टीवी चैनल्स की व्युअरशिप को लेकर BARC India के सीईओ सुनील लुल्ला ने कही ये बात

‘ब्रॉडकास्ट ऑडियंस रिसर्च काउंसिल’ (BARC) इंडिया के सीईओ सुनील लुल्ला ने लॉकडाउन में टीवी व्युअरशिप और मीटर टेंपरिंग समेत तमाम मुद्दों पर रखी अपनी बेबाक राय

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Tuesday, 08 December, 2020
Last Modified:
Tuesday, 08 December, 2020
Sunil Lulla

देश में टेलिविजन दर्शकों की संख्या मापने वाली संस्था ‘ब्रॉडकास्ट ऑडियंस रिसर्च काउंसिल’ (BARC) इंडिया के सीईओ सुनील लुल्ला का कहना है कि देश में लोगों तक पहुंच के मामले में टीवी सबसे ज्यादा प्रभावशाली माध्यम बना रहेगा। उनका कहना है कि कोविड महामारी और लॉकडाउन के दौरान टीवी व्युअरशिप ने स्पष्ट कर दिया है कि व्युअरशिप के मामले में आईपीएल के लिए यह काफी अच्छा सीजन रहा है। लुल्ला का यह भी कहना था कि हाल में मीटरों के छेड़छाड़ से जुड़ी घटनाओं ने स्टेकहोल्डर्स को साथ में आगे आने और इस मीजरमेंट प्रक्रिया को मजबूती से आगे बढ़ाने के संकल्प को और मजबूत किया है। हमारी सहयोगी वेबसाइट ‘एक्सचेंज4मीडिया’ (exchange4media) के साथ बातचीत में लुल्ला ने तमाम मुद्दों पर अपनी बेबाक राय रखी। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

टीवी व्युअरशिप की बात करें तो शुरुआती छमाही की तुलना में इस साल की दूसरी छमाही कैसी रही है?

देशभर के लोगों तक पहुंचने के लिए टेलिविजन सबसे प्रभावी माध्यम बना हुआ है। कोविड-19 और लॉकडाउन के दौरान साल की पहली छमाही जैसी रही, वह पहले कभी नहीं रही। इस दौरान लोगों ने टीवी देखने में ज्यादा समय बिताया। इससे व्युअरशिप रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई, जो पहले इस तरह कभी नहीं रही।  

मार्च के आखिरी से लेकर जून की शुरुआत तक जब स्कूल-बाजार, दुकान वगैराह सब बंद थे, ‘नॉन प्राइम टाइम’ (NPT) में टीवी पर बिताया जाने वाला समय छह सौ घंटों से बढ़कर 1800 घंटे हो गया। वर्ष 2019 की पहली छमाही की तुलना में इस साल पहले हफ्ते से 26वें हफ्ते के दौरान ‘नॉन प्राइम टाइम’ (NPT)  व्युअरशिप में 13.7 की वृद्धि देखने को मिली। पिछले साल की पहली छमाही की तुलना में इस साल की पहली छमाही में प्राइम टाइम व्युअरशिप में 3.6 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई। इस साल की पहली छमाही मे मूवीज, न्यूज और किड्स जैसे जॉनर्स को फायदा हुआ। फिर अनलॉक की शुरुआत हुई और जुलाई से लेकर सितंबर तक ट्रांसपोर्ट, कार्यस्थल आदि खुलने शुरू हुए। ऐसे में दर्शकों ने अपनी अन्य गतिविधियों के लिए फिर से कमर कसनी शुरू कर दी और टेलिविजन पर बिताए जाने वाले समय में कमी हो गई।

इस साल की दूसरी छमाही (H2 2020) में 27 से 43वें हफ्ते के दौरान पिछले साल इसी अवधि की तुलना में प्राइम टाइम की व्युअरशिप 16.2 प्रतिशत और नॉन प्राइम टाइम की व्युअरशिप 24.3 प्रतिशत बढ़ गई। 46वें हफ्ते तक व्युअरशिप में मूवीज जॉनर का शेयर कोविड-19 से पहले की तरह 23 प्रतिशत हो गया, जबकि जनरल एंटरटेनमेंट चैनल्स जॉनर का शेयर कोविड-19 से पहले 52 प्रतिशत था, जो बढ़कर 56 प्रतिशत हो गया।  

लॉकडाउन के दौरान हमने देखा कि जनरल एंटरटेनमेंट चैनल्स के मुकाबले न्यूज जॉनर में सबसे ज्यादा वृद्धि हुई। अब क्या स्थिति है। किन जॉनर्स की व्युअरशिप में बढ़ोतरी हो रही है?

सबसे पहले न्यूज जॉनर की बात करते हैं। 13-14 हफ्ते में न्यूज की व्युअरशिप बढ़कर 21 प्रतिशत हो गई और जून-जुलाई में यह घटकर 14-15 प्रतिशत पर आ गई और अब यह कम है। यह बढ़ोतरी नॉन प्राइम टाइम देखने के कारण हुई थी। न्यूज व्युइंग अब आठ-नौ प्रतिशत पर वापस लौट आई है। लॉकडाउन के दौरान ऑरिजनल प्रोग्रामिंग में कमी को देखते हुए ब्रॉडकास्टर्स ‘महाभारत’ और ‘रामायण’ जैसे क्लासिक शो को वापस ले आए।

महामारी के दौरान जनरल एंटरटेनमेंट चैनल्स के साथ न्यूज का उपभोग भी बढ़ गया, क्योंकि स्थिति जानने के लिए व्युअर्स न्यूज चैनल्स से जुड़े रहते थे। लॉकडाउन के दौरान यह जॉनर सात से बढ़कर 21 प्रतिशत हो गया और अब अनलॉक होने के साथ यह वापस सात प्रतिशत पर लौट आया है। ऑरिजनल प्रोग्रामिंग लौटने के बाद प्राइमटाइम व्युअरशिप भी बढ़ी है। इसके अलावा किड्स जॉनर की व्युअरशिप में भी वृद्धि हुई है। कुल मिलाकर टीवी पर बिताए जाने वाले औसत समय और यूनिक व्युअर्स की संख्या में बढ़ोतरी हुई है।

आईपीएल को लेकर जारी बार्क डाटा से स्पष्ट पता चलता है कि पिछले सीजन की तुलना में व्युअरशिप के मामले में यह सीजन काफी अच्छा रहा है। क्या आप इस साल आईपीएल के कुछ डाटा को शेयर कर सकते हैं? अथवा व्युअरशिप/ऐड वॉल्यूम ट्रेंड इस साल कैसे अलग रहा है?

व्युअरशिप के मामले में आईपीएल का यह सीजन (आईपीएल-13) पिछले सीजन (आईपीएल-12) के मुकाबले 23 प्रतिशत बढ़ा है। पिछले सीजन में यह 326 बिलियन व्युइंग मिनट्स से बढ़कर यह 400 बिलियन व्युइंग मिनट्स हो गया। प्रति मैच औसत व्युअरशिप भी 23 प्रतिशत बढ़ गई। इस सीरीज को कुळ 405 मिलियन व्युअर्स ने देखा। आईपीएल को ओपनिंग मैच ने 11.2 बिलियन व्युइंग मिनट्स दर्ज किए, जो पिछले सीजन के मुकाबले 65 प्रतिशत ज्यादा थे। पिछले सीजन में औसत इंप्रेशंस 40.3 मिलियन थे जो 29 प्रतिशत बढ़ोतरी के साथ इस सीजन में 52 मिलियन हो गए। पिछले साल की तुलना में इस साल ओपनिंग मैच की पहुंच में 21 प्रतिशत की वृद्धि हुई।  

विज्ञापन की बात करें तो चैनल्स के ऐड वॉल्यूम में वर्ष 2019 और 2020 में समान रूप से चार प्रतिशत की वृद्धि हुई। टॉप पांच सेक्टर्स भी लगभग समान थे। ऐडवर्टाइजिंग में इस साल नए सेक्टर्स देखे गए। मुंबई इंडियंस और चेन्नई सुपर किंग्स के बीच हुआ ओपनिंग मैच आईपीएल-12 और आईपीएल-11 की तुलना में सबसे ज्यादा देखा जाने वाला ओपनिंग मैच रहा।  

आपको क्या लगता है कि डाटा ब्लैकआउट का समय न्यूज चैनल्स और पूरी इंडस्ट्री के बिजनेस पर प्रभाव डालेगा? क्या आप हमें इस अवधि के दौरान उठाए जा रहे कदमों के बारे में कुछ बता सकते हैं?

हाल के घटनाक्रमों के मद्देनजर बार्क बोर्ड ने प्रस्ताव दिया था कि उसकी टेक्निकल कमेटी डाटा को और बेहतर करने के लिए मीजरमेंट के वर्तमान मानकों की समीक्षा और उन्हें बढ़ाने का काम करेगी और प्रमुख जॉनर्स के डाटा की रिपोर्टिंग करेगी। न्यूज समेत प्रमुख जॉनर्स के लिए क्वालिटी डाटा रिपोर्टिंग मानकों के साथ-साथ यह टेक्निकल कमेटी इंडस्ट्री और एक्सपर्ट्स के साथ मिलकर सक्रिय रूप से सहयोग कर रही है।  

साल के शुरुआत में बार-ओ-मीटर (Bar-o-meters) की संख्या बढ़ाने को लेकर चर्चा हुई थी। आपके अनुसार बार्क के मीटरों से छेड़छाड़ रोकने का दीर्घकालिक समाधान क्या है?

लॉकडाउन और COVID-19 के कारण, पैनल का विस्तार अस्थायी रूप से रोक दिया गया था। हमने विस्तार शुरू किया है और मार्केट्स में प्रगति कर रहे हैं। बार्क सेल्फ रेगुलेशन को बढ़ावा देता है।

पूरी इंडस्ट्री के लिए बार्क काफी महत्वपूर्ण संस्था है। पिछले दिनों हुए मामले पर स्टेकहोल्डर्स की प्रतिक्रिया कैसी रही है?

बार्क डाटा उलपब्ध करता है, जिसके आधार पर विज्ञापनदाता चैनल्स को विज्ञापन देते हैं। हमें स्टेकहोल्डर्स से पर्याप्त समर्थन मिल रहा है। इस तरह की घटनाओं ने स्टेकहोल्डर्स को साथ में आगे आने और इस प्रक्रिया को मजबूती से आगे बढ़ाने के संकल्प को मजबूत किया है।

इस बात पर थोड़ा प्रकाश डालें कि क्या बार्क इस प्रतिबंधित अवधि के डाटा को 12हफ्ते के बाद जारी करेगा या यह पूरी तरह से ब्लैकआउट रहेगा?

टेक्निकल कमेटी डाटा क्वालिटी रिपोर्टिंग के सभी पहलुओं को ध्यान में रख रही है और उसी के आधार पर तय किया जाएगा।

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यह स्थिति सिर्फ मीडिया ही नहीं, बल्कि संविधान के लिए भी सही नहीं है: सतीश के. सिंह

वरिष्ठ पत्रकार सतीश के. सिंह ने मीडिया जगत की अपनी यात्रा को लेकर समाचार4मीडिया से खास बातचीत की है। इस इंटरव्यू में उन्होंने अपने जीवन के कई अनुसने किस्सों को साझा किया है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Monday, 15 November, 2021
Last Modified:
Monday, 15 November, 2021
Satish K Singh

वरिष्ठ पत्रकार सतीश के. सिंह ने मीडिया जगत की अपनी यात्रा को लेकर समाचार4मीडिया से खास बातचीत की है। इस इंटरव्यू में उन्होंने अपने जीवन के कई अनुसने किस्सों को साझा किया है। पेश है इस बातचीत के कुछ प्रमुख अंश-

अपने शुरुआती दिनों के बारे में कुछ बताएं। मीडिया में कैसे आना हुआ?

बचपन में जब मैं पटना में रहता था तो अखबार पढ़ने की आदत लग गई थी। उन दिनों बचपन में ऐसा लगता था कि अखबार बहुत बड़ी चीज है। धीरे-धीरे मेरी रुचि अन्य भाषाओं के अखबारों और पत्रिकाओं में भी होने लगी और साल 1977 आते-आते राजनीति जैसे विषयों की समझ विकसित होनी शुरू हो गई थी। हालांकि मेरी रुचि मीडिया में आने की नहीं थी, दरअसल मुझे खेल का मैदान रोमांचित किया करता था। उस दौरान मैं लगभग सभी बड़ी खेल पत्रिकाओं का अध्ययन किया करता था। मैं बड़ा खिलाड़ी तो नहीं बन पाया, लेकिन मैं एथलीट जरूर था। साल 1982 में पटना के एक अखबार में मेरा फोटो आया था और वो याद आज भी मेरे जहन में जिंदा है। इसके बाद मैं दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ने के लिए आ गया। उसी दौरान मेरी समझ को देखकर मेरे एक मित्र ने मुझे पत्रकारिता में आने की सलाह दी। मैंने एक पत्रिका को जॉइन किया और बाद में नलिनी सिंह जी के कार्यक्रम के साथ जुड़ गया।

जैसा कि आपने कहा कि बचपन से राजनीति में रुचि थी तो किसी पार्टी से क्यों नहीं जुड़े?

देखिए, अगर मैं चाहता तो बड़ी आसानी से किसी भी राजनीतिक पार्टी से मैं जुड़ सकता था। मुझे पांच बड़े नेताओं ने ऑफर दिया था, जिसमें से चार तो आज जीवित भी नहीं हैं। देखा जाए तो फैक्ट्स आधारित पत्रकारिता करने में मुझे मजा आ रहा था और आज भी मैं उसी को एन्जॉय करता हूं। राजनीति मुझे लगता है कि मेरे बस की नहीं है। मुझे तो इस नाम से ही समस्या है। आप राजनीति क्यों कहते हैं? राष्ट्रनीति कहिए न! ये राज्य करने की नीति क्यों हो? आप इसे लोगों की सेवा करने की नीति कहिए। मीडिया की अगर बात करें तो वहां भी जनता के मुद्दे उठें, लेकिन आज आप देखिए की डिबेट में बॉक्सिंग हो रही है, लोग लड़ रहे हैं और तथ्यों को तोड़ा-मरोड़ा जाता है। मेरा मानना है कि चुनाव तो ठीक है, लेकिन असली लोकतंत्र की परीक्षा चुनाव के बाद ही शुरू होती है।

अपने रिपोर्टिंग के अनुभव के बारे में बताएं। उस दौर में रिपोर्टिंग करना कितना चुनौतीपूर्ण था?

नलिनी सिंह जी के कार्यक्रम ‘हेलो जिंदगी‘ में काम करने के दौरान मुझे हिमाचल, पंजाब और बिहार जैसे राज्यों में जाने का मौका मिला और काफी कुछ मैंने सीखा। उसके बाद मैं ‘फर्स्ट एडिशन‘ से जुड़ गया, जहां मुझे रिसर्च का काम दिया जाता था जो मेरे लिए अच्छा भी रहा। उसके बाद साल 1996 में मुझे ‘जी टीवी‘ से जुड़ने का मौका मिला। उसी दौरान ओलंपिक हुए और मैंने डेस्क पर रहते हुए उसकी पूरी रिपोर्ट बनाई। उसके बाद मुझे चुनाव कवर करने के लिए पटना (बिहार) भेजा गया। टीवी के लिए वह मेरी पहली चुनावी रिपोर्टिंग थी। मैंने लालू यादव जी का इंटरव्यू भी किया था और उस चुनाव के बाद मुझे लगता है कि मैं एक अच्छा रिपोर्टर बन गया था। देवगौड़ा जी का इस्तीफा, गुजराल जी का पीएम बनना, कारगिल घुसपैठ जैसी खबरें मैंने ही ब्रेक की थीं। इसके अलावा कंधार विमान अपहरण और उसके समाधान की न्यूज भी मैंने ही ब्रेक की थी। इसके अलावा वाजपेयी जी के विश्वासमत हारने की खबर मैंने पहले ही बता दी थी। इसके अलावा मुझे कई बार भारत सरकार की ओर से विदेश जाने का भी मौका मिला। वहीं काम के सिलसिले में करीब 28 देशों की यात्रा करने का मौका मिला। एक और खास बात ये है कि साल 2004 से मैं चुनाव परिणाम की भविष्यवाणी करीब-करीब सही करता आ रहा हूं।

अगर हम 90 के दशक की बात करें तो वो देश के लिए बड़ा चुनौतीपूर्ण दशक था। कई बड़ी घटनाएं उस दौर में हुईं। आप उस समय और आज की पत्रकारिता में क्या बड़ा अंतर पाते हैं?

मुझे ऐसा लगता है कि आज मुख्यधारा का पत्रकार काफी वजह से कमजोर है। आप उसे दबाब कह लें, महत्वकांक्षा कह लें या उसकी विचारधारा को कारण मान लें, लेकिन सच यही है कि आज उस दौर की तरह पत्रकारिता नहीं हो रही है। वैसे एक दौर में हमने सांप-बिच्छू वाली खबरें भी देखीं और उससे मीडिया की इमेज प्रभावित भी हुई, आज कम से कम न्यूज की शक्ल में कुछ तो लोगों को देखने को मिल रहा है। दूसरी ओर आज डिजिटल मीडिया का जमाना है, जहां कमोबेश हर व्यक्ति पत्रकार बन गया है। आज आपकी एक उंगली पर दुनिया है और खबरें बड़ी तेजी से लोगों तक जा रही हैं तो उनका फैक्ट चेक भी बहुत जरूरी है। जहां तक उस दौर की बात है तो अच्छे-बुरे लोग तो हर समय में होते हैं। आज भी ऐसे कई पत्रकार हैं जो मीडिया में काफी अच्छा प्रयोग कर रहे हैं। उस समय भी तमाम नेता अपना झुंड बनाकर चलते थे, जो हर जगह उनकी बात को सही साबित करे और ये आज भी होता है। एक और चीज जो मुझे दिखाई पड़ती है, वो ये है कि आज के समय में स्टडी उतनी नहीं हो रही है। पहले पढ़ाई-लिखाई पर बड़ा जोर रहता था। इसके अलावा मैं विचारधारा के अतिरेक को भी गलत मानता हूं। चाहे कोई भी विचारधारा हो, अगर वो मीडिया पर हावी होने की कोशिश करेगी तो आप ये मानकर चलिए कि ये सिर्फ मीडिया के लिए ही नहीं बल्कि देश के संविधान के लिए भी सही नहीं है।

आज देश के ऊपर ‘फेक न्यूज‘ नाम का संकट आ खड़ा हुआ है। कई बार तो पत्रकार भी ऐसे एजेंडे में शामिल हो जाते हैं। आपका क्या मत है?

आज भले ही कुछ लोग भ्रम फैला रहे हैं, लेकिन आप ये भी जान लीजिए कि सिस्टम इतना मजबूत है कि आज किसी को भी कहीं से दबोचा जा सकता है। आज सरकार ने प्रसारण से जुड़े कानून बनाए हैं, लेकिन उनका पालन सख्ती से होना चाहिए। फेक न्यूज तो पहले भी थी, लेकिन आज सोशल मीडिया के कारण असर अधिक दिखाई दे रहा है, इसलिए सरकार को ऐसे लोगों से निपटने के लिए इंतजाम करना चाहिए। मेरा मत यह भी है कि ये सभी पर समान रूप से लागू होना चाहिए। ऐसा नहीं कि कोई गलत काम करने के बाद जेल जाए और कोई बच जाए। देश के नेताओं को आज ये बात समझने की जरूरत है कि एक समय उनके खिलाफ भी अगर लिखा जाता था तो पत्रकार का कोई अपमान नहीं करता था, लेकिन आज समय बदल गया है। आज के नेताओं को सहिष्णु होना होगा।

आपकी रुचि क्या है? खाली समय में क्या करना पसंद करते हैं?

समय की तो मेरे पास कभी कमी हुई नहीं है और मैं अपने आप को किसी न किसी काम में व्यस्त रखता हूं। मैं बहुत पढ़ाई करता हूं और डिजिटल मीडिया को समझने की कोशिश करता हूं। इसके अलावा आज भी खेल पत्रिकाओं को पढ़ता हूं और रोज बाजार में लोगों से मिलने जाता हूं। लोगों से मिलना और उनसे बातें करना मुझे पसंद है, इससे समाज को समझने में मेरी काफी मदद हो जाती है। इसके अलावा कैसे देश का विकास हो,  कैसे आम आदमी की कमाई बढ़े और कैसे सबको समान अवसर मिलें, इसी पर सोचता रहता हूं। वैसे देखा जाए तो मेरे पास खेल को लेकर एक पूरी नीति तैयार है, लेकिन कोई पूछे तो हम कहें और कोई न पूछे तो भी क्या? हम तो अपनी मस्ती में मस्त हैं।

समाचार4मीडिया के साथ सतीश के. सिंह की बातचीत का वीडियो आप यहां देख सकते हैं।

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मीडिया की दुनिया में तमाम रिश्ते तो ऑफिस तक ही खत्म हो जाते हैं: नवीन कुमार

नवीन कुमार को मीडिया जगत में तीन दशक से भी अधिक का अनुभव है। वर्तमान में वह दिल्ली बीजेपी के मीडिया प्रमुख पद की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Sunday, 07 November, 2021
Last Modified:
Sunday, 07 November, 2021
Naveen Kumar

नवीन कुमार को मीडिया जगत में तीन दशक से भी अधिक का अनुभव है। वर्तमान में वह दिल्ली बीजेपी के मीडिया प्रमुख पद की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। समाचार4मीडिया को दिए इंटरव्यू में उन्होंने अपनी इस जीवन यात्रा पर विस्तार से चर्चा की है। पेश हैं इस इंटरव्यू के प्रमुख अंश-

आपने तीन दशक से अधिक मीडिया में काम किया और अब आप राजनीति में हैं। अपने प्रारंभिक जीवन के बारे में कुछ बताइए।

मेरा जन्म मेरठ में हुआ है और शिक्षा दिल्ली में हुई। मेरे पिताजी फार्मासिस्ट थे और परिवार के बाकी लोग भी यही चाहते थे कि मैं सरकारी अधिकारी बनकर देश की सेवा करूं। मीडिया में आने का मेरा भी कोई प्लान नहीं था।

पढ़ाई के दिनों के दौरान ही मैं ‘अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद’ से जुड़ गया था और डिबेट में भाग लेने के कारण मेरी सामाजिक समझ विकसित हो रही थी। उस दौरान कई बड़े पत्रकारों से मिलना होता था और मुझे धीरे-धीरे समझ आया कि मेरी समझ के हिसाब से मुझे पत्रकारिता में जाना चाहिए और मैं पत्रकार बन गया।

शुरू के कुछ वर्ष बेहद कष्टदायक थे, लेकिन धीरे-धीरे मैं काम सीखता गया और आगे बढ़ता गया। साल 1990 में जब ‘दैनिक जागरण‘ दिल्ली से शुरू हुआ तो मुझे जुड़ने का मौका मिला और मैंने काफी कुछ उस संस्थान से सीखा। इसके बाद मुझे ‘राष्ट्रीय सहारा‘ में काम करने का मौका मिला लेकिन मेरे साथ वहां एक समस्या खड़ी हो गई।

दरअसल मैंने राजनीतिक रिपोर्टिंग की और वहां मुझे अपराध की खबरें कवर करने के लिए कहा गया। इसके अलावा मुझे यह भी कह दिया गया कि या तो आप चार महीने के अंदर क्राइम रिपोर्टर बन जाइए या फिर आप इस्तीफा सौंप दें, वरना आपको निकाल दिया जाएगा। मेरे पास कुछ महीनों का समय था और धीरे-धीरे मैंने काम करना और समझना शुरू किया।

एक दिन मैंने दिल्ली पुलिस कमिश्नर का इंटरव्यू फिक्स किया और दोपहर के तय समय से पहले ही मैं पहुंच गया और अपनी बारी का इंतजार करने लगा। तय समय से ढाई घंटा अधिक हो चुका था, लेकिन मुझे समय नहीं मिला था लेकिन उसी दौरान वहां एक बड़े अखबार के संपादक आए और उन्हें तुरंत समय मिल गया।

उस दिन मुझे अहसास हुआ कि बड़े पत्रकार का क्या रौब होता है और उस घटना ने मेरे जीवन को बदल दिया। इसके बाद मैं जी-जान से अपने काम में लग गया और उस घटना के एक महीने के अंदर मैं हमारे मुख्य क्राइम रिपोर्टर का भी बॉस बन गया। इसके अलावा मैं क्राइम चीफ रिपोर्टर भी बन गया।

उसके बाद मैंने पब्लिसिटी वाले इंटरव्यू करने बंद कर दिए और वास्तविक मुद्दों पर फोकस शुरू किया। ऐसे कई मामले थे जो आत्महत्या में दर्ज हुए, लेकिन मेरी तहकीकात के कारण उन्हें हत्या मानकर जांच की गई।

आपने प्रिंट में काफी अच्छा काम किया और उसके बाद आप टीवी से जुड़ गए। उस यात्रा के बारे में कुछ बताइए।

वर्ष 1997 में मुझे ‘जी‘ में काम करने का मौका मिला। उस समय वह ‘जी न्यूज‘ नहीं हुआ करता था और सिर्फ एक बुलेटिन आया करता था। अब टीवी से हम परिचित नहीं थे और न ही कुछ समझ में आ रहा था।

दरअसल, उत्साह में मैंने ‘सहारा‘ छोड़ दिया और कुछ लोगों की बातों में आकर गलत निर्णय ले डाले। जब मैं कुछ समय के लिए रोजगार विहीन हुआ तब मुझे समझ आ गया कि लोग आपको नहीं, आपकी कुर्सी को सलाम करते हैं।

मीडिया की दुनिया भी ऐसी ही दुनिया है। जब तक आपके संबंध हैं, तब तक आपको लोग प्रेम करते हैं, वरना बाकी रिश्ते तो ऑफिस तक ही खत्म हो जाते हैं। ‘सहारा‘ में मुझे तमाम सुविधाएं मिलीं, उस समय सिर्फ मैं अकेला क्राइम रिपोर्टर था, जिसके पास जिप्सी होती थी लेकिन एक गलत निर्णय से मुझे जीवन की सच्चाई समझ आई।

अब मेरा ‘जी‘ में सलेक्शन हो तो गया थे, लेकिन मन मेरा प्रिंट में ही था तो मैंने ‘जी‘ में काम करते हुए भी नौकरी खोजनी शुरू कर दी थी। जब मैं टीवी में काम कर रहा था तो दिन भर राजनीतिक खबरें करते थे और सोचते थे कि रात को न्यूज चलेगी, लेकिन जब रात को बुलेटिन आता था तो हमारी न्यूज कुछ सेकंड भर तक सिमट कर रह जाती थी।

उसके बाद आखिर मुझे ‘दैनिक हिंदुस्तान‘ में काम मिल गया। उसके बाद मैंने अपने बॉस को कहा कि ये टीवी अपने बस का तो है नहीं, हम प्रिंट में ही सही हैं, लेकिन उन्होंने मेरे इस निर्णय पर ऐसा कटाक्ष किया कि मैं अंदर तक हिल गया। इसके बाद मैंने ये निर्णय ले लिया कि अब टीवी में ही काम करना है और शानदार काम करना है।

उसी समय ‘जी‘ का ही एक एंटरटेनमेंट लिमिटेड नाम से चैनल आता था और सूर्यकान्त बाली जी वहां के संपादक थे और वो भी प्रिंट से ही आए थे तो मैंने उनसे कहा कि एक करंट अफेयर्स पर और एक विश्लेषण को लेकर कार्यक्रम किया जाए और हमने वो कार्यक्रम बनाना शुरू कर दिया।

धीरे-धीरे वो हिट होने लगा और हमने एक से एक अच्छे प्रोजेक्ट किए। उसके बाद हमने सुबह का बुलेटिन भी करना शुरू कर दिया। उसी समय मेरी एक मुलाकात विजय जिंदल जी से हुई, जो कि उस समय ग्रुप सीईओ थे और उनके सहयोग से उस चैनल का नाम ‘जी इंडिया‘ हो गया और उसके बाद वही ‘जी न्यूज‘ हुआ।

उस दौरान टीवी पर क्राइम फिक्शन की शुरुआत करने वाला मैं एकलौता मीडियाकर्मी था। संसद हमले पर जो मैंने डॉक्यूमेंट्री बनाई, उसको तो आडवाणी जी ने सभी सांसदों को न्यौता देकर दिखाई और मुझे कई राज्यों से अवार्ड मिले।

टीवी पर क्राइम शो को शुरू करने वाली मेरी टीम थी। मेरे शो के कुछ महीनों बाद देश के बड़े न्यूज चैनल्स ने फिर अपने शो लांच किए।

आपने पंजाब, कश्मीर और पूर्वोत्तर के आतंक को भी कवर किया है। कई आतंकियों के इंटरव्यू लिए हैं। उन अनुभवों के बारे में बताएं।

जी, मैंने पंजाब के आतंक को काफी नजदीक से कवर किया है। एक बार मैं एक आतंकी से मिलकर आया और ‘सहारा‘ में जब खबर छपी तो बाद में मुझे पता चला कि केपीएस गिल साहब की टीम ने सात आतंकी मारे हैं और उनमें एक आतंकी वो भी था।

मुझ पर आतंकी हमला तक हुआ। गनीमत रही कि मेरी जान बच गई, लेकिन मैंने अपना काम नहीं छोड़ा। मैंने कश्मीर में भी बहुत काम किया है। माजिद डार जो हिजबुल का कमांडर हुआ करता था, उसका इंटरव्यू मैंने किया। बाद में उसका भी एनकाउंटर हो गया।

इसके अलावा गाजीबाबा, डॉक्टर नईम जैसे कई आतंकी हैं, जिनको मेरे इंटरव्यू करने के बाद मार दिया गया था। अफजल गुरु का भी मैंने इंटरव्यू किया था। पूर्वोत्तर की बात करें तो कई आतंकियों के मैंने स्टिंग किए और सेना ने मेरी सराहना भी की।

बाहुबली अमरमणि त्रिपाठी का भी मैंने जेल में स्टिंग किया था और उसे अपनी ही सुपारी दे दी थी। बबलू श्रीवास्तव नाम का दाऊद का आदमी नेपाल में वहीं के एक अधिकारी के साथ रहता था और उसका खुलासा मैंने ही किया था। मैंने जर्मनी जाकर बब्बर खालसा के लोगों का स्टिंग किया था।

आप जब मीडिया में इतना अच्छा काम कर रहे थे तो राजनीति में कैसे आ गए? बीजेपी से जुड़ाव कैसे हुआ?

दरअसल, मीडिया में रहते हुए ही मुझ पर आतंकी हमला हुआ था और उसके बाद काफी लंबे समय तक मुझे जेड सुरक्षा दी गई थी। उस सुरक्षा घेरे के कारण मैं कई जगह नहीं जा पाता था।

जब मैं ‘जी‘ में था तब साल 2003 में मैंने बीजेपी से दिल्ली विधानसभा का चुनाव लड़ा था। उसके बाद भी मैंने मीडिया में काम किया, लेकिन मेरी छवि बीजेपी नेता की हो गई थी और साल 2013 के बाद मैं पूर्णकालिक रूप से बीजेपी में ही शामिल हो गया।

पहले मुझे पार्टी ने प्रवक्ता की जिम्मेदारी थी और अब मुझे मीडिया प्रमुख की जिम्मेदारी दी गई है। मैं दिल्ली के सीएम अरविन्द केजरीवाल को एक्सपोज करने में लगा हुआ हूं और मुझे इस कार्य में लोगों का सहयोग भी मिल रहा है। दिल्ली के जल बोर्ड में 57 हजार करोड़ का घोटाला हुआ है, कहीं अस्पताल नहीं बने और कोई बाइक एम्बुलेंस नहीं है।

आपको सोशल मीडिया पर लोगों का अच्छा समर्थन मिल रहा है। क्या भविष्य में केजरीवाल के सामने खड़ा होने की या पार्टी का चेहरा बनने की योजना है?

देखिए, चेहरा तो कमल का फूल है। हम सब उसके तने और शाखाएं हैं, लेकिन जड़ वही है। चेहरा कोई भी हो, मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है। मैंने तो हमेशा कहा है कि मेरी चुनाव लड़ने की कोई इच्छा नहीं है।

मैं तो बस हमेशा पार्टी के संगठन में काम करना चाहता हूं और पार्टी को मजबूत करने की इच्छा है। हर कार्यकर्ता की तरह मेरी भी यही कामना है कि दिल्ली में बीजेपी की सरकार बने और दिल्ली का विकास हो।

समाचार4मीडिया के साथ नवीन कुमार की बातचीत का वीडियो आप यहां देख सकते हैं।

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आज तमाम अखबार या टीवी मीडिया के संपादक डिजिटल को ध्यान में रखकर काम कर रहे हैं: प्रभाष झा

‘हिन्दुस्तान’ की न्यूज वेबसाइट (livehindustan.com) में एडिटर प्रभाष झा को मीडिया के क्षेत्र में काम करने का करीब 20 साल का अनुभव है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Monday, 01 November, 2021
Last Modified:
Monday, 01 November, 2021
Prabhash Jha

‘हिन्दुस्तान’ की न्यूज वेबसाइट (livehindustan.com) में एडिटर प्रभाष झा को मीडिया के क्षेत्र में काम करने का करीब 20 साल का अनुभव है। मूलरूप से मधुबनी (बिहार) के रहने वाले प्रभाष झा ने पत्रकारिता के क्षेत्र में अपने करियर की शुरुआत वर्ष 2000 में बतौर इंटर्न ‘जैन टीवी’ (Jain TV) से की थी। उन्होंने पत्रकारिता में अपने सफर समेत तमाम बिंदुओं पर समाचार4मीडिया के साथ खास बातचीत की है। पेश हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

अपने प्रारंभिक जीवन के बारे में कुछ बताइए और आप मीडिया में कैसे आए?

मेरा जन्म मधुबनी (बिहार) में हुआ और बचपन की शिक्षा वहीं हुई। मेरे पिताजी टाटा स्टील, जमशेदपुर में काम करते थे। जब मैं पांचवी कक्षा में था तो पिताजी को लगा कि ये पढ़ने-लिखने में अच्छा है तो उन्होंने मुझे अपने पास ही बुला लिया और बाद में दसवीं तक मैं वहीं पढ़ा।

उसके बाद इंदौर, नागपुर में आगे की पढ़ाई की। इसके अलावा मैंने ‘आईआईएमसी’ से भी लगभग एक साल का कोर्स किया है। जब मैं नागपुर में था तो उसी समय मीडिया और खबरों से नाता जुड़ने लगा था तो कहीं न कहीं ऐसा लगता था कि शायद मीडिया में ही मेरा भविष्य है और वही हुआ।

आप बिहार से हैं और वहां तो अधिकांश युवा सरकारी अधिकारी बनने का सपना देखते हैं तो आपने जब मीडिया में जाने का सोचा तो घर वालों का रिएक्शन कैसा था? 

देखिए, बिहार के अधिकांश बच्चे जब स्कूल में होते हैं तो वो आईआईटी का सपना देखते हैं और जब वो कॉलेज में होते हैं तो सरकारी अधिकारी बनने का सपना देखते हैं, लेकिन इन दोनों के बीच हकीकत का भी अपना एक महत्व है।

मुझे ऐसा लगता है कि मेरे घर की स्थिति ऐसी थी कि मेरे पास इतना समय नहीं था और मुझे जल्द से जल्द अपने पैरों पर खड़ा होना था वरना बिहार के हर बच्चे की तरह सपना तो मेरा भी सरकारी अधिकारी बनने का ही था।

आपको पहली नौकरी कैसे मिली? उस अनुभव और यात्रा के बारे में बताइए।

जब मैं ‘आईआईएमसी’ पढ़ने आया था तो ऐसा लगता था कि अब आप इधर आ गए हैं तो नौकरी आसानी से मिल ही जाएगी, लेकिन जब आप पढ़कर बाहर निकलते हैं तो आपको समझ आता है कि नौकरी करना इतना भी आसान नहीं है।

उस समय ‘जी न्यूज‘ और ‘आजतक‘ के सिवा कोई था नहीं और डिजिटल का उदय नहीं हुआ था। दीपावली के बाद जब हम छुट्टियों से वापस आए तो मैंने और मेरे कुछ दोस्तों ने कई जगह अपना सीवी देना शुरु किया।

हमें बस किसी जगह दो-तीन महीने अगर इंटर्न का भी काम मिल जाता तो वो आने वाले समय में नौकरी के लिए काम आ सकता था। उस समय ही मुझे ‘जैन टीवी‘ में काम करने का मौका मिला, जिसमें कमाई उतनी नहीं थी। जब अच्छा पैसा मिलने की उम्मीद जगी तो उस समय उनकी आर्थिक स्थिति बिगड़ गई।

उसके बाद या तो पैसे बहुत लेट मिलते थे या मिलते ही नहीं थे। हालांकि बाहर के कुछ अखबार थे, जहां मुझे नौकरी मिल रही थी लेकिन वो एक सोच ऐसी थी कि दिल्ली में रहोगे, तभी बड़ा पत्रकार बन पाओगे। हालांकि, समय कुछ अच्छा न होता देख मैंने भोपाल जाने का निर्णय किया और वहां ‘नवभारत‘ अखबार में मुझे नौकरी मिल गई।

उस समय रहता भोपाल में था, लेकिन मन मेरा दिल्ली में था। उसी दौरान मेरे कुछ मित्रों से जानकारी मिली कि ‘दैनिक जागरण‘ मेरठ में नौकरी है। मुझे खेल पत्रकार के तौर पर उस अखबार में नौकरी मिल गई।

अब मेरे इस काम में सबसे बड़ी समस्या यह आई कि स्पोर्ट्स डेस्क का कोई पत्रकार उस समय संपादक बन जाए, ऐसी कोई उम्मीद नहीं थी और मुझे संपादक बनना था, इसलिए ये बेहद जरूरी था कि मैं जनरल डेस्क पर काम करूं।

उसी दौरान ‘अमर उजाला‘ में बात हुई और मैं देहरादून चला गया। वहां करीब आठ-नौ महीने काम करने के बाद वापस ‘दैनिक जागरण‘ नोएडा में मेरा आना हुआ। इसके बाद मैंने ‘बीबीसी‘ की हिंदी सर्विस में भी काम किया।

वर्ष 2007 में ‘नवभारत टाइम्स‘ अपने डिजिटल की योजनाओं को विस्तार देने में लगा हुआ था और उसी दौरान इसके अच्छे भविष्य को ध्यान में रखते हुए मैंने वहां नौकरी की और उसके बाद संपादक के पद तक पहुंचा। साल 2019 में लगभग 12 साल अपनी सेवाएं देने के बाद मैंने फिर ‘हिंदुस्तान‘ डिजिटल को संपादक के तौर पर जॉइन किया।

आपने शुरू में सिर्फ टीवी में इंटर्नशिप की और उसके बाद कभी टीवी के साथ काम नहीं किया! कोई खास कारण?

जहां तक बात टीवी की है तो मैं ये समझता हूं कि उस समय में टीवी में इतना लिखने का काम था नहीं और दूसरी ओर मेरा शुरुआती अनुभव ही इस प्रकार का रहा कि फिर मैंने कभी टीवी में जाना उचित नहीं समझा।

हालांकि साल 2007 में जब मैं ‘नवभारत टाइम्स‘ को जॉइन कर रहा था उसी समय एक 24 घंटे का चैनल लॉन्च हो रहा था और मेरे कुछ वरिष्ठ सहयोगी वहां थे तो उन्होंने मुझे याद किया, लेकिन मैंने जाना उचित नहीं समझा। दूसरी बात ये कि आप किसी भी माध्यम में हों, मूल काम तो लिखना है।

अगर टीवी के शुरुआती दौर को देखें तो उस समय सिर्फ प्रिंट और रेडियो जर्नलिज्म था और जितने भी लोग टीवी में गए थे, वो यहीं से गए थे। उन लोगों को सिखाने के लिए विदेशी मीडिया के सहयोग से वर्कशॉप भी होती थीं। इसलिए मैंने प्रिंट में काम किया और बाद में डिजिटल में काम किया और मुझे इसमें बड़ी खुशी मिलती है।

‘टाइम्स ग्रुप‘ एक शो तैयार करता है, जिसका नाम ‘फेक इट इंडिया‘ है। आपको दर्शक उस शो में अभिनय करते हुए भी देखते हैं, उसके बारे में बताइए।

दरअसल, वर्ष 2015 के बाद हमने देखा कि ह्यूमर पर आधारित वीडियो काफी तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। उसी कड़ी में नीरज बधवार और हमारी टीम ने एक ऐसे ही शो की योजना बनाई। अगर आप इस शो को देखें तो इसके किरदार आपके जीवन के आस पास के वो ही लोग हैं, जो परेशान हैं।

जब एक आम आदमी की समस्या पर शो करते हैं तो वो सफल भी होता है और लोगों को पसंद भी आता है। आपने देखा होगा कि मेरा किरदार ‘पत्थर दिल बॉस‘ लोगों को पसंद आता है। ऐसे और भी कई किरदार हैं, जो लोगों को बेहद लुभाते हैं।

इस शो की पूरी स्क्रिप्टिंग नीरज बधवार करते हैं और आपको यह जानकार हैरानी होगी कि इस शो के कई एपिसोड का आइडिया तो हमें फिल्म सिटी में चाय की दुकान पर बैठकर आता था।

डिजिटल को आप किस तरह से देखते हैं! क्या टीवी की न्यूज को सोशल मीडिया पर डाल देना ही डिजिटल है या वहां कुछ अलग कंटेंट देना चाहिए?

टीवी में तो अक्सर ऐसा होता है कि वो हर प्रकार के कंटेंट को डिजिटल पर डालते हैं, लेकिन वर्तमान में आप देखिए कि कई मीडिया हाउस ऐसे हैं, जो अब डिजिटल पर आधारित शो बना रहे हैं। जहां तक बात नियमावली की है तो मुझे नहीं लगता कि ऐसा कुछ डिजिटल के लिए सोचा जा सकता है। आज हम सोशल मीडिया के जमाने में जी रहे हैं, जहां एक मिनट में वीडियो वायरल हो जाता है।

हालांकि आज सिर्फ प्रिंट की न्यूज को डिजिटल पर अपलोड करने की प्रवृति बदल गई है। आज तमाम जितने भी बड़े अखबार हैं या टीवी मीडिया के संपादक हैं, वो डिजिटल को ध्यान में रखते हुए ही काम कर रहे हैं।

आज डिजिटल में बड़ी प्रतिस्पर्धा है। कई छोटी-छोटी वेबसाइट्स हैं, जो फालतू और फेक न्यूज बनाकर अच्छे व्यूज ले रही हैं। इस पर आपका क्या विचार है?

पिछले दो साल में जितनी तेजी से कोरोना संक्रमण फैला, उतनी ही तेजी से डिजिटल का काम बढ़ा है। आज ‘फेसबुक‘ और ‘ट्विटर‘ पर जिसका अकाउंट है, वो एक संभावित प्रकाशक है। करोड़ों की आबादी वाले देश में अगर किसी पोर्टल ने लाखों दर्शकों तक कोई गलत सूचना प्रकाशित भी कर दी तो आप उसे किसी भी तरह से रेगुलेट नहीं कर सकते हैं।

हालांकि मुझे पूरी उम्मीद है कि आने वाले समय में ये अच्छा काम कर सकता है। आज आप देखेंगे कि आज से तीन चार साल पहले जो फेक न्यूज थी, वो आज कम हो गई है। आज का जो पाठक है, वो भी थोड़ा समझदार हो गया है और वो अब हर चीज को सोच समझकर शेयर करता है। हर चीज को स्थापित होने में समय लगता है और सबको मिलकर इसके लिए कोशिश करनी होगी।

आपको यह भी ध्यान रखना होगा कि कई लोग ऐसे हैं, जिन्होंने बहुत कम धन राशि में काफी अच्छा काम किया है। ऐसी कई अच्छी वेबसाइट्स हैं, जो सामाजिक मुद्दों पर बेहद अच्छा काम कर रही हैं।मुझे अंत में बस यही कहना है कि किसी माध्यम में अगर लाख अच्छाई है तो बुराई भी होगी, बस हमें उसे मिलकर दूर करना है।

समाचार4मीडिया के साथ प्रभाष झा की बातचीत का वीडियो आप यहां देख सकते हैं।

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गोवा के मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत बोले, मैं हमेशा इन दो चीजों को देता हूं प्राथमिकता

‘बिजनेसवर्ल्ड’ समूह के चेयरमैन व एडिटर-इन-चीफ और ‘एक्सचेंज4मीडिया’ समूह के को-फाउंडर व एडिटर-इन-चीफ डॉ. अनुराग बत्रा ने गोवा के मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत से बातचीत की

Last Modified:
Friday, 22 October, 2021
PramodSawant454787

भारत का एक ऐसा राज्य, जिसकी सुंदरता देश ही नहीं बल्कि विदेशों तक प्रसिद्ध है। इस छोटे से राज्य का नाम सुनते ही पर्यटक रोमांचित होने लगते हैं। जी हां, यहां बात हो रही है गोवा की। गोवा में हर साल 19 दिसंबर को गोवा मुक्ति दिवस मनाया जाता है और इस वर्ष दिसंबर में वह अपनी आजादी के 61वें साल में प्रवेश करेगा। इसी के मद्देनजर ‘बिजनेसवर्ल्ड’ समूह के चेयरमैन व एडिटर-इन-चीफ और ‘एक्सचेंज4मीडिया’ समूह के को-फाउंडर व एडिटर-इन-चीफ डॉ. अनुराग बत्रा ने गोवा के मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत से बातचीत की और जाना कि कैसे यह राज्य स्टार्ट-अप स्पेस में बड़े पैमाने पर प्रगति कर रहा है और कैसे आत्म निर्भरता की ओर आगे बढ़ रहा है।

डॉ. बत्रा- सुबह से लेकर देर रात तक काम को लेकर आपकी क्या दिनचर्या रहती है यानी आप लगातार किस तरह काम करते रहते हैं? 

प्रमोद सावंत- मैं जो भी काम करता हूं, वह अपने राज्य और देश के लिए करता हूं और मुझे सुबह से लेकर शाम तक काम करने में कोई दिक्कत नहीं है। मैं रोजाना 16 से 18 घंटे काम करता हूं और यह काम मै स्वेच्छा से करता हूं।

डॉ. बत्रा- गोवा की आजादी का 60वां साल चल रहा है। अब आगे राज्य के लिए आपकी क्या योजना है? 

प्रमोद सावंत- जिस तरह देश में ‘आजादी का अमृत महोत्सव’ (Azadi ka Amrut Mahotsav) मना रहे हैं, उसी तरह  हम गोवा की आजादी की 60वीं वर्षगांठ यानी 19 दिसंबर 2020 से उत्सव मना रहे हैं। उस कार्यक्रम के उद्घाटन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी मौजूद थे। हमने राज्य में और राज्य से बाहर के लिए तमाम योजनाएं तैयार की थीं, हालांकि महामारी के चलते हम उन योजनाओं का पूरी तरह से क्रियान्वन नहीं कर सके। हालांकि, अगले दो महीनों के लिए हमारे पास कई कार्यक्रम हैं। राज्य में ही कम से कम 60 कार्यक्रम होंगे, इसके अलावा देशभर में भी कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। हम पहले ही सरकार आपके द्वार यानी ‘Government at Your Doorstep’ (Sarkar Tumchya Dari) कार्यक्रम शुरू कर चुके हैं। इसके तहत सभी सरकारी सेवाएं लोगों को उनके घरों पर उपलब्ध होंगी।

डॉ. बत्रा- बेंगलुरु और देश के अन्य स्थानों की तरह गोवा इस तरह नवाचार का केंद्र (Innovation Hub) बनने जा रहा है? 

प्रमोद सावंत- हमने हाल ही में गोवा की कैबिनेट में स्टार्ट-अप नीति में संशोधन किया है। इस नीति को निवेशकों के लिए और यहां स्टार्ट-अप शुरू करने के इच्छुक लोगों के लिए पहले की अपेक्षा अधिक आकर्षक बनाया गया है। निवेशकों को आकर्षित करने के लिए हमने गोवा के टेक्निकल कॉलेजों में प्रतिभा तलाशने के लिए कॉन्क्लेव आयोजित किया था। गोवा को नॉलेज हब के रूप में और बढ़ावा देने के लिए हमने राज्य में निजी विश्वविद्यालय विधेयक पारित किया है। हमने गृह मंत्रालय के परामर्श से राष्ट्रीय फोरेंसिक विज्ञान विश्वविद्यालय शुरू किया है। गोवा में इंटरनेशनल स्कूल ऑफ लॉ शुरू हो रहा है, जो नॉलेज हब के रूप में राज्य के विकास को और गति देगा।

डॉ. बत्रा- गोवा में 500 से ज्यादा आईटी कंपनियां होने के बावजूद इसे आईटी हब बनाने की दिशा में रफ्तार थोड़ी धीमी है। इस रफ्तार को तेज करने के लिए आपके पास क्या प्लान है? 

प्रमोद सावंत- हमने नीति आयोग के इनक्यूबेशन सेंटर्स (incubation centres) विकसित किए हैं। इसे और सुविधाजनक बनाने के लिए हमारे पास डीजे-गिफ्ट (DJ-GIFT) योजना है, जिससे फीस में 50 प्रतिशत तक की कमी आएगी। इससे तकनीकी क्षेत्र में प्रतिभाओं को आकर्षित करने में मदद मिलेगी।

डॉ. बत्रा- कोविड की दूसरी लहर ने पूरे देश को चौंका दिया था और अब तीसरी लहर आने की आशंका जताई जा रही है। ऐसे में कोविड की तीसरी लहर से निपटने के लिए और इसके साथ ही स्वास्थ्य टूरिज्म, टेलिमेडिसिन और इसी तरह की चीजों को प्रमोट करने के लिए आपके पास क्या योजनाएं हैं? 

प्रमोद सावंत- कोविड की दूसरी लहर के दौरान हमने राज्य के लिए आवश्यक बुनियादी ढांचे का विकास किया था। हमने अपनी दीन दयाल स्वास्थ्य सेवा योजना के माध्यम से निजी अस्पतालों में भी मुफ्त इलाज उपलब्ध कराया और ऐसा करने वाला गोवा एकमात्र राज्य है। चाहे एलएमओ (लिक्विड मेडिकल टैंक) हो या ऑक्सीजन जेनरेशन प्लांट, हमारे पास सुपर स्पेशियलिटी अस्पतालों या जिला अस्पतालों में यह उपलब्ध है। हम जल्द ही टेलिमेडिसिन शुरू करेंगे, जिससे राज्य भर के लोगों को फायदा होगा। हम गोवा के लोगों को सर्वोत्तम सुविधाएं प्रदान करने की पूरी कोशिश कर रहे हैं।

डॉ. बत्रा- लोग आपको शिक्षित, प्रगतिशील, विनम्र और कुशल राजनेता के रूप में देखते हैं। लोगों को आपसे बहुत उम्मीदें हैं। अपनी योजनाओं को पूरा करने के लिए आप किस तरह प्राथमिकता सूची तैयार करेंगे?

प्रमोद सावंत- मैं बुनियादी ढांचा और मानव विकास, इन दो चीजों को प्राथमिकता देता हूं। मैं समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचने के लिए काम करता हूं, फिर चाहे वह मामूली बुनियादी ढांचे या प्रमुख बुनियादी ढांचे से जुड़ा हो। जिस तरह से केंद्र सरकार ने ‘आत्मनिर्भर भारत’ योजना शुरू की है, उसी तरह से गोवा सरकार ने भी स्वयंपूर्ण गोवा (Swayampurna Goa) या आत्मनिर्भर गोवा (self-reliant Goa) योजना शुरू की है। इसके तहत गोवा के हर गांव में प्रत्येक शनिवार को एक सरकारी कर्मचारी जा रहा है और लोगों के लिए काम कर रहा है।

डॉ. बत्रा- यह देखते हुए कि गोवा में बुनियादी ढांचा तेजी से विकसित हो रहा है, आप इसका उपयोग गोवा के लोगों को आगे बढ़ाने, अधिक रोजगार और अधिक अवसर पैदा करने के लिए किस तरह करेंगे?

प्रमोद सावंत- चाहे मोपा इंटरनेशनल एयरपोर्ट हो, या नॉर्थ गोवा से साउथ गोवा तक कनेक्टिविटी हो, इन सभी सुविधाओं से पर्यटन उद्योग को फलने-फूलने में मदद मिलेगी। हम सभी के लिए सर्वोत्तम बुनियादी ढांचा उपलब्ध कराने का प्रयास करते हैं। इससे न केवल पर्यटन, बल्कि राज्य में निवेश को भी बढ़ावा मिलेगा।

डॉ. बत्रा- पिछले कुछ वर्षों से खनन का काम नहीं हो रहा है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा खनन पर प्रतिबंध लगाए जाने के साथ ही पुराने खनन पट्टे समाप्त हो चुके हैं अथवा निलंबित हो चुके हैं। यदि आपकी सरकार वापस आती है तो क्या खनन प्रतिबंध का कोई समाधान निकाला जाएगा? 

प्रमोद सावंत- जब से मेरी सरकार सत्ता में आई है, हम पहले ही खनन निगम बना चुके हैं। हम यहां के लोगों को आर्थिक विकास प्रदान करते हुए राज्य में खनन गतिविधियों में तेजी लाने के कई तरीकों का पता लगाने के साथ-साथ इस कार्यकाल में ही लीज की गतिविधियों की शुरुआत कर रहे हैं। मैं खुद खनन क्षेत्र से आता हूं और महसूस करता हूं कि लोगों के लिए खनन शुरू करना कितना महत्वपूर्ण है। सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के अनुरूप हम इन तीन महीनों में खनन गतिविधियां शुरू करेंगे। इसके तहत हम विभिन्न गतिविधियों को शुरू और प्रोत्साहित कर रहे हैं।

डॉ. बत्रा- चुनाव के बाद यदि आप गोवा के मुख्यमंत्री के रूप में वापस आएंगे तो गोवा के लिए आपका क्या विजन है?

प्रमोद सावंत- मैं ये नहीं कह सकता हूं कि 2022 के चुनाव में कौन जीतेगा और कौन मुख्यमंत्री बनेगा। लेकिन मैं पक्के तौर पर कह सकता हूं कि 2022 में हमारे मौजूदा प्रधानमंत्री के नेतृत्व में बीजेपी की सरकार आएगी। आत्मनिर्भर भारत के तहत हम पर्यटन उद्योग को बढ़ावा दे रहे हैं, जो हमारा प्राथमिक उद्योग है। चाहे वह नीली क्रांति हो, हरित क्रांति हो या श्वेत क्रांति हो, हम इसे राज्य में बढ़ावा दे रहे हैं। हम भारत सरकार के सहयोग से मछली पालन को बढ़ावा दे रहे हैं, जिसमें निर्यात भी शामिल है। जब मैं हरित क्रांति की बात करता हूं, तो इसमें हम घरेलू स्तर पर उन कृषि उत्पादों का उत्पादन कर रहे हैं, जिनका हम पहले आयात कर रहे थे। हम पहले दूसरे राज्यों से दूध आयात कर रहे थे, लेकिन घरेलू उत्पादन के लिए इसे प्रोत्साहित किया जा रहा है। चाहे वह कोई भी उद्योग हो, कृषि हो, युवा हो या महिलाएं, हम सभी के विकास को बढ़ावा देने का प्रयास कर रहे हैं।

इसके अलावा हम आईटी, शिक्षा और समुद्री उद्योग को प्रोत्साहित कर रहे हैं, जो पर्यावरण के अनुकूल भी हैं। मेरा विजन गैर प्रदूषणकारी उद्योगों को बढ़ावा देना है, और गोवा के लोग जानते हैं कि गोवा में 60 में पहली बार हमने आत्मनिर्भर/स्वयंपूर्ण गोवा को बढ़ावा दिया है।

डॉ. बत्रा- गोवा के लोगों, विशेषकर उद्यमियों और व्यापारियों से आपकी क्या अपेक्षा है? कोविड की दूसरी लहर में लघु और मध्यम उद्योगों (SMEs) पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा था, इसे देखते हुए गोवा के संपन्न व्यवसाइयों से आप क्या चाहते हैं? 

प्रमोद सावंत- कोविड के दौरान भी हमने लघु और मध्यम उद्योगों (SMEs) की हर तरह से मदद की थी। मैं राज्य के संपन्न उद्योगपतियों से केवल यही अनुरोध करूंगा कि वे गोवा के लोगों को अपने उद्यमों में रोजगार दें। आत्मनिर्भर भारत के तहत लघु और मध्यम उद्योगों के लिए जो भी लाभ थे, हमने उसे स्थानीय बैंकरों के सहयोग से स्थानीय उद्यमों को दिया। आत्मनिर्भर भारत की तरह ही मेक इन इंडिया की अवधारणा को भी केंद्र सरकार द्वारा प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। यह आवश्यक है कि गोवा में कुशल जनशक्ति (skilled manpower) का उपयोग किया जाए, जिसके लिए हम अप्रेंटिसशिप (apprenticeship) के माध्यम से बड़ी संख्या में लोगों की मदद कर सकते हैं। यहां मैं यह भी बताना चाहूंगा कि इस महामारी के दौरान हमने MSMEs को राहत के रूप में 500 करोड़ का वितरण किया है। हम आरएसएल प्लेटफॉर्म (RSL platform) का उपयोग करने वाले और राज्य में छूट प्रणाली (discounting system) तैयार करने वाले पहले राज्य हैं, ताकि गोवा राज्य में अर्थव्यवस्था का प्रवाह निर्बाध रूप से हो।

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दुर्भाग्य है कि आज की पत्रकारिता सिर्फ ग्लैमर में फंसकर रह गई है: श्रवण गर्ग

वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग के पास 50 साल से भी अधिक पत्रकारिता का अनुभव है। इतने वर्षों में उन्होंने अंग्रेजी, हिंदी और गुजराती के विभिन्न अखबारों में महत्वपूर्ण पदों पर कार्य किया है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Saturday, 16 October, 2021
Last Modified:
Saturday, 16 October, 2021
Shravan Garg

वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग के पास 50 साल से भी अधिक पत्रकारिता का अनुभव है। इतने वर्षों में उन्होंने अंग्रेजी, हिंदी और गुजराती के विभिन्न अखबारों में महत्वपूर्ण पदों पर कार्य किया है। एक रिपोर्टर और सब-एडिटर के रूप में अपनी यात्रा शुरू करने वाले श्रवण गर्ग ने शीर्ष संपादकीय दायित्वों का निर्वहन किया है। प्रस्तुत हैं समाचार4मीडिया की उनसे बातचीत के प्रमुख अंश-

आपने अपने जीवन के 50 वर्ष पत्रकारिता को दिए हैं। अपने प्रारंभिक जीवन और शिक्षा के बारे में कुछ बताइए।

मेरी शिक्षा तो सरकारी स्कूल में ही हुई है। उस समय सिर्फ सरकारी स्कूल में जिनकी फीस भी बेहद कम होती थी, मेरे ख्याल से मेरी फीस कोई 25 पैसे महीना थी। लेकिन अब वो सरकारी इमारतें ध्वस्त हो चुकी हैं। उनके साथ भी वही हुआ है, जैसा बाकी सरकारी संस्थानों के साथ होता आया है। चिमनी की रोशनी में पढ़े, नंगे पैर चले और किराए की साइकिल लेकर 15 रुपये महीने में ट्यूशन पढ़ाकर काम चलाते थे।

जीवन में ऐसा अनुभव होता है कि बचपन देखा ही नहीं, परिवार और मेरा दोनों का संघर्ष चलता रहा। वैसे मैं छोटी उम्र में ही पढ़ने-लिखने लग गया था, इसलिए शायद मन हमेशा से लेखन में ही रहा। इंजीनियरिंग भी की और कलकत्ता (अब कोलकाता) नौकरी करने भी गया, लेकिन 1966 में नौकरी छोड़कर वापस आ गया। तबसे आज तक पत्रकारिता ही कर रहा हूं। इंग्लिश, हिंदी और गुजराती भाषा में भी काम किया, पूरा देश घूमा और खूब अनुभव लिया।

आपने पत्रकारिता की पढ़ाई कहां से की? उसके बारे में बताइए।

देखिए, ये पढ़ाई तो बस एक बहाना है। इस फील्ड की कोई पढ़ाई नहीं होती है, ये तो जीवन से निकलती है। वैसे, भारतीय विद्या भवन से पढ़ाई की। उसके बाद स्कॉलरशिप पर लंदन, ऑस्ट्रिया, जापान जैसी जगह पर भी सीखने का मौका मिला, लेकिन मेरा कहना है कि ये पत्रकारिता तो जीवन के अनुभव से आती है।

हमारी पत्रकारिता पश्चिम से थोड़ी अलग है। वैसे हमारे यहां अखबार और प्रिंटिंग मशीन आजादी के काफी पहले ही आ गए थे, लेकिन फिर भी हमारी पत्रकारिता आजादी से निकली हुई है। वैसे भी आजकल तो लगभग हर नागरिक ही पत्रकारिता कर रहा है, उसके पास न तो डिग्री है और न ही अनुभव है। जिसके मन में जो आ रहा है, वो बोले जा रहा है। इसलिए मुझे लगता है कि आज तो देश में करोड़ों पत्रकार हैं। जो मुख्यधारा के पत्रकार हैं, वो भी सरकार के नजदीक ही नजर आ रहे हैं।

आपने 70 के दशक में बिहार आंदोलन को देखा, किताब भी लिखी, उस अनुभव के बारे में बताएं।

वो तो बड़े रोमांचक अनुभव रहे थे। उस समय इंदिरा जी के खिलाफ आंदोलन था और उस समय मैं जयप्रकाश नारायण जी के साथ सहयोगी के तौर पर था। मैं पूरे देश में उन दिनों घूम रहा था। उस समय हम ‘इंडियन एक्सप्रेस‘ में काम कर रहे थे और उस दौर में काम करने का एक अलग ही रोमांच था। आपातकाल लागू हो गया था और लगातार पाबंदी लगाई जा रही थी। उस दौर में भी हमने काम करने का साहस दिखाया था, आज के समय को देखकर ऐसा लगता है कि कुछ डरे हुए पत्रकार हैं या कुछ गुलाम पत्रकार हैं। उस समय स्पष्ट था कि कौन पत्रकार समर्थन में है और कौन विरोध में है! आज किसी पत्रकार को देखकर आप अंदाजा नहीं लगा सकते हैं कि वो क्या करेगा?

वो दौर अलग था और उस समय के पत्रकार और लेखन शैली वापस नहीं लाई जा सकती है। आज लोगों को सिर्फ एकतरफा जानकारी मिल रही है, जो उनके लिए ठीक नहीं है। उस समय मोबाइल नहीं थे और पत्रकार फील्ड पर होता था, उसे किसी भी हालत में शाम तक अपनी स्टोरी टाइप करने वापस आना होता था, क्योंकि उस जमाने में हम टाइपराइटर पर लिखा करते थे। उस समय एक जुनून था, जिसकी आज मुझे कमी नजर आती है। दुर्भाग्य है कि आज की पत्रकारिता सिर्फ ग्लैमर में फंसकर रह गई है और एंकर पर निर्भर हो गई है। और देखिए मैं कोई आरोप नहीं लगा रहा हूं। दरअसल, आज जब हम किसी एंकर को कोसते हैं तो वो गलत है, क्योंकि उसके पीछे एक पूरी टीम काम करती है। कई बार संस्थान के कुछ ऐसे हित होते हैं, जो हमें दिखाई नहीं देते हैं और हम पूरा दोष कई बार एंकर पर लगा देते हैं। आज टीवी में आपको क्राइम, स्पोर्ट्स और ग्लैमर ही दिखाई देता है और आजकल तो पॉजिटिव न्यूज का भी एक दौर आ गया है।

आपने चंबल के डाकुओं का आत्मसमर्पण देखा है। आपकी किताब भी काफी प्रसिद्ध हुई। उस दौर के अनुभव बताइए।

आज के समय में वो अनुभव करना कठिन है। उस समय करीब 500 गिने-चुने डाकू थे, लेकिन आज देखा जाए तो लाखों-करोड़ों ‘डाकू’ हो गए हैं। अप्रैल 1972 में डाकुओं का समर्पण हुआ और उसे मैंने बड़े करीब से अनुभव किया था। वो भी एक बड़ा रोमांचक अनुभव था, जब चंबल में रहना पड़ा। उस दौर की कल्पना करना ही आज मुश्किल है। खूंखार डाकुओं से मैंने बात की और उनके इंटरव्यू भी किए। उनके आत्मसमर्पण की पक्रिया भी काफी लंबी चली थी।

उस समय सरकारों से बात करना, उनसे सहमति लेना बड़ा काम था। मैं आपको बता दूं कि इस कार्य की बुनियाद बिनोवा भावे ने 1960 में रखी थी, उनके सामने भी डाकुओं का आत्मसमर्पण हुआ था। आज तो समर्पण इस समाज से खत्म हो गया है, सीधे एनकाउंटर कर दिया जाता है। उस समय जयप्रकाश नारायण को इंदिरा जी और एमपी के सीएम से समर्थन भी मिला था, जब उन्होंने डाकुओं के आत्मसमर्पण की बात की थी।

हमने अक्सर ऐसा सुना है कि उस जमाने में डाकू सिर्फ अमीरों को परेशान करते थे, महिलाओं-बच्चों को नहीं मारते थे। क्या आपने ये सब अनुभव किया, जब उनसे बात की?

आदमी डाकू क्यों बनता था? दरअसल, वो एक ऐसे तबके से ताल्लुक रखता था, जिसको प्रताड़ित किया गया है। इसलिए उसको लोगों से मदद मिलती थी। गांव के लोगों से भी मदद मिलती थी। डाकू के पास कोई बैंक तो होता नहीं तो वो धन गरीबों में बांट देता था। उस समय तो आदमी सिर्फ अपमान का बदला लेने के लिए कई बार डाकू बन जाता था। आज भी हमारे यहां नक्सल की समस्या है। उस समय डाकू थानों को लूटकर हथियार जमा कर लेते थे। हालांकि किसी प्रकार की हिंसा का समर्थन नहीं किया जा सकता है। जेपी आंदोलन का तो मकसद ही यही था कि हिंसा से सदैव दूर रहना है। उस समय राजमाता सिंधिया जी तो साफ़ कहती थीं कि इनका महिमामंडन नहीं होना चाहिए। वो डाकुओं के समर्पण के बिल्कुल खिलाफ थीं।

आपने जीवन के 50 साल मीडिया को दिए हैं। क्या कुछ ऐसे लोग याद आते हैं, जिनका व्यक्तित्व अद्वितीय था! जिनकी लेखन क्षमता मन को मोहने वाली थी? 

मैंने तो इन 50 सालों में हिंदी और अंग्रेजी के जितने भी बड़े नाम हैं, सबके साथ काम किया है। जिस छत के नीचे उन्होंने काम किया, उसी छत के नीचे मैंने भी काम किया है। कुछ नाम मैं लेना चाहूंगा और जिनमें पहले हैं राजेंद्र माथुर जी,  उनके साथ मैं काफी जुड़ा रहा और मेरे भावनात्मक संबंध भी उनके साथ थे। उनकी ईमानदारी, बेबाक बोलना, उनकी लेखन क्षमता आज भी याद आती है। दूसरे हैं प्रभाष जोशी जी, उनके साथ वर्षों काम करने का मौका मिला और शानदार अनुभव रहे। इसके अलावा वेद प्रताप वैदिक जी, उनके साथ भी बड़े अच्छे संबंध रहे और आज भी हैं।

ऐसे बहुत नाम हैं लेकिन ये तीन का नाम मैं प्रमुखता से लेना चाहूंगा। आज हिंदी मीडिया के जितने भी बड़े संपादक हैं, उन्होंने मेरे साथ कभी न कभी काम किया है और सब अच्छे हैं, जवान हैं और अच्छा काम कर रहे हैं। कई बड़े संपादक ‘नई दुनिया‘ से निकले हैं और उसका सबसे बड़ा कारण यह है कि वो एक लोकतांत्रिक अखबार है। उस समय में इस अखबार का एमपी ही नहीं, बल्कि पूरे देश में बड़ा नाम था लेकिन आज वो चीज बची नहीं है। आज के समय में अगर आप मुझसे पूछेंगे कि हिंदी का कौन सा अखबार आप पढ़ना चाहेंगे तो मुझे आधा घंटा सोचना पड़ेगा कि मैं आपके सवाल का क्या जवाब दूं? जब मैं ‘दैनिक भास्कर‘ में था तो दबाव हमारे ऊपर भी आता थे, लेकिन हम उसे झेलते थे। उस समय हमारे मालिकों का हमें पूरा समर्थन होता था। आज के समय में जिस तरह एक विचारधारा का प्रभाव मीडिया पर आ गया है, उस दौर में मालिकों के लिए भी बड़ा मुश्किल हो गया है।

समाचार4मीडिया के साथ श्रवण गर्ग की बातचीत का वीडियो आप यहां देख सकते हैं।

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मीडिया में आप जीवन के इतने आयाम देख लेते हैं, जो कहीं और संभव नहीं हैं: पंकज शर्मा

कांग्रेस नेता और वरिष्ठ पत्रकार पंकज शर्मा ने अपनी जीवन यात्रा के बारे में समाचार4मीडिया के साथ बातचीत की है। इस इंटरव्यू में आप उनके जीवन के कुछ ऐसे पहलू जान पाएंगे, जो आपको अब तक ज्ञात नहीं हैं।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Saturday, 09 October, 2021
Last Modified:
Saturday, 09 October, 2021
Pankaj Sharma

कांग्रेस नेता और वरिष्ठ पत्रकार पंकज शर्मा ने अपनी जीवन यात्रा के बारे में समाचार4मीडिया के साथ बातचीत की है। इस इंटरव्यू में आप उनके जीवन के कुछ ऐसे पहलू जान पाएंगे, जो आपको अब तक ज्ञात नहीं हैं। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

अपने प्रारंभिक जीवन के बारे में कुछ बताइए। मीडिया में कैसे आना हुआ?

मेरा जन्म तो मध्य प्रदेश के चंबल इलाके में हुआ है। मेरे पिता सरकारी अधिकारी थे और गांधीवादी विचारों को मानते थे। मेरे ऊपर उनका बड़ा प्रभाव रहा। मेरा बचपन तो आप यूं कह लीजिए कि चंबल के बीहड़ों और आदिवासी इलाकों में ही बीता है। माध्यमिक शिक्षा तक कस्बे तक आना हुआ और आगे की पढ़ाई शहरों में हुई है। इंदौर से मुझे पोस्ट ग्रेजुएशन करने का मौका मिला। चूंकि मेरे नानाजी अध्यापक थे, तो मेरी पट्टी पूजा भी ननिहाल में ही हुई थी। गर्मियों की छुट्टी में अक्सर वहां जाने का मौका मिल जाया करता था और काफी कुछ सीखने को मिलता था। जहां तक बात मीडिया जगत में आने की है तो मैंने ऐसा कभी कुछ सोचा नहीं था। छात्र जीवन से ही पढ़ने लिखने का शौक था, इसके अलावा वाद विवाद और निबंध प्रतियोगिता में भी मैं विजयी रहता था तो शायद इसका असर मुझ पर था। वहीं मेरे पिताजी तो चाहते थे कि बेटा पढ़-लिखकर सरकारी अधिकारी ही बने, लेकिन मैं उतना मेधावी नहीं था। मेरा ध्यान दूसरी गतिविधियों में अधिक रहता था-जैसे खेलकूद, वाद-विवाद और साहित्य में, तो मेरे सरकारी अधिकारी या डॉक्टर बनने की संभावना शून्य ही थी।

जब मैंने बीएससी में दाखिला लिया तो मैं प्रायोगिक परीक्षा में अनुत्तीर्ण हो गया था। इसके बाद तो मुझे पिताजी ने भी कह दिया कि विज्ञान तुम्हारे बस का नहीं है। इसके बाद मैंने अपनी आगे की पढ़ाई कला संकाय से की। इसके बाद मेरे जीवन में कुछ अहम मोड़ आए। दरअसल, राजेंद्र माथुर जी से तो छात्र जीवन से मेरा परिचय था, उस समय ‘नई दुनिया‘ अखबार पूरे देश और प्रदेश में प्रसिद्ध था। उस समय ‘टाइम्स ऑफ इंडिया‘ का अपना खुद का एक प्रशिक्षण संस्थान था और वो पूरे देश से सिर्फ दो हिंदी पत्रकारों को चुनते थे। इसके बाद मुंबई में उनको प्रशिक्षण दिया जाता था और उसके बाद उन्हें नौकरी दी जाती थी। साल 1979 में मैंने एमए फाइनल की परीक्षा दी ही थी कि वो विज्ञापन निकला और मेरे मन में भी इच्छा जाग उठी। उसमें चयनित होने के लिए किसी भी ज्वलंत मुद्दे पर 4000 शब्दों का एक लेख लिखकर देना होता था फिर अगर उनको ठीक लगता तो आगे जो चयन के चरण थे, उनको आपको पार करना होता था।

उस समय अटल जी विदेश मंत्री थे और चीन का दौरा बीच में छोड़कर आ गए थे। मैंने उसी मुद्दे पर लेख लिखा और मेरा चयन आगे के चरण के लिए हुआ। इस लेख को लिखने के लिए राजेंद्र माथुर जी ने न सिर्फ मुझे मार्गदर्शन दिया बल्कि मुझे ‘नई दुनिया‘  का पुस्तकालय भी मुहैया करवाया गया। लेख के बाद एक लिखित परीक्षा होती थी और उसके बाद अंतिम चरण साक्षात्कार होता था। मेरा सौभाग्य रहा कि मेरा चयन किया गया और मुझे एक वर्ष के उस प्रशिक्षण कार्यक्रम के लिए चुना गया। काम मुझे मुंबई ही करना था, लेकिन उन्होंने मुझे दिल्ली भेजा और इस प्रकार मुझे ‘टाइम्स ग्रुप‘ के साथ जुड़ने का मौका मिला और ‘नवभारत टाइम्स‘ के साथ जो मेरी यात्रा शुरू हुई, वो कभी खत्म नहीं होने वाली थी। मैंने जब मीडिया छोड़ा तब भी मैं वहीं था। मैंने अपने जीवन में कभी कोई दूसरी नौकरी नहीं की है।

जैसा कि आपने बताया कि ‘टाइम्स ऑफ इंडिया‘ समूह खुद ही पत्रकारों को प्रशिक्षित करता था, जरा उसके बारे में कुछ बताइए।

उस समय में ‘टाइम्स ऑफ इंडिया‘ में चयनित होने का मतलब बड़ी सफलता माना जाता था। हमें टाइपिंग सिखाई जाती थी और स्टेनोग्राफी भी, इसके अलावा बहुत कुछ पढ़ाया और सिखाया जाता था। पत्रकारिता के क्या नियम कायदे और कानून हैं, इसकी समझ भी विकसित की जाती थी। इसके अलावा बीच-बीच में छोटे प्रोजेक्ट्स पर भी काम करवाया जाता था। वहीं एक अखबार भी निकलता था तो उसमें भी काम करने का मौका मिलता था। इसके अलावा अखबार की प्रिंटिंग कैसे होती है, वो सिखाया और समझाया जाता था। आज समस्या यह है कि तमाम पत्रकारों को इस बात की जानकारी ही नहीं है कि आपका अखबार छपने की पूरी प्रक्रिया क्या है। उस समय एक जुड़ाव होता था। अपने लिखे हुए को मुद्रित देखना एक सुखद अनुभव होता था, पर आज के समय में उस भावना की कमी मैं महसूस करता हूं।

जैसा कि आपने बताया कि आपने एक संस्थान में ही नौकरी की है तो आप उस दौर के अपने अनुभव के बारे में कुछ बताइए।

अनुभव तो बेहद ही शानदार रहे हैं। मुझे ऐसा लगता है कि ये मीडिया एक ऐसी दुनिया है, जिसमें आप जीवन के इतने आयाम देख लेते हैं, जो कहीं और संभव नहीं है। मैंने साहित्यकारों, राजनेताओं और समाजसेवियों के इंटरव्यू तो लिए ही हैं, पर भिंडरावाला जैसे आतंकी तक के इंटरव्यू करने का मुझे मौका मिला। मीडिया ही एक ऐसा पेशा है, जिसमें आपको दुनिया भर के लोगों से मिलने-जुलने का मौका मिलता है, इंटरव्यू करने का मौका मिलता है और समझने का भी मौका मिलता है। जब राजीव गांधी देश के प्रधानमंत्री थे, तो श्रीलंका में भारत ने शांति सेना भेजी थी। उस समय जाफना के जंगलों से भी मैंने रिपोर्टिंग की है। वो एक ऐसा समय था, जब रिपोर्टिंग करने के खुलकर मौके दिए जाते थे। मुझे बहुत अच्छा लगता है, जब मैं अपने उन दिनों को याद करता हूं। मैंने जो लिखा है, उस पर मैं एक किताब भी लाने की सोच रहा हूं और जब भी मैं उसे पढ़ता हूं तो मुझे अच्छा लगता है कि आज के दौर से तो कम से कम उसकी तुलना नहीं हो सकती है।

अपने रिपोर्टिंग के दिनों में कोई ऐसी घटना याद आती है जो आप साझा करना चाहेंगे?

बिल्कुल, पंजाब के स्वर्ण मंदिर की घटना हम सबको याद है। उस समय आतंक अपने चरम पर था। उसके कई किस्से दिल में हैं। इसके अलावा जब एक बार मैं अमेरिकी सरकार के बुलावे पर वहां गया था तो मुझे पता चला कि किसी खालिस्तान के आतंकी ने अपनी सरकार वहां बना रखी थी और खुद स्वयंभू प्रेजिडेंट बनकर राज कर रहे थे। मैं उनसे मिला, उन्होंने मुझसे कहा कि आजकल पत्रकार के रूप में भी ‘रॉ‘ (RAW) के एजेंट घूमते हैं और ऐसी कई बातें मुझसे कहीं। अंत में जब मैं जाने लगा तो मुझसे कहा कि पंकज जी आपसे अगली मीटिंग अब खालिस्तान में होगी। मैंने उनसे कहा कि आपका ये सपना तो पूरा हो नहीं पाएगा।

इसके बाद वो मुझे उनके साहित्य, वीडियो कैसेट, ऑडियो कैसेट का एक बैग देने लगा, फिर उन्होंने मुझसे कहा कि ये हम आपके पते पर पहुंचा देंगे, लेकिन हुआ ये कि वो मेरे भारत के पते पर चला गया और उस समय ऐसा संवेदनशील पार्सल किसी के घर जाना बड़ी बात थी तो आईबी के लोग मेरे घर आ गए और उस वक्त सिर्फ मेरी पत्नी वहीं थी। हालांकि उस समय राजेश पायलट जी थे और पीएम भी जानते थे, अखबारों में मेरी स्टोरी छप ही रही थी, तब जाकर आईबी वालों ने इस घटना को हल्के में लिया। मैं तो बस एक ही बात कहता हूं कि मेरे मीडिया के सफर में सड़कों की धूल से पाला पड़ा है, जंगलों की ख़ाक छानी है और आलीशान होटलों में पैर भी पसारे हैं। एक बात और मैं आपको बताऊं कि उड्डयन मंत्रालय से जुड़ी खबरों को तो समाचार पत्रों में जगह ही नहीं दी जाती थी, फिर मैंने इस विषय पर लिखना शुरू किया। एसपी सिंह ने मुझे मौका दिया तो उस समय भी नेवी, आर्मी और अधिकारियों के साथ खूब घूमने का मौका मिलता था।

आपने अपने इस सफर में कई बड़े पत्रकारों और संपादकों के साथ काम किया होगा। किसी की याद आती है, जिसने आपको निखारा हो?

इस विषय में तो मैं दो-तीन लोगों का नाम लेना चाहूंगा। एक राहुल बारपुते जी जो कि ‘नई दुनिया‘ के प्रधान संपादक थे। मैं कभी उनके साथ काम नहीं कर पाया, लेकिन मेरी लेखनी पर उनका प्रभाव सदैव रहा है। मैं उनसे अक्सर मिलता भी रहता था। इसके अलावा पत्रकारिता के संस्कार मेरे अंदर राजेंद्र माथुर जी से आए। एक सकारात्मक सोच उनके मार्गदर्शन में मेरी बनी। आखिर में एसपी सिंह, उनके अंदर एक अलग प्रकार की चेतना और समझ थी, उन्होंने मुझे बहुत काम करने का मौका दिया। मेरे जीवन में इन तीन लोगों का मार्गदर्शन मेरे बहुत काम आया है।

आपने ‘नवभारत टाइम्स‘ में कई पदों पर कार्य किया है। आपको ऐसा नहीं लगता कि आपको संपादक होना चाहिए था? क्यों नहीं बने?

मुझे लगता है कि मुझे इस पद पर बिठाना किसी के लिए आसान नहीं होता। वैसे मुझे ऐसा लगता है कि राजेंद्र माथुर जी का इतना जल्दी दुनिया से चले जाना मेरे संपादक बनने की राह का सबसे बड़ा रोड़ा था। अगर वो जीवित होते तो मैं जरूर संपादक बनता। वैसे भी मेरे जैसे व्यक्ति के साथ समाजोयन कर पाना बड़ा कठिन काम है। मैं हर काम को अकेले ही करना पसंद करता हूं। इसलिए मुझे लगता है कि मैं संपादक शायद ही बन पाता और मैं अपने जीवन से खुश हूं।

आपने मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ के मीडिया सलाहकार के तौर पर काम किया है। क्या आपने मीडिया पर दबाब बनाया?

आपने बहुत अच्छा सवाल किया है। मैं आपको बताऊं कि जब मैं कमलनाथ जी का मीडिया सलाहकार बना तो मैंने पहले ही दिन उनसे कह दिया कि मैं मीडिया में सरकार का नहीं, बल्कि सरकार में मीडिया का प्रतिनिधि हूं और मैं जो काम करूंगा मीडिया के हित में करूंगा और वही मैंने किया था। मुझे इस बात की ख़ुशी है की इस बाबत मुझे कमलनाथ जी का पूरा सहयोग प्राप्त हुआ।

वर्तमान में आप कांग्रेस पार्टी से जुड़े हुए हैं, वहां आपको क्या जिम्मेदारी मिली हुई है, उसके बारे में कुछ बताइए।

जब मैंने ‘एनबीटी‘ छोड़ा तो सोनिया गांधी जी ने मुझे कांग्रेस के मुखपत्र ‘कांग्रेस संदेश‘ में काम करने का मौका दिया। करीब तीन साल तक मैं उस मुखपत्र से जुड़ा रहा। उसके बाद जब वह अध्यक्ष बनीं तब उन्होंने मुझे राष्ट्रीय सचिव बना दिया। वर्तमान में कांग्रेस पार्टी के हिंदी विभाग में मुझे राष्ट्रीय सचिव की जिम्मेदारी मिली हुई है। बात रही योजनाओं की तो मैं मानता हूं कि आपकी बनाई गई योजनाओं से कुछ नहीं होता है और राजनीति में तो आप भूल ही जाइए। वर्तमान में इंदौर लोकसभा में सक्रिय हूं और मैंने तो तय किया हुआ है कि जब भी मौका आएगा, जीतने के लिए या हारने के लिए ही सही, मैं लोकसभा का चुनाव लडूंगा। नमस्कार।

समाचार4मीडिया के साथ पंकज शर्मा की बातचीत का वीडियो आप यहां देख सकते हैं।

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अगर आप हार्डकोर रिपोर्टर नहीं हैं तो कभी भी अच्छे एंकर नहीं बन सकते हैं: भूपेंद्र चौबे

वरिष्ठ पत्रकार भूपेंद्र चौबे वर्तमान में ‘इंडिया अहेड’ (India Ahead) के एडिटर-इन-चीफ हैं। इन्होंने मीडिया जगत को बड़ी बारीकी से जाना और समझा है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Saturday, 02 October, 2021
Last Modified:
Saturday, 02 October, 2021
Bhupendra Chaubey

वरिष्ठ पत्रकार भूपेंद्र चौबे वर्तमान में ‘इंडिया अहेड’ (India Ahead) के एडिटर-इन-चीफ हैं। इन्होंने मीडिया जगत को बड़ी बारीकी से जाना और समझा है। समाचार4मीडिया के साथ एक खास बातचीत में भूपेंद्र चौबे ने अपने इस सफर के बारे में विस्तार से बताया है। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

आपने एक लंबा सफर मीडिया में तय किया है। अपने प्रारंभिक जीवन के बारे में कुछ बताइए।

मेरा जन्म बनारस में हुआ, मेरे पिताजी (अब दिवंगत) दिल्ली विश्वविद्यालय में अध्यापक थे। मेरी चार बड़ी बहनें थीं और मैं सबसे छोटा था। पढ़ाई वैसे ही हुई जैसे एक मिडिल क्लास के बच्चे की होती है। चीजों को संभाल कर रखना, एक-एक पैसा बचाकर चलना, सच कहूं तो वो संस्कार आज भी मेरे अंदर जीवित हैं। हमारे पास स्कूल फीस भरने तक के पैसे कई बार नहीं होते थे, इसलिए उस कठिन समय की छाप आज भी मेरे अवचेतन पर मौजूद है लेकिन वो समय बेहद सुखद भी था। दरअसल, सबके पास एक-दूसरे के लिए समय होता था, लेकिन आज ऐसा नहीं है। ऐसा लगता है कि जिंदगी की भागदौड़ में वो समय अब किसी के पास नहीं रहा। बचपन से ही डिबेट में भाग लेना अच्छा लगता था, निबंध प्रतियोगिता में कई बार मैं विजयी हुआ तो समाज से एक जुड़ाव तो बचपन में ही हो गया था। मुंबई में जब मैं मास्टर्स करने गया तो वहां जीवन में एक अहम मोड़ आया। दरअसल, मेरे कुछ साथियों ने मुझसे कहा कि तुम्हें सामाजिक विषयों की इतनी अच्छी समझ है तो मीडिया और संचार के फील्ड में क्यों नहीं जाते? वहीं मुझे किताबें पढ़ने और फिल्में देखने का बड़ा शौक था तो वो बात मेरे दिमाग में बैठ गई। फिर मैंने एक छोटा सा कोर्स भी कर ही लिया, उस वक्त मेरा बस एक ही सपना था कि अपनी खुद की फिल्म लिखूं और उसे खुद ही निर्देशित करूं, लेकिन जैसा कि आप जानते हैं, वो सपना अधूरा रह गया।

जैसा कि आपने बताया कि आपने मीडिया और संचार में पढ़ाई की तो पहली नौकरी आपको कैसे मिली?

वो किस्सा भी दिलचस्प है। दरअसल, मेरे सास और ससुर का शिष्य ‘आजतक’ में काम करता था। उस दौर में ‘आजतक’ सिर्फ एक घंटे का बुलेटिन बनाया करता था। उस शिष्य ने मेरी पत्नी से मेरे बारे में बात की और मेरी पत्नी ने फिर मुझसे बात की। उस वक्त ‘आजतक’ और ‘एनडीटीवी‘ दो बड़े नाम थे तो मेरी पत्नी ने ही मेरा सीवी बनाकर भेज दिया था। उन्होंने मेरा बड़ा अच्छा सीवी बनाया और लगभग हर महीने वो ऐसा करती थीं, जबकि मैं उन सब बातों को भूल चुका था। ऐसे ही एक दिन फिर मुझे प्रणब रॉय के ऑफिस से कॉल आया और उस समय में देहरादून में ऐड फिल्म की शूटिंग कर रहा था जो कि केतन मेहता जी के साथ थी। इसके बाद मैं जब प्रणव जी से मिलने गया तो उन्होंने मुझसे कहा कि ये जो तुम्हारा सीवी है, वो इतना परफेक्ट है कि इसकी तारीफ़ में उनके पास शब्द नहीं हैं। ये सब मेरी श्रीमती जी का कमाल था। इसके बाद मैंने प्रणव जी से कहा कि मुझे सिनेमा में रुचि है तो उन्होंने मुझसे कहा कि तुम बतौर वीडियोग्राफर हमसे जुड़ जाओ। वो मीडिया में मेरी पहली नौकरी थी और उस समय मैंने बिल्कुल नहीं सोचा था कि मेरी यात्रा यहां तक आ जाएगी।

आपने वीडियोग्राफर के तौर पर करियर की शुरुआत की थी। एंकरिंग में आना कैसे हुआ?

हमारे यहां एंकरिंग को एक अलग कला माना जाता है, जो कि ठीक नहीं है। मुझे ऐसा लगता है कि अगर आप हार्डकोर रिपोर्टर नहीं हैं तो कभी भी एक अच्छे एंकर नहीं बन सकते हैं। रिपोर्टर को ही मुद्दों की सही और सटीक समझ होती है। मैंने अपने शुरुआती दस साल सिर्फ ग्राउंड वर्क को दिए थे और उसके बाद किसी चीज में कोई कठिनाई महसूस नहीं हुई। वर्तमान में एंकर सबको बनना है, लेकिन हार्डकोर रिपोर्टिंग में मेहनत भी नहीं करनी है। उस दौर में सोशल मीडिया नहीं था, मोबाइल कम थे, किसी से मिलने के लिए भी बहुत मेहनत करनी पड़ती थी और बड़ा अनुशासन था। मैं तो आह्वान करता हूं मीडिया के लोगों का कि जब आप किसी को एंकरिंग करने का मौका दें तो पहले ये देखें कि क्या उस व्यक्ति ने जीवन में अच्छी रिपोर्टिंग की है या नहीं की? मैं स्टूडियो कल्चर को अपनाने वाला आदमी नहीं हूं। मैं अपने शो में एक रिपोर्टर की भावना को लेकर शो को संचालित करता हूं और जब आप ऐसा करते हैं तो लोग आपको अपने आप पसंद करने लग जाते हैं।

आपने बहुत कम मीडिया संस्थानों के साथ काम किया है और बड़ा लंबा काम किया है। ‘सीएनएन न्यूज18’ में यात्रा कैसे शुरू हुई?

दरअसल, मेरे जीवन पर राजदीप सरदेसाई का बड़ा गहरा प्रभाव रहा है। मैं उन्हें दूसरी और अपने आप को तीसरी पीढ़ी के तौर पर गिनता हूं। जब उन्होंने वहां से निकलने का मन बनाया तो उसके बाद अरनब ने भी छोड़ने का निर्णय ले लिया था। इसके बाद मैं भी राजदीप जी के साथ साल 2005 में जुड़ गया। मुझे प्रणव जी की तरफ से रोकने की भी कोशिश हुई लेकिन मैंने जीवन में आगे बढ़ने का निर्णय ले लिया था। हमने साथ में काम किया और एक से एक नायाब स्टोरी कीं। मुझे लगता है कि इंसान को जीवन में समय के साथ निर्णय लेना सीखना चाहिए। आज मैं ‘इंडिया अहेड‘ से जुड़ा हूं और देखता हूं कि कितने युवा, ऊर्जावान और विद्वान मेरे साथी हैं। अगर मैं वहीं 25 साल ‘एनडीटीवी‘ में रहता तो शायद आज जो अनुभव कर रहा हूं, वो नहीं कर पा रहा होता।

जैसा कि आपने बताया कि ‘इंडिया अहेड‘ में बड़े ऊर्जावान साथियों के साथ आप काम कर रहे हैं। डिजिटल के भविष्य को किस तरह से देखते हैं?

मुझे बड़ा गर्व है कि ‘इंडिया अहेड‘ सही मायनों में देश का पहला डिजिटल न्यूज चैनल है, जहां बाकायदा डिजिटल फॉर्मेट में हम कंटेंट तैयार कर रहे हैं, न कि जो टीवी पर चल रहा है, उसी को डाल रहे हैं। आप टीवी और डिजिटल को एक नहीं कर सकते हैं। ऋचा अनिरुद्ध जैसी बुद्धिमान एंकर और लेखिका हमसे जुड़ी हुई हैं। उनका आप शो देखेंगे तो आपको अहसास होगा कि क्यों वो सबसे श्रेष्ठ कही जाती हैं! मैं शर्तिया कह सकता हूं कि डिजिटल में इतनी गहराई के साथ कोई शो नहीं कर सकता है। मेरी टीम में सुमित पांडेय, अद्वैता काला जैसे गुणी लोग हैं तो हम बिल्कुल अलग काम कर रहे हैं। ‘इंडिया अहेड‘ सिर्फ न्यूज फॉर्मेट है, जिसकी कमी महसूस की जा रही थी।

क्या आपको लगता है कि देश में पत्रकारों को लिखने और बोलने की आजादी नहीं है? एक बड़ा वर्ग है जो इस प्रकार की बातें करता है। इस बारे में आपके क्या विचार हैं?

मेरा मत यही है कि इस देश में कोई आपातकाल नहीं है। दरअसल, समस्या यह है कि कुछ लोग जो ये समझते थे कि पत्रकारिता सिर्फ उन्हीं के हिसाब से चलेगी, समस्या उनको हो रही है। उनको लगता था कि देश की जनता की राय बनाने में सिर्फ उनका हाथ है और वो अब अपना काम कर नहीं पा रहे! देश की जनता अब पूरी तरह से जागरूक हो चुकी है और वो फैक्ट्स को जांचना और परखना सीख गई है। ‘सीएनएन आईबीएन‘ में एक हफ्ते तक प्राइम टाइम शुरू होने से पहले और उसके खत्म होने तक पी चिदंबरम जी के लिए माफीनामा चलाया गया था। डॉक्टर स्वामी को एक बार सिर्फ इसलिए बोलने नहीं दिया गया कि मंत्री जी नाराज हो जाएंगे। ये कोई नई चीज नहीं है और सब संस्थानों में पहले भी होती थी। पहले सोशल मीडिया नहीं था तो बात उतनी आगे तक नहीं जाती थी अब कोई भी चीज आग की तरह फैल जाती है और लोग कुछ भी आरोप लगाना शुरू कर देते हैं।

समाचार4मीडिया के साथ भूपेंद्र चौबे की बातचीत का वीडियो आप यहां देख सकते हैं।

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टाटा सन्स के हरीश भट्ट ने मार्केटर्स को दिए टिप्स, किताब से दे रहे सकारात्मकता का संदेश

पिछले दिनों हुई ‘पिच सीएमओ समिट’ (Pitch CMO Summit) 2021  में ‘टाटा सन्स’ (Tata Sons) के ब्रैंड कस्टोडियन हरीश भट्ट (Harish Bhat) ने टाटा ग्रुप की सफलता की कहानी बयां की।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Monday, 27 September, 2021
Last Modified:
Monday, 27 September, 2021
harishbhatt5454

पिछले दिनों हुई ‘पिच सीएमओ समिट’ (Pitch CMO Summit) 2021  में ‘टाटा सन्स’ (Tata Sons) के ब्रैंड कस्टोडियन हरीश भट्ट (Harish Bhat) ने टाटा ग्रुप की सफलता की कहानी बयां की। ‘Future Proofing Brands’ थीम पर हुई इस समिट में उन्होंने बताया कि टाटा ग्रुप किस तरह से तमाम पीढ़ियों से प्रासंगिक बना हुआ है।

हमारी सहयोगी ‘एक्सचेंज4मीडिया’ (exchange4media) के को-फाउंडर और डायरेक्टर नवल आहूजा ने एक सेशन को मॉडरेट किया। इस दौरान भट्ट ने अपनी किताब ‘#Tatastories’ पर भी चर्चा की और उन तथ्यों के बारे में बताया, जिन पर यह आधारित है और जिनके बारे में लोग कम जानते हैं। इसके साथ ही उन्होंने यह भी बताया कि ये तथ्य वर्तमान सीएमओ को कई तरह से कैसे मदद कर सकते हैं।

‘Future Proofing Brands’ के बारे में बात करते हुए भट्ट ने टाटा सन्स का उदाहरण सबके सामने रखा, जो इस साल 153 साल का हो गया है।

उन्होंने कहा, ‘टाटा ब्रैंड इस साल 153 साल का हो गया है। ऐसे कुछ ही ब्रैंड्स हैं जो 100 साल पुराने हैं और 150 साल पुराने ब्रैंड्स तो काफी कम हैं और भी भी आज की दुनिया में प्रासंगिक बने हुए हैं। टाटा समूह 100 बिलियन डॉलर का उद्यम है, जिसका बाजार पूंजीकरण (market cap) 300 बिलियन डॉलर से अधिक है। यह दुनिया के शीर्ष 100 ब्रैंड्स में एकमात्र भारतीय ब्रैंड है और दुनिया भर के 150 देशों में मौजूद है। टाटा ब्रैंड की कहानी अपने आप में काफी अनोखी है।’

इस दौरान भट्ट ने बताया कि उन्हें अपनी हालिया किताब #Tatastories की प्रेरणा कहां से मिली। भट्ट का कहना था, ‘मार्च से अप्रैल, 2020 तक दुनिया में हर जगह सब कुछ ठहर सा गया था। मैं भी घर से काम कर रहा था और यह हमारे जैसे बहुत से लोगों के लिए अच्छा समय नहीं था। तमाम लोगों की नौकरी चली गई थी और कई लोगों की कमाई घट गई थी। ऐसे में मैंने सोचा कि मेरे जैसे व्यक्ति के लिए जो लिखना पसंद करता है, इस नकारत्मकता को दूर करने के लिए सकारात्मक प्रेरक कहानियां लिखूं। टाटा समूह के साथ 34 वर्षों तक काम करने के बाद, इन स्टोरीज को खोजने के लिए टाटा समूह से बेहतर कोई जगह नहीं हो सकती है। मैंने कुछ स्टोरी लिखीं और यह देखने के लिए कि क्या यह लोगों को प्रेरित करती हैं, उन्हें लिंक्डइन पर पोस्ट कर दिया। जल्दी ही मैंने देखा कि इन्हें यूजर्स की ओर से काफी ज्यादा और अच्छी प्रतिक्रिया मिलने लगी। कई युवा महिला प्रोफेशनल्स ने मुझे लिखकर कहा कि वे रात को अपने बच्चों को सोते समय ये कहानियां पढ़कर सुनाती हैं। इससे मुझे और ज्यादा से ज्यादा लिखने का प्रोत्साहन मिला। जब मैंने 30-40 स्टोरी पूरी कर लीं तो मैंने उन्हें एक किताब की शक्ल दे दी। इस किताब की सबसे खास बात यह है कि एक स्टोरी को पढ़ने में छह मिनट से भी कम समय लगता है।’

अपनी इस किताब में भट्ट ने एक अध्याय स्वामी विवेकानंद को समर्पित किया है। यह पूछे जाने पर कि कॉरपोरेट की दुनिया में कैसे एक धार्मिक विद्वान ने अपनी जगह बनाई? भट्ट ने बताया, ‘इस किताब के कवर पेज पप टाटा ग्रुप के फाउंडर जमशेद जी टाटा हैं। उनका दृढ़ विश्वास था कि अगर हमें प्रगति करनी है तो भारत को विज्ञान और प्रौद्योगिकी में एक शोध विश्वविद्यालय की आवश्यकता है।’

हरीश भट्ट के अनुसार, ‘एक बार जेआरडी टाटा जापान से कनाडा की यात्रा कर रहे थे। उस जहाज (ship) पर उनकी मुलाकात स्वामी विवेकानंद से हुई और उन्होंने भारत का पहला शोध विश्वविद्यालय स्थापित करने की बात कही। जब जेआरडी टाटा भारत में वापस आए, तो उन्हें विज्ञान और प्रौद्योगिकी में भारत का पहला शोध विश्वविद्यालय स्थापित करने का विचार आया। अंग्रेजों ने उसमें तमाम बाधाएं डालने की कोशिश की, इसलिए जमशेदजी टाटा ने स्वामी विवेकानंद को एक पत्र लिखा। इस पत्र में उन्होंने लिखा- आप मुझे समुद्री यात्रा के दौरान मिले थे और आपको याद होगा कि हमने एक विश्वविद्यालय के बारे में बात की थी, जिसे मैं स्थापित करना चाहता हूं। मैं उस योजना को मूर्त रूप देना चाहता हूं और क्या आप इस विश्वविद्यालय के पक्ष में एक अपील प्रकाशित करने में मेरी मदद करेंगे।’

भट्ट ने बताया, ‘स्वामी विवेकानंद ने तुरंत जवाब दिया और उस मैगजीन में इसके बारे में लिखा जिसे उन्होंने संपादित किया था। उन्होंने इसके समर्थन में जोरदार अपील की। उसके बाद, मैसूर के महाराजा ने इस विश्वविद्यालय के लिए मैसूर में अपनी जमीन दी और अन्य संसाधन जुटाए गए। आखिरकार, आज जिसे हम भारतीय विज्ञान संस्थान के नाम से जानते हैं, वह अस्तित्व में आया। यह आज भी नंबर एक रैंक वाले विश्वविद्यालय के रूप में बना हुआ है। इस तरह इस देश की भलाई के लिए इस विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए उद्योगपति और धार्मिक विद्वान एक साथ आए।’

इस दौरान भट्ट ने किताब में अपने पसंदीदा अध्याय के बारे में भी बताया। उन्होंने कहा, ’इस किताब में मेरी पसंदीदा स्टोरी कल्पना चावला और जेआरडी हैं। जब कल्पना चावला अंतरिक्ष में गई थीं, तो तो अपने साथ एक पुरानी ब्लैक एंड व्हाइट तस्वीर ले गईं जो उड़ान में जेआरडी की पहली तस्वीर थी। 1982 में 78 वर्ष की आयु में जेआरडी ने भी उड़ान भरी और कल्पना चावला इसे देख रही थीं। इससे उन्हें एक एयरोनॉटिकल इंजीनियर के रूप में अपना करियर बनाने और बाद में नासा में शामिल होने की प्रेरणा मिली।’

भरोसेमंद और टिकाऊ ब्रैंड्स के निर्माण के बारे में भट्ट ने कहा कि इसके लिए गुणवत्ता के साथ जुनून भी होना चाहिए, यह तभी संभव है। उन्होंने कहा, ‘किसी भी व्यवसाय में सबसे पहले आपको आर्थिक पक्ष तैयार करना होता है। ऐसा तब होता है जब आप प्रॉडक्ट्स और सर्विसेज में उत्कृष्टता प्रदान करते हैं ताकि कस्टमर्स वापस आते रहें।’

ब्रैंड्स कम्युनिटी को क्या वापस देते हैं, के बारे में भट्ट ने कहा कि देश में ऐसे तमाम उद्योगपति हैं जिन्होंने समाज को वापस देने का रास्ता दिखाया है। भट्ट ने कहा, ‘मेरा मानना है कि प्रतिस्पर्धी बनें, अच्छे प्रॉडक्ट बनाएं और अपने कस्टमर्स को बनाए रखें, लेकिन इसके ऊपर खुद से पूछें कि आप समाज के लिए क्या कर सकते हैं। मैंने इस समूह के लिए 34 वर्षों तक काम किया है और इस समूह के साथ इतने लंबे समय तक काम करने का एक कारण यह है कि मैं जो कर रहा हूं, वह राष्ट्र के निर्माण में मदद कर रहा है। हमारा सारा मुनाफा टाटा चैरिटेबल ट्रस्ट को जाता है, जिसके पास हमारी कंपनी का 66 फीसदी हिस्सा है।’

 

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आज हर दूसरा व्यक्ति संपादक बना हुआ है, जिससे भ्रम की स्थिति है: वाशिंद्र मिश्र

वरिष्ठ पत्रकार वाशिंद्र मिश्र लगभग 31 वर्षों से पत्रिकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। उन्हें टेलिविजन इंडस्ट्री में 19 वर्षों और प्रिंट इंडस्ट्री में करीब 12 वर्षों का अनुभव है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Monday, 20 September, 2021
Last Modified:
Monday, 20 September, 2021
Vasindra Mishra

वरिष्ठ पत्रकार वाशिंद्र मिश्र लगभग 31 वर्षों से पत्रिकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। उन्हें टेलिविजन इंडस्ट्री में 19 वर्षों और प्रिंट इंडस्ट्री में करीब 12 वर्षों का अनुभव है। समाचार4मीडिया के साथ एक बातचीत में उन्होंने अपने इस सफर के बारे में विस्तार से बात की है। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश-

अपने प्रारंभिक जीवन और शिक्षा के बारे में कुछ बताइए, पत्रकार कैसे बने?

मुझे तो ग्रामीण विरासत मिली है, मैंने अपनी शुरुआती पढ़ाई भी गांव से ही की है। इसके बाद लखनऊ क्रिश्चियन कॉलेज से ग्रेजुएशन करने के बाद लखनऊ यूनिवर्सिटी से वेस्टर्न हिस्ट्री में पोस्ट ग्रेजुएशन किया। उस समय मैं लेखन और पढ़ाई में रुचि लेने लग गया था। ‘पॉयनियर’ में मेरा साप्ताहिक लेख आने लग गया था। जब मैं पीएचडी कर रहा था उसी समय एक वरिष्ठ पत्रकार का सानिध्य मुझे मिला और वहीं से मेरे पत्रकार बनने की कहानी शुरू हुई। शुरु में मुझे रिपोर्टिंग का काम दिया गया था। लगभग 12 साल तक मैंने प्रिंट में काम किया है और बड़े-बड़े अखबार जैसे ‘हिंदुस्तान टाइम्स‘ तक की टीम के साथ मुझे काम करने का मौका मिला। उसके बाद मैं टीवी पत्रकारिता में आ गया।

जब मैं ‘जी मीडिया‘ में आया तो मुझे लखनऊ ब्यूरो का चीफ बनाकर भेजा गया। उसके बाद मेरी मेहनत से प्रभावित होकर मुझे दिल्ली बुला लिया गया और बाद में प्रादेशिक चैनल्स की जिम्मेदारी मुझे दे दी गई। शुरू में यूपी से हमने शुरू किया और बाद में एमपी, राजस्थान और बिहार जैसे कई राज्यों में हमने प्रादेशिक चैनल शुरू किया और मुझे एडिटर की जिम्मेदारी दी गई। उसके बाद ‘नेटवर्क18‘ ग्रुप में सलाहकार संपादक की भूमिका में भी काम किया। इसके बाद एक और चैनल को रीलॉन्च किया और वर्तमान में मैं अपने खुद के डिजिटल नेटवर्क को बड़ा करने की कोशिश कर रहा हूं।

जैसा कि आपने बताया कि आपने 12 साल प्रिंट में काम किया तो कोई खास वजह रही कि आप फिर प्रिंट को छोड़कर टीवी में चले गए?

दरअसल,, जब टीवी इंडस्ट्री आगे बढ़ने लगी तो उस समय विद्वान लोग उनके पास नहीं थे। लगभग सभी बड़े लोग प्रिंट में होते थे तो टीवी में जितने भी लोग शुरुआती दौर में शामिल हुए, वो सब प्रिंट से ही थे। मेरे साथ भी कमोबेश यही हुआ था। मेरे भी दो सीनियर साथियों ने मुझे टीवी में आने का आग्रह किया था और मैं मना नहीं कर पाया। इसके अलावा मुझे लगता है कि प्रिंट में टैलेंट अधिक है और कार्यप्रणाली भी उत्तम है। प्रिंट में आप इतनी आसानी से किसी भी खबर को पेज पर नहीं छाप सकते हैं। उसका अपना एक तरीका है लेकिन टीवी में कई बार ऐसी गलती होती है। इसके अलावा आज भी प्रिंट का पत्रकार सामाजिक मुद्दों को लेकर अधिक मुखर है, लेकिन टीवी में कहीं ना कहीं ग्लैमर अधिक है। टीवी में ऐसा लगता है कि बस आदमी अपनी नौकरी कर रहा है, लेकिन प्रिंट में अखबार छपने के बाद भी घंटों उस पर बात चलती रहती है।

आपने बताया कि आपको ‘जी मीडिया‘ के प्रादेशिक चैनल्स की कमान दी गई। क्या आपको ऐसा लगता है कि इस देश में रीजनल मीडिया को उतनी तवज्जो नहीं दी जाती?

मुझे ऐसा लगता है कि रीजनल चैनल अधिक शक्तिशाली होते हैं। दरअसल लोकल स्तर की खबरें जो आम आदमी से जुड़ी हुई रहती हैं, वो रीजनल मीडिया ही दिखा सकता है, नेशनल मीडिया नहीं। नेशनल मीडिया के पास उतना स्पेस नहीं होता कि वो छोटी-छोटी खबरों को जगह दे सके। अखबार को ही आप देख लीजिए, लोग सभी प्रकार के अखबार पढ़ते हैं लेकिन हां, भाषा कभी-कभी समस्या बन जाती है। दक्षिण में आप देखिए कि कैसे वहां के स्थानीय स्तर के चैनल और समाचार पत्र हमसे अच्छा कर रहे हैं जबकि मध्य भारत में ऐसा नहीं देखने को मिलता है। इसके लिए हिंदी चैनल लाने वाले लोग भी उतने ही जिम्मेदार हैं, जितना कि एक हिंदी का पत्रकार, अगर आप अपने दर्शकों से जुड़ नहीं सकते हैं और उनके हिसाब से आप कंटेंट नहीं बना सकते हैं तो वो आपसे रिश्ता तोड़ लेता है।

क्या आपको संपादक रहते हुए कभी ऐसा महसूस हुआ कि रीजनल टीवी में पत्रकार को डराना धमकाना अधिक होता है? क्या उतनी आसानी से सुनवाई होती है?

मेरे अनुसार यह समस्या सिर्फ टीवी नहीं बल्कि हर जगह आती है। इसमें रीजनल और नेशनल का कोई भेद नहीं है और पूरी जांच भी करनी जरूरी होती है। मैं आपको प्रिंट का एक उदाहरण देता हूं। वर्षों पहले ‘एनबीटी‘ के एक जिला स्तर के पत्रकार ने एक खबर छापी, जिसको लेकर डीएम और एसपी नाराज थे। पत्रकार के खिलाफ मुकदमे लिखकर जेल भेजने की कोशिश हुई और स्थानीय पत्रकार प्रदर्शन करने लगे। धीरे-धीरे वो मुद्दा राष्ट्रीय स्तर का मुद्दा बन गया। फिर प्रेस काउंसिल की एक फैक्ट चेक करने वाली कमेटी को भेजा गया और जांच में पाया गया कि उस जिला स्तर के पत्रकार ने अपनी विचारधारा के तहत खबरों को अलग मोड़ दिया और एसपी और डीएम के निजी जीवन पर भी गलत लिखा, वहीं पशुओं की तस्करी में भी स्थानीय मीडिया की भूमिका संदिग्ध थी। इसलिए मेरा कहना यह है कि कोई भी मामला रीजनल बनाम नेशनल नहीं होता। अच्छे से जांच लगभग सभी मामलों की होती रही है। हालांकि कुछ सालों से मैं चीजों में बदलाव देख रहा हूं। पहले पत्रकार का एक नियम होता था कि वो दोनों पक्षों को अपनी रिपोर्ट में जगह देता था लेकिन वर्तमान में ये चीज बदल गई है। आजकल मैं देख रहा हूं कि ज्यादातर बस एक ही पक्ष को दिखाया जाता है। अगर आप पक्ष में लिख रहे हैं तो ठीक लेकिन अगर आप आलोचक हैं तो आपको दुश्मन की तरह मान लिया जाता है। इसलिए अब वो संस्थान खत्म हो रहे हैं, जो ईमानदारी की मिसाल हुआ करते थे।

जैसा कि आपने बताया कि आपने वर्तमान में अपने डिजिटल चैनल की जिम्मेदारी संभाली हुई है तो क्या आपको लगता है कि अब डिजिटल ही भविष्य है?

मुझे पूरी तरह से ऐसा नहीं लगता है। दरअसल डिजिटल में पिछले कुछ समय से फेक कंटेंट की शिकायत बड़ी आ रही है और ऐसे में लोग इससे परेशान हो रहे हैं। मुझे नहीं लगता है कि यह मीडिया का विकल्प बन सकता है। आज हर दूसरा व्यक्ति संपादक बना हुआ है और इससे भ्रम की स्थिति बनी हुई है। कई लोग तो बस एजेंडा चलाते हुए दिखाई दे रहे हैं और ऐसे में उसकी उम्र कितनी होगी, कह नहीं सकते! कई लोग जो अखबार और टीवी में अपने बेकार काम के कारण निकाल दिए गए और अब यहां आकर अपनी कुंठा निकाल रहे हैं। आज देश डिजिटल क्रांति की ओर बढ़ चुका है और ऐसे में आप देश की जनता को अपनी एकतरफा रिपोर्टिंग से पागल नहीं बना सकते है। अब वो समय खत्म हो गया है कि एक पत्रकार मामले को तूल देकर अपना हित साध ले, ऐसा करने वाले अब खत्म होने की कगार पर है। कुछ पत्रकार विदेशी घटनाओं में भी भारत को घसीटने का काम करते हैं, लेकिन एक-दो दिन से अधिक वो मुद्दा चलता नहीं है। अब जनता जागरूक और समझदार हो चुकी है। 

क्या आपको ऐसा लगता है कि देश में आज लिखने और बोलने की आजादी नहीं है?

नहीं! मैं ऐसा बिल्कुल भी नहीं मानता हूं कि देश में बोलने और लिखने की आजादी नहीं है। अगर ऐसा नहीं होता तो हम और आप संवाद कैसे कर रहे होते? दरअसल ये एजेंडा कुछ लोगों की कुंठा का नतीजा है। संविधान ने आपको अधिकार दिए हैं तो सीमाएं भी बनाई हैं। समस्या तब आती है जब आप अधिकारों की आड़ में सीमाओं को लांघ जाते हैं। एक आम आदमी से लेकर पीएम तक सब दायरे से बंधे हुए हैं। हमें एक जागरूक और समझदार पत्रकार होकर बात कहनी चाहिए। देश सबसे बड़ा होता है, अगर कोई मीडिया हाउस किसी अखबार या चैनल को चला रहा है तो उसकी एक पॉलिसी होती है और हर व्यक्ति को उसे समझना चाहिए।

समाचार4मीडिया के साथ वाशिंद्र मिश्र की बातचीत का वीडियो आप यहां देख सकते हैं।

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India Ahead के इन सवालों पर योगी आदित्यनाथ ने कुछ यूं रखी ‘मन की बात’

‘इंडिया अहेड’ के एडिटर-इन-चीफ और सीईओ भूपेंद्र चौबे, ऋचा अनिरुद्ध और अद्वैता काला ने एक खास कार्यक्रम के जरिये उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के साथ संवाद किया।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Wednesday, 08 September, 2021
Last Modified:
Wednesday, 08 September, 2021
Interview

उत्तर प्रदेश में अगले विधानसभा चुनाव में अब छह महीने से भी कम का समय बचा है और ऐसे में सबकी निगाहें सीएम योगी आदित्यनाथ पर टिकी हुई हैं कि कैसे वह इतने प्रचंड बहुमत को बरकरार रख पाएंगे। ‘इंडिया अहेड’ (India-Aheadd) के एडिटर-इन-चीफ और सीईओ भूपेंद्र चौबे, ऋचा अनिरुद्ध और अद्वैता काला कुछ ऐसे ही सवालों के जवाब लेने के लिए सीएम योगी से मिलने पहुंचे और एक खास कार्यक्रम के जरिये उनके साथ संवाद किया। यह इंटरव्यू अपने आप में इसलिए भी खास रहा, क्यूंकि इसमें व्यापर जगत की बड़ी हस्तियां भी शामिल हुईं और सीएम योगी से विकास के रोडमैप पर उन्होंने चर्चा की। अपने इस इंटरव्यू में सीएम योगी ने लगभग सभी बड़े मुद्दों पर बेबाकी से जवाब दिए। भूपेंद्र चौबे, ऋचा अनिरुद्ध और अद्वैता काला ने यूपी की राजनीति से जुड़े सभी अहम सवाल तो उनसे पूछे ही, इसके अलावा भी देश-विदेश के मुद्दों पर भी उनकी राय जानी। आइये जानते हैं कि इस इंटरव्यू की बड़ी बातें क्या रहीं-

कोरोना नियंत्रण: आज यूपी वैक्सीन लगाने के मामले में टॉप पर बना हुआ है और कोरोना के नियंत्रण में भी सफलता प्राप्त की है। वहीं, केरल जैसे राज्यों में आज भी 30 हजार से अधिक केस आ रहे हैं। सीएम योगी ने कहा कि जब देश ने स्वदेशी वैक्सीन का उत्पादन किया तो विपक्ष ने दुष्प्रचार करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। इसे बीजेपी की वैक्सीन का नाम दे दिया गया, जिसका परिणाम यह हुआ कि उन लोगों की बातों में आकर कई लोगों ने वैक्सीन से दूरी बनाई और दूसरी लहर की चपेट में आ गए। योगी ने कहा कि इस पाप का जवाब जनता विपक्ष से लेगी। उन्होंने कहा कि आज 24 करोड़ की आबादी में सिर्फ 22 केस आए हैं। हमारे 28 जनपद कोरोना मुक्त हैं और इसके साथ-साथ समय-समय पर हम सैनिटाइजेशन का कार्य कर रहे हैं।

अर्थव्यवस्था: इस बारे में सवाल पूछे जाने पर सीएम योगी ने कहा कि जब हम वर्ष 2017 में आए थे, तब उत्तर प्रदेश देश की छठी अर्थव्यवस्था था और आज नंबर दो पर है। इसके लिए हमने बेहतर कानून व्यवस्था को आधार बनाया और फिर निवेशकों के लिए निवेश करने का माहौल बनाया, हमने इंफ्रास्ट्रक्चर पर कार्य किया। पहले प्रदेश की पहचान थी कि जहां से गड्ढे शुरू हों वो उत्तर प्रदेश, लेकिन आज जहां से फोरलेन शुरू हों, वो उत्तर प्रदेश है। चाहे आप दिल्ली से आइये, हरियाणा से आइये, बिहार से आइये, उत्तराखंड से आइये, राजस्थान से आइये, मध्यप्रदेश से आइये.. हमने अलग पहचान बनाई। इसके साथ साथ परंपरागत उद्यम को प्रोत्साहन दिया, एक डिस्ट्रिक एक उत्पाद इसका उदाहरण है।

ओबीसी फैक्टर: राष्ट्रीय जनगणना और जातीय जनगणना को लेकर भी राजनीति तेज हो रही है तो यह कैसे चुनाव को प्रभावित कर सकती है? यह पूछने पर सीएम योगी ने कहा कि जातिगत राजनीति ने उत्तर प्रदेश और बिहार को बदहाल कर दिया था। दलित, पिछड़ा वंचित समाज को कहीं का नहीं छोड़ा था। कोई भी पार्टी नहीं कह सकती कि उन्हें मौका नही मिला, कांग्रेस ने सबसे ज्यादा उत्तर प्रदेश में राज किया और क्या किया उन्होंने यहां के लिए? यूपी का नौजवान, महिला और किसान सब कुछ जानते हैं और वो भारतीय जनता पार्टी के ही साथ हैं।

गुंडाराज का खात्मा और विपक्ष के आरोप: जब सीएम योगी से यह पूछा गया कि पूर्व सीएम अखिलेश यादव कह रहे हैं कि वो 400 सीट लाएंगे और जनता आपसे खुश नहीं है तो उसके जवाब में सीएम योगी ने कुछ आकंड़े दिए। उन्होंने कहा कि सपा, बसपा और कांग्रेस के संबंध माफिया मुख्तार से थे, उसे कुचलने का काम हमने किया है। हम महिलाओं के लिए मिशन शक्ति अभियान चला रहे हैं। थानों में महिला सहायता डेस्क और तहसीलों में अलग से महिलाओं की सुनवाई के कार्य हो रहे हैं वहीं पुलिस भर्ती में 20 फीसदी बालिकाओं की भर्ती की गई। बुंदेलखंड में पहले भीषण जल संकट था। हम सुनिश्चित कर रहे हैं कि लोगों को अब साफ पानी मिले, हम आरओ प्लांट लगा रहे हैं। बुंदेलखंड में पर्यटन रफ्तार पकड़ रहा है। चित्रकूट आज बिल्कुल अलग दिखता है, पिछली सरकारों ने राजनीतिक कारणों से बुंदेलखंड को समृद्ध नहीं होने दिया और अब हम उसे बदल रहे हैं।

‘इंडिया अहेड’ के एडिटर-इन-चीफ और सीईओ भूपेंद्र चौबे, ऋचा अनिरुद्ध और अद्वैता काला का सीएम योगी के साथ यह इंटरव्यू आप यहां देख सकते हैं।

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