ऑपरेशन के कैंप में अगर 40 लोग अंधे हो जाएंगे तो मैं उसे दिखाऊंगा भी और सवाल भी करूंगा।

यहां एक सवाल यह भी खड़ा हो सकता है कि जब एक आदमी की बात आती है तो आप नंबर दिखाते हैं लेकिन जब सरकार की बात आती है तो आप नंबर छिपा देते हैं। सबका नजरिया है और देश से बड़ा कुछ भी नहीं है।

मैंने जब हेल्थ की स्टोरी कीं वो चाहे एम्स पर हो या आगरा पर हों, उस समय राजनारायण जी हेल्थ मिनिस्टर थे। उन्होंने उस समय मेडिकल कॉलेज को एम्बुलेंस दी थीं और जब मैं वहां गया तो मैंने देखा कि वहां तो बंदर कूद रहे थे।

इस देश में उस समय भी हेल्थ पर ध्यान नहीं दिया जाता था और आज भी नहीं दिया जाता है। जीडीपी का ढाई फीसदी प्रस्तावित है लेकिन वो भी खर्च नहीं होता है। हमें हेल्थ सिस्टम पर ध्यान देना होगा। सात साल हों, चाहे 70 साल हों, दोनों जिम्मेदार हैं।

आपने केदारनाथ जैसी जगह में भी रिपोर्टिंग की है और फुटपाथ पर भी शो किए हैं। युवा पत्रकारों के लिए कोई सलाह देंगे!

केदारनाथ में तो मेरा किस्सा लगभग खत्म ही हो गया था। उसी के बाद मैंने ‘आजतक‘ छोड़ा था और वो साल 2013 की बात है। केदारनाथ की वो बारिश और 15 दिन तक कुछ पता नहीं कि क्या हो रहा है ! उस घनघोर जंगल में इतनी ऊंचाई पर खो जाना, आपके पास न कोई सामान है और न खाने को कुछ है। ऐसी भयंकर बारिश और 20 दिन बाद जब लौटा तो सोचा कि जीवन में आगे बढ़ जाना चाहिए।

मैं युवा पत्रकारों से एक ही चीज कहूंगा कि शरीर और जीवन का ध्यान करो, यह रहेगा तो पोस्ट मिल जाएगी अगर यह ही नहीं रहा तो जीवन का कोई अर्थ नहीं है। मैंने तो अपने साथी को कह दिया था कि आप मुझे छोड़कर चल जाइए। ऐसी पर्वत श्रृंखला जो कहां जाएगी, किधर निकलेगी कुछ अता-पता नहीं था। जो एसडीएम मेरे साथ रुका था, वो बह गया था और जिस पहाड़ पर मैं था, उसके नीचे से मिट्टी सरक रही थी। मैं एक हिंदू हूं और आप सोचिए कि मैं उस मंदिर के अंदर नहीं गया! मेरे सामने लाशें पड़ी थीं।

मैनें नक्सल के इलाके में भी रिपोर्टिंग की और बाढ़ भी कवर की, लेकिन केदारनाथ की रिपोर्टिंग जीवन का सबसे कठिन काम था। मुझे आज भी याद है मुंबई की वो पहली बाढ़, जिसको कवर करने मुझे भेजा गया था, पहली बार ऐसा था कि ‘स्टार‘ से टीआरपी में ‘आजतक‘ ने झटका खाया था।

मैं जब गया तो नेवी के अधिकारी ने कहा कि अगर गिर गए तो गए, कोई नहीं आएगा! मेरे दो लोग पहले ही जान खो चुके हैं। झारखंड में नक्सल की रिपोर्टिंग की है, डाल्टनगंज में डेढ़ महीने तक रुका रहा। आज मैं बस इतना कहूंगा कि जीवन बड़ा है। जिस गांव में हम रुके थे तो उस बारिश में उसकी गाय, घर सब नीचे बह गया था। सुबह वो रो रहा था और मुझे ऐसा लगा कि अगर मुझे थोड़ा धक्का लगा होता तो मैं भी नीचे गया था।

कैमरामैन बोला, प्रतीक जी ये तो गलत काम हाथ में ले लिया है। आगे नहीं जाना! मैंने कहा-चलो स्थगित करते हैं। लेकिन मन में आया कि थोड़ा और आगे देख आएं, रात हो जाए तो वहीं रुक जाएंगे। ऐसा करते-करते बहुत आगे तक चले गए और ऐसा अनुभव हुआ कि बस एक ही बात निकलती है कि अपने जीवन के साथ कभी मत खेलो।

समाचार4मीडिया के साथ प्रतीक त्रिवेदी की इस बातचीत का वीडियो आप यहां देख सकते हैं-

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यही बात डिजिटल मीडिया को आकर्षक और ताकतवर बना रही है: निशांत चतुर्वेदी

वरिष्ठ पत्रकार एवं ‘टीवी9 भारतवर्ष’ के सीनियर एग्जिक्यूटिव एडिटर निशांत चतुर्वेदी ने समाचार4मीडिया से खास बातचीत की है।

Last Modified:
Friday, 04 June, 2021
Nishant Chaturvedi

वरिष्ठ पत्रकार एवं ‘टीवी9 भारतवर्ष’ के सीनियर एग्जिक्यूटिव एडिटर निशांत चतुर्वेदी ने समाचार4मीडिया से खास बातचीत की है। इस दौरान उन्होंने अपने जीवन से जुड़े कई पहलू साझा किए हैं। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:
आपने मीडिया में एक लंबा सफर तय कर लिया है, हमें अपने शुरुआती जीवन के बारे में कुछ बताइए।

मैं भोपाल में जन्मा हूं और मेरी पढ़ाई कई जगह हुई है। मैंने भगत सिंह कॉलेज, दिल्ली से बी.कॉम किया है। मीडिया में आने से पहले मैं रेडियो जॉकी कर रहा था। 
मैं स्पोर्ट्स बहुत अच्छा कर रहा था और 100 मीटर में स्टेट चैम्पियन भी रहा। उस समय किसी ने मुझसे कहा कि ‘आजतक‘ नाम का एक चैनल आ रहा है, तुम्हे उसमें जाना चाहिए। मैंने एक अच्छा सा सीवी तैयार किया और ‘आजतक‘, ‘जी न्यूज‘ और ‘एनडीटीवी‘ में भेज दिया। 

‘एनडीटीवी‘ उस समय ‘स्टार‘ के लिए न्यूज बना रहा था। मुझे बाकी जगह से तो नहीं लेकिन ‘जी न्यूज‘ से कॉल आया।  जब मैं वहां गया तो मुझे एक अजीब सा अनुभव हुआ, मुझे सब वहां अजीब सी निगाहों से देख रहे थे। मेकअप रुम में मुझे देखकर पता नहीं क्यों एक महिला रोने लगी ! उस समय ‘जी‘ में ‘इंदु  शेखर‘ जी हुआ करते थे और बहुत अच्छा उनका व्यक्तित्व था। 
मैनें अपने पिताजी की शर्ट और कोट पहना हुआ था और उस समय क्रोमा पीला नहीं नीला हुआ करता था। मुझे इन सब चीजों की कोई खास जानकारी नहीं थी तो मुझे उन्होंने कहा कि तुम कैसे करोगे? मुझे उस वक्त उन्होंने अपना कोट दिया और इस तरह से मेरा ऑडिशन हुआ। 

मुझे कहा गया कि आप स्पोर्ट्स की एंकरिंग करेंगे, जिसमें मुझे कोई परेशानी नहीं थी। एक दिन मुझे एक लड़के ने बुलाया और कहा कि आपको पता है आपको इधर सब क्यों अजीब तरह से देखते है ? 
उसने मुझे एक वीडियो क्लिप दिखाई और मैंने देखा की एक व्यक्ति जो बिल्कुल मेरी तरह दिखाई देता है बस चश्मे का फर्क था। उनका नाम था अमल चतुर्वेदी और एक हादसे में कुछ ही दिनों पहले उनकी मृत्यु हुई थी। 

लोगों को ऐसा लगा कि जैसे अमल वापस आ गया है और मेकअप रुप में रोने वाली महिला उनकी मंगेतर थी। तो मेरी नौकरी मेरी काबिलियत से नहीं बल्कि अमल के आशीर्वाद से लगी थी क्योंकि उसने ऊपर जाकर मेरी ‘सेटिंग‘ की थी। 

आपने ‘जी न्यूज‘ के बाद ‘दूरदर्शन‘ के साथ भी काम किया है, उस यात्रा के बारे में कुछ बताइए। 

दरअसल, जब अमेरिका में 9/11 का हमला हुआ था उस वक्त निधि जी उसे एंकर कर रही थीं। उस वक्त ‘सीएनएन‘ के हवाले से हमें फुटेज मिल रही थी। वो एक ऐसा समय था, जब रन डाउन भी हाथों से बना करते थे। न्यूज रुम में भी सब चौंक गए थे कि इतना बड़ा हमला हो गया है। उस हमले की एंकरिंग मैंने भी रात में की थी। 

लेकिन उसके तीन दिन बाद मुझे मना कर दिया गया। उस वक्त इतने सवाल पूछने की हिम्मत किसी की नहीं होती थी और उसके दो दिन बाद मुझे टिकर पर डाल दिया गया। मुझे उस समय हिंदी टाइपिंग नहीं आती थी तो उसके बाद मुझे वेबसाइट देखने के लिए बोल दिया गया। 

आकृता धीर उस वक्त मेरी बॉस हुआ करती थीं, लेकिन तब तक मेरे मन में भावना आ गई थी कि मेरे साथ गलत हो रहा है तो उसी वक्त मैंने दूसरी जगह पर जाने का निर्णय लिया। 
‘डीडी न्यूज‘ में जाना इतना आसान नहीं था क्योंकि उनका एक बहुत बड़ा पैनल था, जिसनें मेरा इंटरव्यू किया था। हालांकि वो नौकरी पाने में कामयाबी हासिल हुई और मैनें उधर बहुत कुछ सीखा, हमें ‘बीबीसी‘ वालों ने भी आकर काफी कुछ सिखाया।

मैंने उस समय के पीएम वाजपेयी जी के साथ ट्रेवल किया, कलाम साहब का इलेक्शन कवर किया और उसके बाद ‘आजतक‘ में मुझे मौका दिखाई दिया और आखिरकार दिसंबर 2003 में मैंने ‘आजतक‘ के साथ जुड़ने का निर्णय लिया। इसके अलावा मैंने ‘सहारा‘, ‘न्यूजएक्स‘ और ‘इंडिया टीवी‘ के साथ भी काम किया है। 

आपका मिजाज काफी सौम्य है और आप डिबेट में किसी से बहस भी नहीं करते है ! क्या आपको कभी गुस्सा आता है?

देखिए,हम स्क्रीन पर जितने शांत दिखाई देते है उतने प्रोडक्शन के टाइम पर नहीं होते है। अगर आप मेरे प्रोड्यूसर से बात करेंगे तो वो कहेंगे कि यार ये कितना गुस्सा करता है। जब आप शो करते है तो उस वक्त आपने उसकी एक रुपरेखा बनाई होती है। उस समय स्क्रीन पर कुछ गड़बड़ न हो जाए,ऐसा लगातार दिमाग में भी चलता रहता है। 

आप देखिए कि हाल ही में फ्रेंच नोबेल पुरस्कार विजेता लूच मॉन्टेनियर ने दावा किया था कि वैक्सीन लगवाने वाले लोग अगले दो साल से ज्यादा जिंदा नहीं रहेंगे। लूच ने वेरियंट्स के लिए वैक्सीन के कारण हुए म्यूटेशन को जिम्मेदार ठहराया था लेकिन हमारे शो में हमने उन्हें गलत साबित किया है। जब आप ऐसे मुद्दों पर बहस करते है तो आपको सावधान रहना होता है कि कोई गलत जानकारी दर्शकों तक नहीं जानी चाहिए। 

जहां तक बात स्क्रीन की है तो मेरा शांत स्वभाव मेरे पिताजी पर गया है। कभी हम सड़क पर किसी की लड़ाई देखते है तो उसे देखकर हम घर चले जाते है लेकिन वहां उसकी बात नहीं करते। 
मैं नहीं चाहता कि मेरे शो पर भी ऐसा ही हो। मैं चाहता हूं कि लोग मेरे शो को देखकर और मेरी डिबेट से कुछ सीखकर घर जाए। मेरे शो में आप देखेंगे कि ग्राफिक इनपुट बहुत अधिक होता है और उसी कारण डिबेट में बैठे लोग जानकरी पर ही चर्चा करते है। इसके अलावा मेरा यह भी कहना है कि कोई भी राजनेता कितना ही छोटा क्यों न हो, अनुभव में वो आपसे बड़ा है इसलिए मैं अपनी डिबेट में किसी शोर शराबे को स्वीकृति नहीं देता हूं। 

आपकी डिबेट को अगर देखा जाए तो ऐसा लगता है कि विदेशी मामलों में आपकी रुचि अधिक है ! इसके पीछे क्या कारण है? 

मैं जब 'दूरदर्शन' में था तो मुझे विदेश विभाग कवर करने का मौका मिला था और इसके अलावा 'आजतक' में भी अच्छे मौके मुझे मिलते गए। इसके अलावा ये हर किसी की रुचि पर भी निर्भर करता है कि वो कैसे चीजों को देखता और समझता है। ऐसा नहीं है कि मुझे राजनीति अच्छी नहीं लगती लेकिन हर जगह की राजनीति की एक खासियत है कि आप उसमें अनुमान लगा सकते है। 
आज के समय में तो सीधे किसी भी नेता का बयान आ जाता है लेकिन हमारे समय में ऐसा नहीं था। हमें घंटों इंतजार करना पड़ता था। 

मुझे आज भी याद है कि जब वाजपेयी जी हारे थे, तब 10 जनपथ में सुबह 6. 30 से रात को 8.30 तक हम खड़े रहते थे, आप सोचिए कि उस दौर में हमें कितना कुछ सीखने को मिलता था। मुझे ऐसा लगता है कि विदेशी मामले बड़े रोचक होते है। अगर आप 1918 के flu pandemic को देखें और आज के कोरोना वायरस को देखें तो आप पाएंगे कि दुनिया कैसे बदल रही है। फाइजर और मॉडर्ना ने अगले दो साल तक के लिए अपनी वैक्सीन दूसरे देशों को देने के लिए बुक कर ली है। 'यास तूफान'  के समय क्या ये न्यूज किसी ने देखी कि भारत हमेशा अन्य देशों की प्राकृतिक आपदा में मदद करता रहा है? मेरा मानना है कि जब आप किसी चीज को चाहते है तो वो ऊर्जा आपको उस तक पहुंचा देती है।  

आज के समय में डिजिटल जिस तेजी से बढ़ रहा है उसी तेजी से फेक न्यूज भी बढ़ रही है ! इस पर आपका क्या कहना है?

देखिए, इसमें हमें एक और चीज जोड़नी होगी और वो है पारंपरिक मीडिया, डिजिटल मीडिया अभी छोटा बच्चा है और उसे सिखाना होगा और वो काम सरकार करेगी। अगर मीडिया के बड़े-बड़े लोग एक मीडिया मॉनिटरिंग सोसाइटी बना लें तो भी इसे अच्छे से मॉनिटर किया जा सकता है। वो और सरकार दोनों को अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी और वो बताएंगे कि डिजिटल में क्या गलत हो रहा है और क्या सही करना चाहिए ! 

अगर आप किसी छोटे बच्चे को खेलते हुए देखें तो वो दस बार दीवार पर मारता है सिर्फ एक बार बॉल पर मारता है, उसके बाद भी आप उसकी तारीफ़ करते है क्योंकि आप भी जानते हैं कि वो छोटा बच्चा है। इसके अलावा हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि ये तेजी से बढ़ रहा है क्योंकि दोनों तरफ से संवाद है। टीवी में दर्शक कुछ नहीं कर सकता, उसे बस सुनना है लेकिन डिजिटल में वो अपनी राय देता है, कमेंट करता है और यही चीज इसे आकर्षक बना रही है। 

इसी कारण से पहले जो न्यूज सुनता था वो अब न्यूज देने लग गया है और वो भी यही दावा करता है कि अगर आपकी राय लोग सुन सकते हैं तो मेरी राय क्यों नहीं ? इस माध्यम की सबसे बड़ी खासियत यह है कि ये आपको ताकत देता है अपनी राय देने की! आप सोचिए कि कमेंट करना किसे अच्छा नहीं लगता है? इसलिए हमें सिर्फ इसकी निगरानी की जरूरत है। 

आज के समय में सोशल मीडिया प्लेटफार्म काफी ताकतवर हैं। उनके पास डाटा है और वही सबसे बड़ा हथियार है ! हमारे डाटा चोरी को लेकर आपकी सोच क्या है? 

आपके इस सवाल में तीन हिस्से है, पहला डाटा चोरी का, दूसरा प्लटफॉर्म की जवाबदेही का और तीसरा ये कि अब हम क्या करें? डाटा चोरी तो सब कर रहे हैं। हाल ही में एयर इंडिया तक का डाटा चोरी हुआ है। 'आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस' (एआई) का फ़ूड ही डाटा है और आने वाले समय में इसकी अहमियत बढ़ने वाली है। 

'एआई' बहुत ताकतवर हो गया है और इसे आप एक उदाहरण से समझ सकते हैं। जब आप किसी शॉपिंग वेबसाइट पर कुछ समय के लिए विजिट करते हैं और उसके बाद जब आप फेसबुक चलाते हैं तो आपको उसी का ऐड दिखाई देने लग जाता है, इसका मतलब यह है कि आप क्या पसंद कर रहे हैं, क्या देख रहे हैं, ये भी 'एआई' समझ रहा है। सरकार ने उनकी जवाबदेही तय करने की कोशिश की है और इसे एक अच्छा कदम माना जाना चाहिए। ऑस्ट्रेलिया का उदाहरण सबके सामने है कि कैसे उन्होंने इन बड़ी-बड़ी कंपनियों को झुका दिया था, लेकिन क्या आप ऐसा करने की स्थिति में है ? 
क्या आप 'फेसबुक' और 'इंस्टाग्राम' जैसा कुछ खड़ा कर पाए हैं? 'ट्विटर' के मुकाबले 'कू' को हमने खड़ा किया है, लेकिन अभी भी शुरुआती दौर में है। 

लोग अक्सर राष्ट्रवाद की बात करते हैं तो मैं कहता हूं कि क्यों न इसमें राष्ट्रवाद हो? क्यों नहीं आप उनके जैसा कुछ बनाएं और उसे गर्व से कहें कि देखो ये हमने बनाया है ! भारत से बड़े-बड़े जो आईटी एक्सपर्ट अन्य देशों में जा रहे हैं, उनको भी सोचना चाहिए कि हम अपने देश के लिए भी कुछ ऐसा बनाएं, जिस पर पूरी दुनिया को गर्व महसूस हो। 

रोहित सरदाना की आकस्मिक मौत ने हम सबको झकझोर कर रख दिया है। आपने तो उनके साथ काम किया है, कोई ऐसे याद जो आप शेयर करना चाहें? 

मैंने रोहित के साथ दो साल काम किया और किसी को जानने और समझने के लिए दो साल बहुत होते हैं। दो बार हम अपने परिवार के साथ लंच पर भी मिले थे। रोहित की पत्नी प्रमिला जी बहुत स्ट्रांग हैं और उनके बच्चे काफी अच्छे हैं। जीवन में बस कई बार ऐसा लगता है कि कुछ धोखा आपके साथ हो गया। ऋषि कपूर जी के निधन पर अमिताभ सर ने लिखा था कि 'जब छोटे चले जाएं तो दुःख होता है', बस कुछ ऐसा ही महसूस हो रहा है। ऐसा लगता है कि ये रोहित के जाने का समय नहीं था। 

रोहित के निधन के बाद भी लोगों ने काफी कुछ उनके बारे में कहा, जो कि ठीक नहीं है। कुछ लोग उनके निधन पर भी टीआरपी देख रहे थे और इसी से उनका कद पता चलता है।
इसके अलावा मैं यह भी कहूंगा कि 'आजतक' की टीम और सुप्रिय जी भी उनके लिए बहुत कुछ कर रहे हैं और इस बात के लिए उनकी तारीफ़ करनी होगी। सुप्रिय जी अपनी टीम को लेकर बहुत भावुक हैं। 

समाचार4मीडिया के साथ निशांत चतुर्वेदी की इस बातचीत का वीडियो आप यहां देख सकते हैं-

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कोरोना संक्रमण के दौरान डॉक्टर का बस यही कहना मुझे थोड़ा सुकून भरा लगा: भूपेंद्र सिंह

कोरोनावायरस (कोविड-19) के खिलाफ पूरे देश में ‘जंग’ जारी है। इस बीमारी को मात देने वाले पत्रकारों में ‘जी न्यूज’ के प्रड्यूसर भूपेंद्र सिंह भी शामिल हैं।

Last Modified:
Tuesday, 01 June, 2021
Bhupendra Singh

कोरोनावायरस (कोविड-19) के खिलाफ पूरे देश में ‘जंग’ जारी है। संकट के इस दौर में अपनी जान को जोखिम में डालते हुए तमाम पत्रकार अपनी ड्यूटी निभा रहे हैं और महामारी को लेकर रिपोर्टिंग भी कर रहे हैं। ऐसे में कोरोनावायरस की चपेट में आने से कई पत्रकारों की मौत हो चुकी है, जबकि कई लोग विभिन्न अस्पतालों में उपचाराधीन हैं। हालांकि, कुछ ऐसे भी पत्रकार हैं, जो इस महामारी को हराने में सफल रहे हैं। इन्हीं में ‘जी न्यूज’ (Zee News) के प्रड्यूसर भूपेंद्र सिंह भी शामिल हैं। समाचार4मीडिया के साथ बातचीत में भूपेंद्र सिंह ने बताया कि कोरोना से संक्रमण का दौर उनके लिए कैसा रहा और कैसे उन्होंने इस महामारी पर विजय पाई। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

आपको कैसे पता चला कि आप कोरोनावायरस से संक्रमित हैं?

21 अप्रैल की सुबह थोड़ा सा जुकाम हुआ। छींक भी आईं दो से तीन बार। मैंने सोचा कि यह ऐसे ही थोड़ी सी छींक आई होंगी। उस दिन मुझे ऑफिस जाना था। दोपहर को ऑफिस पहुंचा और शाम होते-होते मेरी नाक लगातार बहने लगी। मैंने टिशू पेपर का इस्तेमाल कर रोकने की कोशिश की लेकिन उसका कोई फायदा नहीं हुआ। जुकाम लगातार तेज होता गया। फिर मुझे लगा कि कुछ तो गड़बड़ है, जिसके बाद मैं घर आ गया। घर में मैंने सब से दूरी बना ली थी, क्योंकि मुझे कोरोना होने का शक था। दूसरे दिन यानी 22 अप्रैल को मैं सुबह आरएमएल अस्पताल पहुंच गया। वहां पर मैंने RT-PCR टेस्ट कराया और जैसे ही मैं घर वापस आया मेरी सुगंध और स्वाद दोनों जा चुके थे। मेरी पत्नी ने अगरबत्ती जलाई, स्प्रे किया लेकिन मुझे कोई खुशबू नहीं आई। फिर धूप बत्ती जलाई, लेकिन उसकी भी कोई खुशबू नहीं आई तब पक्का हो गया था कि मुझे कोरोना के लक्षण आ गए हैं।  दूसरे दिन जांच रिपोर्ट आई, जिसमें मैं पॉजिटिव था।

पता चलने पर सबसे पहले आपने क्या किया? आप सेल्फ आइसोलेट हुए या किसी डॉक्टर को दिखाया?

मोबाइल पर रिपोर्ट देखने के बाद मैंने पत्नी को बताया कि मेरी रिपोर्ट पॉजिटिव आई है। पत्नी थोड़ा घबराई। मैं भी थोड़ा सा चिंतित हुआ। फिर मैंने हॉस्पिटल में फोन किया और डॉक्टर से बात हुई, जिसमें उन्होंने बताया कि आप पॉजिटिव हैं अगर आप चाहें तो आकर अपनी रिपोर्ट की हार्ड कॉपी ले लीजिए और डॉक्टर से कंसल्ट कर लीजिए। हॉस्पिटल में मैंने डॉक्टर से कंसल्ट किया, जिसके बाद डॉक्टर ने 14 दिन की दवाइयां दीं और कहा कि आप इसे खाइए और अगर आपको कोई दिक्कत महसूस होती है तो आप यहां आ सकते हैं। डॉक्टर का बस यही कहना मुझे थोड़ा सुकून भरा लगा, क्योंकि उस समय दिल्ली के हालात तो सबको पता थे।

मैं हॉस्पिटल से सारी दवाइयां लेकर घर आया और मैंने अपने आप को एक रूम में आइसोलेट किया और रूम अंदर से लॉक कर लिया। डॉक्टर की बताई हुई दवाइयां ही मैं खाता रहा। लेकिन इस दौरान मैंने घरेलु नुस्खे भी अपनाए, योग किया और गरम नींबू पानी पीता रहा।

इलाज के दौरान आपने खाने-पीने का किस तरह से ध्यान रखा और अन्य कौन सी सावधानियां बरतीं?

इलाज के दौरान बीच में कभी-कभी स्ट्रेस भी हुआ, लेकिन पत्नी और अन्य घरवालों ने मुझे हौसला दिया और हमेशा सकारात्मक सोचने के लिए बोला। मेरी पत्नी मृदुला ने इस दौरान मेरी बहुत देखभाल की। उन्होंने फल-फ्रूट के अलावा मेरे खाने की सभी चीजें बनाईं, जिससे मेरे शरीर की इम्यूनिटी मजबूत रहे।

आइसोलेशन के दौरान आपने अपना समय व्यतीत करने के लिए क्या किया?

आइसोलेशन के दौरान मैंने भजन सुने। वेबसीरीज देखीं, फिल्में देखीं, दोस्तों से फोन पर बात की। जिनसे बहुत दिनों से बात नहीं हुई थी, उनसे भी इस दौरान फोन पर काफी बातें हुईं। इसी तरह से समय पास होता रहा।

इस दौरान परिजनों और अन्य करीबियों का व्यवहार कैसा रहा?

आइसोलेशन के दौरान मैं अपने परिवार को लेकर बहुत चिंतित था। मुझे बार-बार ये डर सता रहा था कि कहीं मेरी वजह से किसी को कुछ न हो। लेकिन ईश्वर के आशीर्वाद से सब ठीक रहा। मैंने 15 दिनों के बाद फिर से कोरोना टेस्ट कराया और रिपोर्ट नेगेटिव आई। हालांकि उसके बाद भी कमजोरी बनी रही, जो धीरे-धीरे समय के साथ कम हुई।

संक्रमण से निजात मिलने पर अब कोरोना से जूझ रहे पीड़ितों को क्या कहना चाहते हैं?

मैं इस संक्रमण से जूझ रहे लोगों से कहना चाहूंगा कि आप इससे डरिये नहीं, इस बीमारी से जितना डरेंगे ये उतना ही आपको परेशान करेगी। हौसला रखिए, खाने-पीने पर ध्यान रखिए पौष्टिक खाना खाइए, योग करिए, ब्रीदिंग एक्सरसाइज करिए, नींबू पानी और मौसमी फल का सेवन जरूर करिए, सब ठीक हो जाएगा।

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कोई भी संपादक जो जनता से सरोकार रखता हो, ऐसी खबर सुनकर परेशान हो जाएगा: ब्रजेश मिश्रा

‘भारत समाचार’ के एडिटर-इन-चीफ ब्रजेश मिश्रा ने समाचार4मीडिया से खास बातचीत की है। इस दौरान उन्होंने अपने जीवन से जुड़े कई पहलू साझा किए हैं।

Last Modified:
Monday, 31 May, 2021
Brajesh Mishra

‘भारत समाचार’ के एडिटर-इन-चीफ ब्रजेश मिश्रा ने समाचार4मीडिया से खास बातचीत की है। इस बातचीत के दौरान उन्होंने अपने जीवन से जुड़े कई पहलू हमारे साथ साझा किए, वहीं कोरोना को लेकर भी उन्होंने सरकार से कई सवाल किए हैं। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

अपने प्रारंभिक जीवन के बारे में हमें कुछ बताएं! क्या आप वाकई पत्रकार बनना चाहते थे?

मैं बीएससी ग्रेजुएट हूं। उस वक्त टेलिकम्युनिकेशन इंजीनियरिंग का दौर था और बाकी लोगों की तरह मैं भी एक टेलिकम्युनिकेशन इंजीनियर बनना चाहता था। मुझे जेके इंस्टीट्यूट ऑफ एप्लाइड फिजिक्स एंड टेक्नोलॉजी (JK INSTITUTE OF APPLIED PHYSICS AND TECHNOLOGY) में प्रवेश भी मिल गया था लेकिन एक सेमेस्टर करने के बाद अहसास हुआ कि मैं एक अच्छा इंजीनियर नहीं बन सकता हूं।

ये 1997 की बात है, उस समय ‘स्वतंत्र भारत‘ नाम से लखनऊ से अखबार प्रकाशित होता था और उस वक्त उस अखबार की बड़ी इज्जत हुआ करती थी। उस अखबार में मुझे क्राइम रिपोर्टिंग करने का मौका मिला और उस समय मुर्दाघर में मेरी ड्यूटी लगती थी। लाशों की गिनती करना, मृत्यु के कारण का पता लगाना, ये सब मेरे काम होते थे और मुझे उस समय इस काम के 1200 रुपये मिलते थे। इसके बाद मैंने इसी काम को आगे बढ़ाया और जीवन में मौके मिलते चले गए।

आपने ईटीवी के साथ काफी समय काम किया है। उस यात्रा के बारे में कुछ बताएं?

ये बात वर्ष 2002 की है और मैं उस वक्त तक लखनऊ आ गया था और एक वेबसाइट के लिए काम कर रहा था। मैं आपको बता दूं कि जब 80 रुपये एक घंटे के साइबर कैफे में लगते थे, उस वक्त मैं वेब पत्रकारिता शुरू कर चुका था। उस वक्त इंटरनेट महंगा भी था और न ही इतनी स्पीड थी कि लोग न्यूज पढ़ने के लिए वेबसाइट पर आएं। उस दौर में मैंने पहली बार ईटीवी के लिए फ्रीलॉन्स काम किया।

उस वक्त अभय आदित्य सिंह ने मेरा बड़ा साथ दिया और साल 2003 में मुझे पहली बार टीवी पर मौका मिला। मैं इंटरव्यू करता था और अगले दो साल तक मैं वही काम करता रहा। 2005 में न्यूज सेक्शन को मुझे हेड करने का मौका दिया गया। उसके बाद मैं ब्यूरो चीफ भी बना और साल 2008 तक उनके साथ काम किया। वह एक शानदार और सुनहरा वक्त था। उस वक्त तकनीक इतनी आसान नहीं थी और इंटरनेट स्पीड के नाम पर कुछ नहीं था। उस समय हम बस और टैक्सी के जरिये छोटे-छोटे टेप मंगवाते थे और कई बार तो खबर अगले दिन चलती थी।

रामोजी राव ने एक शानदार प्रयोग उस दौर में किया था, जब लोगों ने कभी उम्मीद ही नहीं की थी कि गांव की न्यूज भी टीवी पर आ सकती है। उसके बाद मुझे कुछ वर्षों तक ‘न्यूज 24’ के साथ भी काम करने का मौका मिला। मैं उनका यूपी और उत्तराखंड का प्रमुख था।

उसके बाद वापस 2010 में मुझे संपादक की पोस्ट ‘ईटीवी‘ की ओर से ऑफर हुई, जिसे मैंने स्वीकार कर लिया और साल 2016 तक वह यात्रा बहुत शानदार तरीके से आगे बढ़ी। उस समय रीजनल मीडिया में ‘ईटीवी‘ सबसे अधिक देखा जाने वाला चैनल था। उसके बाद हमने महसूस किया कि जनता को एक ऐसे चैनल की जरूरत है, जो उनकी बात करे।

उस वक्त मेरे पास हर फील्ड से जुड़े 55 लोगों की टीम थी। जब मैंने सबके साथ बैठक की तो महसूस किया कि सबकी यही राय है कि अब खुद का काम शुरू किया जाए और उस तरह से ‘भारत समाचार‘ की नींव रखी गई और वो यात्रा आज भी जारी है।

क्या आपको ऐसा लगता है कि कोरोना की दूसरी लहर की भयावहता को सरकार पढ़ और समझ नहीं पाई?

देखिए, कोरोना को लेकर हम अपनी जिम्मेदारी समझते हैं और हमने सरकार को जनवरी 2020 से ही आगाह करना शुरू कर दिया था। हम पहले दिन से ही महामारी को ट्रैक कर रहे थे और जो न्यूज आ रही थीं, वो चिंताजनक थीं।

एक ऐसा वायरस, जिसका प्रसार मनुष्य से मनुष्य तक हो रहा है तो जाहिर सी बात है कि वो पूरे विश्व में फैलेगा। हमने पिछले 15 महीने से भी अधिक समय से लगातार राज्य और केंद्र सरकार को अपने सुझाव दिए हैं और इसके अलावा देश-विदेश के डॉक्टर्स और वैज्ञानिक भी हमने अपने टीवी शो में बुलाए हैं।

जब दूसरी लहर की चर्चा हो रही थी, उसी के ठीक पहले यूरोप में हालात बिगड़ रहे थे और लंदन में कर्फ्यू लगाना पड़ा था। जर्मनी, नार्वे और पोलैंड जैसे देशों में स्थिति खराब थी। उसी दौरान हम ये महसूस करने लगे थे कि खतरा हमारी ओर बढ़ रहा है। मुझे हैरानी है कि हमारी सरकारें इसे वक्त रहते क्यों नहीं समझ पाईं? यूरोप के देशों ने अपने सबसे बड़े त्यौहार क्रिसमस को नहीं मनाया था तो क्या ये हमारे लिए चेतावनी नहीं थी?

मुझे लगता है कि चुनाव की वजह से हमने इसे नजरअंदाज किया था। इसके अलावा वैक्सीन का अति आत्मविश्वास भी एक बड़ा कारण हो सकता है। मेरा मत हमेशा से यही रहा है कि कोरोना को नेता नहीं हैंडल कर सकते हैं। इसे तो डॉक्टर्स और वैज्ञानिक ही हैंडल कर सकते हैं और उन्हें अपना काम ईमानदारी से करना चाहिए।

कोरोना विज्ञान से हारेगा, न कि विज्ञापन से, मुझे लगता है कि ये पिछले 100 साल की सबसे बड़ी राजनीतिक चूक है। अगर मेरे जैसा पत्रकार उस तबाही को देख सकता था तो क्या हमारे डॉक्टर्स नहीं देख पाए? मुझे ऐसा लगता है कि या तो उनसे चूक हुई है या जब उन्होंने सरकार को बताया तो सरकार ने उसे अनदेखा किया।

आपके रिपोर्टर इस समय यूपी के 55 जनपदों तक से रिपोर्ट कर रहे हैं। यूपी के गांवों में इस समय कोरोना की क्या स्थिति दिखाई देती है?

जब ये बुरा दौर शुरू हुआ तो उस समय हमारी टीम ने ये निर्णय किया कि हम पंचायत चुनाव के नतीजे कवर नहीं करेंगे। ये वही समय था, जब लोग ऑक्सीजन की कमी से जूझ रहे थे और देश में हजारों मौतें हो रही थीं। न पर्याप्त दवाएं थीं और न ही पर्याप्त इंजेक्शन थे। टेस्ट होना तो लगभग बंद हो गया था। ऐसे समय में जब लोगों को अस्पताल में जगह तक नहीं मिल रही थी, उस समय हमने गांवों की ओर रुख करना शुरू किया।

गांवों से ये न्यूज आ रही थीं कि दिन में बुखार है, दर्द है, सीने में जकड़न है और रात को सोने के बाद सुबह मरे हुए मिलते हैं। कोई भी ऐसा संपादक जो जनता से सरोकार रखता हो और उनकी चिंता करता हो, निश्चित रूप से ऐसी खबर सुनकर परेशान हो जाएगा। हमने 55 लोगों की टीम बनाई, जो गांवों में जाने को तैयार थी। इस वक्त हम 1900 गांवों तक पहुंच गए हैं और हालात डराने वाले हैं। अगर देखा जाए तो यूपी में 90 हजार से अधिक गांव हैं तो ऐसे में अभी बहुत सफर तय करना बाकी है।

शायद ही कोई ऐसा गांव हमे ऐसा मिला, जिसमें 50 से 60 लोगों की मौत न हुई हो। न कोई टीका लग रहा है और न ही स्वास्थ्य विभाग की कोई टीम वहां है। आज के समय में 90 फीसदी गांवों में हालात बेहद खराब है।

आईसीयू की तो आप बात ही छोड़ दीजिए। एक नार्मल पैरासिटामोल तक वहां उपलब्ध नहीं है। जानकारी के अभाव और सरकार की नाकामी के चलते आज जो रिपोर्ट हमारे पास आ रही है, वो बेहद दुःखदायी है। ‘भारत समाचार‘ पर 1900 गांवों की वास्तविक तस्वीर आप देख सकते हैं और हमारा काम सिर्फ जनता की समस्या दिखाना है। हम न तो पुलिस हैं और न ही जज, आखिर में जनता ही तय करती है कि कौन सही था और कौन गलत।

यूपी सरकार कह रही है कि उसने कोर्ट के कहने पर चुनाव करवाए हैं। ऐसे में सरकार पर आरोप लगाना कहां तक उचित है?

सरकार कोर्ट के आदेश की दलील तो दे रही है, लेकिन वो ये क्यों नहीं बताती कि पंचायत का कार्यकाल तो दिसंबर 2020 में ही खत्म हो गया था। इसका अर्थ यह हुआ कि आपको नवंबर तक पूरी प्रक्रिया से गुजरना था, लेकिन ऐसा नहीं हो पाया। उस वक्त कोरोना से देश में हालात उतने बुरे नहीं थे। अगर लोकसभा और विधानसभा के चुनाव समय पर हो रहे हैं तो पंचायत चुनाव क्यों नहीं? 56000 ग्राम पंचायतों का गठन समय से क्यों नहीं हो पाया?

इसके अलावा एक और सवाल उठता है कि सरकार ने निर्वाचन आयोग से क्या ये कहा कि कोरोना बढ़ गया है, आप चुनाव को रोकने की सिफारिश कीजिए? हमारी आयोग से बात हुई है, जिसमें उनकी ओर से ये कहा गया है कि हमें ऐसा कोई पत्र नहीं मिला है। हां, सरकार ने ये तर्क जरूर दिया था कि आरक्षण प्रक्रिया के चलते इसमें देरी हो रही है। ये वो सरकार है, जो बात-बात पर हाई कोर्ट के निर्णय के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट चली जाती है! जब अप्रैल में कोर्ट ने लॉकडाउन के लिए कहा था तो यही सरकार स्टे लेने सुप्रीम कोर्ट चली गई थी।

अगर आपको लगता था कि चुनाव नहीं हो सकते तो आप इस निर्णय के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट क्यों नहीं गए? अभी आपको याद होगा कि राम भरोसे कह दिया था हाई कोर्ट ने तो सुप्रीम कोर्ट से स्टे लेने चले गए! जब आप इतनी सी बात पर सुप्रीम कोर्ट जा सकते हैं तो जब हजारों लोगों की जान जा रही थी, तब क्यों नहीं गए? लाखों लोगों की जान गई है। लोगों ने अपने बच्चे खोए हैं। इस प्रकार के बयान से बात बनने वाली नहीं है, जवाबदेही तो तय करनी ही होगी।

आपके ऊपर ये आरोप लगाया जाता है कि आप सिर्फ सरकार को बदनाम करने के लिए कोरोना की ही बात करते हैं। क्या आप लोगों को डरा रहे हैं?

ये जो भी लोग हैं और जो भी ये कमेंट करते हैं कि मैं लोगों को डरा रहा हूं,  ऐसे लोगों को मैं बिल्कुल भी तवज्जो नहीं देता हूं। इसके पीछे एक सबसे बड़ा कारण यह है कि मैं सच की राह पर खड़ा हूं। कन्नौज से लेकर बलिया तक गंगा के दोनों छोर तक लाशें अटी पड़ी हैं, गांवों में लोग मर रहे है। अगर लाशें बहाई जा रही हैं, किनारों पर दफनाई जा रही हैं तो क्या हम सच को नहीं देखें?

आपको अंदाजा नहीं है कि इतनी बड़ी तबाही हुई है कि परिजनों के पास अपने लोगों के अंतिम संस्कार करने तक के पैसे नहीं हैं। गांवों में लोग इस पीड़ा से गुजर रहे हैं कि इलाज कराने में उनके घर और गहने तक गिरवी हो गए हैं। क्या आरोप लगाने वाले गांवों में जाकर ये सच देखेंगे?

क्या हमने कभी कल्पना की थी कि लखनऊ और वाराणसी जैसे बड़े शहरों में लोग बिना ऑक्सीजन के मर जाएंगे? क्या कभी एक बेटे को आपने देखा है, जिसने ऑक्सीजन की कमी के कारण अपने बाप को मरते देखा हो? क्या आपको पता है कि लखनऊ में श्मशान घाट का एरिया सील कर दिया गया था, ताकि जलती लाशें न दिखाई जाएं? जब आपके परिजन का अंतिम संस्कार करने के लिए आपको 3 दिन का टोकन दिया जाए और आप उसकी पीड़ा का अनुभव नहीं कर सकें तो आप ये मान लीजिए कि आपमें मानवता की कमी आ गई है।

यहां कोई पक्ष और विपक्ष नहीं है, सिर्फ सत्यता है। हम सच के साथ हैं और हम किसी भी विभाग को अपनी रिपोर्ट देने के लिए तैयार हैं। मैं तो इतना तक कह रहा हूं कि इन पूरी मौतों की न्यायिक जांच होनी चाहिए।

आरोप लगाने वाले ये भी देख लें कि सिर्फ एक-दो महीने से नहीं, जब आप कोरोना का सी नहीं जानते थे, तब से मैं कोरोना को लेकर लगातार ट्वीट कर रहा हूं। अगर इतनी तबाही के बाद भी आप लोगों की पीड़ा से नहीं जुड़ पाते हैं और मुझे ये कहते हैं कि मैं लोगों को डरा रहा हूं तो ये बेशर्म और निर्लल्ज लोग हैं और मैं ऐसे लोगों को महत्त्व नहीं देता।

कोरोना के इस दौर में आपके ऑफिस में किन प्रोटोकॉल्स को फॉलो किया जा रहा है?

आपने बहुत अच्छा सवाल किया है और मुझे लगता है कि इसका सबसे अच्छा जवाब हमारे एम्प्लॉयीज और पत्रकार बंधु ही दे सकते हैं। हमने फरवरी 2020 से ही तैयारी कर ली थी और ताईवान का मॉडल फॉलो किया।

थर्मल स्कैनर, ऑक्सीमीटर, बेहतरीन क्वालिटी के N 95 मास्क का हमने प्रयोग किया। जितना हो सके उतने कम कर्मचारियों को हमने ऑफिस में रखा और इसके अलावा दो लोगों के बीच कम से कम 4 फुट की दूरी हमने रखी।

जब लोगों को इस बीमारी की गंभीरता का अहसास भी नहीं था तब हमने सभी का आरटीपीसीआर टेस्ट करवा लिया था। दूसरी लहर में भी हमनें सभी के टेस्ट करवाए। आज भी आप ऑफिस में आएंगे तो मल्टी लेयर हेल्थ सिस्टम आपको देखने को मिलेगा। इसी का नतीजा था कि यहां सिर्फ 5 से 7 लोगों को ही कोरोना हुआ और ईश्वर की कृपा से कोई जान की हानि नहीं हुई।

हमने विदेशी मीडिया से सीखा और एक कोविड हेल्प डेस्क तैयार करवाई जो कि हर समय स्टाफ की सेवा के लिए उपलब्ध थी। अगर किसी स्टाफ को कोरोना हुआ तो हम इतना तक आपको बता सकते हैं कि सुबह और शाम को उसका ऑक्सीजन लेवल कितना था, आप अंदाजा लगा सकते हैं कि इतनी सघन निगरानी शायद ही किसी ने की हो।

क्या भविष्य में आप किसी राष्ट्रीय चैनल को लाने की सोच रहे हैं? क्या लखनऊ से दिल्ली आने की इच्छा है?

लखनऊ एक शानदार शहर है और मैं आपको निमंत्रित करता हूं कि आप आइये। एक बार आप आएंगे तो मुझे पूरी उम्मीद है कि आपका जाने का मन नहीं करेगा। ये अपनी रफ्तार का शहर है मुझे ये बहुत पसंद है। दिल्ली मुझे सहज नहीं लगता है और मेरी वहां आने की कोई इच्छा भी नहीं है।

‘भारत समाचार’ यूपी के लोगों को समर्पित है और अभी हमें बहुत लंबा सफर तय करना है। हमारे पास बहुत ही मेहनती, वफादार और कर्मठ टीम है। इसके अलावा आने वाले समय में हमारी राष्ट्रीय चैनल लाने की कोई योजना नहीं है। आखिर में बस मैं इतना कहूंगा कि रात में किसी को बुखार आता है और सुबह अगर वो मरा हुआ मिलता है तो आप डरिए, क्योंकि कभी-कभी डरना अच्छा होता है।

समाचार4मीडिया के साथ ब्रजेश मिश्रा की इस बातचीत का वीडियो आप यहां देख सकते हैं-

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आज भी ‘जी हिन्दुस्तान’ मेरे लिए लिए बच्चे जैसा है: शमशेर सिंह

‘जी हिन्दुस्तान’ के मैनेजिंग एडिटर शमशेर सिंह ने समाचार4मीडिया से खास बातचीत की और अपनी मीडिया जगत की यात्रा को खुलकर हमारे सामने रखा।

Last Modified:
Friday, 28 May, 2021
Shamshersingh548

‘जी हिन्दुस्तान’ के मैनेजिंग एडिटर शमशेर सिंह ने समाचार4मीडिया से खास बातचीत की और अपनी मीडिया जगत की यात्रा को खुलकर हमारे सामने रखा। उन्होंने एक रिपोर्टर से लेकर एडिटर तक का सफर तय किया है और मीडिया जगत में उनकी पहचान एक बेमिसाल लीडर के तौर पर की जाती है।

‘जी हिन्दुस्तान’ ने चार साल पूरे कर लिए हैं और आपके सानिध्य में ही ‘जी हिन्दुस्तान’ की नींव रखी गई थी, उस अनुभव के बारे में कुछ बताए?

देखिए, उस वक्त मैं ‘इंडिया टीवी’ में नेशनल अफेयर्स एडिटर था और उसी दौरान एक ऐसा चैनल लाने की रूपरेखा बनी जिसका स्वरुप ‘जी न्यूज’ से बिल्कुल अलग होने वाला था। उन्होंने मुझे आमंत्रित किया और मैंने भी हां कर दी। हमने ‘जी हिन्दुस्तान’ को लॉन्च किया और उसके केंद्र में राज्यों और प्रदेशों को रखा। हमने कहा कि ‘राज्यों से देश बनता है’ और यह सबको पसंद भी आया। हमारे पास एक बेहद शानदार टीम थी। हालांकि कुछ समय बाद मुझे छोड़कर जाना पड़ा लेकिन आज भी ‘जी हिन्दुस्तान’ मेरे लिए लिए बच्चे जैसा है।

आपके प्रारंभिक जीवन के बारे में कुछ बताए, क्या आप वाकई पत्रकार बनना चाहते थे?

जी नहीं, मैं पत्रकार बनने के लिए नहीं आया था। दरअसल बिहार के पूर्णिया जिले से मैं आता हूं और 12वीं की पढ़ाई वहीं से हुई। उस समय हर व्यक्ति यूपीएससी की तैयारी करने की ख्वाहिश रखता था और मेरा भी यही लक्ष्य था। अब जब 3 बार कोशिश करने के बाद भी मेरा चयन नहीं हुआ, तो सबसे बड़ी समस्या यह हुई की अब अगर आखिरी मौके में चयन नहीं हुआ तो क्या करेंगे? आप वापिस गांव जा नहीं सकते! कोई काम कर नहीं सकते! फैक्ट्री भी नहीं है कोई, जो आप वहां नौकरी कर लें, तो उसी उधेड़बुन में एक निर्णय मैंने लिया कि मुझे अब पत्रकार बनना है। मुझे ऐसा लगा कि पैसे भले की कम मिले, लेकिन इस पेशे में इज्जत है और ज्ञान भी है और उसके बाद आगे का मेरा जीवन एक पत्रकार के तौर पर शुरू हुआ।

आपने प्रिंट में काम नहीं किया और टीवी पत्रकारिता की है, ‘आजतक’ में पहली नौकरी कैसे मिली?

उस समय ‘आजतक’, ‘दूरदर्शन’, के लिए ‘आपका फैसला’ नाम से शो करता था और 1998 में चुनाव होने थे। उस वक्त तक किसी भी चैनल में गेस्ट कोऑर्डिनेशन के लिए लोग नहीं रखे जाते थे। उस समय वरिष्ठ पत्रकार सुरेंद्र प्रताप सिंह (एस.पी. सिंह) जिस हिसाब से न्यूज पढ़ते थे, वो भी मुझे बहुत अच्छा लगता था। इसलिए मेरी भी खुद की इच्छा थी कि मैं ‘आजतक’ में काम करूं। संयोग से मुझे सिर्फ 3 महीने के लिए वहां इंटर्नशिप मिल गई। गेस्ट कोऑर्डिनेशन के लिए मुझे रखा गया और मैंने खूब मेहनत की। मेरे काम से वो इतना प्रभावित हुए कि बाद में मुझे 5500 रुपए महीने की नौकरी पर रख लिया गया।

आप ‘आजतक’ में 16 साल रहे और आपने डिप्टी एडिटर तक का पद प्राप्त किया। उस यात्रा के बारे में कुछ बताएं

देखिए, मैं अपने आपको खुशनसीब मानता हूं कि मुझे बड़े काबिल और अच्छे लोगों का साथ मिला है। उस समय क़मर वहीद नक़वी जी एक ऐसे व्यक्ति थे, जिनको अगर स्क्रिप्ट अच्छी नहीं लगती थी तो उसे फाड़ कर फेंक देते थे। उन्होंने एक नियम बना दिया था कि हर व्यक्ति को हिंदी टाइपिंग करनी होगी और रोज एक पेज हिंदी टाइप करके दिखाना होगा। इसके बाद उदय शंकर जी जैसे लोगों के साथ काम करने का मौका मिला, जिन्होंने खबरों के साथ खेलना सिखाया। एक साल तक हमारे एडिटर राहुल देव भी रहे, तो मेरा यही मानना है की हम बड़े खुशकिस्मत लोग थे कि हमें इन लोगों ने सिखाया और अच्छा सिखाया। एक आत्मविश्वास वही से बनना शुरू हुआ और उसके अलावा एक और चीज सीखी, जो थी लीडरशिप पर विश्वास करना। आपको हमेशा अपने लीडर पर विश्वास करना चाहिए कि वो जो भी कह रहा है, सही कह रहा है।

शिवसेना ने जब कोटला का पिच खोद दिया था, तो सिर्फ एक मैं ही ऐसा रिपोर्टर था, जिसने वो कवर किया था। इसके अलावा समता पार्टी और जया, जेटली को लेकर जो घटनाक्रम हुआ उसे भी रात को डेढ़ बजे मैंने कवर किया था। लगभग पूरी रात हम उस स्टोरी में ही लगे रहे थे। उस वक्त हम कुछ लोग लोकल दिल्ली की न्यूज करते थे। छोटा सा पीटीसी करता था तो भी मेरी इच्छा होती थी कि बस किसी तरह से थोड़ी देर के लिए ही सही स्क्रीन पर दिखाई दे जाउं और आप ये मान लीजिए की वही से यात्रा शुरू हुई।

आपको मैं एक और किस्सा बताता हूं, दरअसल जब भी कोई अच्छा काम करता था, तो ‘आजतक’ में समोसे और जलेबी की पार्टी होती थी। मैनें 2 बार जब ये नाइट स्टोरी की तो मेरी तारीफ में मेरे एडिटर ने पार्टी दी और हिसाब से दो बार ऑफिस को जलेबी और समोसे की पार्टी मिली। उसके बाद मैंनें कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा और बड़े इंटरनेशनल इवेंट वहां रहते हुए कवर किए।

आपने ‘रिपब्लिक भारत’ को लीड किया और काफी कम समय में उस चैनल ने बुलंदियों को हासिल किया। आप वहां तक कैसे पहुंचे?

देखिए, मैं हमेशा अपने दोस्तों से कहा करता था कि अगर मैं किसी चैनल का हेड बना, तो रिटायर होने में मजा है। मेरी प्रोफाइल कभी एडिटर की नहीं रही थी और मेरी इच्छा था कि मैं एडिटर बनूं। जब अरनब गोस्वामी का चैनल लॉन्च होने की बात हो रही थी, तो बड़े-बड़े एडिटर भी उनके संपर्क में थे और एक बार मैंने भी उन्हें मैसेज भेजा कि मैं आपके साथ काम करने का इच्छुक हूं और उसके बाद ढाई घंटे तक वीडियो कॉन्फ्रेसिंग पर हमारी बात हुई।

मैंने उनसे कहा कि मेरे अंदर भूख है और मुझे एडिटर बनना है। एक दिन अरनब ने मुझसे पूछा कि अगर मुझे आज रात घोषणा करनी है कि मैं हिंदी चैनल ला रहा हूं, तो मैं क्या कहू? मैंनें उनसे कहा कि बस इतना कह दीजिए कि ‘जल्द ही’ और उन्होंने ऐसा ही किया। मैं उन्हें पसंद आया और इस तरह मेरी उनके साथ ये यात्रा शुरू हुई।

मैं आपको सच बताऊं, तो वो मेरे लिए इतनी बड़ी जिम्मेदारी थी कि मैंने अरनब से भी कह दिया था कि जिस दिन ये ‘रिपब्लिक’ नंबर- 1 हो जाएगा, मैं उसके बाद रिटायर कर जाऊंगा। सिर्फ इस सपने को पूरा करने के लिए मैंने दो साल में एक भी छुट्टी नहीं ली थी। मैनें अपने पत्नी बच्चों तक को घर में कह दिया था कि बस इतना समझ लीजिए की मैं जंग के मैदान में हूं। लेकिन यहां एक बात कहना चाहूंगा कि मुझसे अधिक जूनून अरनब में था। कई बार वो मेरा नाम लेकर कहते थे कि लगता है तुम थक गए? मैं कहता था, ‘नहीं बॉस मैं नहीं थका’।

मैं आपको एक बात और बताना चाहूंगा कि अगर मेरे अपने पूरे जीवन में किसी को लगातार 36 घंटे काम करते देखा है, तो वो सिर्फ अरनब को देखा है।

इसके बाद मुझे वहां 2 साल हो गए थे और मुझे अपना प्रोफाइल भी बदलना था और इतना आसान नहीं था अरनब से कहना कि बॉस मैं अब वापस जा रहा हूं। लेकिन ‘जी हिन्दुस्तान’ भी मेरे बच्चे की तरह ही था और जब मुझे कहा गया तो एक बार फिर मैनें ‘जी हिन्दुस्तान’ की कमान संभाल ली। इसके अलावा मैं ऑफिस में बैठने वाला और अपनी टीम को लेकर चलने वाला एडिटर मैं नहीं हूं। मैं न्यूज फ्लोर पर रहता हूं और मेरा सिर्फ एक ही सिद्धांत है कि सबकी हिस्सेदारी तय हो। अगर कुछ अच्छा हो रहा है, तो वो भी आपकी कामयाबी है और अगर कुछ गलत टीवी पर चला गया तो जवाबदेही भी आपकी ही होगी।

आपको एक्सक्लूसिव स्टोरी का मास्टर माना जाता है और दूसरा आप अपने सहयोगियों से अच्छा काम करवाते हैं, ये खूबी क्या आपने किसी से सीखी है या आपके अंदर पहले से थी?

देखिए, दोनों ही बातें आप मान सकते हैं। दरअसल ये तरीका उदय शंकर जी का था। उन्होंने हमें न्यूज के साथ खेलना सिखाया था। कई बार तो ऐसा होता था कि हमारी स्टोरी को वो सहमति नहीं देते थे और कहते थे कि इसे वापस करके लाओ। फिर हम वापस उस स्टोरी को करते थे और उसके बाद वो हमारी तारीफ भी करते थे। वे सही मायनों में एक अच्छे टीम लीडर थे। मैं अपनी टीम के लोगों से वो काम करवा लेता हूं, जो उन्हें खुद भी नहीं पता होता कि उनके अंदर वो काम करने की काबिलियत थी। दरअसल ये चीज आप कह सकते है कि मैंनें अपने अनुभव से सीखा है।

कोरोना महामारी को लेकर कई चीजें बदली हैं, तो आप अपने संस्थान में किन प्रोटोकॉल्स का पालन कर रहे है?

देखिए, समय तो वाकई कठिन है और ऐसे माहौल में भी मैं ऑफिस आता हूं। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण यह है कि अगर टीम लीडर ही नहीं आएगा तो कैसे काम चलेगा। मेरा मानना है कि दिमागी तौर से मजबूत रहना आज के समय में बहुत जरूरी है। अगर मैं ऑफिस नहीं आऊंगा तो कल को मेरे 10 लोग बीमार हो जाएंगे। हम इस चीज को भी स्वीकार करते हैं कि कई ऐसे लोग हैं जिनके घर में कुछ न कुछ घटना इस समय में हुई है। ऐसे सभी लोगों की लिस्ट मेरे पास है और रोज सुबह आकर मैं वो लिस्ट देखता हूं। मैं व्यक्तिगत तौर पर न सिर्फ उनकी मदद कर रहा हूं बल्कि निगरानी भी कर रहा हूं और यही कारण है कि बाकी संस्थान के मुकाबले हमारे यहां इसका कम असर हुआ है।

भविष्य में आप टीवी और डिजिटल की संभावना को कैसे देखते है और फेक न्यूज को लेकर आपकी टीम कैसे काम करती है?

अगर ईमानदारी से कहे तो आने वाला समय तो डिजिटल का ही है। मेरे पास भी अगर कोई एंकर आता है और कहता है कि टीवी में काम करना है तो मैं उसे सिर्फ एक बात कहता हूं कि डिजिटल में शिफ्ट हो जाओ क्योंकि आने वाला समय डिजिटल का ही है। आने वाले दो से तीन साल में मुझे लगता है कि डिजिटल काफी तरक्की करेगा। अगर फेक न्यूज की बात करें, तो यह एक बड़ी महीन रेखा है और इसको लेकर सबको सावधान रहने की जरूरत है। हमारी टीम इसको लेकर बहुत सावधान रहती है और डिजिटल को लेकर सबसे बड़ी चुनौती अगर कोई आने वाली है, तो वो फेक न्यूज है।

आपने अपनी ट्विटर बायो में लिखा है कि आपकी अंग्रेजी कमजोर है और स्वभाव से जिद्दी है। वर्तमान समय में तो इसे कमजोरी कहा जाएगा?

मैंने कभी इंग्लिश स्कूल से पढ़ाई नहीं की और इंग्लिश तो मेरी हमेशा से ही कमजोर रही है। हालांकि अब थोड़ा सा मैं जरूर बोल लेता हूं। मुझे लगता है कि लोगों में जो हीन भावना है कि अगर हमें इंग्लिश नहीं आती तो हम वहां खड़े नहीं हो पाएंगे या उससे बात नहीं कर पाएंगे। ये मैंने सिर्फ उन बच्चों के लिए लिखा है जो ये सोचते है की मेरी इंग्लिश कमजोर हुई, तो मैं आगे नहीं बढ़ सकता हूं। इंग्लिश कमजोर होना कोई बुरी बात नहीं है और इसका उदाहरण मैं खुद हूं। एयरपोर्ट पर या फाइव स्टार होटल में सब अच्छी इंग्लिश बोलते है, तो इससे मेरा प्रोफाइल कमजोर थोड़े होता है? आप मुझे देखिए की मेरी इंग्लिश इतनी कमजोर है, लेकिन मेरा प्रोफाइल तो अच्छा है।

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मैंने इस पूरे वाकये के दौरान कई चेहरों से नकाब हटते देखे हैं: अशोक श्रीवास्तव

‘डीडी न्यूज’ (DD News) में सीनियर कंसल्टिंग एडिटर अशोक श्रीवास्तव ने समाचार4मीडिया के साथ बातचीत में अपने जीवन से जुड़ी कई बातें साझा की हैं।

Last Modified:
Monday, 24 May, 2021
Ashok Shrivastav

‘डीडी न्यूज’ (DD News) में सीनियर कंसल्टिंग एडिटर अशोक श्रीवास्तव ने समाचार4मीडिया के साथ बातचीत में अपने जीवन से जुड़ी कई बातें साझा की हैं।  उन्होंने मीडिया में अपने सफर पर तो चर्चा की ही, इसके अलावा अपनी किताब और कोरोना काल में ‘लाशों पर राजनीति’ करने वाले पत्रकारों को भी आड़े हाथ लिया है। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

अपने प्रारंभिक जीवन के बारे में कुछ बताइए।

मेरे पिताजी मीडिया में ही थे। एक बार की बात है कि मैं मूवी देखने गया हुआ था। सिनेमाघर भरा हुआ था तो टिकट मिलने की उम्मीद कम ही थी लेकिन मैंने उस दिन अपने पिताजी का कार्ड मैनेजर को दिखाया और इसके बाद हम दोस्तों ने बॉक्स में बैठकर मूवी देखी।

उस दिन मुझे पहली बार ऐसा लगा कि मीडिया के लोगों में ताकत होती है। इसके अलावा एक चीज और हुई। दरअसल, मैंने अपनी कॉलोनी में एक न्यूज पेपर निकाला, जिसमें रोजमर्रा से जुड़ी समस्या के बारे में हम बात करते थे। चूंकि आइडिया मेरा था, इसलिए संपादक भी मैं ही बना। उसे मेरे पिताजी ने देखा और कहा कि तुम अच्छा लिखते हो। उन्होंने मेरी सराहना भी की। वो एक शुरुआती समय था जीवन का और शायद उसी प्रेरणा से मैं इस पेशे में आया।

इसके अलावा एक और बात है जो मैं आपसे साझा करना चाहूंगा। दरअसल, मैं स्पोर्ट्स में रुचि रखता था लेकिन दुर्भाग्य से एक हादसे में मेरे पैर में ऐसी चोट लगी कि मेरा फिर उस पेशे में जाना संभव नहीं था। यही कारण था कि फिर मैंने पत्रकारिता की दिशा में कदम बढ़ा दिए। कई बार मुझे लगता था की मैं एक्टर बन जाऊं, लेकिन मुझे अपने पैरों पर जल्द खड़ा होना था, इसलिए वो आइडिया भी मैंने ड्रॉप कर दिया था।

मैं इसके बाद बीएचयू पढ़ने गया लेकिन वहां हड़ताल चल रही थी। हालांकि इस वक्त तक मैंने लिखना शुरू कर दिया था और नवभारत टाइम्स में मेरे लेख आते थे। जब मैं वापस बीएचयू आया तो मेरी मुलाकात जनसत्ता के तत्कालीन ब्यूरो चीफ आलोक तोमर जी से हुई।

उन्होंने मुझे कहा कि यदि तुम्हें पत्रकार बनना है तो पढ़ने से अधिक प्रैक्टिस पर ध्यान दो और खूब अभ्यास करो। मैंने उनकी बात मानी और मुझे लगता है कि वो मेरे गुरु साबित हुए और मैंने उनसे बहुत कुछ सीखा।

आपने डीडी न्यूज में आने से पहले नलिनी सिंह के साथ ‘आंखों देखी’ में काम किया है। वो आपको कैसे मिला?

उस वक्त मैं और अरुण शौरी किसी एक मुद्दे पर डिस्कस करते थे और उसे रिकॉर्ड करते थे। इसके बाद मैं उसे हिंदी में लिखता था और इस तरह से वह अनुवाद नहीं दिखाई देता था। उस वक्त तक मुझे ये भान  नहीं था की नलिनी जी उनकी बहन हैं। उस समय देश में पहली बार एग्जिट पोल होने जा रहा था।

योगेंद्र यादव जी को भी नलिनी जी ने देश के सामने चुनावी विश्लेषक के तौर पर उसी समय पेश किया था। चूंकि वो कार्यक्रम लाइव जाना था और नलिनी जी की हिंदी उतनी अच्छी नहीं थी। तब अरुण जी के कहने पर मैं नलिनी जी से मिलने गया। मैंने उनसे कहा कि आपकी हिंदी तो बढ़िया है तो उन्होंने कहा कि वो ठीक है, लेकिन मैं अपनी हिंदी में लोकोक्ति, मुहावरे और अलंकार इन सबका अच्छा प्रयोग करना चाहती हूं। मैं पहली बार लाइव प्रोग्राम में जा रही हूं तो मुझे उस स्तर की हिंदी का प्रयोग करना है। इसके बाद हमारी इस बात पर सहमति बन गई कि मैं उन्हें वाक्य रचना में व्याकरण का प्रयोग करना सिखाऊंगा।

मैं आज नलिनी जी की तारीफ करना चाहूंगा कि वो रात को दो बजे तक भी बैठी रहतीं और सीखतीं। वो अक्सर चीजों के नोट्स बनातीं और उन्हें अमल में लाने की पूरी कोशिश करती थीं। वो शो बड़ा अच्छा हुआ और उन्होंने मुझे इसका पेमेंट भी दिया। इसके बाद उन्होंने मुझे कहा कि अशोक तुम्हारी हिंदी अच्छी है और तुम टीवी में अच्छा काम कर सकते हो और मेरी टीम को जॉइन कर लो। इसके बाद मुझे ‘आंखों देखी‘ मिला और उसके बाद हमारी टीम ने उस कार्यक्रम को बुलंदियों तक पहुंचाया।

‘आंखों देखी‘ के बाद आपको ‘डीडी न्यूज‘ में कैसे नौकरी मिली?

जब मैंने नलिनी जी के साथ काम शुरू किया था तो वादा किया था कि ‘आंखों देखी‘ को बहुत आगे लेकर जाना है। कई बार ऐसा होता था कि टीआरपी में हम ‘आजतक‘ को भी पीछे छोड़ देते थे। उस वक्त मुझे ‘आजतक‘ से भी ऑफर था और लोग मुझे जानने लगे थे कि मैं ‘आंखों देखी‘ बना रहा हूं। जैसा कि मैंने नलिनी जी को वादा किया था कि लगभग तीन साल तक मैंने उनके साथ काम किया। इसके बाद मुझे लगा कि आगे बढ़ना बेहतर है। उस समय भारत की एक बड़ी कंपनी के एमडी ने मुझसे वादा किया कि वो जल्द अपना चैनल लाएंगे और मुझसे अपनी टीम बनाने के लिए कह दिया गया।

उस वक्त तक सब बेहतर था, लेकिन उसी कंपनी के परिवार के लोगों के बीच मतभेद पैदा हो गए और वह चैनल नहीं आ पाया। इसके बाद मैंने खुद का प्रॉडक्शन हाउस शुरू किया लेकिन वो सारा पैसा डूब गया। मुझे ऐसा लगता था कि मैंने काफी काम किया है और वो अनुभव मुझे फायदा देगा, लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा कुछ नहीं हुआ। मैंने अपनी सारी पूंजी लगा दी थी और मेरे पास गाड़ी ठीक करवाने तक के पैसे नहीं थे। मैंने अपने साथियों तक के साथ खाना शेयर किया हुआ है।

उसके बाद मैंने एक एंकर का विज्ञापन देखा और उस कंपनी ने जिसने विज्ञापन दिया था, मुझे पहले राउंड के लिए चुन लिया। उसके बाद मुझसे कहा गया कि अगला कॉल आपको चैनल की ओर से आएगा। उसके बाद जब कॉल आया तो मुझे पता चला कि वह कॉल दूरदर्शन से थी।

कोरोना काल में आपने ‘नमस्ते डॉक्टर‘ के नाम से एक मुहिम शुरू की है, उसके बारे में कुछ बताइए।

मेरा मानना है कि सब कुछ ईश्वर की कृपा से होता है। दरअसल कोरोना के इस कठिन समय में मैंने अपने डिबेट शो ‘दो टूक‘ को इस बार भी स्थगित कर दिया है। ऐसा हमने पिछले साल भी किया था और ऐसा करने से मेरे ऊपर काम का दबाब थोड़ा कम हुआ।  

मुझे इस समय ये अहसास हुआ कि लोगों को डॉक्टर्स की सलाह की जरूरत है। दरअसल, मेरे माता और पिता दोनों को कोरोना हो गया था और मैं उन्हें लेकर पास के नर्सिंग होम में लेकर गया। मुझे ये कहा गया कि आप पहले इनकी कोरोना रिपोर्ट लेकर आइये, फिर हम इन्हें भर्ती कर सकते हैं। मुझे उस समय काफी तकलीफ हुई कि दो दिन भी अगर रिपोर्ट आने में लगते हैं तो दो दिन तक इनकी हालत बिगड़ सकती है।

ईश्वर की कृपा से मैं कुछ अच्छे चिकित्सकों के संपर्क में था तो मुझे सही जानकारी मिली और मेरे पापा जल्द स्वस्थ भी हुए लेकिन इस वाकये ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया। एक बार हमने उन्हें अस्पताल में भर्ती करने की भी सोची लेकिन माहौल ऐसा था कि हमें ऐसा लगने लगा कि अगर ये वहां गए तो जीवित नहीं आ पाएंगे।

उस वक्त मेरे दिमाग में ये ख्याल आया कि ऐसे कितने लोग हैं, जिनको अगर सही समय पर डॉक्टर की सलाह मिल जाए तो उनके लिए कितना सही रहेगा। इसी कड़ी में कुछ मित्रों के साथ चर्चा हुई और ‘नमस्ते डॉक्टर‘ की रूपरेखा तैयार हुई।

वर्तमान में अमेरिका से डॉक्टर बैठ रहे हैं और रोजाना 50 से 60 लोग इससे जुड़ रहे हैं। ये अभियान अब गांव में भी जा रहा है और मुझे ये देखकर काफी ख़ुशी हो रही है। जब चीजें ठीक होंगी तो हम इस सेवा को अगले लेवल पर लेकर जाएंगे।

आप कश्मीर को लेकर काफी मुखर रहे हैं। अब जबकि वहां से अनुच्छेद 370 हट गया है, अब आप कश्मीर में क्या बदलाव देख रहे हैं?

मुझे ऐसा लगता है कि अब जम्मू कश्मीर में विकास के कार्य अच्छे से हो रहे हैं। अनुच्छेद 370 हटने के एक साल बाद जब मैं वहां शोपियां जैसे इलाके में गया और मैंने देखा कि ऐसे-ऐसे गांव हैं, जिनमें पहली बार बिजली आ रही है, सड़क बन रही है।

करीब 15 साल पहले मैं कश्मीर के एक गांव में था और मैंने देखा कि महिलाएं बड़ा गंदा पानी भर रही थीं और जब मुझे पता चला कि ये पानी पीने के लिए इस्तेमाल होने वाला है तो मुझे बड़ा दुःख हुआ। पहले एक नेक्सस था जो जमीन पर पैसा पहुंचने नहीं देता था लेकिन आज एक ऐसा समय है, जब 15 साल पुरानी योजनाएं जमीन पर उत्तर रही हैं।

एक समय था जब भारत का झंडा लेकर निकलना बड़ा मुश्किल माना जाता था लेकिन आज वो समय बदल गया है। बाकी अगर देखा जाए तो लोगों के मन में भी कई आशंकाए हैं, जिन्हे खत्म होने में समय लगने वाला है।

आपने मोदी जी का इंटरव्यू किया और उस पर काफी विवाद भी हुए। बाद में आपने उन पर एक किताब भी लिखी। उस पूरे वाकये के बारे में बताएं।

मेरा ये मानना है कि दूरदर्शन की भूमिका बहुत बड़ी होनी चाहिए लेकिन जब सरकार बदलती है और मंत्री आते हैं तो उनकी भूमिका बढ़ जाती है। हालांकि अम्बिका सोनी और सुषमा स्वराज जैसे लोग थें जिन्होंने कभी चीजों को प्रभावित करने की कोशिश नहीं की।

आपको यह जानकार हैरानी होगी कि दस साल तक पीएम मोदी को डीडी न्यूज पर दिखाया नहीं जाता था। मैं कई बार गुजरात से रिपोर्टिंग करता था तो वो पूरा नहीं दिखाया जाता था या चीजें बदल जाती थीं। मुझे ऐसा लगा कि शायद कहीं न कहीं से निर्देश है कि उन्हें नहीं दिखाया जाए। चुनाव से पहले मैंने इंटरव्यू का समय मांगा और मुझे वो मिल गया। इससे पहले भी मैं मोदीजी से बातचीत कर चुका था जब वो गुजरात में बीजेपी का काम देख रहे थे।

मैंने अपनी टीम के साथ योजना बनाई और उनका इंटरव्यू किया। मुझे लगा कि रात तक इंटरव्यू चल जाएगा लेकिन चला नहीं! और कुछ दिनों बाद मुझे पता चला कि वो इंटरव्यू नहीं जाएगा। इससे मुझे बड़ा धक्का लगा और मेरे स्वाभिमान को भी चोट पहुंची। जब ये बात लोगों तक पहुंची तो लोगों ने सवाल उठाने शुरू कर दिए। जब सरकार चारों ओर से घिर गई तब जाकर वो पब्लिश हुआ था, लेकिन उसमें काटछांट की गई।

इसके बाद कहीं से ‘टाइम्स ऑफ इंडिया‘ में ये खबर आई कि मोदी जी ने उस इंटरव्यू में प्रियंका को अपनी बेटी के जैसा कहा है और डीडी ने इंटरव्यू में वो हिस्सा काट दिया। इसके बाद प्रियंका गांधी से जब सवाल किए गए तो उन्होंने कहा कि मोदी जी मेरे पिता कभी नहीं हो सकते। दिल्ली में भी कांग्रेस के नेताओं ने प्रेस वार्ता में ऐसी बातें कहीं कि जैसे मोदी जी किसी के पिता बनने के लायक नहीं हैं।

दरअसल, पीएम मोदी ने ये कहा था कि सोनिया गांधी की बेटी होने का वो फर्ज निभा रही हैं और चुनाव प्रचार कर रही हैं।  उन्होंने ये नहीं कहा था कि वो मेरी बेटी के जैसे हैं। लेकिन इसके बाद चीजें बदलीं और ‘डीडी न्यूज‘ में तीन महीने के लिए मेरा कार्य बाधित हुआ। इसके बाद सरकार बदली और मैंने ये चीज समझी कि इस देश में एक ऐसा वर्ग है जो पीएम मोदी से नफरत करता है।

मैंने उस पूरे वाकये के दौरान कई चेहरों से नकाब हटते देखे हैं। मेरा ऐसा मानना है कि आप किसी की आलोचना कीजिए लेकिन किसी से नफरत मत कीजिए। मैंने अपने सामने ऐसे कई लोग देखे हैं, जिनको सरकार रातों रात नौकरी से निकाल देती है। हर सरकार मीडिया को काबू करने की कोशिश करती है। विपक्ष मोदी के ऊपर फासिस्ट होने का आरोप लगाता है लेकिन जब उन्हीं का इंटरव्यू चलने नहीं दिया गया तो वो कौनसा लोकतंत्र था? उसी दौर में मुझे लगा कि किताब के रूप में ये कहानी लोगों तक जानी चाहिए।

इसके बाद मुझे किताब को पब्लिश करवाने में भी बड़ी दिक्क्त आई। बड़े प्रकाशकों ने मुझसे कहा कि माहौल मोदी के खिलाफ है और आपकी किताब प्रो मोदी दिखाई दे रही है। मैंने उनसे कहा कि मेरी किताब न प्रो मोदी है न एंटी मोदी है। ये बस सच है, जो मैंने भोगा है। इसके बाद आखिरकार मुझे प्रकाशक मिले और मेरी किताब जारी हुई।

क्या आपातकाल शब्द को छोटा बनाया जा रहा है? कुछ पत्रकारों का कहना है कि देश में अब लिखने की आजादी नहीं है?

देखिए, आप उस वक्त पैदा भी नहीं हुए थे और मैं छोटा था। मेरे मन में आज भी उस समय की स्मृतियां अंकित हैं। मेरे पिता को मीसा एक्ट में गिरफ्तार करने की तैयारी थी। मेरे पिताजी को घर से फरार होना पड़ा था क्योंकि पुलिस उनके पीछे पड़ी थी। इस आपातकाल के दौरान ही मैंने अपनी बहन को खो दिया। आज बड़ी आसानी से कह देते हैं आप कि आपातकाल है?

मैंने तो सिर्फ मोदी का इंटरव्यू किया था और मैं बस इतना चाहता था कि वो प्रसारित हो जाए उसके बाद भी मुझे क्यों डीडी से शंट किया गया? आप वीडियो बना रहे हैं, पीएम को गाली दे रहे हैं। इतने में तो आपातकाल में आपके साथ वो होता कि आपकी आवाज नहीं निकल सकती थी। इंदिरा जी के लिए एक शब्द भी आप लिख दें तो पुलिस आपको उठाकर बंद कर देती थी। आज आप पीएम को गाली दे रहे हैं और कह रहे है कि देश में इमरजेंसी है तो मेरा मत है कि इससे बड़ा ढोंग और पाखंड कोई नहीं हो सकता है।

कुछ पत्रकार लाशों पर राजनीति करने की कोशिश कर रहे हैं। इस कठिन समय में इस संवेदनहीनता को आप कैसे देख रहे हैं?

जब कोरोना की वजह से यूरोप और बाकी देशों में मौत हो रही थीं तो किस मीडिया ने वो लाशें दिखाईं? जब अमेरिका में वर्ल्ड ट्रेड सेंटर को उड़ा दिया गया तो किस मीडिया ने लाशें दिखाईं? मुझे लगता है कि लाशें दिखाना और जलती चिताएं दिखाना, ये सब नहीं होना चाहिए। आप सरकार से सवाल करिए लेकिन कम से कम देश को बदनाम मत कीजिए।

जब मेरे पिताजी बीमार हुए तो मुझसे डॉक्टर ने कहा कि आप कोशिश करें कि आपके पिताजी न्यूज न देखें। अगर वो इतना निगेटिव देखेंगे तो आधी लड़ाई हम वहीं हार जाएंगे। सवाल केंद्र सरकार पर अगर उठ रहे हैं तो सवाल राज्य सरकार पर भी उठाने चाहिए। पूरा सिस्टम फेल हुआ है और उस सिस्टम का मैं और आप भी हिस्सा हैं। अगर मरीज को समय से इलाज नहीं मिल रहा है तो इसका जिम्मेदार कौन है,ये देखना होगा। जलती चिताओं के पास बैठकर वीडियो बनाने वालों ने कभी ये जानने की कोशिश की है कि ये अचानक से इतनी ऑक्सीजन की किल्ल्त कैसे हुई? इतनी कालाबाजारी कौन कर रहा है?

दिल्ली के सीएम केजरीवाल ने पिछले एक साल में एक भी वेंटिलेटर नहीं खरीदा और ये आरटीआई से खुलासा हुआ है तो दिल्ली के अस्पताल में अगर किसी मरीज को अच्छा इलाज नहीं मिल रहा है तो क्या इसके लिए भी पीएम मोदी जिम्मेदार हैं? क्या आप उनसे सवाल करेंगे? क्या वो इस सिस्टम का हिस्सा नहीं हैं? सवाल कीजिए लेकिन सबसे कीजिए, जिसमें पंजाब और झारखंड भी शामिल हैं,लेकिन आप ऐसा नहीं करते और वो इसलिए नहीं करते क्यूंकि आपको सिर्फ अपना एजेंडा चलाना है।

जो लोग ये कहते हैं कि सरकार से सवाल होने चाहिए, वही लोग ममता दीदी से सवाल क्यों नहीं करते जब चुनाव परिणाम के बाद हिंसा होती है और महिलाओ के साथ बलात्कार होते हैं। दरअसल, ये सिर्फ इनका पाखंड है और इनका देश से कोई लेना देना नहीं है।

समाचार4मीडिया के साथ अशोक श्रीवास्तव की इस बातचीत का वीडियो आप यहां देख सकते हैं।

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हर चीज को देखने का लोगों का अपना नजरिया होता है: ब्रजेश कुमार सिंह

‘न्यूज18’ (News18) ग्रुप के मैनेजिंग एडिटर ब्रजेश कुमार सिंह ने समाचार4मीडिया के साथ बातचीत में अपने जीवन से जुड़ी कई बातें साझा की हैं।

Last Modified:
Wednesday, 19 May, 2021
Brajesh Kumar

‘न्यूज18’ (News18) ग्रुप के मैनेजिंग एडिटर ब्रजेश कुमार सिंह ने समाचार4मीडिया के साथ बातचीत में अपने जीवन से जुड़ी कई बातें साझा की हैं। इसके अलावा उन्होंने कोरोना के दौर में मीडिया की क्या भूमिका हो? इस पर भी हमारे साथ खुलकर बात की है। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

आपको मीडिया जगत में 25 साल से भी अधिक अनुभव है। हमारे दर्शकों को अपने प्रारंभिक जीवन के बारे में कुछ बताएं।

बिहार के गोपालगंज जिले में एक छोटे से गांव में मेरा जन्म हुआ था। मैंने अपनी शुरुआती पढ़ाई वहीं से पूरी की है। उसके बाद मैं पटना आया और वहीं से मैंने 12वीं की पढ़ाई विज्ञान विषय से की। यह 1992 की बात है और उस समय बिहार का शिक्षा में बुरा हाल था। इसके बाद मैंने काशी हिंदू विश्वविद्यालय का रुख किया और मैं वाराणसी आ गया। इतिहास और राजनीतिक विज्ञान में मैंने आगे की पढ़ाई की। मेरा सपना यूपीएससी करने का था, लेकिन दिल में ये भी ख्याल आता था कि अगर चार मौके मुझे मिले और मेरा सलेक्शन नहीं हुआ तो उसके बाद मेरा क्या होगा।

हम मिडिल क्लास परिवार से थे तो यही सोच दिमाग में आती थी। इसलिए मैंने आईआईएमसी से पत्रकारिता का कोर्स करने का निर्णय ले लिया। मैंने पहला सेमेस्टर टॉप भी किया था। अप्रैल 1996 में मैंने आईआईएमसी में अपनी पढ़ाई पूरी कर ली।

आईआईएमसी से बाहर आने के बाद आपने नौकरी की शुरुआत किस संस्थान से की?

देखिए, वहां से निकलने के बाद सबसे पहले इंटर्नशिप होती है और आमतौर पर इंसान वहीं जाता है, जहां उसे लगता है कि वह कुछ सीख पाएगा और करियर में भी संभावना बनेगी। तो मैंने भी उस समय एक चैनल के साथ इंटर्नशिप की। हम पांच लोग थे, लेकिन वहां मुझे पहले ही दिन कुछ अच्छा अनुभव नहीं हुआ। वहां, अभद्र भाषा का भी इस्तेमाल किया जाता था तो मैंने सोचा कि यहां क्यों रुका जाए?  इसके बाद मैं वहां से निकल गया और उसके बाद मैंने ‘आजतक’ में इंटर्नशिप शुरू कर दी। ‘आजतक’ में इस समय जो न्यूज डायरेक्टर हैं, वह उस समय वहां हमारे सीनियर थे।

इसके बाद मेरी कोशिश थी कि वहीं काम किया जाए, लेकिन चीजें सीमित थीं तो इसके बाद मुझे सलाह दी गई कि मैं किसी अखबार में काम करके अपने न्यूज सेंस को और अच्छा करूं। इसी को ध्यान में रखते हुए मैंने ‘अमर उजाला’ ग्रुप के साथ काम करने का निर्णय लिया।

उस वक्त ‘अमर उजाला’ ग्रुप ने  ‘अमर उजाला कारोबार’ के नाम से एक अखबार शुरू किया था और उसी में मैं काम करने लगा। मुझे बाजार की कोई अधिक समझ थी नहीं, लेकिन फिर भी उस विधा पर मैंने अपना नियंत्रण बनाया और धीरे-धीरे अपने आप उस क्षेत्र की भी समझ हासिल कर ली। इसके बाद साल 1998 में मैंने प्रिंट की दुनिया से टीवी की दुनिया में कदम रखा। मेरी पहली शुरुआत ‘जी मीडिया‘ के साथ थी, जो उस समय 24 घंटे का चैनल लाने की प्लानिंग कर चुके थे।

इसके बाद एक बार फिर साल 2001 में मैंने ‘आजतक‘ का रुख किया। मैंने काफी समय गुजरात में भी बिताया है और साल 2002 में मैंने ‘स्टार न्यूज‘ को जॉइन किया जो कि आज ‘एबीपी न्यूज‘ के नाम से जाना जाता है। ‘स्टार न्यूज‘ के साथ मेरी यात्रा बहुत लंबी और अच्छी थी। लगभग 14 साल तक मैंने उस संस्थान के साथ काम किया और जून 2017 में वहां से अलग हुआ। उसके बाद ‘जी‘ ग्रुप के साथ मेरी तीसरी यात्रा शुरू हुई, जो कि मार्च 2019 तक जारी रही। इसके बाद मैंने ‘न्यूज18‘ को जॉइन किया और अभी इसी के साथ जुड़ा हुआ हूं।

कोरोना के इस समय में मीडिया में काफी बदलाव हुआ है और काम करने के तरीके बदल गए हैं। अपने संस्थान में आपने क्या क्या चीजें बदली हैं, उसके बारे में कुछ बताइए।

हमारे ग्रुप का ये मानना है कि जीवन सबसे अहम है और बाकी चीजें बाद में हैं। कोरोना को लेकर जितने भी प्रोटोकॉल थे, उन सबका हमने पालन किया है। जहां तक डिजिटल का सवाल है तो उसमें हमें कोई बड़ी तकलीफ नहीं हुई।

डिजिटल में आप घर से भी अच्छा और बढ़िया काम कर सकते हैं। हमने तो यह भी देखा की डिजिटल का काम उस दौर में और अच्छा और बेहतर हुआ है। जहां तक बात टीवी की है तो हम सब जानते हैं कि कुछ ऐसी तकनीकी चीजें होती हैं, जिनके लिए ऑफिस में आना अनिवार्य हो जाता है, वो घर तक नहीं जा सकती हैं।

मुझे ऐसा लगता है कि प्रोडक्शन की टीम को आप घर से काम करने को नहीं कह सकते हैं, क्योंकि कई ऐसी बाध्यता हैं कि उन्हें ऑफिस आना ही पड़ता है लेकिन उनकी सुरक्षा के लिए भी हमने सारे उपाय किए हैं। हमने हमारी पूरी टीम को तीन हिस्सों में बांट दिया और सबको शिफ्ट में काम करने के लिए कहा गया। एक समय में एक ही टीम शिफ्ट में काम करती थी।

कई बार हमें लगा कि काम बढ़ गया है तो हमने 12 घंटे की भी शिफ्ट की। अगर किसी को कोरोना हुआ तो हमने ट्रेसिंग की और उसके संपर्क में आए लोगों को आइसोलेशन में भेज दिया। एक बात और मैं आपसे कहना चाहूंगा कि इस समय हमारी टीम ने बहुत अच्छा काम किया है, जिस काम को 100 लोग मिलकर किया करते थे, उसी काम को हमारी सिर्फ 30 लोगों की टीम ने सीमित संसाधनों में करके दिखाया है।

हमने इस चीज पर भी ध्यान दिया कि अगर कोई घर से काम कर रहा है तो वो अधिक तनाव में नहीं जाए, क्योंकि आप घर में रहकर भी अपने परिवार के लोगों को समय नहीं दे पाते हैं और कई बार वो मानसिक कष्ट का कारक बन जाता है। कोरोना के इस काल को अगर हम देखें तो प्रिंट मीडिया इससे बहुत प्रभावित हुआ है। लोगों के अंदर एक भय था कि अखबार से भी कोरोना फैल सकता है।

टीवी की बात करें तो टीवी ने कमोबेश उस रफ्तार को कायम रखा है, लेकिन डिजिटल ने एक अभूतपूर्व वृद्धि हासिल की है। इसके अलावा हमने अपनी लागत को कम करने पर भी ध्यान दिया और उसमें भी हमने सफलता हासिल है।

मीडिया के ऊपर अक्सर ये आरोप लगाए जाते हैं कि कोरोना के इस दौर में नकारात्मक रिपोर्टिंग हुई है। आपका इसके बारे में क्या ख्याल है?

इसके लिए दो पहलू देखने होंगे। एक वो जो पारंपरिक मीडिया संस्थान हैं और एक वो जो खुद से अपना चैनल चला रहे हैं। डिजिटल मीडिया का एक सबसे बड़ा फायदा यह है कि बहुत तेजी से चीजें आप दिखा सकते हैं। पारंपरिक मीडिया संस्थान एक सिद्धांत पर चलता है और उसे चीजें दिखाने से पहले उन्हें सत्यापित भी करना होता है। शुरु में जब कोरोना आया तो कई लोगों को इसके बारे में पता तक नहीं था। उस समय मीडिया सिर्फ वही न्यूज दिखाता था, जो सरकारी गाइडलाइन के हिसाब से होती थीं और पारंपरिक मीडिया संस्थान को लेकर मुझे लगता है कि उन्होंने हमेशा मर्यादा का पालन किया है।

एक बात जरूर है कि दूसरी लहर में जब मौत अधिक होने लगीं तो उस समय जाहिर सी बात है कि आपको वो भी दिखाना है। मेरा ये मत है कि कई ऐसे डिजिटल माध्यम के लोग थे, जिन्होंने उन मौतों को और उन लाशों को एक एजेंडा के तौर पर इस्तेमाल करना शुरू कर दिया।

मुझे लगता है कि ऐसे समय में मृत शरीरों को दिखाना और जलती लाशों को दिखाना गलत माना जाएगा, आप जब भी ऐसा कुछ करते हैं तो लोगों की पीड़ा और बढ़ती है एवं जो कोरोना को झेल रहा है, उसकी हिम्मत टूट सकती है।

जिस विदेशी मीडिया ने 9/11 हमले के बाद एक भी व्यक्ति की लाश नहीं दिखाई, वही विदेशी मीडिया आज भारत में जलती चिताओं की तस्वीरें प्रसारित कर रहा है। दुर्भाग्य यह है कि भारत के भी कई पत्रकार इसमें शामिल हैं।

जाहिर सी बात है कि मौतें हुई हैं, लेकिन आबादी के अनुसार देखा जाए तो भारत अभी भी कई देशों से अच्छी स्थिति में है। दुर्भाग्य से ऐसा आकलन करना लोगों को बुरा लगता है। इस दूसरी लहर के पीछे एक कारण यह भी रहा कि हमने सरकार की बात को कहीं न कहीं नहीं माना। हम शादियां करने लगे, ट्रेवल करने लगे, थोड़ा लापरवाह भी हो गए थे। इसका परिणाम यह हुआ कि हेल्थ सिस्टम पर आठ-दस गुना अधिक बोझ अचानक से पड़ गया और जाहिर सी बात है कि कोई भी व्यवस्था उसे झेल नहीं पाएगी। इसलिए बड़े पैमाने पर मौतें भी हुईं, लेकिन सरकार ने उसे ठीक भी किया।

मुझे ऐसा लगता है कि हर चीज को देखने का एक नजरिया होता है। अगर किसी को सुविधाओं की कमी से जूझ रहे अस्पताल दिखाई दे रहे हैं तो किसी को उसी अस्पताल में 24 घंटे सेवा दे रहे डॉक्टर और नर्स दिखाई दे रहे हैं और हर व्यक्ति अपने हिसाब से चीजों को देखने के लिए स्वतंत्र है। मेरा मानना है कि ऐसा कोई काम नहीं हो, जिसके कारण लोग नेगेटिव सोचने लगें। 

आपने हाल ही में एक लेख लिखा और मोदी की चुप्पी को उनकी सबसे बड़ी ताकत बताया, आपको ऐसा क्यों लगता है?

इसमें दो चीजें हैं। अगर एक महामारी इतनी बड़ी हो गई है कि देश में लोगों को तकलीफ हो रही है तो क्या देश के नेता के भाषण करने से वो खत्म हो जाएगी? ऐसे समय में एक नेता अगर टीवी पर आकर बोलेगा तो क्या उससे सब ठीक हो जाएगा? पिछले दो दशक से मैंने पीएम मोदी को काम करते हुए देखा है और बड़े करीब से उनको कवर भी किया है।

गुजरात के पहली बार सीएम बनने से लेकर पीएम तक के सफर को मैंने देखा है और अपने अनुभव के आधार पर मैं कह सकता हूं कि पीएम मोदी की चुप्पी उनके लिए ताकत बन जाती है। जब-जब भी ऐसे दौर आए, जब चुनौती बहुत बड़ी हो, तब मैंने देखा है कि उन्होंने अपने कर्म से अपने आप को साबित किया है। उनकी गंभीर आलोचना होती है, उसके बाद भी वो चुप्पी ही साधे रखना ठीक समझते हैं।

एक उदाहरण मैं आपको देना चाहता हूं। 26 जुलाई 2008 को अहमदाबाद में 90 मिनट के भीतर 16 बम विस्फोट किए गए थे। इसकी जिम्‍मेदारी इंडियन मुजाहिदीन ने ली थी। इन भीषण बम विस्‍फोटों में 38 लोग मारे गए थे और लगभग इतने ही लोग घायल हो गए थे। उस समय भी मोदीजी की बड़ी आलोचना हुई थी कि आप तो कहते थे कि आपके राज्य में एक भी आतंकी नहीं है। उन आरोपों के बाद भी मोदी जी शांत थे और वो अपना कर्म करते रहे।

ऐसा पहली बार हुआ था कि किसी सीरियल ब्लास्ट के आरोपी इतनी जल्दी पकड़े गए और न सिर्फ आरोपी बल्कि जांच टीम ने उस ब्लास्ट के मास्टरमाइंड अब्‍दुल कुरैशी को भी पकड़ा था। इसलिए मुझे ऐसा लगा और मैंने वो लेख लिखा।   

समाचार4मीडिया के साथ ब्रजेश कुमार सिंह की इस बातचीत का वीडियो आप यहां देख सकते हैं।  

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जीवन के इस पड़ाव पर मैं टीआरपी की दौड़ से बहुत बाहर हूं: सुशांत सिन्हा

समाचार4मीडिया के साथ बातचीत में वरिष्ठ पत्रकार सुशांत सिन्हा ने मीडिया में अपनी यात्रा के साथ-साथ तमाम अहम मुद्दों पर अपने विचार साझा किए है।

Last Modified:
Monday, 17 May, 2021
SushantSinha54

वरिष्ठ पत्रकार सुशांत सिन्हा ‘इंडिया टीवी’ को अलविदा कहने के बाद से ही अब सोशल मीडिया के जरिये अपने विचार लोगों तक पहुंचा रहे हैं। यूट्यूब और ट्विटर और उनके लाखों चाहने वाले हैं और उनके वीडियो बहुत अधिक लोकप्रिय हो रहे हैं। समाचार4मीडिया के साथ बातचीत में उन्होंने मीडिया में अपनी यात्रा के साथ-साथ तमाम अहम मुद्दों पर अपने विचार साझा किए है। इसके अलावा गोदी मीडिया को लेकर भी उन्होंने अपनी राय रखी है। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

आपने पत्रकार बनने का निर्णय कैसे लिया? अपने प्रारंभिक जीवन के बारे में कुछ बताएं।

मैंने बहुत कम उम्र में ही काम करना शुरू कर दिया था। अगर बिहार की बात की जाए तो वहां एक संस्कृति देखने को मिलती है कि अक्सर अपने परिवार की जिम्मेदारी के कारण लोग जल्दी काम करने लग जाते हैं। मैंने बचपन में अपने पिताजी को खो दिया था तो मेरी मां जो कि सरकारी नौकरी में थीं, उन्होंने मुझे और मेरी बहन को बड़ी मुश्किल से पाला है। मुझे बचपन से शौक भी था न्यूज देखने का तो कम उम्र में ही पटना आकर नौकरी की। मेरी मां अक्सर मुझसे कहा करती थीं कि न्यूज का अगर इतना ही शौक है तो जाओ, वहीं नौकरी करो, तो एक वो भी आप कह सकते हैं।

2001 में पटना के एक स्थानीय चैनल के साथ शुरू हुआ सफर अब तक जारी है। कुछ समय बाद मुझे लगा कि अब मुझे पटना से बाहर निकलकर अपने आप को आगे बढ़ाना चाहिए। यही सोचकर मैं दिल्ली आया और ‘जैन टीवी’ से शुरुआत की, उसके बाद ‘जनमत’ में काम किया। ‘जनमत’ में मैंने करीब पांच साल काम किया, जिसमें एक पीरियड ‘लाइव इंडिया’ का भी था। इसके बाद मैं ‘न्यूज 24’ में चला गया और वहां कुछ समय तक काम करने के बाद मैं ‘एनडीटीवी’ चला गया। वहां मैंने पांच साल तक काम किया है। उसके बाद मैंने ‘आईटीवी नेटवर्क’ के साथ काम किया और फिर मैंने ‘इंडिया टीवी’ के साथ भी काम किया। ‘इंडिया टीवी’ को अलविदा कहने के बाद फिर मैंने किसी को जॉइन नहीं किया।

अगर देखा जाए तो आपने ‘एनडीटीवी’ के साथ काफी काम किया है। आप वहां तक कैसे पहुंचे?

दरअसल, मैं जब ‘लाइव इंडिया’ में था तो उस दौरान ही मेरी ‘एनडीटीवी’ में बात चल रही थी। मैनें इंटरव्यू भी दिया था, लेकिन जब कुछ फाइनल नहीं हुआ तो मैं ‘न्यूज 24’ में चला गया था। लेकिन कुछ ही महीनों के बाद मुझे ‘एनडीटीवी‘ से कॉल आया था और उसके बाद मैं वहां चला गया। मुझे काम करने का 10 साल से अधिक का अनुभव हो गया था और मेरी समझ भी अच्छी थी और उसी कारण मुझे जैसा कि आपने कहा कि बहुत कम उम्र में अच्छा पद प्राप्त हो गया था।

जब ‘एनडीटीवी‘ का नाम जहन में आता है तो वहां रवीश कुमार जैसे बड़े चेहरे हैं, यहां आपका पांच साल का अनुभव कैसा रहा?

देखिए, आज भी ‘एनडीटीवी‘ में मेरे कई मित्र हैं। किसी भी संस्थान में अच्छा और बुरा दोनों वक्त होता है। कभी भी ऐसा नहीं हो सकता कि सिर्फ आपका अच्छा ही समय चले। मेरा अनुभव मिला-जुला रहा है। कुछ चीजों को लेकर बहुत अच्छे दोस्त मिले तो कुछ चीजों को लेकर बहुत बंदिशें भी थीं। कई बार मेरे बोलने और कुछ कहने पर टोका जाता था। इसके अलावा अगर कुछ सोशल मीडिया पर लिख दिया, तो धमकी भरी चिट्ठी आ जाती थी। एक तरह से आप कह सकते हैं कि मैं बंधा हुआ सा महसूस करता था।

दूसरा मैंने ये देखा कि वहां का अपना ईको सिस्टम है। अगर आप उसका हिस्सा हैं तो चीजें आपके हिसाब से होंगी, वरना आपको दिक्क्तों का सामना करना पड़ेगा। अंदर जो होता था, मैं उसको लेकर आवाज उठाता ही उठाता था। इसलिए मैंने निर्णय लिया कि एक-दूसरे के लिए परेशानी खड़ी करने से बेहतर है कि कोई नया विकल्प तलाश लिया जाए।

‘इंडिया टीवी‘ को अलविदा कहने के बाद आपने कहीं जॉब क्यों नहीं की? इतनी कम उम्र में इतना बड़ा निर्णय कैसे लिया?

ऐसा नहीं था कि मैं यूट्यूब पर आने के बारे में सोच रहा था, इसलिए मैंने ‘इंडिया टीवी‘ को छोड़ दिया या इस्तीफा दिया। ऐसा भी नहीं था कि मुझे कोई ऑफर नहीं था, लेकिन कई जगह ऐसी थीं, जहां मैं जाना नहीं चाहता था। मुझे काम करते हुए 18 साल हो गए हैं और जीवन में एक पड़ाव ऐसा आता है कि जब आप खुद को समझने लग जाते हैं। आपका मन समझौते करने से मना करता है और यही कारण था कि मैंने कहीं फिर नौकरी नहीं की। कई बड़े संस्थानों से मुझे ऑफर आया था, लेकिन मैं अब खुद इस चीज को जानता हूं कि मेरे काम करने का स्टाइल ऐसा है कि मैं वहां ढल नहीं पाऊंगा।

मैं आपसे एक बात और कहना चाहूंगा कि मैं खुद उतना यूट्यूब नहीं देखता था। मैं जब घर आता था तो मेरी खुद की ये कोशिश होती थी कि मैं टीवी भी नहीं देखूं। मेरे मित्र और कई परिचित लोग हमेशा मुझसे कहते थे कि मुझे यूट्यूब पर आना चाहिए। इसके बाद मैंने ये सब शुरू किया और मुझे उम्मीद नहीं थी कि लाखों चाहने वाले होंगे और करोड़ों व्यूज होंगे। हाल ही में मेरे पास एक बहुत बड़े संस्थान से ऑफर भी आया था और जिम्मेदारी भी बहुत बड़ी थी, लेकिन उनकी एक शर्त थी कि मुझे मेरा यूट्यूब बंद करना होगा। मुझे ऐसा लगता है कि मैं जीवन के उस पड़ाव पर हूं, जहां टीआरपी की दौड़ से बहुत बाहर हूं। अब मैं जो बोलना चाहता हूं, वो बोलता हूं और ईश्वर की कृपा से लोग उसे पसंद भी कर रहे हैं। इसलिए फिर मैंने इधर ही रहना जरूरी समझा। मुझे ऐसा लगता है कि अगर देश के 10 लोगों पर भी मैं प्रभाव छोड़ पा रहा हूं तो वही मेरे लिए सफलता है और इसके बाद मुझे कुछ भी नहीं चाहिए।

सोशल मीडिया पर फेक न्यूज का जमाना है और इसके अलावा कई बार आपको ट्रोल्स का भी सामना करना पड़ता है। उन चीजों को कैसे देखते हैं?

देखिए, सोशल मीडिया के साथ जो हमारा रिश्ता है, वो दोनों तरह का रहने वाला है। जैसे कोरोना के इस कठिन समय में हम सबने देखा है कि कैसे इसी सोशल मीडिया के माध्यम से लोगों को मदद मिल रही है और उनकी जान बच रही है। इसके साथ सबसे बड़ी समस्या यह है कि कुछ लोग इसे नैरेटिव सेट करने का माध्यम बना देते हैं। कई बार लोग बिना जाने और बिना समझे किसी भी बात को दिमाग में बिठा लेते हैं। इसके अलावा जिन ट्रोल्स की आपने बात की है तो मेरा मत यह है कि इनका काम सिर्फ आपको हतोत्साहित करने का होता है। अगर आप कोई सच दुनिया को बता रहे हैं तो ये आपको ओतना ट्रोल करेंगे की आप हार मान जाएं। लेकिन मैं बिहारी हूं और ऊपर से पत्रकार हूं। यदि डरना होता तो इस काम में आता ही नहीं। आपने नोटिस किया होगा कि मैं कभी ट्विटर पर लड़ाई नहीं लड़ता। मुझे वेरिफाइड अकाउंट से लेकर फेक अकाउंट तक से बहुत कुछ बोला जाता है, लेकिन मैं जीवन में बुद्ध की अवस्था को लेकर चलने वाला इंसान हूं। मुझे लगता है कि ऐसे समय में आप बुद्ध बन जाइए। 

आपने एक बड़े पत्रकार को खुली चिट्ठी लिखी थी और गोदी मीडिया जैसे शब्द पर कड़ी आपत्ति आपको है, दोनों बातें खुलकर समझाए?

मैं हमेशा अपने दर्शकों से कहता रहता हूं कि गोदी मीडिया जैसे शब्द सिर्फ अपने पाप को छिपाने के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं। इस देश में सत्ता और पत्रकारिता का गठजोड़ सालों से चला आ रहा है।मेरे चैनल पर पद्मश्री आलोक मेहता जी का भी इंटरव्यू है और बाकी पत्रकारों के भी इंटरव्यू हैं। उन्होंने बताया है कि कैसे बड़े-बड़े पत्रकारों को लिफाफे जाया करते थे। लोगों को सोचना चाहिए कि उनके इतने बड़े-बड़े बंगले कैसे बन गए?

मैंने और अशोक श्रीवास्तव जी ने तो खुलकर इस बात को कहा है कि हर पत्रकार को अपनी संपत्ति सार्वजनिक करनी चाहिए। अगर नेताओं के लिए आप कहते हैं तो इसे पत्रकारों के लिए भी कहिए। आप पूछिए रवीश कुमार से कि क्या वो ऐसा करेंगे? वो तो परेशान हो गए थे जब मैंने सबको उनकी सैलरी बता दी थी। दरअसल जब आप चेहरा बनाते हैं कि आप बहुत बड़े समाजवादी हैं और बिल्कुल ही गरीब हैं लेकिन जब लोगों को पता चले कि आठ लाख रुपये महीना लेकर आदमी गरीबों की बात कर रहा है तो आपकी इमेज खत्म होने का आपको डर रहता है। उनको आपकी मेरी और किसी की चिंता नहीं है। उनको सिर्फ एक लक्ष्य दे दिया गया है कि इस आदमी को कुर्सी को नीचे से उतारो और वो बस अपने इसी काम में लगे हुए हैं। उनके लिए आपकी और मेरी लाश सिर्फ एक सीढ़ी है कि कैसे वो एक कदम और आगे बढ़ें, बस इससे अधिक कुछ नहीं।

आपको जानकार हैरानी होगी कि शीलाजी के समय के 16 हॉस्पिटल लगभग बनकर तैयार हैं, लेकिन अरविंद केजरीवाल ने उन्हें शुरू तक नहीं किया है। दिल्ली एक ऐसी जगह है, जहां लोग अस्पताल और दवाइयों के अभाव में मर रहे हैं। अब आप रवीश कुमार से कहिए कि आप क्यों नहीं अरविंद केजरीवाल का इंटरव्यू करते? क्यों नहीं आप उनसे सवाल पूछते कि उन्होंने वो 16 अस्पताल क्यों नहीं चलाए?

आज सोशल मीडिया के ज़माने में हर कोई अपने आप को एडिटर समझने लगा है। नई पीढ़ी के लोगों को क्या सलाह देंगे?

मैं आपको इसे एक उदाहरण के माध्यम से समझाता हूं। मेरा मानना है कि जब आप शादी करते हैं तो इसलिए नहीं करनी चाहिए कि उसके पीछे कुछ पारिवारिक कारण होते हैं बल्कि इसलिए करनी चाहिए कि जीवन का ऐसा कौन सा खाली हिस्सा है, जिसे आप भरना चाहते हैं। किसी भी काम को करते वक्त अपने आप से पूछिए कि आप ये क्यों करना है?  मीडिया में आने से लेकर डॉक्टर बनने तक की भी अगर बात जो पहले दिल से पूछिए कि क्या आप उसे करते वक्त खुश रहेंगे या नहीं?

जैसे कि मैंने अपने बारे में सोच रखा है कि मैं आगे वाले कुछ सालों में पत्रकारिता छोड़ दूंगा। मैंने अपने जीवन में बहुत कुछ कर लिया है और मैं अब कुछ और आयाम जीवन के अनुभव करना चाहता हूं। ये एक ऐसा पेशा है जो आपका बहुत कुछ लेता है। अगर मैं सिर्फ 2 वीडियो भी दे रहा हूं तो उसके पीछे घंटों की रिसर्च होती है। कई बार जब आपको बुद्ध वाली अवस्था में जाना भी होता है, उस समय भी आपको स्वयं को समय देकर यह समझाना होता है और उसमे भी बहुत अधिक ऊर्जा नष्ट हो जाती है। हम जलते रहते हैं और सामने वाले को जवाब नहीं देतें क्योंकि आपको अपने आप को बेहतर बनाना है और उस बेहतर बनाने की लड़ाई में बहुत कुछ खपता है।

समाचार4मीडिया के साथ सुशांत सिन्हा की इस बातचीत का वीडियो आप यहां देख सकते हैं-

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